त्रिजट ऋषि - जिन्होंने अपनी सूझ बूझ से श्रीराम से सहस्त्रों गायें दान में प्राप्त की

त्रिजट ऋषि
रामायण असंख्य छोटी बड़ी अद्भुत कथाओं से भरा पड़ा है। ऐसी ही एक कथा है त्रिजट ऋषि की जिन्होंने अपनी सूझ बूझ से श्रीराम से सहस्त्रों गौवें दान में प्राप्त की। इनकी कथा वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में आती है। वैसे तो संसार में एक से एक दानी व्यक्ति हुए हैं रामायण के अयोध्या कांड में जैसा वर्णन श्रीराम द्वारा दान दिए जाने का है, वो उन्हें भी एक श्रेष्ठ दानी सिद्ध करता है। इसी सन्दर्भ में ऋषि त्रिजट की कथा आती है।

पुनर्जन्म की सच्चाई

पुनर्जन्म की सच्चाई
विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद से लेकर वेद, दर्शनशास्त्र, पुराण, गीता, योग आदि ग्रंथों में पुनर्जन्म की मान्यता का प्रतिपादन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार शरीर का मृत्यु ही जीवन का अंत नहीं है बल्कि जन्म जन्मांतर की श्रृंखला है। पुराण आदि में भी जन्म और पुनर्जन्मों का उल्लेख है। जीवात्मा पुनर्जन्म लेती है।

यक्षिणियाँ कौन होती हैं?

यक्षिणियाँ कौन होती हैं?
हिन्दू धर्म में कई जातियों का वर्णन है। ये तो हम सभी जानते हैं कि परमपिता ब्रह्मा ने ही पूरी सृष्टि का निर्माण किया। उसे सँभालने के लिए उन्होंने अपने मानस पुत्रों को प्रकट किया। उनमें से ही एक थे महर्षि मरीचि जो सप्तर्षियों में से एक थे। उनके पुत्र थे महर्षि कश्यप जिन्होंने प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया और उनके ही संतानों से अनेकानेक जातियों का जन्म हुआ। महर्षि कश्यप से उत्पन्न जातियों के बारे में जानने के लिए यहाँ जाएँ।

विश्व का सबसे अमीर और रहस्य्मयी मंदिर - श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर

आठवीं सदी में एक महान विष्णु भक्त थे जो सदैव श्रीहरि की साधना में लीन रहते थे। उनकी बस एक ही इच्छा थी कि किसी भी प्रकार उन्हें श्रीहरि के महाविष्णु स्वरुप के दर्शन हो जाएँ। किन्तु हर दिन एक बालक उनकी तपस्या को भंग करने का प्रयास करता था। एक दिन जब वो बालक उन्हें परेशान करने आया तो उन्होंने उसे पकड़ लिया।

भानुमति

भानुमति
महाभारत में स्त्री चरित्रों को बहुत प्रमुखता से दिखाया गया है। चाहे वो द्रौपदी हो, कुंती हो अथवा गांधारी, महाभारत स्त्री सशक्तिकरण का एक जीवंत उदाहरण है। हालाँकि कुछ स्त्री चरित्र ऐसे भी हैं जो गौण हैं किन्तु उससे उनका महत्त्व कम नहीं होता। ऐसा ही एक चरित्र है भानुमति का।

गणेश जी ने भी दिया था गीता ज्ञान - श्री गणेश गीता

गणेश गीता
हम सभी महाभारत में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए अद्वितीय ज्ञान, अर्थात श्रीमद्भगवतगीता के विषय में तो जानते ही हैं। महाभारत के भीष्म पर्व के आरम्भ में ज्ञान का ये अथाह सागर वर्णित है जिसमें १८ अध्याय एवं कुल ७०० श्लोक है। किन्तु क्या आप ये जानते हैं कि श्रीगणेश ने भी गीता का ज्ञान दिया था जो गणेश गीता के नाम से प्रसिद्ध है।

ऋष्यमूक पर्वत

ऋष्यमूक पर्वत
हम सभी ने रामायण में ऋष्यमूक पर्वत के विषय में सुना ही है। ये हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण पर्वतों में से एक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि ऋष्यमूक पर्वत आज के कर्नाटक राज्य के हम्पी में स्थित था। उसी स्थान पर वानर साम्राज्य किष्किंधा हुआ करता था, ऐसी मान्यता है।

वर्ष में दो बार नवरात्रि क्यों मनाई जाती है?

वर्ष में दो बार नवरात्रि क्यों मनाई जाती है?
आपमें से कई लोगों को ये पता होगा कि नवरात्रि वर्ष में दो बार मनाई जाती है। हालाँकि बहुत ही कम लोगों को ये पता होगा कि वास्तव में वर्ष में चार बार नवरात्रि का पर्व आता है। अर्थात हर तिमाही में एक बार नवरात्रि मनाई जाती है। आइये पहले इन चारों नवरात्रियों के नाम और समय को जान लेते हैं:

कुबेर से भी कर लेने वाले श्रीराम के परदादा - महाराज रघु

कुबेर से भी कर लेने वाले श्रीराम के परदादा - महाराज रघु
महाराज खटांग के पुत्र थे महाराज दिलीप। एक बार ये अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में गए जहाँ इन्होने उनकी गाय कामधेनु पुत्री नंदिनी की रक्षा का प्रण कर लिया। वे नंदिनी को लेकर वन गए जहाँ पर नंदिनी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक माया सिंह उत्पन्न किया। उस सिंह ने नंदिनी पर आक्रमण किया जिसकी रक्षा के लिए महाराज दिलीप ने उस सिंह पर अनेक बाण चलाये किन्तु सारे व्यर्थ हुए।

जब ब्रह्मदेव और देवर्षि नारद ने एक दूसरे को श्राप दे दिया

जब ब्रह्मदेव और देवर्षि नारद ने एक दूसरे को श्राप दे दिया
ये तो हम सभी जानते हैं कि देवर्षि नारद परमपिता ब्रह्मा के ही मानस पुत्र हैं। हम ये भी जानते हैं कि देवर्षि नारद भगवान श्रीहरि के अनन्य भक्त हैं। इनके जन्म के विषय में भी आपने कई कथाएं सुनी होगी। किन्तु पुराणों में एक कथा ऐसी आती है कि इन्होने अपने पिता भगवान ब्रह्मा को और ब्रह्मा जी ने इन्हे परस्पर श्राप दे दिया था।

कृपाचार्य

कृपाचार्य
महर्षि गौतम और उनकी पत्नी अहिल्या के विषय में तो हम सभी जानते ही हैं। इनका वर्णन मुख्य रूप से रामायण में किया गया है। रामायण के साथ साथ महाभारत में भी इनका वर्णन आता है। हालाँकि इन दोनों ग्रंथों में इनके अलग-अलग पुत्रों का वर्णन है। रामायण के अनुसार महर्षि गौतम के पुत्र ऋषि शतानन्द थे जो महाराज जनक के कुलगुरु थे। जब महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण के साथ जनकपुरी पहुंचे तो वहां शतानन्द जी का विस्तृत वर्णन है।

महर्षि दुर्वासा तक को विवश करने वाले - महाराज अम्बरीष

महर्षि दुर्वासा तक को विवश करने वाले - महाराज अम्बरीष
कुछ समय पहले हमने श्रीराम के पूर्वज महाराज युवनाश्व के विषय में लेख प्रकाशित किया था जिन्होंने गर्भ धारण किया था। उन्होंने ने ही मान्धाता नामक महान पुत्र को जन्म दिया। मान्धाता ने सौ राजसूय यज्ञ किये। साथ ही यही वो पहले सूर्यवंशी सम्राट थे जिन्होंने चंद्रवंशियों से सम्बन्ध बनाये। इनके विषय में हम किसी और लेख में विस्तार से जानेंगे।

हयग्रीव कौन हैं और हिन्दू धर्म में कितने हयग्रीवों का वर्णन है?

हयग्रीव कौन हैं और हिन्दू धर्म में कितने हयग्रीवों का वर्णन है?
भगवान हयग्रीव श्रीहरि के २४ अवतारों में से एक हैं। हालाँकि हिन्दू धर्म में उनके अतिरिक्त हयग्रीव नाम के एक दानव, एक दैत्य और एक राक्षस भी हुए हैं, इसीलिए लोगों को ये शंका होती है कि वास्तव में हयग्रीव आखिरकार कितने थे? अलग-अलग पुराणों में भी हयग्रीव के विषय में अलग-अलग कथा दी गयी है जो इसे और भी जटिल बनाती है। तो चलिए इसे समझते हैं।

गरुड़ एवं नागों में शत्रुता क्यों थी?

गरुड़ एवं नागों में शत्रुता क्यों थी?
कुछ समय पहले हमें महर्षि कश्यप और उनकी सभी पत्नियों से मुख्य जातियों की उत्पत्ति के विषय में एक वीडियो बनाया था जिसे आप यहाँ देख सकते हैं। संक्षेप में महर्षि कश्यप ने प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया जिनसे १७ प्रमुख जातियों की उत्पति हुई। इसी कारण महर्षि कश्यप प्रजापति के नाम से भी जाने जाते हैं। इनकी दो-दो पत्नियों से जो पुत्र हुए उनके बीच की शत्रुता प्रसिद्ध है।

केवल सुख को ही अपना ध्येय मानने वाले - "चार्वाक"

केवल सुख को ही अपना ध्येय मानने वाले - "चार्वाक"
काम एवैकः पुरुषार्थः

अर्थात: काम (भोग विलास) ही एकमात्र पुरुषार्थ है।

इस एक वाक्य से आपको चावार्क दर्शन की मानसिकता समझ में आ जाएगी। हिन्दू धर्म में ९ मुख्य दर्शन बताये गए हैं। उनमें से छः दर्शन आस्तिकवादी हैं और ३ नास्तिकवादी। इन ३ नास्तिकवादी दर्शनों में भी जो चावार्क दर्शन है वो घोर भौतिकवादी है। अर्थात चावार्क दर्शन के अनुसार जीवन का एकमात्र उद्देश्य केवल भोग विलास में लिप्त रहना है। किन्तु इससे पहले हम इस दर्शन को समझें, हमें चावार्क क्या है, ये जानना होगा।

भोलेनाथ को मांस अर्पण करने वाला महान भक्त - कन्नप्पा नयनार

भोलेनाथ को मांस अर्पण करने वाला महान भक्त - कन्नप्पा नयनार
हिन्दू धर्म में महादेव के एक से बढ़कर एक भक्तों का वर्णन मिलता है। किन्तु उनमें से एक भक्त ऐसे भी थे जो किसी भी पूजा विधि को नहीं जानते थे। उन्होंने हर वो चीज की जो शास्त्र विरुद्ध है और जिसे पाप माना जाता है, किन्तु फिर भी महादेव ने उन्हें दर्शन दिए। वे इस बात को सिद्ध करते हैं कि महादेव केवल अपने भक्त के भाव देखते हैं, पद्धति नहीं। उनका नाम था कन्नप्पा।

समुद्र मंथन

समुद्र मंथन
समुद्र मंथन हिन्दू धर्म की सबसे रोचक कथाओं में से एक है। इसका विस्तृत वर्णन विष्णु पुराण में दिया गया है। समुद्र मंथन क्यों करना पड़ा इसके ऊपर हम पहले ही एक लेख लिख चुके हैं और वीडियो बना चुके हैं। उसे आप यहाँ देख सकते हैं। समुद्र मंथन कहाँ हुआ उसके विषय में भी एक वीडियो बनाया जा चुका है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं।

संक्षेप में कथा ये है कि महर्षि दुर्वासा ने इंद्र देव के अभिमान के कारण उन्हें श्राप दिया जिससे सारी पृथ्वी श्रीहीन हो गयी। जब असुरों को इसका पता चला तो उन्होंने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया और वहां अपना आदिपत्य जमा लिया। देवता विश्रांत हो परमपिता ब्रह्मा की शरण में आये। ब्रह्मदेव सबको लेकर श्रीहरि विष्णु के पास गए।

जब श्रीहरि ने ये सुना तो उन्होंने कहा कि दैवयोग से इस समय दैत्यों का बल प्रबल है अतः उनसे युद्ध कर स्वर्ग को प्राप्त करना कठिन होगा। इसी कारण आप सभी उन्हें समुद्र मंथन करने के लिए मनाइये। मंथन से अनेकानेक रत्न प्राप्त होंगे जिन्हे देव और दैत्य आपस में बाँट सकते हैं। इससे पृथ्वी पुनः श्रीयुक्त हो जाएगी। आप सबकी सहायता के लिए त्रिदेव तत्पर रहेंगे।

श्रीहरि की ऐसी बात सुनकर इन्द्रादि देवता देवगुरु बृहस्पति के नेतृत्व में दैत्यराज बलि के पास गए। ब्रह्मा जी और श्रीहरि की आज्ञा मान कर दैत्यों ने देवों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करना स्वीकार किया। त्रिदेवों के मार्गदर्शन में सभी पर्वतों ने समस्त प्रकार की औषधियां लेकर समुद्र में डाली गयीं। अब प्रश्न था कि इतने विशाल समुद्र को मथने के लिए मथनी कहाँ से लायी जाये?

तब ब्रह्मा जी के सुझाव पर सब पर्वतराज मंदराचल के पास पहुंचे ताकि उन्हें मथनी बनाया जा सके। मंदराचल को जब इस कार्य का पता चला तो उन्होंने सहर्ष अपनी स्वीकृति दे दी। किन्तु समस्या थी कि उन्हें वहां से समुद्र तक कैसे ले जाया जाये? देव और दैत्य दोनों उस महान पर्वत को उठाने में असमर्थ रहे। तब सबने श्रीहरि से सहायता मांगी।

इस पर श्रीहरि ने तत्काल ही उस पर्वत को उखाड़ दिया और उसे गरुड़ की पीठ पर रख कर समुद्र के समीप आये। वहां उन्होंने उस पर्वत को समुद्र में डाल दिया। किन्तु समुद्र में जाते ही वो पर्वत डूबने लगा। ऐसे में मंथन कैसे हो? तब पुनः श्रीहरि ने उनकी सहायता की और दूसरे दशावतार अर्थात कच्छप रूप में वे प्रकट हुए। उस कच्छप के पीठ का विस्तार १००००० योजन था। उन्होंने समुद्र के तल पर जाकर उसे अपनी पीठ पर स्थापित किया।

अब प्रश्न उठा कि इतने बड़े पर्वत को मथने के लिए नेती, अर्थात रस्सी कहाँ से ले जाये। तब महादेव ने अपने गले से नागराज वासुकि को उतार कर इस कार्य के लिए दिया। मंथन के घर्षण से वासुकि को कष्ट ना हो इसीलिए महादेव ने उन्हें गहन निद्रा का वरदान दिया। तब वासुकि को नेति बना कर उस मंदराचल पर्वत पर लपेटा गया।

देवर्षि नारद ने यहाँ चतुराई दिखाई और देवताओं को वासुकि के मुख का भाग पकड़ने को कहा। ये देख कर दैत्यों से सोंचा कि मुख पकड़ने में अवश्य ही कोई लाभ है इसीलिए उन्होंने हठ किया कि दैत्य ही वासुकि के मुख की ओर रहेंगे। देवता यही चाहते थे, उन्होंने सहर्ष इस बात को स्वीकार कर लिया। अब श्रीहरि ने देवों और दैत्यों में शक्ति का संचार किया और भगवान कच्छप के एक लाख योजन चौड़े पीठ पर समुद्र मंथन आरम्भ हुआ।

किन्तु तीव्रता से घूमने के कारण अब पर्वत बहुत हिलने-डुलने लगा और समुद्र छोड़ ऊपर की ओर उठने लगा। तब परमपिता ब्रह्मा स्वयं उस पर्वत के शिखर पर बैठ गए ताकि संतुलन बना रहे। तब कही जाकर समुद्र मंथन सुचारु ढंग से चल पाया।

जब मंथन आरम्भ हुआ तब दैत्यों को पता चला कि वासुकि का मुख पकड़ कर उन्होंने गलती कर दी है। घर्षण के कारण वासुकि के मुख से घोर ताप निकलने लगा जिससे दैत्यों का शरीर जल कर काला पड़ने लगा। उधर वही ताप वासुकि की पूंछ पकडे देवताओं पर वर्षा कर उन्हें सुख पहुँचाने लगा। किन्तु अब किया भी क्या जा सकता था। दैत्यों ने गलती मानने के स्थान पर उस कष्ट को सहना ही उचित समझा।

मंथन जोर शोर से चलने लगा। सब प्रतीक्षा कर रहे थे कि समुद्र से पहला रत्न कौन सा निकलता है। तभी पहले रत्न के रूप में समुद्र से घोर हलाहल निकला। कई स्थानों पर इसे कालकूट भी कहा गया है किन्तु कालकूट एवं हलाहल अंतर है। हलाहल, कालकूट और अन्य प्रकार के विष के विषय में जानने के लिए यहाँ जाएँ।

उस घोर गरल से सारी सृष्टि नष्ट होने लगी। तब सभी ने एक स्वर में महादेव को पुकारा। अपने भक्तों का कष्ट देख कर महादेव ने उस हलाहल को पी लिया। किन्तु माता पार्वती के आग्रह पर उन्होंने उस विष को अपने कंठ में ही स्थित कर लिया जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया। ये देख कर सबने उनकी जय जयकार की और श्रीहरि ने उन्हें "नीलकंठ" नाम दिया।

वर्णित है कि समुद्र मंथन से कुल ८४ रत्नों की प्राप्ति हुई जिनमें से १४ मुख्य रत्न माने जाते हैं और ७० गौण रत्न। इसका विवरण हमें विष्णु पुराण के इस श्लोक से मिलता है।

लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुराधन्वन्तरिश्चन्द्रमाः।
गावः कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवांगनाः।।
अश्वः सप्तमुखो विषं हरिधनुः शंखोमृतं चाम्बुधेः।
रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्यात्सदा मंगलम्।।

आइये उन सभी १४ मुख्य रत्नों के विषय में संक्षेप में जान लेते हैं।

हलाहल
हलाहल:
इसे ब्रह्माण्ड का सबसे घातक विष माना जाता है। इसकी तीव्रता स्वयं शेषनाग के विष से भी अधिक मानी गयी है। इसकी तुलना महादेव के तीसरे नेत्र की ज्वाला के १००वें भाग से की गयी है। यही नहीं इसकी शक्ति के सामने देवताओं की अमरता भी नहीं ठहर सकती। अर्थात हलाहल की तीव्रता स्वयं अमृत की शक्ति को भी क्षीण कर सकने में सक्षम थी। सृष्टि की रक्षा के लिए महादेव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाये।

ऐरावत
ऐरावत:
चार दांतों और पांच सूंडों वाले इस अद्भुत श्वेतवर्णित गज का प्रादुर्भाव समुद्र मंथन से हुआ। ऐरावत का अर्थ है "इरा", अर्थात जल से उत्पन्न होने वाला। ऐरावत ने ही कालांतर में महर्षि दुर्वासा की माला तोड़ दी थी जिससे दुर्वासा ने इंद्र को श्राप दिया। उसी श्राप के कारण श्री सहित ऐरावत का भी लोप हो गया था जिसे पुनः समुद्र मंथन से प्राप्त किया गया। इसे देवराज इंद्र ने पुनः अपने वाहन के रूप में स्वीकार किया।

कामधेनु
कामधेनु:
कामधेनु को प्रथम गौ कहा गया है। इनका एक नाम सुरभि भी है। यही नंदिनी गाय की माता भी हैं। महादेव के ११ रुद्रावतार इन्ही कामधेनु के पुत्र माने गए हैं। कहा जाता है कि कामधेनु में सभी देवताओं का वास है। इन्ही से समस्त गौ और महिष (भैंस) जाति की उत्पत्ति हुई। इसे भी स्वर्गलोक में रखा गया जिसपर बाद में देवताओं का अधिकार हो गया। बाद में इनकी पुत्री नंदिनी को ब्रह्मा पुत्र महर्षि वशिष्ठ ने प्राप्त किया।

उच्चैःश्रवा
उच्चैःश्रवा:
इसे अश्वों का राजा कहा गया है। इनके सात मुख थे और इनका रंग पूर्ण श्वेत था। इसकी शक्ति अपार बताई गयी है और इसे मन की गति से चलने वाला अश्व कहा गया है। श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को अश्वों में उच्चैःश्रवा कहा है। उस समय दैत्यराज बलि ने इसे प्राप्त किया किन्तु बाद में इंद्र ने इस पर अपना अधिकार कर लिया। आगे चल कर तारकासुर ने इसे इंद्र से छीन लिया था। कार्तिकेय द्वारा तारकासुर का वध होने के पश्चात इंद्र ने पुनः इसे प्राप्त किया। इसी अश्व के रंग को लेकर महर्षि कश्यप की पत्नी कुद्रू एवं विनता में शर्त लगी थी जिसे कुद्रू ने छल से जीत लिया था। 

कौस्तुभ मणि
कौस्तुभ मणि:
सूर्य की आभा को भी फीकी कर देने वाली ये मणि संसार में सर्वश्रेठ मानी जाती है। देवों और दैत्यों ने इसे श्रीहरि को प्रदान किया। ये मणि सदैव श्रीहरि के ह्रदय के पास रहती है। महाभारत में श्रीकृष्ण के पास भी इस मणि के होने का वर्णन आता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार ये मणि कालिया नाग के पास थी और श्रीकृष्ण द्वारा उसके मर्दन के पश्चात उसने ये मणि उन्हें दे दी।

कल्पवृक्ष
कल्पवृक्ष:
ये एक अद्भुत दिव्य वृक्ष है जो सभी कामनाओं को पूर्ण करता है। कहा जाता है कि इसके नीचे बैठ कर जो कुछ भी माँगा जाये वो प्राप्त होता है। इस वृक्ष को अनश्वर भी माना गया है। इसे देवताओं ने प्राप्त किया और इसकी स्थापना स्वर्ग के नंदन वन में की गयी।

रम्भा
रम्भा:
रम्भा को प्रथम अप्सरा माना जाता है। इनका रूप अद्वितीय था और ये सभी अप्सराओं की प्रधान थी। इन्हे इंद्र ने स्वर्गलोक में रख लिया। इनका विवाह कुबेर के पुत्र नलकुबेर से हुआ। रावण ने बलात इनसे सम्बन्ध स्थापित किया और तब इन्होने उसे श्राप दिया था कि यदि वो किसी स्त्री के साथ उसकी इच्छा के बिना समागम करेगा तो उसके सर के टुकड़े हो जाएंगे। इसी श्राप के कारण रावण माता सीता को स्पर्श नहीं कर सकता था। द्वापर में इन्हे शेशिरायनण की पत्नी बताया गया है जिनका पुत्र कालयवन था। ये बाद में श्रीकृष्ण द्वारा छला गया और राजा मुचुकंद द्वारा मारा गया। रम्भा ने विश्वामित्र की तपस्या भंग करने का प्रयास किया जिस पर उन्होंने उसे शिला में बदल दिया। कुछ कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन से रम्भा के साथ कई और अप्सराओं का भी जन्म हुआ था जिसे देवों और दैत्यों ने आपस में बाँट लिया।

महालक्ष्मी
महालक्ष्मी:
भगवान विष्णु की सहगामिनी। समुद्र मंथन से उत्पन्न होने के कारण इन्हे सागर कन्या भी कहा गया। महर्षि दुर्वासा के श्राप से "श्री" अर्थात माता लक्ष्मी का लोप हो गया जिससे समस्त सृष्टि धन-धन्य से शून्य हो गयी। समुद्र मंथन से उत्पन्न होने पर देव और दैत्य इनकी सुंदरता पर मुग्ध हो गए किन्तु तब ब्रह्मा जी ने सब को उनकी वास्तविकता से अवगत करवाया। बाद में माता लक्ष्मी ने श्रीहरि को अपने पति के रूप में चुना और पुनः वैकुण्ठ लौटी।

वारुणी
वारुणी:
समुद्र मंथन की कथा के अनुसार ये एक देवी थी जिन्होंने वरुण को अपने पति के रूप में चुना। आम तौर पर इसे मदिरा के रूप में भी वर्णित किया गया है। वर्णन है कि वरुणि मदिरा को दैत्यों ने अपने अधिकार में ले लिया। अमृत की रक्षा के लिए मोहिनी रुपी भगवान विष्णु ने इसी वारुणी को दैत्यों को पिला दिया था जिससे वे अपनी चेतना खो बैठे और देवों ने अवसर का लाभ उठा कर अमृत प्राप्त कर लिया।

चन्द्रमा
चन्द्रमा:
ब्रह्मा जी के अंश और महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र चंद्र को भी रत्न के रूप में मान्यता प्राप्त है। समुद्र मंथन से निकलने के पश्चात इनकी गिनती देवताओं में हुई और महादेव ने इन्हे अपने शीश पर धारण किया। इन्होने ही स्वर्भानु (राहु-केतु) के छल के बारे में मोहिनी रुपी श्रीहरि को बताया था।

श्राङ्ग
श्राङ्ग:
इसे महादेव के पिनाक के साथ संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुष माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहीं से धनुर्वेद का प्रादुर्भाव हुआ। इसे भगवान विष्णु ने धारण किया। अन्य कथाओं के अनुसार पिनाक और श्राङ्ग को विश्वकर्मा ने बनाया था। बाद में श्रीहरि ने इसे महर्षि ऋचीक को दे दिया और उन्होंने इस धनुष को अपने पोते भगवान परशुराम को प्रदान किया। श्रीराम ने परशुराम के कहने पर इसी धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई थी। महाभारत में ये धनुष श्रीकृष्ण के पास था और कहा जाता है कि उनके अतिरिक्त केवल अर्जुन ही इसे संभाल सकते थे।

पांचजन्य
पांचजन्य:
इसे विश्व का प्रथम शंख माना जाता है। कहा जाता है कि इसके नाद से, जहाँ तक इसका स्वर जाता था, वहाँ से आसुरी शक्तियों का नाश हो जाता था। इसे बहुत विशाल और भारी बताया गया है। इसे भी श्रीहरि ने धारण किया। महाभारत में ये शंख श्रीकृष्ण के पास था।

धन्वन्तरि
धन्वन्तरि:
इन्हे भगवान विष्णु के २४ अवतारों में से एक माना जाता है। ये आयुर्वेद के जनक थे। नारायण की भांति ही ये भी चतुर्भुज हैं और अपने हाथों में शंख, चक्र, औषधि और अमृत धारण करते हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से इनका प्रादुर्भाव माता लक्ष्मी से दो दिन पहले हुआ था इसीलिए दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस पर्व मनाया जाता है।

अमृत
अमृत:
अमृत एक ऐसा पेय है जो अमरता प्रदान करता है। अर्थ इसे पीने वाला कभी नहीं मरता। साथ ही ये प्राणी को रोग और बुढ़ापे से भी बचाता है। ऋग्वेद में शायद इसे ही सोमरस कहा गया है। समुद्र मंथन के अंतिम रत्न के रूप में अमृत को लेकर स्वयं देव धन्वन्तरि निकले थे। अमृत को देखते ही देव और दैत्य उसे प्राप्त करने को दौड़े। धन्वन्तरि इसे बचाने को भागने लगे। तब श्रीहरि ने मोहिनी अवतार लेकर अमृत की रक्षा की और छल से देवताओं को अमृत और दैत्यों को वारुणी पिला दिया। इसी अमृत से अमर होकर और बल प्राप्त कर देवताओं ने पुनः युद्ध कर दैत्यों से स्वर्ग वापस ले लिया।

क्या भगवान शंकर वास्तव में भस्म हो जाते यदि भस्मासुर उनके सर पर हाथ रख देता?

क्या भगवान शंकर वास्तव में भस्म हो जाते यदि भस्मासुर उनके सर पर हाथ रख देता?
हम सब ने भस्मासुर की कथा सुनी या पढ़ी है। उस पर बने कई फिल्म और टीवी सीरियल भी देख चुके हैं। इन आधुनिक कृतियों द्वारा जनमानस में जो सबसे बड़ी भ्रान्ति फैलाई जाती है वो ये है कि त्रिलोक के स्वामी महादेव भी किसी के डर से मारे मारे फिर सकते हैं। ये महादेव का घोर अपमान है। इस बारे में चर्चा करने से पहले भस्मासुर के विषय में जान लेते हैं।

क्या आप भगवान शिव के दशावतार के विषय में जानते हैं?

क्या आप भगवान शिव के दशावतार के विषय में जानते हैं?
हम सभी ने भगवान विष्णु के प्रसिद्ध दशावतारों के विषय में जानते हैं किन्तु क्या आपको महादेव के दशावतार के विषय में पता है? आम तौर पर जब भी महादेव के अवतरण की बात होती है तो उनके विषय में द्वादश ज्योतिर्लिंग, ११ रुद्रावतार एवं उनके १९ अवतारों के बारे में जानकारी मिलती है। किन्तु श्रीहरि की भांति ही महादेव के भी दशावतार हैं। महादेव के ये दस अवतार मूलतः तंत्र विद्या से सम्बंधित हैं और इन्हे ही तंत्र शास्त्र का जनक माना गया है।

इससे पहले हमने माता सती के दस रूप, जिन्हे दस महाविद्या कहा जाता है, उनके विषय में एक लेख प्रकाशित किया था। यही दस महाविद्या महादेव के इन दस अवतारों की पत्नियां हैं। दस महाविद्या के विषय में आप विस्तार से यहाँ जान जान सकते हैं। तो आइये महादेव के दशावतारों के विषय में संक्षेप में जानते हैं।
  1. महाकाल: महादेव के दशावतारों में प्रथम स्थान भगवान महाकाल का है। ये महादेव के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से सम्बंधित हैं। इनकी पत्नी का नाम महाकाली है। एक कथा के अनुसार दूषण नामक एक राक्षस था जिसने घोर तप कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर अतुल बल का वरदान प्राप्त कर लिया। उस वरदान के मद में उसने ब्राह्मणों पर अत्याचार करना आरम्भ किया। उसके अत्याचारों से तंग आकर ऋषियों ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने स्वयं उसे वरदान दिया था इसीलिए उन्होंने महादेव से उस राक्षस का वध करने का अनुरोध किया। ब्रह्माजी के अनुरोध पर महादेव ने दूषण को चेतावनी दी किन्तु फिर भी उसका अत्याचार नहीं रुका। उसने उज्जैन जाकर ब्राह्मणों का वध करना आरम्भ किया। तब सभी ने एक स्वर में महादेव को पुकारा। तब महादेव महाकाल अवतार लेकर उज्जैन में प्रकट हुए और उन्होंने अपनी एक ही हुंकार में दूषण का वध कर दिया। बाद में भक्तों की प्रार्थना पर महादेव वहां महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में भी स्थित हुए।
  2. तारकेश्वर: भगवान शिव के दशावतार में दूसरा स्थान है तारकेश्वर महादेव का। उनके इस अवतार में उनकी शक्ति हैं माता तारा। ये अवतार तारकासुर से जुड़ा है। जब तारकासुर को ये वरदान मिला कि उसका वध केवल महादेव के पुत्र के हांथों ही हो सकता है तो स्वयं को अमर मान कर उसने अत्याचार की सारी सीमाओं को लाँघ दिया। अंततः कालांतर में शिवपुत्र कार्तिकेय के द्वारा उसका वध किया गया। जब वो मरणासन्न अवस्था में था और अपनी अंतिम सांसें ले रहा था तो उसे अपने कृत्यों पर बड़ा पश्चाताप हुआ। अपने अंत समय में उसे महादेव के दर्शनों की अभिलाषा जागी। तब भोलेनाथ ने तारकेश्वर अवतार के रूप में उसे दर्शन दिए और ये वरदान भी दिया कि कालांतर में उसके नाम से लोग उनकी पूजा करेंगे। आज तारकेश्वर महादेव का मंदिर उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में है।
  3. बाल भुवनेश: दशावतार में तीसरा स्थान है भगवान भुवनेश का। इस अवतार में महादेव अपने बाल रूप में प्रकट हुए थे इसी कारण इन्हे बाल भुवनेश भी कहा जाता है। इनकी शक्ति है माता बाल भुवनेश्वरी। एक कथा के अनुसार अपने इस अवतार में महादेव ने भुवनेश नामक एक भील का उद्धार किया था। अपने इस अवतार में महादेव १४ भुवनों की रक्षा और पालन करते हैं। उत्तराखंड के कोटद्वार में भगवान भुवनेश्वर का मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर का नाम भी महादेव के इसी अवतार पर पड़ा है।
  4. षोडश विद्येश: शिव दशावतार में चौथा स्थान है भगवान षोडश विद्येश का। इनकी शक्ति षोडशा विद्येशा हैं जिन्हे त्रिपुरसुन्दरी के नाम से भी जाना जाता है। ये तो हम सभी जानते हैं कि कलाएं १६ प्रकार की होती हैं। इस अवतार में भगवान शिव अपनी सभी १६ कलाओं से युक्त होते हैं इसीलिए इन्हे षोडशा विद्येश कहा जाता है। अपने इस अवतार में महादेव मनुष्य को सुख, समृद्धि एवं मोक्ष प्रदान करते हैं।
  5. भैरवनाथ: दशावतार में पांचवां स्थान है भगवान भैरव का। ये महादेव का सर्वाधिक प्रसिद्ध अवतार है। इनकी शक्ति माता भैरवी हैं। ये अवतार देखने में बहुत ही भयानक हैं और इसीलिए इन्हे भैरव कहा जाता है। भैरव का अर्थ होता है जो देखने में बहुत भयानक हो और भक्तों की भय से रक्षा करें। वैसे तो भैरव कई हैं किन्तु अष्ट भैरव सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। उनमें भी काल भैरव सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। इन्होने ही परमपिता ब्रह्मा के पांचवें सर, जो महादेव की निंदा करता था, उसे काट डाला था। भैरव को माता का गण भी माना जाता है। जब श्रीहरि ने अपने सुदर्शन से माता सती के पार्थिव शरीर के ५१ टुकड़े किये जो शक्तिपीठ कहलाये तब महादेव ने अपने शरीर से कई भैरवों को उत्पन्न किया और उन्हें उन सभी शक्तिपीठ का रक्षक बनाया। शक्तिपीठ और सभी भैरव के विषय में यहाँ पढ़ें।
  6. छिन्नमस्तक: महादेव के छठे दशावतार हैं श्री छिन्नमस्तक। इनकी शक्ति माता छिन्नमस्तिका हैं। महादेव का ये अति प्रचंड अवतार शीशहीन है और ऐसी ही इनकी पत्नी भी हैं। इनका कटा सर ये अपने ही हाथ में पकडे रहते हैं और अपने दूसरे हाथ में त्रिशूल को धारण करते हैं। ऐसी कथा है कि जब माता सती ने छिन्नमस्तिका अवतार में असुरों का संहार किया तो उनकी सेना रक्तपान से तृप्त नहीं हुई। इस पर उन्होंने स्वयं अपना मस्तक काट लिया जिससे उनकी सेना तृप्त हो गयी। तब महादेव ने भी छिन्नमस्तक अवतार लेकर अपना सर अपने ही त्रिशूल से काट लिया। इन दोनों की पूजा विशेष रूप से अघोरियों और तांत्रिकों के लिए अनिवार्य होती है।
  7. धूम्रवान: महादेव के सातवें दशावतार हैं श्री धूम्रवान। इन्हे द्यूमवान भी कहा जाता है। इनकी शक्ति माता धूमावती हैं जो मृत्यु एवं विधवाओं की अधिष्ठात्री हैं। ये माता लक्ष्मी की बहन हैं और इनका एक नाम अलक्ष्मी भी है। अपने इस स्वरुप में महादेव धुंए के समान माने गए हैं इसीलिए उनका ये नाम पड़ा है। भगवान धूम्रवान का रूप भी विकट बताया गया है, किन्तु इस रूप में भी वे कल्याणकारी हैं और अपने भक्तों के भय को दूर करने वाले हैं।
  8. बगलामुख: दशावतार में आठवां स्थान है भगवान बगलामुख का। इनकी शक्ति माता बगलामुखी हैं। ये महादेव का अति उग्र रूप माना जाता है किन्तु अपने भक्तों को ये आनंद प्रदान करने वाला है। इनका रूप पीला है और अपने इस अवतार में भगवान शिव अपने सभी भक्तों को उनके कर्मों के अनुसार उसका फल देते हैं। इनकी पत्नी माता बगलामुखी के तीन प्रमुख मंदिर हैं, जिनमें से कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) के मंदिर की सर्वाधिक मान्यता है। देव बगलाबमुख भी उन्ही मंदिरों में उनके साथ निवास करते हैं।
  9. मातंग: दशावतार में नवां स्थान है भगवान मातंग का। इनकी शक्ति है माता मातंगी। इनका रंग हरा है। मृत्यु को भी जीत लेने के कारण इनका एक नाम मृत्युंजय भी है। रामायण के अनुसार ऐसी मान्यता है कि महादेव ने अपना ये स्वरुप महर्षि मातंग की तपस्या से प्रसन्न होकर लिया था। मध्यप्रदेश के खुजराहों मंदिर में मतंगेश्वर महादेव का शिवलिंग स्थापित है। ये एकमात्र जीवित शिवलिंग माना जाता है जो हर वर्ष ऊपर और नीचे की ओर एक अंगुल बढ़ रहा है। ऐसी मान्यता है कि जब ये शिवलिंग पाताल तक पहुँच जाएगा, उसी समय कलियुग का अंत हो जाएगा।
  10. कमल: महादेव का दसवां और अंतिम अवतार कमल अवतार है। इनकी शक्ति माता कमला है जो माता लक्ष्मी के गुणों से युक्त हैं। अपने इस अवतार में महादेव सभी ६४ विद्याओं से युक्त होते हैं। कहा जाता है कि दिव्य और पूर्ण कमल के पुष्प में भी कुल ६४ पंखुड़ियां होती है इसलिए महादेव के इस अवतार को कमल के नाम से जाना जाता है। जिस प्रकार माता कमला में माता लक्ष्मी के गुण भी हैं, उसी प्रकार भगवान कमल भी नारायण के गुणों से युक्त होते हैं।

श्रीकृष्ण पर आक्रमण के समय किन किन राजाओं ने जरासंध का साथ दिया?

श्रीकृष्ण पर आक्रमण के समय किन किन राजाओं ने जरासंध का साथ दिया?
हम सभी श्रीकृष्ण और जरासंध की प्रतिद्वंदिता के विषय में जानते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा अपने जमाता कंस के वध के पश्चात उसने १७ बार मथुरा पर आक्रमण किया किन्तु उन सभी युद्ध में उसे मुँह की खानी पड़ी। श्रीकृष्ण और बलराम हर बार उसकी पूरी सेना का नाश कर उसे जीवित छोड़ देते थे। वास्तव में वे दोनों चाहते थे कि जरासंध बार बार संसार के सभी पापियों को लेकर आये ताकि वे उनका एक बार में ही संहार कर सकें।

एकलव्य - क्यों माँगा गुरु द्रोण ने अंगूठा? क्यों किया श्रीकृष्ण ने वध?

एकलव्य - क्यों माँगा गुरु द्रोण ने अंगूठा? क्यों किया श्रीकृष्ण ने वध?
एकलव्य महाभारत का एक गौण पात्र है। यदि मूल महाभारत की बात की जाये तो एकलव्य के बारे में बहुत अधिक नहीं लिखा गया है। आज जो भी जानकारियां हमें एकलव्य के विषय में मिलती हैं वो अधिकतर लोक कथाओं के रूप में ही है लेकिन उन कथाओं और मान्यताओं में बहुत अधिक दुष्प्रचार किया गया है। तो आइये एकलव्य के बारे में थोड़ा विस्तार से जानते हैं और इन मिथ्या जानकारियों को भी समझते हैं।

"सेंगोल" वास्तव में क्या है?

आज कल सेंगोल की बहुत चर्चा हो रही है। इसके सम्बन्ध में कई भ्रांतियाँ भी फ़ैल रही है। अधिकतर लोग सेंगोल का ऐतिहासिक महत्त्व बता रहे हैं किन्तु आपको जानकर अच्छा लगेगा कि सेंगोल का पौराणिक महत्त्व भी बहुत अधिक है। सहस्त्रों वर्षों से सेंगोल का वर्णन हमारे पौराणिक ग्रंथों में है, विशेषकर इसका वर्णन महाभारत में किया गया है, पर किसी और नाम से। इसके विषय में लगभग हर व्यक्ति जनता होगा पर इस शब्द "सेंगोल" से बहुत कम लोग परिचित हैं। तो आइये हम सेंगोल के विषय में कुछ जानते हैं।

चलिए प्रथम इसके ऐतिहासिक महत्त्व के विषय में जानते हैं। सेंगोल शब्द की उत्पत्ति तमिल शब्द "सेम्मई" से हुई है जिसका अर्थ होता है नीतिपरायणता। इस शब्द का संस्कृत अर्थ "संकु", अर्थात शंख से जुड़ा हुआ है जो पवित्रता का प्रतीक है। सेंगोल वास्तव में कुछ और नहीं बल्कि वही राजदंड होता था जिसका वर्णन हमारे पुराणों और ग्रंथों में कई बार किया गया है। हालाँकि सेंगोल शब्द तमिल भाषा से प्रेरित है और मूल रूप से दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य से जुड़ा हुआ है।

सेंगोल वास्तव में एक दंड हुआ करता था जिसे सत्ता के हस्तानांतरण हेतु प्रयोग में लाया जाता था। संस्कृत और हिंदी भाषा में इसे ही राजदंड कहते हैं। सेंगोल या राजदंड का उपयोग लगभग पूरे आर्यावर्त में किया जाता था। सेंगोल जब किसी राजा को सौंपा जाता था तो उसका अर्थ ये होता था कि वो राजा उस दंड को साक्षी मान कर अपना राज्य नीतिपरायणता और धर्मानुसार ही चलाएगा। वास्तव में ये किसी राजा के राज्य की राजनीति में "दंड" का प्रतिनिधित्व करता था।

राजधर्म में शासन के चार मुख्य भाग बताये गए हैं। ये हैं - साम, दाम, भेद और दण्ड। ये चारों किसी भी शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए आवश्यक माने गए हैं। इन्हे किसी सम्राट के चार शस्त्रों के समान बताया गया है जिसे वो समयानुसार अपने राज्य को न्यायपूर्वक चलाने के लिए उपयोग में लाता है। साम का अर्थ है समझाना, दाम का अर्थ है किसी चीज का उचित मूल्य देकर देश के लिए उसका अधिग्रहण करना, भेद का अर्थ है राज्य का गुप्तचर विभाग जो देश की रक्षा के लिए अति आवश्यक है।

इनमें से जो अंतिम और सबसे अधिक महत्वपूर्ण है वो है दण्ड। कोई भी राजा किसी राज्य को बिना दंड के सुचारु रूप से नहीं चला सकता। प्रथम तीन चरण उन नागरिकों के लिए हैं जो राजाज्ञा का पालन करते हैं किन्तु दंड उनके लिए आवश्यक माना गया है जो उदंड हैं और राजाज्ञा का उलंघन करते हैं। कोई व्यक्ति यदि शठ है और राजाज्ञा और नियम का पालन नहीं करता तो वो औरों के लिए गलत उदाहरण प्रस्तुत करता है। ऐसे व्यक्तियों के लिए दंड का प्रावधान किया गया है। सेंगोल या राजदंड इसी दंड को का सांकेतिक रूप से प्रतिनिधित्व करता है।

ऐतिहासिक ग्रंथों में सेंगोल की बनावट के बारे में भी विस्तार से लिखा गया है। अभी जो सेंगोल संसद भवन में लगाया गया है वो चांदी से निर्मित है जिसपर सोने का पानी चढ़ाया गया है पर प्राचीन काल में इसे ठोस सोने से बना हुआ बताया गया है। अलग-अलग राज्यों के राजा अपने-अपने सेंगोल का प्रयोग करते थे किन्तु उनकी बनावट बहुत हद तक एक प्रकार की ही होती थी। ग्रंथों में इस दंड की लम्बाई चार हाथ (५-६ फ़ीट) बताई गयी है।

इस सेंगोल के तीन मुख्य भाग हैं। सबसे ऊपर महादेव के वाहन नंदी विराजमान हैं। नंदी को समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस दंड पर नंदी के होने का अर्थ ये है कि जिस प्रकार नंदी पूर्ण रूप से महादेव को समर्पित हैं उसी प्रकार राजा भी पूर्ण रूप से अपनी प्रजा के प्रति समर्पित रहे। नंदी का एक अर्थ स्थायित्व भी है। जिस प्रकार नंदी महादेव के सामने स्थिर रूप से बैठे रहते हैं उसी प्रकार राजा से अपने राज्य में स्थायित्व स्थापित करने की अपेक्षा होती है। इसके अतिरिक्त चोल साम्राज्य के काल में दक्षिण भारत में शैव धर्म अपने चरम पर था और नंदी उसी शैव धर्म के प्रवर्तक भी हैं।

सेंगोल का दूसरा भाग वो मंच है जिसपर नंदी विराजमान हैं। उस मंच को संसार का प्रतीक माना गया है। सेंगोल की लम्बाई चार हाथ होने का भी एक विशेष तात्पर्य है। कलियुग में मनुष्य की ऊंचाई चार हाथ ही बताई गयी है। इस प्रकार सेंगोल समता का भी प्रतीक बन जाता है।

सेंगोल का तीसरा भाग उस मंच के नीचे का है जहाँ माता लक्ष्मी की आकृति है। ये राज्य के धन सम्पदा का प्रतीक है और ऐसी मान्यता है कि जिसके हाथ में ये दंड होता है, माता लक्ष्मी उसके राज्य को धन सम्पदा से भर देती है। माता लक्ष्मी के साथ वहां फसल और फूल पत्तियां भी उकेरी गयी है जो किसी भी देश या राज्य की हरियाली और अन्न सम्पदा का प्रतीक है। ये माता अन्नपूर्णा से प्रार्थना है कि उस राज्य में कभी दुर्भिक्ष ना पड़े और वहां कभी धन-धान्य की कमी ना हो।

यदि सेंगोल की बात करें तो मूल रूप से ये चोल साम्राज्य से जुड़ा है जिसका शासनकाल ८४८ ईस्वी से १२७९ ईस्वी तक माना जाता है। जैसा कि पहले बताया है कि सेंगोल एक स्वर्ण दंड होता था जिसे सत्तारूढ़ सम्राट अगले सम्राट को हस्तानांतरित करता था। तो इस प्रकार सेंगोल सत्ता के हस्तानांतरण का प्रतीक होता था। इसी दंड को धारण कर राजा अपनी प्रजा के न्यायपूर्वक पालन करने की शपथ लेता था। तो सेंगोल वास्तव में इस बात का साक्षी होता था कि राजा अपनी प्रजा के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन सही ढंग से कर रहा है या नहीं।

कई लोगों को ये लग रहा होगा कि क्या वास्तव में सेंगोल इतना महत्वपूर्ण था? तो इसका एक वर्णन महान तमिल ग्रन्थ शिलप्पदिकारम् में मिलता है। जब माता कन्नगी अपने पति कोवलन के साथ मदुरै पहुँचती है तो दुर्भाग्य से राजा अनजाने में कोवलन को मृत्युदंड दे देता है। अपने पति की मृत्यु का समाचार सुन कर कन्नगी राजा से मिलती यही और वहीँ सेंगोल का वर्णन आता है।

कन्नगी उस राजा को धिक्कारते हुए कहती है कि क्या इसीलिए उसने इस राजदंड (सेंगोल) को धारण किया है कि वो प्रजा के साथ अन्याय कर सके? राजा कन्नगी से अपनी बात का प्रमाण देने के लिए कहता है जिसपर कन्नगी उसे अपनी रत्नजड़ित पायल दिखाती है। जब राजा को अपनी गलती का पता चलता है तो उसे इतना क्षोभ होता है कि वो अपने उस एक गलत निर्णय के कारण उसी सेंगोल के समक्ष अपने प्राण त्याग देता है। ये घटना सेंगोल के वास्तविक महत्त्व को दर्शाती है। कोवलन और कन्नगी के बारे में विस्तार से यहाँ जानें।

चोल साम्राज्य के साथ साथ मौर्य साम्राज्य में भी सेंगोल का बड़ा महत्त्व है। यहाँ इसे राजदंड कहा गया है। राजदंड की महत्ता बताने के लिए एक प्राचीन पद्धति का वर्णन मिलता है। जब भी कोई राजा सिंहासन पर बैठता था तो वो तीन बार "अदण्ड्यो: अस्मि" कहता था। इसका अर्थ था कि ये दंड राजा को सजा नहीं दे सकता। 

तब इसके विरोध में उनके कुलगुरु या पुरोहित उसे उसी दंड से तीन बार मार कर कहते थे - "धर्मदण्ड्यो: असि"। इसका अर्थ था कि इस दंड को राजा को भी दण्डित करने का अधिकार है। इसके बाद ही वो राजा उस दंड को धारण कर सिंहासनरूढ़ होता था। ये सेंगोल या राजदंड की महत्ता को दर्शाता है।

सेंगोल या राजदंड का वर्णन हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी दिया गया है। विशेषकर महाभारत के शांति पर्व के अंतर्गत राजधर्मानुशासन पर्व के १४वें और १५वें खंड में इसकी महत्ता के विषय में बताया गया है। विशेषकर १५वें खंड में अर्जुन द्वारा इस दंड के महत्त्व का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसे आप महाभारत में विस्तार से पढ़ सकते हैं किन्तु यहाँ मैं इसे संक्षेप में बता देता हूँ शांतिपर्व के अध्याय चौदह के श्लोक १४ से आरम्भ होता है। 

नदण्डः क्षत्रियो भाति नदण्डो भूमिमश्नुते।
नादंडस्य प्रजा राज्ञः सुखं विदन्ति भारत।।
- शांति पर्व, अध्याय चौदह, श्लोक १४

अर्थात: यहाँ द्रौपदी महाराज युधिष्ठिर से कहती है कि जो दंड देने की शक्ति नहीं रखता उस क्षत्रिय की शोभा नहीं होती। दंड ना देने वाला राजा इस पृथ्वी का उपभोग नहीं कर सकता। दण्डहीन राजा से कभी प्रजा को सुख नहीं मिलता।

इसके बाद शांतिपर्व के चौदहवें अध्याय के श्लोक २१ से श्लोक २५ तक द्रौपदी युधिष्ठिर द्वारा सप्त द्वीपों (जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप एवं पुष्करद्वीप) को अपने दंड से अधिकार में लेने का वर्णन करती है।

इसके बाद शांतिपर्व का पूरा का पूरा पन्द्रहवां अध्याय अर्जुन द्वारा राजदंड की महत्ता के वर्णन से भरा पड़ा है। इस अध्याय में कुल ५८ श्लोक हैं जहाँ अर्जुन विस्तार से युधिष्ठिर और सभासदों को राजदंड (सेंगोल) के महत्त्व के विषय में बताते हैं। राजदंड के विषय में विस्तार से जानने के लिए हर किसी को महाभारत के शांतिपर्व के १५वें अध्याय को पढ़ना चाहिए।

जब हनुमान जी ने बलराम जी, गरुड़, सुदर्शन एवं देवी सत्यभामा का अभिमान भंग किया

जब हनुमान जी ने बलराम जी, गरुड़, सुदर्शन एवं देवी सत्यभामा का अभिमान भंग किया
महाबली हनुमान अष्टचिरंजीवियों में से एक हैं। उन्हें कल्प के अंत तक जीवित रहने का वरदान प्राप्त है। यही कारण है कि रामायण के साथ साथ हनुमान जी का वर्णन महाभारत में भी आता है। महाभारत में उनके द्वारा भीम के अभिमान को भंग करने और अर्जुन के रथ की रक्षा करने के विषय में तो हम सभी जानते ही हैं किन्तु हरिवंश पुराण में एक वर्णन ऐसा भी आता है जब श्रीकृष्ण ने बजरंगबली के द्वारा बलराम जी, सुदर्शन चक्र, गरुड़ एवं देवी सत्यभामा का अभिमान भंग करवाया था।

भगवान शिव को अपने ही पुत्र श्रीगणेश का मस्तक क्यों काटना पड़ा?

भगवान शिव को अपने ही पुत्र श्रीगणेश का मस्तक क्यों काटना पड़ा?
महादेव द्वारा श्रीगणेश का मस्तक काटने के विषय में तो हम सभी जानते हैं किन्तु इस विषय में एक प्रश्न आता है कि आखिर उन्हें ऐसा करना क्यों पड़ा? महादेव तो त्रिकालदर्शी हैं फिर उन्हें कैसे नहीं पता था कि श्रीगणेश उनके ही पुत्र हैं? वास्तव में महादेव ने श्रीगणेश का मस्तक एक श्राप के कारण काटा था।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राक्षसराज सुकेश के पुत्र माली और सुमाली ने महादेव से वरदान प्राप्त किया कि किसी भी विपत्ति में एक बार उन्हें उनकी सहायता के लिए आना होगा। महादेव ने उन्हें ये वरदान दे दिया। उस वरदान से उन्मत्त होकर माली और सुमाली ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। उन्हें रोकने के लिए स्वयं भगवान सूर्यनारायण युद्धक्षेत्र में आये और उनके बीच घोर युद्ध हुआ।

माली और सुमाली वीर अवश्य थे किन्तु सूर्यदेव के तेज का सामना नहीं कर पाए। सूर्यदेव ने घोर युद्ध कर उन्हें परास्त किया और फिर वो दोनों भाई सूर्यदेव के तेज से जलने लगे। अपना अंत निश्चित जान कर उन दोनों ने महादेव का समरण किया। वरदान के कारण महादेव स्वयं वहां आये और सूर्यदेव को उनपर प्रहार करने से रोका। किन्तु दोनों असुरों को अकेले परास्त करने के मद में सूर्यदेव ने महादेव के रोकने पर भी उन दोनों पर अपने भीषण तेज से प्रहार कर दिया। इससे माली और सुमाली के शरीर पर कोढ़ फूट आया और वे दोनों अचेत हो गिर पड़े।

अपनी ऐसी अवहेलना देख कर भगवान रूद्र को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने क्रोध में आकर अपने त्रिशूल से सूर्यदेव पर प्रहार किया जिससे उनका सर उनके धढ़ से अलग हो गया। सूर्यदेव मृत हो कर भूमि पर गिर पड़े जिससे समस्त संसार में अंधकार छा गया।

उधर जब परमपिता ब्रह्मा के पौत्र और महर्षि मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप ऋषि ने ये देखा कि महादेव के प्रहार से आदित्यों में से एक उनके पुत्र सूर्यदेव की मृत्यु हो गयी है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उसी क्रोध में प्रजापति कश्यप ने महादेव को श्राप दे दिया कि "जिस प्रकार आपने आज मेरे पुत्र का मस्तक काटा है, एक दिन आपको स्वयं अपने हाथ से अपने पुत्र का मस्तक काटना होगा। अपने मृत पुत्र की पीड़ा को जैसे मैं आज भोग रहा हूँ, आपको भी भविष्य में वही पीड़ा भोगनी होगी।"

महादेव को ऐसा श्राप देने के बाद महर्षि कश्यप का क्रोध कुछ कम हुआ और उन्हें अपने उस श्राप पर बड़ी ग्लानि हुई। तब ब्रह्माजी ने महादेव से कहा कि सूर्यदेव के ना रहने पर पृथ्वी पर जीवन का नाश हो जाएगा। उनके इस प्रकार कहने पर और महर्षि कश्यप के दुःख को देख कर महादेव ने सूर्यदेव को पुनः जीवित कर दिया।

तब महर्षि कश्यप ने महादेव से क्षमा मांगते हुए उनसे अपने श्राप का निवारण करने को कहा किन्तु महादेव ने कहा कि "आप प्रजापति हैं इसीलिए आपका वचन झूठा नहीं हो सकता। भविष्य में जो होना है वो हो कर ही रहेगा।" इस पर महर्षि कश्यप ने कहा कि "हे महादेव! मेरे सम्मान के लिए अपने पुत्र का जीवन ले लेना केवल आपके लिए ही संभव है। किन्तु जिस प्रकार आपने मेरे पुत्र को जीवनदान दिया है, उसी प्रकार आप अपने पुत्र को भी जीवनदान देंगे।" इस पर महादेव ने उन्हें अपनी स्वीकृति दे दी।

इसके बाद महादेव ने माली और सुमाली को भी चेतना प्रदान की। उन दोनों ने अपने शरीर पर उत्पन्न कोढ़ से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि जिसके प्रहार से ये कोढ़ उत्पन्न हुआ है वही तुम्हे इससे मुक्ति दिलवाएंगे। अतः सूर्यदेव की आराधना करो। तब दोनों भाइयों ने सूर्यदेव की तपस्या की और अंततः उस कोढ़ से मुक्ति पायी। आज भी ऐसी मान्यता है कि सूर्य की किरणों में कोढ़ को नष्ट करने की शक्ति होती है।

महर्षि कश्यप के उसी श्राप के कारण महादेव को अपने ही पुत्र श्रीगणेश का मस्तक काटना पड़ा था। हालाँकि बाद में उन्होंने उनके धढ़ पर हाथी का सर रख कर उन्हें जीवित कर दिया था। इसी से श्रीगणेश गजानन के नाम से विख्यात हुए। श्रीगणेश का सर कटने के बाद कहाँ गया, इसके बारे में आप विस्तार ये यहाँ पढ़ सकते हैं। 

शनि देव को तेल क्यों चढ़ाया जाता है?

शनि देव को तेल क्यों चढ़ाया जाता है?
हमारे पौराणिक ग्रंथों में शनिदेव को तेल चढाने के बारे में कहा गया है। शताब्दियों से लोग हर शनिवार को शनिदेव पर तेल चढ़ाते आ रहे हैं। मान्यता है कि ऐसा करने पर शनि की साढ़ेसाती और ढैया से मुक्ति मिलती है। किन्तु शनिदेव को तेल चढाने के पीछे एक पौराणिक कथा भी है जो रामायण से सम्बंधित है।

गोत्र क्या होता है? समान गोत्र में विवाह क्यों नहीं होता?

गोत्र क्या होता है? समान गोत्र में विवाह क्यों नहीं होता?
गोत्र की अवधारणा हिन्दू धर्म में सदा से है। ये हिन्दू धर्म के सबसे जटिल विषयों में से एक है। गोत्र को अति प्राचीन माना गया है। यहाँ तक कि ऐसा कहा गया है कि गोत्र पहले आये और फिर वर्ण व्यवस्था प्रारम्भ हुई। अर्थात गोत्र की अवधारणा वर्ण व्यवस्था से भी प्राचीन है।

एक ऐसा गाँव जहाँ हनुमान जी की पूजा करना मना है

द्रोणागिरि गांव
महाबली हनुमान हिन्दू धर्म के सर्वाधिक पूज्य देवताओं में से एक हैं। शायद ही इस देश का एक भी ऐसा कोना हो जहाँ हनुमान जी का मंदिर ना हो या उनकी पूजा ना होती हो। लेकिन आज हम आपको भारत के एक ऐसे ही गांव के बारे में बताने वाले हैं जहाँ हनुमान जी की पूजा वर्जित है। ऐसा इसलिए क्यूंकि वहां के लोग सदैव हनुमान जी से नाराज रहते हैं।

बभ्रुवाहन - अर्जुन का वध करने वाला उसका अपना पुत्र

बभ्रुवाहन - अर्जुन का वध करने वाला उसका अपना पुत्र
द्रौपदी का विवाह जब पांचों पांडवों से विवाह किया तब देवर्षि नारद के सुझाव पर पांडवों ने एक कड़ा नियम बनाया। उस नियम के अनुसार जब द्रौपदी किसी एक पांडव की पत्नी रहेगी, उस समय यदि कोई दूसरा पांडव उनके कक्ष में प्रवेश करेगा तो उसे १२ वर्षों का वनवास भोगना पड़ेगा। जब द्रौपदी युधिष्ठिर की पत्नी थी उस समय गायों के एक झुण्ड की रक्षा के लिए युधिष्ठिर के कक्ष में अपना गांडीव लेने चले गए जिस कारण उन्हें १२ वर्ष का वनवास भोगना पड़ा। द्रौपदी के अतिरिक्त अर्जुन के अन्य तीन विवाह इसी वनवास काल में हुए थे।

महाराज दशरथ के कितने मंत्री और पुरोहित थे?

महाराज दशरथ के कितने मंत्री और पुरोहित थे?
हमारे धर्मग्रंथों में ऐसा लिखा गया है कि मंत्री ही किसी राजा के राज्य का आधार होते हैं। मंत्री वे कहलाते हैं जिससे "मंत्रणा", अर्थात सलाह लेकर कोई राजा अपनी प्रजा के हित में कोई निर्णय लेता है। किसी राजा के कई मंत्री हो सकते थे और उनमें से जो मुख्य होता था उन्हें "महामंत्री" के नाम से जाना जाता था। आगे चल कर आधुनिक काल में इन्ही मंत्रियों को "आमात्य" या "सचिव" कहा जाने लगा।

नल दमयन्ती - विश्व की प्रथम प्रेम कथा

नल दमयन्ती - विश्व की प्रथम प्रेम कथा
हिंदु धर्म में प्रेम कथाओं का विशेष उल्लेख किया गया है। आज हम जो कथा आपको बताने जा रहे हैं वो संसार की पहली प्रेम कथा मानी जा सकती है। नल-दमयन्ती की कथा का वर्णन महाभारत में आता है। जब युधिष्ठिर द्रौपदी को जुए में हार जाते हैं और फिर पांडव द्रौपदी सहित वनवास को जाते हैं, तब युधिष्ठिर की आत्म-ग्लानि को मिटाने के लिए देवर्षि नारद ने उन्हें ये कथा सुनाई थी।

क्यों दूर्वा का हर पूजा में इतना महत्त्व है?

क्यों दूर्वा का हर पूजा में इतना महत्त्व है?
दूर्वा, जिसे हम हिंदी में दूब भी कहते हैं, का हिन्दू धर्म में बहुत महत्त्व है। शायद ही ऐसी कोई पूजा हो जो दूर्वा के बिना संपन्न होती हो। आम तौर पर लोग दूर्वा और घास को एक ही समझते हैं किन्तु ऐसा नहीं है। दूर्वा घास का ही एक प्रकार है जो हरे रंग की होती है और पृथ्वी पर फ़ैल कर बढ़ती है और कभी ऊपर नहीं उठती।

महाराज मोरध्वज - जिन्होंने दानवीरता की सारी सीमाओं को पार कर दिया

महाराज मोरध्वज - जिन्होंने दानवीरता की सारी सीमाओं को पार कर दिया
हमारे देश में एक से एक महादानी हुए हैं किन्तु आज हम जिस व्यक्ति की बात करने वाले हैं उसने दानवीरता की सारी सीमाओं को पार कर लिया। ये कथा है महाराज मोरध्वज की। कथा महाभारत की है किन्तु मूल महाभारत का भाग नहीं है। भारतीय दंतकथाओं में इसकी बड़ी प्रसिद्धि है। विशेषकर छत्तीसगढ़ में इसे बड़े चाव से सुना और सुनाया जाता है।

चार वटवृक्ष जो अमर हैं

चार वटवृक्ष जो अमर हैं
हिन्दू धर्म में वटवृक्ष का क्या महत्त्व है इस विषय में कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है। वैसे तो इस दुनिया में असंख्य वटवृक्ष हैं किन्तु उनमें से ५ ऐसे हैं जो अमर माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि उनका कभी नाश नहीं होता। तीर्थदीपिका में पांच वटवृक्षों का वर्णिन मिलता है:

ऋषि कितने प्रकार के होते हैं?

ऋषि कितने प्रकार के होते हैं?
कुछ समय पहले हमने ऋषि, मुनि, साधु, संन्यासी, तपस्वी, योगी, संत और महात्मा में क्या अंतर है, उसके बारे में बताया था। आज हम ऋषियों के प्रकार के बारे में जानेंगे। ऋषि वे ज्ञानी पुरुष थे जो शोध करते थे। अंग्रेजी का शब्द "रिसर्च" ऋषि शब्द से ही निकला है। ऋषि शब्द "ऋष" मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इन्हे श्रुति ग्रंथों का अध्ययन एवं स्मृति ग्रंथों की रचना और शोध करने के लिए जाना जाता है।

गरुड़ काष्ठ

गरुड़ काष्ठ
गरुड़ काष्ठ वास्तव में गरुड़ नामक एक विशाल वृक्ष की फली होती है जो देखने में किसी सर्प के समान लगती है और १ मीटर तक हो सकती है। इसके ऊपर एक बहुत महीन पारदर्शी परत चढ़ी रहती है जो देखने में किसी सांप की केंचुली के समान लगती है। यह एक दुर्लभ वृक्ष है और बहुत ही कम स्थानों पर पाया जाता है। ये इस पृथ्वी पर उत्पन्न सबसे प्राचीन वृक्षों में से एक है जिसकी उत्पत्ति लगभग ३ अरब वर्ष पहले बताई गयी है।

उलूक

उलूक
उलूक महाभारत का एक कम प्रसिद्ध पात्र है। वो गांधार राज शकुनि और रानी आर्शी का ज्येठ पुत्र था। शकुनि के तीनों पुत्रों में केवल वही था जिसने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। यही नहीं, वो महाभारत के उन गिने चुने योद्धाओं में था जो युद्ध के १८वें दिन तक जीवित रहे थे। महाभारत कथा में उलूक का वर्णन युद्ध से ठीक पहले आता है।

जब श्रीराम को हनुमान के साथ छल करना पड़ा

जब श्रीराम को हनुमान के साथ छल करना पड़ा
ये तो हम सभी जानते हैं कि रावण की मृत्यु के पश्चात श्रीराम ने ११००० वर्षों तक अयोध्या पर राज्य किया। उसके पश्चात उन्होंने निर्वाण लिया और अपनी लीला समाप्त की। लेकिन रामायण के कुछ संस्करणों में हमें एक और बड़ी ही रोचक कथा जानने को मिलती है।

जब एक रात के लिए पुनर्जीवित हो गए महाभारत के मृत योद्धा

महाभारत से जुडी अनेकों कथा जनश्रुतियों के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनमें कुछ का सन्दर्भ हमें मूल महाभारत में मिलता है किन्तु कुछ केवल लोककथाओं के रूप में ही जनमानस में प्रसिद्ध हैं। आज हम आपको ऐसी ही एक कथा के बारे में बताने वाले हैं जिसमें महाभारत में वीरगति को प्राप्त सभी योद्धा एक दिन के लिए जीवित हो गए थे।