शनिवार, जून 22, 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र (अर्थ सहित)

पिछले लेख में आपने मृतसञ्जीवनी मन्त्र के विषय में पढ़ा। इस भाग में हम "मृतसंजीवनी स्त्रोत्र" के विषय में आपको बताएँगे। ऐसा माना जाता है कि इस महान स्त्रोत्र को परमपिता ब्रह्मा के पुत्र महर्षि वशिष्ठ ने लिखा था। ३० श्लोकों का ये स्त्रोत्र भगवान शिव को समर्पित है और उनके कई अनजाने पहलुओं पर प्रकाश डालता है। जो कोई भी इस स्त्रोत्र का पूर्ण चित्त से पाठ करता है, उसे जीवन में किसी भी कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता। इस लेख में हम आपको पूर्ण मृतसञ्जीवनी मन्त्र से अर्थ सहित परिचित करवाएंगे।

एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयेश्वरम्।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा।।१।।

अर्थात: गौरीपति मृत्युञ्जयेश्र्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करने के पश्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये।

सारात्सारतरं पुण्यं गुह्यात्गुह्यतरं शुभम्।
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकम्।।२।।

अर्थात: महादेव भगवान् शङ्कर का यह मृतसञ्जीवन नामक कवच तत्त्व का भी तत्त्व है, पुण्यप्रद है, गुह्य और मङ्गल प्रदान करने वाला है।

समाहितमना भूत्वा शृणुश्व कवचं शुभम्।
शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा।।३।।

अर्थात: अपने मन को एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवच को सुनो। यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है। इसकी गोपनीयता सदा बनाये रखना।

वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवित:।
मृत्युञ्जयो महादेव: प्राच्यां मां पातु सर्वदा।।४।।

अर्थात: जरा से अभय करने वाले, निरन्तर यज्ञ करने वाले, सभी देवतओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव! आप पूर्व-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें।

दधान: शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुज: प्रभु:।
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा।।५।।

अर्थात: अभय प्रदान करनेवाली शक्ति को धारण करनेवाले, तीन मुखोंवाले तथा छ: भुजओंवाले, अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोणमें मेरी सदा रक्षा करें।

अष्टादशभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभु:।
यमरूपी महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु।।६।।

अर्थात: अट्ठारह भुजाओं से युक्त, हाथ में दण्ड और अभयमुद्रा धारण करने वाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें।

खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवित:।
रक्षोरूपी महेशो मां नैऋत्यां सर्वदावतु।।७।।

अर्थात: हाथ में खड्ग और अभयमुद्रा धारण करने वाले, धैर्यशाली, दैत्यगणों से आराधित, रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें।

पाशाभयभुज: सर्वरत्नाकरनिषेवित:।
वरूणात्मा महादेव: पश्चिमे मां सदावतु।।८।।

अर्थात: हाथमें अभयमुद्रा और पाश धाराण करनेवाले, शभी रत्नाकरोंसे सेवित, वरुणस्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशामें मेरी सदा रक्षा करें।

गदाभयकर: प्राणनायक: सर्वदागति:।
वायव्यां वारुतात्मा मां शङ्कर: पातु सर्वदा।।९।।

अर्थात: हाथों में गदा और अभयमुद्रा धारण करने वाले, प्राणोम के रक्षक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें।

शङ्खाभयकरस्थो मां नायक: परमेश्वर:।
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्कर: प्रभु:।।१०।।

अर्थात: हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करने वाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा), सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्य में मेरी रक्षा करें।

शूलाभयकर: सर्वविद्यानामधिनायक:।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर:।।११।।

अर्थात: हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करने वाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशान स्वरूप भगवान् परमेश्वर शिव ईशान कोण में मेरी रक्षा करें।

ऊर्ध्वभागे ब्रह्मरूपी विश्वात्माऽध: सदावतु।
शिरो मे शङ्कर: पातु ललाटं चन्द्रशेखर:।।१२।।

अर्थात: ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊर्ध्वभाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें। शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें।

भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु।।
भ्रूयुग्मं गिरिश: पातु कर्णौ पातु महेश्वर:।।१३।।

अर्थात: मेरे भौंहों के मध्य में सर्वलोकेश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें। दोनों भौंहों की रक्षा गिरिश एवं दोनों कानों की रक्षा भगवान् महेश्वर करें।

नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वज:।
जिव्हां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु।।१४।।

अर्थात: महादेव मेरी नासीका की तथा वृषभध्वज मेरे दोनों अधरों की सदा रक्षा करें। दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वा की तथा गिरिश मेरे दन्तों की रक्षा करें।

मृत्युञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषण:।
पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम।।१५।।

अर्थात: मृत्युञ्जय मेरे मुख की एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठ की रक्षा करें। पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूलि मेरे हृदय की रक्षा करें।

पञ्चवक्त्र: स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वर:।
नाभिं पातु विरूपाक्ष: पार्श्वो मे पार्वतिपति:।।१६।।

अर्थात: पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनो की और जगदीश्वर मेरे उदरकी रक्षा करें। विरूपाक्ष नाभि की और पार्वतीपति पार्श्वभाग की रक्षा करें।

कटद्वयं गिरिशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिप:।
गुह्यं महेश्वर: पातु ममोरु पातु भैरव:।।१७।।

अर्थात: गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें। महेश्वर मेरे गुह्यभाग की और भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें।

जानुनी मे जगद्धर्ता जङ्घे मे जगदंबिका।
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्य: सदाशिव:।।१८।।

अर्थात: जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघो की तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें।

गिरिश: पातु मे भार्या भव: पातु सुतान्मम।
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायक:।।१९।।

अर्थात: गिरीश मेरी भार्या की रक्षा करें तथा भव मेरे पुत्रों की रक्षा करें। मृत्युञ्जय मेरे आयु की गणनायक मेरे चित्त की रक्षा करें।

सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकाल: सदाशिव:।
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानांच दुर्लभम्।।२०।।

अर्थात: कालों के काल सदाशिव मेरे सभी अंगो की रक्षा करें। देवताओंके लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवच का वर्णन मैंने तुमसे किया है।

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम्।
सहस्त्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम्।।२१।।

अर्थात: महादेव ने स्वयं मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है। इस कवच की सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है। 

य: पठेच्छृणुयानित्यं श्रावयेत्सु समाहित:।
सकालमृत्यु निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते।।२२।।

अर्थात: जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयु का उपयोग करता है।

हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ।
आधयोव्याधयस्तस्य न भवन्ति कदाचन।।२३।।

अर्थात: जो व्यक्ति अपने हाथ से मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवच का पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणी के भीतर चेतनता आ जाती है। फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होतीं। 

कालमृत्युमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा।
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तम:।।२४।।

अर्थात: यह मृतसञ्जीवन कवच काल के गाल में गये हुए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर ‍देता है और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणों से युक्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।

युद्धारम्भे पठित्वेदमष्टाविंशतिवारकम।
युद्धमध्ये स्थित: शत्रु: सद्य: सर्वैर्न दृश्यते।।२५।।

अर्थात: युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवच का २८ बार पाठ करके रणभूमि में उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुओं अदृश्य रहता है।

न ब्रह्मादिनी चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै।
विजयं लभते देवयुद्धमध्येऽपि सर्वदा।।२६।।

अर्थात: यदि देवताओं के भी साथ युद्ध छिड जाय तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है।

प्रातरूत्थाय सततं य: पठेत्कवचं शुभम्।
अक्षय्यं लभते सौख्यमिहलोके परत्र च।।२७।।

अर्थात: जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच का सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय सुख प्राप्त होता है।

सर्वव्याधिविनिर्मुक्त: सर्वरोगविवर्जित:।
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिक:।।२८।।

अर्थात: वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्त हो जाता है, सब प्रकार के रोग उसके शरीर से भाग जाते हैं। वह अजर-अमर होकर सदा के लिये सोलह वर्ष वाला व्यक्ति बन जाता है। 

विचरत्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान्।
तस्मादिदं महागोप्यं कवचं समुदाहृतम्।।२९।।

अर्थात: इस लोक में दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है। इसलिये इस महागोपनीय कवच को मृतसञ्जीवन नाम से कहा है।

मृतसञ्जीवनं नाम्ना दैवतैरपि दुर्लभम्।
इति वसिष्ठकृतं मृतसञ्जीवन स्तोत्रम्।।३०।।

अर्थात: मृतसंजीवनी नामक यह स्त्रोत्र देवतओं के लिय भी दुर्लभ है। ये वशिष्ठ द्वारा रचित मृतसंजीवनी स्त्रोत्र है।

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