रविवार, जुलाई 05, 2020

पौराणिक द्वीप - ७: शाक द्वीप

पिछले लेख में हमने क्रौंच द्वीप के विषय में पढ़ा। इस लेख में हम छठे महान शाक द्वीप के विषय में जानेंगे। 
  • इस द्वीप के मध्य में एक अतिविशाल शाक का वृक्ष है और उसी वृक्ष के कारण इस द्वीप का नाम शाक द्वीप पड़ा है। 

सोमवार, जून 29, 2020

पौराणिक द्वीप - ६: क्रौंच द्वीप

पिछले लेख में हमने कुश द्वीप के विषय में पढ़ा था। इस लेख में हम क्रौंच द्वीप के विषय में विस्तार पूर्वक जानेंगे जिसका स्थान सप्तद्वीपों में पाँचवा है। 
  • इस द्वीप का नाम यहाँ स्थित क्रौंच नामक महान पर्वत के कारण पड़ा है। 
  • यहाँ के निवासी वरुण देव की पूजा करते हैं। 

सोमवार, जून 22, 2020

पौराणिक द्वीप - ५: कुश द्वीप


इस श्रृंखला के पिछले लेख में हमने शाल्मल द्वीप के विषय में पढ़ा था। इस लेख में हम कुश द्वीप के विषय में विस्तार से जानेंगे। कुश द्वीप उन सात पौराणिक द्वीपों में से एक है जिसका वर्णन हमारे पुराणों में किया गया है। विष्णु पुराण के अनुसार -

कुश: क्रौंचस्तथा शाक: पुष्करश्चैव सप्तम:।

मंगलवार, जून 16, 2020

आदि शंकराचार्य - ५: प्रमुख कालखंड एवं रचनाएँ

पिछले लेख में आपने आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों के विषय में पढ़ा। इस लेख में हम उनके प्रमुख काल खंड का वर्णन करेंगे और साथ ही उनके द्वारा लिखित रचनाओं के विषय में भी जानेंगे।

आदि शंकराचार्य के जीवन की प्रमुख घटनाएं
  • जन्म: २६३१ युधिष्ठिर संवत, वैशाख शुक्ल पंचमी
  • उपनयन संस्कार: २६३९ युधिष्ठिर संवत, चैत्र शुक्ल नवमी
  • संन्यास ग्रहण: २६३९ युधिष्ठिर संवत, कार्तिक शुक्ल एकादशी

गुरुवार, जून 11, 2020

आदि शंकराचार्य - ४: चार मठों की स्थापना

पिछले लेखों में हमने आदि शंकराचार्य के जीवन के विषय में जाना। वैसे तो आदि शंकराचार्य ने केवल ३२ वर्ष की आयु में ही अनेक महान कार्य किये किन्तु उनके द्वारा चार दिशाओं में चार मठों, जिसे हम चार धाम के नाम से भी जानते हैं, की स्थापना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। हिन्दू धर्म का समस्त संत समाज इन्ही चारो मठों के अधीन है। जिसे इन चारो मठों में से किसी एक से भी स्वीकृति मिलती है, केवल वही संत माना जा सकता है।

शुक्रवार, जून 05, 2020

आदि शंकराचार्य - ३: मण्डन मिश्र और भारती

पिछले लेखों में आपने वास्तविक शंकराचार्य एवं उनके प्रारंभिक जीवन के विषय में पढ़ा। जब वे युवा हुए तो उनके ज्ञान का प्रकाश पूरे आर्यावर्त में फ़ैल गया। ब्रह्मसूत्रों की जैसी गहन और गूढ़ व्याख्या आदि शंकराचार्य ने की वैसी किसी और ने नहीं की। इसके अतिरिक्त इन्होने सभी उपनिषदों पर गहन शोध किया और उनपर अलग-अलग भाष्य लिखे। इसीलिए कहा जाता है कि सतयुग में मनु, त्रेता में दत्तात्रेय, द्वापर में वेदव्यास और कलियुग में आदि शंकराचार्य का ज्ञान के प्रसार में जो योगदान है वैसा किसी और का नहीं है। इनके विषय में कहा गया है -

शनिवार, मई 30, 2020

आदि शंकराचार्य - २: जीवन

पिछले लेख में आपने वास्तविक शंकराचार्य के विषय में पढ़ा जिनका जन्म २६३१ युधिष्ठिर सम्वत (लगभग ५०८ ईस्वी पूर्व) हुआ था। कहा जाता है कि ये स्वयं भगवान शंकर (शिव नहीं) के अवतार थे। पुराणों में कई ऐसे श्लोक हैं जो इन्हे भगवान शंकर का अवतार सिद्ध करते हैं। आइये उनमें से कुछ पर दृष्टि डालते हैं -