श्रीराम द्वारा किया गया अद्भुत दान

श्रीराम द्वारा किया गया अद्भुत दान
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में जब श्रीराम के वनवास जाने का प्रसग आता है तो वन जाने से पहले वो पाना समस्त व्यक्तिगत धन ब्राह्मणों और अन्य जनता में बाँट देते हैं। यहाँ पर श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं कि "हे लक्ष्मण! मेरा ये जो धन है इसे मैं तुम्हारे साथ रहकर तपस्वी ब्राह्मणों में बाँटना चाहता हूँ। इसलिए जो भी श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ हैं, उनको तथा उनके आश्रितों को मेरे पास लेकर आओ।

क्या लक्ष्मण वास्तव में १४ वर्षों तक नहीं सोये थे

क्या लक्ष्मण वास्तव में १४ वर्षों तक नहीं सोये थे
आज कल एक कथा बड़ी प्रचलित है कि मेघनाद को केवल वही व्यक्ति मार सकता था जो १४ वर्षों से ना सोया हो। कुछ लोग इसे एक कदम और आगे बढ़ा देते हैं और कहते हैं कि ना सिर्फ १४ वर्षों तक सोया ना हो बल्कि १४ वर्षों से भोजन भी ना किया हो।

कांजीरोट्टु यक्षिणी

कांजीरोट्टु यक्षिणी
कुछ समय पहले हमने यक्षिणियों एवं पद्मनाभ स्वामी मंदिर के रहस्य पर एक लेख प्रकाशित किया था। इन दोनों में हमने कांजीरोट्टू नामक एक यक्षिणी के विषय में बताया था। इस यक्षिणी की मान्यता दक्षिण भारत, विशेषकर केरल और तमिलनाडु में बहुत है और वहाँ इसकी कई लोक कथाएं भी प्रचलित हैं।

वानरराज वाली कितने शक्तिशाली थे?

वानरराज वाली कितने शक्तिशाली थे?
वानरराज वाली के विषय में तो हम सभी जानते ही हैं। उनका बल सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध था। रामायण के किष्किन्धा काण्ड सर्ग ११ में महर्षि वाल्मीकि ने वाली के बल का विस्तार से वर्णन किया है। इस सर्ग में श्रीराम के पूछने पर सुग्रीव वाली के बल के बारे में बताते हैं।

कैसे बने श्रीगणेश एकदंत

कैसे बने श्रीगणेश एकदंत
ये तो हम सभी जानते हैं कि श्रीगणेश एकदन्त हैं, अर्थात उनका एक दांत टूटा हुआ है। लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि आखिर क्यों श्रीगणेश का एक दांत टूट गया? इस विषय में हमें पुराणों में कई वर्णन मिलता है। इनमें से कुछ कथाएं सुनी हुई हैं किन्तु कुछ ऐसी भी है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

महर्षि भरद्वाज द्वारा भरत और उनकी सेना का दिव्य सत्कार

महर्षि भरद्वाज द्वारा भरत और उनकी सेना का दिव्य सत्कार
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के ९१वें सर्ग में एक प्रसंग आता है जब भरत अपनी सेना सहित श्रीराम को वापस बुलाने वन को निकलते हैं तो उनकी भेंट महर्षि भरद्वाज से होती है। तब भरत एक रात्रि के लिए अपनी सेना सहित महर्षि के आश्रम में ही रुकते हैं। उस समय भरद्वाज मुनि द्वारा उनके और उनकी सेना के दिव्य सत्कार का वर्णन है जो अद्भुत है। ये इस बात का उदाहरण है कि तप की शक्ति कितनी प्रबल हो सकती है।