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श्रीकृष्ण की रानियों और उनके पुत्रों के नाम

श्रीकृष्ण के जीवन में स्त्रियों का बड़ा महत्त्व रहा है, चाहे वो राधा और अथवा रुक्मिणी। इनकी कुल १६१०८ पत्नियाँ कही गयी है जिनमे से अधिकतर नरकासुर के कैद से छुड़ाई गयी थी। प्रत्येक पत्नी से उन्होंने १०-१० पुत्र प्राप्त किये थे। इस प्रकार उनके समस्त पुत्रों की गिनती १६१०८० थी। अब उनकी सभी पत्नियों एवं पुत्रों का नाम बताना तो संभव नहीं है लेकिन उनकी आठ मुख्य रानियों के पुत्रों के नाम नीचे दिए हैं।

शरभ द्वारा नृसिंह का मान मर्दन

भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष के वध के पश्चात ब्रह्मा से वरदान पा उसके बड़े भाई हिरण्यकशिपु के अत्याचार हद से अधिक बढ़ गए। सारी सृष्टि त्राहि-त्राहि करने लगी। जहाँ एक ओर हिरण्यकशिपु संसार से धर्म का नाश करने पर तुला हुआ था, वही उसका अपना पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु की भक्ति में लीन था। हिरण्यकश्यप जब किसी भी तरह प्रह्लाद को नहीं समझा सका तो उसने उसे कई बार मारने का प्रयत्त्न किया किन्तु प्रह्लाद हर बार भगवान विष्णु की कृपा से बच गया। यहाँ तक कि इस प्रयास में उसकी बहन होलिका भी मृत्यु को प्राप्त हो गयी। अंत में जब वो स्वयं प्रह्लाद को मारने को तत्पर हुआ तो अपने भक्त की रक्षा के लिए भगवान विष्णु स्वयं नृसिंह अवतार में प्रकट हुए।

प्रमुख नाग कुल

पुराणों के अनुसार महर्षि कश्यप ने प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया और उनसे ही सभी जातियों की उत्पत्ति हुई। इसके बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें। कश्यप एवं उनकी की पत्नी क्रुदु से नाग जाति (नाग और सर्प जाति अलग-अलग है) की उत्पत्ति हुई जिसमे नागों के आठ प्रमुख कुल चले। इनका वर्णन नीचे दिया गया है: अनंत (शेषनाग): कद्रू के पुत्रों में सबसे पराक्रमी। उन्होंने अपनी छली माँ भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करनी आरंभ की। भाइयों तथा क्रुदु का का विमाता विनता तथा सौतेले भाइयों अरुण और गरुड़ के प्रति द्वेष भाव ही उसकी सांसारिक विरक्ति का कारण था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे वरदान दिया कि उसकी बुद्धि सदैव धर्म में लगी रहे। साथ ही ब्रह्मा ने उसे आदेश दिया कि वह पृथ्वी को अपने फन पर संभालकर धारण करे, जिससे कि वह हिलना बंद कर दे तथा स्थिर रह सके। शेष नाग ने इस आदेश का पालन किया। उसके पृथ्वी के नीचे जाते ही सर्पों ने उसके छोटे भाई, वासुकि का राज्यतिलक कर दिया। श्रीहरि विष्णु शेषनाग पर ही शयन करते हैं। जब वसुदेव भगवान कृष्ण को नन्द गाँव पहुँचाने के लिए यमुना में उतरे…

विभिन्न व्यूह रचना

२१ जुलाई २०१२, ठीक अपने जन्मदिन के दिन मैं अपने एक मित्र प्रशांत साहू के साथ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में भ्रमण के लिए गया था। वहाँ विज्ञान भवन में एक पूरा हिस्सा महाभारत को समर्पित था। वही मैंने महाभारत में प्रयोग किये गए इन व्यूहों का चित्र देखा। वैसे तो इसका चित्र लेना प्रतिबंधित था किन्तु फिर मैंने जब सुरक्षा अधिकारीयों को धर्मसंसार के बारे में बताया तब उन्होंने इन चित्रों को लेने की अनुमति दे दी। दुर्भाग्य से उस समय मेरा मोबाइल कैमरा बहुत अच्छा नहीं था और अँधेरा भी बहुत था, इसी लिए चित्र बहुत साफ़ नहीं आये हैं किन्तु काम चलाने लायक तो हैं। मैं कुरुक्षेत्र विज्ञान भवन प्रबंधन का हार्दिक धन्यवाद अदा करता हूँ। उसी जगह अति प्राचीन विश्व के नक्शों पर भारत की स्थिति का चित्र मिला था जिसे आप यहाँ देख सकते हैं।

अति प्राचीन विश्व के नक्शों पर भारत की स्थिति

२१ जुलाई २०१२, ठीक अपने जन्मदिन के दिन मैं अपने एक मित्र प्रशांत साहू के साथ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में भ्रमण के लिए गया था। वहाँ विज्ञान भवन में एक पूरा हिस्सा महाभारत को समर्पित था। वही मैंने इन दुर्लभ नक्शों को देखा। वैसे तो इसका चित्र लेना प्रतिबंधित था किन्तु फिर मैंने जब सुरक्षा अधिकारीयों को धर्मसंसार के बारे में बताया तब उन्होंने इन चित्रों को लेने की अनुमति दे दी। दुर्भाग्य से उस समय मेरा मोबाइल कैमरा बहुत अच्छा नहीं था और अँधेरा भी बहुत था, इसी लिए चित्र बहुत साफ़ नहीं आये हैं किन्तु काम चलाने लायक तो हैं। मैं कुरुक्षेत्र विज्ञान भवन प्रबंधन का हार्दिक धन्यवाद अदा करता हूँ। इसी जगह मैंने महाभारत में प्रयोग किये गए व्यूहों का चित्र भी देखा जिसे आप यहाँ देख सकते हैं।

युधिष्ठिर से मोहम्मद गोरी तक के शासकों का वर्णन

महाभारत युद्ध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर की ३० पीढ़ियों ने १७७० वर्ष ११ माह १० दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है। युधिष्ठिर से पहले प्रजापति ब्रम्हा तक के वंशों का वर्णन देखने के लिए यहाँजाएँ।  युधिष्ठिर: ३६ वर्षपरीक्षित: ६० वर्षजनमेजय: ८४ वर्षअश्वमेध: ८२ वर्षद्वैतीयरम: ८८ वर्ष क्षत्रमाल: ८१ वर्ष चित्ररथ: ७५ वर्ष  दुष्टशैल्य: ७५ वर्ष

जब दो ब्रह्मास्त्रों का सामना हुआ

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरवों की ओर से केवल तीन महारथी हीं जीवित बचे थे - अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। दुर्योधन की मृत्यु से दुखी अश्वत्थामा ने पांडवों को छल से मारने की प्रतिज्ञा की। उसने दुर्योधन को मरते हुए वचन दिया था कि जैसे भी हो वो पांचों पांडवों को अवश्य मार डालेगा। कृपाचार्य ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की पर अंततः उन्होंने भी उसका साथ देने की स्वीकृति भर दी।

जब शिव ने सती का त्याग किया

सभी लोग जानते हैं कि सती ने अपने पिता द्वारा शिव को यज्ञ में आमंत्रित न करने और उनका अपमान करने पर उसी यज्ञशाला में आत्मदाह कर लिया था लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि इसकी भूमिका बहुत पहले हीं लिखी जा चुकी थी। बात उन दिनों की है जब रावण ने सीता का हरण कर लिया था और श्रीराम और लक्ष्मण उनकी खोज में दर दर भटक रहे थे। जब सती ने ये देखा कि श्रीराम विष्णु के अवतार होते हुए भी इतना कष्ट उठा रहे हैं तो उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि प्रभु भगवान विष्णु तो आपके परम भक्त हैं फिर किस पाप के कारण वे इतना कष्ट भोग रहे हैं? भगवान शिव ने कहा कि चूँकि श्रीहरि विष्णु मनुष्य रूप में हैं इसलिए एक साधारण मनुष्य की तरह हीं वे भी दुःख भोग रहे हैं। सती ने पूछा कि अगर विष्णु केवल एक मनुष्य के रूप में हैं तो क्या उनमे वो सरे दिव्य गुण हैं जो श्रीहरि विष्णु में हैं? शिव ने जवाब दिया कि हाँ मनुष्य होते हुए भी वे उन सारी कलाओं से युक्त हैं जो श्रीहरि विष्णु में हैं।

कश्यप ऋषि से सम्पूर्ण जाति की उत्पत्ति

महर्षि कश्यप ब्रम्हा के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र थे। इस प्रकार वे ब्रम्हा के पोते हुए। महर्षि कश्यप ने ब्रम्हा के पुत्र प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया। संसार की सारी जातियां महर्षि कश्यप की इन्ही १७ पत्नियों की संतानें मानी जाति हैं। इसी कारण महर्षि कश्यप की पत्नियों को लोकमाता भी कहा जाता है। प्रजापति दक्ष की सभी पुत्रियों और उनके पति के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ जाएँ। उनकी पत्नियों और उनसे उत्पन्न संतानों का वर्णन नीचे है: अदिति: आदित्य (देवता)। ये १२ कहलाते हैं. ये हैं अंश, अयारमा, भग, मित्र, वरुण, पूषा, त्वस्त्र, विष्णु, विवस्वत, सावित्री, इन्द्र और धात्रि या त्रिविक्रम (भगवन वामन)।

महाभारत में १८ संख्या का महत्त्व

महाभारत कथा में १८ (अठारह) संख्या का बड़ा महत्त्व है। महाभारत की कई घटनाएँ १८ संख्या से सम्बंधित है। कुछ उदाहरण देखें: महाभारत का युद्ध कुल १८ दिनों तक हुआ था। कौरवों (११ अक्षौहिणी) और पांडवों (९ अक्षौहिणी) की सेना भी कुल १८ अक्षौहिणी थी। अक्षौहिणी सेना के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ जाएँ।अक्षौहिणी सेना के प्रत्येक भाग की संख्या के अंकों का कुल जमा १८ आता है।

पुराणों में श्लोकों की संख्या

ब्रह्मपुराण: १४०००पद्मपुराण: ५५०००विष्णुपुराण: २३००० शिवपुराण: २४००० श्रीमद्भावतपुराण: १८००० नारदपुराण: २५००० मार्कण्डेयपुराण: ९००० अग्निपुराण: १५००० भविष्यपुराण: १४५०० ब्रह्मवैवर्तपुराण: १८००० लिंगपुराण: ११००० वाराहपुराण: २४००० स्कन्धपुराण: ८११०० वामनपुराण: १०००० कूर्मपुराण: १७००० मत्सयपुराण: १४००० गरुड़पुराण: १९००० ब्रह्माण्डपुराण: १२००० इस प्रकार सारे पुराणों के श्लोकों की कुल संख्या लगभग ४०३६०० (चार लाख तीन हजार छः सौ) है। इसके अलावा रामायण में लगभग २४००० एवं महाभारत में लगभग ११०००० श्लोक हैं।