बुधवार, मई 02, 2018

ब्रह्मा

ब्रह्मा हिन्दू धर्म के त्रिदेवों में से एक हैं। ये सृष्टिकर्ता हैं जो पालनहार नारायण एवं संहारक शिव के साथ त्रिमूर्ति को पूर्ण करते हैं। इन्हे हिरण्यगर्भ कहा जाता है क्यूँकि इनकी उत्पत्ति ब्रह्म-अण्ड (ब्रम्हांड) से मानी जाती है। समस्त सृष्टि का सृजन करने के लिए इन्हे परमपिता भी कहा जाता है। हालाँकि ये त्रिदेवों में एक हैं लेकिन आधुनिक युग में इन्हे अन्य दो देवों विष्णु एवं शिव के जितना महत्त्व और सम्मान नहीं दिया जाता जो कि बिलकुल भी सही नहीं है। रही सही कसर आज कल के फालतू धार्मिक टीवी शोज ने पूरी कर दी है।

वास्तविकता ये है कि वेदों एवं पुराणों में ब्रह्मा का महत्त्व विष्णु एवं शिव से किसी भी मामले में कम नहीं है और इन तीनों को एक दुसरे का पूरक और समकक्ष माना जाता है। हालाँकि इनकी उत्पत्ति निर्विवाद रूप से शिव और विष्णु के बाद मानी गयी है लेकिन कहीं कहीं सदाशिव के साकार रूप रूद्र को ब्रह्मा से उत्पन्न माना गया है। ऐसी मान्यता है कि सदाशिव (परब्रह्म अथवा शिव का निराकार रूप) ने विष्णु और ब्रह्मा की उत्पत्ति के बाद स्वयं त्रिदेवों को पूर्ण करने के लिए एवं संहार का उत्तरदायित्व सँभालने के लिए रूद्र के रूप में उत्पन्न हुए।

ब्रह्मा को स्वयंभू माना गया है जिसका अर्थ है स्वयं उत्त्पन्न होने वाला। जब जगत में कुछ नहीं था, केवल अंधकार था तो ब्रम्हाण्ड रुपी अंडे को चीर कर एक अनंत प्रकाश रुपी पाँच सर एवं चार भुजाओं वाले ब्रह्मा का जन्म हुआ जो एक कमल पर विराजमान थे। अपने जन्म से आश्चर्यचकित ब्रम्हा ने अपने उत्पत्ति का कारण जानने के लिए उस कमल-दण्ड को पकड़ कर नीचे आरम्भ किया किन्तु १००० वर्षों तक लगातार चलने के बाद भी वे उसके अंत तक नहीं पहुँच सके। अंततः हार कर वे वापस उसी कमल पर अपने जन्म के कारण पर चिंतन करने लगे। तभी उन्हें एक स्वर सुनाई दिया "तपस... तपस..." उस स्वर से प्रभावित हो वे तपस्या में लीन हो गए। इस तपस्या को सृष्टि की पहली तपस्या का सम्मान प्राप्त है और इसे "आदि-तप" भी कहा गया है। अनंत काल तक (कहीं-कहीं १००० वर्षों का वर्णन है) तपस्या करने के पश्चात उन्हें अनंत क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर लेटे नारायण के दर्शन हुए।

नारायण ने उनसे कहा कि "हे आदिपुरुष! आपने अनंत तप कर समस्त प्रकार के ज्ञान को प्राप्त किया है। बुद्धि, बल और तेज में आप स्वयं मेरे समान ही हैं। मेरे दर्शन से आपमें सृजन की शक्ति आ गयी है अतः हे देव अब आप अपने मानस शक्ति से इस जगत की रचना करें।" भगवान विष्णु से एक प्रकार की प्रेरणा पाकर ब्रम्हा ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया। अपनी वाक्-शक्ति से उन्होंने सबसे पहले अपने चारो मुख से चार वेदों को उत्पन्न किया और अपने चार हाथों में स्वयं उसे धारण किया। उन्होंने इसके बाद कई बार अपने मानस शक्ति से ब्रम्हाण्ड की रचना करने का प्रयास किया किन्तु असफल रहे। ये देख कर उन्होंने एक बार फिर नारायण का ध्यान किया और उनसे सहायता माँगी। ब्रह्मदेव की व्यथा सुन कर भगवान विष्णु ने उन्हें मैथुनी सृष्टि बनाने का सुझाव दिया।

तब उन्होंने अपने प्रथम १६ मानस पुत्रों को उत्पन्न किया जो प्रजापति कहलाये। इनमे से सात प्रथम ऋषि सप्तर्षि कहलाये। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक कन्या शतरूपा की भी उत्पत्ति की। ये हैं - 
  1. मुख से अंगिरस
  2. नेत्र से अत्रि
  3. कर्ण से पुलस्त्य
  4. नाभि से पुलह
  5. हाथ से क्रतु
  6. प्राण से वशिष्ठ
  7. मन से मरीचि
  8. अंगूठे से दक्ष
  9. गोद से नारद
  10. छाया से कर्दम
  11. इच्छा से सनक 
  12. इच्छा से सनन्दन 
  13. इच्छा से सनातन 
  14. इच्छा से सनत्कुमार
  15. शरीर के दाहिने भाग से स्वयंभू मनु एवं वाम भाग से शतरूपा 
  16. ध्यान से चित्रगुप्त
सबसे पहले उन्होंने सनत्कुमारों को मैथुनी सृष्टि कर संतान उत्पत्ति करने की आज्ञा दी किन्तु नारद ने सनत्कुमारों को वैराग्य की शिक्षा देकर विरक्त कर दिया। इससे क्रोधित हो ब्रह्मा ने उन्होंने नारद को सदैव भटकते रहने का श्राप दे दिया। उन्होंने फिर से सृष्टि के निर्माण आरम्भ किया। वे ये समझ गए कि पुरुष और नारी के संयोग से ही सृष्टि का विस्तार हो सकता है। इसी कारण उन्होंने मनु और शतरूपा को विवाह कर संतानोत्पत्ति करने की आज्ञा दी। इन्ही की मैथुनी सृष्टि से हमारा जन्म हुआ और मनु के नाम पर ही हम मानव कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त दक्ष की पुत्रियों और कर्दम ऋषि की संतानों से संसार का अनंत विस्तार हुआ। 

ब्रह्मा पूरे जगत के पिता हैं अतः वे सभी के लिए सम्माननीय हैं। इसी कारण देव-दैत्य सभी अपनी समस्याओं के निदान हेतु उन्ही के पास आते हैं। सावित्री, सरस्वती और वेदमाता गायत्री को ब्रह्मा की पत्नी माना गया है। इनका वाहन हंस है। वेदों में कहा गया है कि जो कोई और नहीं दे सकता वो केवल त्रिदेवों से प्राप्त हो सकता है। ब्रह्मा, भगवान विष्णु एवं भगवान शंकर के समान हर प्रकार वरदान देने में सक्षम हैं। यही कारण है कि कई दैत्य भी इनसे अमरता का वरदान पाने को लालायित रहते थे किन्तु उन्होंने कभी किसी को अमरता का वरदान नहीं दिया। ब्रह्मा ही समय-समय पर भगवान विष्णु को पृथ्वी के उद्धार के लिए अवतार लेने के लिया प्रेरित करते हैं।

हालाँकि भगवान विष्णु और भगवान शंकर की तरह ब्रह्मदेव अवतार नहीं लेते किन्तु फिर भी उनके कुछ अवतारों का वर्णन है। श्रीहरि के दशावतार की तरह ही ब्रह्मा के सप्तवतार प्रसिद्ध हैं, जिन्हे ब्रह्मवातार भी कहते हैं। ये हैं -
  1. वाल्मीकि अवतार
  2. कश्यप अवतार
  3. दत्तात्रेय अवतार
  4. लक्ष्मण अवतार
  5. व्यास अवतार
  6. बलराम अवतार
  7. कालिदास अवतार
ब्रह्मा का पाँचवा मस्तक और पूजा अधिकार से बहिष्कार

वैसे तो ब्रह्मा के पाँच सर का वर्णन आता है किन्तु उनका चार सर वाला स्वरुप ही प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त विष्णु एवं शिव की अपेक्षा उनकी पूजा बहुत कम की जाती है। ना ही वैष्णव अथवा शैव की तरह उनका कोई अपना संप्रदाय है। हालाँकि ब्रह्मा जी की उपासना का भी एक विशिष्ट सम्प्रदाय है, जो वैखानस सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध है। इस वैखानस सम्प्रदाय की सभी सम्प्रदायों में मान्यता है। पुराणादि सभी शास्त्रों के ये ही आदि वक्ता माने गये हैं। भारत में उनका एकमात्र मंदिर राजस्थान के पुष्कर में है। इसके पीछे कई कथा का वर्णन आता है।
  • कहा जाता है कि मनु की उत्पत्ति के बाद जब उन्होंने उसकी पत्नी के रूप में शतरूपा की रचना की तो उसकी सुंदरता पर मुग्ध हो गए। शतरूपा उनकी दृष्टि से बचने के इधर-उधर भागने लगी किन्तु वे जहाँ भी जाती ब्रह्मा अपने चारों सिरों से उसे देखते रहते। तब शतरूपा आकाश की ओर चली गयी जिस कारण ब्रह्मा ने आकाश की ओर अपना एक और सर उत्पन्न कर लिया जिस कारण शतरूपा का छिपा रहना असंभव हो गया। जब महादेव ने ब्रह्मा को अपनी पुत्री पर कुदृष्टि डालते देखा तो उन्होंने दण्ड-स्वरुप उनका पाँचवा सर काट दिया।
  • एक और वर्णन के अनुसार ब्रह्मा के पाँच सरों में से चार महादेव की स्तुति करते थे किन्तु एक सर उनकी निंदा करता था जिस कारण महादेव ने वो सर काट दिया। इस कारण ब्रह्मा का पुत्र दक्ष महादेव का घोर विरोधी हो गया और उसके द्वेष के कारण सती को अपने प्राण त्यागने पड़े।
  • एक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा एवं विष्णु में उनकी महानता को लेकर विवाद हो गया। तभी उनके बीच एक ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ और आकाशवाणी हुई की जो भी इसका छोर ढूढ़ लेगा वो महान कहलायेगा। ब्रह्मा हंस के रूप में ऊपर तथा विष्णु वराह के रूप में नीचे गए किन्तु हजारों वर्षों के बाद भी उन्हें उस शिवलिंग का छोर ना मिला। हारकर विष्णु ने कहा कि मैं छोर धुंध नहीं पाया किन्तु ब्रह्मा ने झूठ कह दिया कि उन्हें ऊपरी छोर मिल गया। उन्हें अपने मुख से असत्य कहते लज्जा आई इसी कारण उन्होंने अपना पाँचवा सर से झूठ बोला। तब महादेव ने असत्य वचन बोलने के कारण उनका वह मस्तक काट दिया और पूजित ना होने का श्राप दिया।
  • एक बार कामदेव ने ब्रह्मा द्वारा दिए काम-बाण उन्ही पर चला दिए जिससे वे अपनी पुत्री सरस्वती पर ही मुग्ध हो गए। तब शिव ने इस कृत्य के लिए उन्हें पूजित ना होने का श्राप दिया। चेतन होने पर ब्रह्मा ने भी कामदेव को महादेव के द्वारा भस्म होने का श्राप दे दिया।
  • एक कथा के अनुसार भगवान शिव और पार्वती के विवाह में ब्रह्मा ही ब्राम्हण रूप में विवाह करवा रहे थे। पार्वती ने अपना मुख घूँघट में ढका हुआ था किन्तु ब्रह्मा उनका मुख देखना चाहते थे। इस कारण उन्होंने हवनकुण्ड में गीली लकड़ी डाल दी जिससे धुआँ हुआ और देवी पार्वती ने अपना घूँघट उठा दिया। ब्रह्मा उनके सौंदर्य को देखते ही रह गए। जब शिव ने ऐसा देखा तो उन्होंने ब्रह्मदेव की पूजा ना होने का श्राप दे दिया।
  • एक बार ब्रह्मा पुष्कर में एक यज्ञ कर रहे थे जिसमे सरस्वती समय पर नहीं पहुँच पायी। बिना पत्नी के यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था इसीलिए ब्रह्मा ने गायत्री की रचना की और उनसे विवाह किया। जब सरस्वती यज्ञ-स्थल पहुँची और वहाँ गायत्री को बैठे देखा तो क्रोध में उन्होंने ब्रह्मा को श्राप दे दिया कि इस स्थान के अतिरिक्त आपकी पूजा और कही नहीं होगी।
  • एक और कथा के अनुसार एक बार भगवान विष्णु ब्रह्मा के रूप पर आसक्त हो गए और मोहिनी रूप लेकर उनके आये। मोहिनी ने ब्रह्मा की तपस्या भंग कर दी और उससे बचने के लिए ब्रह्मा श्रीहरि को याद करने लगे। तभी वहां सप्तर्षि आये और उन्होंने पूछा कि ये कन्या क्यों यहाँ बैठी है? तब ब्रह्मा ने कहा कि ये नृत्य करते हुए थक गयी है और पुत्री भाव से मेरे पास बैठी है। तब मोहिनी ने क्रुद्ध होकर उन्हें श्राप दिया कि उनकी पूजा कही और नहीं होगी।
ब्रह्मा की आयु

ब्रह्मा की आयु हिन्दू धर्म के सबसे रोचक तथ्यों में से एक है। यहाँ बस उसका सार दिया जा रहा है क्यूंकि इसके बारे में विस्तार से एक लेख पहले ही प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
  • मनुष्यों के ३६० वर्षों का देवों और दैत्यों का १ वर्ष होता है जिसे "दिव्य वर्ष" कहते हैं।
  • १२००० दिव्य वर्षों का १ चतुर्युग होता है जिसे महायुग भी कहते हैं।
    • ४८०० दिव्य वर्षों का सतयुग होता है।
    • ३६०० दिव्य वर्षों का त्रेतायुग होता है।
    • २४०० दिव्य वर्षों का द्वापरयुग होता है।
    • १२०० दिव्य वर्षों का कलियुग होता है।
  • ७१ महायुग का १ मन्वन्तर होता है जिसमें एक मनु शासन करते हैं। 
  • १४ मन्वन्तरों या १००० महायुगों का १ कल्प होता है जो ब्रह्मा का दिन कहलाता है। इसी प्रकार १ कल्प की ब्रह्मा की रात्रि होती है। ब्रह्मा के आधे दिन (१ कल्प) में १४ मनु शासन करते हैं।
  • ७२० कल्पों का ब्रह्मा जी का १ वर्ष होता है जिसे ब्रह्मवर्ष कहते हैं। 
  • ५० ब्रह्मवर्षों का १ परार्ध होता है। 
  • २ परार्ध अथवा ब्रह्मा के १०० वर्ष को महाकल्प कहा जाता है। 
  • ब्रह्मा के १००० दिनों का विष्णु जी की १ घटी होती है। 
  • श्रीहरि के १२००००० घटियों का भगवान शिव की अर्धकला होती है। 
  • महादेव के १००००००००० अर्धकलाओं का एक ब्रह्माक्ष होता है।
  • हम अभी ब्रह्मा के ५१ वें वर्ष में, सातवें (वैवस्वत) मनु के शासन में, श्वेतवाराह कल्प के द्वितीय परार्ध में, अठ्ठाईसवें कलियुग के प्रथम वर्ष के प्रथम दिवस में विक्रम संवत २०७६ में हैं। इस प्रकार अब तक १५५५२१९७१९६१६३२ (पंद्रह नील पचपन खरब इक्कीस अरब सत्तानवे करोड़ उन्नीस लाख इकसठ हजार छः सौ बाइस वर्ष वर्तमान ब्रह्मा को सृजित हुए हो गये हैं।
ब्रह्मा के तीन सबसे प्रमुख अस्त्र माने जाते हैं:
  1. ब्रह्मास्त्र: ये सर्वाधिक प्रसिद्ध अस्त्र माना जाता है। ये ब्रह्मा के १ मुख का प्रतिनिधित्व करता है। प्राचीन काल में कई योद्धा ऐसे थे जिनके पास ब्रह्मास्त्र था। जिनके पास ब्रह्मास्त्र होता था वे सीधे महारथी की श्रेणी में आ जाते थे। इसका समकक्ष अस्त्र भगवान विष्णु का नारायणास्त्र और भगवान शंकर का शिवास्त्र है। ब्रह्मास्त्र को केवल ब्रह्मास्त्र से ही रोका जा सकता था किन्तु जहाँ दो ब्रह्मास्त्र टकराते थे वहां १२ वर्षों तक भयानक दुर्भिक्ष पड़ता था। ऐसा ही एक मौका आया था जब अर्जुन और अश्वत्थामा ने अपने अपने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिए थे। महर्षि वेदव्यास और देवर्षि नारद ने उन्हें टकराने से बचाया।
  2. ब्रह्मशिरा: ये ब्रह्मास्त्र से ४ गुणा अधिक शक्तिशाली अस्त्र था जो ब्रह्मा के ४ मुखों का प्रतिनिधित्व करता था। इतिहास में कुछ चुनिंदा योद्धा ही थे जिनके पास ये अस्त्र था। परशुराम उन्ही में से एक थे। कुछ ग्रंथों में द्रोण, अर्जुन और अश्वत्थामा के पास ब्रह्मशिरा होना बताया गया है किन्तु ये सत्य नहीं है। उनके पास ब्रह्मास्त्र थे, ब्रह्मशिरा नहीं। भगवान विष्णु का वैष्णव अस्त्र और महादेव का पाशुपतास्त्र ब्रह्मशिरा के समक्ष महास्त्र थे। ऐसा वर्णित है कि जिस स्थान पर दो ब्रह्मशिरा अस्त्र टकराते हैं वहां १२ दिव्य वर्षों (४३२० मानव वर्षों) तक वर्षा नहीं होती थी।
  3. ब्रह्माण्ड अस्त्र: ये ब्रह्मास्त्र से ५ गुणा अधिक शक्तिशाली अस्त्र था जो ब्रह्मा के ५ मुखों का प्रतिनिधित्व करता है। इतिहास ने केवल महर्षि वशिष्ठ ही थे जिनके पास ये अस्त्र था। इसी अस्त्र से वसिष्ठ ने विश्वामित्र के ब्रह्मास्त्र को पी लिया था। भगवान विष्णु का विष्णुज्वर एवं महादेव का माहेश्वरज्वर (शिवज्वर) इसके समकक्ष दिव्यास्त्र हैं।
ऐसा माना जाता है कि पूरे विश्व में केवल पुष्कर में ब्रह्मा का मंदिर है किन्तु ये सत्य नहीं है। पुष्कर निश्चित रूप से ब्रह्मा का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण मंदिर है किन्तु इसके अतिरिक्त भी राजस्थान में ही बारमेर जिले के आसोतरा गांव में ब्रह्मा का एक मंदिर है जिसे खेतेश्वर ब्रह्मधाम तीर्थ कहते हैं। केरला के उथमार कोवली नमक जगह में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के साथ त्रिमूर्ति रूप में पूजे जाते हैं जिसे थ्रिपया त्रिमूर्ति मंदिर कहते हैं। तमिलनाडु के कुंबकोणम गांव में ब्रह्मा का ब्रह्मापुरीईश्वर मंदिर है। आंध्र प्रदेश के श्रीकालाहस्ती नामक स्थान पर ब्रह्ममंदिर है। इसके अतिरिक्त आंध्रप्रदेश के ही चेब्रोलू नमक जगह पर ब्रह्मा का चतुर्मुख मंदिर है। गोवा के करम्बोलिम नामक स्थान पर ब्रह्मा का एक तीर्थ है। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के मंगलवेढा गांव में तथा मुंबई के निकट नाला सुपारा में भी ब्रह्मा की मूर्ति स्थापित है।

इसके अतिरिक्त गुजरात के खेड़ब्रह्म, कानपुर में ब्रह्म कुटीर मंदिर, हिमाचल प्रदेश के खोखन, आँध्रप्रदेश के अनंतपुर एवं तमिलनाडु के होसुर में भी ब्रह्मदेव के उल्लेखनीय मंदिर हैं। यही नहीं विदेश में भी ब्रह्मा के मंदिर हैं। संसार के सबसे बड़े मंदिर कम्बोडिया के अंगकोरवाट मंदिर में ब्रह्मा की प्रतिमाएं हैं। इंडोनेशिया का प्रम्बानन मंदिर ब्रह्मा के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। बैंकाक (थाईलैंड) के इरावन तीर्थ में ब्रह्मा का भव्य मंदिर है। थाईलैंड में ब्रह्मा को "फ्रा-फ्रॉम" के नाम से बुलाया जाता है। म्यानमार जिसका पुराना नाम बर्मा था वो ब्रह्मा के नाम पर ही रखा गया था जिसका प्राचीन नाम ब्रह्मदेश था। यही नहीं चीन के लोक-कथाओं में भी ब्रह्मा का वर्णन आता है जहाँ उन्हें "सिमीएनसेन" कहा जाता है और उनके कई मंदिर हैं।

।। जय ब्रह्मदेव ।।

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