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December, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नल

रामायण की कथा में नल और नील नामक दो वानरों की कथा आती है। दोनों महान योद्धा थे और लंका युद्ध में उन्होंने कई प्रमुख राक्षस योद्धाओं का वध किया। कई लोगों को ये लगता है कि नल और नील भाई थे। कई ये भी कहते हैं कि दोनों जुड़वाँ भाई थे, किन्तु ये सत्य नहीं है। रामायण में जो वानर सेना थी वे सभी किसी ना किसी देवता के अंश थे। उसी प्रकार नल भगवान विश्वकर्मा और नील अग्निदेव के अंशावतार थे।
वाल्मीकि रामायण में लंका सेतु की रचना का श्रेय केवल नल को ही दिया गया है और सेतु निर्माण में नील का कोई वर्णन नहीं। है यही कारण है कि इस सेतु को लंका सेतु एवं रामसेतु के अतिरिक्त नलसेतु के नाम से भी जाना जाता है। विश्वकर्मा के पुत्र होने के कारण नल में स्वाभाविक रूप से वास्तुशिल्प की कला थी। अपने पिता विश्वकर्मा की भांति वो भी एक उत्कृष्ट शिल्पी थे। यही कारण है कि समुद्र पर सेतु निर्माण का दायित्व नल को ही दिया गया था।

माता अरुंधति - २

पिछले लेख में आपने महर्षि कर्दम की पुत्री और महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति के प्रारंभिक जीवन के बारे में पढ़ा। आप जाना कि किस प्रकार अरुंधति पूर्वजन्म में भगवान ब्रह्मा की पुत्री संध्या थी जिसने महर्षि वशिष्ठ के उपदेश से भगवान विष्णु की तपस्या  की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें तीन वरदान दिए कि जन्म लेते ही किसी भी जीव में काम भावना ना हो, उनका पतिव्रत अखंड रहे और कोई भी काम दृष्टि से उन्हें देखे तो वो नपुंसक हो जाये। अब आगे...
भगवान विष्णु की कृपा से अदृश्य होकर संध्या महर्षि मेघतिथि के यज्ञ में गयी और वहाँ महर्षि वशिष्ठ को पति रूप में पाने की कामना लेकर उन्होंने यञकुंड में अपना शरीर समर्पित कर दिया। उस अग्नि में भस्म होने के बाद उत्पन्न उनकी पवित्र ऊर्जा को स्वयं सूर्यदेव ने दो भाग कर सृष्टि के कल्याण हेतु अपने रथ पर स्थापित किया। यही दो भाग प्रातः काल और संध्या काल कहलाये।

माता अरुंधति - १

भगवान शिव और माता पार्वती के बाद अगर आदर्श गृहस्थ जीवन का कोई बेहतरीन उदाहरण है तो वो महर्षि वशिष्ठ और उनकी पत्नी माता अरुंधति का ही है। वास्तव में श्रीराम से बहुत काल पहले महर्षि वशिष्ठ ने ही एकपत्नीव्रत का उदाहरण स्थापित किया था और कदाचित यही कारण था कि उनकी शिक्षा के आधार पर श्रीराम ने भी इसी व्रत का पालन किया।
ब्रह्मा के दाहिने अंग से स्वयंभू मनु उत्पन्न हुए और उनके वाम भाग से शतरूपा। इन्ही दोनों से मनुष्यों की उत्पत्ति हुई। दोनों से दो पुत्र - प्रियव्रत एवं उत्तानपाद एवं तीन पुत्रियाँ - आकूति, देवहूति एवं प्रसूति हुई। आकूति रूचि प्रजापति एवं प्रसूति दक्ष प्रजापति से ब्याही गयी। देवहूति का विवाह महर्षि कर्दम से हुआ और इन दोनों की १० संतानें हुई जिनमे से अरुंधति एक थी। एक पुत्र - कपिल एवं नौ पुत्रियाँ - कला, अनुसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधति एवं शांति।

कीचक: ४ - अंत

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार कीचक की कुदृष्टि सैरन्ध्री बनी दौपदी पर पड़ती है और वो उसपर आसक्त हो जाता है। वो द्रौपदी को बलात प्राप्त करने का प्रयास करता है और दो बार द्रौपदी कीचक से अपने प्राण बचा कर भागती है किन्तु कीचक भरे सभा में ये चुनौती देकर जाता है कि वो सैरन्ध्री को प्राप्त कर के रहेगा। अब आगे...

कीचक: ३ - कुचेष्टा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार कीचक ने विराट देश का सेनापति बनते ही सारे शत्रुओं को अपने बल से पीछे खदेड़ दिया। उसके शौर्य से विराट नरेश भी बड़े प्रसन्न हुए और उसे प्रधान सेनापति बना दिया। किन्तु उन्हें ये नहीं पता था कि कीचक को इतने अधिकार देने पर उस पर नियंत्रण पाना कठिन हो जाएगा। यही हुआ और और विराट नगर का शासन कीचक ने अप्रत्यक्ष रूप से अपने हाथों में ले लिया। अब आगे...

कीचक: २ - प्रभाव

पिछले लेख में आपने कीचक के वंश और परिवार के विषय में पढ़ा। आपने ये भी जाना कि किस प्रकार कीचक ने विराटराज को अपनी सहायता देने के लिए उन्हें अपनी बहन सुदेष्णा से विवाह करने को कहा। विवाह के पश्चात विराटराज ने कीचक को प्रधान सेनापति बनाया और एक बड़ा प्रदेश भी प्रदान किया जहाँ की राजधानी कीचक ने एकचक्रा नगरी को बनाया। अब आगे... 
प्रधान सेनापति का पद सँभालते ही कीचक ने सर्वप्रथम विराटदेश की सीमा पर आ पहुँची विभिन्न राज्य की सेनाओं से युद्ध किया। कीचक और उसके भाइयों की वीरता के आगे वो सेनाएं टिक नहीं पायी और पीछे हटने को विवश हो गयी। कीचक ने अप्रतिम वीरता दिखाते हुए मेखल, त्रिगर्त, दशार्ण, कशेरुक, मालव, यवन, पुलिन्द, काशी, कोसल, अंग, वंग, कलिंग, तंगण, परतंग, मलद, निषध, तुण्डिकेर, कोंकण, करद, निषिद्ध, शिव, दुश्छिल्लिक तथा अन्य छोटे-बड़े राज्यों की सेनाओं को खदेड़ दिया।

कीचक: १ - वंश

प्राचीन काल में दानवों की एक शक्तिशाली प्रजाति हुआ करती थी जिसे कालकेय कहा जाता था। दक्ष प्रजापति ने अपनी १७ पुत्रियों का विवाह महर्षि कश्यप से किया। उनमे से एक थी दनु जिनके पुत्र हुए विश्वनर। विश्वनर की चार पुत्रियां थी - कालका, पौलोमा, उपदानवी एवं हयशिरा। इनमे से कालका से ही सभी कालकेयों की उत्पत्ति हुई। कुल कालकेयों की संख्या १०६ बताई जाती है जिसमे से सबसे बड़ा था बाण। 
बाण और उसके अनुज अपने अतुल बल के कारण तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मचाने लगे। उनकी ये धृष्टता देख कर महर्षि अगस्त्य ने उन्हें मनुष्य रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया। उसी श्राप के कारण ये सभी कालकेय द्वापर युग में मनुष्य के रूप में जन्में और उसमे से ज्येष्ठ बाण ही महाबली कीचक के रूप में जन्मा। अन्य कालकेय उसके १०५ भाइयों के रूप में जन्में जिन्हे उपकीचक कहा जाता था।

चिल्कुर बालाजी

इस देश में कई मंदिर अपनी अलग-अलग विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध हैं। किन्तु हैदराबाद में एक ऐसा मंदिर भी है जिसकी विशेषता जानकर आप हैरान रह जाएंगे। ये मंदिर युवाओं, विशेषकर आईटी इंजीनियर के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। आपने तिरुपति बालाजी का नाम तो अवश्य सुना होगा। ये मंदिर भी वेंकटेश बालाजी को ही समर्पित है और इसका नाम चिल्कुर बालाजी है।

महाभारत में वर्णित प्रसिद्ध शंख

शंख का महत्त्व हम सभी जानते हैं। कहते हैं कि जहाँ तक शंख की ध्वनि जाती है वहाँ तक कोई नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर सकती। प्राचीन काल में शंख ना सिर्फ पवित्रता का प्रतीक था बल्कि इसे शौर्य का द्योतक भी माना जाता था। प्रत्येक योद्धा के पास अपना शंख होता था और किसी भी युद्ध अथवा पवित्र कार्य का आरम्भ शंखनाद से किया जाता था। महाभारत में भी हर योद्धा के पास अपना शंख था और कुछ के नाम भी महाभारत में वर्णित हैं। आइये कुछ प्रसिद्ध शंखों के बारे में जानें।

खर-दूषण - २

पिछले लेख में आपने रावण के सौतेले भाइयों खर और दूषण के वंश के बारे में पढ़ा। उनके नेतृत्व में रावण की सेना के १४००० योद्धा दण्डक वन में रहते थे। अपनी पति की मृत्यु के बाद शूर्पणखा भी रावण के आदेश पर वही दण्डक वन में अपने दोनों भाइयों के साथ रहती थी। खर और दूषण के विरोध का साहस कोई नहीं करता था और इसी कारण वे दोनों नरभक्षी भाई उन्मत्त होकर वहाँ रहने वाले ऋषि मुनियों पर अत्याचार करते थे।

खर-दूषण - १

खर और दूषण रावण के सौतेले भाई और राक्षसों के प्रमुख यूथपति थे जो दण्डक वन में रावण की ओर से शासन करते थे। राक्षसों के वंश के बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें। परमपिता ब्रह्मा से हेति और प्रहेति नामक दो राक्षसों की उत्पत्ति हुई। ये दोनों ही राक्षसों के आदिपुरुष माने जाते हैं। हेति से विद्युत्केश और विद्युत्केश से सुकेश का जन्म हुआ। इसी सुकेश को महादेव और देवी पार्वती ने गोद ले लिया और ये उनका पुत्र कहलाया।
सुकेश के तीन प्रतापी पुत्र हुए - माल्यवान, सुमाली एवं माली। सुमाली के १० पुत्र और ४ पुत्रियाँ हुई - राका, पुष्पोत्कटा, कुंभीनसी और कैकसी। सुमाली ने एक शक्तिशाली वंशज पाने के लिए अपनी पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि पुलत्स्य के पुत्र महर्षि विश्रवा से करवा दिया। इन्ही दोनों का पुत्र रावण हुआ जिसने आगे चलकर राक्षस वंश को अपने शिखर पर पहुँचाया और दिग्विजयी बना। कुम्भकर्ण और विभीषण भी इसी के पुत्र थे।

रानी चोला देवी - २

पिछले लेख में आपने रानी चोला देवी और उनके पति मंगलसेन के विषय में पढ़ा। किस प्रकार रानी के उद्यान का विध्वंस करने वाले शूकर का वध मंगलसेन करते हैं जो वास्तव में चित्ररथ नामक गन्धर्व थे जो ब्रह्मदेव का श्राप भोग रहे थे। मंगलसेन के हांथों उन्हें अपने श्राप से मुक्ति मिल जाती है और वे उन्हें आशीर्वाद देकर अपने लोक लौट जाते हैं। अब आगे...

रानी चोला देवी - १

महर्षि अंगिरस के लेख में रानी चोला देवी का वर्णन आया था। महाभारत में युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि "हे माधव! जिसे सुनने से मन प्रसन्न हो और पापों का अंत हो जाये ऐसी कोई कथा मुझे सुनाइए।" ये सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा - "भ्राताश्री! सतयुग में जब दैत्य वृत्रासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया तब देवराज इंद्र ने यही इच्छा देवर्षि नारद के सामने जताई थी। देवर्षि ने जो कथा देवराज को सुनाई वही मैं आपको सुनाता हूँ। इस कथा को सुनने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और मनुष्य की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है।"
पुरन्दरपुर नामक एक वैभवशाली राज्य था जहाँ राजा मंगलसेन राज्य करते थे। कहा जाता है कि उनके नगर को स्वयं विश्वकर्मा ने बनाया था और उसके समान और कोई दूसरा नगर विश्व में नहीं था। राजा मंगलसेन की दो रूपवती पत्नियाँ थी - चिल्ल देवी और चोला देवी। जहाँ चिल्ल देवी को धर्म-कर्म में पूर्ण विश्वास था वही चोला देवी नास्तिक तो नहीं थी किन्तु उन्हें धर्म-कर्म, पूजा-पाठ पर कुछ खास श्रद्धा नहीं थी।

गयासुर - ३

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार गयासुर को भगवान विष्णु द्वारा मिले गए वरदान के कारण सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता है। इससे मुक्ति पाने के लिए समस्त देवता भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं और फिर श्रीहरि परमपिता ब्रह्मा को गयासुर का शरीर दान में मांगने का सुझाव देते हैं। तब ब्रह्मदेव गयासुर के पास जाकर यज्ञ हेतु उसके शरीर का दान मांगते हैं जो वो प्रसन्नतापूर्वक दे देता है। अब आगे...

गयासुर - २

पिछले लेख में आपने धर्म परायण और श्रीहरि के भक्त गयासुर के बारे में पढ़ा। आपने ये जाना कि किस प्रकार जीवमात्र की भलाई के लिए उसने भगवान विष्णु से ये वर मांग लिया कि उसे देखते ही कोई भी प्राणी मोक्ष को प्राप्त कर ले। किन्तु उसके इस वरदान के कारण सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया क्यूंकि हर प्राणी उसे देख कर बैकुंठ जाने लगा और यमपुरी खाली हो गयी। अब आगे...