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कालचक्र और युगों का वर्णन

मनुष्य का एक वर्ष देवताओं का १ दिन होता है जिसे दिव्य दिवस कहते हैं। इसी प्रकार मनुष्यों के ३६० वर्ष (यहाँ ३६५ के हिसाब से गणना नहीं होती) देवताओं का १ वर्ष होता है जिसे दिव्य वर्ष कहते हैं। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के नाभि कमल से उत्पन ब्रम्हा की आयु १०० दिव्य वर्ष मानी गयी है। पितामह ब्रम्हा के प्रथम ५० वर्षों को पूर्वार्ध एवं अगले ५० वर्षों को उत्तरार्ध कहते हैं। सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग को मिलकर एक महायुग कहते हैं। ऐसे १००० महायुगों का ब्रम्हा का एक दिन होता है। इसी प्रकार १००० महायुगों का ब्रम्हा की एक रात्रि होती है। अर्थात परमपिता ब्रम्हा का एक पूरा दिन २००० महायुगों का होता है। प्राचीन काल गणना के विषय में विस्तार से यहाँ पढ़ें।

महाजनपद

बौद्ध और जैन धर्म के प्रारंम्भिक ग्रंथों में महाजनपद नाम के सोलह राज्यों का विवरण मिलता है। महाजनपदों के नामों की सूची इन ग्रंथों में समान नहीं है परन्तु वज्जि, मगध,कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति जैसे नाम अक्सर मिलते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि ये महाजनपद महत्त्वपूर्ण महाजनपदों के रूप में जाने जाते होंगे। अधिकांशतः महाजनपदों पर राजा का ही शासन रहता था परन्तु गण और संघ नाम से प्रसिद्ध राज्यों में लोगों का समूह शासन करता था, इस समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था। हर एक महाजनपद की एक राजधानी थी जिसे क़िले से घेरा दिया जाता था। भारत के सोलह महाजनपदों का उल्लेख ईसा पूर्व छठी शताब्दी से भी पहले का है। ये महाजनपद थे:

अक्षौहिणी सेना

अक्षौहिणी प्राचीन भारत में सेना का माप हुआ करता था जिसका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है। किसी भी अक्षौहिणी सेना के चार विभाग होते थे: गज (हाँथी सवार)रथ (रथी)घोड़े (घुड़सवार)सैनिक (पैदल सिपाही)

प्राचीन भारत का नक्शा

एकश्लोकी रामायण

। आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनं 
वैदेही हरणं, जटायु मरणं, सुग्रीव संभाषणं 
बालि निर्दलं, समुन्द्र तरणं, लंकापुरी दाहनं 
पश्चाद्रावण-कुम्भकरण हननं, एतद्धि रामायणं ।।