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वाल्मीकि रामायण अरण्य कांड (सम्पूर्ण) - मूल श्लोक और हिंदी अर्थ सहित

वाल्मीकि रामायण अरण्य कांड (सम्पूर्ण) - मूल श्लोक और हिंदी अर्थ सहित
सर्ग १

प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान्।
रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम्॥१॥

दण्डकारण्य नामक महान् वन में प्रवेश करके मन को वश में रखने वाले दुर्जय वीर श्रीराम ने तपस्वी मुनियों के बहुत-से आश्रम देखे॥१॥

क्या कभी माता सीता का स्वयंवर हुआ था?

क्या कभी माता सीता का स्वयंवर हुआ था?
भगवान श्रीराम और माता सीता का स्वयंवर हिन्दू धर्म के सबसे प्रसिद्ध स्वयंवरों में से एक है। श्री रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने सीता स्वयंवर का बहुत विस्तृत और सुन्दर वर्णन किया है। मानस के अनुसार संक्षेप में कथा ये है कि महर्षि विश्वामित्र के साथ श्रीराम और लक्ष्मण जनकपुरी में आते हैं। पुष्प वाटिका में श्रीराम और सीताजी एक दूसरे का दर्शन करते हैं। फिर माता सीता के स्वयंवर का आयोजन होता है।

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
महर्षि विश्वामित्र हिन्दू धर्म के सर्वाधिक प्रसिद्ध, प्रभावशाली और शक्तिशाली ऋषियों में से एक हैं। वो हमारे धर्म के उन गिने चुने ऋषियों में से एक हैं जिन्होंने ऋषियों के सर्वोच्च पद, अर्थात ब्रह्मर्षि के पद को प्राप्त किया था। सबसे कमाल की बात ये है कि ब्रह्मर्षि के पद को प्राप्त करने वाले विश्वामित्र वास्तव में ब्राह्मण वर्ण के थे ही नहीं। वे जन्म से एक क्षत्रिय थे और उन्होंने अपने तप के बल पर ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया। वे इस बात के ज्वलंत उदाहरण हैं कि हमारा धर्म जन्म नहीं बल्कि कर्म प्रधान है।

वाल्मीकि रामायण अयोध्या कांड (सम्पूर्ण) - मूल श्लोक और हिंदी अर्थ सहित

वाल्मीकि रामायण अयोध्या कांड (सम्पूर्ण) - मूल श्लोक और हिंदी अर्थ सहित
सर्ग १ 

गच्छता मातुलकुलं भरतेन तदानघः।
शत्रुघ्नो नित्यशत्रुघ्नो नीतः प्रीतिपुरस्कृतः॥१॥

(पहले यह बताया जा चुका है कि) भरत अपने मामा के यहाँ जाते समय काम आदि शत्रुओं को सदा के लिये नष्ट कर देने वाले निष्पाप शत्रुघ्न को भी प्रेमवश अपने साथ लेते गये थे॥१॥

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड (सम्पूर्ण) - मूल श्लोक और हिंदी अर्थ सहित

वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड (सम्पूर्ण) - मूल श्लोक और हिंदी अर्थ सहित
सर्ग १ 

ॐ तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम्॥१॥

तपस्वी वाल्मीकिजी ने तपस्या और स्वाध्याय में लगे हुए विद्वानों में श्रेष्ठ मुनिवर नारदजी से पूछा-

क्या अंगद ने रावण को अपना पैर उखाड़ने की चुनौती दी थी?

क्या अंगद ने रावण को अपना पैर उखाड़ने की चुनौती दी थी?
रामायण में अंगद द्वारा रावण को अपना पैर हिलाने की चुनौती देने वाला प्रसंग रामायण के सबसे रोचक प्रसंगों में से एक है। संक्षेप में कथा ये है कि जब श्रीराम की सेना ने समुद्र में पुल बना कर लंका में प्रवेश किया तब उस युद्ध को रोकने के अंतिम प्रयास के रूप में श्रीराम ने रावण के पास संधि प्रस्ताव भेजने का विचार किया। हालाँकि सुग्रीव उनकी इस बात से सहमत नहीं थे, फिर भी श्रीराम की आज्ञा मान कर उन्होंने अंगद को अपना दूत बना कर रावण के पास भेजा।

बोनालु और पोथराजू

बोनालु तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में मनाया जाने वाला एक त्यौहार है जो आषाढ़ महीने में माता काली के एक रूप जिसे स्थानीय भाषा में येल्लम्मा कहा जाता है, उनके सम्मान में मनाया जाता है। विशेषकर इसे हैदराबाद और सिकंदराबाद में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। तीन हफ़्तों तक हर रविवार चलने वाला ये त्यौहार मनुष्यों द्वारा माता की कृपाओं का आभार प्रकट करने के लिए मनाया जाता है।

श्रीराम कितने सुन्दर थे?

श्रीराम का रूप कितना मनोहर था उसके बारे में कुछ कहने की आवश्यकता तो नहीं है क्यूंकि हम सभी भक्तों के मन में भी उनके मनोहर रूप की अलग-अलग छवि बसी हुई है। वैसे तो श्रीराम के रूप के विषय में कई ग्रंथों में बहुत कुछ लिखा गया है किन्तु उनके रूप का जो सबसे प्रामाणिक वर्णन मिलता है वो हमें वाल्मीकि रामायण में मिलता है। रामायण के सुन्दर कांड के ३५वें सर्ग में हमें इसका वर्णन मिलता है।

महाभारत में वर्णित २४ महान राजा

महाभारत में वर्णित २४ महान राजा
महाभारत के आदिपर्व के प्रथम अध्याय के अनुक्रमणिकपर्व में हमें महाराज धृतराष्ट्र और संजय का एक प्रसंग मिलता है जिसमें संजय ने इतिहास के २४ महान राजाओं का वर्णन किया है। ये प्रसंग तब का है जब धृतराष्ट्र अपने पुत्रों के वध से अत्यंत व्याकुल थे। उस समय संजय ने उन्हें महर्षि व्यास और देवर्षि नारद के मुख से कहे गए उन २४ राजाओं के विषय में बताया है जो इतिहास में सबसे उत्कृष्ट राजाओं के रूप में विख्यात हुए। आज हम उन्ही २४ राजाओं के विषय में संक्षेप में जानेगे।

वानरराज वाली

वानरराज वाली
वानरराज वाली रामायण के एक मुख्य पात्र हैं। आज हमें इंटरनेट पर यहाँ-वहाँ वाली के बारे में कई आश्चर्यजनक बातें पता चलती है किन्तु आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि उनमें से अधिकतर चीजों का मूल रामायण से कोई लेना देना नहीं है। पहली बात तो ये कि वानरराज वाली के बारे में कोई भी विस्तृत वर्णन हमें रामायण में मिलता ही नहीं। रामायण में उनका बड़ा संक्षिप्त वर्णन दिया गया है।

रामायण के अनुसार श्रीराम का वंश

रामायण के अनुसार श्रीराम का वंश
कुछ समय पहले हमने श्रीराम के वंश के बारे में एक वीडियो प्रकाशित किया था। किन्तु यदि आप वाल्मीकि रामायण पढ़ेंगे तो आपको उनके वंश का एक अलग वर्णन मिलता है। ये थोड़ा अजीब इसीलिए है क्यूंकि कुछ चंद्रवंशी राजाओं का वर्णन भी इसमें किया गया है जबकि श्रीराम सूर्यवंशी थे। साथ ही महाभारत में उन चंद्रवंशी राजाओं का क्रम ब्रह्माजी से नजदीक है जबकि रामायण में ये बहुत बाद का बताया गया है।

क्या श्रीराम ने कभी माता शबरी के जूठे बेर खाये थे?

रामायण के सन्दर्भ में शबरी और उनके जूठे बेरों के विषय में तो सब जानते हैं। सदियों से हम ये सुनते आ रहे हैं कि जब श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ माता सीता को ढूंढते हुए माता शबरी के आश्रम में पहुंचे तो उन्हें देख कर शबरी, जो वर्षों से उनकी प्रतीक्षा कर रही थी बड़ी प्रसन्न हुई। फिर उन्होंने दोनों भाइयों को खाने के लिए बेर दिए। बेर अच्छे हैं या नहीं इसीलिए उन्होंने उसे पहले उसे चखा। बाद में उसी बेर को श्रीराम और लक्ष्मण ने प्रेम से खाया।

अयोमुखी - एक और राक्षसी जिसके नाक-कान लक्ष्मण ने काट डाले

अयोमुखी - एक और राक्षसी जिसके नाक-कान लक्ष्मण ने काट डाले
शूर्पणखा की कथा तो हम सभी जानते ही हैं। रामायण के अरण्य कांड के १८वें सर्ग में इसका वर्णन है कि जब शूर्पणखा श्रीराम के समझाने पर भी नहीं मानी और माता सीता पर आक्रमण किया, तब लक्ष्मण ने श्रीराम की आज्ञा से उसके नाक और कान काट डाले। किन्तु क्या आपको पता है कि रामायण में ही एक और ऐसी राक्षसी का वर्णन आता है जिसके नाक कान लक्ष्मण ने काट डाले थे?

श्रीराम और माता सीता की आयु कितनी थी?

श्रीराम और माता सीता की आयु कितनी थी?
कुछ समय पहले हमने रावण की आयु पर एक लेख और वीडियो प्रकाशित किया था। जैसा कि हमने उसमें देखा कि मूल वाल्मीकि रामायण में हमें रावण की आयु के विषय में कुछ स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता। हालाँकि यदि बात श्रीराम और माता सीता की आयु की की जाये तो रामायण में हमें इस विषय में कई सन्दर्भ मिलते हैं।

ऋषि जाबालि

ऋषि जाबालि
कुछ समय पहले हमने चार्वाक दर्शन पर एक लेख प्रकाशित किया था जो पूर्ण रूप से नास्तिक विचारधारा पर आधारित है। किन्तु यदि हम रामायण का अध्ययन करते हैं तो हमें पता चलता है कि नास्तिक विचारधारा आज की नहीं अपितु बहुत पहले से चली आ रही है। आधुनिक काल में उसके प्रवर्तक चार्वाक माने जाते हैं किन्तु उनसे बहुत पहले रामायण में भी एक ऋषि थे जिनकी विचारधारा घोर नास्तिक मानी जाती है।

क्या वास्तव में लक्ष्मण ने लक्ष्मण रेखा खींची थी?

क्या वास्तव में लक्ष्मण ने लक्ष्मण रेखा खींची थी?
आप सभी लोग सोच रहे होंगे कि मैं ये कैसी बातें कर रहा हूँ? सदियों से हम लक्ष्मण रेखा के विषय में सुनते आ रहे हैं। सभी लोग ये जानते हैं कि जब श्रीराम स्वर्णमृग रूपी मारीच के पीछे चले गए और उसका वध किया तब उसने श्रीराम के स्वर में माता सीता और लक्ष्मण को पुकारा। तब माता सीता के बहुत कहने पर लक्ष्मण जी श्रीराम की सहायता के लिए गए लेकिन जाने से पहले माता सीता की रक्षा के लिए एक ऐसी रेखा खींच गए जिसे कोई पार ना कर सके। वही रेखा "लक्ष्मण रेखा" के रूप में प्रसिद्ध है।

महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण को कौन-कौन से अस्त्र दिए थे?

महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण को कौन-कौन से अस्त्र दिए थे?
रामायण में जब महर्षि विश्वामित्र महाराज दशरथ से श्रीराम और लक्ष्मण को मांग कर ले जाते हैं तो ताड़का वध से पहले और उसके बाद वे श्रीराम को कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और विद्याएं प्रदान करते हैं। इसका वर्णन वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के २२वें और २७वें सर्ग में दिया गया है। आइये उन सभी के बारे में जानते हैं:

ताड़का

ताड़का
ताड़का रामायण में वर्णित एक राक्षसी थी जिसका वर्णन हमें रामायण के बालकाण्ड के २४वें सर्ग में मिलता है। जब महर्षि विश्वामित्र महाराज दशरथ से अपने यज्ञ की रक्षा हेतु श्रीराम और लक्ष्मण को मांग कर ले गए, तब मार्ग में यज्ञ से पहले ताड़का राक्षसी का सन्दर्भ आता है। ताड़का वास्तव में एक यक्षिणी थी जिसे राक्षस योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था।

रामायण में कौन किसका अवतार था?

रामायण में कौन किसका अवतार था?
ये तो हम सभी जानते ही हैं कि रामायण में भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अपना सातवां अवतार लिया था। किन्तु उस युग में उनकी सहायता के लिए अनेकों देवताओं ने अवतार लिए। इसका विस्तृत वर्णन वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के सर्ग १७ और युद्धकाण्ड के सर्ग ३० में मिलता है। इसके अतिरिक्त रामचरितमानस में भी हमें कुछ वर्णन मिलता है। कुछ ऐसे अवतार भी हैं जो लोक कथाओं के रूप में प्रचलित हैं, उसका अलग से वर्णन किया गया है।