प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान्।
रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम्॥१॥
दण्डकारण्य नामक महान् वन में प्रवेश करके मन को वश में रखने वाले दुर्जय वीर श्रीराम ने तपस्वी मुनियों के बहुत-से आश्रम देखे॥१॥
कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्मया लक्ष्या समावृतम्।
यथा प्रदीप्तं दुर्दर्श गगने सूर्यमण्डलम्॥२॥
वहाँ कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रम मण्डल ऋषियों की ब्रह्मविद्या के अभ्यास से प्रकट हुए विलक्षण तेज से व्याप्त था, इसलिये आकाश में प्रकाशित होने वाले दुर्दर्श सूर्य-मण्डल की भाँति वह भूतल पर उद्दीप्त हो रहा था। राक्षस आदि के लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था॥२॥
शरण्यं सर्वभूतानां सुसम्मृष्टाजिरं सदा।
मृगैर्बहुभिराकीर्णं पक्षिसंघैः समावृतम्॥३॥
वह आश्रमसमुदाय सभी प्राणियों को शरण देने वाला था। उसका आँगन सदा झाड़ने-बुहारने से स्वच्छ बना रहता था। वहाँ बहुत-से वन्य पशु भरे रहते थे और पक्षियों के समुदाय भी उसे सब ओर से घेरे रहते थे॥३॥
पूजितं चोपनृत्तं च नित्यमप्सरसां गणैः।
विशालैरग्निशरणैः स्रग्भाण्डैरजिनैः कुशैः॥४॥
समिद्भिस्तोयकलशैः फलमूलैश्च शोभितम्।
आरण्यैश्च महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्वृतम्॥५॥
वहाँ का प्रदेश इतना मनोरम था कि वहाँ अप्सराएँ प्रतिदिन आकर नृत्य करती थीं। उस स्थान के प्रति उनके मन में बड़े आदर का भाव था। बड़ी-बड़ी अग्निशालाएँ, सुवा आदि यज्ञपात्र, मृगचर्म, कुश, समिधा, जलपूर्ण कलश तथा फल-मूल उसकी शोभा बढ़ाते थे। स्वादिष्ट फल देने वाले परम पवित्र तथा बड़े-बड़े वन्य वृक्षों से वह आश्रममण्डल घिरा हुआ था॥४-५॥
बलिहोमार्चितं पुण्यं ब्रह्मघोषनिनादितम्।
पुष्पैश्चान्यैः परिक्षिप्तं पद्मिन्या च सपद्मया॥६॥
बलिवैश्वदेव और होम से पूजित वह पवित्र आश्रम समूह वेदमन्त्रों के पाठ की ध्वनि से गूंजता रहता था। कमलपुष्पों से सुशोभित पुष्करिणी उस स्थान की शोभा बढ़ाती थी तथा वहाँ और भी बहुत-से फूल सब ओर बिखरे हुए थे॥६॥
फलमूलाशनैर्दान्तैश्चीरकृष्णाजिनाम्बरैः।
सूर्यवैश्वानराभैश्च पुराणैर्मुनिभिर्युतम्॥७॥
उन आश्रमों में चीर और काला मृगचर्म धारण करने वाले तथा फल-मूल का आहार करके रहने वाले, जितेन्द्रिय एवं सूर्य और अग्नि के तुल्य महातेजस्वी, पुरातन मुनि निवास करते थे॥७॥
पुण्यैश्च नियताहारैः शोभितं परमर्षिभिः।
तद् ब्रह्मभवनप्रख्यं ब्रह्मघोषनिनादितम्॥८॥
नियमित आहार करने वाले पवित्र महर्षियों से सुशोभित वह आश्रमसमूह ब्रह्माजी के धाम की भाँति तेजस्वी तथा वेदध्वनि से निनादित था॥८॥
ब्रह्मविद्भिर्महाभागैाह्मणैरुपशोभितम्।
तद् दृष्ट्वा राघवः श्रीमांस्तापसाश्रममण्डलम्॥९॥
अभ्यगच्छन्महातेजा विज्यं कृत्वा महद् धनुः।
अनेक महाभाग ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण उन आश्रमों की शोभा बढ़ाते थे। महातेजस्वी श्रीराम ने उस आश्रममण्डल को देखकर अपने महान् धनुष की प्रत्यञ्चा उतार दी, फिर वे आश्रम के भीतर गये॥९ १/२॥
दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते रामं दृष्ट्वा महर्षयः॥१०॥
अभिजग्मुस्तदा प्रीता वैदेहीं च यशस्विनीम्।
श्रीराम तथा यशस्विनी सीता को देखकर वे दिव्यज्ञान से सम्पन्न महर्षि बड़ी प्रसन्नता के साथ उनके पास गये॥१०१/२॥
ते तु सोममिवोद्यन्तं दृष्ट्वा वै धर्मचारिणम्॥११॥
लक्ष्मणं चैव दृष्ट्वा तु वैदेहीं च यशस्विनीम्।
मङ्गलानि प्रयुञ्जानाः प्रत्यगृह्णन् दृढव्रताः॥१२॥
दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले वे महर्षि उदयकाल के चन्द्रमा की भाँति मनोहर, धर्मात्मा श्रीराम को, लक्ष्मण को और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता को भी देखकर उन सबके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद देने लगे। उन्होंने उन तीनों को आदरणीय अतिथि के रूप में ग्रहण किया। ११-१२॥
रूपसंहननं लक्ष्मी सौकुमार्यं सुवेषताम्।
ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिनः॥१३॥
श्रीराम के रूप, शरीर की गठन, कान्ति, सुकुमारता तथा सुन्दर वेष को उन वनवासी मुनियों ने आश्चर्यचकित होकर देखा॥१३॥
वैदेहीं लक्ष्मणं रामं नेत्रैरनिमिषैरिव।
आश्चर्यभूतान् ददृशुः सर्वे ते वनवासिनः॥१४॥
वन में निवास करने वाले वे सभी मुनि श्रीराम,लक्ष्मण और सीता–तीनों को एकटक नेत्रों से देखने लगे। उनका स्वरूप उन्हें आश्चर्यमय प्रतीत होता था।॥१४॥
अत्रैनं हि महाभागाः सर्वभूतहिते रताः।
अतिथिं पर्णशालायां राघवं संन्यवेशयन्॥१५॥
समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले उन महाभाग महर्षियों ने वहाँ अपने प्रिय अतिथि इन भगवान् श्रीराम को पर्णशाला में ले जाकर ठहराया॥१५॥
ततो रामस्य सत्कृत्य विधिना पावकोपमाः।
आजहस्ते महाभागाः सलिलं धर्मचारिणः॥१६॥
अग्नितुल्य तेजस्वी और धर्मपरायण उन महाभाग मुनियोंने श्रीरामको विधिवत् सत्कारके साथ जल समर्पित किया॥१६॥
मङ्गलानि प्रयुञ्जाना मुदा परमया युताः।
मूलं पुष्पं फलं सर्वमाश्रमं च महात्मनः॥१७॥
फिर बड़ी प्रसन्नता के साथ मङ्गलसूचक आशीर्वाद देते हुए उन महात्मा श्रीराम को उन्होंने फल-मूल और फूल आदि के साथ सारा आश्रम भी समर्पित कर दिया॥१७॥
निवेदयित्वा धर्मज्ञास्ते तु प्राञ्जलयोऽब्रुवन्।
धर्मपालो जनस्यास्य शरण्यश्च महायशाः॥१८॥
पूजनीयश्च मान्यश्च राजा दण्डधरो गुरुः।
इन्द्रस्यैव चतुर्भागः प्रजा रक्षति राघव॥१९॥
राजा तस्माद् वरान् भोगान् रम्यान् भुङ्क्ते नमस्कृतः।
सब कुछ निवेदन करके वे धर्मज्ञ मुनि हाथ जोड़कर बोले—’रघुनन्दन! दण्ड धारण करने वाला राजा धर्म का पालक, महायशस्वी, इस जनसमुदाय को शरण देने वाला माननीय, पूजनीय और सबका गुरु है। इस भूतल पर इन्द्र (आदि लोकपालों) का ही चौथा अंश होने के कारण वह प्रजा की रक्षा करता है, अतः राजा सबसे वन्दित होता तथा उत्तम एवं रमणीय भोगों का उपभोग करता है। (जब साधारण राजा की यह स्थिति है, तब आपके लिये तो क्या कहना है, आप तो साक्षात् भगवान् हैं)॥१८-१९॥
ते वयं भवता रक्ष्या भवद्विषयवासिनः।
नगरस्थो वनस्थो वा त्वं नो राजा जनेश्वरः॥२०॥
‘हम आपके राज्य में निवास करते हैं, अतः आपको हमारी रक्षा करनी चाहिये। आप नगर में रहें या वन में, हमलोगों के राजा ही हैं। आप समस्त जनसमुदाय के शासक एवं पालक हैं॥२०॥
न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रियाः।
रक्षणीयास्त्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधनाः॥२१॥
‘राजन्! हमने जीवमात्र को दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियों को जीत लिया है। अब तपस्या ही हमारा धन है। जैसे माता गर्भस्थ बालक की रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरह से हमारी रक्षा करनी चाहिये’॥२१॥
एवमुक्त्वा फलैर्मूलैः पुष्पैरन्यैश्च राघवम्।
वन्यैश्च विविधाहारैः सलक्ष्मणमपूजयन्॥२२॥
ऐसा कहकर उन तपस्वी मुनियों ने वन में उत्पन्न होने वाले फल, मूल, फूल तथा अन्य अनेक प्रकार के आहारों से लक्ष्मण (और सीता) सहित भगवान् श्रीरामचन्द्रजी का सत्कार किया॥२२॥
तथान्ये तापसाः सिद्धा रामं वैश्वानरोपमाः।
न्यायवृत्ता यथान्यायं तर्पयामासुरीश्वरम्॥२३॥
इनके सिवा दूसरे अग्नितुल्य तेजस्वी तथा न्याययुक्त बर्ताव वाले सिद्ध तापसों ने भी सर्वेश्वर भगवान् श्रीराम को यथोचित रूप से तृप्त किया॥२३॥
सर्ग २
कृतातिथ्योऽथ रामस्तु सूर्यस्योदयनं प्रति।
आमन्त्र्य स मुनीन् सर्वान् वनमेवान्वगाहत॥१॥
रात्रि में उन महर्षियों का आतिथ्य ग्रहण करके सबेरे सूर्योदय होने पर समस्त मुनियों से विदा ले श्रीरामचन्द्रजी पुनः वन में ही आगे बढ़ने लगे॥१॥
नानामृगगणाकीर्णमृक्षशार्दूलसेवितम्।
ध्वस्तवृक्षलतागुल्मं दुर्दर्शसलिलाशयम्॥२॥
निष्कूजमानशकुनिं झिल्लिकागणनादितम्।
लक्ष्मणानुचरो रामो वनमध्यं ददर्श ह॥३॥
जाते-जाते लक्ष्मणसहित श्रीराम ने वन के मध्यभाग में एक ऐसे स्थान को देखा, जो नाना प्रकार के मृगों से व्याप्त था। वहाँ बहुत-से रीछ और बाघ रहा करते थे। वहाँ के वृक्ष, लता और झाड़ियाँ नष्ट-भ्रष्ट हो गयी। थीं। उस वनप्रान्त में किसी जलाशय का दर्शन होना कठिन था। वहाँ के पक्षी वहीं चहक रहे थे। झींगरों की झंकार गूंज रही थी॥२-३॥
सीतया सह काकुत्स्थस्तस्मिन् घोरमृगायुते।
ददर्श गिरिशृङ्गाभं पुरुषादं महास्वनम्॥४॥
भयंकर जंगली पशुओं से भरे हुए उस दुर्गम वन में सीता के साथ श्रीरामचन्द्रजी ने एक नरभक्षी राक्षस देखा, जो पर्वतशिखर के समान ऊँचा था और उच्चस्वर से गर्जना कर रहा था॥४॥
गभीराक्षं महावक्त्रं विकटं विकटोदरम्।
बीभत्सं विषमं दीर्घ विकृतं घोरदर्शनम्॥५॥
उसकी आँखें गहरी, मुँह बहुत बड़ा, आकार विकट, और पेट विकराल था। वह देखने में बड़ा भयंकर, घृणित, बेडौल, बहुत बड़ा और विकृत वेश से युक्त था॥५॥
वसानं चर्म वैयाघ्रं वसाइँ रुधिरोक्षितम्।
त्रासनं सर्वभूतानां व्यादितास्यमिवान्तकम्॥६॥
उसने खून से भीगा और चरबी से गीला व्याघ्रचर्म पहन रखा था। समस्त प्राणियों को त्रास पहुँचाने वाला वह राक्षस यमराज के समान मुँह बाये खड़ा था॥६॥
त्रीन् सिंहांश्चतुरो व्याघ्रान् द्वौ वृकौ पृषतान् दश।
सविषाणं वसादिग्धं गजस्य च शिरो महत्॥७॥
अवसज्यायसे शूले विनदन्तं महास्वनम्।
वह एक लोहे के शूल में तीन सिंह, चार बाघ, दो भेड़िये, दस चितकबरे हरिण और दाँतों सहति एक बहुत बड़ा हाथी का मस्तक, जिसमें चर्बी लिपटी हुई थी, गाँथ कर जोर-जोर से दहाड़ रहा था॥७ १/२॥
स रामं लक्ष्मणं चैव सीतां दृष्ट्वा च मैथिलीम्।
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धः प्रजाः काल इवान्तकः॥८॥
स कृत्वा भैरवं नादं चालयन्निव मेदिनीम्॥९॥
श्रीराम, लक्ष्मण और मिथिलेशकुमारी सीता को देखते ही वह क्रोध में भरकर भैरवनाद करके पृथ्वी को कम्पित करता हुआ उन सबकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे प्राणान्तकारी काल प्रजा की ओर अग्रसर होता है॥८-९ १/२॥
अङ्केनादाय वैदेहीमपक्रम्य तदाब्रवीत्।
युवां जटाचीरधरौ सभार्यो क्षीणजीवितौ॥१०॥
प्रविष्टौ दण्डकारण्यं शरचापासिपाणिनौ।
वह विदेहनन्दिनी सीता को गोद में ले कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। फिर उन दोनों भाइयों से बोला ‘तुम दोनों जटा और चीर धारण करके भी स्त्री के साथ रहते हो और हाथ में धनुष-बाण और तलवार लिये दण्डकवन में घुस आये हो; अतः जान पड़ता है, तुम्हारा जीवन क्षीण हो चला है॥१० १/२॥
कथं तापसयोर्वां च वासः प्रमदया सह॥११॥
अधर्मचारिणौ पापौ कौ युवां मुनिदूषको।
‘तुम दोनों तो तपस्वी जान पड़ते हो, फिर तुम्हारा युवती स्त्री के साथ रहना कैसे सम्भव हुआ? अधर्मपरायण, पापी तथा मुनिसमुदाय को कलङ्कित करने वाले तुम दोनों कौन हो?॥११ १/२॥
अहं वनमिदं दुर्गं विराधो नाम राक्षसः॥१२॥
चरामि सायुधो नित्यमृषिमांसानि भक्षयन्।
‘मैं विराध नामक राक्षस हूँ और प्रतिदिन ऋषियों के मांस का भक्षण करता हुआ हाथ में अस्त्रशस्त्र लिये इस दुर्गम वन में विचरता रहता हूँ॥१२ १/२॥
इयं नारी वरारोहा मम भार्या भविष्यति॥१३॥
युवयोः पापयोश्चाहं पास्यामि रुधिरं मृधे।
‘यह स्त्री बड़ी सुन्दरी है, अतः मेरी भार्या बनेगी और तुम दोनों पापियोंका मैं युद्धस्थलमें रक्त पान करूँगा’॥१३ १/२॥
तस्यैवं ब्रुवतो दुष्टं विराधस्य दुरात्मनः॥१४॥
श्रुत्वा सगर्वितं वाक्यं सम्भ्रान्ता जनकात्मजा।
सीता प्रवेपितोद्वेगात् प्रवाते कदली यथा॥१५॥
दुरात्मा विराध की ये दुष्टता और घमंड से भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलने पर केले का वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेग के कारण थरथर काँपने लगीं॥१५॥
तां दृष्ट्वा राघवः सीतां विराधाङ्कगतां शुभाम्।
अब्रवील्लक्ष्मणं वाक्यं मुखेन परिशुष्यता॥१६॥
शुभलक्षणा सीता को सहसा विराध के चंगुल में फँसी देख श्रीरामचन्द्र जी सूखते हुए मुँह से लक्ष्मण को सम्बोधित करके बोले-॥१६॥
पश्य सौम्य नरेन्द्रस्य जनकस्यात्मसम्भवाम्।
मम भार्यां शुभाचारां विराधाङ्के प्रवेशिताम्॥१७॥
‘सौम्य! देखो तो सही, महाराज जनक की पुत्री और मेरी सती-साध्वी पत्नी सीता विराध के अङ्क में विवशतापूर्वक जा पहुँची हैं॥१७॥
अत्यन्तसुखसंवृद्धां राजपुत्रीं यशस्विनीम्।
यदभिप्रेतमस्मासु प्रियं वरवृतं च यत्॥१८॥
कैकेय्यास्तु सुसंवृत्तं क्षिप्रमद्यैव लक्ष्मण।
या न तृष्यति राज्येन पुत्रार्थे दीर्घदर्शिनी॥१९॥
‘अत्यन्त सुख में पली हुई यशस्विनी राजकुमारी सीता की यह अवस्था! (हाय! कितने कष्टकी बात है!) लक्ष्मण! वन में हमारे लिये जिस दुःख की प्राप्ति कैकेयी को अभीष्ट थी और जो कुछ उसे प्रिय था, जिसके लिये उसने वर माँगे थे, वह सब आज ही शीघ्रतापूर्वक सिद्ध हो गया। तभी तो वह दूरदर्शिनी कैकेयी अपने पुत्र के लिये केवल राज्य लेकर नहीं संतुष्ट हुई थी॥१८-१९॥
ययाहं सर्वभूतानां प्रियः प्रस्थापितो वनम्।
अद्येदानीं सकामा सा या माता मध्यमा मम॥२०॥
‘जिसने समस्त प्राणियों के लिये प्रिय होने पर भी मुझे वन में भेज दिया, वह मेरी मझली माता कैकेयी आज इस समय सफलमनोरथ हुई है॥२०॥
परस्पर्शात् तु वैदेह्या न दुःखतरमस्ति मे।
पितुर्विनाशात् सौमित्रे स्वराज्य हरणात् तथा॥२१॥
‘विदेहनन्दिनीका दूसरा कोई स्पर्श कर ले, इससे बढ़कर दुःख की बात मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है। सुमित्रानन्दन! पिताजी की मृत्यु तथा अपने राज्य के अपहरण से भी उतना कष्ट मुझे नहीं हुआ था, जितना अब हुआ है’॥२१॥
इति ब्रुवति काकुत्स्थे बाष्पशोकपरिप्लुतः।
अब्रवील्लक्ष्मणः क्रुद्धो रुद्धो नाग इव श्वसन्॥२२॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर शोक के आँसू बहाते हुए लक्ष्मण कुपित हो मन्त्र से अवरुद्ध हुए सर्प की भाँति फुफकारते हुए बोले-॥२२॥
अनाथ इव भूतानां नाथस्त्वं वासवोपमः।
मया प्रेष्येण काकुत्स्थ किमर्थं परितप्यसे॥२३॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण! आप इन्द्र के समान समस्त प्राणियों के स्वामी एवं संरक्षक हैं। मुझ दास के रहते हुए आप किसलिये अनाथ की भाँति संतप्त हो रहे हैं?॥२३॥
शरेण निहतस्याद्य मया क्रुद्धेन रक्षसः।
विराधस्य गतासोर्हि मही पास्यति शोणितम्॥२४॥
‘मैं अभी कुपित होकर अपने बाण से इस राक्षस का वध करता हूँ। आज यह पृथ्वी मेरे द्वारा मारे गये प्राणशून्य विराध का रक्त पीयेगी॥२४॥
राज्यकामे मम क्रोधो भरते यो बभूव ह।
तं विराधे विमोक्ष्यामि वज्री वज्रमिवाचले॥२५॥
‘राज्य की इच्छा रखने वाले भरत पर मेरा जो क्रोध प्रकट हुआ था, उसे आज मैं विराध पर छोडूंगा। जैसे वज्रधारी इन्द्र पर्वत पर अपना वज्र छोड़ते हैं॥२५॥
मम भुजबलवेगवेगितः पततु शरोऽस्य महान् महोरसि।
व्यपनयतु तनोश्च जीवितं पततु ततश्च महीं विघूर्णितः॥२६॥
‘मेरी भुजाओं के बल के वेग से वेगवान् होकर छूटा हुआ मेरा महान् बाण आज विराध के विशाल वक्षःस्थल पर गिरे इसके शरीर से प्राणों को अलग करे। तत्पश्चात् यह विराध चक्कर खाता हुआ पृथ्वी पर पड़ जाय’॥२६॥
सर्ग ३
अथोवाच पुनर्वाक्यं विराधः पूरयन् वनम्।
पृच्छतो मम हि ब्रूतं कौ युवां क्व गमिष्यथः॥१॥
तदनन्तर विराध ने उस वन को जाते हुए कहा - ’अरे! मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ। तुम दोनों कौन हो और कहाँ जाओगे?’॥१॥
तमुवाच ततो रामो राक्षसं ज्वलिताननम्।
पृच्छन्तं सुमहातेजा इक्ष्वाकुकुलमात्मनः॥२॥
क्षत्रियौ वृत्तसम्पन्नौ विद्धि नौ वनगोचरौ।
त्वां तु वेदितुमिच्छावः कस्त्वं चरसि दण्डकान्॥३॥
तब महातेजस्वी श्रीराम ने अपना परिचय पूछते हुए प्रज्वलित मुख वाले उस राक्षस से इस प्रकार कहा –’तुझे मालूम होना चाहिये कि महाराज इक्ष्वाकु का कुल ही मेरा कुल है। हम दोनों भाई सदाचार का पालन करने वाले क्षत्रिय हैं और कारण वश इस समय वन में निवास करते हैं। अब हम तेरा परिचय जानना चाहते हैं। तु कौन है, जो दण्डक वन में स्वेच्छा से विचर रहा है?’॥२-३॥
तमुवाच विराधस्तु रामं सत्यपराक्रमम्।
हन्त वक्ष्यामि ते राजन् निबोध मम राघव॥४॥
यह सुनकर विराध ने सत्यपराक्रमी श्रीराम से कहा- ‘रघुवंशी नरेश! मैं प्रसन्नतापूर्वक अपना परिचय देता हूँ। तुम मेरे विषय में सुनो॥४॥
पुत्रः किल जवस्याहं माता मम शतहदा।
विराध इति मामाहुः पृथिव्यां सर्वराक्षसाः॥५॥
‘मैं ‘जव’ नामक राक्षस का पुत्र हूँ, मेरी माता का नाम ‘शतह्रदा’ है। भूमण्डल के समस्त राक्षस मुझे विराध के नाम से पुकारते हैं॥५॥
तपसा चाभिसम्प्राप्ता ब्रह्मणो हि प्रसादजा।
शस्त्रेणावध्यता लोकेऽच्छेद्याभेद्यत्वमेव च॥६॥
‘मैंने तपस्या के द्वारा ब्रह्माजी को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त किया है कि किसी भी शस्त्र से मेरा वध न हो। मैं संसार में अच्छेद्य और अभेद्य होकर रहूँ कोई भी मेरे शरीर को छिन्न-भिन्न नहीं कर सके॥६॥
उत्सृज्य प्रमदामेनामनपेक्षौ यथागतम्।
त्वरमाणौ पलायेथां न वां जीवितमाददे॥७॥
‘अब तुम दोनों इस युवती स्त्री को यहीं छोड़कर इसे पाने की इच्छा न रखते हुए जैसे आये हो उसी प्रकार तुरंत यहाँ से भाग जाओ। मैं तुम दोनों के प्राण नहीं लूँगा’॥७॥
तं रामः प्रत्युवाचेदं कोपसंरक्तलोचनः।
राक्षसं विकृताकारं विराधं पापचेतसम्॥८॥
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वे पापपूर्ण विचार और विकट आकार वाले उस पापी राक्षस विराध से इस प्रकार बोले-॥८॥
क्षुद्र धिक् त्वां तु हीनार्थं मृत्युमन्वेषसे ध्रुवम्।
रणे प्राप्स्यसि संतिष्ठ न मे जीवन् विमोक्ष्यसे॥९॥
‘नीच! तुझे धिक्कार है। तेरा अभिप्राय बड़ा ही खोटा है। निश्चय ही तू अपनी मौत ढूँढ़ रहा है और वह तुझे युद्ध में मिलेगी। ठहर, अब तू मेरे हाथ से जीवित नहीं छूट सकेगा’॥९॥
ततः सज्यं धनुः कृत्वा रामः सुनिशितान् शरान्।
सुशीघ्रमभिसंधाय राक्षसं निजघान ह॥१०॥
यह कहकर भगवान् श्रीराम ने अपने धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और तुरंत ही तीखे बाणों का अनुसंधान करके उस राक्षस को बींधना आरम्भ किया॥१०॥
धनुषा ज्यागुणवता सप्त बाणान् मुमोच ह।
रुक्मपुङ्खान् महावेगान् सुपर्णानिलतुल्यगान्॥११॥
उन्होंने प्रत्यञ्चायुक्त धनुष के द्वारा विराध के ऊपर लगातार सात बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायु के समान महान् वेगशाली थे और सोने के पंखों से सुशोभित हो रहे थे॥११॥
ते शरीरं विराधस्य भित्त्वा बर्हिणवाससः।
निपेतुः शोणितादिग्धा धरण्यां पावकोपमाः॥१२॥
प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी और मोर पंख लगे हुए वे बाण विराध के शरीर को छेदकर रक्तरञ्जित हो पृथ्वी पर गिर पड़े॥१२॥
स विद्धो न्यस्य वैदेहीं शूलमुद्यम्य राक्षसः।
अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धस्तदा रामं सलक्ष्मणम्॥१३॥
घायल हो जाने पर उस राक्षस ने विदेहकुमारी सीता को अलग रख दिया और स्वयं हाथ में शूल लिये अत्यन्त कुपित होकर श्रीराम तथा लक्ष्मण पर तत्काल टूट पड़ा॥१३॥
स विनद्य महानादं शूलं शक्रध्वजोपमम्।
प्रगृह्याशोभत तदा व्यात्तानन इवान्तकः॥१४॥
वह बड़े जोर से गर्जना करके इन्द्रध्वज के समान शूल लेकर उस समय मुँह बाये हुए काल के समान शोभा पा रहा था॥१४॥
अथ तौ भ्रातरौ दीप्तं शरवर्षं ववर्षतुः।
विराधे राक्षसे तस्मिन् कालान्तकयमोपमे॥१५॥
तब काल, अन्तक और यमराज के समान उस भयंकर राक्षस विराध के ऊपर उन दोनों भाइयों ने प्रज्वलित बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी॥१५॥
स प्रहस्य महारौद्रः स्थित्वाजृम्भत राक्षसः।
जृम्भमाणस्य ते बाणाः कायान्निष्पेतुराशुगाः॥१६॥
‘यह देख वह महाभयंकर राक्षस अट्टहास करके खड़ा हो गया और जंभाई के साथ अंगड़ाई लेने लगा। उसके वैसा करते ही शीघ्रगामी बाण उसके शरीर से निकलकर पृथ्वी पर गिर पड़े॥१६॥
स्पर्शात् तु वरदानेन प्राणान् संरोध्य राक्षसः।
विराधः शूलमुद्यम्य राघवावभ्यधावत॥१७॥
वरदान के सम्बन्ध से उस राक्षस विराध ने प्राणों को रोक लिया और शूल उठाकर उन दोनों रघुवंशी वीरों पर आक्रमण किया॥१७॥
तच्छूलं वज्रसंकाशं गगने ज्वलनोपमम्।
द्वाभ्यां शराभ्यां चिच्छेद रामः शस्त्रभृतां वरः॥१८॥
उसका वह शूल आकाश में वज्र और अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा; परंतु शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ने दो बाण मारकर उसे काट डाला॥१८॥
तद् रामविशिखैश्छिन्नं शूलं तस्यापतद् भुवि।
पपाताशनिना छिन्नं मेरोरिव शिलातलम्॥१९॥
श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से कटा हुआ विराध का वह शूल वज्र से छिन्न-भिन्न हुए मेरु के शिलाखण्ड की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा॥१९॥
तौ खड्गौ क्षिप्रमुद्यम्य कृष्णसर्पाविवोद्यतौ।
तूर्णमापेततुस्तस्य तदा प्रहरतां बलात्॥२०॥
फिर तो वे दोनों भाई शीघ्र ही काले सो के समान दो तलवारें लेकर तुरंत उस पर टूट पड़े और तत्काल बलपूर्वक प्रहार करने लगे॥२०॥
स वध्यमानः सुभृशं भुजाभ्यां परिगृह्य तौ।
अप्रकम्प्यौ नरव्याघ्रौ रौद्रः प्रस्थातुमैच्छत॥२१॥
उनके आघात से अत्यन्त घायल हुए उस भयंकर राक्षस ने अपनी दोनों भुजाओं से उन अकम्प्य पुरुषसिंह वीरों को पकड़कर अन्यत्र जाने की इच्छा की॥२१॥
तस्याभिप्रायमाज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।
वहत्वयमलं तावत् पथानेन तु राक्षसः॥२२॥
यथा चेच्छति सौमित्रे तथा वहतु राक्षसः।
अयमेव हि नः पन्था येन याति निशाचरः॥२३॥
उसके अभिप्राय को जानकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा - ’सुमित्रानन्दन! यह राक्षस अपनी इच्छा के अनुसार हम लोगों को इस मार्ग से ढोकर ले चले। यह जैसा चाहता है, उसी तरह हमारा वाहन बनकर हमें ले चले (इसमें बाधा डालने की आवश्यकता नहीं है)। जिस मार्ग से यह निशाचर चल रहा है, यही हमलोगों के लिये आगे जाने का मार्ग है’॥२२-२३॥
स तु स्वबलवीर्येण समुत्क्षिप्य निशाचरः।
बालाविव स्कन्धगतौ चकारातिबलोद्धतः॥२४॥
अत्यन्त बल से उद्दण्ड बने हुए निशाचर विराध ने अपने बल-पराक्रम से उन दोनों भाइयों को बालकों की तरह उठाकर अपने दोनों कंधों पर बिठा लिया॥२४॥
तावारोप्य ततः स्कन्धं राघवौ रजनीचरः।
विराधो विनदन् घोरं जगामाभिमुखो वनम्॥२५॥
उन दोनों रघुवंशी वीरों को कंधे पर चढ़ा लेने के बाद राक्षस विराध भयंकर गर्जना करता हुआ वन की ओर चल दिया॥२५॥
वनं महामेघनिभं प्रविष्टो द्रुमैर्महद्भिर्विविधैरुपेतम्।
नानाविधैः पक्षिकुलैर्विचित्रं शिवायुतं व्यालमृगैर्विकीर्णम्॥२६॥
तदनन्तर उसने एक ऐसे वन में प्रवेश किया, जो महान् मेघों की घटा के समान घना और नीला था। नाना प्रकार के बड़े-बड़े वृक्ष वहाँ भरे हुए थे। भाँति-भाँति के पक्षियों के समुदाय उसे विचित्र शोभा से सम्पन्न बना रहे थे तथा बहुत-से गीदड़ और हिंसक पशु उसमें सब ओर फैले हुए थे॥२६॥
सर्ग ४
ह्रियमाणौ तु काकुत्स्थौ दृष्ट्वा सीता रघूत्तमौ।
उच्चैः स्वरेण चुक्रोश प्रगृह्य सुमहाभुजौ॥१॥
रघुकुल के श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण को राक्षस लिये जा रहा है यह देखकर सीता अपनी दोनों बाहें ऊपर उठाकर जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगीं-॥१॥
एष दाशरथी रामः सत्यवाञ्छीलवान् शुचिः।
रक्षसा रौद्ररूपेण ह्रियते सहलक्ष्मणः॥२॥
‘हाय ! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचार विचार वाले दशरथनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण को यह रौद्ररूपधारी राक्षस लिये जा रहा है॥२॥
मामृक्षा भक्षयिष्यन्ति शार्दूलद्वीपिनस्तथा।
मां हरोत्सृज काकुत्स्थौ नमस्ते राक्षसोत्तम॥३॥
‘राक्षसशिरोमणे! तुम्हें नमस्कार है। इस वन में रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो, किंतु इन दोनों ककुत्स्थवंशी वीरों को छोड़ दो’॥३॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा वैदेह्या रामलक्ष्मणौ।
वेगं प्रचक्रतुर्वीरौ वधे तस्य दुरात्मनः॥४॥
विदेहनन्दिनी सीता की यह बात सुनकर वे दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण उस दुरात्मा राक्षस का वध करने में शीघ्रता करने लगे॥४॥
तस्य रौद्रस्य सौमित्रिः सव्यं बाहुं बभञ्ज ह।
रामस्तु दक्षिणं बाहं तरसा तस्य रक्षसः॥५॥
सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उस राक्षस की बायीं और श्रीराम ने उसकी दाहिनी बाँह बड़े वेग से तोड़ डाली।
स भग्नबाहुः संविग्नः पपाताशु विमूर्च्छितः।
धरण्यां मेघसंकाशो वज्रभिन्न इवाचलः॥६॥
भुजाओं के टूट जाने पर वह मेघ के समान काला राक्षस व्याकुल हो गया और शीघ्र ही मूर्च्छित होकरवज्र के द्वारा टूटे हुए पर्वत शिखर की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा॥६॥
मुष्टिभिर्बाहुभिः पद्भिः सूदयन्तौ तु राक्षसम्।
उद्यम्योद्यम्य चाप्येनं स्थण्डिले निष्पिपेषतुः॥७॥
तब श्रीराम और लक्ष्मण विराध को भुजाओं, मुक्कों और लातों से मारने लगे तथा उसे उठा-उठाकर पटकने और पृथ्वी पर रगड़ने लगे॥७॥
स विद्वौ बहुभिर्बाणैः खड्गाभ्यां च परिक्षतः।
निष्पिष्टो बहुधा भूमौ न ममार स राक्षसः॥८॥
बहुसंख्यक बाणों से घायल और तलवारों से क्षतविक्षत होने पर तथा पृथ्वी पर बार-बार रगड़ा जाने पर भी वह राक्षस मरा नहीं॥८॥
तं प्रेक्ष्य रामः सुभृशमवध्यमचलोपमम्।
भयेष्वभयदः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्॥९॥
अवध्य तथा पर्वत के समान अचल विराध को बारंबार देखकर भय के अवसरों पर अभय देने वाले श्रीमान् राम ने लक्ष्मण से यह बात कही-॥९॥
तपसा पुरुषव्याघ्र राक्षसोऽयं न शक्यते।
शस्त्रेण युधि निर्जेतुं राक्षसं निखनावहे॥१०॥
‘पुरुषसिंह! यह राक्षस तपस्या से (वर पाकर) अवध्य हो गया है। इसे शस्त्र के द्वारा युद्ध में नहीं जीता जा सकता। इसलिये हमलोग निशाचर विराध को पराजित करने के लिये अब गड्ढा खोदकर गाड़ दें॥१०॥
कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण।
वनेऽस्मिन् सुमहच्छ्वभ्रं खन्यतां रौद्रवर्चसः॥११॥
‘लक्ष्मण! हाथी के समान भयंकर तथा रौद्र तेज वाले इस राक्षस के लिये इस वन में बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’॥११॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति।
तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान्॥१२॥
इस प्रकार लक्ष्मण को गड्ढा खोदने की आज्ञा देकर पराक्रमी श्रीराम अपने एक पैर से विराध का गला दबाकर खड़े हो गये॥१२॥
तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं राक्षसः प्रश्रितं वचः।
इदं प्रोवाच काकुत्स्थं विराधः पुरुषर्षभम्॥१३॥
श्रीरामचन्द्रजी की कही हुई यह बात सुनकर राक्षस विराध ने पुरुषप्रवर श्रीराम से यह विनययुक्त बात कही –॥१३॥
हतोऽहं पुरुषव्याघ्र शक्रतुल्यबलेन वै।
मया तु पूर्वं त्वं मोहान्न ज्ञातः पुरुषर्षभ॥१४॥
‘पुरुषसिंह ! नरश्रेष्ठ! आपका बल देवराज इन्द्र के समान है। मैं आपके हाथ से मारा गया। मोहवश पहले मैं आपको पहचान न सका॥१४॥
कौसल्या सुप्रजास्तात रामस्त्वं विदितो मया।
वैदेही च महाभागा लक्ष्मणश्च महायशाः॥१५॥
‘तात! आपके द्वारा माता कौसल्या उत्तम संतान वाली हुई हैं। मैं यह जान गया कि आप ही श्रीरामचन्द्रजी हैं। यह महाभागा विदेहनन्दिनी सीता हैं और ये आपके छोटे भाई महायशस्वी लक्ष्मण हैं॥१५॥
अभिशापादहं घोरां प्रविष्टो राक्षसीं तनुम्।
तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वः शप्तो वैश्रवणेन हि॥१६॥
‘मुझे शाप के कारण इस भयंकर राक्षस शरीर में आना पड़ा था। मैं तुम्बुरु नामक गन्धर्व हूँ। कुबेर ने मुझे राक्षस होने का शाप दिया था॥१६॥
प्रसाद्यमानश्च मया सोऽब्रवीन्मां महायशाः।
यदा दाशरथी रामस्त्वां वधिष्यति संयुगे॥१७॥
तदा प्रकृतिमापन्नो भवान् स्वर्गं गमिष्यति।
‘जब मैंने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की तब वे महायशस्वी कुबेर मुझसे इस प्रकार बोले - ’गन्धर्व! जब दशरथनन्दन श्रीराम युद्ध में तुम्हारा वध करेंगे, तब तुम अपने पहले स्वरूप को प्राप्त होकर स्वर्गलोक को जाओगे॥१७ १/२॥
अनुपस्थीयमानो मां स क्रुद्धो व्याजहार ह॥१८॥
इति वैश्रवणो राजा रम्भासक्तमुवाच ह।
‘मैं रम्भा नामक अप्सरा में आसक्त था, इसलिये एक दिन ठीक समय से उनकी सेवा में उपस्थित न हो सका। इसीलिये कुपित हो राजा वैश्रवण (कुबेर) ने मुझे पूर्वोक्त शाप देकर उससे छूटने की अवधि बतायी थी॥१८ १/२॥
तव प्रसादान्मुक्तोऽहमभिशापात् सुदारुणात्॥१९॥
भुवनं स्वं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु परंतप।
‘शत्रुओं को संताप देने वाले रघुवीर! आज आपकी कृपा से मुझे उस भयंकर शाप से छुटकारा मिल गया। आपका कल्याण हो, अब मैं अपने लोक को जाऊँगा॥१९ १/२॥
इतो वसति धर्मात्मा शरभङ्गः प्रतापवान्॥२०॥
अध्यर्धयोजने तात महर्षिः सूर्यसंनिभः।
तं क्षिप्रमभिगच्छ त्वं स ते श्रेयोऽभिधास्यति॥२१॥
‘तात! यहाँ से डेढ़ योजन की दूरी पर सूर्य के समान तेजस्वी प्रतापी और धर्मात्मा महामुनि शरभङ्ग निवास करते हैं। उनके पास आप शीघ्र चले जाइये, वे आपके कल्याण की बात बतायेंगे॥२०-२१॥
अवटे चापि मां राम निक्षिप्य कुशली व्रज।
रक्षसां गतसत्त्वानामेष धर्मः सनातनः॥२२॥
‘श्रीराम! आप मेरे शरीर को गड्डे में गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइये। मरे हुए राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ना (कब्र खोदकर उसमें दफना देना) यह उनके लिये सनातन (परम्परा प्राप्त) धर्म है॥२२॥
अवटे ये निधीयन्ते तेषां लोकाः सनातनाः।
एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थं विराधः शरपीडितः॥२३॥
बभूव स्वर्गसम्प्राप्तो न्यस्तदेहो महाबलः।
‘जो राक्षस गड्ढे में गाड़ दिये जाते हैं, उन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।’ श्रीराम से ऐसा कहकर बाणों से पीड़ित हुआ महाबली विराध (जब उसका शरीर गड्ढे में डाला गया, तब) उस शरीर को छोड़कर स्वर्गलोक को चला गया॥२३ १/२॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं लक्ष्मणं व्यादिदेश ह॥२४॥
कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण।
वनेऽस्मिन्सुमहान् श्वभ्रः खन्यतां रौद्रकर्मणः॥२५॥
(वह किस तरह गड्ढे में डाला गया? - यह बात अब बतायी जाती है-) उसकी बात सुनकर श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मण को आज्ञा दी—’लक्ष्मण! भयंकर कर्म करने वाले तथा हाथी के समान भयानक इस राक्षस के लिये इस वन में बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’॥२४-२५॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति।
तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान॥२६॥
इस प्रकार लक्ष्मण को गड्ढा खोदने का आदेश दे पराक्रमी श्रीराम एक पैर से विराधका गला दबाकर खड़े हो गये॥२६॥
ततः खनित्रमादाय लक्ष्मणः श्वभ्रमुत्तमम्।
अखनत् पावतस्तस्य विराधस्य महात्मनः॥२७॥
तब लक्ष्मण ने फावड़ा लेकर उस विशालकाय विराध के पास ही एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदकर तैयार किया॥२७॥
तं मुक्तकण्ठमुत्क्षिप्य शङ्ककर्ण महास्वनम्।
विराधं प्राक्षिपच्छ्वभ्रे नदन्तं भैरवस्वनम्॥२८॥
तब श्रीराम ने उसके गले को छोड़ दिया और लक्ष्मणने बँटे-जैसे कान वाले उस विराध को उठाकर उस गड्डे में डाल दिया, उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में जोर-जोर से गर्जना कर रहा था॥२८॥
तमाहवे दारुणमाशुविक्रमौ स्थिरावुभौ संयति रामलक्ष्मणौ।
मुदान्वितौ चिक्षिपतुर्भयावह नदन्तमुत्क्षिप्य बलेन राक्षसम्॥२९॥
युद्ध में स्थिर रहकर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करने वाले उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण ने रणभूमि में क्रूरतापूर्ण कर्म करने वाले उस भयंकर राक्षस विराध को बलपूर्वक उठाकर गड्ढे में फेंक दिया। उस समय वह जोर-जोर से चिल्ला रहा था। उसे गड्ढे में डालकर वे दोनों बन्धु बड़े प्रसन्न हुए॥२९॥
अवध्यतां प्रेक्ष्य महासुरस्य तौ शितेन शस्त्रेण तदा नरर्षभौ।
समर्थ्य चात्यर्थविशारदावुभौ बिले विराधस्य वधं प्रचक्रतुः॥३०॥
महान् असुर विराध का तीखे शस्त्र से वध होने वाला नहीं है, यह देखकर अत्यन्त कुशल दोनों भाई नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण ने उस समय गड्ढा खोदकर उस गड्ढे में उसे डाल दिया और उसे मिट्टी से पाटकर उस राक्षस का वध कर डाला॥३०॥
स्वयं विराधेन हि मृत्युमात्मनः प्रसह्य रामेण यथार्थमीप्सितः।
निवेदितः काननचारिणा स्वयं न मे वधः शस्त्रकृतो भवेदिति॥३१॥
वास्तव में श्रीराम के हाथ से ही हठपूर्वक मरना उसे अभीष्ट था। उस अपनी मनोवाञ्छित मृत्यु की प्राप्ति के उद्देश्य से स्वयं वनचारी विराध ने ही श्रीराम को यह बता दिया था कि शस्त्र द्वारा मेरा वध नहीं हो सकता॥३१॥
तदेव रामेण निशम्य भाषितं कृता मतिस्तस्य बिलप्रवेशने।
बिलं च तेनातिबलेन रक्षसा प्रवेश्यमानेन वनं विनादितम्॥३२॥
उसकी कही हई उसी बातको सुनकर श्रीराम ने उसे गड्ढे में गाड़ देने का विचार किया था। जब वह गड्ढे में डाला जाने लगा, उस समय उस अत्यन्त बलवान् राक्षस ने अपनी चिल्लाहट से सारे वन प्रान्त को गुँजा दिया॥३२॥
प्रहृष्टरूपाविव रामलक्ष्मणौ विराधमुर्त्यां प्रदरे निपात्य तम्।
ननन्दतुर्वीतभयौ महावने शिलाभिरन्तर्दधतुश्च राक्षसम्॥३३॥
राक्षस विराध को पृथ्वी के अंदर गड्ढे में गिराकर श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उसे ऊपर से बहुतेरे पत्थर डालकर पाट दिया। फिर वे निर्भय हो उस महान् वन में सानन्द विचरने लगे॥३३॥
ततस्तु तौ काञ्चनचित्रकार्मुको निहत्य रक्षः परिगृह्य मैथिलीम।
विजह्रतुस्तौ मुदितौ महावने दिवि स्थितौ चन्द्रदिवाकराविव॥३४॥
इस प्रकार उस राक्षस का वध करके मिथिलेशकुमारी सीता को साथ ले सोने के विचित्र धनुषों से सुशोभित हो वे दोनों भाई आकाश में स्थित हुए चन्द्रमा और सूर्य की भाँति उस महान् वन में आनन्दमग्न हो विचरण करने लगे॥३४॥
सर्ग ५
हत्वा तु तं भीमबलं विराधं राक्षसं वने।
ततः सीतां परिष्वज्य समाश्वास्य च वीर्यवान्॥१॥
अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्।
कष्टं वनमिदं दुर्गं न च स्मो वनगोचराः॥२॥
अभिगच्छामहे शीघ्रं शरभङ्गं तपोधनम्।
आश्रमं शरभङ्गस्य राघवोऽभिजगाम ह॥३॥
वन में उस भयंकर बलशाली राक्षस विराध का वध करके पराक्रमी श्रीराम ने सीता को हृदय से लगाकर सान्त्वना दी और उद्दीप्त तेज वाले भाई लक्ष्मण से इस प्रकार कहा - ’सुमित्रानन्दन! यह दुर्गम वन बड़ा कष्टप्रद है,हमलोग इसके पहले कभी ऐसे वनों में नहीं रहे हैं (अतः यहाँ के कष्टों का न तो अनुभव है और न अभ्यास ही है)। अच्छा! हमलोग अब शीघ्र ही तपोधन शरभङ्गजी के पास चलें’ - ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी शरभङ्ग मुनि के आश्रमपर गये॥१-३॥
तस्य देवप्रभावस्य तपसा भावितात्मनः।
समीपे शरभङ्गस्य ददर्श महदद्भुतम्॥४॥
देवताओं के तुल्य प्रभावशाली तथा तपस्या से शुद्ध अन्तःकरणवाले (अथवा तप के द्वारा परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार करने वाले) शरभङ्ग मुनि के समीप जाने पर श्रीराम ने एक बड़ा अद्भुत दृश्य देखा॥४॥
विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम्।
रथप्रवरमारूढमाकाशे विबुधानुगम्॥५॥
असंस्पृशन्तं वसुधां ददर्श विबुधेश्वरम्।
सम्प्रभाभरणं देवं विरजोऽम्बरधारिणम्॥६॥
वहाँ उन्होंने आकाश में एक श्रेष्ठ रथ पर बैठे हुए देवताओं के स्वामी इन्द्रदेव का दर्शन किया, जो पृथ्वी का स्पर्श नहीं कर रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति सूर्य और अग्नि के समान प्रकाशित होती थी। वे अपने तेजस्वी शरीर से देदीप्यमान हो रहे थे। उनके पीछे और भी बहुत-से देवता थे। उनके दीप्तिमान् आभूषण चमक रहे थे तथा उन्होंने निर्मल वस्त्र धारण कर रखा था॥५-६॥
तद्विधैरेव बहुभिः पूज्यमानं महात्मभिः।
हरितैर्वाजिभिर्युक्तमन्तरिक्षगतं रथम्॥७॥
ददर्शादूरतस्तस्य तरुणादित्यसंनिभम्।
उन्हीं के समान वेशभूषावाले दूसरे बहुत-से महात्मा इन्द्रदेव की पूजा (स्तुति-प्रशंसा) कर रहे थे। उनका रथ आकाश में खड़ा था और उसमें हरे रंग के घोड़े जुते हुए थे। श्रीराम ने निकट से उस रथ को देखा। वह नवोदित सूर्य के समान प्रकाशित होता था॥७ १/२॥
पाण्डुराभ्रघनप्रख्यं चन्द्रमण्डलसंनिभम्॥८॥
अपश्यद् विमलं छत्रं चित्रमाल्योपशोभितम्।
उन्होंने यह भी देखा कि इन्द्र के मस्तक के ऊपर श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल तथा चन्द्रमण्डल के समान कान्तिमान् निर्मल छत्र तना हुआ है, जो विचित्र फूलों की मालाओं से सुशोभित है॥८ १/२॥
चामरव्यजने चाग्रये रुक्मदण्डे महाधने॥९॥
गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि।
श्रीराम ने सुवर्णमय डंडे वाले दो श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य चँवर और व्यजन भी देखे, जिन्हें दो सुन्दरियाँ लेकर देवराज के मस्तक पर हवा कर रही थीं॥९ १/२॥
गन्धर्वामरसिद्धाश्च बहवः परमर्षयः॥१०॥
अन्तरिक्षगतं देवं गीर्भिरग्रया भिरैडयन्।
सह सम्भाषमाणे तु शरभङ्गेन वासवे॥११॥
दृष्ट्वा शतक्रतुं तत्र रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।
रामोऽथ रथमुद्दिश्य भ्रातुर्दर्शयताद्भुतम्॥१२॥
उस समय बहुत-से गन्धर्व, देवता, सिद्ध और महर्षिगण उत्तम वचनों द्वारा अन्तरिक्ष में विराजमान देवेन्द्र की स्तुति करते थे और देवराज इन्द्र शरभङ्ग मुनि के साथ वार्तालाप कर रहे थे। वहाँ इस प्रकार शतक्रतु इन्द्र का दर्शन करके श्रीराम ने उनके अद्भुत रथ की ओर अँगुली से संकेत करते हुए उसे भाई को दिखाया और लक्ष्मण से इस प्रकार कहा-॥१०-१२॥
अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टमद्भुतं पश्य लक्ष्मण।
प्रतपन्तमिवादित्यमन्तरिक्षगतं रथम्॥१३॥
‘लक्ष्मण! आकाश में वह अद्भुत रथ तो देखो, उससे तेज की लपटें निकल रही हैं। वह सूर्य के समान तप रहा है। शोभा मानो मूर्तिमती होकर उसकी सेवा करती है॥१३॥
ये हयाः पुरुहूतस्य पुरा शक्रस्य नः श्रुताः।
अन्तरिक्षगता दिव्यास्त इमे हरयो ध्रुवम्॥१४॥
‘हमलोगों ने पहले देवराज इन्द्र के जिन दिव्य घोडों के विषय में जैसा सुन रखा है, निश्चय ही आकाश में ये वैसे ही दिव्य अश्व विराजमान हैं॥१४॥
इमे च पुरुषव्याघ्र ये तिष्ठन्त्यभितो दिशम्।
शतं शतं कुण्डलिनो युवानः खड्गपाणयः॥१५॥
विस्तीर्णविपुलोरस्काः परिघायतबाहवः।
शोणांशुवसनाः सर्वे व्याघ्रा इव दुरासदाः॥१६॥
‘पुरुषसिंह! इस रथ के दोनों ओर जो ये हाथों में खड्ग लिये कुण्डलधारी सौ-सौ युवक खड़े हैं, इनके वक्षःस्थल विशाल एवं विस्तृत हैं, भुजाएँ परिघों के समान सुदृढ़ एवं बड़ी-बड़ी हैं। ये सब-केसब लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं और व्याघ्रों के समान दुर्जय प्रतीत होते हैं॥१५-१६॥
उरोदेशेषु सर्वेषां हारा ज्वलनसंनिभाः।
रूपं बिभ्रति सौमित्रे पञ्चविंशतिवार्षिकम्॥१७॥
‘सुमित्रानन्दन! इन सबके हृदयदेशों में अग्नि के समान तेज से जगमगाते हुए हार शोभा पाते हैं। ये नवयुवक पच्चीस वर्षों की अवस्था का रूप धारण करते हैं।॥१७॥
एतद्धि किल देवानां वयो भवति नित्यदा।
यथेमे पुरुषव्याघ्रा दृश्यन्ते प्रियदर्शनाः॥१८॥
‘कहते हैं, देवताओं की सदा ऐसी ही अवस्था रहती है, जैसे ये पुरुष प्रवर दिखायी देते हैं। इनका दर्शन कितना प्यारा लगता है॥१८॥
इहैव सह वैदेह्या मुहूर्तं तिष्ठ लक्ष्मण।
यावज्जानाम्यहं व्यक्तं क एष द्युतिमान् रथे॥१९॥
‘लक्ष्मण! जबतक कि मैं स्पष्ट रूपसे यह पता न लगा लूँ कि रथ पर बैठे हुए ये तेजस्वी पुरुष कौन हैं? तबतक तुम विदेहनन्दिनी सीता के साथ एक मुहूर्त तक यहीं ठहरो’॥१९॥
तमेवमुक्त्वा सौमित्रिमिहैव स्थीयतामिति।
अभिचक्राम काकुत्स्थः शरभङ्गाश्रमं प्रति॥२०॥
इस प्रकार सुमित्राकुमार को वहीं ठहरने का आदेश देकर श्रीरामचन्द्रजी टहलते हुए शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर गये॥२०॥
ततः समभिगच्छन्तं प्रेक्ष्य रामं शचीपतिः।
शरभङ्गमनुज्ञाप्य विबुधानिदमब्रवीत्॥२१॥
श्रीराम को आते देख शचीपति इन्द्र ने शरभङ्ग मुनि से विदा ले देवताओं से इस प्रकार कहा-॥२१॥
इहोपयात्यसौ रामो यावन्मां नाभिभाषते।
निष्ठां नयत तावत् तु ततो माद्रष्टमर्हति॥२२॥
‘श्रीरामचन्द्रजी यहाँ आ रहे हैं। वे जब तक मुझसे कोई बात न करें, उसके पहले ही तुम लोग मुझे यहाँ से दूसरे स्थान में ले चलो। इस समय श्रीराम से मेरी मुलाकात नहीं होनी चाहिये॥२२॥
जितवन्तं कृतार्थं हि तदाहमचिरादिमम्।
कर्म ह्यनेन कर्तव्यं महदन्यैः सुदुष्करम्॥२३॥
‘इन्हें वह महान् कर्म करना है, जिसका सम्पादन करना दूसरों के लिये बहुत कठिन है। जब ये रावण पर विजय पाकर अपना कर्तव्य पूर्ण करके कृतार्थ हो जायँगे, तब मैं शीघ्र ही आकर इनका दर्शन करूँगा’॥२३॥
अथ वज्री तमामन्त्र्य मानयित्वा च तापसम्।
रथेन हययुक्तेन ययौ दिवमरिंदमः॥२४॥
यह कहकर वज्रधारी शत्रुदमन इन्द् रने तपस्वी शरभङ्ग का सत्कार किया और उनसे पूछकर अनुमति ले वे घोड़े जुते हुए रथ के द्वारा स्वर्गलोक को चल दिये॥२४॥
प्रयाते तु सहस्राक्षे राघवः सपरिच्छदः।
अग्निहोत्रमुपासीनं शरभङ्गमुपागमत्॥२५॥
सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी और भाई के साथ शरभङ्ग मुनि के पास गये। उस समय वे अग्नि के समीप बैठकर अग्निहोत्र कर रहे थे।॥२५॥
तस्य पादौ च संगृह्य रामः सीता च लक्ष्मणः।
निषेदुस्तदनुज्ञाता लब्धवासा निमन्त्रिताः॥२६॥
श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने मुनि के चरणों में प्रणाम किया और उनकी आज्ञा से वहाँ बैठ गये। शरभङ्गजी ने उन्हें आतिथ्य के लिये निमन्त्रण दे ठहरने के लिये स्थान दिया॥२६॥
ततः शक्रोपयानं तु पर्यपृच्छत राघवः ।
शरभङ्गश्च तत् सर्वं राघवाय न्यवेदयत्॥२७॥
तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी ने उनसे इन्द्र के आने का कारण पूछा। तब शरभङ्ग मुनि ने श्रीरघुनाथजी से सब बातें निवेदन करते हुए कहा-॥२७॥
मामेष वरदो राम ब्रह्मलोकं निनीषति।
जितमुग्रेण तपसा दुष्प्रापमकृतात्मभिः॥२८॥
‘श्रीराम! ये वर देने वाले इन्द्र मुझे ब्रह्मलोक में ले जाना चाहते हैं। मैंने अपनी उग्र तपस्या से उस लोक पर विजय पायी है। जिनकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, उन पुरुषों के लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है॥२८॥
अहं ज्ञात्वा नरव्याघ्र वर्तमानमदूरतः।
ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम्॥२९॥
‘पुरुषसिंह! परंतु जब मुझे मालूम हो गया कि आप इस आश्रम के निकट आ गये हैं, तब मैंने निश्चय किया कि आप-जैसे प्रिय अतिथि का दर्शन किये बिना मैं ब्रह्मलोक को नहीं जाऊँगा॥२९॥
त्वयाहं पुरुषव्याघ्र धार्मिकेण महात्मना।
समागम्य गमिष्यामि त्रिदिवं चावरं परम्॥३०॥
‘नरश्रेष्ठ! आप धर्मपरायण महात्मा पुरुष से मिलकर ही मैं स्वर्गलोक तथा उससे ऊपर के ब्रह्मलोक को जाऊँगा॥३०॥
अक्षया नरशार्दूल जिता लोका मया शुभाः।
ब्राह्मयाश्च नाकपृष्ठ्याश्च प्रतिगृह्णीष्व मामकान्॥३१॥
‘पुरुषशिरोमणे! मैंने ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक आदि जिन अक्षय शुभ लोकों पर विजय पायी है, मेरे उन सभी लोकों को आप ग्रहण करें’॥३१॥
एवमुक्तो नरव्याघ्रः सर्वशास्त्रविशारदः।
ऋषिणा शरभङ्गेन राघवो वाक्यमब्रवीत्॥३२॥
शरभङ्ग मुनि के ऐसा कहने पर सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी ने यह बात कही-॥३२॥
अहमेवाहरिष्यामि सर्वांल्लोकान् महामुने।
आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने॥३३॥
‘महामुने! मैं ही आपको उन सब लोकों की प्राप्ति कराऊँगा। इस समय तो मैं इस वन में आपके बताये हुए स्थान पर निवासमात्र करना चाहता हूँ’॥३३॥
राघवेणैवमुक्तस्तु शक्रतुल्यबलेन वै।
शरभङ्गो महाप्राज्ञः पुनरेवाब्रवीद् वचः॥३४॥
इन्द्र के समान बलशाली श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर महाज्ञानी शरभङ्ग मुनि फिर बोले-॥३४॥
इह राम महातेजाः सुतीक्ष्णो नाम धार्मिकः।
वसत्यरण्ये नियतः स ते श्रेयो विधास्यति॥३५॥
‘श्रीराम! इस वन में थोड़ी ही दूर पर महातेजस्वी धर्मात्मा सुतीक्ष्ण मुनि नियमपूर्वक निवास करते हैं। वे ही आपका कल्याण (आपके लिये स्थान आदि का प्रबन्ध) करेंगे॥३५॥
सुतीक्ष्णमभिगच्छ त्वं शुचौ देशे तपस्विनम्।
रमणीये वनोद्देशे स ते वासं विधास्यति॥३६॥
‘आप इस रमणीय वनप्रान्त के उस पवित्र स्थान में तपस्वी सुतीक्ष्ण मुनि के पास चले जाइये। वे आपके निवासस्थान की व्यवस्था करेंगे॥३६॥
इमां मन्दाकिनी राम प्रतिस्रोतामनुव्रज।
नदी पुष्पोडुपवहां ततस्तत्र गमिष्यसि॥३७॥
‘श्रीराम! आप फूल के समान छोटी-छोटी डोंगियों से पार होने योग्य अथवा पुष्पमयी नौका को बहाने वाली इस मन्दाकिनी नदी के स्रोत के विपरीत दिशा में इसी के किनारे-किनारे चले जाइये। इससे वहाँ पहुँच जाइयेगा॥३७॥
एष पन्था नरव्याघ्र मुहूर्तं पश्य तात माम्।
यावज्जहामि गात्राणि जीर्णां त्वचमिवोरगः॥३८॥
‘नरश्रेष्ठ! यही वह मार्ग है, परंतु तात! दो घड़ी यहीं ठहरिये और जब तक पुरानी केंचुल का त्याग करने वाले सर्प की भाँति मैं अपने इन जराजीर्ण अङ्गों का त्याग न कर दूँ, तब तक मेरी ही ओर देखिये॥३८॥
ततोऽग्निं स समाधाय हत्वा चाज्येन मन्त्रवत्।
शरभङ्गो महातेजाः प्रविवेश हुताशनम्॥३९॥
यों कहकर महातेजस्वी शरभङ्ग मुनि ने विधिवत् अग्नि की स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और मन्त्रोच्चारणपूर्वक घी की आहुति देकर वे स्वयं भी उस अग्नि में प्रविष्ट हो गये॥३९॥
तस्य रोमाणि केशांश्च तदा वह्निर्महात्मनः।
जीर्णां त्वचं तदस्थीनि यच्च मांसं च शोणितम्॥४०॥
उस समय अग्नि ने उन महात्मा के रोम, केश, जीर्ण त्वचा, हड्डी, मांस और रक्त सबको जलाकर भस्म कर दिया॥४०॥
स च पावकसंकाशः कुमारः समपद्यत।
उत्थायाग्निचयात् तस्माच्छरभङ्गो व्यरोचत॥४१॥
वे शरभङ्ग मुनि अग्नितुल्य तेजस्वी कुमार के रूप में प्रकट हो गये और उस अग्निराशि से ऊपर उठकर बड़ी शोभा पाने लगे॥४१॥
स लोकानाहिताग्नीनामृषीणां च महात्मनाम्।
देवानां च व्यतिक्रम्य ब्रह्मलोकं व्यरोहत॥४२॥
वे अग्निहोत्री पुरुषों, महात्मा मुनियों और देवताओं के भी लोकों को लाँघकर ब्रह्मलोक में जा पहुँचे॥४२॥
स पुण्यकर्मा भुवने द्विजर्षभःपितामहं सानुचरं ददर्श ह।
पितामहश्चापि समीक्ष्य तं द्विजंननन्द सुस्वागतमित्युवाच ह॥४३॥
पुण्यकर्म करने वाले द्विजश्रेष्ठ शरभङ्ग ने ब्रह्मलोक में पार्षदों सहित पितामह ब्रह्माजी का दर्शन किया। ब्रह्माजी भी उन ब्रह्मर्षि को देखकर बड़े प्रसन्न हुए और बोले- ‘महामुने! तुम्हारा शुभ स्वागत है’॥४३॥
सर्ग ६
शरभङ्गे दिवं प्राप्ते मुनिसङ्घाः समागताः।
अभ्यगच्छन्त काकुत्स्थं रामं ज्वलिततेजसम्॥१॥
शरभङ्ग मुनि के ब्रह्मलोक चले जाने पर प्रज्वलित तेज वाले ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजी के पास बहुत-से मुनियों के समुदाय पधारे॥१॥
वैखानसा वालखिल्याः सम्प्रक्षाला मरीचिपाः।
अश्मकुट्टाश्च बहवः पत्राहाराश्च तापसाः॥२॥
दन्तोलूखलिनश्चैव तथैवोन्मज्जकाः परे।
गात्रशय्या अशय्याश्च तथैवानवकाशिकाः॥३॥
मुनयः सलिलाहारा वायुभक्षास्तथापरे।
आकाशनिलयाश्चैव तथा स्थण्डिलशायिनः॥४॥
तथोर्ध्ववासिनो दान्तास्तथाऽऽर्द्रपटवाससः।
सजपाश्च तपोनिष्ठास्तथा पञ्चतपोऽन्विताः॥५॥
उनमें वैखानस’, वालखिल्य, सम्प्रक्षाल, मरीचिप, बहुसंख्यक अश्मकुट्ट, पत्राहार, दन्तोलूखली’, उन्मज्जक, गात्रशय्य, अशय्य’, अनवकाशिक, सलिलाहार, वायुभक्ष, आकाशनिलय, स्थण्डिलशायी’, ऊर्ध्ववासी, दान्त, आर्द्रपटवासा, सजप, तपोनिष्ठ° और पञ्चाग्निसेवी–इन सभी श्रेणियों के तपस्वी मुनि थे॥२-५॥
सर्वे ब्राह्मया श्रिया युक्ता दृढयोगसमाहिताः।
शरभङ्गाश्रमे राममभिजग्मुश्च तापसाः॥६॥
वे सभी तपस्वी ब्रह्मतेज से सम्पन्न थे और सुदृढ़ योग के अभ्यास से उन सबका चित्त एकाग्र हो गया था। वे सब-के-सब शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर श्रीरामचन्द्रजी के समीप आये॥६॥
अभिगम्य च धर्मज्ञा रामं धर्मभृतां वरम्।
ऊचुः परमधर्मज्ञमृषिसङ्घाः समागताः॥७॥
धर्मात्माओं में श्रेष्ठ परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी के पास आकर वे धर्म के ज्ञाता समागत ऋषिसमुदाय उनसे बोले-॥७॥
त्वमिक्ष्वाकुकुलस्यास्य पृथिव्याश्च महारथः।
प्रधानश्चापि नाथश्च देवानां मघवानिव॥८॥
‘रघुनन्दन! आप इस इक्ष्वाकुवंश के साथ ही समस्त भूमण्डल के भी स्वामी, संरक्षक एवं प्रधान महारथी वीर हैं। जैसे इन्द्र देवताओं के रक्षक हैं, उसी प्रकार आप मनुष्यलोक की रक्षा करनेवाले हैं।॥८॥
विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु यशसा विक्रमेण च।
पितृव्रतत्वं सत्यं च त्वयि धर्मश्च पुष्कलः॥९॥
‘आप अपने यश और पराक्रम से तीनों लोकों में विख्यात हैं। आपमें पिता की आज्ञा के पालन का व्रत, सत्य भाषण तथा सम्पूर्ण धर्म विद्यमान हैं॥९॥
त्वामासाद्य महात्मानं धर्मज्ञं धर्मवत्सलम्।
अर्थित्वान्नाथ वक्ष्यामस्तच्च नः क्षन्तुमर्हसि॥१०॥
‘नाथ! आप महात्मा, धर्मज्ञ और धर्मवत्सल हैं। हम आपके पास प्रार्थी होकर आये हैं; इसीलिये ये स्वार्थ की बात निवेदन करना चाहते हैं। आपको इसके लिये हमें क्षमा करना चाहिये॥१०॥
अधर्मः सुमहान् नाथ भवेत् तस्य तु भूपतेः।
यो हरेद् बलिषड्भागं न च रक्षति पुत्रवत्॥१०॥
‘स्वामिन् ! जो राजा प्रजा से उसकी आयका छठा भाग करके रूप में ले ले और पुत्र की भाँति प्रजा की रक्षा न करे, उसे महान् अधर्म का भागी होना पड़ता है॥११॥
युञ्जानः स्वानिव प्राणान् प्राणैरिष्टान् सुतानिव।
नित्ययुक्तः सदा रक्षन् सर्वान् विषयवासिनः॥१२॥
प्राप्नोति शाश्वती राम कीर्तिं स बहवार्षिकीम्।
ब्रह्मणः स्थानमासाद्य तत्र चापि महीयते॥१३॥
‘श्रीराम! जो भूपाल प्रजा की रक्षा के कार्य में संलग्न हो अपने राज्य में निवास करने वाले सब लोगों को प्राणों के समान अथवा प्राणों से भी अधिक प्रिय पुत्रों के समान समझकर सदा सावधानी के साथ उनकी रक्षा करता है, वह बहुत वर्षों तक स्थिर रहने वाली अक्षय कीर्ति पाता है और अन्त में ब्रह्मलोक में जाकर वहाँ भी विशेष सम्मान का भागी होता है॥१२-१३॥
यत् करोति परं धर्मं मुनिर्मूलफलाशनः।
तत्र राज्ञश्चतर्भागः प्रजा धर्मेण रक्षतः॥१४॥
‘राजा के राज्य में मुनि फल-मूलका आहार करके जिस उत्तम धर्म का अनुष्ठान करता है, उसका चौथा भाग धर्म के अनुसार प्रजा की रक्षा करने वाले उस राजा को प्राप्त हो जाता है॥१४॥
सोऽयं ब्राह्मणभूयिष्ठो वानप्रस्थगणो महान्।
त्वन्नाथोऽनाथवद् राम राक्षसैर्हन्यते भृशम्॥१५॥
‘श्रीराम! इस वन में रहने वाला वानप्रस्थ महात्माओं का यह महान् समुदाय, जिसमें ब्राह्मणों की ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसों के द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है इस मुनि-समुदायका बहुत अधिक मात्रा में संहार हो रहा है॥१५॥
एहि पश्य शरीराणि मुनीनां भावितात्मनाम्।
हतानां राक्षसैोरैर्बहूनां बहुधा वने॥१६॥
‘आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसों द्वारा बारम्बार अनेक प्रकार से मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियों के शरीर (शव या कंकाल) दिखायी देते हैं॥१६॥
पम्पानदीनिवासानामनुमन्दाकिनीमपि।
चित्रकूटालयानां च क्रियते कदनं महत्॥१७॥
‘पम्पा सरोवर और उसके निकट बहने वाली तुङ्गभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट पर्वत के किनारे अपना निवासस्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियों का राक्षसों द्वारा महान् संहार किया जा रहा है॥१७॥
एवं वयं न मृष्यामो विप्रकारं तपस्विनाम्।
क्रियमाणं वने घोरं रक्षोभिीमकर्मभिः॥१८॥
‘इन भयानक कर्म करने वाले राक्षसों ने इस वन में तपस्वी मुनियों का जो ऐसा भयंकर विनाशकाण्ड मचा रखा है, वह हमलोगों से सहा नहीं जाता है॥१८॥
ततस्त्वां शरणार्थं च शरण्यं समुपस्थिताः।
परिपालय नो राम वध्यमानान् निशाचरैः॥१९॥
‘अतः इन राक्षसों से बचने के लिये शरण लेने के उद्देश्य से हम आपके पास आये हैं। श्रीराम! आप शरणागतवत्सल हैं, अतः इन निशाचरों से मारे जाते हुए हम मुनियों की रक्षा कीजिये॥१९॥
परा त्वत्तो गतिर्वीर पृथिव्यां नोपपद्यते।
परिपालय नः सर्वान् राक्षसेभ्यो नृपात्मज॥२०॥
‘वीर राजकुमार! इस भूमण्डल में हमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई सहारा नहीं दिखायी देता। आप इन राक्षसों से हम सबको बचाइये’॥२०॥
एतच्छ्रुत्वा तु काकुत्स्थस्तापसानां तपस्विनाम्।
इदं प्रोवाच धर्मात्मा सर्वानेव तपस्विनः॥२१॥
तपस्या में लगे रहने वाले उन तपस्वी मुनियों की ये बातें सुनकर ककुत्स्थकुलभूषण धर्मात्मा श्रीराम ने उन सबसे कहा-॥२१॥
नैवमर्हथ मां वक्तुमाज्ञाप्योऽहं तपस्विनाम्।
केवलेन स्वकार्येण प्रवेष्टव्यं वनं मया॥२२॥
‘मुनिवरो! आप लोग मुझसे इस प्रकार प्रार्थना न करें। मैं तो तपस्वी महात्माओं का आज्ञापालक हूँ। मुझे केवल अपने ही कार्य से वन में तो प्रवेश करना ही है (इसके साथ ही आपलोगों की सेवा का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हो जायगा)॥२२॥
विप्रकारमपाक्रष्टुं राक्षसैर्भवतामिमम्।
पितुस्तु निर्देशकरः प्रविष्टोऽहमिदं वनम्॥२३॥
‘राक्षसों के द्वारा जो आपको यह कष्ट पहुँच रहा है, इसे दूर करने के लिये ही मैं पिता के आदेश का पालन करता हुआ इस वन में आया हूँ॥२३॥
भवतामर्थसिद्ध्यर्थमागतोऽहं यदृच्छया।
तस्य मेऽयं वने वासो भविष्यति महाफलः॥२४॥
‘आपलोगों के प्रयोजन की सिद्धि के लिये मैं दैवात् यहाँ आ पहुँचा हूँ। आपकी सेवा का अवसर मिलने से मेरे लिये यह वनवास महान् फलदायक होगा॥२४॥
तपस्विनां रणे शत्रून् हन्तुमिच्छामि राक्षसान्।
पश्यन्तु वीर्यमृषयः सभ्रातुर्मे तपोधनाः॥२५॥
‘तपोधनो! मैं तपस्वी मुनियों से शत्रुता रखने वाले उन राक्षसों का युद्ध में संहार करना चाहता हूँ। आप सब महर्षि भाईसहित मेरा पराक्रम देखें’॥२५॥
दत्त्वा वरं चापि तपोधनानां धर्मे धृतात्मा सह लक्ष्मणेन।
तपोधनैश्चापि सहार्यदत्तः सुतीक्ष्णमेवाभिजगाम वीरः॥२६॥
इस प्रकार उन तपोधनों को वर देकर धर्म में मन लगाने वाले तथा श्रेष्ठ दान देने वाले वीर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण तथा तपस्वी महात्माओं के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के पास गये॥२६॥
सर्ग ७
रामस्तु सहितो भ्रात्रा सीतया च परंतपः।
सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं जगाम सह तैर्द्विजैः॥१॥
शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सीता तथा उन ब्राह्मणों के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर चले॥१॥
स गत्वा दूरमध्वानं नदीस्तीर्वा बहूदकाः।
ददर्श विमलं शैलं महामेरुमिवोन्नतम्॥२॥
वे दूर तक का मार्ग तै करके अगाध जल से भरी हुई बहुत-सी नदियों को पार करते हुए जब आगे गये, तब उन्हें महान् मेरुगिरि के समान एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी दिया, जो बड़ा ही निर्मल था॥२॥
ततस्तदिक्ष्वाकुवरौ सततं विविधैर्दुमैः ।
काननं तौ विविशतुः सीतया सह राघवौ॥३॥
वहाँ से आगे बढ़कर वे दोनों इक्ष्वाकुकुल के श्रेष्ठ वीर रघुवंशी बन्धु सीता के साथ नाना प्रकार के वृक्षों से भरे हुए एक वन में पहुँचे॥३॥
प्रविष्टस्तु वनं घोरं बहुपुष्पफलद्रुमम्।
ददर्शाश्रममेकान्ते चीरमालापरिष्कृतम्॥४॥
उस घोर वन में प्रविष्ट हो श्रीरघुनाथजी ने एकान्त स्थान में एक आश्रम देखा, जहाँ के वृक्ष प्रचुर फलफूलों से लदे हुए थे। इधर-उधर टँगे हुए चीर वस्त्रों के समुदाय उस आश्रम की शोभा बढ़ाते थे॥४॥
तत्र तापसमासीनं मलपङ्कजधारिणम्।
रामः सुतीक्ष्णं विधिवत् तपोधनमभाषत॥५॥
वहाँ आन्तरिक मल की शुद्धि के लिये पद्मासन धारण किये सुतीक्ष्ण मुनि ध्यान मग्न होकर बैठे थे। श्रीराम ने उन तपोधन मुनि के पास विधिवत् जाकर उनसे इस प्रकार कहा-॥५॥
रामोऽहमस्मि भगवन् भवन्तं द्रष्टुमागतः।
तन्माभिवद धर्मज्ञ महर्षे सत्यविक्रम॥६॥
‘सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ महर्षे ! भगवन् ! मैं राम हूँ और यहाँ आपका दर्शन करने के लिये आया हूँ, अतः आप मुझसे बात कीजिये’॥६॥
स निरीक्ष्य ततो धीरो रामं धर्मभृतां वरम्।
समाश्लिष्य च बाहुभ्यामिदं वचनमब्रवीत्॥७॥
धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम का दर्शन करके धीर महर्षि सुतीक्ष्ण ने अपनी दोनों भुजाओं से उनका आलिङ्गन किया और इस प्रकार कहा-॥७॥
स्वागतं ते रघुश्रेष्ठ राम सत्यभृतां वर।
आश्रमोऽयं त्वयाऽऽक्रान्तः सनाथ इव साम्प्रतम्॥८॥
‘सत्यवादियों में श्रेष्ठ रघुकुलभूषण श्रीराम! आपका स्वागत है। इस समय आपके पदार्पण करने से यह आश्रम सनाथ हो गया॥८॥
प्रतीक्षमाणस्त्वामेव नारोहेऽहं महायशः।
देवलोकमितो वीर देहं त्यक्त्वा महीतले॥९॥
‘महायशस्वी वीर! मैं आपकी ही प्रतीक्षा में था, इसीलिये अब तक इस पृथ्वी पर अपने शरीर को त्यागकर मैं यहाँ से देवलोक (ब्रह्मधाम) में नहीं गया॥९॥
चित्रकूटमुपादाय राज्यभ्रष्टोऽसि मे श्रुतः।
इहोपयातः काकुत्स्थ देवराजः शतक्रतुः॥१०॥
‘मैंने सुना था कि आप राज्य से भ्रष्ट हो चित्रकूट पर्वत पर आकर रहते हैं। काकुत्स्थ! यहाँ सौ यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले देवराज इन्द्र आये थे॥१०॥
उपागम्य च मे देवो महादेवः सुरेश्वरः।
सर्वांल्लोकाञ्जितानाह मम पुण्येन कर्मणा॥११॥
‘वे महान् देवता देवेश्वर इन्द्रदेव मेरे पास आकर कह रहे थे कि ‘तुमने अपने पुण्यकर्म के द्वारा समस्त शुभ लोकों पर विजय पायी है’॥११॥
तेषु देवर्षिजुष्टेषु जितेषु तपसा मया।
मत्प्रसादात् सभार्यस्त्वं विहरस्व सलक्ष्मणः॥१२॥
‘उनके कथनानुसार मैंने तपस्या से जिन देवर्षिसेवित लोकों पर अधिकार प्राप्त किया है, उन लोकों में आप सीता और लक्ष्मण के साथ विहार करें। मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ वे सारे लोक आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ॥
तमुग्रतपसं दीप्तं महर्षिं सत्यवादिनम्।
प्रत्युवाचात्मवान् रामो ब्रह्माणमिव वासवः॥१३॥
जैसे इन्द्र ब्रह्माजी से बात करते हैं, उसी प्रकार मनस्वी श्रीराम ने उन उग्र तपस्या वाले तेजस्वी एवं सत्यवादी महर्षि को इस प्रकार उत्तर दिया-॥१३॥
अहमेवाहरिष्यामि स्वयं लोकान् महामुने।
आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने॥१४॥
‘महामुने! वे लोक तो मैं स्वयं ही आपको प्राप्त कराऊँगा, इस समय तो मेरी यह इच्छा है कि आप बतावें कि मैं इस वन में अपने ठहरने के लिये कहाँ कुटिया बनाऊँ?॥१४॥
भवान् सर्वत्र कुशलः सर्वभूतहिते रतः।
आख्यातं शरभरुन गौतमेन महात्मना॥१५॥
‘आप समस्त प्राणियों के हित में तत्पर तथा इहलोक और परलोक की सभी बातों के ज्ञान में निपुण हैं, यह बात मुझसे गौतमगोत्रीय महात्मा शरभङ्ग ने कही थी’॥१५॥
एवमुक्तस्तु रामेण महर्षिर्लोकविश्रुतः।
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं हर्षेण महता युतः॥१६॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उन लोकविख्यात महर्षि ने बड़े हर्ष के साथ मधुर वाणी में कहा—॥१६॥
अयमेवाश्रमो राम गुणवान् रम्यतामिति।
ऋषिसंघानुचरितः सदा मूलफलैर्युतः॥१७॥
‘श्रीराम! यही आश्रम सब प्रकार से गुणवान् (सुविधाजनक) है, अतः आप यहीं सुखपूर्वक निवास कीजिये। यहाँ ऋषियों का समुदाय सदा आता-जाता रहता है और फल-मूल भी सर्वदा सुलभ होते हैं॥१७॥
इममाश्रममागम्य मृगसंघा महीयसः।
अहत्वा प्रतिगच्छन्ति लोभयित्वाकुतोभयाः॥१८॥
‘इस आश्रम पर बड़े-बड़े मृगों के झुंड आते और अपने रूप, कान्ति एवं गति से मन को लुभाकर किसी को कष्ट दिये बिना ही यहाँ से लौट जाते हैं। उन्हें यहाँ किसी से कोई भय नहीं प्राप्त होता है। १८॥
नान्यो दोषो भवेदत्र मृगेभ्योऽन्यत्र विद्धि वै।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य महर्षेर्लक्ष्मणाग्रजः॥१९॥
उवाच वचनं धीरो विगृह्य सशरं धनुः।
‘इस आश्रम में मृगों के उपद्रव के सिवा और कोई दोष नहीं है, यह आप निश्चित रूप से जान लें।’ महर्षि का यह वचन सुनकर लक्ष्मण के बड़े भाई धीरवीर भगवान् श्रीराम ने हाथ में धनुष-बाण लेकर कहा –॥१९ १/२॥
तानहं सुमहाभाग मृगसंघान् समागतान्॥२०॥
हन्यां निशितधारेण शरेणानतपर्वणा।
भवांस्तत्राभिषज्येत किं स्यात् कृच्छ्रतरं ततः॥२१॥
‘महाभाग! यहाँ आये हुए उन उपद्रवकारी मृगसमूहों को यदि मैं झुकी हुई गाँठ और तीखी धार वाले बाण से मार डालूँ तो इसमें आपका अपमान होगा। यदि ऐसा हुआ तो इससे बढ़कर कष्ट की बात मेरे लिये और क्या हो सकती है ?॥२०-२१॥
एतस्मिन्नाश्रमे वासं चिरं तु न समर्थये।
तमेवमुक्त्वोपरमं रामः संध्यामुपागमत्॥२२॥
‘इसलिये मैं इस आश्रम में अधिक समय नहीं निवास करना चाहता।’ मुनि से ऐसा कहकर मौन हो श्रीरामचन्द्र जी संध्योपासना करने चले गये॥२२॥
अन्वास्य पश्चिमां संध्यां तत्र वासमकल्पयत् ।
सुतीक्ष्णस्याश्रमे रम्ये सीतया लक्ष्मणेन च। २३॥
सायंकाल की संध्योपासना करके श्रीराम ने सीता और लक्ष्मण के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के उस रमणीय आश्रम में निवास किया॥२३॥
ततः शुभं तापसयोग्यमन्नं स्वयं सुतीक्ष्णः पुरुषर्षभाभ्याम्।
ताभ्यां सुसत्कृत्य ददौ महात्मासंध्यानिवृत्तौ रजनीं समीक्ष्य॥२४॥
संध्या का समय बीतने पर रात हुई देख महात्मा सुतीक्ष्ण ने स्वयं ही तपस्वी-जनों के सेवन करने योग्यशुभ अन्न ले आकर उन दोनों पुरुषशिरोमणि बन्धुओं को बड़े सत्कार के साथ अर्पित किया॥२४॥
सर्ग ८
रामस्तु सहसौमित्रिः सुतीक्ष्णेनाभिपूजितः।
परिणाम्य निशां तत्र प्रभाते प्रत्यबुध्यत॥१॥
सुतीक्ष्ण के द्वारा भलीभाँति पूजित हो लक्ष्मणसहित श्रीराम उनके आश्रम में ही रात बिताकर प्रातःकाल जाग उठे॥१॥
उत्थाय च यथाकालं राघवः सह सीतया।
उपस्पश्य सशीतेन तोयेनोत्पलगन्धिना॥२॥
अथ तेऽग्निं सुरांश्चैव वैदेही रामलक्ष्मणौ।
काल्यं विधिवदभ्यर्च्य तपस्विशरणे वने॥३॥
उदयन्तं दिनकरं दृष्ट्वा विगतकल्मषाः।
सुतीक्ष्णमभिगम्येदं श्लक्ष्णं वचनमब्रुवन्॥४॥
सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण ने ठीक समय से उठकर कमल की सुगन्ध से सुवासित परम शीतल जल के द्वारा स्नान किया। तदनन्तर उन तीनों ने ही मिलकर विधिपूर्वक अग्नि और देवताओं की प्रातःकालिक पूजा की। इसके बाद तपस्वीजनों के आश्रयभूत वन में उदित हुए सूर्यदेव का दर्शन करके वे तीनों निष्पाप पथिक सुतीक्ष्ण मुनि के पास गये और यह मधुर वचन बोले-॥२-४॥
सुखोषिताः स्म भगवंस्त्वया पूज्येन पूजिताः।
आपृच्छामः प्रयास्यामो मुनयस्त्वरयन्ति नः॥५॥
‘भगवन्! आपने पूजनीय होकर भी हमलोगों की पूजा की है। हम आपके आश्रम में बड़े सुख से रहे हैं। अब हम यहाँ से जायँगे, इसके लिये आपकी आज्ञा चाहते हैं। ये मुनि हमें चलने के लिये जल्दी मचा रहे हैं॥५॥
त्वरामहे वयं द्रष्टुं कृत्स्नमाश्रममण्डलम्।
ऋषीणां पुण्यशीलानां दण्डकारण्यवासिनाम्॥६॥
‘हमलोग दण्डकारण्य में निवास करने वाले पुण्यात्मा ऋषियों के सम्पूर्ण आश्रममण्डल का दर्शन करने के लिये उतावले हो रहे हैं॥६॥
अभ्यनुज्ञातुमिच्छामः सहैभिर्मुनिपुंगवैः।
धर्मनित्यैस्तपोदान्तैर्विशिखैरिव पावकैः॥७॥
‘अतः हमारी इच्छा है कि आप धूमरहित अग्नि के समान तेजस्वी, तपस्याद्वारा इन्द्रियों को वश में रखने वाले तथा नित्य-धर्मपरायण इन श्रेष्ठ महर्षियों के साथ यहाँ से जाने के लिये हमें आज्ञा दें॥७॥
अविषह्यातपो यावत् सूर्यो नातिविराजते।
अमार्गेणागतां लक्ष्मी प्राप्येवान्वयवर्जितः॥८॥
तावदिच्छामहे गन्तुमित्युक्त्वा चरणौ मुनेः।
ववन्दे सहसौमित्रिः सीतया सह राघवः॥९॥
‘जैसे अन्याय से आयी हुई सम्पत्ति को पाकर किसी नीच कुल के मनुष्य में असह्य उग्रता आ जाती है, उसी प्रकार यह सूर्यदेव जब तक असह्य ताप देने वाले होकर प्रचण्ड तेज से प्रकाशित न होने लगें, उसके पहले ही हम यहाँ से चल देना चाहते हैं।’ ऐसा कहकर लक्ष्मण और सीतासहित श्रीराम ने मुनि के चरणों की वन्दना की।
तौ संस्पृशन्तौ चरणावुत्थाप्य मुनिपुंगवः।
गाढमाश्लिष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत्॥१०॥
अपने चरणों का स्पर्श करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण को उठाकर मुनिवर सुतीक्ष्ण ने कसकर हृदय से लगा लिया और बड़े स्नेह से इस प्रकार कहा—॥१०॥
अरिष्टं गच्छ पन्थानं राम सौमित्रिणा सह।
सीतया चानया सार्धं छाययेवानवृत्तया॥११॥
‘श्रीराम! आप छाया की भाँति अनुसरण करने वाली – इस धर्मपत्नी सीता तथा सुमित्राकुमार लक्ष्मण के साथ यात्रा कीजिये। आपका मार्ग विघ्न-बाधाओं से रहित परम मङ्गलमय हो॥११॥
पश्याश्रमपदं रम्यं दण्डकारण्यवासिनाम्।
एषां तपस्विनां वीर तपसा भावितात्मनाम्॥१२॥
‘वीर! तपस्या से शुद्ध अन्तःकरण वाले दण्डकारण्य-वासी इन तपस्वी मुनियों के रमणीय आश्रमों का दर्शन कीजिये॥
सुप्राज्यफलमूलानि पुष्पितानि वनानि च।
प्रशस्तमृगयूथानि शान्तपक्षिगणानि च॥१३॥
‘इस यात्रा में आप प्रचुर फल-मूलों से युक्त तथा फूलों से सुशोभित अनेक वन देखेंगे; वहाँ उत्तम मृगों के झुंड विचरते होंगे और पक्षी शान्तभाव से रहते होंगे॥१३॥
फुल्लपङ्कजखण्डानि प्रसन्नसलिलानि च।
कारण्डवविकीर्णानि तटाकानि सरांसि च॥१४॥
‘आपको बहुत-से ऐसे तालाब और सरोवर दिखायी देंगे, जिनमें प्रफुल्ल कमलों के समूह शोभा दे रहे होंगे। उनमें स्वच्छ जल भरे होंगे तथा कारण्डव आदि जलपक्षी सब ओर फैल रहे होंगे। १४॥
द्रक्ष्यसे दृष्टिरम्याणि गिरिप्रस्रवणानि च।
रमणीयान्यरण्यानि मयूराभिरुतानि च॥१५॥
‘नेत्रों को रमणीय प्रतीत होने वाले पहाड़ी झरनों और मोरों की मीठी बोली से गूंजती हुई सुरम्य वनस्थलियों को भी आप देखेंगे॥१५॥
गम्यतां वत्स सौमित्रे भवानपि च गच्छतु।
आगन्तव्यं च ते दृष्ट्वा पुनरेवाश्रमं प्रति॥१६॥
‘श्रीराम! जाइये, वत्स सुमित्राकुमार! तुम भी जाओ। दण्डकारण्य के आश्रमों का दर्शन करके आपलोगों को फिर इसी आश्रम में आ जाना चाहिये’। १६॥
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा काकुत्स्थः सहलक्ष्मणः।
प्रदक्षिणं मुनिं कृत्वा प्रस्थात्मपचक्रमे॥१७॥
उनके ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर मुनि की परिक्रमा की और वहाँ से प्रस्थान करने की तैयारी की॥१७॥
ततः शुभतरे तूणी धनुषी चायतेक्षणा।
ददौ सीता तयोर्धात्रोः खड्गौ च विमलौ ततः॥१८॥
तदनन्तर विशाल नेत्रोंवाली सीता ने उन दोनों भाइयों के हाथ में दो परम सुन्दर तूणीर, धनुष और चमचमाते हुए खड्ग प्रदान किये॥१८॥
आबध्य च शुभे तूणी चापे चादाय सस्वने।
निष्क्रान्तावाश्रमाद् गन्तुमुभौ तौ रामलक्ष्मणौ। १९॥
उन सुन्दर तूणीरों को पीठ पर बाँधकर टंकारते हुए धनुषों को हाथ में ले वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आश्रम से बाहर निकले॥१९॥
शीघ्रं तौ रूपसम्पन्नावनुज्ञातौ महर्षिणा।
प्रस्थितौ धृतचापासी सीतया सह राघवौ॥२०॥
वे दोनों रघुवंशी वीर बड़े ही रूपवान् थे, उन्होंने खड्ग और धनुष धारण करके महर्षि की आज्ञा ले सीता के साथ शीघ्र ही वहाँ से प्रस्थान किया॥२०॥
सर्ग ९
सुतीक्ष्णेनाभ्यनुज्ञातं प्रस्थितं रघुनन्दनम्।
हृद्यया स्निग्धया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥
सुतीक्ष्ण की आज्ञा लेकर वन की ओर प्रस्थित हुए अपने स्वामी रघुकुलनन्दन श्रीराम से सीता ने स्नेहभरी मनोहर वाणी में इस प्रकार कहा-॥१॥
अधर्मं तु सुसूक्ष्मेण विधिना प्राप्यते महान्।
निवृत्तेन च शक्योऽयं व्यसनात् कामजादिह॥२॥
‘आर्यपुत्र! यद्यपि आप महान् पुरुष हैं तथापि अत्यन्त सूक्ष्म विधि से विचार करने पर आप अधर्म को प्राप्त हो रहे हैं। जब कामजनित व्यसन से आप सर्वथा निवृत्त हैं, तब यहाँ इस अधर्म से भी बच सकते हैं॥२॥
त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत।
मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ॥३॥
परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता।
मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव॥४॥
‘इस जगत् में काम से उत्पन्न होने वाले तीन ही व्यसन होते हैं। मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं-परस्त्रीगमन और बिना वैर के ही दूसरों के प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव। रघुनन्दन! इनमें से मिथ्याभाषणरूप व्यसन तो न आप में कभी हुआ है और न आगे होगा ही। ३-४॥
कुतोऽभिलषणं स्त्रीणां परेषां धर्मनाशनम्।
तव नास्ति मनुष्येन्द्र न चाभूत् ते कदाचन॥५॥
मनस्यपि तथा राम न चैतद् विद्यते क्वचित्।
स्वदारनिरतश्चैव नित्यमेव नृपात्मज॥६॥
धर्मिष्ठः सत्यसंधश्च पितुर्निर्देशकारकः।
त्वयि धर्मश्च सत्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्॥७॥
‘परस्त्रीविषयक अभिलाषा तो आपको हो ही कैसे सकती है? नरेन्द्र! धर्म का नाश करने वाली यह कुत्सित इच्छा न आपके मन में कभी हुई थी, न है और न भविष्य में कभी होने की सम्भावना ही है। राजकुमार श्रीराम! यह दोष तो आपके मन में भी कभी उदित नहीं हुआ है। (फिर वाणी और क्रिया में कैसे आ सकता है?) आप सदा ही अपनी धर्मपत्नी में अनुरक्त रहने वाले, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ तथा पिताकी आज्ञा का पालन करने वाले हैं। आपमें धर्म और सत्य दोनों की स्थिति है। आपमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है॥५-७॥
तच्च सर्वं महाबाहो शक्यं वोढुं जितेन्द्रियैः।
तव वश्येन्द्रियत्वं च जानामि शुभदर्शन॥८॥
‘महाबाहो! जो लोग जितेन्द्रिय हैं, वे सदा सत्य और धर्म को पूर्णरूप से धारण कर सकते हैं। शुभदर्शी महापुरुष! आपकी जितेन्द्रियता को मैं अच्छी तरह जानती हूँ (इसीलिये मुझे विश्वास है कि आप में पूर्वोक्त दोनों दोष कदापि नहीं रह सकते)॥८॥
तृतीयं यदिदं रौद्रं परप्राणाभिहिंसनम्।
निर्वैरं क्रियते मोहात् तच्च ते समुपस्थितम्॥९॥
‘परंतु दूसरों के प्राणों की हिंसारूप जो यह तीसरा भयंकर दोष है, उसे लोग मोहवश बिना वैर-विरोध के भी किया करते हैं। वही दोष आपके सामने भी उपस्थित है॥९॥
प्रतिज्ञातस्त्वया वीर दण्डकारण्यवासिनाम्।
ऋषीणां रक्षणार्थाय वधः संयति रक्षसाम्॥१०॥
‘वीर! आपने दण्डकारण्यनिवासी ऋषियों की रक्षा के लिये युद्ध में राक्षसों का वध करने की प्रतिज्ञा की है।
एतन्निमित्तं च वनं दण्डका इति विश्रुतम्।
प्रस्थितस्त्वं सह भ्रात्रा धृतबाणशरासनः॥११॥
‘इसी के लिये आप भाई के साथ धनुष-बाण लेकर दण्डकारण्य के नाम से विख्यात वन की ओर प्रस्थित हुए हैं। ११॥
ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मनः।
त्वद्धृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्निःश्रेयसं हितम्॥१२॥
‘अतः आपको इस घोर कर्म के लिये प्रस्थित हुआ देख मेरा चित्त चिन्ता से व्याकुल हो उठा है। आपके प्रतिज्ञा-पालनरूप व्रतका विचार करके मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि कैसे आपका कल्याण हो?॥१२॥
नहि मे रोचते वीर गमनं दण्डकान् प्रति।
कारणं तत्र वक्ष्यामि वदन्त्याः श्रूयतां मम॥१३॥
‘वीर! मुझे इस समय आपका दण्डकारण्य में जाना अच्छा नहीं लगता है। इसका क्या कारण है—यह बता रही हूँ; आप मेरे मुँह से सुनिये॥१३॥
त्वं हि बाणधनुष्पाणिर्धात्रा सह वनं गतः।
दृष्ट्वा वनचरान् सर्वान् कच्चित् कुर्याः शरव्ययम्॥१४॥
‘आप हाथ में धनुष-बाण लेकर अपने भाइ के साथ वन में आये हैं। सम्भव है, समस्त वनचारी राक्षसों को देखकर कदाचित् आप उनके प्रति अपने बाणों का प्रयोग कर बैठें॥१४॥
क्षत्रियाणामिह धनुर्हताशस्येन्धनानि च।
समीपतः स्थितं तेजोबलमुच्छ्रयते भृशम्॥१५॥
‘जैसे आग के समीप रखे हुए ईंधन उसके तेजरूप बल को अत्यन्त उद्दीप्त कर देते हैं, उसी प्रकार जहाँ क्षत्रियों के पास धनुष हो तो वह उनके बल और प्रताप को उद्बोधित कर देता है।॥१५॥
पुरा किल महाबाहो तपस्वी सत्यवान् शुचिः।
कस्मिंश्चिदभवत् पुण्ये वने रतमृगद्विजे॥१६॥
‘महाबाहो! पूर्वकाल की बात है, किसी पवित्र वन में, जहाँ मृग और पक्षी बड़े आनन्द से रहते थे, एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे। १६॥
तस्यैव तपसो विजं कर्तुमिन्द्रः शचीपतिः।
खड्गपाणिरथागच्छदाश्रमं भटरूपधृक्॥१७॥
‘उन्हीं की तपस्या में विघ्न डालने के लिये शचीपति इन्द्र किसी योद्धा का रूप धारण करके हाथ में तलवार लिये एक दिन उनके आश्रम पर आये॥१७॥
तस्मिंस्तदाश्रमपदे निहितः खड्ग उत्तमः।
स न्यासविधिना दत्तः पुण्ये तपसि तिष्ठतः॥१८॥
‘उन्होंने मुनि के आश्रम में अपना उत्तम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्या में लगे हुए मुनि को धरोहर के रूप में वह खड्ग दे दिया॥१८॥
स तच्छस्त्रमनुप्राप्य न्यासरक्षणतत्परः।
वने तु विचरत्येव रक्षन् प्रत्ययमात्मनः॥१९॥
‘उस शस्त्र को पाकर मुनि उस धरोहर की रक्षा में लग गये। वे अपने विश्वास की रक्षा के लिये वन में विचरते समय भी उसे साथ रखते थे॥१९॥
यत्र गच्छत्युपादातुं मूलानि च फलानि च।
न विना याति तं खड्गं न्यासरक्षणतत्परः॥२०॥
‘धरोहर की रक्षा में तत्पर रहने वाले वे मुनि फलमूल लाने के लिये जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्ग को साथ लिये बिना नहीं जाते थे॥२०॥
नित्यं शस्त्रं परिवहन् क्रमेण स तपोधनः।
चकार रौद्रीं स्वां बुद्धिं त्यक्त्वा तपसि निश्चयम्॥२१॥
‘तप ही जिनका धन था, उन मुनि ने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहने के कारण क्रमशः तपस्या का निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धि को क्रूरतापूर्ण बना लिया॥२१॥
ततः स रौद्राभिरतः प्रमत्तोऽधर्मकर्षितः।
तस्य शस्त्रस्य संवासाज्जगाम नरकं मुनिः॥२२॥
‘फिर तो अधर्म ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रौद्र-कर्म में तत्पर हो गये और उस शस्त्र के सहवास से उन्हें नरक में जाना पड़ा॥२२॥
एवमेतत् पुरावृत्तं शस्त्रसंयोगकारणम्।
अग्निसंयोगवद्धेतुः शस्त्रसंयोग उच्यते॥२३॥
‘इस प्रकार शस्त्र का संयोग होने के कारण पूर्वकाल में उन तपस्वी मुनि को ऐसी दुर्दशा भोगनी पड़ी जैसे आग का संयोग ईंधनों को जलाने का कारण होता है, उसी प्रकार शस्त्रों का संयोग शस्त्रधारी के – हृदय में विकार का उत्पादक कहा गया है।॥२३॥
स्नेहाच्च बहुमानाच्च स्मारये त्वां तु शिक्षये।
न कथंचन सा कार्या गृहीतधनुषा त्वया॥२४॥
बुद्धिर्वैरं विना हन्तुं राक्षसान् दण्डकाश्रितान्।
अपराधं विना हन्तुं लोको वीर न मंस्यते॥२५॥
‘मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है, उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना वैर के ही दण्डकारण्यवासी राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिये। वीरवर ! बिना अपराध के ही किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे॥
क्षत्रियाणां तु वीराणां वनेषु नियतात्मनाम्।
धनुषा कार्यमेतावदार्तानामभिरक्षणम्॥२६॥
‘अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले क्षत्रिय वीरों के लिये वन में धनुष धारण करने का इतना ही प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें॥२६॥
क्व च शस्त्रं क्व च वनं क्व च क्षात्रं तपः क्व च।
व्याविद्धमिदमस्माभिर्देशधर्मस्तु पूज्यताम्॥२७॥
‘कहाँ शस्त्र-धारण और कहाँ वनवास! कहाँ क्षत्रिय का हिंसामय कठोर कर्म और कहाँ सब प्राणियों पर दया करना रूप तप - ये परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं। अतः हमलोगों को देशधर्म का ही आदर करना चाहिये (इस समय हम तपोवन रूप देश में निवास करते हैं, अतः यहाँ के अहिंसामय धर्म का पालन करना ही हमारा कर्तव्य है)॥२७॥
कदर्यकलुषा बुद्धिर्जायते शस्त्रसेवनात्।
पुनर्गत्वा त्वयोध्यायां क्षत्रधर्मं चरिष्यसि॥२८॥
‘केवल शस्त्रका सेवन करने से मनुष्य की बुद्धि कृपण पुरुषों के समान कलुषित हो जाती है; अतः आप अयोध्या में चलने पर ही पुनः क्षात्रधर्म का अनुष्ठान कीजियेगा॥२८॥
अक्षया तु भवेत् प्रीतिः श्वश्रूश्वशुरयोर्मम।
यदि राज्यं हि संन्यस्य भवेस्त्वं निरतो मुनिः॥२९॥
‘राज्य त्यागकर वन में आ जाने पर यदि आप मुनिवृत्ति से ही रहें तो इससे मेरी सास और श्वशुर को अक्षय प्रसन्नता होगी॥२९॥
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥३०॥
‘धर्म से अर्थ प्राप्त होता है, धर्म से सुख का उदय होता है और धर्म से ही मनुष्य सब कुछ पा लेता है। इस संसार में धर्म ही सार है॥३०॥
आत्मानं नियमैस्तैस्तैः कर्षयित्वा प्रयत्नतः।
प्राप्तये निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभते सुखम्॥३१॥
‘चतुर मनुष्य भिन्न-भिन्न वानप्रस्थोचित नियमों के द्वारा अपने शरीर को क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्म का सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधन से सुख के हेतुभूत धर्म की प्राप्ति नहीं होती है।॥३१॥
नित्यं शुचिमतिः सौम्य चर धर्मं तपोवने।
सर्वं तु विदितं तुभ्यं त्रैलोक्यामपि तत्त्वतः॥३२॥
‘सौम्य ! प्रतिदिन शुद्धचित्त होकर तपोवन में धर्म का अनुष्ठान कीजिये। त्रिलोकी में जो कुछ भी है, आपको तो वह सब कुछ यथार्थ रूप से विदित ही है॥३२॥
स्त्रीचापलादेतदुपाहृतं मे धर्मं च वक्तुं तव कः समर्थः।
विचार्य बुद्ध्या तु सहानुजेन यद् रोचते तत् कुरु माचिरेण॥३३॥
‘मैंने नारीजाति की स्वाभाविक चपलता के कारण ही आपकी सेवा में ये बातें निवेदन कर दी हैं। वास्तव में आपको धर्म का उपदेश करने में कौन समर्थ है? आप इस विषय में अपने छोटे भाई के साथ बुद्धिपूर्वक विचार कर लें फिर आपको जो ठीक ऊंचे, उसे ही शीघ्रतापूर्वक करें’॥३३॥
सर्ग १०
वाक्यमेतत् तु वैदेह्या व्याहृतं भर्तृभक्तया।
श्रुत्वा धर्मे स्थितो रामः प्रत्युवाचाथ जानकीम्॥१॥
अपने स्वामी के प्रति भक्ति रखने वाली विदेहकुमारी सीता की कही हुई यह बात सुनकर सदा धर्म में स्थित रहने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने जानकी को इस प्रकार उत्तर दिया
हितमुक्तं त्वया देवि स्निग्धया सदृशं वचः।
कुलं व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनकात्मजे॥२॥
‘देवि! धर्म को जानने वाली जनककिशोरी! तुम्हारा मेरे ऊपर स्नेह है, इसलिये तुमने मेरे हित की बात कही है। क्षत्रियों के कुलधर्म का उपदेश करती हुई तुमने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे ही योग्य है॥२॥
किं नु वक्ष्याम्यहं देवि त्वयैवोक्तमिदं वचः।
क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति॥३॥
‘देवि! मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ, तुमने ही पहले यह बात कही है कि क्षत्रिय लोग इसलिये धनुष धारण करते हैं कि किसी को दुःखी होकर हाहाकार न करना पड़े (यदि कोई दुःख या संकटमें पड़ा हो तो उसकी रक्षा की जाय)॥३॥
ते चार्ता दण्डकारण्ये मुनयः संशितव्रताः।
मां सीते स्वयमागम्य शरण्यं शरणं गताः॥४॥
‘सीते! दण्डकारण्य में रहकर कठोर व्रत का पालन करने वाले वे मुनि बहुत दुःखी हैं, इसीलिये मुझे शरणागतवत्सल जानकर वे स्वयं मेरे पास आये और शरणागत हुए॥४॥
वसन्तः कालकालेषु वने मूलफलाशनाः।
न लभन्ते सुखं भीरु राक्षसैः क्रूरकर्मभिः॥५॥
भक्ष्यन्ते राक्षसैीमैर्नरमांसोपजीविभिः।
‘भीरु ! सदा ही वन में रहकर फल-मूल का आहार करने वाले वे मुनि इन क्रूरकर्मा राक्षसों के कारण कभी सुख नहीं पाते हैं। मनुष्यों के मांस से जीवननिर्वाह करने वाले ये भयानक राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं॥५ १/५॥
ते भक्ष्यमाणा मुनयो दण्डकारण्यवासिनः॥६॥
अस्मानभ्यवपद्येति मामूचुद्धिजसत्तमाः।
‘उन राक्षसों के ग्रास बने हुए वे दण्डकारण्यवासी द्विजश्रेष्ठ मुनि हमलोगों के पास आकर मुझसे बोले —’प्रभो! हम पर अनुग्रह कीजिये’॥६ १/२॥
मया तु वचनं श्रुत्वा तेषामेवं मुखाच्च्युतम्॥७॥
कृत्वा वचनशुश्रूषां वाक्यमेतदुदाहृतम्।
‘उनके मुख से निकली हुई इस प्रकार रक्षा की पुकार सुनकर और उनकी आज्ञा-पालनरूपी सेवा का विचार मन में लेकर मैंने उनसे यह बात कही॥७ १/२॥
प्रसीदन्तु भवन्तो मे हीरेषा तु ममातुला॥८॥
यदीदृशैरहं विप्रैरुपस्थेयैरुपस्थितः।
किं करोमीति च मया व्याहृतं द्विजसंनिधौ॥९॥
‘महर्षियो! आप-जैसे ब्राह्मणों की सेवा में मुझे स्वयं ही उपस्थित होना चाहिये था, परंतु आप स्वयं ही अपनी रक्षा के लिये मेरे पास आये, यह मेरे लिये अनुपम लज्जा की बात है; अतः आप प्रसन्न हों। बताइये, मैं आपलोगों की क्या सेवा करूँ?’ यह बात मैंने उन ब्राह्मणों के सामने कही॥८-९॥
सर्वैरेव समागम्य वागियं समुदाहृता।
राक्षसैर्दण्डकारण्ये बहुभिः कामरूपिभिः॥१०॥
अर्दिताः स्म भृशं राम भवान् नस्तत्र रक्षतु।
‘तब उन सभी ने मिलकर अपना मनोभाव इन वचनों में प्रकट किया—’श्रीराम! दण्डकारण्य में इच्छानुसार रूप धारण करने वाले बहुत-से राक्षस रहते हैं। उनसे हमें बड़ा कष्ट पहुँच रहा है, अतः वहाँ उनके भय से आप हमारी रक्षा करें। १० १/२॥
होमकाले तु सम्प्राप्ते पर्वकालेषु चानघ॥११॥
धर्षयन्ति सुदुर्धर्षा राक्षसाः पिशिताशनाः।
‘निष्पाप रघुनन्दन! अग्निहोत्र का समय आनेपर तथा पर्व के अवसरों पर ये अत्यन्त दुर्धर्ष मांसभोजी राक्षस हमें धर दबाते हैं। ११ १/२॥
राक्षसैर्धर्षितानां च तापसानां तपस्विनाम्॥१२॥
गतिं मृगयमाणानां भवान् नः परमा गतिः।
‘राक्षसों द्वारा आक्रान्त होने वाले हम तपस्वी तापस सदा अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ते रहते हैं, अतःआप ही हमारे परम आश्रय हों॥१२ १/२॥
कामं तपःप्रभावेण शक्ता हन्तं निशाचरान्॥१३॥
चिरार्जितं न चेच्छामस्तपः खण्डयितुं वयम्।
बहविघ्नं तपो नित्यं दृश्चरं चैव राघव॥१४॥
‘रघुनन्दन! यद्यपि हम तपस्या के प्रभाव से इच्छानुसार इन राक्षसों का वध करने में समर्थ हैं तथापि चिरकाल से उपार्जित किये हुए तप को खण्डित करना नहीं चाहते हैं; क्योंकि तप में सदा ही बहुत-से विघ्न आते रहते हैं तथा इसका सम्पादन बहुत ही कठिन होता है। १३-१४॥
तेन शापं न मुञ्चामो भक्ष्यमाणाश्च राक्षसैः।
तदर्घमानान् रक्षोभिर्दण्डकारण्यवासिभिः॥१५॥
रक्ष नस्त्वं सह भ्रात्रा त्वन्नाथा हि वयं वने।
‘यही कारण है कि राक्षसों के ग्रास बन जाने पर भी हम उन्हें शाप नहीं देते हैं, इसलिये दण्डकारण्यवासी निशाचरों से पीड़ित हुए हम तापसों की भाई सहित आप रक्षा करें; क्योंकि इस वन में अब आप ही हमारे रक्षक हैं’॥१५॥
मया चैतद्वचः श्रुत्वा कात्स्येन परिपालनम्॥१६॥
ऋषीणां दण्डकारण्ये संश्रुतं जनकात्मजे।
‘जनकनन्दिनि! दण्डकारण्य में ऋषियों की यह बात सुनकर मैंने पूर्णरूप से उनकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की है॥१६ १/२॥
संश्रुत्य च न शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम्॥१७॥
मनीनामन्यथा कर्तुं सत्यमिष्टं हि मे सदा।
‘मुनियों के सामने यह प्रतिज्ञा करके अब मैं जीते जी इस प्रतिज्ञा को मिथ्या नहीं कर सकूँगा; क्योंकि सत्य का पालन मुझे सदा ही प्रिय है॥१७ १/२॥
अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम्॥१८॥
न त प्रतिज्ञा संश्रत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः।
‘सीते! मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, तुम्हारा और लक्ष्मण का भी परित्याग कर सकता हूँ, किंतु अपनी प्रतिज्ञा को, विशेषतः ब्राह्मणों के लिये की गयी प्रतिज्ञा को मैं कदापि नहीं तोड़ सकता।। १८ १/२॥
तदवश्यं मया कार्यमृषीणां परिपालनम्॥१९॥
अनुक्तेनापि वैदेहि प्रतिज्ञाय कथं पुनः।
‘इसलिये ऋषियों की रक्षा करना मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य है। विदेहनन्दिनि ! ऋषियों के बिना कहे ही उनकी मुझे रक्षा करनी चाहिये थी; फिर जब उन्होंने स्वयं कहा और मैंने प्रतिज्ञा भी कर ली, तब अब उनकी रक्षा से कैसे मुँह मोड़ सकता हूँ॥१९॥
मम स्नेहाच्च सौहार्दादिदमुक्तं त्वया वचः॥२०॥
परितुष्टोऽस्म्यहं सीते न ह्यनिष्टोऽनुशास्यते।
‘सीते! तुमने स्नेह और सौहार्दवश जो मुझसे ये बातें कही हैं, इससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि जो अपना प्रिय न हो, उसे कोई हितकर उपदेश नहीं देता॥२० १/२॥
सदृशं चानुरूपं च कुलस्य तव शोभने।
सधर्मचारिणी मे त्वं प्राणेभ्योऽपि गरीयसी॥२१॥
‘शोभने! तुम्हारा यह कथन तुम्हारे योग्य तो है ही, तुम्हारे कुल के भी सर्वथा अनुरूप है। तुम मेरी सहधर्मिणी हो और मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हो’॥२१॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा सीतां प्रियां मैथिलराजपुत्रीम्।
रामो धनुष्मान् सह लक्ष्मणेन जगाम रम्याणि तपोवनानि॥२२॥
महात्मा श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा वचन कहकर हाथ में धनुष ले लक्ष्मण के साथ रमणीय तपोवनों में विचरण करने लगे॥२२॥
सर्ग ११
अग्रतः प्रययौ रामः सीता मध्ये सुशोभना।
पृष्ठतस्तु धनुष्पाणिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह॥१॥
तदनन्तर आगे-आगे श्रीराम चले, बीच में परम सुन्दरी सीता चल रही थीं और उनके पीछे हाथ में धनुष लिये लक्ष्मण चलने लगे॥१॥
तौ पश्यमानौ विविधान् शैलप्रस्थान् वनानि च।
नदीश्च विविधा रम्या जग्मतुः सह सीतया॥२॥
सीता के साथ वे दोनों भाई भाँति-भाँति के पर्वतीय शिखरों, वनों तथा नाना प्रकार की रमणीय नदियों को देखते हुए अग्रसर होने लगे॥२॥
सारसांश्चक्रवाकांश्च नदीपुलिनचारिणः।
सरांसि च सपद्मानि युतानि जलजैः खगैः॥३॥
उन्होंने देखा, कहीं नदियों के तटों पर सारस और चक्रवाक विचर रहे हैं और कहीं खिले हुए कमलों और जलचर पक्षियों से युक्त सरोवर शोभा पाते हैं। ३॥
यूथबद्धांश्च पृषतान् मदोन्मत्तान् विषाणिनः।
महिषांश्च वराहांश्च गजांश्च द्रुमवैरिणः॥४॥
कहीं चितकबरे मृग यूथ बाँधे चले जा रहे थे, कहीं बड़े-बड़े सींगवाले मदमत्त भैंसे तथा बढ़े हुए दाँत वाले जंगली सूअर और वृक्षों के वैरी दन्तार हाथी दिखायी देते थे॥४॥
ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे।
ददृशुः सहिता रम्यं तटाकं योजनायुतम्॥५॥
दूरतक यात्रा तै करने के बाद जब सूर्य अस्ताचल को जाने लगे, तब उन तीनों ने एक साथ देखा-सामने एक बड़ा ही सुन्दर तालाब है, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक योजन की जान पड़ती है॥५॥
पद्मपुष्करसम्बाधं गजयूथैरलंकृतम्।
सारसैहँसकादम्बैः संकुलं जलजातिभिः॥६॥
वह सरोवर लाल और श्वेत कमलों से भरा हुआ था। उसमें क्रीड़ा करते हुए झुंड-के-झुंड हाथी उसकी शोभा बढ़ाते थे तथा सारस, राजहंस और कलहंस आदि पक्षियों एवं जलमें उत्पन्न होने वाले मत्स्य आदि जन्तुओं से वह व्याप्त दिखायी देता था। ६॥
प्रसन्नसलिले रम्ये तस्मिन् सरसि शुश्रुवे।
गीतवादित्रनिर्घोषो न तु कश्चन दृश्यते॥७॥
स्वच्छ जल से भरे हुए उस रमणीय सरोवर में गाने बजाने का शब्द सुनायी देता था, किंतु कोई दिखायी नहीं दे रहा था॥७॥
ततः कौतूहलाद् रामो लक्ष्मणश्च महारथः।
मुनिं धर्मभृतं नाम प्रष्टुं समुपचक्रमे॥८॥
तब श्रीराम और महारथी लक्ष्मण ने कौतूहलवश अपने साथ आये हुए धर्मभृत् नामक मुनि से पूछना आरम्भ किया - ॥८॥
इदमत्यद्भुतं श्रुत्वा सर्वेषां नो महामुने।
कौतूहलं महज्जातं किमिदं साधु कथ्यताम्॥९॥
‘महामुने! यह अत्यन्त अद्भुत संगीत की ध्वनि सुनकर हम सब लोगों को बड़ा कौतूहल हो रहा है। यह क्या है, इसे अच्छी तरह बताइये’॥९॥
तेनैवमुक्तो धर्मात्मा राघवेण मुनिस्तदा।
प्रभावं सरसः क्षिप्रमाख्यातुमुपचक्रमे॥१०॥
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर धर्मात्मा धर्मभृत् नामक मुनि ने तुरंत ही उस सरोवर के प्रभाव का वर्णन आरम्भ किया-॥१०॥
इदं पञ्चाप्सरो नाम तटाकं सार्वकालिकम्।
निर्मितं तपसा राम मुनिना माण्डकर्णिना॥११॥
‘श्रीराम! यह पञ्चाप्सर नामक सरोवर है, जो सर्वदा अगाध जल से भरा रहता है। माण्डकर्णि नामक मुनि ने अपने तप के द्वारा इसका निर्माण किया था॥११॥
स हि तेपे तपस्तीव्र माण्डकर्णिमहामुनिः।
दशवर्षसहस्राणि वायुभक्षो जलाशये॥१२॥
‘महामुनि माण्डकर्णि ने एक जलाशय में रहकर केवल वायु का आहार करते हुए दस सहस्र वर्षों तक तीव्र तपस्या की थी॥१२॥
ततः प्रव्यथिताः सर्वे देवाः साग्निपुरोगमाः।
अब्रुवन् वचनं सर्वे परस्परसमागताः॥१३॥
‘उस समय अग्नि आदि सब देवता उनके तप से अत्यन्त व्यथित हो उठे और आपस में मिलकर वे सब-के-सब इस प्रकार कहने लगे॥१३॥
अस्माकं कस्यचित् स्थानमेष प्रार्थयते मुनिः।
इति संविग्नमनसः सर्वे तत्र दिवौकसः॥१४॥
‘जान पड़ता है, ये मुनि हमलोगों में से किसी के स्थान को लेना चाहते हैं, ऐसा सोचकर वे सब देवता वहाँ मन-ही-मन उद्विग्न हो उठे॥१४॥
ततः कर्तुं तपोविनं सर्वदेवैर्नियोजिताः।
प्रधानाप्सरसः पञ्च विद्युच्चलितवर्चसः॥१५॥
‘तब उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिये सम्पूर्ण देवताओं ने पाँच प्रधान अप्सराओं को नियुक्त किया, जिनकी अङ्गकान्ति विद्युत् के समान चञ्चल थी॥१५॥
अप्सरोभिस्ततस्ताभिर्मुनिर्दृष्टपरावरः।
नीतो मदनवश्यत्वं देवानां कार्यसिद्धये॥१६॥
‘तदनन्तर जिन्होंने लौकिक एवं पारलौकिक धर्माधर्म का ज्ञान प्राप्त कर लिया था, उन मुनि को उन पाँच अप्सराओं ने देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये काम के अधीन कर दिया॥१६॥
ताश्चैवाप्सरसः पञ्च मुनेः पत्नीत्वमागताः।
तटाके निर्मितं तासां तस्मिन्नन्तर्हितं गृहम्॥१७॥
‘मुनि की पत्नी बनी हुई वे ही पाँच अप्सराएँ यहाँ रहती हैं। उनके रहने के लिये इस तालाब के भीतर घर बना हुआ है, जो जल के अंदर छिपा हुआ है॥१७॥
तत्रैवाप्सरसः पञ्च निवसन्त्यो यथासुखम्।
रमयन्ति तपोयोगान्मुनिं यौवनमास्थितम्॥१८॥
‘उसी घर में सुखपूर्वक रहती हुई पाँचों अप्सराएँ तपस्या के प्रभाव से युवावस्था को प्राप्त हुए मुनि को अपनी सेवाओं से संतुष्ट करती हैं।॥१८॥
तासां संक्रीडमानानामेष वादित्रनिःस्वनः।
श्रूयते भूषणोन्मिश्रो गीतशब्दो मनोहरः॥१९॥
‘क्रीड़ा-विहार में लगी हुई उन अप्सराओं के ही वाद्यों की यह ध्वनि सुनायी देती है, जो भूषणों की झनकार के साथ मिली हुई है। साथ ही उनके गीत का भी मनोहर शब्द सुन पड़ता है’॥१९॥
आश्चर्यमिति तस्यैतद् वचनं भावितात्मनः।
राघवः प्रतिजग्राह सह भ्रात्रा महायशाः॥२०॥
अपने भाई के साथ महायशस्वी श्रीरघुनाथजी ने उन भावितात्मा महर्षि के इस कथन को ‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है’ यों कहकर स्वीकार किया। २०॥
एवं कथयमानः स ददर्शाश्रममण्डलम्।
कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्मया लक्ष्या समावृतम्॥२१॥
इस प्रकार कहते हुए श्रीरामचन्द्रजी को एक आश्रममण्डल दिखायी दिया, जहाँ सब ओर कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रम ब्राह्मी लक्ष्मी (ब्रह्मतेज) से प्रकाशित होता था॥२१॥
प्रविश्य सह वैदेह्या लक्ष्मणेन च राघवः।
तदा तस्मिन् स काकुत्स्थः श्रीमत्याश्रममण्डले॥२२॥
उषित्वा स सुखं तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः।
विदेहनन्दिनी सीता तथा लक्ष्मण के साथ उस तेजस्वी आश्रममण्डल में प्रवेश करके ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ने उस समय सुखपूर्वक निवास किया। वहाँ के महर्षियों ने उनका बड़ा आदरसत्कार किया॥२२ १/२॥
जगाम चाश्रमांस्तेषां पर्यायेण तपस्विनाम्॥२३॥
येषामुषितवान् पूर्वं सकाशे स महास्त्रवित्।
तदनन्तर महान् अस्त्रों के ज्ञाता श्रीरामचन्द्रजी बारीबारी से उन सभी तपस्वी मुनियों के आश्रमों पर गये, जिनके यहाँ वे पहले रह चुके थे। उनके पास भी (उनकी भक्ति देख) दुबारा जाकर रहे॥२३ १/२॥
क्वचित् परिदशान् मासानेकसंवत्सरं क्वचित्॥२४॥
क्वचिच्च चतुरो मासान् पञ्च षट् च परान् क्वचित्।
अपरत्राधिकान् मासानध्यर्धमधिकं क्वचित्॥२५॥
त्रीन् मासानष्टमासांश्च राघवो न्यवसत् सुखम्।
कहीं दस महीने, कहीं साल भर, कहीं चार महीने, कहीं पाँच या छः महीने, कहीं इससे भी अधिक समय (अर्थात् सात महीने), कहीं उससे भी अधिक (आठ महीने), कहीं आधे मास अधिक अर्थात् साढ़े आठ महीने, कहीं तीन महीने और कहीं आठ और तीन अर्थात् ग्यारह महीने तक श्रीरामचन्द्रजी ने सुखपूर्वक निवास किया॥२४-२५ १/२॥
तत्र संवसतस्तस्य मुनीनामाश्रमेषु वै॥२६॥
रमतश्चानुकूल्येन ययुः संवत्सरा दश।
इस प्रकार मुनियों के आश्रमों पर रहते और अनुकूलता पाकर आनन्द का अनुभव करते हुए उनके दस वर्ष बीत गये॥२६ १/२॥
परिसृत्य च धर्मज्ञो राघवः सह सीतया॥२७॥
सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं पुनरेवाजगाम ह।
इस प्रकार सब ओर घूम-फिरकर धर्म के ज्ञाता भगवान् श्रीराम सीता के साथ फिर सुतीक्ष्ण के आश्रम पर ही लौट आये॥२७ १/२॥
स तमाश्रममागम्य मुनिभिः परिपूजितः॥२८॥
तत्रापि न्यवसद् रामः किंचित् कालमरिंदमः।
शत्रुओं का दमन करने वाले श्रीराम उस आश्रम में आकर वहाँ रहने वाले मुनियों द्वारा भलीभाँति सम्मानित हो वहाँ भी कुछ कालतक रहे॥२८ १/२॥
अथाश्रमस्थो विनयात् कदाचित् तं महामुनिम्॥२९॥
उपासीनः स काकुत्स्थः सुतीक्ष्णमिदमब्रवीत्।
उस आश्रम में रहते हुए श्रीराम ने एक दिन महामुनि सुतीक्ष्ण के पास बैठकर विनीतभाव से कहा-॥२९ १/२॥
अस्मिन्नरण्ये भगवन्नगस्त्यो मनिसत्तमः॥३०॥
वसतीति मया नित्यं कथाः कथयतां श्रुतम्।
न तु जानामि तं देशं वनस्यास्य महत्तया॥३१॥
‘भगवन् ! मैंने प्रतिदिन बातचीत करने वाले लोगों के मुँह से सुना है कि इस वन में कहीं मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी निवास करते हैं; किंतु इस वन की विशालता के कारण मैं उस स्थान को नहीं जानता हूँ॥३०-३१॥
कुत्राश्रमपदं रम्यं महर्षेस्तस्य धीमतः।
प्रसादार्थं भगवतः सानुजः सह सीतया॥३२॥
अगस्त्यमधिगच्छेयमभिवादयितुं मुनिम्।
मनोरथो महानेष हृदि सम्परिवर्तते॥३३॥
‘उन बुद्धिमान् महर्षि का सुन्दर आश्रम कहाँ है ? मैं लक्ष्मण और सीता के साथ भगवान् अगस्त्य को प्रसन्न करने के लिये उन मुनीश्वर को प्रणाम करने के उद्देश्य से उनके आश्रम पर जाऊँ—यह महान् मनोरथ मेरे हृदय में चक्कर लगा रहा है॥३२-३३॥
यदहं तं मुनिवरं शुश्रूषेयमपि स्वयम्।
इति रामस्य स मुनिः श्रुत्वा धर्मात्मनो वचः॥३४॥
सुतीक्ष्णः प्रत्युवाचेदं प्रीतो दशरथात्मजम्।
‘मैं चाहता हूँ कि स्वयं भी मुनिवर अगस्त्य की सेवा करूँ।’ धर्मात्मा श्रीराम का यह वचन सुनकर सुतीक्ष्ण मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दशरथनन्दन से इस प्रकार बोले-॥३४ १/२॥
अहमप्येतदेव त्वां वक्तुकामः सलक्ष्मणम्॥३५॥
अगस्त्यमभिगच्छेति सीतया सह राघव।
दिष्ट्या त्विदानीमर्थेऽस्मिन् स्वयमेव ब्रवीषि माम्॥३६॥
‘रघुनन्दन ! मैं भी लक्ष्मणसहित आपसे यही कहना चाहता था कि आप सीता के साथ महर्षि अगस्त्य के पास जायँ। सौभाग्य की बात है कि इस समय आप स्वयं ही मुझसे वहाँ जाने के विषय में पूछ रहे हैं॥३५-३६॥
अयमाख्यामि ते राम यत्रागस्त्यो महामुनिः।
योजनान्याश्रमात् तात याहि चत्वारि वै ततः।
दक्षिणेन महान् श्रीमानगस्त्यभ्रातुराश्रमः॥३७॥
‘श्रीराम! महामुनि अगस्त्य जहाँ रहते हैं, उस आश्रम का पता मैं अभी आपको बताये देता हूँ। तात! इस आश्रम से चार योजन दक्षिण चले जाइये। वहाँ आपको अगस्त्य के भाई का बहुत बड़ा एवं सुन्दर आश्रम मिलेगा॥३७॥
स्थलीप्रायवनोद्देशे पिप्पलीवनशोभिते।
बहुपुष्पफले रम्ये नानाविहगनादिते॥३८॥
पद्मिन्यो विविधास्तत्र प्रसन्नसलिलाशयाः।
हंसकारण्डवाकीर्णाश्चक्रवाकोपशोभिताः॥३९॥
‘वहाँ के वन की भूमि प्रायः समतल है तथा पिप्पली का वन उस आश्रम की शोभा बढ़ाता है। वहाँ फूलों और फलों की बहुतायत है। नाना प्रकार के पक्षियों के कलरवों से गूंजते हुए उस रमणीय आश्रम के पास भाँति-भाँति के कमलमण्डित सरोवर हैं, जो स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं। हंस और कारण्डव आदि पक्षी उनमें सब ओर फैले हुए हैं तथा चक्रवाक उनकी शोभा बढ़ाते हैं॥३८-३९॥
तत्रैकां रजनीं व्युष्य प्रभाते राम गम्यताम्।
दक्षिणां दिशमास्थाय वनखण्डस्य पार्श्वतः॥४०॥
तत्रागस्त्याश्रमपदं गत्वा योजनमन्तरम्।
रमणीये वनोद्देशे बहपादपशोभिते॥४१॥
‘श्रीराम! आप एक रात उस आश्रम में ठहरकर प्रातःकाल उस वनखण्ड के किनारे दक्षिण दिशा की ओर जायें। इस प्रकार एक योजन आगे जाने पर अनेकानेक वृक्षों से सुशोभित वन के रमणीय भाग में अगस्त्य मुनि का आश्रम मिलेगा। ४०-४१॥
रंस्यते तत्र वैदेही लक्ष्मणश्च त्वया सह।
स हि रम्यो वनोद्देशो बहुपादपसंयुतः॥४२॥
‘वहाँ विदेहनन्दिनी सीता और लक्ष्मण आपके साथ सानन्द विचरण करेंगेः क्योंकि बहुसंख्यक वृक्षों से सुशोभित वह वनप्रान्त बड़ा ही रमणीय है। ४२॥
यदि बुद्धिः कृता द्रष्टुमगस्त्यं तं महामुनिम्।
अद्यैव गमने बुद्धिं रोचयस्व महामते॥४३॥
‘महामते! यदि आपने महामुनि अगस्त्य के दर्शन का निश्चित विचार कर लिया है तो आज ही वहाँ की यात्रा करने का भी निश्चय करें’॥४३॥
इति रामो मुनेः श्रुत्वा सह भ्रात्राभिवाद्य च।
प्रतस्थेऽगस्त्यमुद्दिश्य सानुगः सह सीतया॥४४॥
मुनि का यह वचन सुनकर भाईसहित श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें प्रणाम किया और सीता तथा लक्ष्मण के साथ अगस्त्यजी के आश्रम की ओर चल दिये॥४४॥
पश्यन् वनानि चित्राणि पर्वतांश्चाभ्रसंनिभान्।
सरांसि सरितश्चैव पथि मार्गवशानुगान्॥४५॥
मार्ग में मिले हुए विचित्र-विचित्र वनों, मेघमाला के समान पर्वतमालाओं, सरोवरों और सरिताओं को देखते हुए वे आगे बढ़ते गये॥४५॥
सुतीक्ष्णेनोपदिष्टेन गत्वा तेन पथा सुखम्।
इदं परमसंहृष्टो वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत्॥४६॥
इस प्रकार सुतीक्ष्ण के बताये हुए मार्ग से सुखपूर्वक चलते-चलते श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यन्त हर्ष में भरकर लक्ष्मण से यह बात कही - ॥४६॥
एतदेवाश्रमपदं नूनं तस्य महात्मनः।
अगस्त्यस्य मुनेमा॑तुर्दृश्यते पुण्यकर्मणः॥४७॥
‘सुमित्रानन्दन! निश्चय ही यह पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करने वाले महात्मा अगस्त्यमुनि के भाई का आश्रम दिखायी दे रहा है॥४७॥
यथा हीमे वनस्यास्य ज्ञाताः पथि सहस्रशः।
संनताः फलभारेण पुष्पभारेण च द्रमाः॥४८॥
‘क्योंकि सुतीक्ष्णजी ने जैसा बतलाया था, उसके अनुसार इस वन के मार्ग में फूलों और फलों के भार से झुके हुए सहस्रों परिचित वृक्ष शोभा पा रहे हैं॥४८॥
पिप्पलीनां च पक्वानां वनादस्मादुपागतः।
गन्धोऽयं पवनोत्क्षिप्तः सहसा कटुकोदयः॥४९॥
‘इस वन में पकी हुई पीपलियों की यह गन्ध वायु से प्रेरित होकर सहसा इधर आयी है, जिससे कटु रस का उदय हो रहा है॥४९॥
तत्र तत्र च दृश्यन्ते संक्षिप्ताः काष्ठसंचयाः।
लूनाश्च परिदृश्यन्ते दर्भा वैदूर्यवर्चसः॥५०॥
‘जहाँ-तहाँ लकड़ियों के ढेर लगे दिखायी देते हैं और वैदूर्यमणि के समान रंगवाले कुश कटे हुए दृष्टिगोचर होते हैं॥५०॥
एतच्च वनमध्यस्थं कृष्णाभ्रशिखरोपमम्।
पावकस्याश्रमस्थस्य धूमाग्रं सम्प्रदृश्यते॥५१॥
‘यह देखो, जंगल के बीच में आश्रम की अग्नि का धुआँ उठता दिखायी दे रहा है, जिसका अग्रभाग काले मेघों के ऊपरी भाग-सा प्रतीत होता है॥५१॥
विविक्तेषु च तीर्थेष कृतस्नाना द्विजातयः।
पुष्पोपहारं कुर्वन्ति कुसुमैः स्वयमर्जितैः॥५२॥
‘यहाँ के एकान्त एवं पवित्र तीर्थों में स्नान करके आये हुए ब्राह्मण स्वयं चुनकर लाये हुए फूलों से देवताओं के लिये पुष्पोपहार अर्पित करते हैं। ५२॥
ततः सुतीक्ष्णवचनं यथा सौम्य मया श्रुतम्।
अगस्त्यस्याश्रमो भ्रातुनूनमेष भविष्यति॥५३॥
‘सौम्य ! मैंने सुतीक्ष्णजी का कथन जैसा सुना था, उसके अनुसार यह निश्चय ही अगस्त्यजी के भाई का आश्रम होगा॥५३॥
निगृह्य तरसा मृत्युं लोकानां हितकाम्यया।
यस्य भ्रात्रा कृतेयं दिक्शरण्या पुण्यकर्मणा॥५४॥
‘इन्हीं के भाई पुण्यकर्मा अगस्त्यजी ने समस्त लोकों के हित की कामना से मृत्युस्वरूप वातापि और इल्वल का वेगपूर्वक दमन करके इस दक्षिण दिशा को शरण लेने के योग्य बना दिया॥५४॥
इहैकदा किल क्रूरो वातापिरपि चेल्वलः।
भ्रातरौ सहितावास्तां ब्राह्मणघ्नौ महासुरौ॥५५॥
‘एक समय की बात है, यहाँ क्रूर स्वभाव वाला वातापि और इल्वल—ये दोनों भाई एक साथ रहते थे। ये दोनों महान् असुर ब्राह्मणों की हत्या करने वाले थे॥
धारयन् ब्राह्मणं रूपमिल्वलः संस्कृतं वदन्।
आमन्त्रयति विप्रान् स श्राद्धमुद्दिश्य निघृणः॥५६॥
भ्रातरं संस्कृतं कृत्वा ततस्तं मेषरूपिणम्।
तान् द्विजान् भोजयामास श्राद्धदृष्टेन कर्मणा॥५७॥
‘निर्दयी इल्वल ब्राह्मण का रूप धारण करके संस्कृत बोलता हुआ जाता और श्राद्ध के लिये ब्राह्मणों को निमन्त्रण दे आता था। फिर मेष (जीवशाक) का रूप धारण करने वाले अपने भाई वातापि का संस्कार करके श्राद्धकल्पोक्त विधि से ब्राह्मणों को खिला देता था॥५६-५७॥
ततो भुक्तवतां तेषां विप्राणामिल्वलोऽब्रवीत्।
वातापे निष्क्रमस्वेति स्वरेण महता वदन्॥५८॥
वे ब्राह्मण जब भोजन कर लेते, तब इल्वल उच्च स्वर से बोलता-’वाता पे! निकलो’॥५८॥
ततो भ्रातुर्वचः श्रुत्वा वातापिर्मेषवन्नदन्।
भित्त्वा भित्त्वा शरीराणि ब्राह्मणानां विनिष्पतत्॥५९॥
‘भाई की बात सुनकर वातापि भेड़े के समान ‘में-में’ करता हुआ उन ब्राह्मणों के पेट फाड़-फाड़कर निकल आता था॥५९॥
ब्राह्मणानां सहस्राणि तैरेवं कामरूपिभिः।
विनाशितानि संहत्य नित्यशः पिशिताशनैः॥६०॥
‘इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करने वाले उन मांसभक्षी असुरों ने प्रतिदिन मिलकर सहस्रों ब्राह्मणों का विनाश कर डाला॥६०॥
अगस्त्येन तदा देवैः प्रार्थितेन महर्षिणा।
अनुभूय किल श्राद्धे भक्षितः स महासुरः॥६१॥
‘उस समय देवताओं की प्रार्थना से महर्षि अगस्त्य ने श्राद्ध में शाकरूपधारी उस महान् असुर को जानबूझकर भक्षण किया॥६१॥
ततः सम्पन्नमित्युक्त्वा दत्त्वा हस्तेऽवनेजनम्।
भ्रातरं निष्क्रमस्वेति चेल्वलः समभाषत॥६२॥
‘तदनन्तर श्राद्धकर्म सम्पन्न हो गया। ऐसा कहकर ब्राह्मणों के हाथ में अवनेजन का जल दे इल्वल ने भाई को सम्बोधित करके कहा, ‘निकलो’ ॥६२॥
स तदा भाषमाणं तु भ्रातरं विप्रघातिनम्।
अब्रवीत् प्रहसन् धीमानगस्त्यो मुनिसत्तमः॥६३॥
‘इस प्रकार भाई को पुकारते हुए उस ब्राह्मणघाती असुर से बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने हँसकर कहा॥६३॥
कुतो निष्क्रमितुं शक्तिर्मया जीर्णस्य रक्षसः।
भ्रातुस्तु मेषरूपस्य गतस्य यमसादनम्॥६४॥
‘जिस जीवशाकरूपधारी तेरे भाई राक्षस को मैंने खाकर पचा लिया, वह तो यमलोक में जा पहुँचा है। अब उसमें निकलने की शक्ति कहाँ है’॥६४॥
अथ तस्य वचः श्रुत्वा भ्रातुर्निधनसंश्रितम्।
प्रधर्षयितुमारेभे मुनिं क्रोधान्निशाचरः॥६५॥
‘भाई की मृत्यु को सूचित करने वाले मुनि के इस वचन को सुनकर उस निशाचर ने क्रोधपूर्वक उन्हें मार डालने का उद्योग आरम्भ किया॥६५॥
सोऽभ्यद्रवद् द्विजेन्द्रं तं मुनिना दीप्ततेजसा।
चक्षुषानलकल्पेन निर्दग्धो निधनं गतः॥६६॥
“उसने ज्यों ही द्विजराज अगस्त्यपर धावा किया, त्यों ही उद्दीप्त तेजवाले उन मुनि ने अपनी अग्नितुल्य दृष्टि से उस राक्षस को दग्ध कर डाला। इस प्रकार उसकी मृत्यु हो गयी॥६६॥
तस्यायमाश्रमो भ्रातुस्तटाकवनशोभितः।
विप्रानुकम्पया येन कर्मेदं दुष्करं कृतम्॥६७॥
‘ब्राह्मणों पर कृपा करके जिन्होंने यह दुष्कर कर्म किया था, उन्हीं महर्षि अगस्त्य के भाई का यह आश्रम है, जो सरोवर और वन से सुशोभित हो रहा है’॥६७॥
एवं कथयमानस्य तस्य सौमित्रिणा सह।
रामस्यास्तं गतः सूर्यः संध्याकालोऽभ्यवर्तत॥६८॥
श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ इस प्रकार बातचीत कर रहे थे। इतने में ही सूर्यदेव अस्त हो गये और संध्या का समय हो गया। ६८॥
उपास्य पश्चिमां संध्यां सह भ्रात्रा यथाविधि।
प्रविवेशाश्रमपदं तमृषिं चाभ्यवादयत्॥६९॥
तब भाई के साथ विधिपूर्वक सायं संध्योपासना करके श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश किया और उन महर्षि के चरणों में मस्तक झुकाया॥६९॥
सम्यकप्रतिगृहीतस्तु मुनिना तेन राघवः।
न्यवसत् तां निशामेकां प्राश्य मूलफलानि च॥७०॥
मुनि ने उनका यथावत् आदर-सत्कार किया। सीता और लक्ष्मणसहित श्रीराम वहाँ फल-मूल खाकर एक रात उस आश्रम में रहे॥७०॥
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामुदिते रविमण्डले।
भ्रातरं तमगस्त्यस्य आमन्त्रयत राघवः॥७१॥
वह रात बीतने पर जब सूर्योदय हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजी ने अगस्त्य के भाई से विदा माँगते हुए कहा-॥७१॥
अभिवादये त्वां भगवन् सुखमसम्युषितो निशाम्।
आमन्त्रये त्वां गच्छामि गुरुं ते द्रष्टुमग्रजम्॥७२॥
‘भगवन् ! मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ। यहाँ रात भर बड़े सुख से रहा हूँ। अब आपके बड़े भाई मुनिवर अगस्त्य का दर्शन करने के लिये जाऊँगा। इसके लिये आपसे आज्ञा चाहता हूँ’॥७२॥
गम्यतामिति तेनोक्तो जगाम रघुनन्दनः।
यथोद्दिष्टेन मार्गेण वनं तच्चावलोकयन्॥७३॥
तब महर्षि ने कहा, ‘बहुत अच्छा, जाइये।’ इस प्रकार महर्षि से आज्ञा पाकर भगवान् श्रीराम सुतीक्ष्ण के बताये हुए मार्ग से वन की शोभा देखते हुए आगे चले॥७३॥
नीवारान् पनसान् सालान् वञ्जुलांस्तिनिशांस्तथा।
चिरिबिल्वान् मधूकांश्च बिल्वानथ च तिन्दुकान्॥७४॥
पुष्पितान् पुष्पिताग्राभिलताभिरुपशोभितान्।
ददर्श रामः शतशस्तत्र कान्तारपादपान्॥७५॥
हस्तिहस्तैर्विमृदितान् वानरैरुपशोभितान्।
मत्तैः शकुनिसद्धैश्च शतशः प्रतिनादितान्॥७६॥
श्रीराम ने वहाँ मार्ग में नीवार (जलकदम्ब), कटहल, साखू, अशोक, तिनिश, चिरिबिल्व, महुआ, बेल, तेंद्र तथा और भी सैकड़ों जंगली वृक्ष देखे, जो फूलों से भरे थे तथा खिली हुई लताओं से परिवेष्टित हो बड़ी शोभा पा रहे थे। उनमें से कई वृक्षों को हाथियों ने अपनी सूड़ों से तोड़कर मसल डाला था और बहुत-से वृक्षों पर बैठे हुए वानर उनकी शोभा बढ़ाते थे। सैकड़ों मतवाले पक्षी उनकी डालियोंपर चहक रहे थे॥७४–७६॥
ततोऽब्रवीत् समीपस्थं रामो राजीवलोचनः।
पृष्ठतोऽनुगतं वीरं लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥७७॥
उस समय कमलनयन श्रीराम अपने पीछे-पीछे आते हुए शोभावर्धक वीर लक्ष्मण से, जो उनके निकट ही थे, इस प्रकार बोले-॥७७॥
स्निग्धपत्रा यथा वृक्षा यथा क्षान्ता मृगद्विजाः।
आश्रमो नातिदूरस्थो महर्षे वितात्मनः॥७८॥
‘यहाँ के वृक्षों के पत्ते जैसे सुने गये थे, वैसे ही चिकने दिखायी देते हैं तथा पशु और पक्षी क्षमाशील एवं शान्त हैं। इससे जान पड़ता है, उन भावितात्मा (शुद्ध अन्तःकरण वाले) महर्षि अगस्त्य का आश्रम यहाँ से अधिक दूर नहीं है॥७८॥
अगस्त्य इति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा।
आश्रमो दृश्यते तस्य परिश्रान्तश्रमापहः॥७९॥
‘जो अपने कर्म से ही संसार में अगस्त्य के नाम से विख्यात हुए हैं, उन्हीं का यह आश्रम दिखायी देता है. जो थके-माँदे पथिकों की थकावट को दूर करनेवाला है॥७९॥
प्राज्यधूमाकुलवनश्चीरमालापरिष्कृतः।
प्रशान्तमृगयूथश्च नानाशकुनिनादितः॥८०॥
‘इस आश्रम के वन यज्ञ-यागसम्बन्धी अधिक धूमों से व्याप्त हैं। चीरवस्त्रों की पंक्तियाँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। यहाँ के मृगों के झुंड सदा शान्त रहते हैं तथा इस आश्रम में नाना प्रकार के पक्षियों के कलरव गूंजते रहते हैं॥८०॥
निगृह्य तरसा मृत्युं लोकानां हितकाम्यया।
दक्षिणा दिक् कृता येन शरण्या पुण्यकर्मणा॥८१॥
तस्येदमाश्रमपदं प्रभावाद् यस्य राक्षसैः।
दिगियं दक्षिणा त्रासाद् दृश्यते नोपभुज्यते॥८२॥
‘जिन पुण्यकर्मा महर्षि अगस्त्य ने समस्त लोकों की हितकामना से मृत्युस्वरूप राक्षसों का वेगपूर्वक दमन करके इस दक्षिण दिशा को शरण लेने के योग्य बना दिया तथा जिनके प्रभाव से राक्षस इस दक्षिण दिशा को केवल दूर से भयभीत होकर देखते हैं, इसका उपभोग भी नहीं करते, उन्हीं का यह आश्रम है॥८१-८२॥
यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा।
तदाप्रभृति निर्वैराः प्रशान्ता रजनीचराः॥८३॥
‘पुण्यकर्मा महर्षि अगस्त्य ने जब से इस दिशा में पदार्पण किया है, तब से यहाँ के निशाचर वैररहित और शान्त हो गये हैं॥८३॥
नाम्ना चेयं भगवतो दक्षिणा दिक्प्रदक्षिणा।
प्रथिता त्रिषु लोकेषु दुर्धर्षा क्रूरकर्मभिः॥८४॥
‘भगवान् अगस्त्य की महिमा से इस आश्रम के आस-पास निर्वैरता आदि गुणों के सम्पादन में समर्थ तथा क्रूरकर्मा राक्षसों के लिये दुर्जय होने के कारण यह सम्पूर्ण दिशा नाम से भी तीनों लोकों में ‘दक्षिणा’ ही कहलायी, इसी नाम से विख्यात हुई तथा इसे ‘अगस्त्य की दिशा’ भी कहते हैं॥८४॥
मार्ग निरोधैं सततं भास्करस्याचलोत्तमः।
संदेशं पालयस्तस्य विन्ध्यशैलो न वर्धते॥८५॥
‘एक बार पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य सूर्य का मार्ग रोकने के लिये बढ़ा था, किंतु महर्षि अगस्त्य के कहने से वह नम्र हो गया। तब से आज तक निरन्तर उनके आदेश का पालन करता हुआ वह कभी नहीं बढ़ता॥८५॥
अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः।
अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः॥८६॥
‘वे दीर्घायु महात्मा हैं। उनका कर्म (समुद्रशोषण आदि कार्य) तीनों लोकों में विख्यात है। उन्हीं अगस्त्य का यह शोभासम्पन्न आश्रम है, जो विनीत मृगों से सेवित है॥८६॥
एष लोकार्चितः साधुर्हिते नित्यं रतः सताम्।
अस्मानधिगतानेष श्रेयसा योजयिष्यति॥८७॥
‘ये महात्मा अगस्त्यजी सम्पूर्ण लोकों के द्वारा पूजित तथा सदा सज्जनों के हित में लगे रहने वाले हैं। अपने पास आये हुए हमलोगों को वे अपने आशीर्वाद से कल्याण के भागी बनायेंगे॥८७॥
आराधयिष्याम्यत्राहमगस्त्यं तं महामुनिम्।
शेषं च वनवासस्य सौम्य वत्स्याम्यहं प्रभो॥८८॥
‘सेवा करने में समर्थ सौम्य लक्ष्मण ! यहाँ रहकर मैं उन महामुनि अगस्त्य की आराधना करूँगा और वनवास के शेष दिन यहीं रहकर बिताऊँगा॥८८॥
अत्र देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।
अगस्त्यं नियताहाराः सततं पर्युपासते॥८९॥
‘देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि यहाँ नियमित आहार करते हुए सदा अगस्त्य मुनि की उपासना करते हैं॥८९॥
नात्र जीवेन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः।
नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः॥९०॥
‘ये ऐसे प्रभावशाली मुनि हैं कि इनके आश्रम में कोई झूठ बोलने वाला, क्रूर, शठ, नृशंस अथवा पापाचारी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता॥९०॥
अत्र देवाश्च यक्षाश्च नागाश्च पतगैः सह।
वसन्ति नियताहारा धर्ममाराधयिष्णवः॥९१॥
‘यहाँ धर्म की आराधना करने के लिये देवता, यक्ष, नाग और पक्षी नियमित आहार करते हुए निवास करते हैं॥९१॥
अत्र सिद्धा महात्मानो विमानैः सूर्यसंनिभैः।
त्यक्त्वा देहान् नवैर्दैहैः स्वर्याताः परमर्षयः॥९२॥
‘इस आश्रम पर अपने शरीरों को त्यागकर अनेकानेक सिद्ध, महात्मा, महर्षि नूतन शरीरों के साथ सूर्यतुल्यतेजस्वी विमानों द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं॥९२॥
यक्षत्वममरत्वं च राज्यानि विविधानि च।
अत्र देवाः प्रयच्छन्ति भूतैराराधिताः शुभैः॥९३॥
‘यहाँ सत्कर्मपरायण प्राणियों द्वारा आराधित हुए देवता उन्हें यक्षत्व, अमरत्व तथा नाना प्रकार के राज्य प्रदान करते हैं॥९३॥
आगताः स्माश्रमपदं सौमित्रे प्रविशाग्रतः।
निवेदयेह मां प्राप्तमृषये सह सीतया॥९४॥
‘सुमित्रानन्दन ! अब हमलोग आश्रम पर आ पहुँचे। तुम पहले प्रवेश करो और महर्षियों को सीता के साथ मेरे आगमन की सूचना दो’॥९४॥
सर्ग १२
स प्रविश्याश्रमपदं लक्ष्मणो राघवानुजः।
अगस्त्यशिष्यमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह॥१॥
श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने आश्रम प्रवेश करके अगस्त्यजी के शिष्य से भेंट की और उनसे यह बात कही - ॥१॥
राजा दशरथो नाम ज्येष्ठस्तस्य सुतो बली।
रामः प्राप्तो मुनिं द्रष्टं भार्यया सह सीतया॥२॥
‘मुने! अयोध्या में जो दशरथ नाम से प्रसिद्ध राजा थे, उन्हीं के ज्येष्ठ पुत्र महाबली श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता के साथ महर्षिका दर्शन करने के लिये आये हैं॥३॥
लक्ष्मणो नाम तस्याहं भ्राता त्ववरजो हितः।
अनुकूलश्च भक्तश्च यदि ते श्रोत्रमागतः॥३॥
‘मैं उनका छोटा भाई, हितैषी और अनुकूल चलने वाला भक्त हूँ। मेरा नाम लक्ष्मण है। सम्भव है यह नाम कभी आपके कानों में पड़ा हो॥३॥
ते वयं वनमत्युग्रं प्रविष्टाः पितृशासनात्।
द्रष्टुमिच्छामहे सर्वे भगवन्तं निवेद्यताम्॥४॥
‘हम सब लोग पिता की आज्ञा से इस अत्यन्त भयंकर वन में आये हैं और भगवान् अगस्त्य मुनि का दर्शन करना चाहते हैं। आप उनसे यह समाचार निवेदन कीजिये’॥४॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य तपोधनः।
तथेत्युक्त्वाग्निशरणं प्रविवेश निवेदितुम्॥५॥
लक्ष्मण की वह बात सुनकर उन तपोधन ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर महिर्ष को समाचार देने के लिये अग्निशाला में प्रवेश किया॥५॥
स प्रविश्य मुनिश्रेष्ठं तपसा दुष्प्रधर्षणम्।
कृताञ्जलिरुवाचेदं रामागमनमञ्जसा॥६॥
यथोक्तं लक्ष्मणेनैव शिष्योऽगस्त्यस्य सम्मतः।
अग्निशाला में प्रवेश करके अगस्त्य के उस प्रिय शिष्य ने जो अपनी तपस्या के प्रभाव से दूसरों के लिये दुर्जय थे, उन मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य के पास जा हाथ जोड़लक्ष्मण के कथनानुसार उन्हें श्रीरामचन्द्रजी के आगमन का समाचार शीघ्रतापूर्वक यों सुनाया - ॥६ १/२॥
पुत्रौ दशरथस्येमौ रामो लक्ष्मण एव च॥७॥
प्रविष्टावाश्रमपदं सीतया सह भार्यया।
द्रष्टुं भवन्तमायातौ शुश्रूषार्थमरिंदमौ॥८॥
यदत्रानन्तरं तत् त्वमाज्ञापयितुमर्हसि।
‘महामुने! राजा दशरथ के ये दो पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण आश्रम में पधारे हैं। श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता के साथ हैं। वे दोनों शत्रुदमन वीर आपकी सेवा के उद्देश्यसे आपका दर्शन करने के लिये आये हैं। अब इस विषय में जो कुछ कहना या करना हो, इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें’॥७-८ १/२॥
ततः शिष्यादुपश्रुत्य प्राप्तं रामं सलक्ष्मणम्॥९॥
वैदेहीं च महाभागामिदं वचनमब्रवीत्।
शिष्य से लक्ष्मणसहित श्रीराम और महाभागा विदेहनन्दिनी सीता के शुभागमन का समाचार सुनकर महर्षि ने इस प्रकार कहा-॥९ १/२॥
दिष्ट्या रामश्चिरस्याद्य द्रष्टुं मां समुपागतः॥१०॥
मनसा कांक्षितं ह्यस्य मयाप्यागमनं प्रति।
गम्यतां सत्कृतो रामः सभार्यः सहलक्ष्मणः॥११॥
प्रवेश्यतां समीपं मे किमसौ न प्रवेशितः।
‘सौभाग्य की बात है कि आज चिरकाल के बाद श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही मझसे मिलने के लिये आ गये। मेरे मन में भी बहुत दिनों से यह अभिलाषा थी कि वे एक बार मेरे आश्रम पर पधारते जाओ, पत्नीसहित श्रीराम और लक्ष्मण को सत्कारपूर्वक आश्रम के भीतर मेरे समीप ले आओ। तुम अब तक उन्हें ले क्यों नहीं आये?’॥१०-११/२॥
एवमुक्तस्तु मुनिना धर्मज्ञेन महात्मना॥१२॥
अभिवाद्याब्रवीच्छिष्यस्तथेति नियताञ्जलिः।
धर्मज्ञ महात्मा अगस्त्य मुनि के ऐसा कहने पर शिष्य ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और कहा - ’बहुत अच्छा अभी ले आता हूँ’॥१२ १/२॥
तदा निष्क्रम्य सम्भ्रान्तः शिष्यो लक्ष्मणमब्रवीत्॥१३॥
कोऽसौ रामो मुनिं द्रष्टमेतु प्रविशतु स्वयम्।
इसके बाद वह शिष्य आश्रम से निकलकर शीघ्रतापूर्वक लक्ष्मण के पास गया और बोला’श्रीरामचन्द्रजी कौन हैं? वे स्वयं आश्रम में प्रवेश करें और मुनि का दर्शन करने के लिये चलें’॥१३ १/२॥
ततो गत्वाऽऽश्रमपदं शिष्येण सह लक्ष्मणः॥१४॥
दर्शयामास काकुत्स्थं सीतां च जनकात्मजाम्।
तब लक्ष्मण ने शिष्य के साथ आश्रम के द्वार पर जाकर उसे श्रीरामचन्द्रजी तथा जनककिशोरी श्रीसीता का दर्शन कराया॥१४ १/२॥
तं शिष्यः प्रश्रितं वाक्यमगस्त्यवचनं ब्रुवन्॥१५॥
प्रावेशयद् यथान्यायं सत्कारार्ह सुसत्कृतम्।
शिष्य ने बड़ी विनय के साथ महर्षि अगस्त्य की कही हुई बात वहाँ दुहरायी और जो सत्कार के योग्य थे, उन श्रीराम का यथोचित रीति से भलीभाँति सत्कार करके वह उन्हें आश्रम में ले गया॥१५ १/२॥
प्रविवेश ततो रामः सीतया सह लक्ष्मणः॥१६॥
प्रशान्तहरिणाकीर्णमाश्रमं अवलोकयन्।
स तत्र ब्रह्मणः स्थानमग्नेः स्थानं तथैव च॥१७॥
उस समय श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता के साथ आश्रम में प्रवेश किया। वह आश्रम शान्तभाव से रहने वाले हरिणों से भरा हुआ था। आश्रम की शोभा देखते हुए उन्होंने वहाँ ब्रह्माजी का स्थान और अग्निदेव का स्थान देखा॥१६-१७॥
विष्णोः स्थानं महेन्द्रस्य स्थानं चैव विवस्वतः।
सोमस्थानं भगस्थानं स्थानं कौबेरमेव च॥१८॥
धातुर्विधातुः स्थानं च वायोः स्थानं तथैव च।
स्थानं च पाशहस्तस्य वरुणस्य महात्मनः॥१९॥
स्थानं तथैव गायत्र्या वसूनां स्थानमेव च।
स्थानं च नागराजस्य गरुडस्थानमेव च॥२०॥
कार्तिकेयस्य च स्थानं धर्मस्थानं च पश्यति।
फिर क्रमशः भगवान् विष्णु, महेन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, भग, कुबेर, धाता, विधाता, वायु, पाशधारी महात्मा वरुण, गायत्री, वसु, नागराज अनन्त, गरुड़, कार्तिकेय तथा धर्मराज के पृथक्-पृथक् स्थान का निरीक्षण किया॥१८-२० १/२॥
ततः शिष्यैः परिवृतो मुनिरप्यभिनिष्पतत्॥२१॥
तं ददर्शाग्रतो रामो मुनीनां दीप्ततेजसाम्।
अब्रवीद् वचनं वीरो लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥२२॥
इतने ही में मुनिवर अगस्त्य भी शिष्यों से घिरे हुए अग्निशाला से बाहर निकले। वीर श्रीराम ने मुनियों के आगे-आगे आते हुए उद्दीप्त तेजस्वी अगस्त्यजी का दर्शन किया और अपनी शोभा का विस्तार करने वाले लक्ष्मण से इस प्रकार कहा-॥२१-२२॥
बहिर्लक्ष्मण निष्क्रामत्यगस्त्यो भगवानृषिः।
औदार्येणावगच्छामि निधानं तपसामिमम्॥२३॥
‘लक्ष्मण! भगवान् अगस्त्य मुनि आश्रम से बाहर निकल रहे हैं। ये तपस्या के निधि हैं। इनके विशिष्ट तेज के आधिक्य से ही मुझे पता चलता है कि ये अगस्त्यजी हैं’॥२३॥
एवमुक्त्वा महाबाहुरगस्त्यं सूर्यवर्चसम्।
जग्राहापततस्तस्य पादौ च रघुनन्दनः॥२४॥
सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि अगस्त्य के विषय में ऐसा कहकर महाबाहु रघुनन्दन ने सामने से आते हुए उन मुनीश्वर के दोनों चरण पकड़ लिये॥२४॥
अभिवाद्य तु धर्मात्मा तस्थौ रामः कृताञ्जलिः।
सीतया सह वैदेह्या तदा रामः सलक्ष्मणः॥२५॥
जिनमें योगियों का मन रमण करता है अथवा जो भक्तों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं, वे धर्मात्मा श्रीराम उस समय विदेहकुमारी सीता और लक्ष्मण के साथ महर्षि के चरणों में प्रणाम करके हाथ जोड़कर खडे हो गये॥२५॥
प्रतिगृह्य च काकुत्स्थमर्चयित्वाऽऽसनोदकैः।
कुशलप्रश्नमुक्त्वा च आस्यतामिति सोऽब्रवीत्॥२६॥
महर्षि ने भगवान् श्रीराम को हृदय से लगाया और आसन तथा जल (पाद्य, अर्घ्य आदि) देकर उनका आतिथ्य-सत्कार किया। फिर कुशल-समाचार पूछकर उन्हें बैठने को कहा॥२६॥
अग्निं हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथीन् प्रतिपूज्य च।
वानप्रस्थेन धर्मेण स तेषां भोजनं ददौ॥२७॥
अगस्त्यजी ने पहले अग्नि में आहुति दी, फिर वानप्रस्थधर्म के अनुसार अर्घ्य दे अतिथियों का भलीभाँति पूजन करके उनके लिये भोजन दिया। २७॥
प्रथमं चोपविश्याथ धर्मज्ञो मुनिपुंगवः।
उवाच राममासीनं प्राञ्जलिं धर्मकोविदम्॥२८॥
अग्निं हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथिं प्रतिपूजयेत्।
अन्यथा खलु काकुत्स्थ तपस्वी समुदाचरन्।
दुःसाक्षीव परे लोके स्वानि मांसानि भक्षयेत्॥२९॥
धर्म के ज्ञाता मुनिवर अगस्त्यजी पहले स्वयं बैठे, फिर धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर आसन पर विराजमान हुए। इसके बाद महर्षि ने उनसे कहा —’काकुत्स्थ! वानप्रस्थ को चाहिये कि वह पहले अग्नि को आहुति दे। तदनन्तर अर्घ्य देकर अतिथि का पूजन करे। जो तपस्वी इसके विपरीत आचरण करता है, उसे झूठी गवाही देने वाले की भाँति परलोक में अपने ही शरीर का मांस खाना पड़ता है॥२८-२९॥
राजा सर्वस्य लोकस्य धर्मचारी महारथः।
पूजनीयश्च मान्यश्च भवान् प्राप्तः प्रियातिथिः॥३०॥
‘आप सम्पूर्ण लोक के राजा, महारथी और धर्म का आचरण करने वाले हैं तथा मेरे प्रिय अतिथि के रूप में इस आश्रम पर पधारे हैं, अतएव आप हमलोगों के माननीय एवं पूजनीय हैं’॥३०॥
एवमुक्त्वा फलैर्मूलैः पुष्पैश्चान्यैश्च राघवम्।
पूजयित्वा यथाकामं ततोऽगस्त्यस्तमब्रवीत्॥३१॥
ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य ने फल, मूल, फूल तथा अन्य उपकरणों से इच्छानुसार भगवान् श्रीराम का पूजन किया। तत्पश्चात् अगस्त्यजी उनसे इस प्रकार बोले-॥३१॥
इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम्।
वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा॥३२॥
अमोघः सूर्यसंकाशो ब्रह्मदत्तः शरोत्तमः।
दत्तौ मम महेन्द्रेण तूणी चाक्षय्यसायकौ॥३३॥
सम्पूर्णौ निशितैर्बाणैर्व्वलद्भिरिव पावकैः।
महाराजतकोशोऽयमसिर्हेमविभूषितः॥३४॥
‘पुरुषसिंह ! यह महान् दिव्य धनुष विश्वकर्माजी ने बनाया है। इसमें सुवर्ण और हीरे जड़े हैं। यह भगवान् विष्णु का दिया हुआ है तथा यह जो सूर्य के समान देदीप्यमान अमोघ उत्तम बाण है, ब्रह्माजी का दिया हुआ है। इनके सिवा इन्द्र ने ये दो तरकस दिये हैं, जो तीखे तथा प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी बाणों से सदा भरे रहते हैं। कभी खाली नहीं होते। साथ ही यह तलवार भी है जिसकी मूठ में सोना जड़ा हुआ है। इसकी म्यान भी सोने की ही बनी हुई है। ३२-३४॥
अनेन धनुषा राम हत्वा संख्ये महासुरान्।
आजहार श्रियं दीप्तां पुरा विष्णुर्दिवौकसाम्॥३५॥
तद्धनुस्तौ च तूणी च शरं खड्गं च मानद।
जयाय प्रतिगृह्णीष्व वज्र वज्रधरो यथा॥३६॥
‘श्रीराम! पूर्वकाल में भगवान् विष्णु ने इसी धनुष से युद्ध में बड़े-बड़े असुरों का संहार करके देवताओं की उद्दीप्त लक्ष्मी को उनके अधिकार से लौटाया था। मानद! आप यह धनुष, ये दोनों तरकस, ये बाण और यह तलवार (राक्षसों पर) विजय पाने के लिये ग्रहण कीजिये। ठीक उसी तरह, जैसे वज्रधारी इन्द्र वज्र ग्रहण करते हैं’॥३५-३६॥
एवमुक्त्वा महातेजाः समस्तं तद्ररायुधम्।
दत्त्वा रामाय भगवानगस्त्यः पुनरब्रवीत्॥३७॥
ऐसा कहकर महान् तेजस्वी अगस्त्य ने वे सभी श्रेष्ठ आयुध श्रीरामचन्द्रजी को सौंप दिये। तत्पश्चात् वे फिर बोले॥३७॥
सर्ग १३
राम प्रीतोऽस्मि भद्रं ते परितुष्टोऽस्मि लक्ष्मण।
अभिवादयितुं यन्मां प्राप्तौ स्थः सह सीतया॥१॥
‘श्रीराम! आपका कल्याण हो। मैं आप पर बहुत प्रसन्न हूँ। लक्ष्मण ! मैं तुम पर भी बहुत संतुष्ट हूँ।आप दोनों भाई मुझे प्रणाम करने के लिये जो सीता के साथ यहाँ तक आये, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥१॥
अध्वश्रमेण वां खेदो बाधते प्रचुरश्रमः।
व्यक्तमुत्कण्ठते वापि मैथिली जनकात्मजा॥२॥
‘रास्ता चलने के परिश्रम से आपलोगों को बहुत थकावट हुई है। इसके कारण जो कष्ट हुआ है, वह आप दोनों को पीड़ा दे रहा होगा। मिथिलेशकुमारी जानकी भी अपनी थकावट दूर करने के लिये अधिक उत्कण्ठित है, यह बात स्पष्ट ही जान पड़ती है॥२॥
एषा च सुकुमारी च खेदैश्च न विमानिता।
प्राज्यदोषं वनं प्राप्ता भर्तृस्नेहप्रचोदिता॥३॥
‘यह सुकुमारी है और इससे पहले इसे ऐसे दुःखों का सामना नहीं करना पड़ा है। वन में अनेक प्रकार के कष्ट होते हैं, फिर भी यह पतिप्रेम से प्रेरित होकर यहाँ आयी है॥३॥
यथैषा रमते राम इह सीता तथा कुरु।
दुष्करं कृतवत्येषा वने त्वामभिगच्छती॥४॥
‘श्रीराम! जिस प्रकार सीता का यहाँ मन लगे जैसे भी यह प्रसन्न रहे, वही कार्य आप करें। वन में आपके साथ आकर इसने दुष्कर कार्य किया है। ४॥
एषा हि प्रकृतिः स्त्रीणामासृष्टे रघुनन्दन।
समस्थमनुरज्यन्ते विषमस्थं त्यजन्ति च॥५॥
‘रघुनन्दन ! सृष्टिकाल से लेकर अबतक स्त्रियों का प्रायः यही स्वभाव रहता आया है कि यदि पति सम अवस्था में है अर्थात् धनधान्य से सम्पन्न, स्वस्थ एवं सुखी है, तब तो वे उसमें अनुराग रखती हैं, परंतु यदि वह विषम अवस्था में पड़ जाता है - दरिद्र एवं रोगी हो जाता है, तब उसे त्याग देती हैं॥५॥
शतहदानां लोलत्वं शस्त्राणां तीक्ष्णतां तथा।
गरुडानिलयोः शैघ्रयमनुगच्छन्ति योषितः॥६॥
‘स्त्रियाँ विद्युत् की चपलता, शस्त्रों की तीक्ष्णता तथा गरुड एवं वायु की तीव्र गति का अनुसरण करती
इयं तु भवतो भार्या दोषैरेतैर्विवर्जिता।
श्लाघ्या च व्यपदेश्या च यथा देवीष्वरुन्धती॥७॥
‘आपकी यह धर्मपत्नी सीता इन सब दोषों से रहित है। स्पृहणीय एवं पतिव्रताओं में उसी तरह अग्रगण्य है, जैसे देवियों में अरुन्धती॥७॥
अलंकृतोऽयं देशश्च यत्र सौमित्रिणा सह।
वैदेह्या चानया राम वत्स्यसि त्वमरिंदम॥८॥
‘शत्रुदमन श्रीराम! आज से इस देश की शोभा बढ़ गयी, जहाँ सुमित्राकुमार लक्ष्मण और विदेहनन्दिनी सीता के साथ आप निवास करेंगे’॥८॥
एवमुक्तस्तु मुनिना राघवः संयताञ्जलिः।
उवाच प्रश्रितं वाक्यमृषिं दीप्तमिवानलम्॥९॥
मुनि के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने प्रज्वलितअग्नि के समान तेजस्वी उन महर्षि से दोनों हाथ जोड़कर यह विनययुक्त बात कही-॥९॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगवः।
गुणैः सभ्रातृभार्यस्य गुरुर्नः परितुष्यति॥१०॥
‘भाई और पत्नीसहित जिसके अर्थात् मेरे गुणों से हमारे गुरुदेव मुनिवर अगस्त्यजी यदि संतुष्ट हो रहे हैं, तब तो मैं धन्य हूँ, मुझपर मुनीश्वर का महान् अनुग्रह है।
किं तु व्यादिश मे देशं सोदकं बहुकाननम्।
यत्राश्रमपदं कृत्वा वसेयं निरतः सुखम्॥११॥
‘परंतु मुने! अब आप मुझे ऐसा कोई स्थान बताइये जहाँ बहुत-से वन हों, जल की भी सुविधा हो तथा जहाँ आश्रम बनाकर मैं सुखपूर्वक सानन्द निवास कर सकूँ’॥११॥
ततोऽब्रवीन्मुनिश्रेष्ठः श्रुत्वा रामस्य भाषितम्।
ध्यात्वा मुहूर्तं धर्मात्मा ततोवाच वचः शुभम्॥१२॥
श्रीराम का यह कथन सुनकर मुनिश्रेष्ठ धर्मात्मा अगस्त्य ने दो घड़ी तक कुछ सोच-विचार किया। तदनन्तर वे यह शुभ वचन बोले-॥१२॥
इतो द्वियोजने तात बहुमूलफलोदकः।
देशो बहुमृगः श्रीमान् पञ्चवट्यभिविश्रुतः॥१३॥
‘तात! यहाँ से दो योजन की दूरी पर पञ्चवटी नाम से विख्यात एक बहुत ही सुन्दर स्थान है, जहाँ बहुत-से मृग रहते हैं तथा फल-मूल और जल की अधिक सुविधा है॥१३॥
तत्र गत्वाऽऽश्रमपदं कृत्वा सौमित्रिणा सह।
रमस्व त्वं पितुर्वाक्यं यथोक्तमनुपालयन्॥१४॥
‘वहीं जाकर लक्ष्मण के साथ आप आश्रम बनाइये और पिता की यथोक्त आज्ञा का पालन करते हुए वहाँ सुखपूर्वक निवास कीजिये॥१४॥
विदितो ह्येष वृत्तान्तो मम सर्वस्तवानघ।
तपसश्च प्रभावेण स्नेहाद् दशरथस्य च॥१५॥
‘अनघ! आपका और राजा दशरथ का यह सारा वृत्तान्त मुझे अपनी तपस्या के प्रभाव से तथा आपके प्रति स्नेह होने के कारण अच्छी तरह विदित है॥१५॥
हृदयस्थं च ते च्छन्दो विज्ञातं तपसा मया।
इह वासं प्रतिज्ञाय मया सह तपोवने॥१६॥
‘आपने तपोवन में मेरे साथ रहने की और वनवास का शेष समय यहीं बिताने की अभिलाषा प्रकट करके भी जो यहाँ से अन्यत्र रहने योग्य स्थान के विषय में मुझसे पूछा है, इसमें आपका हार्दिक अभिप्राय क्या है ? यह मैंने अपने तपोबल से जान लिया है (आपने ऋषियों की रक्षा के लिये राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञा का निर्वाह अन्यत्रा रहने से ही हो सकता है; क्योंकि यहाँ राक्षसों का आना-जाना नहीं होता)॥१६॥
अतश्च त्वामहं ब्रूमि गच्छ पञ्चवटीमिति।
स हि रम्यो वनोद्देशो मैथिली तत्र रंस्यते॥१७॥
‘इसीलिये मैं आपसे कहता हूँ कि पञ्चवटी में जाइये। वहाँ की वनस्थली बड़ी ही रमणीय है। वहाँ मिथिलेशकुमारी सीता आनन्दपूर्वक सब ओर विचरेंगी॥
स देशः श्लाघनीयश्च नातिदूरे च राघव।
गोदावर्याः समीपे च मैथिली तत्र रंस्यते॥१८॥
‘रघुनन्दन ! वह स्पृहणीय स्थान यहाँ से अधिक दूर नहीं है। गोदावरी के पास (उसी के तट पर) है, अतः मैथिली का मन वहाँ खूब लगेगा॥१८॥
प्राज्यमूलफलैश्चैव नानाद्विजगणैर्युतः।
विविक्तश्च महाबाहो पुण्यो रम्यस्तथैव च॥१९॥
‘महाबाहो! वह स्थान प्रचुर फल-मूलों से सम्पन्न, भाँति-भाँति के विहङ्गमों से सेवित, एकान्त, पवित्र और रमणीय है॥१९॥
भवानपि सदाचारः शक्तश्च परिरक्षणे।
अपि चात्र वसन् राम तापसान् पालयिष्यसि॥२०॥
‘श्रीराम! आप भी सदाचारी और ऋषियों की रक्षा करने में समर्थ हैं। अतः वहाँ रहकर तपस्वी मुनियों का पालन कीजियेगा॥२०॥
एतदालक्ष्यते वीर मधूकानां महावनम्।
उत्तरेणास्य गन्तव्यं न्यग्रोधमपि गच्छता॥२१॥
ततः स्थलमुपारुह्य पर्वतस्याविदूरतः।
ख्यातः पञ्चवटीत्येव नित्यपुष्पितकाननः॥२२॥
‘वीर! यह जो महुओं का विशाल वन दिखायी देता है, इसके उत्तर से होकर जाना चाहिये। उस मार्ग से जाते हुए आपको आगे एक बरगद का वृक्ष मिलेगा।उससे आगे कुछ दूर तक ऊँचा मैदान है, उसे पार करने के बाद एक पर्वत दिखायी देगा। उस पर्वत से थोड़ी ही दूर पर पञ्चवटी नाम से प्रसिद्ध सुन्दर वन है, जो सदा फूलों से सुशोभित रहता है’ ॥२१-२२॥
अगस्त्येनैवमुक्तस्तु रामः सौमित्रिणा सह।
सत्कृत्यामन्त्रयामास तमृषि सत्यवादिनम्॥२३॥
महर्षि अगस्त्य के ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने उनका सत्कार करके उन सत्यवादी महर्षि से वहाँ जाने की आज्ञा माँगी॥२३॥
तौ तु तेनाभ्यनुज्ञातौ कृतपादाभिवन्दनौ।
तमाश्रमं पञ्चवटी जग्मतुः सह सीतया॥२४॥
उनकी आज्ञा पाकर उन दोनों भाइयों ने उनके चरणों की वन्दना की और सीता के साथ वे पञ्चवटी नामक आश्रम की ओर चले॥२४॥
गृहीतचापौ तु नराधिपात्मजौ विषक्ततूणी समरेष्वकातरौ।
यथोपदिष्टेन पथा महर्षिणा प्रजग्मतुः पञ्चवटीं समाहितौ॥२५॥
राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण ने पीठ पर तरकस बाँध हाथ में धनुष ले लिये। वे दोनों भाई समराङ्गणों में कातरता दिखाने वाले नहीं थे। वे दोनों बन्धु महर्षि के बताये हुए मार्ग से बड़ी सावधानी के साथ पञ्चवटी की ओर प्रस्थित हुए॥२५॥
सर्ग १४
अथ पञ्चवटीं गच्छन्नन्तरा रघुनन्दनः।
आससाद महाकायं गृधं भीमपराक्रमम्॥१॥
पञ्चवटी जाते समय बीच में श्रीरामचन्द्रजी को एक विशालकाय गृध्र मिला, जो भयंकर पराक्रम प्रकट करने वाला था॥१॥
तं दृष्ट्वा तौ महाभागौ वनस्थं रामलक्ष्मणौ।
मेनाते राक्षसं पक्षिं ब्रवाणौ को भवानिति॥२॥
वन में बैठे हुए उस विशाल पक्षी को देखकर महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण ने उसे राक्षस ही समझा और पूछा - ’आप कौन हैं?’॥२॥
ततो मधुरया वाचा सौम्यया प्रीणयन्निव।
उवाच वत्स मां विद्धि वयस्यं पितुरात्मनः॥३॥
तब उस पक्षी ने बड़ी मधुर और कोमल वाणी में उन्हें प्रसन्न करते हुए-से कहा—’बेटा! मुझे अपने पिता का मित्र समझो’॥३॥
स तं पितृसखं मत्वा पूजयामास राघवः।
स तस्य कुलमव्यग्रमथ पप्रच्छ नाम च॥४॥
पिताका मित्र जानकर श्रीरामचन्द्रजी ने गृध्र का आदर किया और शान्तभाव से उसका कुल एवं नाम पूछा॥४॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा कुलमात्मानमेव च।
आचचक्षे द्विजस्तस्मै सर्वभूतसमुद्भवम्॥५॥
श्रीराम का यह प्रश्न सुनकर उस पक्षी ने उन्हें अपने कुल और नाम का परिचय देते हुए समस्त प्राणियों की उत्पत्तिका क्रम ही बताना आरम्भ किया॥५॥
पूर्वकाले महाबाहो ये प्रजापतयोऽभवन्।
तान् मे निगदतः सर्वानादितः शृणु राघव॥६॥
‘महाबाहु रघुनन्दन! पूर्वकाल में जो-जो प्रजापति हो चुके हैं, उन सबका आदि से ही वर्णन करता हूँ, सुनो॥६॥
कर्दमः प्रथमस्तेषां विकृतस्तदनन्तरम्।
शेषश्च संश्रयश्चैव बहुपुत्रश्च वीर्यवान्॥७॥
‘उन प्रजापतियों में सबसे प्रथम कर्दम हुए। तदनन्तर दूसरे प्रजापति का नाम विकृत हुआ, तीसरे शेष, चौथे संश्रय और पाँचवें प्रजापति पराक्रमी बहुपुत्र हुए॥७॥
स्थाणुर्मरीचरत्रिश्च क्रतुश्चैव महाबलः।
पुलस्त्यश्चाङ्गिराश्चैव प्रचेताः पुलहस्तथा॥८॥
‘छठे स्थाणु, सातवें मरीचि, आठवें अत्रि, नवें महान् शक्तिशाली क्रतु, दसवें पुलस्त्य, ग्यारहवें अङ्गिरा, बारहवें प्रचेता (वरुण) और तेरहवें प्रजापति पुलह हुए॥८॥
दक्षो विवस्वानपरोऽरिष्टनेमिश्च राघव।
कश्यपश्च महातेजास्तेषामासीच्च पश्चिमः॥९॥
‘चौदहवें दक्ष, पंद्रहवें विवस्वान्, सोलहवें अरिष्टनेमि और सत्रहवें प्रजापति महातेजस्वी कश्यप हुए। रघुनन्दन ! यह कश्यपजी अन्तिम प्रजापति कहे गये हैं॥९॥
प्रजापतेस्तु दक्षस्य बभूवुरिति विश्रुताः।
षष्टिर्दुहितरो राम यशस्विन्यो महायशः॥१०॥
‘महायशस्वी श्रीराम! प्रजापति दक्ष के साठ यशस्विनी कन्याएँ हुईं, जो बहुत ही विख्यात थीं॥१०॥
कश्यपः प्रतिजग्राह तासामष्टौ सुमध्यमाः।
अदितिं च दितिं चैव दनूमपि च कालकाम्॥११॥
ताम्रां क्रोधवशां चैव मनुं चाप्यनलामपि।
उनमें से आठ सुन्दरी कन्याओं को प्रजापति कश्यप ने पत्नीरूप में ग्रहण किया। जिनके नाम इस प्रकार हैं- अदिति, दिति, दनु, काल का, ताम्रा, क्रोधवशा, मनु और अनला॥११ १/२॥
तास्तु कन्यास्ततः प्रीतः कश्यपः पुनरब्रवीत्॥
पुत्रांस्त्रैलोक्यभर्तृन् वै जनयिष्यथ मत्समान्।
तदनन्तर उन कन्याओं से प्रसन्न होकर कश्यपजी ने फिर उनसे कहा—’देवियो! तुमलोग ऐसे पुत्रों को जन्म दोगी, जो तीनों लोकों का भरण-पोषण करने में समर्थ और मेरे समान तेजस्वी होंगे’॥१२ १/२॥
अदितिस्तन्मना राम दितिश्च दनुरेव च॥१३॥
कालका च महाबाहो शेषास्त्वमनसोऽभवन्।
‘महाबाहु श्रीराम! इनमें से अदिति, दिति, दनु और काल का-इन चारों ने कश्यपजी की कही हुई बात को मन से ग्रहण किया; परंतु शेष स्त्रियों ने उधर मन नहीं लगाया। उनके मन में वैसा मनोरथ नहीं उत्पन्न हुआ॥१३ १/२॥
अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिंदम॥१४॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च परंतप।
‘शत्रुओं का दमन करने वाले रघुवीर! अदिति के गर्भ से तैंतीस देवता उत्पन्न हुए-बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार शत्रुओं को ताप देने वाले श्रीराम! ये ही तैंतीस देवता हैं॥१४ १/२॥
दितिस्त्वजनयत् पुत्रान् दैत्यांस्तात यशस्विनः॥१५॥
तेषामियं वसुमती पुराऽऽसीत् सवनार्णवा।
‘तात! दितिने दैत्य नाम से प्रसिद्ध यशस्वी पुत्रों को जन्म दिया। पूर्वकाल में वन और समुद्रोंसहित सारी पृथिवी उन्हीं के अधिकार में थी॥१५ १/२॥
दनुस्त्वजनयत् पुत्रमश्वग्रीवमरिंदम॥१६॥
नरकं कालकं चैव कालकापि व्यजायत।
‘शत्रुदमन! दनुने अश्वग्रीव नामक पुत्र को उत्पन्न किया और कालका ने नरक एवं कालक नामक दो पुत्रों को जन्म दिया॥१६ १/२॥
क्रौञ्ची भासी तथा श्येनीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम्॥१७॥
ताम्रा तु सुषुवे कन्याः पञ्चैता लोकविश्रुताः।
‘ताम्राने क्रौञ्ची, भासी, श्येनी, धृतराष्ट्री तथा शुकी -इन पाँच विश्वविख्यात कन्याओं को उत्पन्न किया॥१७ १/२॥
उलूकाञ्जनयत् क्रौञ्ची भासी भासान व्यजायत॥१८॥
श्येनी श्येनांश्च गृध्रांश्च व्यजायत सुतेजसः।
धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसाश्च सर्वशः॥१९॥
‘इनमें से क्रौञ्ची ने उल्लुओं को, भासी ने भास नामक पक्षियों को, श्येनी ने परम तेजस्वी श्येनों (बाजों) और गीधों को तथा धृतराष्ट्री ने सब प्रकार के हंसों और कलहंसों को जन्म दिया॥१८-१९॥
चक्रवाकांश्च भद्रं ते विजज्ञे सापि भामिनी।
शुकी नतां विजज्ञे तु नतायां विनता सुता॥२०॥
‘श्रीराम! आपका कल्याण हो, उसी भामिनी धृतराष्ट्री ने चक्रवाक नामक पक्षियों को भी उत्पन्न किया था। ताम्रा की सबसे छोटी पुत्री शुकी ने नता नामवाली कन्या को जन्म दिया। नता से विनता नामवाली पुत्री उत्पन्न हुई।॥२०॥
दश क्रोधवशा राम विजज्ञेऽप्यात्मसंभवाः।
मृगीं च मृगमन्दां च हरी भद्रमदामपि॥२१॥
मातङ्गीमथ शार्दूलीं श्वेतां च सुरभी तथा।
सर्वलक्षणसम्पन्नां सुरसां कद्रुकामपि॥२२॥
‘श्रीराम ! क्रोधवशा ने अपने पेट से दस कन्याओं को जन्म दिया। जिनके नाम हैं - मृगी, मृगमन्दा, हरी,भद्रमदा, मातङ्गी, शार्दूली, श्वेता, सुरभी, सर्वलक्षणसम्पन्ना सुरसा और कद्रुका॥२१-२२॥
अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम।
ऋक्षाश्च मृगमन्दायाः सृमराश्चमरास्तथा॥२३॥
‘नरेशों में श्रेष्ठ श्रीराम! मृगी की संतान सारे मृग हैं और मृगमन्दा के ऋक्ष, सृमर और चमर॥२३॥
ततस्त्विरावतीं नाम जज्ञे भद्रमदा सुताम्।
तस्यास्त्वैरावतः पुत्रो लोकनाथो महागजः॥२४॥
‘भद्रमदा ने इरावती नामक कन्या को जन्म दिया, जिसका पुत्र है ऐरावत नामक महान् गजराज, जो समस्त लोकों को अभीष्ट है॥२४॥
हर्याश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तपस्विनः।
गोलाङ्गलाश्च शार्दूली व्याघ्रांश्चाजनयत् सुतान्॥२५॥
‘हरी की संतानें हरि (सिंह) तथा तपस्वी (विचारशील) वानर तथा गोलांगूल (लंगूर) हैं। क्रोधवशा की पुत्री शार्दूली ने व्याघ्र नामक पुत्र उत्पन्न किये॥२५॥
मातङ्ग्यास्त्वथ मातङ्गा अपत्यं मनुजर्षभ।
दिशागजं तु काकुत्स्थ श्वेता व्यजनयत् सुतम्॥२६॥
‘नरश्रेष्ठ! मातङ्गीकी संतानें मातङ्ग (हाथी) हैं। काकुत्स्थ! श्वेता ने अपने पुत्र के रूपमें एक दिग्गज को जन्म दिया॥२६॥
ततो दुहितरौ राम सुरभिट्टै व्यजायत।
रोहिणी नाम भद्रं ते गन्धर्वी च यशस्विनीम्॥२७॥
‘श्रीराम! आपका भला हो। क्रोधवशा की पुत्री सुरभी देवी ने दो कन्याएँ उत्पन्न की-रोहिणी और यशस्विनी गन्धर्वी॥२७॥
रोहिण्यजनयद् गावो गन्धर्वी वाजिनः सुतान्।
सुरसाजनयन्नागान् राम कद्रूश्च पन्नगान्॥२८॥
‘रोहिणी ने गौओं को जन्म दिया और गन्धर्वी ने घोड़ों को ही पुत्ररूप में प्रकट किया। श्रीराम! सुरसा ने नागों को और कद्रूने पन्नगों को जन्म दिया॥२८॥
मनुर्मनुष्याञ्जनयत् कश्यपस्य महात्मनः।
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्च मनुजर्षभ॥२९॥
‘नरश्रेष्ठ! महात्मा कश्यप की पत्नी मनु ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जातिवाले मनुष्यों को जन्म दिया॥२९॥
मुखतो ब्राह्मणा जाता उरसः क्षत्रियास्तथा।
ऊरुभ्यां जज्ञिरे वैश्याः पद्भ्यां शूद्रा इति श्रुतिः॥३०॥
‘मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए और हृदय से क्षत्रिय। दोनों ऊरुओं से वैश्यों का जन्म हुआ और दोनों पैरों से शूद्रों का—ऐसी प्रसिद्धि है॥३०॥
सर्वान् पुण्यफलान् वृक्षाननलापि व्यजायत।
विनता च शुकीपौत्री कद्रूश्च सुरसास्वसा॥३१॥
‘(कश्यपपत्नी) अनला ने पवित्र फलवाले समस्त वृक्षों को जन्म दिया। कश्यपपत्नी ताम्रा की पुत्री जो शुकी थी, उसकी पौत्री विनता थी तथा कद्रू सुरसा की बहिन (एवं क्रोधवशा की पुत्री) कही गयी है॥३१॥
कद्रूर्नागसहस्रं तु विजज्ञे धरणीधरान्।
द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु गरुडोऽरुण एव च॥३२॥
‘इनमें से कद्रू ने एक सहस्र नागों को उत्पन्न किया, जो इस पृथ्वी को धारण करने वाले हैं तथा विनता के दो पुत्र हुए–गरुड़ और अरुण॥३२॥
तस्माज्जातोऽहमरुणात् सम्पातिश्च ममाग्रजः।
जटायुरिति मां विद्धि श्येनीपुत्रमरिंदम॥३३॥
‘उन्हीं विनतानन्दन अरुण से मैं तथा मेरे बड़े भाई सम्पाति उत्पन्न हुए। शत्रुदमन रघुवीर! आप मेरा नाम जटायु समझें। मैं श्येनी का पुत्र हूँ (ताम्रा की पुत्री जो श्येनी बतायी गयी है, उसी की परम्परा में उत्पन्न हुई एक श्येनी मेरी माता हुई)॥३३॥
सोऽहं वाससहायस्ते भविष्यामि यदीच्छसि।
इदं दुर्गं हि कान्तारं मृगराक्षससेवितम्।
सीतां च तात रक्षिष्ये त्वयि याते सलक्ष्मणे॥३४॥
‘तात! यदि आप चाहें तो मैं यहाँ आपके निवास में सहायक होऊँगा। यह दुर्गम वन मृगों तथा राक्षसों से सेवित है। लक्ष्मणसहित आप यदि अपनी पर्णशाला से कभी बाहर चले जायँ तो उस अवसर पर मैं देवी सीता की रक्षा करूँगा’॥३४॥
जटायुषं तु प्रतिपूज्य राघवो मुदा परिष्वज्य च संनतोऽभवत् ।
पितुर्हि शुश्राव सखित्वमात्मवा जटायुषा संकथितं पुनः पुनः॥३५॥
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने जटायु का बड़ा सम्मान किया और प्रसन्नतापूर्वक उनके गले लगकर वे उनके सामने नतमस्तक हो गये। फिर पिता के साथ जिस प्रकार उनकी मित्रता हुई थी, वह प्रसङ्ग मनस्वी श्रीराम ने जटायु के मुख से बारंबार सुना॥३५॥
स तत्र सीतां परिदाय मैथिली सहैव तेनातिबलेन पक्षिणा।
जगाम तां पञ्चवटीं सलक्ष्मणो रिपून दिधक्षन् शलभानिवानलः॥३६॥
तत्पश्चात् वे मिथिलेशकुमारी सीता को उनके संरक्षण में सौंपकर लक्ष्मण और उन अत्यन्त बलशाली पक्षी जटायु के साथ ही पञ्चवटी की ओर ही चल दिये। श्रीरामचन्द्रजी मुनिद्रोही राक्षसों को शत्रु समझकर उन्हें उसी प्रकार दग्ध कर डालना चाहते थे, जैसे आग पतिङ्गों को जलाकर भस्म कर देती है। ३६॥
सर्ग १५
ततः पञ्चवटीं गत्वा नानाव्यालमृगायुताम्।
उवाच लक्ष्मणं रामो भ्रातरं दीप्ततेजसम्॥१॥
नाना प्रकार के सर्पो, हिंसक जन्तुओं और मृगों से भरी हुई पञ्चवटी में पहुँचकर श्रीराम ने उद्दीप्त तेजवाले अपने भाई लक्ष्मण से कहा-॥१॥
आगताः स्म यथोद्दिष्टं यं देशं मुनिरब्रवीत्।
अयं पञ्चवटीदेशः सौम्य पुष्पितकाननः॥२॥
‘सौम्य! मुनिवर अगस्त्य ने हमें जिस स्थान का परिचय दिया था, उनके तथाकथित स्थान में हमलोग आ पहुँचे। यही पञ्चवटी का प्रदेश है। यहाँ का वनप्रान्त पुष्पों से कैसी शोभा पा रहा है॥२॥
सर्वतश्चार्यतां दृष्टिः कानने निपुणो ह्यसि।
आश्रमः कतरस्मिन् नो देशे भवति सम्मतः॥३॥
‘लक्ष्मण! तुम इस वन में चारों ओर दृष्टि डालो; क्योंकि इस कार्य में निपुण हो। देखकर यह निश्चय करो कि किस स्थान पर आश्रम बनाना हमारे लिये अच्छा होगा॥३॥
रमते यत्र वैदेही त्वमहं चैव लक्ष्मण।
तादृशो दृश्यतां देशः संनिकृष्टजलाशयः॥४॥
वनरामण्यकं यत्र जलरामण्यकं तथा।
संनिकृष्टं च यस्मिंस्तु समित्पुष्पकुशोदकम्॥५॥
“लक्ष्मण! तुम किसी ऐसे स्थान को ढूँढ़ निकालो, जहाँ से जलाशय निकट हो, जहाँ विदेहकुमारी सीता का मन लगे, जहाँ तुम और हम भी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें, जहाँ वन और जल दोनों का रमणीय दृश्य हो तथा जिस स्थान के आस-पास ही समिधा, फूल, कुश और जल मिलने की सुविधा हो’॥४-५॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः संयताञ्जलिः।
सीतासमक्षं काकुत्स्थमिदं वचनमब्रवीत्॥६॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर सीता के सामने ही उन ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम से इस प्रकार बोले-॥६॥
परवानस्मि काकुत्स्थ त्वयि वर्षशतं स्थिते।
स्वयं तु रुचिरे देशे क्रियतामिति मां वद॥७॥
‘काकुत्स्थ! आपके रहते हुए मैं सदा पराधीन ही हूँ। मैं सैकड़ों या अनन्त वर्षों तक आपकी आज्ञा के अधीन ही रहना चाहता हूँ; अतः आप स्वयं ही देखकर जो स्थान सुन्दर जान पड़े, वहाँ आश्रम बनाने के लिये मुझे आज्ञा दें-मुझसे कहें कि तुम अमुक स्थान पर आश्रम बनाओ’॥७॥
सुप्रीतस्तेन वाक्येन लक्ष्मणस्य महाद्युतिः।
विमृशन् रोचयामास देशं सर्वगुणान्वितम्॥८॥
स तं रुचिरमाक्रम्य देशमाश्रमकर्मणि।।
हस्ते गृहीत्वा हस्तेन रामः सौमित्रिमब्रवीत्॥९॥
लक्ष्मण के इस वचन से अत्यन्त तेजस्वी भगवान् श्रीराम को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने स्वयं ही सोच-विचारकर एक ऐसा स्थान पसंद किया, जो सब प्रकार के उत्तम गुणों से सम्पन्न और आश्रम बनाने के योग्य था। उस सुन्दर स्थान पर आकर श्रीराम ने लक्ष्मण का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा –॥८-९॥
अयं देशः समः श्रीमान् पुष्पितैस्तरुभिर्वृतः।
इहाश्रमपदं रम्यं यथावत् कर्तुमर्हसि॥१०॥
‘सुमित्रानन्दन! यह स्थान समतल और सुन्दर है तथा फूले हुए वृक्षों से घिरा है। तुम्हें इसी स्थान पर यथोचित रूप से एक रमणीय आश्रम का निर्माण करना चाहिये॥१०॥
इयमादित्यसंकाशैः पद्यैः सुरभिगन्धिभिः।
अदूरे दृश्यते रम्या पद्मिनी पद्मशोभिता॥११॥
‘यह पास ही सूर्य के समान उज्ज्वल कान्तिवाले मनोरम गन्धयुक्त कमलों से रमणीय प्रतीत होने वाली तथा पद्मों की शोभा से सम्पन्न पुष्करिणी दिखायी देती है॥११॥
यथाख्यातमगस्त्येन मुनिना भावितात्मना।
इयं गोदावरी रम्या पुष्पितैस्तरुभिर्वृता॥१२॥
‘पवित्र अन्तःकरण वाले अगस्त्य मुनि ने जिसके विषय में कहा था, वह विकसित वृक्षावलियों से घिरी हई रमणीय गोदावरी नदी यही है॥१२॥
हंसकारण्डवाकीर्णा चक्रवाकोपशोभिता।
नातिदूरे न चासन्ने मृगयूथनिपीडिता॥१३॥
‘इसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी विचर रहे हैं। चकवे इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं तथा पानी पीने के लिये आये हुए मृगों के झुंड इसके तट पर छाये रहते हैं। यह नदी इस स्थान से न तो अधिक दूर है और न अत्यन्त निकट ही॥१३॥
मयूरनादिता रम्याः प्रांशवो बहुकन्दराः।
दृश्यन्ते गिरयः सौम्य फुल्लैस्तरुभिरावृताः॥१४॥
‘सौम्य! यहाँ बहुत-सी कन्दराओं से युक्त ऊँचे-ऊँचे पर्वत दिखायी दे रहे हैं, जहाँ मयूरों की मीठी बोली गूंज रही है। ये रमणीय पर्वत खिले हुए वृक्षों से व्याप्त हैं॥१४॥
सौवर्णै राजतैस्तानैर्देशे देशे तथा शुभैः।
गवाक्षिता इवाभान्ति गजाः परमभक्तिभिः॥१५॥
‘स्थान-स्थान पर सोने, चाँदी तथा ताँबे के समान रंगवाले सुन्दर गैरिक धातुओं से उपलक्षित ये पर्वत ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो झरोखे के आकार में की गयी नीले, पीले और सफेद आदि रंगों की उत्तम शृङ्गाररचनाओं से अलंकृत हाथी शोभा पा रहे हों॥१५॥
सालैस्तालैस्तमालैश्च खजूरैः पनसैर्दुमैः।
नीवारैस्तिनिशैश्चैव पुन्नागैश्चोपशोभिताः॥१६॥
चूतैरशोकैस्तिलकैः केतकैरपि चम्पकैः।
पुष्पगुल्मलतोपेतैस्तैस्तैस्तरुभिरावृताः॥१७॥
स्यन्दनैश्चन्दनैर्नीपैः पर्णासैर्लकुचैरपि।
धवाश्वकर्णखदिरैः शमीकिंशुकपाटलैः॥१८॥
पुष्पों, गुल्मों तथा लता-वल्लरियों से युक्त साल, ताल, तमाल, खजूर, कटहल, जलकदम्ब, तिनिश, पुनाग, आम,अशोक, तिलक, केवड़ा, चम्पा, स्यन्दन, चन्दन, कदम्ब, पर्णास, लकुच, धव, अश्वकर्ण, खैर, शमी, पलाश और पाटल (पाडर) आदि वृक्षों से घिरे हुए ये पर्वत बड़ी शोभा पा रहे हैं। १६–१८॥
इदं पुण्यमिदं रम्यमिदं बहुमृगद्विजम्।
इह वत्स्याम सौमित्रे सार्धमेतेन पक्षिणा॥१९॥
‘सुमित्रानन्दन! यह बहुत ही पवित्र और बड़ा रमणीय स्थान है। यहाँ बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते हैं। हमलोग भी यहीं इन पक्षिराज जटायु के साथ रहेंगे’॥१९॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः परवीरहा।
अचिरेणाश्रमं भ्रातुश्चकार सुमहाबलः॥२०॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले महाबली लक्ष्मण ने भाई के लिये शीघ्र ही आश्रम बनाकर तैयार किया॥२०॥
पर्णशालां सुविपुलां तत्र संघातमृत्तिकाम्।
सुस्तम्भां मस्करैर्दीधैः कृतवंशां सुशोभनाम्॥२१॥
शमीशाखाभिरास्तीर्य दृढपाशावपाशिताम्।
कशकाशशरैः पर्णैः सुपरिच्छादितां तथा॥२२॥
समीकृततलां रम्यां चकार सुमहाबलः।
निवासं राघवस्यार्थे प्रेक्षणीयमनुत्तमम्॥२३॥
वह आश्रम एक अत्यन्त विस्तृत पर्णशाला के रूप में बनाया गया था। महाबली लक्ष्मण ने पहले वहाँ मिट्टी एकत्र करके दीवार खड़ी की, फिर उसमें सुन्दर एवं सुदृढ़ खम्भे लगाये। खम्भों के ऊपर बड़े-बड़े बाँस तिरछे करके रखे। बाँसों के रख दिये जाने पर वह कुटी बड़ी सुन्दर दिखायी देने लगी। फिर उन बाँसों पर उन्होंने शमीवृक्ष की शाखाएँ फैला दीं और उन्हें मजबूत रस्सियों से कसकर बाँध दिया। – इसके बाद ऊपर से कुश, कास, सरकंडे और पत्ते बिछाकर उस पर्णशाला को भलीभाँति छा दिया तथा नीचे की भूमि को बराबर करके उस कुटी को बड़ा रमणीय बना दिया। इस प्रकार लक्ष्मण ने श्रीरामचन्द्रजी के लिये परम उत्तम निवासगृह बना दिया, जो देखने ही योग्य था॥२१–२३॥
स गत्वा लक्ष्मणः श्रीमान् नदी गोदावरी तदा।
स्नात्वा पद्मानि चादाय सफलः पुनरागतः॥२४॥
उसे तैयार करके श्रीमान् लक्ष्मणने गोदावरीनदीके तटपर जाकर तत्काल उसमें स्नान किया और कमलके फूल तथा फल लेकर वे फिर वहीं लौट आये॥२४॥
ततः पुष्पबलिं कृत्वा शान्तिं च स यथाविधि।
दर्शयामास रामाय तदाश्रमपदं कृतम्॥२५॥
तदनन्तर शास्त्रीय विधि के अनुसार देवताओं के लिये फूलों की बलि (उपहारसामग्री) अर्पित की तथावास्तुशान्ति करके उन्होंने अपना बनाया हुआ आश्रम श्रीरामचन्द्रजी को दिखाया॥२५॥
स तं दृष्ट्वा कृतं सौम्यमाश्रमं सह सीतया।
राघवः पर्णशालायां हर्षमाहारयत् परम्॥२६॥
भगवान् श्रीराम सीता के साथ उस नये बने हुए सुन्दर आश्रम को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और कुछ कालतक उसके भीतर खड़े रहे॥२६॥
सुसंहृष्टः परिष्वज्य बाहुभ्यां लक्ष्मणं तदा।
अतिस्निग्धं च गाढं च वचनं चेदमब्रवीत्॥२७॥
तत्पश्चात् अत्यन्त हर्ष में भरकर उन्होंने दोनों भुजाओं से लक्ष्मण को कसकर हृदय से लगा लिया और बड़े स्नेह के साथ यह बात कही-॥२७॥
प्रीतोऽस्मि ते महत् कर्म त्वया कृतमिदं प्रभो।
प्रदेयो यन्निमित्तं ते परिष्वङ्गो मया कृतः॥२८॥
‘सामर्थ्यशाली लक्ष्मण ! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने यह महान् कार्य किया है। उसके लिये और कोई समुचित पुरस्कार न होने से मैंने तुम्हें गाढ़ आलिङ्गन प्रदान किया है॥२८॥
भावज्ञेन कृतज्ञेन धर्मज्ञेन च लक्ष्मण।
त्वया पुत्रेण धर्मात्मा न संवृत्तः पिता मम॥२९॥
‘लक्ष्मण! तुम मेरे मनोभाव को तत्काल समझ लेने वाले, कृतज्ञ और धर्मज्ञ हो। तुम-जैसे पुत्र के कारण मेरे धर्मात्मा पिता अभी मरे नहीं हैं-तुम्हारे रूप में वे अब भी जीवित ही हैं’।॥२९॥
एवं लक्ष्मणमुक्त्वा तु राघवो लक्ष्मिवर्धनः।
तस्मिन् देशे बहुफले न्यवसत् स सुखं सुखी॥३०॥
लक्ष्मण से ऐसा कहकर अपनी शोभा का विस्तार करने वाले सुखी श्रीरामचन्द्रजी प्रचुर फलों से सम्पन्न उस पञ्चवटी-प्रदेश में सबके साथ सुखपूर्वक रहने लगे॥३०॥
कञ्चित् कालं स धर्मात्मा सीतया लक्ष्मणेन च।
अन्वास्यमानो न्यवसत् स्वर्गलोके यथामरः॥३१॥
सीता और लक्ष्मण से सेवित हो धर्मात्मा श्रीराम कुछ काल तक वहाँ उसी प्रकार रहे, जैसे स्वर्गलोक में देवता निवास करते हैं।॥३१॥
सर्ग १६
वसतस्तस्य तु सुखं राघवस्य महात्मनः।
शरव्यपाये हेमन्तऋतुरिष्टः प्रवर्तत॥१॥
महात्मा श्रीराम को उस आश्रम में रहते हुए शरद् ऋतु बीत गयी और प्रिय हेमन्त का आरम्भ हुआ॥१॥
स कदाचित् प्रभातायां शर्वर्यां रघुनन्दनः।
प्रययावभिषेकार्थं रम्यां गोदावरी नदीम्॥२॥
एक दिन प्रातःकाल रघुकुलनन्दन श्रीराम स्नान करने के लिये परम रमणीय गोदावरी नदी के तट पर गये॥२॥
प्रह्वः कलशहस्तस्तु सीतया सह वीर्यवान्।
पृष्ठतोऽनुव्रजन् भ्राता सौमित्रिरिदमब्रवीत्॥३॥
उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी, जो बड़े ही विनीत और पराक्रमी थे, सीता के साथ-साथ हाथ में घड़ालिये उनके पीछे-पीछे गये। जाते-जाते वे श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार बोले-॥३॥
अयं स कालः सम्प्राप्तः प्रियो यस्ते प्रियंवद।
अलंकृत इवाभाति येन संवत्सरः शुभः॥४॥
प्रिय वचन बोलने वाले भैया श्रीराम! यह वही हेमन्तकाल आ पहुँचा है, जो आपको अधिक प्रिय है और जिससे यह शुभ संवत्सर अलंकृत-सा प्रतीत होता है॥४॥
नीहारपरुषो लोकः पृथिवी सस्यमालिनी।
जलान्यनुपभोग्यानि सुभगो हव्यवाहनः॥५॥
‘इस ऋतु में अधिक ठण्डक या पाले के कारण लोगों का शरीर रूखा हो जाता है। पृथ्वी पर रबी की खेती लहलहाने लगती है। जल अधिक शीतल होने के कारण पीने के योग्य नहीं रहता और आग बड़ी प्रिय लगती है॥५॥
नवाग्रयणपूजाभिरभ्यर्च्य पितृदेवताः।
कृताग्रयणकाः काले सन्तो विगतकल्मषाः॥६॥
‘नवसस्येष्टि’ कर्म के अनुष्ठान की इस वेला में नूतन अन्न ग्रहण करने के लिये की गयी आग्रयणकर्मरूप पूजाओं द्वारा देवताओं तथा पितरों को संतुष्ट करके उक्त आग्रयण कर्म का सम्पादन करने वाले सत्पुरुष निष्पाप हो गये हैं॥६॥
प्राज्यकामा जनपदाः सम्पन्नतरगोरसाः।
विचरन्ति महीपाला यात्रार्थं विजिगीषवः॥७॥
‘इस ऋतु में प्रायः सभी जनपदों के निवासियों की अन्नप्राप्ति विषयक कामनाएँ प्रचुर रूप से पूर्ण हो जाती हैं। गोरस की भी बहुतायत होती है तथा विजय की इच्छा रखने वाले भूपालगण युद्ध-यात्रा के लिये विचरते रहते हैं॥७॥
सेवमाने दृढं सूर्ये दिशमन्तकसेविताम्।
विहीनतिलकेव स्त्री नोत्तरा दिक् प्रकाशते॥८॥
‘सूर्यदेव इन दिनों यमसेवित दक्षिण दिशाका दृढ़तापूर्वक सेवन करने लगे हैं। इसलिये उत्तरदिशा सिंदूरविन्दु से वञ्चित हुई नारी की भाँति सुशोभित या प्रकाशित नहीं हो रही है॥८॥
प्रकृत्या हिमकोशाढ्यो दूरसूर्यश्च साम्प्रतम्।
यथार्थनामा सुव्यक्तं हिमवान् हिमवान् गिरिः॥९॥
‘हिमालय पर्वत तो स्वभाव से ही घनीभूत हिम के खजाने से भरा-पूरा होता है, परंतु इस समय सूर्यदेव भी दक्षिणायन में चले जाने के कारण उससे दूर हो गये हैं; अतः अब अधिक हिम के संचय से सम्पन्न होकर हिमवान् गिरि स्पष्ट ही अपने नाम को सार्थक कर रहा है॥९॥
अत्यन्तसुखसंचारा मध्याह्ने स्पर्शतः सुखाः।
दिवसाः सुभगादित्याश्छायासलिलदुर्भगाः॥१०॥
‘मध्याह्नकाल में धूप का स्पर्श होने से हेमन्त के सुखमय दिन अत्यन्त सुख से इधर-उधर विचरने के योग्य होते हैं। इन दिनों सुसेव्य होने के कारण सूर्यदेव सौभाग्यशाली जान पड़ते हैं और सेवन के योग्य न होने के कारण छाँह तथा जल अभागे प्रतीत होते हैं।
मृदुसूर्याः सुनीहाराः पटुशीताः समारुताः।
शून्यारण्या हिमध्वस्ता दिवसा भान्ति साम्प्रतम्॥११॥
‘आजकल के दिन ऐसे हैं कि सूर्य की किरणों का स्पर्श कोमल (प्रिय) जान पड़ता है। कुहासे अधिक पड़ते हैं। सरदी सबल होती है, कड़ाके का जाड़ा पड़ने लगता है। साथ ही ठण्डी हवा चलती रहती है। पाला पड़ने से पत्तों के झड़ जाने के कारण जंगल सूने दिखायी देते हैं और हिम के स्पर्श से कमल गल जाते हैं॥११॥
निवृत्ताकाशशयनाः पुष्यनीता हिमारुणाः।
शीतवृद्धतरायामास्त्रियामा यान्ति साम्प्रतम्॥१२॥
‘इस हेमन्तकाल में रातें बड़ी होने लगती हैं। इनमें सरदी बहुत बढ़ जाती है। खुले आकाश में कोई नहीं सोते हैं। पौषमास की ये रातें हिमपात के कारण धूसर प्रतीत होती हैं।१२॥
रविसंक्रान्तसौभाग्यस्तुषारारुणमण्डलः।
निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते॥१३॥
‘हेमन्तकाल में चन्द्रमा का सौभाग्य सूर्यदेव में चला गया है (चन्द्रमा सरदी के कारण असेव्य और सूर्य मन्दरश्मि होने के कारण सेव्य हो गये हैं)। चन्द्रमण्डल हिमकणों से आच्छन्न होकर धूमिल जान पड़ता है; अतः चन्द्रदेव निःश्वासवायु से मलिन हुए दर्पण की भाँति प्रकाशित नहीं हो रहे हैं॥१३॥
ज्योत्स्ना तुषारमलिना पौर्णमास्यां न राजते।
सीतेव चातपश्यामा लक्ष्यते न च शोभते॥१४॥
इन दिनों पर्णिमा की चाँदनी रात भी तुहिन बिन्दुओं से मलिन दिखायी देती है—प्रकाशित नहीं होती है। ठीक उसी तरह, जैसे सीता अधिक धूप लगने से साँवली-सी दीखती है-पूर्ववत् शोभा नहीं पाती॥१४॥
प्रकृत्या शीतलस्पर्शो हिमविद्धश्च साम्प्रतम्।
प्रवाति पश्चिमो वायुः काले द्विगुणशीतलः॥१५॥
‘स्वभाव से ही जिसका स्पर्श शीतल है, वह पछुआ हवा इस समय हिमकणों से व्याप्त हो जाने के कारण दूनी सरदी लेकर बड़े वेग से बह रही है॥१५॥
बाष्पच्छन्नान्यरण्यानि यवगोधूमवन्ति च।
शोभन्तेऽभ्युदिते सूर्ये नदद्भिः क्रौञ्चसारसैः॥१६॥
‘जौ और गेहूँ के खेतों से युक्त ये बहुसंख्यक वन भाप से ढंके हुए हैं तथा क्रौञ्च और सारस इनमें कलरव कर रहे हैं। सूर्योदयकाल में इन वनों की बड़ी शोभा हो रही है॥१६॥
खजूरपुष्पाकृतिभिः शिरोभिः पूर्णतण्डुलैः।
शोभन्ते किंचिदालम्बाः शालयः कनकप्रभाः॥१७॥
‘ये सुनहरे रंग के जड़हन धान खजूर के फूल के-से आकारवाली बालों से, जिनमें चावल भरे हुए हैं, कुछ लटक गये हैं। इन बालों के कारण इनकी बड़ी शोभा होती है॥१७॥
मयूखैरुपसर्पद्भिर्हिमनीहारसंवृतैः।
दूरमभ्युदितः सूर्यः शशाङ्क इव लक्ष्यते॥१८॥
‘कुहासे से ढकी और फैलती हुई किरणों से उपलक्षित होने वाले दूरोदित सूर्य चन्द्रमा के समान दिखायी देते हैं॥१८॥
आग्राह्यवीर्यः पूर्वाणे मध्याह्ने स्पर्शतः सुखः।
संरक्तः किंचिदापाण्डुरातपः शोभते क्षितौ॥१९॥
‘इस समय अधिक लाल और कुछ-कुछ श्वेत, पीत वर्ण की धूप पृथ्वी पर फैलकर शोभा पा रही है। पूर्वाह्नकाल में तो कुछ इसका बल जान ही नहीं पड़ता है, परंतु मध्याह्नकाल में इसके स्पर्श से सुखका अनुभव होता है॥१९॥
अवश्यायनिपातेन किंचित्प्रक्लिन्नशादला।
वनानां शोभते भूमिर्निविष्टतरुणातपा॥२०॥
‘ओस की बूंदें पड़ने से जहाँ की घासें कुछ-कुछ भीगी हुई जान पड़ती हैं, वह वनभूमि नवोदित सूर्य की धूप का प्रवेश होने से अद्भुत शोभा पा रही है॥२०॥
स्पृशन् सुविपुलं शीतमुदकं द्विरदः सुखम्।
अत्यन्ततृषितो वन्यः प्रतिसंहरते करम्॥२१॥
‘यह जंगली हाथी बहुत प्यासा हुआ है। यह सुखपूर्वक प्यास बुझाने के लिये अत्यन्त शीतल जल का स्पर्श तो करता है, किंतु उसकी ठंडक असह्य होने के कारण अपनी सूंड़ को तुरंत ही सिकोड़ लेता है॥२१॥
एते हि समुपासीना विहगा जलचारिणः।
नावगाहन्ति सलिलमप्रगल्भा इवाहवम्॥२२॥
‘ये जलचर पक्षी जल के पास ही बैठे हैं; परंतु जैसे डरपोक मनुष्य युद्धभूमि में प्रवेश नहीं करते हैं, उसी प्रकार ये पानी में नहीं उतर रहे हैं॥२२॥
अवश्यायतमोनद्धा नीहारतमसावृताः।
प्रसुप्ता इव लक्ष्यन्ते विपुष्पा वनराजयः॥२३॥
‘रात में ओसविन्दुओं और अन्धकार से आच्छादित तथा प्रातःकाल कुहासे के अँधेरे से ढकी हुई ये पुष्पहीन वनश्रेणियाँ सोयी हुई-सी दिखायी देती हैं॥२३॥
बाष्पसंछन्नसलिला रुतविज्ञेयसारसाः।
हिमावालुकैस्तीरैः सरितो भान्ति साम्प्रतम्॥२४॥
‘इस समय नदियों के जल भाप से ढके हुए हैं। इनमें विचरने वाले सारस केवल अपने कलरवों से पहचाने जाते हैं तथा ये सरिताएँ भी ओस से भीगी हुई बालूवाले अपने तटों से ही प्रकाश में आती हैं (जल से नहीं)॥२४॥
तुषारपतनाच्चैव मृदुत्वाद् भास्करस्य च।
शैत्यादगाग्रस्थमपि प्रायेण रसवज्जलम्॥२५॥
‘बर्फ पड़ने से और सूर्य की किरणों के मन्द होने से अधिक सर्दी के कारण इन दिनों पर्वत के शिखर पर पड़ा हुआ जल भी प्रायः स्वादिष्ट प्रतीत होता है॥२५॥
जराजर्जरितैः पत्रैः शीर्णकेसरकर्णिकैः।
नालशेषा हिमध्वस्ता न भान्ति कमलाकराः॥२६॥
‘जो पुराने पड़ जाने के कारण जर्जर हो गये हैं, जिनकी कर्णिका और केसर जीर्ण-शीर्ण हो गये हैं, ऐसे दलों से उपलक्षित होने वाले कमलों के समूह पाला पड़ने से गल गये हैं। उनमें डंठलमात्र शेष रह गये हैं,इसीलिये उनकी शोभा नष्ट हो गयी है॥२६॥
अस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्र काले दुःखसमन्वितः।
तपश्चरति धर्मात्मा त्वद्भक्त्या भरतः पुरे॥२७॥
‘पुरुषसिंह श्रीराम! इस समय धर्मात्मा भरत आपके लिये बहुत दुःखी हैं और आपमें भक्ति रखते हुए नगर में ही तपस्या कर रहे हैं॥२७॥
त्यक्त्वा राज्यं च मानं च भोगांश्च विविधान्बहून्।
तपस्वी नियताहारः शेते शीते महीतले॥२८॥
‘वे राज्य, मान तथा नाना प्रकार के बहुसंख्यक भोगों का परित्याग करके तपस्या में संलग्न हैं एवं नियमित आहार करते हुए इस शीतल महीतल पर बिना विस्तर के ही शयन करते हैं॥२८॥
सोऽपि वेलामिमां नूनमभिषेकार्थमुद्यतः।
वृतः प्रकृतिभिर्नित्यं प्रयाति सरयूं नदीम्॥२९॥
‘निश्चय ही भरत भी इसी बेला में स्नान के लिये उद्यत हो मन्त्री एवं प्रजाजनों के साथ प्रतिदिन सरयू नदी के तट पर जाते होंगे॥२९॥
अत्यन्तसुखसंवृद्धः सुकुमारो हिमादितः।
कथं त्वपररात्रेषु सरयूमवगाहते॥३०॥
‘अत्यन्त सुख में पले हुए सुकुमार भरत जाड़े का कष्ट सहते हुए रात के पिछले पहर में कैसे सरयूजी के जल में डुबकी लगाते होंगे॥३०॥
पद्मपत्रेक्षणः श्यामः श्रीमान् निरुदरो महान्।
धर्मज्ञः सत्यवादी च ह्रीनिषेवी जितेन्द्रियः॥३१॥
प्रियाभिभाषी मधुरो दीर्घबाहुररिंदमः।
संत्यज्य विविधान् सौख्यानार्यं सर्वात्मनाश्रितः॥३२॥
‘जिनके नेत्र कमलदल के समान शोभा पाते हैं, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम है और जिनके उदर का कुछ पता ही नहीं लगता है, ऐसे महान् धर्मज्ञ,सत्यवादी, लज्जाशील, जितेन्द्रिय, प्रिय वचन बोलने वाले, मृदुल स्वभाव वाले महाबाहु शत्रुदमन श्रीमान् भरत ने नाना प्रकार के सुखों को त्यागकर सर्वथा आपका ही आश्रय ग्रहण किया है॥३१-३२॥
जितः स्वर्गस्तव भ्रात्रा भरतेन महात्मना।
वनस्थमपि तापस्ये यस्त्वामविधीयते॥३३॥
‘आपके भाई महात्मा भरत ने निश्चय ही स्वर्गलोक पर विजय प्राप्त कर ली है; क्योंकि वे भी तपस्या में स्थित होकर आपके वनवासी जीवन का अनुसरण कर रहे हैं॥३३॥
न पित्र्यमनवर्तन्ते मातृकं द्विपदा इति।
ख्यातो लोकप्रवादोऽयं भरतेनान्यथा कृतः॥३४॥
‘मनुष्य प्रायः माता के गुणों का ही अनुवर्तन करते हैं पिता के नहीं; इस लौकिक उक्ति को भरत ने अपने बर्ताव से मिथ्या प्रमाणित कर दिया है॥३४॥
भर्ता दशरथो यस्याः साधुश्च भरतः सुतः।
कथं नु साम्बा कैकेयी तादृशी क्रूरदर्शिनी॥३५॥
‘महाराज दशरथ जिसके पति हैं और भरत-जैसा साधु जिसका पुत्र है, वह माता कैकेयी वैसी क्रूरतापूर्ण दृष्टिवाली कैसे हो गयी?’॥३५॥
इत्येवं लक्ष्मणे वाक्यं स्नेहाद् वदति धार्मिके।
परिवादं जनन्यास्तमसहन् राघवोऽब्रवीत्॥३६॥
धर्मपरायण लक्ष्मण जब स्नेहवश इस प्रकार कह रहे थे, उस समय श्रीरामचन्द्रजी से माता कैकेयी की निन्दा नहीं सही गयी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा-॥३६॥
न तेऽम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या कदाचन।
तामेवेक्ष्वाकुनाथस्य भरतस्य कथां कुरु॥३७॥
‘तात! तुम्हें मझली माता कैकेयी की कभी निन्दा नहीं करनी चाहिये। (यदि कुछ कहना हो तो) पहले की भाँति इक्ष्वाकुवंश के स्वामी भरत की ही चर्चा करो॥३७॥
निश्चितैव हि मे बुद्धिर्वनवासे दृढव्रता।
भरतस्नेहसंतप्ता बालिशीक्रियते पुनः॥३८॥
‘यद्यपि मेरी बुद्धि दृढ़तापूर्वक व्रत का पालन करते हुए वन में रहने का अटल निश्चय कर चुकी है, तथापि भरत के स्नेह से संतप्त होकर पुनः चञ्चल हो उठती है॥३८॥
संस्मराम्यस्य वाक्यानि प्रियाणि मधुराणि च।
हृद्यान्यमृतकल्पानि मनःप्रह्लादनानि च॥३९॥
मुझे भरत की वे परम प्रिय, मधुर, मन को भाने वाली और अमृत के समान हृदय को आह्लाद प्रदान करने वाली बातें याद आ रही हैं॥३९॥
कदा ह्यहं समेष्यामि भरतेन महात्मना।
शत्रुजेन च वीरेण त्वया च रघुनन्दन॥४०॥
‘रघुकुलनन्दन लक्ष्मण! कब वह दिन आयेगा, जब मैं तुम्हारे साथ चलकर महात्मा भरत और वीरवर शत्रुघ्न से मिलूँगा’॥४०॥
इत्येवं विलपंस्तत्र प्राप्य गोदावरी नदीम्।
चक्रेऽभिषेकं काकुत्स्थः सानुजः सह सीतया॥४१॥
इस प्रकार विलाप करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता के साथ गोदावरी नदी के तटपर जाकर स्नान किया॥४१॥
तर्पयित्वाथ सलिलैस्तैः पितॄन् दैवतानपि।
स्तुवन्ति स्मोदितं सूर्यं देवताश्च तथानघाः॥४२॥
वहाँ स्नान करके उन्होंने गोदावरी के जल से देवताओं और पितरों का तर्पण किया। तदनन्तर जब सूर्योदय हुआ, तब वे तीनों निष्पाप व्यक्ति भगवान् सूर्य का उपस्थान करके अन्य देवताओं की भी स्तुति करने लगे॥४२॥
कृताभिषेकः स रराज रामः सीताद्वितीयः सह लक्ष्मणेन।
कृताभिषेकस्त्वगराजपुत्र्या रुद्रः सनन्दिर्भगवानिवेशः॥४३॥
सीता और लक्ष्मण के साथ स्नान करके भगवान् श्रीराम उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे पर्वतराजपुत्री उमा और नन्दी के साथ गङ्गाजी में अवगाहन करके भगवान् रुद्र सुशोभित होते हैं॥४३॥
सर्ग १७
कृताभिषेको रामस्तु सीता सौमित्रिरेव च।
तस्माद् गोदावरीतीरात् ततो जग्मुः स्वमाश्रमम्॥१॥
स्नान करके श्रीराम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही उस गोदावरी तट से अपने आश्रम में लौट आये॥१॥
आश्रमं तमुपागम्य राघवः सहलक्ष्मणः।
कृत्वा पौर्वाणिकं कर्म पर्णशालामुपागमत्॥२॥
उस आश्रम में आकर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने पूर्वाणकाल के होम-पूजन आदि कार्य पूर्ण किये, फिर वे दोनों भाई पर्णशाला में आकर बैठे॥२॥
उवास सुखितस्तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः।
स रामः पर्णशालायामासीनः सह सीतया॥३॥
विरराज महाबाहुश्चित्रया चन्द्रमा इव।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा चकार विविधाः कथाः॥४॥
वहाँ सीता के साथ वे सुखपूर्वक रहने लगे। उन दिनों बड़े-बड़े ऋषि-मुनि आकर वहाँ उनका सत्कार करते थे। पर्णशाला में सीता के साथ बैठे हुए महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी चित्रा के साथ विराजमान चन्द्रमा की भाँति शोभा पा रहे थे। वे अपने भाई लक्ष्मण के साथ वहाँ तरह-तरह की बातें किया करते थे॥३-४॥
तदासीनस्य रामस्य कथासंसक्तचेतसः।
तं देशं राक्षसी काचिदाजगाम यदृच्छया॥५॥
सा तु शूर्पणखा नाम दशग्रीवस्य रक्षसः।
भगिनी राममासाद्य ददर्श त्रिदशोपमम्॥६॥
उस समय जब कि श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ बातचीत में लगे हुए थे, एक राक्षसी अकस्मात् उस स्थान पर आ पहुँची। वह दशमुख राक्षस रावण की बहिन शूर्पणखा थी। उसने वहाँ आकर देवताओं के समान मनोहर रूप वाले श्रीरामचन्द्रजी को देखा॥५-६॥
दीप्तास्यं च महाबाहुं पद्मपत्रायतेक्षणम्।
गजविक्रान्तगमनं जटामण्डलधारिणम्॥७॥
उनका मुख तेजस्वी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल एवं सुन्दर थे। वे हाथी के समान मन्द गति से चलते थे। उन्होंने मस्तक पर जटामण्डल धारण कर रखा था॥७॥
सुकुमारं महासत्त्वं पार्थिवव्यञ्जनान्वितम्।
राममिन्दीवरश्यामं कंदर्पसदृशप्रभम्॥८॥
बभूवेन्द्रोपमं दृष्ट्वा राक्षसी काममोहिता।
परम सुकुमार, महान् बलशाली, राजोचित लक्षणों से युक्त, नील कमल के समान श्याम कान्ति से सुशोभित, कामदेव के सदृश सौन्दर्यशाली तथा इन्द्र के समान तेजस्वी श्रीराम को देखते ही वह राक्षसी काम से मोहित हो गयी॥८ १/२॥
सुमुखं दुर्मुखी रामं वृत्तमध्यं महोदरी॥९॥
विशालाक्षं विरूपाक्षी सुकेशं ताम्रमूर्धजा।
प्रियरूपं विरूपा सा सुस्वरं भैरवस्वना॥१०॥
श्रीराम का मुख सुन्दर था और शूर्पणखा का मुख बहुत ही भद्दा एवं कुरूप था। उनका मध्यभाग(कटिप्रदेश और उदर) क्षीण था; किंतु शूर्पणखा बेडौल लंबे पेटवाली थी। श्रीराम की आँखें बड़ी-बड़ी होने के कारण मनोहर थीं, परंतु उस राक्षसी के नेत्र कुरूप और डरावने थे। श्रीरघुनाथजी के केश चिकने और सुन्दर थे, परंतु उस निशाचरी के सिर के बाल ताँबे-जैसे लाल थे। श्रीराम का रूप बड़ा प्यारा लगता था, किंतु शूर्पणखा का रूप बीभत्स और विकराल था। श्रीराघवेन्द्र मधुर स्वर में बोलते थे, किंतु वह राक्षसी भैरवनाद करनेवाली थी॥९-१०॥
तरुणं दारुणा वृद्धा दक्षिणं वामभाषिणी।
न्यायवृत्तं सुदुर्वृत्ता प्रियमप्रियदर्शना॥११॥
ये देखने में सौम्य और नित्य नूतन तरुण थे, किंतु वह निशाचरी क्रूर और हजारों वर्षों की बुढ़िया थी। ये सरलता से बात करने वाले और उदार थे, किंतु उसकी बातों में कुटिलता भरी रहती थी। ये न्यायोचित सदाचार का पालन करने वाले थे और वह अत्यन्त दराचारिणी थी। श्रीराम देखने में प्यारे लगते थे और शूर्पणखा को देखते ही घृणा पैदा होती थी॥११॥
शरीरजसमाविष्टा राक्षसी राममब्रवीत्।
जटी तापसवेषेण सभार्यः शरचापधृक्॥१२॥
आगतस्त्वमिमं देशं कथं राक्षससेवितम्।
किमागमनकृत्यं ते तत्त्वमाख्यातुमर्हसि॥१३॥
तो वह राक्षसी कामभाव से आविष्ट हो (मनोहर रूप बनाकर) श्रीराम के पास आयी और बोली - ’तपस्वी के वेश में मस्तक पर जटा धारण किये, साथ में स्त्री को लिये और हाथ में धनुष-बाण ग्रहण किये, इस राक्षसों के देश में तुम कैसे चले आये? यहाँ तुम्हारे आगमन का क्या प्रयोजन है? यह सब मुझे ठीक-ठीक बताओ’॥१२-१३॥
एवमुक्तस्तु राक्षस्या शूर्पणख्या परंतपः।
ऋजुबुद्धितया सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे॥१४॥
राक्षसी शूर्पणखा के इस प्रकार पूछने पर शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने अपने सरलस्वभाव के कारण सब कुछ बताना आरम्भ किया-॥१४॥
आसीद् दशरथो नाम राजा त्रिदशविक्रमः।
तस्याहमग्रजः पुत्रो रामो नाम जनैः श्रुतः॥१५॥
‘देवि! दशरथ नाम से प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो देवताओं के समान पराक्रमी थे। मैं । उन्हीं का ज्येष्ठ पुत्र हूँ और लोगों में राम नाम से विख्यात हूँ॥१५॥
भ्रातायं लक्ष्मणो नाम यवीयान् मामनुव्रतः।
इयं भार्या च वैदेही मम सीतेति विश्रुता॥१६॥
‘ये मेरे छोटे भाई लक्ष्मण हैं, जो सदा मेरी आज्ञा के अधीन रहते हैं और ये मेरी पत्नी हैं, जो विदेहराज जनक की पुत्री तथा सीता नाम से प्रसिद्ध हैं॥१६॥
नियोगात् तु नरेन्द्रस्य पितुर्मातुश्च यन्त्रितः।
धर्मार्थं धर्मकांक्षी च वनं वस्तुमिहागतः॥१७॥
‘अपने पिता महाराज दशरथ और माता कैकेयी की आज्ञा से प्रेरित होकर मैं धर्मपालन की इच्छा रखकर धर्मरक्षा के ही उद्देश्य से इस वन में निवास करने के लिये यहाँ आया हूँ॥१७॥
त्वां तु वेदितुमिच्छामि कस्य त्वं कासि कस्य वा।
त्वं हि तावन्मनोज्ञाङ्गी राक्षसी प्रतिभासि मे॥१८॥
इह वा किंनिमित्तं त्वमागता ब्रूहि तत्त्वतः।
‘अब मैं तुम्हारा परिचय प्राप्त करना चाहता हूँ। तुम किसकी पुत्री हो? तुम्हारा नाम क्या है? और तुम किसकी पत्नी हो? तुम्हारे अङ्ग इतने मनोहर हैं कि तुम मुझे इच्छानुसार रूप धारण करने वाली कोई राक्षसी प्रतीत होती हो। यहाँ किस लिये तुम आयी हो? यह ठीक-ठीक बताओ’॥१८-१/२॥
साब्रवीद् वचनं श्रुत्वा राक्षसी मदनार्दिता॥१९॥
श्रूयतां राम तत्त्वार्थं वक्ष्यामि वचनं मम।
अहं शूर्पणखा नाम राक्षसी कामरूपिणी॥२०॥
श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर वह राक्षसी काम से पीड़ित होकर बोली - ’श्रीराम! मैं सब कुछ ठीक-ठीक बता रही हूँ। तुम मेरी बात सुनो। मेरा नाम शूर्पणखा है और मैं इच्छानुसार रूप धारण करने वाली राक्षसी हूँ॥१९-२०-१/२॥
अरण्यं विचरामीदमेका सर्वभयंकरा।
रावणो नाम मे भ्राता यदि ते श्रोत्रमागतः॥२१॥
‘मैं समस्त प्राणियों के मन में भय उत्पन्न करती हुई इस वन में अकेली विचरती हूँ। मेरे भाई का नाम रावण है। सम्भव है, उसका नाम तुम्हारे कानों तक पहुँचा हो॥२१॥
वीरो विश्रवसः पुत्रो यदि ते श्रोत्रमागतः।
प्रवृद्धनिद्रश्च सदा कुम्भकर्णो महाबलः॥२२॥
‘रावण विश्रवा मुनि का वीर पुत्र है, यह बात भी तुम्हारे सुनने में आयी होगी। मेरा दूसरा भाई महाबली कुम्भकर्ण है, जिसकी निद्रा सदा ही बढ़ी रहती है॥२२॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा न तु राक्षसचेष्टितः।
प्रख्यातवीर्यौ च रणे भ्रातरौ खरदूषणौ॥२३॥
‘मेरे तीसरे भाई का नाम विभीषण है, परंतु वह धर्मात्मा है, राक्षसों के आचार-विचार का वह कभी पालन नहीं करता। युद्ध में जिनका पराक्रम विख्यात है, वे खर और दूषण भी मेरे भाई ही हैं॥२३॥
तानहं समतिक्रान्तां राम त्वापूर्वदर्शनात्।
समुपेतास्मि भावेन भर्तारं पुरुषोत्तमम्॥२४॥
‘श्रीराम! बल और पराक्रम में मैं अपने उन सभी भाइयों से बढ़कर हूँ। तुम्हारे प्रथम दर्शन से ही मेरा मन तुम में आसक्त हो गया है। (अथवा तुम्हारा रूप सौन्दर्य अपूर्व है। आज से पहले देवताओं में भी किसी का ऐसा रूप मेरे देखने में नहीं आया है, अतः इस अपूर्व रूप के दर्शन से मैं तुम्हारे प्रति आकृष्ट हो गयी हूँ।) यही कारण है कि मैं तुम-जैसे पुरुषोत्तम के प्रति पतिकी भावना रखकर बड़े प्रेम से पास आयी हूँ॥२४॥
अहं प्रभावसम्पन्ना स्वच्छन्दबलगामिनी।
चिराय भव भर्ता मे सीतया किं करिष्यसि॥२५॥
‘मैं प्रभाव (उत्कृष्ट भाव–अनुराग अथवा महान् बल-पराक्रम) से सम्पन्न हूँ और अपनी इच्छा तथा शक्ति से समस्त लोकों में विचरण कर सकती हूँ, अतः अब तुम दीर्घकाल के लिये मेरे पति बन जाओ। इस अबला सीता को लेकर क्या करोगे?॥२५॥
विकृता च विरूपा च न सेयं सदृशी तव।
अहमेवानुरूपा ते भार्यारूपेण पश्य माम्॥२६॥
‘यह विकारयुक्त और कुरूपा है, अतः तुम्हारे योग्य नहीं है। मैं ही तुम्हारे अनुरूप हूँ, अतः मुझे अपनी भार्या के रूप में देखो॥२६॥
इमां विरूपामसतीं कराला निर्णतोदरीम्।
अनेन सह ते भ्रात्रा भक्षयिष्यामि मानुषीम्॥२७॥
‘यह सीता मेरी दृष्टि में कुरूप, ओछी, विकृत, धंसे हए पेटवाली और मानवी है, मैं इसे तुम्हारे इस भाई के साथ ही खा जाऊँगी॥२७॥
ततः पर्वतशृङ्गाणि वनानि विविधानि च।
पश्यन् सह मया कामी दण्डकान् विचरिष्यसि॥२८॥
‘फिर तुम कामभावयुक्त हो मेरे साथ पर्वतीय शिखरों और नाना प्रकार के वनों की शोभा देखते हुए दण्डक वन में विहार करना’॥२८॥
इत्येवमुक्तः काकुत्स्थः प्रहस्य मदिरेक्षणाम्।
इदं वचनमारेभे वक्तुं वाक्यविशारदः॥२९॥
शूर्पणखा के ऐसा कहने पर बातचीत करने में कुशल ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी जोर-जोर से हँसने लगे, फिर उन्होंने उस मतवाले नेत्रोंवाली निशाचरी से इस प्रकार कहना आरम्भ किया॥२९॥
सर्ग १८
तां तु शूर्पणखां रामः कामपाशावपाशिताम्।
स्वेच्छया श्लक्ष्णया वाचा स्मितपूर्वमथाब्रवीत्॥१॥
श्रीराम ने कामपाश से बँधी हुई उस शूर्पणखा से अपनी इच्छा के अनुसार मधुर वाणी में मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा-॥१॥
कृतदारोऽस्मि भवति भार्येयं दयिता मम।
त्वद्विधानां तु नारीणां सुदुःखा ससपत्नता॥२॥
‘आदरणीया देवि! मैं विवाह कर चुका हूँ। यह मेरी प्यारी पत्नी विद्यमान है। तुम-जैसी स्त्रियों के लिये तो सौत का रहना अत्यन्त दुःखदायी ही होगा॥२॥
अनुजस्त्वेष मे भ्राता शीलवान् प्रियदर्शनः।
श्रीमानकृतदारश्च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥३॥
अपूर्वी भार्यया चार्थी तरुणः प्रियदर्शनः।
अनुरूपश्च ते भर्ता रूपस्यास्य भविष्यति॥४॥
‘ये मेरे छोटे भाई श्रीमान् लक्ष्मण बड़े शीलवान्, देखने में प्रिय लगने वाले और बल-पराक्रम से सम्पन्न हैं। इनके साथ स्त्री नहीं है। ये अपूर्व गुणों से सम्पन्न हैं। ये तरुण तो हैं ही, इनका रूप भी देखने में बड़ा मनोरम है। अतः यदि इन्हें भार्या की चाह होगी तो ये ही तुम्हारे इस सुन्दर रूप के योग्य पति होंगे॥३-४॥
एनं भज विशालाक्षि भर्तारं भ्रातरं मम।
असपत्ना वरारोहे मेरुमर्कप्रभा यथा॥५॥
‘विशाललोचने! वरारोहे! जैसे सूर्य की प्रभा मेरुपर्वत का सेवन करती है, उसी प्रकार तुम मेरे इन छोटे भाई लक्ष्मण को पति के रूप में अपनाकर सौत के भयसे रहित हो इनकी सेवा करो’॥५॥
इति रामेण सा प्रोक्ता राक्षसी काममोहिता।
विसृज्य रामं सहसा ततो लक्ष्मणमब्रवीत्॥६॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर वह काम से मोहित हुई राक्षसी उन्हें छोड़कर सहसा लक्ष्मण के पास जा पहुँची और इस प्रकार बोली-॥६॥
अस्य रूपस्य ते युक्ता भार्याहं वरवर्णिनी।
मया सह सुखं सर्वान् दण्डकान् विचरिष्यसि॥७॥
‘लक्ष्मण! तुम्हारे इस सुन्दर रूप के योग्य मैं ही हूँ, अतः मैं ही तुम्हारी परम सुन्दरी भार्या हो सकती हूँ। मुझे अङ्गीकार कर लेने पर तुम मेरे साथ समूचे दण्डकारण्य में सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे’॥७॥
एवमुक्तस्तु सौमित्री राक्षस्या वाक्यकोविदः।
ततः शूर्पनखीं स्मित्वा लक्ष्मणो युक्तमब्रवीत्॥८॥
उस राक्षसी के ऐसा कहने पर बातचीत में निपुण सुमित्राकुमार लक्ष्मण मुसकराकर सूप-जैसे नखवाली उस निशाचरी से यह युक्तियुक्त बात बोले-॥८॥
कथं दासस्य मे दासी भार्या भवितुमिच्छसि।
सोऽहमार्येण परवान् भ्रात्रा कमलवर्णिनि॥९॥
‘लाल कमल के समान गौर वर्णवाली सुन्दरि! मैं तो दास हूँ, अपने बड़े भाई भगवान् श्रीराम के अधीन हूँ, तुम मेरी स्त्री होकर दासी बनना क्यों चाहती हो?॥९॥
समृद्धार्थस्य सिद्धार्था मुदितामलवर्णिनी।
आर्यस्य त्वं विशालाक्षि भार्या भव यवीयसी॥१०॥
‘विशाललोचने! मेरे बड़े भैया सम्पूर्ण ऐश्वर्यों (अथवा सभी अभीष्ट वस्तुओं) से सम्पन्न हैं। तुम उन्हीं की छोटी स्त्री हो जाओ। इससे तुम्हारे सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे और तुम सदा प्रसन्न रहोगी। तुम्हारे रूप-रंग उन्हीं के योग्य निर्मल हैं॥१०॥
एतां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम्।
भार्यां वृद्धां परित्यज्य त्वामेवैष भजिष्यति॥११॥
‘कुरूप, ओछी, विकृत, धंसे हुए पेटवाली और वृद्धा भार्या को त्यागकर ये तुम्हें ही सादर ग्रहण करेंगे॥११॥
को हि रूपमिदं श्रेष्ठं संत्यज्य वरवर्णिनि।
मानुषीषु वरारोहे कुर्याद भावं विचक्षणः॥१२॥
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली वरवर्णिनि! कौन ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य होगा, जो तुम्हारे इस श्रेष्ठ रूप को छोड़कर मानवकन्याओं से प्रेम करेगा?’॥१२॥
इति सा लक्ष्मणेनोक्ता कराला निर्णतोदरी।
मन्यते तद्वचः सत्यं परिहासाविचक्षणा॥१३॥
लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर परिहास को न समझने वाली उस लंबे पेटवाली विकराल राक्षसी ने उनकी बात को सच्ची माना॥१३॥।
सा रामं पर्णशालायामुपविष्टं परंतपम्।
सीतया सह दुर्धर्षमब्रवीत् काममोहिता॥१४॥
वह पर्णशाला में सीता के साथ बैठे हुए शत्रुसंतापी दुर्जय वीर श्रीरामचन्द्रजी के पास लौट आयी और काम से मोहित होकर बोली-॥१४॥
इमां विरूपामसती कराला निर्णतोदरीम्।
वृद्धां भार्यामवष्टभ्य न मां त्वं बह मन्यसे॥१५॥
‘राम! तुम इस कुरूप, ओछी, विकृत, धंसे हुए पेटवाली और वृद्धाका आश्रय लेकर मेरा विशेष आदर नहीं करते हो॥१५॥
अद्येमां भक्षयिष्यामि पश्यतस्तव मानुषीम्।
त्वया सह चरिष्यामि निःसपत्ना यथासुखम्॥१६॥
‘अतः आज तुम्हारे देखते-देखते मैं इस मानुषी को खा जाऊँगी और इस सौत के न रहने पर तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचरण करूँगी’॥१६॥
इत्युक्त्वा मृगशावाक्षीमलातसदृशेक्षणा।
अभ्यगच्छत् सुसंक्रुद्धा महोल्का रोहिणीमिव॥१७॥
ऐसा कहकर दहकते हुए अंगारों के समान नेत्रोंवाली शूर्पणखा अत्यन्त क्रोध में भरकर मृगनयनी सीता की ओर झपटी, मानो कोई बड़ी भारी उल्का रोहिणी नामक तारे पर टूट पड़ी हो॥१७॥
तां मृत्युपाशप्रतिमामापतन्तीं महाबलः।
विगृह्य रामः कुपितस्ततो लक्ष्मणमब्रवीत्॥१८॥
महाबली श्रीराम ने मौत के फंदे की तरह आती हुई उस राक्षसी को हुंकार से रोककर कुपित हो लक्ष्मण से कहा-॥१८॥
क्रूरैरनार्यैः सौमित्रे परिहासः कथंचन।
न कार्यः पश्य वैदेहीं कथंचित् सौम्य जीवतीम्॥१९॥
‘सुमित्रानन्दन! क्रूर कर्म करने वाले अनार्यों से किसी प्रकार का परिहास भी नहीं करना चाहिये। सौम्य! देखो न, इस समय सीता के प्राण किसी प्रकार बड़ी मुश्किल से बचे हैं॥१९॥
इमां विरूपामसतीमतिमत्तां महोदरीम्।
राक्षसी पुरुषव्याघ्र विरूपयितुमर्हसि॥२०॥
‘पुरुषसिंह! तुम्हें इस कुरूपा, कुलटा, अत्यन्त मतवाली और लंबे पेटवाली राक्षसी को कुरूप किसी अङ्ग से हीन कर देना चाहिये’॥२०॥
इत्युक्तो लक्ष्मणस्तस्याः क्रुद्धो रामस्य पश्यतः।
उद्धृत्य खड्गं चिच्छेद कर्णनासे महाबलः॥२१॥
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार आदेश देने पर क्रोध में भरे हुए महाबली लक्ष्मण ने उनके देखते-देखते म्यान से तलवार खींच ली और शूर्पणखा के नाक कान काट लिये॥२१॥
निकृत्तकर्णनासा तु विस्वरं सा विनद्य च।
यथागतं प्रद्राव घोरा शूर्पणखा वनम्॥२२॥
नाक और कान कट जाने पर भयंकर राक्षसी शूर्पणखा बड़े जोर से चिल्लाकर जैसे आयी थी, उसी तरह वन में भाग गयी॥२२॥
सा विरूपा महाघोरा राक्षसी शोणितोक्षिता।
ननाद विविधान् नादान् यथा प्रावृषि तोयदः॥२३॥
खून से भीगी हुई वह महाभयंकर एवं विकराल रूप वाली निशाचरी नाना प्रकार के स्वरों में जोर-जोर से चीत्कार करने लगी, मानो वर्षाकाल में मेघों की घटा गर्जन-तर्जन कर रही हो॥२३॥
सा विक्षरन्ती रुधिरं बहधा घोरदर्शना।
प्रगृह्य बाहू गर्जन्ती प्रविवेश महावनम्॥२४॥
वह देखनेमें बड़ी भयानक थी। उसने अपने कटे हुए अङ्गोंसे बारंबार खूनकी धारा बहाते और दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर चिग्घाड़ते हुए एक विशाल वनके भीतर प्रवेश किया॥२४॥
ततस्तु सा राक्षससङ्गसंवृतं खरं जनस्थानगतं विरूपिता।
उपेत्य तं भ्रातरमुग्रतेजसं पपात भूमौ गगनाद् यथाशनिः॥२५॥
लक्ष्मण के द्वारा कुरूप की गयी शूर्पणखा वहाँ से भागकर राक्षस समूह से घिरे हुए भयंकर तेजवाले जनस्थान-निवासी भ्राता खर के पास गयी और जैसे आकाश से बिजली गिरती है, उसी प्रकार वह पृथ्वी पर गिर पड़ी॥
ततः सभार्यं भयमोहमूर्च्छिता सलक्ष्मणं राघवमागतं वनम्।
विरूपणं चात्मनि शोणितोक्षिता शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा॥२६॥
खर की वह बहन रक्त से नहा गयी थी और भय तथा मोह से अचेत-सी हो रही थी। उसने वन में सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीरामचन्द्रजी के आने और अपने कुरूप किये जाने का सारा वृत्तान्त खर से कह सुनाया॥२६॥
सर्ग १९
तां तथा पतितां दृष्ट्वा विरूपां शोणितोक्षिताम्।
भगिनीं क्रोधसंतप्तः खरः पप्रच्छ राक्षसः॥१॥
अपनी बहिन को इस प्रकार अङ्गहीन और रक्त से भीगी हुई अवस्था में पृथ्वी पर पड़ी देख राक्षस खर क्रोध से जल उठा और इस प्रकार पूछने लगा॥१॥
उत्तिष्ठ तावदाख्याहि प्रमोहं जहि सम्भ्रमम।
व्यक्तमाख्याहि केन त्वमेवंरूपा विरूपिता॥२॥
‘बहिन उठो और अपना हाल बताओ। मूर्छा और घबराहट छोड़ो तथा साफ-साफ कहो, किसने तुम्हें इस तरह रूपहीन बनाया है ?॥२॥
कः कृष्णसर्पमासीनमाशीविषमनागसम्।
तुदत्यभिसमापन्नमङ्गल्यग्रेण लीलया॥३॥
‘कौन अपने सामने आकर चुपचाप बैठे हुए निरपराध एवं विषैले काले साँप को अपनी अँगुलियों के अग्रभाग से खेल-खेल में पीड़ा दे रहा है?॥३॥
कालपाशं समासज्य कण्ठे मोहान्न बुध्यते।
यस्त्वामद्य समासाद्य पीतवान् विषमुत्तमम्॥४॥
‘जिसने आज तुम पर आक्रमण करके तुम्हारे नाक-कान काटे हैं, उसने उच्चकोटि का विष पी लिया है तथा अपने गले में काल का फंदा डाल लिया है, फिर भी मोहवश वह इस बात को समझ नहीं रहा है॥४॥
बलविक्रमसम्पन्ना कामगा कामरूपिणी।
इमामवस्थां नीता त्वं केनान्तकसमागता॥५॥
‘तुम तो स्वयं ही दूसरे प्राणियों के लिये यमराज के समान हो, बल और पराक्रम से सम्पन्न हो तथा इच्छानुसार सर्वत्र विचरने और अपनी रुचि के अनुसार रूप धारण करने में समर्थ हो, फिर भी तुम्हें किसने इस दुरवस्था में डाला है; जिससे दुःखी होकर तुम यहाँ आयी हो?॥५॥
देवगन्धर्वभूतानामृषीणां च महात्मनाम्।
कोऽयमेवं महावीर्यस्त्वां विरूपां चकार ह॥६॥
‘देवताओं, गन्धों , भूतों तथा महात्मा ऋषियों में यह कौन ऐसा महान् बलशाली है, जिसने तुम्हें रूपहीन बना दिया?॥६॥
नहि पश्याम्यहं लोके यः कुर्यान्मम विप्रियम्।
अमरेषु सहस्राक्षं महेन्द्रं पाकशासनम्॥७॥
‘संसार में तो मैं किसी को ऐसा नहीं देखता, जो मेरा अप्रिय कर सके देवताओं में सहस्रनेत्रधारी पाकशासन इन्द्र भी ऐसा साहस कर सकें, यह मुझे नहीं दिखायी देता॥७॥
अद्याहं मार्गणैः प्राणानादास्ये जीवितान्तगैः।
सलिले क्षीरमासक्तं निष्पिबन्निव सारसः॥८॥
‘जैसे हंस जल में मिले हुए दूध को पी लेता है, उसी प्रकार मैं आज इन प्राणान्तकारी बाणों से तुम्हारे अपराधी के शरीर से उसके प्राण ले लूँगा॥८॥
निहतस्य मया संख्ये शरसंकृत्तमर्मणः।
सफेनं रुधिरं कस्य मेदिनी पातुमिच्छति॥९॥
‘युद्ध में मेरे बाणों से जिसके मर्मस्थान छिन्न-भिन्न हो गये हैं तथा जो मेरे हाथों मारा गया है, ऐसे किस पुरुष के फेनसहित गरम-गरम रक्त को यह पृथ्वी पीना चाहती है ?॥९॥
कस्य पत्ररथाः कायान्मांसमुत्कृत्य संगताः।
प्रहृष्टा भक्षयिष्यन्ति निहतस्य मया रणे॥१०॥
‘रणभूमि में मेरे द्वारा मारे गये किस व्यक्ति के शरीर से मांस कुतर-कुतरकर ये हर्ष में भरे हुए झुंडके-झुंड पक्षी खायँगे?॥१०॥
तं न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः।
मयापकृष्टं कृपणं शक्तास्त्रातुं महाहवे॥११॥
‘जिसे मैं महासमर में खींच लूँ, उस दीन अपराधी को देवता, गन्धर्व, पिशाच और राक्षस भी नहीं बचा सकते॥११॥
उपलभ्य शनैः संज्ञां तं मे शंसितमर्हसि।
येन त्वं दुर्विनीतेन वने विक्रम्य निर्जिता॥१२॥
‘धीरे-धीरे होश में आकर तुम मुझे उसका नाम बताओ, जिस उद्दण्ड ने वन में तुम पर बलपूर्वक आक्रमण करके तुम्हें परास्त किया है’॥१२॥
इति भ्रातुर्वचः श्रुत्वा क्रुद्धस्य च विशेषतः।
ततः शूर्पणखा वाक्यं सबाष्पमिदमब्रवीत्॥१३॥
भाई का विशेषतः क्रोध में भरे हुए भाई खर का यह वचन सुनकर शूर्पणखा नेत्रों से आँसू बहाती हुई इस प्रकार बोली-॥१३॥
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥१४॥
‘भैया ! वन में दो तरुण पुरुष आये हैं, जो देखने में बड़े ही सुकुमार, रूपवान् और महान् बलवान् हैं।उन दोनों के बड़े-बड़े नेत्र ऐसे जान पड़ते हैं मानो खिले हुए कमल हों। वे दोनों ही वल्कल-वस्त्र और मृगचर्म पहने हुए हैं॥१४॥
फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यास्तां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥१५॥
‘फल और मूल ही उनका भोजन है। वे जितेन्द्रिय, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं। दोनों ही राजा दशरथ के पुत्र और आपस में भाई-भाई हैं। उनके नाम राम और लक्ष्मण हैं॥१५॥
गन्धर्वराजप्रतिमौ पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ।
देवौ वा दानवावेतौ न तर्कयितुमुत्सहे॥१६॥
‘वे दो गन्धर्वराजों के समान जान पड़ते हैं और राजोचित लक्षणों से सम्पन्न हैं। ये दोनों भाई देवता अथवा दानव हैं, यह मैं अनुमान से भी नहीं जान सकती॥१६॥
तरुणी रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता।
दृष्टा तत्र मया नारी तयोर्मध्ये सुमध्यमा॥१७॥
“उन दोनों के बीच में एक तरुण अवस्था वाली रूपवती स्त्री भी वहाँ देखी है, जिसके शरीर का मध्यभाग बड़ा ही सुन्दर है। वह सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित है॥१७॥
ताभ्यामुभाभ्यां सम्भूय प्रमदामधिकृत्य ताम्।
इमामवस्थां नीताहं यथानाथासती तथा॥१८॥
‘उस स्त्री के ही कारण उन दोनों ने मिलकर मेरी एक अनाथ और कुलटा स्त्री की भाँति ऐसी दुर्गति की है॥१८॥
तस्याश्चानृजुवृत्तायास्तयोश्च हतयोरहम।
सफेनं पातुमिच्छामि रुधिरं रणमूर्धनि॥१९॥
‘मैं युद्ध में उस कुटिल आचार वाली स्त्री के और उन दोनों राजकुमारों के भी मारे जाने पर उनका फेनसहित रक्त पीना चाहती हूँ॥१९॥
एष मे प्रथमः कामः कृतस्तत्र त्वया भवेत्।
तस्यास्तयोश्च रुधिरं पिबेयमहमाहवे॥२०॥
‘रणभूमि में उस स्त्री का और उन पुरुषों का भी रक्त मैं पी सकूँ-यह मेरी पहली और प्रमुख इच्छा है, जो तुम्हारे द्वारा पूर्ण की जानी चाहिये॥२०॥
इति तस्यां ब्रुवाणायां चतुर्दश महाबलान्।
व्यादिदेश खरः क्रुद्धो राक्षसानन्तकोपमान्॥२१॥
शूर्पणखा के ऐसा कहने पर खरने कुपित होकर अत्यन्त बलवान् चौदह राक्षसों को, जो यमराज के समान भयंकर थे, यह आदेश दिया-॥२१॥
मानुषौ शस्त्रसम्पन्नौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ।
प्रविष्टौ दण्डकारण्यं घोरं प्रमदया सह॥२२॥
‘वीरो! इस भयंकर दण्डकारण्य के भीतर चीर और काला मृगचर्म धारण किये दो शस्त्रधारी मनुष्य एक युवती स्त्री के साथ घुस आये हैं॥२२॥
तौ हत्वा तां च दुर्वृत्तामुपावर्तितुमर्हथ।
इयं च भगिनी तेषां रुधिरं मम पास्यति॥२३॥
‘तुमलोग वहाँ जाकर पहले उन दोनों पुरुषों को मार डालो; फिर उस दुराचारिणी स्त्री के भी प्राण ले लो। मेरी यह बहिन उन तीनों का रक्त पीयेगी॥२३॥
मनोरथोऽयमिष्टोऽस्या भगिन्या मम राक्षसाः।
शीघ्रं सम्पाद्यतां गत्वा तौ प्रमथ्य स्वतेजसा॥२४॥
‘राक्षसो! मेरी इस बहिन का यह प्रिय मनोरथ है। तुम वहाँ जाकर अपने प्रभाव से उन दोनों मनुष्यों को मार गिराओ और बहिन के इस मनोरथ को शीघ्र पूरा करो॥२४॥
युष्माभिर्निहतौ दृष्ट्वा तावुभौ भ्रातरौ रणे।
इयं प्रहृष्टा मुदिता रुधिरं युधि पास्यति॥२५॥
‘रणभूमि में उन दोनों भाइयों को तुम्हारे द्वारा मारा गया देख यह हर्ष से खिल उठेगी और आनन्दमग्न होकर युद्ध स्थल में उनका रक्त पान करेगी’॥२५॥
इति प्रतिसमादिष्टा राक्षसास्ते चतुर्दश।
तत्र जग्मस्तया सार्धं घना वातेरिता इव॥२६॥
खर की ऐसी आज्ञा पाकर वे चौदहों राक्षस हवा के उड़ाये हुए बादलों के समान विवश हो शूर्पणखा के साथ पञ्चवटी को गये॥२६॥
सर्ग २०
ततः शूर्पणखा घोरा राघवाश्रममागता।
राक्षसानाचचक्षे तौ भ्रातरौ सह सीतया॥१॥
तदनन्तर भयानक राक्षसी शूर्पणखा श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम पर आयी। उसने सीता सहित उन दोनों भाइयों का उन राक्षसों को परिचय दिया॥१॥
ते रामं पर्णशालायामुपविष्टं महाबलम्।
ददृशुः सीतया सार्धं लक्ष्मणेनापि सेवितम्॥२॥
राक्षसों ने देखा-महाबली श्रीराम सीता के साथ पर्णशाला में बैठे हैं और लक्ष्मण भी उनकी सेवा में उपस्थित हैं॥२॥
तां दृष्ट्वा राघवः श्रीमानागतांस्तांश्च राक्षसान्।
अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्॥३॥
इधर श्रीमान् रघुनाथजी ने भी शूर्पणखा तथा उसके साथ आये हुए उन राक्षसों को भी देखा। देखकर वे उद्दीप्त तेज वाले अपने भाई लक्ष्मण से इस प्रकार बोले-॥३॥
मुहूर्तं भव सौमित्रे सीतायाः प्रत्यनन्तरः।
इमानस्या वधिष्यामि पदवीमागतानिह॥४॥
‘सुमित्राकुमार! तुम थोड़ी देर तक सीता के पास खड़े हो जाओ। मैं इस राक्षसी के सहायक बनकर पीछे-पीछे आये हुए इन निशाचरों का यहाँ अभी वध कर डालूँगा’॥४॥
वाक्यमेतत् ततः श्रुत्वा रामस्य विदितात्मनः।
तथेति लक्ष्मणो वाक्यं राघवस्य प्रपूजयन्॥५॥
अपने स्वरूप को समझने वाले श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर लक्ष्मण ने इसकी भूरि-भूरि सराहना करते हुए ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की॥५॥
राघवोऽपि महच्चापं चामीकरविभूषितम्।
चकार सज्यं धर्मात्मा तानि रक्षांसि चाब्रवीत्॥६॥
तब धर्मात्मा रघुनाथजी ने अपने सुवर्णमण्डित विशाल धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और उन राक्षसों से कहा॥६॥
पुत्रौ दशरथस्यावां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
प्रविष्टौ सीतया सार्धं दुश्चरं दण्डकावनम्॥७॥
फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
वसन्तौ दण्डकारण्ये किमर्थमुपहिंसथ॥८॥
‘हम दोनों भाई राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं तथा सीता के साथ इस दुर्गम दण्डकारण्य में आकर फल-मूल का आहार करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्या में संलग्न हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। इस प्रकार दण्डक वन में निवास करने वाले हम दोनों भाइयों की तुम किसलिये हिंसा करना चाहते हो?॥७-८॥
युष्मान् पापात्मकान् हन्तुं विप्रकारान् महाहवे।
ऋषीणां तु नियोगेन सम्प्राप्तः सशरासनः॥९॥
‘देखो, तुम सब-के-सब पापात्मा तथा ऋषियों का अपराध करने वाले हो। उन ऋषि-मुनियों की आज्ञा से ही मैं धनुष-बाण लेकर महासम रमें तुम्हारा वध करने के लिये यहाँ आया हूँ॥९॥
तिष्ठतैवात्र संतुष्टा नोपवर्तितुमर्हथ।
यदि प्राणैरिहार्थो वो निवर्तध्वं निशाचराः॥१०॥
‘निशाचरो! यदि तुम्हें युद्ध से संतोष प्राप्त होता हो तो यहाँ खड़े ही रहो, भाग मत जाना और यदि तुम्हें प्राणों का लोभ हो तो लौट जाओ (एक क्षण के लिये भी यहाँ न रुको)’॥१०॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसास्ते चतुर्दश।
ऊचुर्वाचं सुसंक्रुद्धा ब्रह्मघ्नाः शूलपाणयः॥
संरक्तनयना घोरा रामं संरक्तलोचनम्।
परुषा मधुराभाष हृष्टा दृष्टपराक्रमम्॥१२॥
श्रीराम की यह बात सुनकर वे चौदहों राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे। ब्राह्मणों की हत्या करने वाले वे घोर निशाचर हाथों में शूल लिये क्रोध से लाल आँखें करके कठोर वाणी में हर्ष और उत्साह के साथ स्वभावतः लाल नेत्रों वाले मधुरभाषी श्रीराम से, जिनका पराक्रम वे देख चुके थे, यों बोले-॥११-१२॥
क्रोधमुत्पाद्य नो भर्तुः खरस्य सुमहात्मनः।
त्वमेव हास्यसे प्राणान् सद्योऽस्माभिर्हतो युधि॥१३॥
‘अरे! तूने हमारे स्वामी महाकाय खर को क्रोध दिलाया है; अतः हमलोगों के हाथ से युद्ध में मारा जाकर तू स्वयं ही तत्काल अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा॥१३॥
का हि ते शक्तिरेकस्य बहूनां रणमूर्धनि।
अस्माकमग्रतः स्थातुं किं पुनर्योद्धमाहवे॥१४॥
‘हम बहुत-से हैं और तू अकेला, तेरी क्या शक्ति है कि तू हमारे सामने रणभूमिमें खड़ा भी रह सके, फिर युद्ध करना तो दूरकी बात है॥१४॥
एभिर्बाहुप्रयुक्तैश्च परिघैः शूलपट्टिशैः।
प्राणांस्त्यक्ष्यसि वीर्यं च धनुश्च करपीडितम्॥१५॥
‘हमारी भुजाओं द्वारा छोड़े गये इन परिघों, शूलों और पट्टिशों की मार खाकर तू अपने हाथ में दबाये हुए इस धनुष को, बल-पराक्रम के अभिमान को तथा अपने प्राणों को भी एक साथ ही त्याग देगा’॥१५॥
इत्येवमुक्त्वा संरब्धा राक्षसास्ते चतुर्दश।
उद्यतायुधनिस्त्रिंशा राममेवाभिदुद्रुवुः॥१६॥
ऐसा कहकर क्रोध में भरे हुए वे चौदहों राक्षस तरह-तरह के आयुध और तलवारें लिये श्रीराम पर ही टूट पड़े॥१६॥
चिक्षिपुस्तानि शूलानि राघवं प्रति दुर्जयम्।
तानि शूलानि काकुत्स्थः समस्तानि चतुर्दश॥१७॥
तावद्भिरेव चिच्छेद शरैः काञ्चनभूषितैः।
उन राक्षसों ने दुर्जय वीर श्रीराघवेन्द्र पर वे शूल चलाये, परंतु ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी ने उन समस्त चौदहों शूलों को उतने ही सुवर्णभूषित बाणों द्वारा काट डाला॥१७ १/२॥
ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् सूर्यसंनिभान्॥१८॥
जग्राह परमक्रुद्धश्चतुर्दश शिलाशितान्।
गृहीत्वा धनुरायम्य लक्ष्यानुद्दिश्य राक्षसान्॥१९॥
मुमोच राघवो बाणान् वज्रानिव शतक्रतुः।
तत्पश्चात् महातेजस्वी रघुनाथजी ने अत्यन्त कुपित हो शान पर चढ़ाकर तेज किये गये सूर्यतुल्य तेजस्वी चौदह नाराच हाथ में लिये। फिर धनुष लेकर उसपर उन बाणों को रखा और कान तक खींचकर राक्षसों को लक्ष्य करके छोड़ दिया। मानो इन्द्र ने वज्रों का प्रहार किया हो॥१८-१९ १/२॥
ते भित्त्वा रक्षसां वेगाद् वक्षांसि रुधिरप्लुताः॥२०॥
विनिष्पेतुस्तदा भूमौ वल्मीकादिव पन्नगाः।
वे बाण बड़े वेग से उन राक्षसों की छाती छेदकर रुधिर में डूबे हए निकले और बाँबी से बाहर आये हुए सर्पो की भाँति तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़े॥२० १/२॥
तैर्भग्नहृदया भूमौ छिन्नमूला इव द्रुमाः॥२१॥
निपेतुः शोणितस्नाता विकृता विगतासवः।
उन नाराचों से हृदय विदीर्ण हो जाने के कारण वे राक्षस जड़ से कटे हुए वृक्षों की भाँति धराशायी हो गये। वे सब-के-सब खून से नहा गये थे। उनके शरीर विकृत हो गये थे। उस अवस्था में उनके प्राण पखेरू उड़ गये॥२१ १/२॥
तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा राक्षसी क्रोधमूर्छिता॥२२॥
उपगम्य खरं सा तु किंचित्संशुष्कशोणिता।
पपात पुनरेवार्ता सनिर्यासेव वल्लरी॥२३॥
उन सबको पृथ्वी पर पड़ा देख वह राक्षसी क्रोध से मूर्छित हो गयी और खर के पास जाकर पुनः आर्तभाव से गिर पड़ी। उसके कटे हुए कानों और नाकों का खून सूख गया था, इसलिये गोंदयुक्त लता के समान प्रतीत होती थी॥२२-२३॥
भ्रातुः समीपे शोकार्ता ससर्ज निनदं महत् ।
सस्वरं मुमुचे बाष्पं विवर्णवदना तदा॥२४॥
भाई के निकट शोक से पीड़ित हुई शूर्पणखा बड़े जोर से आर्तनाद करने और फूट-फूटकर रोने तथा आँसू बहाने लगी। उस समय उसके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी थी॥२४॥
निपातितान् प्रेक्ष्य रणे तु राक्षसान् प्रधाविता शूर्पणखा पुनस्ततः।
वधं च तेषां निखिलेन रक्षसां शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा॥२५॥
रणभूमि में उन राक्षसों को मारा गया देख खर की बहिन शूर्पणखा पुनः वहाँ से भागी हुई आयी। उसने उन समस्त राक्षसों के वध का सारा समाचार भाई से कह सुनाया॥२५॥
सर्ग २१
स पुनः पतितां दृष्ट्वा क्रोधाच्छूर्पणखां पुनः।
उवाच व्यक्तया वाचा तामनर्थार्थमागताम्॥१॥
शूर्पणखा को पुनः पृथ्वी पर पड़ी हुई देख अनर्थ के लिये आयी हुई उस बहिन से खर ने क्रोधपूर्वक स्पष्ट वाणी में फिर कहा-॥१॥
मया त्विदानीं शूरास्ते राक्षसाः पिशिताशनाः।
त्वत्प्रियार्थं विनिर्दिष्टाः किमर्थं रुद्यते पुनः॥२॥
‘बहिन ! मैंने तुम्हारा प्रिय करने के लिये उस समय बहुत-से शूरवीर एवं मांसाहारी राक्षसों को जाने की आज्ञा दे दी थी, अब फिर तुम किसलिये रो रही हो?॥२॥
भक्ताश्चैवानुरक्ताश्च हिताश्च मम नित्यशः।
हन्यमाना न हन्यन्ते न न कुर्युर्वचो मम॥३॥
‘मैंने जिन राक्षसों को भेजा था, वे मेरे भक्त, मुझमें अनुराग रखने वाले और सदा मेरा हित चाहने वाले हैं। वे किसी के मारने पर भी मर नहीं सकते। उनके द्वारा मेरी आज्ञा का पालन न हो, यह भी सम्भव नहीं है॥३॥
किमेतच्छोतुमिच्छामि कारणं यत्कृते पुनः।
हा नाथेति विनर्दन्ती सर्पवच्चेष्टसे क्षितौ॥४॥
‘फिर ऐसा कौन-सा कारण उपस्थित हो गया, जिसके लिये तुम ‘हा नाथ’ की पुकार मचाती हुई साँप की तरह धरती पर लोट रही हो। मैं उसे सुनना चाहता हूँ॥४॥
अनाथवद् विलपसि किं नु नाथे मयि स्थिते।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ मा मैवं वैक्लव्यं त्यज्यतामिति॥५॥
‘मेरे-जैसे संरक्षक के रहते हुए तुम अनाथ की तरह विलाप क्यों करती हो? उठो! उठो!! इस तरह लोटो मत घबराहट छोड़ दो’॥५॥
इत्येवमुक्ता दुर्धर्षा खरेण परिसान्त्विता।
विमृज्य नयने साने खरं भ्रातरमब्रवीत्॥६॥
खर के इस प्रकार सान्त्वना देने पर वह दुर्धर्षराक्षसी अपने आँसू भरे नेत्रों को पोंछकर भाई खर से बोली-॥६॥
अस्मीदानीमहं प्राप्ता हतश्रवणनासिका।
शोणितौघपरिक्लिन्ना त्वया च परिसान्त्विता॥७॥
‘भैया मैं इस समय फिर तुम्हारे पास क्यों आयी हूँ-यह बताती हूँ, सुनो-मेरे नाक-कान कट गये और मैं खून की धारा से नहा उठी, उस अवस्था में जब पहली बार मैं आयी थी, तब तुमने मुझे बड़ी सान्त्वना दी थी॥७॥
प्रेषिताश्च त्वया शूरा राक्षसास्ते चतुर्दश।
निहन्तुं राघवं घोरं मत्प्रियार्थं सलक्ष्मणम्॥८॥
ते तु रामेण सामर्षाः शूलपट्टिशपाणयः।
समरे निहताः सर्वे सायकैमर्मभेदिभिः॥९॥
‘तत्पश्चात् मेरा प्रिय करने के लिये लक्ष्मणसहित राम का वध करने के उद्देश्य से तुमने जो वे चौदह शूरवीर राक्षस भेजे थे, वे सब-के-सब अमर्ष में भरकर हाथों में शूल और पट्टिश लिये वहाँ जा पहुँचे, परंतु राम ने अपने मर्मभेदी बाणों द्वारा उन सबको समराङ्गण में मार गिराया॥८-९॥
तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा क्षणेनैव महाजवान्।
रामस्य च महत्कर्म महांस्त्रासोऽभवन्मम॥१०॥
‘उन महान् वेगशाली निशाचरों को क्षणभर में ही धराशायी हुआ देख राम के उस महान् पराक्रमपर दृष्टिपात करके मेरे मन में बड़ा भय उत्पन्न हो गया॥१०॥
सास्मि भीता समुद्विग्ना विषण्णा च निशाचर।
शरणं त्वां पुनः प्राप्ता सर्वतो भयदर्शिनी॥११॥
‘निशाचरराज! मैं भयभीत, उद्विग्न और विषादग्रस्त हो गयी हूँ। मुझे सब ओर भय-ही-भय दिखायी देता है, इसीलिये फिर तुम्हारी शरण में आयी हूँ॥११॥
विषादनक्राध्युषिते परित्रासोर्मिमालिनि।
किं मां न त्रायसे मग्नां विपुले शोकसागरे॥१२॥
‘मैं शोक के उस विशाल समुद्र में डूब गयी हूँ, जहाँ विषादरूपी मगर निवास करते हैं और त्रास की तरङ्गमालाएँ उठती रहती हैं। तुम उस शोक सागर से मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हो?॥१२॥
एते च निहता भूमौ रामेण निशितैः शरैः।
ये च मे पदवी प्राप्ता राक्षसाः पिशिताशनाः॥१३॥
‘जो मांसभक्षी राक्षस मेरे साथ गये थे, वे सब-के सब राम के पैने बाणों से मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हैं॥१३॥
मयि ते यद्यनुक्रोशो यदि रक्षःसु तेषु च।
रामेण यदि शक्तिस्ते तेजो वास्ति निशाचर॥१४॥
दण्डकारण्यनिलयं जहि राक्षसकण्टकम्।
‘राक्षसराज! यदि मुझपर और उन मरे हुए राक्षसों पर तुम्हें दया आती हो तथा यदि राम के साथ लोहा लेने के लिये तुम में शक्ति और तेज हो तो उन्हें मार डालो; क्योंकि दण्डकारण्य में घर बनाकर रहने वाले राम राक्षसों के लिये कण्टक हैं॥१४ १/२॥
यदि रामममित्रघ्नं न त्वमद्य वधिष्यसि॥१५॥
तव चैवाग्रतः प्राणांस्त्यक्ष्यामि निरपत्रपा।
‘यदि तुम आज ही शत्रुघाती राम का वध नहीं कर डालोगे तो मैं तुम्हारे सामने ही अपने प्राण त्याग दूंगी; क्योंकि मेरी लाज लुट चुकी है॥१५ १/२॥
बुद्ध्याहमनुपश्यामि न त्वं रामस्य संयुगे॥१६॥
स्थातुं प्रतिमुखे शक्तः सबलोऽपि महारणे।
‘मैं बुद्धि से बारंबार सोचकर देखती हूँ कि तुम महासमर में सबल होकर भी राम के सामने युद्ध में नहीं ठहर सकोगे॥१६ १/२॥
शूरमानी न शूरस्त्वं मिथ्यारोपितविक्रमः॥१७॥
अपयाहि जनस्थानात् त्वरितः सहबान्धवः।
जहि त्वं समरे मूढान्यथा तु कुलपांसन॥१८॥
‘तुम अपने को शूरवीर मानते हो, किंतु तुम में शौर्य है ही नहीं। तुमने झूठे ही अपने-आप में पराक्रम का आरोप कर लिया है। मूढ़ ! तुम समराङ्गण में उन दोनों को मार डालो अन्यथा अपने कुल में कलङ्क लगाकर भाई-बन्धुओं के साथ तुरंत ही इस जनस्थान से भाग जाओ॥१७-१८॥
मानुषौ तौ न शक्नोषि हन्तुं वै रामलक्ष्मणौ।
निःसत्त्वस्याल्पवीर्यस्य वासस्ते कीदृशस्त्विह॥१९॥
‘राम और लक्ष्मण मनुष्य हैं, यदि उन्हें भी मारने की तुममें शक्ति नहीं है तो तुम्हारे-जैसे निर्बल और पराक्रमशून्य राक्षस का यहाँ रहना कैसे सम्भव हो सकता है ?॥१९॥
रामतेजोऽभिभूतो हि त्वं क्षिप्रं विनशिष्यसि।
स हि तेजःसमायुक्तो रामो दशरथात्मजः॥२०॥
भ्राता चास्य महावीर्यो येन चास्मि विरूपिता।
‘तुम राम के तेज से पराजित होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे; क्योंकि दशरथकुमार राम बड़े तेजस्वी हैं। उनका भाई भी महान् पराक्रमी है, जिसने मुझे नाक कान से हीन करके अत्यन्त कुरूप बना दिया’॥२० १/२॥
एवं विलप्य बहुशो राक्षसी प्रदरोदरी॥२१॥
भ्रातुः समीपे शोकार्ता नष्टसंज्ञा बभूव ह।
कराभ्यामुदरं हत्वा रुरोद भृशदुःखिता॥२२॥
इस प्रकार बहुत विलाप करके गुफा के समान गहरे पेटवाली वह राक्षसी शोक से आतुर हो अपने भाई के पास मूर्च्छित-सी हो गयी और अत्यन्त दुःखी हो दोनों हाथों से पेट पीटती हुई फूट-फूटकर रोने लगी। २१-२२॥
सर्ग २२
एवमाधर्षितः शूरः शूर्पणख्या खरस्ततः।
उवाच रक्षसां मध्ये खरः खरतरं वचः॥१॥
शूर्पणखा द्वारा इस प्रकार तिरस्कृत होकर शूरवीर खर ने राक्षसों के बीच अत्यन्त कठोर वाणी में कहा-१॥
तवापमानप्रभवः क्रोधोऽयमतुलो मम।
न शक्यते धारयितुं लवणाम्भ इवोल्बणम्॥२॥
“बहिन! तुम्हारे अपमान के कारण मुझे बेतरह क्रोध चढ़ आया है। इसे धारण करना या दबा देना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमा को प्रचण्ड वेग से बढ़े हुए खारे पानी के समुद्र के जल को (अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे घाव पर नमकीन पानी का छिड़कना)॥२॥
न रामं गणये वीर्यान्मानुषं क्षीणजीवितम्।
आत्मदुश्चरितैः प्राणान् हतो योऽद्य विमोक्ष्यते॥३॥
‘मैं पराक्रम की दृष्टि से राम को कुछ भी नहीं गिनता हूँ; क्योंकि उस मनुष्य का जीवन अब क्षीण हो चला है। वह अपने दुष्कर्मों से ही मारा जाकर आज प्राणों से हाथ धो बैठेगा॥३॥
बाष्पः संधार्यतामेष सम्भ्रमश्च विमुच्यताम्।
अहं रामं सह भ्रात्रा नयामि यमसादनम्॥४॥
‘तुम अपने आँसुओं को रोको और यह घबराहट छोड़ो। मैं भाईसहित राम को अभी यमलोक पहुँचा देता हूँ॥४॥
परश्वधहतस्याद्य मन्दप्राणस्य भूतले।
रामस्य रुधिरं रक्तमुष्णं पास्यसि राक्षसि॥५॥
‘राक्षसी! आज मेरे फरसे की मार से निष्प्राण होकर धरतीपर पड़े हुए राम का गरम-गरम रक्त तुम्हें पीने को मिलेगा’॥५॥
सम्प्रहृष्टा वचः श्रुत्वा खरस्य वदनाच्च्युतम्।
प्रशशंस पुनौाद् भ्रातरं रक्षसां वरम्॥६॥
खर के मुख से निकली हुई इस बात को सुनकर शूर्पणखा को पड़ी प्रसन्नता हुई। उसने मूर्खतावश राक्षसों में श्रेष्ठ भाई खर की पुनः भूरि-भूरि प्रशंसा की॥६॥
तया परुषितः पूर्वं पुनरेव प्रशंसितः।
अब्रवीद् दूषणं नाम खरः सेनापतिं तदा॥७॥
उसने पहले जिसका कठोर वाणी द्वारा तिरस्कार किया और पुनः जिसकी अत्यन्त सराहना की, उस खर ने उस समय अपने सेनापति दूषण से कहा-॥७॥
चतुर्दश सहस्राणि मम चित्तानुवर्तिनाम्।
रक्षसां भीमवेगानां समरेष्वनिवर्तिनाम॥८॥
नीलजीमूतवर्णानां लोकहिंसाविहारिणाम्।
सर्वोद्योगमुदीर्णानां रक्षसां सौम्य कारय॥९॥
‘सौम्य! मेरे मन के अनुकूल चलने वाले, युद्ध के मैदान से पीछे न हटने वाले, भयंकर वेगशाली, मेघों की काली घटा के समान काले रंगवाले, लोगों की हिंसा से ही क्रीड़ा-विहार करने वाले तथा युद्ध में उत्साहपूर्वक आगे बढ़ने वाले चौदह सहस्र राक्षसों को युद्ध के लिये भेजने की पूरी तैयारी कराओ॥८-९॥
उपस्थापय मे क्षिप्रं रथं सौम्य धनूंषि च।
शरांश्च चित्रान् खड्गांश्च शक्तीश्च विविधाः शिताः॥१०॥
सौम्य सेनापते! तुम शीघ्र ही मेरा रथ भी यहाँ मँगवा लो। उस पर बहुत-से धनुष, बाण, विचित्रविचित्र खड्ग और नाना प्रकार की तीखी शक्तियों को भी रख दो॥१०॥
अग्रे निर्यातुमिच्छामि पौलस्त्यानां महात्मनाम्।
वधार्थं दुर्विनीतस्य रामस्य रणकोविद॥११॥
‘रणकुशल वीर! मैं इस उद्दण्ड राम का वध करने के लिये महामनस्वी पुलस्त्यवंशी राक्षसों के आगे-आगे जाना चाहता हूँ’॥११॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य सूर्यवर्ण महारथम्।
सदश्वैः शबलैर्युक्तमाचचक्षेऽथ दूषणः॥१२॥
उसके इस प्रकार आज्ञा देते ही एक सूर्य के समान प्रकाशमान और चितकबरे रंग के अच्छे घोड़ों से जुता हुआ विशाल रथ वहाँ आ गया दूषण ने खर को इसकी सूचना दी॥१२॥
तं मेरुशिखराकारं तप्तकाञ्चनभूषणम्।
हेमचक्रमसम्बाधं वैदूर्यमयकूबरम्॥१३॥
मत्स्यैः पुष्पैर्दुमैः शैलैश्चन्द्रसूर्यैश्च काञ्चनैः।
माङ्गल्यैः पक्षिसङ्घश्च ताराभिश्च समावृतम्॥१४॥
ध्वजनिस्त्रिंशसम्पन्नं किंकिणीवरभूषितम्।
सदश्वयुक्तं सोऽमर्षादारुरोह खरस्तदा॥१५॥
वह रथ मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोने के बने हुए साज-बाज से सजाया गया था, उसके पहियों में सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथ के कूबर वैदूर्यमणि से जड़े गये थे, उसकी सजावट के लिये सोने के बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियों के समुदाय तथा तारिकाओं से वह रथ सुशोभित हो रहा था, उस पर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथ के भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुघुरुओं से सजे और उत्तम घोड़ों से जुते हुए उस रथ पर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिन के अपमान का स्मरण करके उसके मन में बड़ा अमर्ष हो रहा था॥१३–१५॥
खरस्तु तन्महत्सैन्यं रथचर्मायुधध्वजम्।
निर्यातेत्यब्रवीत् प्रेक्ष्य दूषणः सर्वराक्षसान्॥१६॥
रथ, ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वज से सम्पन्न उस विशाल सेना की ओर देखकर खर और दूषण ने समस्त राक्षसों से कहा-’निकलो, आगे बढ़ो’॥१६॥
ततस्तद् राक्षसं सैन्यं घोरचर्मायुधध्वजम्।
निर्जगाम जनस्थानान्महानादं महाजवम्॥१७॥
कूच करने की आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजा से युक्त वह विशाल राक्षस सेना जोर-जोर से गर्जना करती हुई जनस्थान से बड़े वेग के साथ निकली॥१७॥
मुद्गरैः पट्टिशैः शूलैः सुतीक्ष्णैश्च परश्वधैः ।
खड्गैश्चक्रैश्च हस्तस्थैर्भ्राजमानैः सतोमरैः॥१८॥
शक्तिभिः परिघैोरैरतिमात्रैश्च कार्मुकैः।
गदासिमुसलैर्वज्रर्गृहीतैर्भीमदर्शनैः॥१९॥
राक्षसानां सुघोराणां सहस्राणि चतुर्दश।
निर्यातानि जनस्थानात् खरचित्तानुवर्तिनाम्॥२०॥
सैनिकों के हाथ में मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फर से, खड़ग, चक्र और तोमर चमक उठे। शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र (आठ कोणवाले आयुधविशेष) उन राक्षसों के हाथों में आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे। इन अस्त्र-शस्त्रों से उपलक्षित और खर के मन की इच्छा के अनुसार चलने वाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थान से युद्ध के लिये चले॥१८-२०॥
तांस्तु निर्धावतो दृष्ट्वा राक्षसान् भीमदर्शनान्।
खरस्याथ रथः किंचिज्जगाम तदनन्तरम्॥२१॥
उन भयंकर दिखायी देने वाले राक्षसों को धावा करते देख खर का रथ भी कुछ देर सैनिकों के निकलने की प्रतीक्षा करके उनके साथ ही आगे बढ़ा॥२१॥
ततस्ताञ्छबलानश्वांस्तप्तकाञ्चनभूषितान्।
खरस्य मतमाज्ञाय सारथिः पर्यचोदयत्॥२२॥
तदनन्तर खर का अभिप्राय जानकर उसके सारथि ने तपाये हुए सोनेके आभूषणों से विभूषित उन चितकबरे घोड़ों को हाँका॥२२॥
संचोदितो रथः शीघ्रं खरस्य रिपुघातिनः।
शब्देनापूरयामास दिशः सप्रदिशस्तथा॥२३॥
उसके हाँकने पर शत्रुघाती खर का रथ शीघ्र ही अपने घर-घर शब्द से सम्पूर्ण दिशाओं तथा उपदिशाओं को प्रतिध्वनित करने लगा॥२३॥
प्रवृद्धमन्युस्तु खरः खरस्वरो रिपोर्वधार्थं त्वरितो यथान्तकः।
अचूचुदत् सारथिमुन्नदन् पुनमहाबलो मेघ इवाश्मवर्षवान्॥२४॥
उस समय खर का क्रोध बढ़ा हुआ था। उसका स्वर भी कठोर हो गया था। वह शत्रु के वध के लिये उतावला होकर यमराज के समान भयानक जान पड़ता था। जैसे ओलों की वर्षा करने वाला मेघ बड़े जोर से गर्जना करता है, उसी प्रकार महाबली खर ने उच्चस्वर से सिंहनाद करके पुनः सारथि को रथ हाँकने के लिये प्रेरित किया॥
सर्ग २३
तत्प्रयातं बलं घोरमशिवं शोणितोदकम्।
अभ्यवर्षन्महाघोरस्तुमलो गर्दभारुणः॥१॥
उस सेना के प्रस्थान करते समय आकाश में गधे के समान धूसर रंग वाले बादलों की महाभयंकर घटा घिरआयी। उसकी तुमुल गर्जना होने लगी तथा सैनिकों के ऊपर घोर अमङ्गल सूचक रक्तमय जल की वर्षा आरम्भ हो गयी॥१॥
निपेतुस्तुरगास्तस्य रथयुक्ता महाजवाः।
समे पुष्पचिते देशे राजमार्गे यदृच्छया॥२॥
खर के रथ में जुते हुए महान् वेगशाली घोड़े फूल बिछे हुए समतल स्थान में सड़क पर चलते-चलते अकस्मात् गिर पड़े॥२॥
श्यामं रुधिरपर्यन्तं बभूव परिवेषणम्।
अलातचक्रप्रतिमं प्रतिगृह्य दिवाकरम्॥३॥
सूर्यमण्डल के चारों ओर अलात चक्र के समान गोलाकार घेरा दिखायी देने लगा, जिसका रंग काला और किनारे का रंग लाल था॥३॥
ततो ध्वजमुपागम्य हेमदण्डं समुच्छ्रितम्।
समाक्रम्य महाकायस्तस्थौ गृध्रः सुदारुणः॥४॥
तदनन्तर खर के रथ की सुवर्णमय दण्डवाली ऊँची ध्वजा पर एक विशालकाय गीध आकर बैठ गया, जो देखने में बड़ा ही भयंकर था॥४॥
जनस्थानसमीपे च समाक्रम्य खरस्वनाः।
विस्वरान् विविधान् नादान् मांसादा मृगपक्षिणः॥५॥
व्याजहरभिदीप्तायां दिशि वै भैरवस्वनम्।
अशिवं यातुधानानां शिवा घोरा महास्वनाः॥
कठोर स्वर वाले मांसभक्षी पशु और पक्षी जनस्थान के पास आकर विकृत स्वर में अनेक प्रकार के विकट शब्द बोलने लगे तथा सूर्य की प्रभा से प्रकाशित हई दिशाओं में जोर-जोर से चीत्कार करने वाले और मुँह से आग उगलने वाले भयंकर गीदड़ राक्षसों के लिये अमङ्गलजनक भैरवनाद करने लगे॥५-६॥
प्रभिन्नगजसंकाशास्तोयशोणितधारिणः।
आकाशं तदनाकाशं चक्रुर्भीमाम्बुवाहकाः॥७॥
भयंकर मेघ, जो मदकी धारा बहाने वाले गजराज के समान दिखायी देते थे और जल की जगह रक्त धारण किये हए थे, तत्काल घिर आये। उन्होंने समूचे आकाश को ढक दिया। थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं रहने दिया॥७॥
बभूव तिमिरं घोरमुद्धतं रोमहर्षणम्।
दिशो वा प्रदिशो वापि सुव्यक्तं न चकाशिरे॥८॥
सब ओर अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी घना अन्धकार छा गया। दिशाओं अथवा कोणों का स्पष्ट रूप से भान नहीं हो पाता था॥८॥
क्षतजार्द्रसवर्णाभा संध्या कालं विना बभौ।
खरं चाभिमुखं नेदुस्तदा घोरा मृगाः खगाः॥९॥
बिना समय के ही खून से भीगे हुए वस्त्र के समान रंगवाली संध्या प्रकट हो गयी। उस समय भयंकर पशु-पक्षी खर के सामने आकर गर्जना करने लगे॥९॥
कङ्कगोमायुगृध्राश्च चुक्रुशुर्भयशंसिनः।
नित्याशिवकरा युद्धे शिवा घोरनिदर्शनाः॥१०॥
नेदुर्बलस्याभिमुखं ज्वालोद्गारिभिराननैः।
भय की सूचना देने वाले कङ्क (सफेद चील),गीदड़ और गीध खर के सामने चीत्कार करने लगे। युद्ध में सदा अमङ्गल सूचित करने वाली और भय दिखाने वाली गीदड़ियाँ खर की सेना के सामने आकर आग उगलने वाले मुखों से घोर शब्द करने लगीं॥१० १/२॥
कबन्धः परिघाभासो दृश्यते भास्करान्तिके॥११॥
जग्राह सूर्यं स्वर्भानुरपर्वणि महाग्रहः।
प्रवाति मारुतः शीघ्रं निष्प्रभोऽभूद् दिवाकरः॥१२॥
सूर्यके निकट परिघ के समान कबन्ध (सिर कटा हुआ धड़) दिखायी देने लगा। महान् ग्रह राहु अमावास्या के बिना ही सूर्य को ग्रसने लगा। हवा तीव्र गति से चलने लगी एवं सूर्यदेव की प्रभा फीकी पड़ गयी॥११-१२॥
उत्पेतुश्च विना रात्रिं ताराः खद्योतसप्रभाः।
संलीनमीनविहगा नलिन्यः शुष्कपङ्कजाः॥१३॥
बिना रात के ही जुगनू के समान चमकने वाले तारे आकाश में उदित हो गये। सरोवरों में मछली और जलपक्षी विलीन हो गये। उनके कमल सूख गये॥१३॥
तस्मिन् क्षणे बभूवुश्च विना पुष्पफलैर्दुमाः।
उद्धृतश्च विना वातं रेणुर्जलधरारुणः॥१४॥
उस क्षण में वृक्षों के फूल और फल झड़ गये। बिना हवा के ही बादलों के समान धूसर रंग की धूल ऊपर उठकर आकाश में छा गयी॥१४॥
चीचीकूचीति वाश्यन्त्यो बभूवुस्तत्र सारिकाः।
उल्काश्चापि सनि?षा निपेत?रदर्शनाः॥१५॥
वहाँ वन की सारिकाएँ चें-चें करने लगीं। भारी आवाज के साथ भयानक उल्काएँ आकाश से पृथ्वी पर गिरने लगीं॥१५॥
प्रचचाल मही चापि सशैलवनकानना।
खरस्य च रथस्थस्य नर्दमानस्य धीमतः॥१६॥
प्राकम्पत भुजः सव्यः स्वरश्चास्यावसज्जत।
साम्रा सम्पद्यते दृष्टिः पश्यमानस्य सर्वतः॥१७॥
पर्वत, वन और काननों सहित धरती डोलने लगी। बुद्धिमान् खर रथ पर बैठकर गर्जना कर रहा था। उस समय उसकी बायीं भुजा सहसा काँप उठी। स्वर अवरुद्ध हो गया और सब ओर देखते समय उसकी आँखों में आँसू आने लगे॥१६-१७॥
ललाटे च रुजो जाता न च मोहान्न्यवर्तत।
तान् समीक्ष्य महोत्पातानुत्थितान् रोमहर्षणान्॥१८॥
अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् प्रहसन् स खरस्तदा।
उसके सिर में दर्द होने लगा, फिर भी मोहवश वह युद्ध से निवृत्त नहीं हुआ। उस समय प्रकट हुए उन बड़े-बड़े रोमाञ्चकारी उत्पातों को देखकर खर जोर-जोरसे हँसने लगा और समस्त राक्षसों से बोला-॥१८ १/२॥
महोत्पातानिमान् सर्वानुत्थितान् घोरदर्शनान्॥१९॥
न चिन्तयाम्यहं वीर्याद् बलवान् दुर्बलानिव।
तारा अपि शरैस्तीक्ष्णैः पातयेयं नभस्तलात्॥२०॥
‘ये जो भयानक दिखायी देने वाले बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इन सबकी मैं अपने बल के भरोसे कोई परवा नहीं करता; ठीक उसी तरह, जैसे बलवान् वीर दुर्बल शत्रुओं को कुछ नहीं समझता है। मैं अपने तीखे बाणों द्वारा आकाश से तारों को भी गिरा सकता हूँ॥१९-२०॥
मृत्यु मरणधर्मेण संक्रुद्धो योजयाम्यहम्।
राघवं तं बलोत्सिक्तं भ्रातरं चापि लक्ष्मणम्॥२१॥
अहत्वा सायकैस्तीक्ष्णैर्नोपावर्तितुमुत्सहे।
‘यदि कुपित हो जाऊँ तो मृत्यु को भी मौत के मुख में डाल सकता हूँ। आज बल का घमंड रखने वाले राम और उसके भाई लक्ष्मण को तीखे बाणों से मारे बिना मैं पीछे नहीं लौट सकता॥२१ १/२॥
यन्निमित्तं तु रामस्य लक्ष्मणस्य विपर्ययः॥२२॥
सकामा भगिनीमेऽस्तु पीत्वा त रुधिरं तयोः।
‘जिसे दण्ड देने के लिये राम और लक्ष्मण की बुद्धि में विपरीत विचार (क्रूरतापूर्ण कर्म करने के भाव) का उदय हुआ है, वह मेरी बहिन शूर्पणखा उन दोनोंका खून पीकर सफल मनोरथ हो जाय॥२२ १/२॥
न क्वचित् प्राप्तपूर्वो मे संयुगेषु पराजयः॥२३॥
युष्माकमेतत् प्रत्यक्षं नानृतं कथयाम्यहम्।
‘आजतक जितने युद्ध हुए हैं, उनमें से किसी में भी पहले मेरी कभी पराजय नहीं हुई है; यह तुम लोगों ने प्रत्यक्ष देखा है मैं झूठ नहीं कहता हूँ॥२३ १/२॥
देवराजमपि क्रुद्धो मत्तैरावतगामिनम्॥२४॥
वज्रहस्तं रणे हन्यां किं पुनस्तौ च मानवौ।
‘मैं मतवाले ऐरावत पर चलने वाले वज्रधारी देवराज इन्द्र को भी रणभूमि में कुपित होकर काल के गाल में डाल सकता हूँ, फिर उन दो मनुष्यों की तो बात ही क्या है ?’॥२४ १/२॥
सा तस्य गर्जितं श्रुत्वा राक्षसानां महाचमूः॥२५॥
प्रहर्षमतुलं लेभे मृत्युपाशावपाशिता।
खर की यह गर्जना सुनकर राक्षसों की वह विशाल सेना, जो मौत के पाश से बँधी हुई थी, अनुपम हर्ष से भर गयी॥ २५ १/२॥
समेयुश्च महात्मानो युद्धदर्शनकांक्षिणः॥२६॥
ऋषयो देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः।
समेत्य चोचुः सहितास्तेऽन्योन्यं पुण्यकर्मणः॥२७॥
उस समय युद्ध देखने की इच्छा वाले बहुत से पुण्यकर्मा महात्मा, ऋषि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण वहाँ एकत्र हो गये। एकत्र हो वे सभी मिलकर एक-दूसरेसे कहने लगे-॥२६-२७॥
स्वस्ति गोब्राह्मणेभ्यस्तु लोकानां ये च सम्मताः।
जयतां राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनीचरान्॥२८॥
चक्रहस्तो यथा विष्णुः सर्वानसुरसत्तमान्।
‘गौओं और ब्राह्मणों का कल्याण हो तथा जो अन्य लोकप्रिय महात्मा हैं, वे भी कल्याण के भागी हों। जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु समस्त असुर शिरोमणियों को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार रघुकुलभूषण श्रीराम युद्ध में इन पुलस्त्यवंशी निशाचरों को पराजित करें’॥२८ १/२॥
एतच्चान्यच्च बहुशो ब्रुवाणाः परमर्षयः॥२९॥
जातकौतूहलास्तत्र विमानस्थाश्च देवताः।
ददृशुर्वाहिनीं तेषां राक्षसानां गतायुषाम्॥३०॥
ये तथा और भी बहुत-सी मङ्गलकामना सूचक बातें कहते हुए वे महर्षि और देवता कौतूहलवश विमान पर बैठकर जिनकी आयु समाप्त हो चली थी, उन राक्षसों की उस विशाल वाहिनी को देखने लगे॥२९-३०॥
रथेन तु खरो वेगात् सैन्यस्याग्राद् विनिःसृतः।
श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुर्विहंगमः॥३१॥
दुर्जयः करवीराक्षः परुषः कालकार्मुकः।
हेममाली महामाली सस्यो रुधिराशनः॥३२॥
द्वादशैते महावीर्याः प्रतस्थुरभितः खरम्।
खर रथ के द्वारा बड़े वेग से चलकर सारी सेना से आगे निकल आया और श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहंगम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मक, हेममाली, महामाली, सस्य तथा रुधिराशन—ये बारह महापराक्रमी राक्षस खर को दोनों ओर से घेरकर उसके साथ-साथ चलने लगे॥३१-३२ १/२॥
महाकपालः स्थूलाक्षः प्रमाथस्त्रिशिरास्तथा।
चत्वार एते सेनाग्रे दूषणं पृष्ठतोऽन्वयुः॥३३॥
महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथ और त्रिशिरा ये चार राक्षस-वीर सेना के आगे और सेनापति दूषण के पीछे-पीछे चल रहे थे॥३३॥
सा भीमवेगा समराभिकांक्षिणी सुदारुणा राक्षसवीरसेना।
तौ राजपुत्रौ सहसाभ्युपेता माला ग्रहाणामिव चन्द्रसूर्यो॥३४॥
राक्षस वीरों की वह भयंकर वेगवाली अत्यन्त दारुण सेना, जो युद्ध की अभिलाषा से आ रही थी, सहसा उन दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण के पास जा पहुँची, मानो ग्रहों की पंक्ति चन्द्रमा और सूर्य के समीप प्रकाशित हो रही हो॥३४॥
सर्ग २४
आश्रमं प्रतियाते तु खरे खरपराक्रमे।
तानेवौत्पातिकान् रामः सह भ्रात्रा ददर्श ह॥१॥
प्रचण्ड पराक्रमी खर जब श्रीराम के आश्रम की ओर चला, तब भाईसहित श्रीराम ने भी उन्हीं उत्पातसूचक लक्षणों को देखा॥१॥
तानुत्पातान् महाघोरान् रामो दृष्ट्वात्यमर्षणः।
प्रजानामहितान् दृष्ट्वा वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत्॥२॥
प्रजा के अहित की सूचना देने वाले उन महाभयंकर उत्पातों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी राक्षसों के उपद्रव का विचार करके अत्यन्त अमर्ष में भर गये और लक्ष्मण से इस प्रकार बोले-॥२॥
इमान् पश्य महाबाहो सर्वभूतापहारिणः।
समुत्थितान् महोत्पातान् संहर्तुं सर्वराक्षसान्॥३॥
‘महाबाहो! ये जो बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इनकी ओर दृष्टिपात करो। समस्त भूतों के संहार की सूचना देने वाले ये महान् उत्पात इस समय इन सारे राक्षसों का संहार करने के लिये उत्पन्न हुए हैं॥३॥
अमी रुधिरधारास्तु विसृजन्ते खरस्वनाः।
व्योम्नि मेघा निवर्तन्ते परुषा गर्दभारुणाः॥४॥
‘आकाश में जो गधों के समान धूसर वर्णवाले बादल इधर-उधर विचर रहे हैं, ये प्रचण्ड गर्जना करते हुए खून की धाराएँ बरसा रहे हैं।॥४॥
सधूमाश्च शराः सर्वे मम युद्धाभिनन्दिताः।
रुक्मपृष्ठानि चापानि विचेष्टन्ते विचक्षण॥५॥
‘युद्धकुशल लक्ष्मण! मेरे सारे बाण उत्पातवश उठने वाले धूम से सम्बद्ध हो युद्ध के लिये मानो आनन्दित हो रहे हैं तथा जिनके पृष्ठभाग में सुवर्ण मढ़ाहुआ है, वे मेरे धनुष भी प्रत्यञ्चा से जुड़ जाने के लिये स्वयं ही चेष्टाशील जान पड़ते हैं॥५॥
यादृशा इह कूजन्ति पक्षिणो वनचारिणः।
अग्रतो नोऽभयं प्राप्तं संशयो जीवितस्य च॥६॥
‘यहाँ जैसे-जैसे वनचारी पक्षी बोल रहे हैं, उनसे हमारे लिये भविष्य में अभय की और राक्षसों के लिये प्राणसंकट की प्राप्ति सूचित हो रही है॥६॥
सम्प्रहारस्तु सुमहान् भविष्यति न संशयः।
अयमाख्याति मे बाहुः स्फुरमाणो मुहुर्मुहुः॥७॥
‘मेरी यह दाहिनी भुजा बारंबार फड़ककर इस बात की सूचना देती है कि कुछ ही देर में बहुत बड़ा युद्ध होगा, इसमें संशय नहीं है॥७॥
संनिकर्षे तु नः शूर जयं शत्रोः पराजयम्।
सुप्रभं च प्रसन्नं च तव वक्त्रं हि लक्ष्यते॥८॥
‘शूरवीर लक्ष्मण! परंतु निकट भविष्य में ही हमारी विजय और शत्रु की पराजय होगी; क्योंकि तुम्हारा मुख कान्तिमान् एवं प्रसन्न दिखायी दे रहा है॥८॥
उद्यतानां हि युद्धार्थं येषां भवति लक्ष्मण।
निष्प्रभं वदनं तेषां भवत्यायुः परिक्षयः॥९॥
‘लक्ष्मण! युद्ध के लिये उद्यत होने पर जिनका मुख प्रभाहीन (उदास) हो जाता है, उनकी आयु नष्ट हो जाती है॥९॥
रक्षसां नर्दतां घोरः श्रूयतेऽयं महाध्वनिः।
आहतानां च भेरीणां राक्षसैः करकर्मभिः॥१०॥
‘गरजते हुए राक्षसों का यह घोर नाद सुनायी देता है, तथा क्रूरकर्मा राक्षसों द्वारा बजायी गयी भेरियों की यह महाभयंकर ध्वनि कानों में पड़ रही है॥१०॥
अनागतविधानं तु कर्तव्यं शुभमिच्छता।
आपदं शङ्कमानेन पुरुषेण विपश्चिता॥११॥
‘अपना कल्याण चाहने वाले विद्वान् पुरुष को उचित है कि आपत्ति की आशङ्का होने पर पहले से ही उससे बचने का उपाय कर ले॥११॥
तस्माद् गृहीत्वा वैदेहीं शरपाणिर्धनुर्धरः।
गुहामाश्रय शैलस्य दुर्गा पादपसंकुलाम्॥१२॥
‘इसलिये तुम धनुष-बाण धारण करके विदेहकुमारी सीता को साथ ले पर्वत की उस गुफा में चले जाओ, जो वृक्षों से आच्छादित है॥१२॥
प्रतिकूलितुमिच्छामि न हि वाक्यमिदं त्वया।
शापितो मम पादाभ्यां गम्यतां वत्स मा चिरम्॥१२॥
‘वत्स! तुम मेरे इस वचन के प्रतिकूल कुछ कहो या करो, यह मैं नहीं चाहता। अपने चरणों की शपथ दिलाकर कहता हूँ, शीघ्र चले जाओ॥१३॥
त्वं हि शूरश्च बलवान् हन्या एतान् न संशयः।
स्वयं निहन्तुमिच्छामि सर्वानेव निशाचरान्॥१४॥
‘इसमें संदेह नहीं कि तुम बलवान् और शूरवीर हो तथा इन राक्षसों का वध कर सकते हो; तथापि मैं स्वयं ही इन निशाचरों का संहार करना चाहता हूँ (इसलिये तुम मेरी बात मानकर सीता को सुरक्षित रखने के लिये इसे गुफा में ले जाओ) ‘॥१४॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः सह सीतया।
शरानादाय चापं च गुहां दुर्गा समाश्रयत्॥१५॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर लक्ष्मण धनुष-बाण ले सीता के साथ पर्वत की दुर्गम गुफा में चले गये॥१५॥
तस्मिन् प्रविष्टे तु गुहां लक्ष्मणे सह सीतया।
हन्त निर्युक्तमित्युक्त्वा रामः कवचमाविशत्॥१६॥
सीतासहित लक्ष्मण के गुफा के भीतर चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने ‘हर्ष की बात है, लक्ष्मण ने शीघ्र मेरी बात मान ली और सीता की रक्षा का समुचित प्रबन्ध हो गया’ ऐसा कहकर कवच धारण किया॥१६॥
स तेनाग्निनिकाशेन कवचेन विभूषितः।
बभूव रामस्तिमिरे महानग्निरिवोत्थितः॥१७॥
प्रज्वलित आग के समान प्रकाशित होने वाले उस कवच से विभूषित हो श्रीराम अन्धकार में प्रकट हुए महान् अग्निदेव के समान शोभा पाने लगे॥१७॥
स चापमुद्यम्य महच्छरानादाय वीर्यवान्।
सम्बभूवास्थितस्तत्र ज्यास्वनैः पूरयन् दिशः॥१८॥
पराक्रमी श्रीराम महान् धनुष एवं बाण हाथ में लेकर युद्ध के लिये डटकर खड़े हो गये और प्रत्यञ्चा की टंकार से सम्पूर्ण दिशाओं को जाने लगे॥१८॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः।
समेयुश्च महात्मानो युद्धदर्शनकांक्षया॥१९॥
तदनन्तर श्रीराम और राक्षसों का युद्ध देखने की इच्छा से देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण आदिमहात्मा वहाँ एकत्र हो गये॥१९॥
ऋषयश्च महात्मानो लोके ब्रह्मर्षिसत्तमाः।
समेत्य चोचुः सहितास्तेऽन्योन्यं पुण्यकर्मणः॥२०॥
स्वस्ति गोब्राह्मणानां च लोकानां चेति संस्थिताः।
जयतां राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनीचरान्॥२१॥
चक्रहस्तो यथा युद्धे सर्वानसुरपुंगवान्।
इनके सिवा, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध ब्रह्मर्षिशिरोमणि पुण्यकर्मा महात्मा ऋषि हैं, वे सभी वहाँ जुट गये और एक साथ खड़े हो परस्पर मिलकर यों कहने लगे—’गौओं, ब्राह्मणों और समस्त लोकों का कल्याण हो। जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु युद्ध में समस्त श्रेष्ठ असुरों को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार इस संग्राम में श्रीरामचन्द्रजी पुलस्त्यवंशी निशाचरों पर विजय प्राप्त करें’॥२०-२१ १/२॥
एवमुक्त्वा पुनः प्रोचुरालोक्य च परस्परम्॥२२॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
एकश्च रामो धर्मात्मा कथं युद्धं भविष्यति॥२३॥
ऐसा कहकर वे पुनः एक-दूसरे की ओर देखते हुए बोले—’एक ओर भयंकर कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षस हैं और दूसरी ओर अकेले धर्मात्मा श्रीराम हैं, फिर यह युद्ध कैसे होगा?’॥२२-२३॥
इति राजर्षयः सिद्धाः सगणाश्च द्विजर्षभाः।
जातकौतूहलास्तस्थुर्विमानस्थाश्च देवताः॥२४॥
ऐसी बातें करते हए राजर्षि, सिद्ध, विद्याधर आदि देवयोनिगण सहित श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि तथा विमानपर स्थित हुए देवता कौतूहलवश वहाँ खड़े हो गये॥२४॥
आविष्टं तेजसा रामं संग्रामशिरसि स्थितम्।
दृष्ट्वा सर्वाणि भूतानि भयाद् विव्यथिरे तदा॥२५॥
युद्ध के मुहाने पर वैष्णव तेज से आविष्ट हुए श्रीराम को खड़ा देख उस समय सब प्राणी (उनके प्रभाव को न जानने के कारण) भय से व्यथित हो उठे॥२५॥
रूपमप्रतिमं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
बभूव रूपं क्रुद्धस्य रुद्रस्येव महात्मनः॥२६॥
अनायास ही महान् कर्म करने वाले तथा रोष में भरे हुए महात्मा श्रीराम का वह रूप कुपित हुए रुद्रदेव के समान तुलनारहित प्रतीत होता था॥२६॥
इति सम्भाष्यमाणे तु देवगन्धर्वचारणैः।
ततो गम्भीरनिर्हादं घोरचर्मायुधध्वजम्॥२७॥
अनीकं यातुधानानां समन्तात् प्रत्यपद्यत।
जब देवता, गन्धर्व और चारण पूर्वोक्त रूप से श्रीराम की मङ्गलकामना कर रहे थे, उसी समय भयंकर ढाल-तलवार आदि आयुधों और ध्वजाओं से उपलक्षित होने वाली निशाचरों की वह सेना गम्भीर गर्जना करती हुई चारों ओर से श्रीरामजी के पास आ पहुँची॥२७ १/२॥
वीरालापान् विसृजतामन्योन्यमभिगच्छताम्॥२८॥
चापानि विस्फारयतां जृम्भतां चाप्यभीक्ष्णशः।
विप्रघुष्टस्वनानां च दुन्दुभींश्चापि निघ्नताम्॥२९॥
तेषां सुतुमुलः शब्दः पूरयामास तद् वनम्।
वे राक्षस-सैनिक वीरोचित वार्तालाप करते, युद्ध का ढंग बताने के लिये एक-दूसरे के सामने जाते, धनुषों को खींचकर उनकी टंकार फैलाते, बारंबार मदमत्त होकर उछलते, जोर-जोर से गर्जना करते और नगाड़े पीटते थे। उनका वह अत्यन्त तुमुल नाद उस वन में सब ओर गूंजने लगा॥२८-२९ १/२॥
तेन शब्देन वित्रस्ताः श्वापदा वनचारिणः॥३०॥
दुद्रुवुर्यत्र निःशब्दं पृष्ठतो नावलोकयन्।
उस शब्द से डरे हुए वनचारी हिंसक जन्तु उस वन में गये, जहाँ किसी प्रकार का कोलाहल नहीं सुनायी पड़ता था। वे वन्यजन्तु भय के मारे पीछे फिरकर देखते भी नहीं थे॥३० १/२॥
तच्चानीकं महावेगं रामं समनुवर्तत॥३१॥
धृतनानाप्रहरणं गम्भीरं सागरोपमम्।
वह सेना बड़े वेग से श्रीराम की ओर चली। उसमें नाना प्रकार के आयुध धारण करने वाले सैनिक थे। वह समुद्र के समान गम्भीर दिखायी देती थी॥३१ १/२॥
रामोऽपि चारयंश्चक्षुः सर्वतो रणपण्डितः॥३२॥
ददर्श खरसैन्यं तद् युद्धायाभिमुखो गतः।
युद्धकला के विद्वान् श्रीरामचन्द्रजी ने भी चारों ओर दृष्टिपात करते हुए खर की सेना का निरीक्षण किया और वे युद्ध के लिये उसके सामने बढ़ गये॥३२ १/२॥
वितत्य च धनुर्भीमं तूण्याश्चोद्धृत्य सायकान्॥३३॥
क्रोधमाहारयत् तीव्र वधार्थं सर्वरक्षसाम्।
दुष्प्रेक्ष्यश्चाभवत् क्रुद्धो युगान्ताग्निरिव ज्वलन्॥३४॥
फिर उन्होंने तरकस से अनेक बाण निकाले और अपने भयंकर धनुष को खींचकर सम्पूर्ण राक्षसों का वध करने के लिये तीव्र क्रोध प्रकट किया। कुपित होने पर वे प्रलयकालिक अग्नि के समान प्रज्वलित होने लगे उस समय उनकी ओर देखना भी कठिन हो गया॥३३-३४॥
तं दृष्ट्वा तेजसाऽऽविष्टं प्राव्यथन् वनदेवताः॥
तस्य रुष्टस्य रूपं तु रामस्य ददृशे तदा।
दक्षस्येव क्रतुं हन्तुमुद्यतस्य पिनाकिनः॥३५॥
तेज से आविष्ट हुए श्रीराम को देखकर वन के देवता व्यथित हो उठे। उस समय रोष में भरे हुए श्रीराम का रूप दक्ष यज्ञ का विनाश करने के लिये उद्यत हुए पिनाकधारी महादेवजी के समान दिखायी देने लगा॥३५॥
तत्कार्मुकैराभरणै रथैश्च तद्भर्मभिश्चाग्निसमानवणैः।
बभूव सैन्यं पिशिताशनानां सूर्योदये नीलमिवाभ्रजालम्॥३६॥
धनुषों, आभूषणों, रथों और अग्नि के समान कान्तिवाले चमकीले कवचों से युक्त वह पिशाचों की सेना सूर्योदयकाल में नीले मेघों की घटा के समान प्रतीत होती थी॥३६॥
सर्ग २५
अवष्टब्धधनु रामं क्रुद्धं तं रिपुघातिनम्।
ददर्शाश्रममागम्य खरः सह पुरःसरैः॥१॥
तं दृष्ट्वा सगुणं चापमुद्यम्य खरनिःस्वनम्।
रामस्याभिमुखं सूतं चोद्यतामित्यचोदयत्॥२॥
खर ने अपने अग्रगामी सैनिकों के साथ आश्रम के पास पहुँचकर क्रोध में भरे हुए शत्रुघाती श्रीराम को देखा, जो हाथ में धनुष लिये खड़े थे। उन्हें देखते ही अपने तीव्र टंकार करने वाले प्रत्यञ्चासहित धनुष को उठाकर सूत को आज्ञा दी-’मेरा रथ राम के सामने ले चलो’॥१-२॥
स खरस्याज्ञया सूतस्तुरगान् समचोदयत्।
यत्र रामो महाबाहुरेको धुन्वन् धनुः स्थितः॥३॥
खर की आज्ञा से सारथि ने घोड़ों को उधर ही बढ़ाया, जहाँ महाबाहु श्रीराम अकेले खड़े होकर अपने धनुष की टंकार कर रहे थे॥३॥
तं तु निष्पतितं दृष्ट्वा सर्वतो रजनीचराः।
मुञ्चमाना महानादं सचिवाः पर्यवारयन्॥४॥
खर को श्रीराम के समीप पहुँचा देख श्येनगामी आदि उसके निशाचर मन्त्री भी बड़े जोर से सिंहनाद करके उसे चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये॥४॥
स तेषां यातुधानानां मध्ये रथगतः खरः।
बभूव मध्ये ताराणां लोहिताङ्ग इवोदितः॥५॥
उन राक्षसों के बीच में रथ पर बैठा हुआ खर तारों के मध्यभाग में उगे हुए मङ्गल की भाँति शोभा पा रहा था।॥५॥
ततः शरसहस्रेण राममप्रतिमौजसम्।
अर्दयित्वा महानादं ननाद समरे खरः॥६॥
उस समय खर ने समराङ्गण में सहस्रों बाणों द्वारा अप्रतिम बलशाली श्रीराम को पीड़ित-सा करके बड़े जोर से गर्जना की॥६॥
ततस्तं भीमधन्वानं क्रुद्धाः सर्वे निशाचराः।
रामं नानाविधैः शस्त्रैरभ्यवर्षन्त दुर्जयम्॥७॥
तदनन्तर क्रोध में भरे हुए समस्त निशाचर भयंकर धनुष धारण करने वाले दुर्जय वीर श्रीराम पर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे॥७॥
मुद्गरैरायसैः शूलैः प्रासैः खड्गैः परश्वधैः ।
राक्षसाः समरे शूरं निजजू रोषतत्पराः॥८॥
उस समराङ्गण में रुष्ट हुए राक्षसों ने शूरवीर श्रीराम पर लोहे के मुद्गरों, शूलों, प्रासों, खड्गों और फरसों द्वारा प्रहार किया॥८॥
ते बलाहकसंकाशा महाकाया महाबलाः।
अभ्यधावन्त काकुत्स्थं रथैर्वाजिभिरेव च॥९॥
गजैः पर्वतकूटाभै रामं युद्धे जिघांसवः।
वे मेघों के समान काले, विशालकाय और महाबली निशाचर रथों, घोड़ों और पर्वतशिखर के समान गजराजों द्वारा ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम पर चारों ओर से टूट पड़े। वे युद्ध में उन्हें मार डालना चाहते थे॥९ १/२॥
ते रामे शरवर्षाणि व्यसृजन् रक्षसां गणाः॥१०॥
शैलेन्द्रमिव धाराभिर्वर्षमाणा महाघनाः।
जैसे बड़े-बड़े मेघ गिरिराज पर जल की धाराएँ बरसा रहे हों, उसी प्रकार वे राक्षसगण श्रीराम पर बाणों की वृष्टि कर रहे थे॥१० १/२॥
सर्वैः परिवृतो रामो राक्षसैः क्रूरदर्शनैः॥११॥
तिथिष्विव महादेवो वृतः पारिषदां गणैः।
क्रूरतापूर्ण दृष्टि से देखने वाले उन सभी राक्षसों ने श्रीराम को उसी प्रकार घेर रखा था, जैसे प्रदोषसंज्ञक तिथियों में भगवान् शिव के पार्षदगण उन्हें घेरे रहते हैं।
तानि मुक्तानि शस्त्राणि यातुधानैः स राघवः॥१२॥
प्रतिजग्राह विशिखैनद्योघानिव सागरः।
श्रीरघुनाथजी ने राक्षसों के छोड़े हुए उन अस्त्रशस्त्रों को अपने बाणों द्वारा उसी तरह ग्रस लिया, जैसे समुद्र नदियों के प्रवाह को आत्मसात् कर लेता है॥१२ १/२॥
स तैः प्रहरणैोरैर्भिन्नगात्रो न विव्यथे॥१३॥
रामः प्रदीप्तैर्बहुभिर्वओरिव महाचलः।
उन राक्षसों के घोर अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से यद्यपि श्रीराम का शरीर क्षत-विक्षत हो गया था तो भी वे व्यथित या विचलित नहीं हुए, जैसे बहुसंख्यक दीप्तिमान् वज्रों के आघात सहकर भी महान् पर्वत अडिग बना रहता है॥१३ १/२॥
स विद्धः क्षतजादिग्धः सर्वगात्रेषु राघवः॥१४॥
बभूव रामः संध्याभैर्दिवाकर इवावृतः।
श्रीरघुनाथजी के सारे अङ्गों में अस्त्र-शस्त्रों के आघात से घाव हो गया था। वे लहूलुहान हो रहे थे, अतः उस समय संध्याकाल के बादलों से घिरे हुए सूर्यदेव के समान शोभा पा रहे थे॥१४ १/२॥
विषेदुर्देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः॥१५॥
एकं सहस्रैर्बहुभिस्तदा दृष्ट्वा समावृतम्।
श्रीराम अकेले थे। उस समय उन्हें अनेक सहस्र शत्रुओं से घिरा हुआ देख देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि विषाद में डूब गये॥१५ १/२॥
ततो रामस्तु संक्रुद्धो मण्डलीकृतकार्मुकः॥१६॥
ससर्ज निशितान् बाणान् शतशोऽथ सहस्रशः।
दुरावारान् दुर्विषहान् कालपाशोपमान् रणे॥१७॥
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यन्त कुपित हो अपने धनुष को इतना खींचा कि वह गोलाकार दिखायी देने लगा। फिर तो वे उस धनुष से रणभूमि में सैकड़ों, हजारों ऐसे पैने बाण छोड़ने लगे, जिन्हें रोकना सर्वथा कठिन था, जो दुःसह होने के साथ ही कालपाश के समान भयंकर थे॥१६-१७॥
मुमोच लीलया कङ्कपत्रान् काञ्चनभूषणान्।
ते शराः शत्रुसैन्येषु मुक्ता रामेण लीलया॥१८॥
आददू रक्षसां प्राणान् पाशाः कालकृता इव।
उन्होंने खेल-खेल में ही चील के परों से युक्त असंख्य सुवर्णभूषित बाण छोड़े। शत्रु के सैनिकों पर श्रीराम द्वारा लीलापूर्वक छोड़े गये वे बाण कालपाश के समान राक्षसों के प्राण लेने लगे॥१८ १/२॥
भित्त्वा राक्षसदेहांस्तांस्ते शरा रुधिराप्लुताः॥
अन्तरिक्षगता रेजुर्दीप्ताग्निसमतेजसः।
राक्षसों के शरीरों को छेदकर खून में डूबे हुए वे बाण जब आकाश में पहुँचते, तब प्रज्वलित अग्नि के समान तेज से प्रकाशित होने लगते थे॥१९ १/२॥
असंख्येयास्तु रामस्य सायकाश्चापमण्डलात्॥२०॥
विनिष्पेतुरतीवोग्रा रक्षःप्राणापहारिणः।
श्रीराम के मण्डलाकार धनुष से अत्यन्त भयंकर और राक्षसों के प्राण लेने वाले असंख्य बाण छूटने लगे॥२० १/२॥
तैर्धनंषि ध्वजाग्राणि चर्माणि कवचानि च॥२१॥
बाहून् सहस्ताभरणानूरून् करिकरोपमान्।
चिच्छेद रामः समरे शतशोऽथ सहस्रशः॥२२॥
उन बाणों द्वारा श्रीराम ने समराङ्गण में शत्रुओं के सैकड़ों हजारों धनुष, ध्वजाओं के अग्रभाग, ढाल, कवच, आभूषणों सहित भुजाएँ तथा हाथी की सँड़ के समान जाँघ काट डालीं॥२१-२२॥
हयान् काञ्चनसंनाहान् रथयुक्तान् ससारथीन्।
गजांश्च सगजारोहान् सहयान् सादिनस्तदा॥२३॥
चिच्छिदुर्बिभिदुश्चैव रामबाणा गुणच्युताः।
पदातीन् समरे हत्वा ह्यनयद् यमसादनम्॥२४॥
प्रत्यञ्चा से छूटे हुए श्रीराम के बाणों ने उस समय सोने के साज-बाज एवं कवच से सजे और रथों में जुते हुए घोड़ों, सारथियों, हाथियों, हाथी सवारों, घोड़ों और घुड़सवारों को भी छिन्न-भिन्न कर डाला। इसी प्रकार श्रीराम ने समरभूमि में पैदल सैनिकों को भी मारकर यमलोक पहुँचा दिया॥२३-२४॥
ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः।
भीममार्तस्वरं चक्रुश्छिद्यमाना निशाचराः॥२५॥
उस समय उनके नालीक, नाराच और तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक बाणों द्वारा छिन्न-भिन्न होते हुए निशाचर भयंकर आर्तनाद करने लगे॥२५॥
तत्सैन्यं विविधैर्बाणैरर्दितं मर्मभेदिभिः।
न रामेण सुखं लेभे शुष्कं वनमिवाग्निना॥२६॥
श्रीराम के चलाये हुए नाना प्रकार के मर्मभेदी बाणों द्वारा पीड़ित हुई वह राक्षस सेना आग से जलते हुए सूखे वन की भाँति सुख-शान्ति नहीं पाती थी॥२६॥
केचिद् भीमबलाः शूराः प्रासान् शूलान्
परश्वधान्। चिक्षिपुः परमक्रुद्धा रामाय रजनीचराः॥२७॥
कुछ भयंकर बलशाली शूरवीर निशाचर अत्यन्त कुपित हो श्रीराम पर प्रासों, शूलों और फरसों का प्रहार करने लगे॥२७॥
तेषां बाणैर्महाबाहुः शस्त्राण्यावार्य वीर्यवान्।
जहार समरे प्राणांश्चिच्छेद च शिरोधरान्॥२८॥
परंतु पराक्रमी महाबाहु श्रीराम ने रणभूमि में अपने बाणों द्वारा उनके उन अस्त्र-शस्त्रों को रोककर उनके गले काट डाले और प्राण हर लिये॥२८॥
ते छिन्नशिरसः पेतुश्छिन्नचर्मशरासनाः।
सुपर्णवातविक्षिप्ता जगत्यां पादपा यथा॥२९॥
अवशिष्टाश्च ये तत्र विषण्णास्ते निशाचराः।
खरमेवाभ्यधावन्त शरणार्थं शराहताः॥३०॥
सिर, ढाल और धनुष के कट जाने पर वे निशाचर गरुड़ के पंख की हवा से टूटकर गिरने वाले नन्दनवन के वृक्षों की भाँति धराशायी हो गये। जो बचे थे, वे राक्षस भी श्रीराम के बाणों से आहत हो विषाद में डूब गये और अपनी रक्षा के लिये खर के पास ही दौड़े गये॥२९-३०॥
तान् सर्वान् धनुरादाय समाश्वास्य च दूषणः।
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धः क्रुद्धं क्रुद्ध इवान्तकः॥३१॥
परंतु बीच में दूषण ने धनुष लेकर उन सबको आश्वासन दिया और अत्यन्त कुपित हो रोष में भरे हुए यमराज की भाँति वह क्रुद्ध होकर युद्ध के लिये डटे हुए श्रीरामचन्द्रजी की ओर दौड़ा॥३१॥
निवृत्तास्तु पुनः सर्वे दूषणाश्रयनिर्भयाः।
राममेवाभ्यधावन्त सालतालशिलायुधाः॥३२॥
दूषण का सहारा मिल जाने से निर्भय हो वे सब-के सब फिर लौट आये और साख, ताड़ आदि के वृक्ष तथा पत्थर लेकर पुनः श्रीराम पर ही टूट पड़े॥३२॥
शूलमुद्गरहस्ताश्च पाशहस्ता महाबलाः।
सृजन्तः शरवर्षाणि शस्त्रवर्षाणि संयुगे॥३३॥
उस युद्धस्थल में अपने हाथों में शूल, मुद्गर और पाश धारण किये वे महाबली निशाचर बाणों तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे॥३३॥
द्रुमवर्षाणि मुञ्चन्तः शिलावर्षाणि राक्षसाः।
तद् बभूवाद्भुतं युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम्॥३४॥
रामस्यास्य महाघोरं पुनस्तेषां च रक्षसाम्।
कोई राक्षस वृक्षों की वर्षा करने लगे तो कोई पत्थरों की,उस समय इन श्रीराम और उन निशाचरों में पुनः बड़ा ही अद्भुत, महाभयंकर, घमासान और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा॥३४ १/२॥
ते समन्तादभिक्रुद्धा राघवं पुनरार्दयन्॥३५॥
ततः सर्वा दिशो दृष्ट्वा प्रदिशश्च समावृताः।
राक्षसैः सर्वतः प्राप्तैः शरवर्षाभिरावृतः॥३६॥
स कृत्वा भैरवं नादमस्त्रं परमभास्वरम्।
समयोजयद् गान्धर्वं राक्षसेषु महाबलः॥३७॥
वे राक्षस कुपित होकर चारों ओर से पुनः श्रीरामचन्द्रजी को पीड़ित करने लगे। तब सब ओर से आये हुए राक्षसों से सम्पूर्ण दिशाओं और उपदिशाओं को घिरी हुई देख बाण-वर्षा से आच्छादित हुए महाबली श्रीराम ने भैरव-नाद करके उन राक्षसों पर परम तेजस्वी गान्धर्व नामक अस्त्रका प्रयोग किया। ३५-३७॥
ततः शरसहस्राणि निर्ययुश्चापमण्डलात्।
सर्वा दश दिशो बाणैरापूर्यन्त समागतैः॥३८॥
फिर तो उनके मण्डलाकार धनुष से सहस्रों बाण छूटने लगे। उन बाणों से दसों दिशाएँ पूर्णतः आच्छादित हो गयीं॥३८॥
नाददानं शरान् घोरान् विमुञ्चन्तं शरोत्तमान्।
विकर्षमाणं पश्यन्ति राक्षसास्ते शरार्दिताः॥३९॥
बाणों से पीड़ित राक्षस यह नहीं देख पाते थे कि श्रीरामचन्द्रजी कब भयंकर बाण हाथ में लेते हैं और कब उन उत्तम बाणों को छोड़ देते हैं। वे केवल उनको धनुष खींचते देखते थे॥३९॥
शरान्धकारमाकाशमावृणोत् सदिवाकरम्।
बभूवावस्थितो रामः प्रक्षिपन्निव तान् शरान्॥४०॥
श्रीरामचन्द्रजी के बाणसमुदायरूपी अन्धकार ने सूर्यसहित सारे आकाशमण्डल को ढक दिया। उस समय श्रीराम उन बाणों को लगातार छोड़ते हुए एक स्थान पर खड़े थे॥४०॥
युगपत्पतमानैश्च युगपच्च हतै शम्।
युगपत्पतितैश्चैव विकीर्णा वसुधाभवत्॥४१॥
एक ही समय बाणों द्वारा अत्यन्त घायल हो एक साथ ही गिरते और गिरे हुए बहुसंख्यक राक्षसों की लाशों से वहाँ की भूमि पट गयी॥४१॥
निहताः पतिताः क्षीणाश्छिन्ना भिन्ना विदारिताः।
तत्र तत्र स्म दृश्यन्ते राक्षसास्ते सहस्रशः॥४२॥
जहाँ-जहाँ दृष्टि जाती थी, वहीं-वहीं वे हजारों राक्षस मरे, गिरे, क्षीण हुए, कटे-पिटे और विदीर्ण हुए दिखायी देते थे॥४२॥
सोष्णीषैरुत्तमाङ्गैश्च साङ्गदैर्बाहुभिस्तथा।
ऊरुभिर्बाहुभिश्छिन्नैर्नानारूपैर्विभूषणैः॥४३॥
हयैश्च द्विपमुख्यैश्च रथैर्भिन्नैरनेकशः।
चामरव्यजनैश्छत्रैर्ध्वजैर्नानाविधैरपि॥४४॥
रामेण बाणाभिहतैर्विच्छिन्नैः शूलपट्टिशैः।
खड्गैः खण्डीकृतैः प्रासैर्विकीर्णैश्च परश्वधैः॥४५॥
चूर्णिताभिः शिलाभिश्च शरैश्चित्रैरनेकशः।
विच्छिन्नैः समरे भूमिर्विस्तीर्णाभूद् भयंकरा॥४६॥
वहाँ श्रीराम के बाणों से कटे हुए पगड़ियों सहित मस्तकों, बाजूबंदसहित भुजाओं, जाँघों, बाँहों, भाँतिभाँति के आभूषणों, घोड़ों, श्रेष्ठ हाथियों, टूटे-फूटे अनेकानेक रथों, चँवरों, व्यजनों, छत्रों, नाना प्रकार की ध्वजाओं, छिन्न-भिन्न हुए शूलों, पट्टिशों, खण्डित खड्गों, बिखरे प्रासों, फरसों, चूर-चूर हुई शिलाओं तथा टुकड़े-टुकड़े हुए बहुतेरे विचित्र बाणों से पटी हुई वह समरभूमि अत्यन्त भयंकर दिखायी देती थी॥४३–४६॥
तान् दृष्ट्वा निहतान् सर्वे राक्षसाः परमातुराः।
न तत्र चलितुं शक्ता रामं परपुरंजयम्॥४७॥
उन सबको मारा गया देख शेष राक्षस अत्यन्त आतुर हो वहाँ शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले श्रीराम के सम्मुख जाने में असमर्थ हो गये॥४७॥
सर्ग २६
दूषणस्तु स्वकं सैन्यं हन्यमानं विलोक्य च।
संदिदेश महाबाहुर्भीमवेगान् दुरासदान्॥१॥
राक्षसान् पञ्चसाहस्रान् समरेष्वनिवर्तिनः।
महाबाहु दूषण ने जब देखा कि मेरी सेना बुरी तरह से मारी जा रही है, तब उसने युद्ध से पीछे पैर न हटाने वाले भयंकर वेगशाली पाँच हजार राक्षसों को, जिन्हें जीतना बड़ा ही कठिन था, आगे बढ़ने की आज्ञा दी॥१ १/२॥
ते शूलैः पट्टिशैः खड्गैः शिलावधैं मैरपि॥२॥
शरवर्षैरविच्छिन्नं ववर्षुस्तं समन्ततः।
वे श्रीराम पर चारों ओर से शूल, पट्टिश, तलवार, पत्थर, वृक्ष और बाणों की लगातार वर्षा करने लगे। २ १/२॥
तद् द्रुमाणां शिलानां च वर्षं प्राणहरं महत्॥३॥
प्रतिजग्राह धर्मात्मा राघवस्तीक्ष्णसायकैः।
यह देख धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने वृक्षों और शिलाओं की उस प्राणहारिणी महावृष्टि को अपने तीखे सायकों द्वारा रोका॥३ १/२॥
प्रतिगृह्य च तद् वर्षं निमीलित इवर्षभः॥४॥
रामः क्रोधं परं लेभे वधार्थं सर्वरक्षसाम्।
उस सारी वर्षा को रोककर आँख मूंदे हुए साँड़ की भाँति अविचल भाव से खड़े हुए श्रीराम ने समस्त राक्षसों के वध के लिये महान् क्रोध धारण किया॥४ १/२॥
ततः क्रोधसमाविष्टः प्रदीप्त इव तेजसा॥५॥
शरैरभ्यकिरत् सैन्यं सर्वतः सहदूषणम्।
क्रोध से युक्त और तेज से उद्दीप्त हुए श्रीराम ने दूषणसहित सारी राक्षस-सेना पर चारों ओर से बाण की वर्षा आरम्भ कर दी॥५ १/२॥
ततः सेनापतिः क्रुद्धो दूषणः शत्रुदूषणः॥६॥
शरैरशनिकल्पैस्तं राघवं समवारयत्।
इससे शत्रुदूषण सेनापति दूषण को बड़ा क्रोध हुआ और उसने वज्र के समान बाणों से श्रीरामचन्द्रजी को रोका॥६ १/२॥
ततो रामः सुसंक्रुद्धः क्षुरेणास्य महद् धनुः॥७॥
चिच्छेद समरे वीरश्चर्तुभिश्चतुरो हयान्।
हत्वा चाश्वान् शरैस्तीक्ष्णैरर्धचन्द्रेण सारथेः॥८॥
शिरो जहार तद्रक्षस्त्रिभिर्विव्याध वक्षसि।
तब अत्यन्त कुपित हुए वीर श्रीराम ने समराङ्गण में क्षुर नामक बाण से दूषण के विशाल धनुष को काट डाला और चार तीखे सायकों से उसके चारों घोड़ों को मौत के घाट उतारकर एक अर्धचन्द्राकार बाण से सारथि का भी सिर उड़ा दिया तथा तीन बाणों से उस राक्षस की भी छाती में चोट पहुँचायी॥७-८ १/२॥
स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः॥९॥
जग्राह गिरिशृङ्गाभं परिघं रोमहर्षणम्।
वेष्टितं काञ्चनैः पट्टैर्देवसैन्याभिमर्दनम्॥१०॥
धनुष कट जाने और घोड़ों तथा सारथि के मारे जाने पर रथहीन हुए दूषण ने पर्वतशिखर के समान एक रोमाञ्चकारी परिघ हाथ में लिया, जिसके ऊपर सोने के पत्र मढ़े गये थे। वह परिघ देवताओं की सेना को भी कुचल डालने वाला था॥९-१०॥
आयसैः शङ्कभिस्तीक्ष्णैः कीर्णं परवसोक्षितम्।
वज्राशनिसमस्पर्श परगोपुरदारणम्॥११॥
उसपर चारों ओर से लोहे की तीखी कीलें लगी हुई थीं। वह शत्रुओं की चर्बी से लिपटा हुआ था। उसका स्पर्श हीरे तथा वज्र के समान कठोर एवं असह्य था। वह शत्रुओं के नगरद्वार को विदीर्ण कर डालने में समर्थ था॥११॥
तं महोरगसंकाशं प्रगृह्य परिघं रणे।
दूषणोऽभ्यपतद् रामं क्रूरकर्मा निशाचरः॥१२॥
रणभूमि में बहुत बड़े सर्प के समान भयंकर उस परिघ को हाथ में लेकर वह क्रूरकर्मा निशाचर दूषण श्रीराम पर टूट पड़ा॥१२॥
तस्याभिपतमानस्य दूषणस्य च राघवः।
द्वाभ्यां शराभ्यां चिच्छेद सहस्ताभरणौ भुजौ॥१३॥
उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देख श्रीरामचन्द्रजी ने दो बाणों से आभूषणोंसहित उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं॥१३॥
भ्रष्टस्तस्य महाकायः पपात रणमूर्धनि।
परिघश्छिन्नहस्तस्य शक्रध्वज इवाग्रतः॥१४॥
युद्ध के मुहाने पर जिसकी दोनों भुजाएँ कट गयी थीं, उस दूषण के हाथ से खिसककर वह विशालकाय परिघ इन्द्रध्वज के समान सामने गिर पड़ा॥१४॥
कराभ्यां च विकीर्णाभ्यां पपात भुवि दूषणः।
विषाणाभ्यां विशीर्णाभ्यां मनस्वीव महागजः॥१५॥
जैसे दोनों दाँतों के उखाड़ लिये जाने पर महान् मनस्वी गजराज उनके साथ ही धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार कटकर गिरी हुई अपनी भुजाओं के साथ ही दूषण भी पृथ्वी पर गिर पड़ा॥१५॥
दृष्ट्वा तं पतितं भूमौ दूषणं निहतं रणे।
साधु साध्विति काकुत्स्थं सर्वभूतान्यपूजयन्॥१६॥
रणभूमि में मारे गये दूषण को धराशायी हुआ देख समस्त प्राणियों ने ‘साधु-साधु’ कहकर भगवान् श्रीराम की प्रशंसा की॥१६॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धास्त्रयः सेनाग्रयायिनः।
संहत्याभ्यद्रवन् रामं मृत्युपाशावपाशिताः॥१७॥
महाकपालः स्थूलाक्षः प्रमाथी च महाबलः।
इसी समय सेना के आगे चलने वाले महाकपाल,स्थूलाक्ष और महाबली प्रमाथी-ये तीन राक्षस कुपित हो मौत के फंदे में फँसकर संगठित रूप से श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर टूट पड़े॥१६-१७ १/२॥
महाकपालो विपुलं शूलमुद्यम्य राक्षसः॥१८॥
स्थूलाक्षः पट्टिशं गृह्य प्रमाथी च परश्वधम्।
राक्षस महाकपाल ने एक विशाल शूल उठाया, स्थूलाक्ष ने पट्टिश हाथ में लिया और प्रमाथी ने फरसा सँभालकर आक्रमण किया। १८ १/२॥
दृष्ट्वैवापततस्तांस्तु राघवः सायकैः शितैः॥१९॥
तीक्ष्णाग्रैः प्रतिजग्राह सम्प्राप्तानतिथीनिव।
उन तीनों को अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीराम ने तीखे अग्रभाग वाले पैने सायकों द्वारा द्वार पर आये हुए अतिथियों के समान उनका स्वागत किया॥१९ १/२॥
महाकपालस्य शिरश्चिच्छेद रघुनन्दनः॥२०॥
असंख्येयैस्तु बाणौघैः प्रममाथ प्रमाथिनम्।
स्थूलाक्षस्याक्षिणी स्थूले पूरयामास सायकैः॥२१॥
श्रीरघुनन्दन ने महाकपाल का सिर एवं कपाल उड़ा दिया। प्रमाथी को असंख्य बाणसमूहों से मथ डाला और स्थूलाक्ष की स्थूल आँखों को सायकों से भर दिया॥
स पपात हतो भूमौ विटपीव महाद्रुमः।
दूषणस्यानुगान् पञ्चसाहस्रान् कुपितः क्षणात्॥२२॥
हत्वा तु पञ्चसाहस्रैरनयद् यमसादनम्।
तीनों अग्रगामी सैनिकों का वह समूह अनेक शाखा वाले विशाल वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी ने कुपित हो दूषण के अनुयायी पाँच हजार राक्षसों को उतने ही बाणों का निशाना बनाकर क्षणभर में यमलोक पहुँचा दिया।। २२ १/२॥
दूषणं निहतं श्रुत्वा तस्य चैव पदानुगान्॥२३॥
व्यादिदेश खरः क्रुद्धः सेनाध्यक्षान् महाबलान्।
अयं विनिहतः संख्ये दूषणः सपदानुगः॥२४॥
महत्या सेनया सार्धं युद्ध्वा रामं कुमानुषम्।
शस्त्रैर्नानाविधाकारैर्हनध्वं सर्वराक्षसाः॥२५॥
दूषण और उसके अनुयायी मारे गये-यह सुनकर खर को बड़ा क्रोध हुआ। उसने अपने महाबलीसेनापतियों को आज्ञा दी—’वीरो! यह दूषण अपने सेवकोंसहित युद्ध में मार डाला गया। अतः अब तुम सभी राक्षस बहुत बड़ी सेना के साथ धावा करके इस दुष्ट मनुष्य राम के साथ युद्ध करो और नाना प्रकार के शस्त्रों द्वारा इसका वध कर डालो’॥२३–२५॥
एवमुक्त्वा खरः क्रुद्धो राममेवाभिदुद्रुवे।
श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुर्विहंगमः॥२६॥
दुर्जयः करवीराक्षः परुषः कालकार्मुकः।
हेममाली महामाली सर्पास्यो रुधिराशनः॥२७॥
द्वादशैते महावीर्या बलाध्यक्षाः ससैनिकाः।
राममेवाभ्यधावन्त विसृजन्तः शरोत्तमान्॥२८॥
ऐसा कहकर कुपित हुए खर ने श्रीराम पर ही धावा किया। साथ ही श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहङ्गम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य तथा रुधिराशन—ये बारह महापराक्रमी सेनापति भी उत्तम बाणों की वर्षा करते हुए अपने सैनिकों के साथ श्रीराम पर ही टूट पड़े॥२६–२८॥
ततः पावकसंकाशैर्हेमवज्रविभूषितैः।
जघान शेषं तेजस्वी तस्य सैन्यस्य सायकैः॥२९॥
तब तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने सोने और हीरों से विभूषित अग्नितुल्य तेजस्वी सायकों द्वारा उस सेना के बचे-खुचे सिपाहियों का भी संहार कर डाला॥२९॥
ते रुक्मपुङ्खा विशिखाः सधूमा इव पावकाः।
निजजुस्तानि रक्षांसि वज्रा इव महाद्रुमान्॥३०॥
जैसे वज्र बड़े-बड़े वृक्षों को नष्ट कर डालते हैं, उसी प्रकार धूमयुक्त अग्नि के समान प्रतीत होने वाले उन सोने की पाँखवाले बाणों ने उन समस्त राक्षसों का विनाश कर डाला॥३०॥
रक्षसां तु शतं रामः शतेनैकेन किर्णना।
सहस्रं तु सहस्रेण जघान रणमूर्धनि॥३१॥
उस युद्ध के मुहाने पर श्रीराम ने कर्णिनामक सौ बाणों से सौ राक्षसों का और सहस्र बाणों से सहस्र निशाचरों का एक साथ ही संहार कर डाला॥३१॥
तैर्भिन्नवर्माभरणाश्छिन्नभिन्नशरासनाः।
निपेतुः शोणितादिग्धा धरण्यां रजनीचराः॥३२॥
उन बाणों से निशाचरों के कवच, आभूषण और धनुष छिन्न-भिन्न हो गये तथा वे खून से लथपथ हो पृथ्वी पर गिर पड़े॥३२॥
तैर्मुक्तकेशैः समरे पतितैः शोणितोक्षितैः।
विस्तीर्णा वसुधा कृत्स्ना महावेदिः कुशैरिव॥३३॥
कुशों से ढकी हुई विशाल वेदी के समान युद्ध में लहूलुहान होकर गिरे हुए खुले केशवाले राक्षसों से सारी रणभूमि पट गयी॥३३॥
तत्क्षणे तु महाघोरं वनं निहतराक्षसम्।
बभूव निरयप्रख्यं मांसशोणितकर्दमम्॥३४॥
राक्षसों के मारे जाने से उस समय वहाँ रक्त और मांस की कीचड़ जम गयी; अतः वह महाभयंकर वन नरक के समान प्रतीत होने लगा॥३४॥
चतुर्दशसहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
हतान्येकेन रामेण मानुषेण पदातिना॥३५॥
मानवरूपधारी श्रीराम अकेले और पैदल थे, तो भी उन्होंने भयानक कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षसों को तत्काल मौत के घाट उतार दिया॥३५॥
तस्य सैन्यस्य सर्वस्य खरः शेषो महारथः।
राक्षसस्त्रिशिराश्चैव रामश्च रिपुसूदनः॥३६॥
उस समूची सेना में केवल महारथी खर और त्रिशिरा-ये दो ही राक्षस बच रहे। उधर शत्रुसंहारक भगवान् श्रीराम ज्यों-के-त्यों युद्ध के लिये डटे रहे। ३६॥
शेषा हता महावीर्या राक्षसा रणमूर्धनि।
घोरा दुर्विषहाः सर्वे लक्ष्मणस्याग्रजेन ते॥३७॥
उपर्युक्त दो राक्षसों को छोड़कर शेष सभी निशाचर,जो महान् पराक्रमी, भयंकर और दुर्धर्ष थे, युद्ध के मुहाने पर लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम के हाथों मारे गये॥३७॥
ततस्तु तद्भीमबलं महाहवे समीक्ष्य रामेण हतं बलीयसा।
रथेन रामं महता खरस्ततः समाससादेन्द्र इवोद्यताशनिः॥३८॥
तदनन्तर महासमर में महाबली श्रीराम के द्वारा अपनी भयंकर सेना को मारी गयी देख खर एक विशाल रथ के द्वारा श्रीराम का सामना करने के लिये आया, मानो वज्रधारी इन्द्र ने किसी शत्रु पर आक्रमण किया हो॥३८॥
सर्ग २७
खरं तु रामाभिमुखं प्रयान्तं वाहिनीपतिः।
राक्षसस्त्रिशिरा नाम संनिपत्येदमब्रवीत्॥१॥
खर को भगवान् श्रीराम के सम्मुख जाते देख सेनापति राक्षस त्रिशिरा तुरंत उसके पास आ पहुँचा और इस प्रकार बोला-॥१॥
मां नियोजय विक्रान्तं त्वं निवर्तस्व साहसात्।
पश्य रामं महाबाहं संयुगे विनिपातितम्॥२॥
‘राक्षसराज! मुझ पराक्रमी वीर को इस युद्ध में लगाइये और स्वयं इस साहसपूर्ण कार्य से अलग रहिये। देखिये, मैं अभी महाबाहु राम को युद्ध में मार गिराता हूँ॥२॥
प्रतिजानामि ते सत्यमायुधं चाहमालभे।
यथा रामं वधिष्यामि वधार्ह सर्वरक्षसाम्॥३॥
‘आपके सामने मैं सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ और अपने हथियार छूकर शपथ खाता हूँ कि जो समस्त राक्षसों के लिये वध के योग्य हैं, उन राम का मैं अवश्य वध करूँगा॥३॥
अहं वास्य रणे मृत्युरेष वा समरे मम।
विनिवर्त्य रणोत्साहं मुहूर्तं प्राश्निको भव॥४॥
‘इस युद्ध में या तो मैं इनकी मृत्यु बनूंगा, या ये ही समराङ्गण में मेरी मृत्यु का कारण होंगे। आप इस समय अपने युद्धविषयक उत्साह को रोककर एक मुहूर्त के लिये जय-पराजय का निर्णय करने वाले साक्षी बन जाइये॥४॥
प्रहृष्टो वा हते रामे जनस्थानं प्रयास्यसि।
मयि वा निहते रामं संयुगाय प्रयास्यसि॥५॥
‘यदि मेरे द्वारा राम मारे गये तो आप प्रसन्नतापूर्वक जनस्थान को लौट जाइये अथवा यदि राम ने ही मुझे मार दिया तो आप युद्ध के लिये इन पर धावा बोल दीजियेगा’॥५॥
खरस्त्रिशिरसा तेन मृत्युलोभात् प्रसादितः।
गच्छ युध्येत्यनुज्ञातो राघवाभिमुखो ययौ॥६॥
भगवान् के हाथ से मृत्यु का लोभ होने के कारण जब त्रिशिरा ने इस प्रकार खर को राजी किया, तब उसने आज्ञा दे दी-’अच्छा जाओ, युद्ध करो। आज्ञा पाकर वह श्रीरामचन्द्रजी की ओर चला॥६॥
त्रिशिरास्तु रथेनैव वाजियुक्तेन भास्वता।
अभ्यद्रवद् रणे रामं त्रिशृङ्ग इव पर्वतः॥७॥
घोड़े जुते हुए एक तेजस्वी रथ के द्वारा त्रिशिरा ने रणभूमि में श्रीराम पर आक्रमण किया। उस समय वह तीन शिखरों वाले पर्वत के समान जान पड़ता था॥७॥
शरधारासमूहान् स महामेघ इवोत्सृजन्।
व्यसृजत् सदृशं नादं जलार्द्रस्येव दुन्दुभेः॥८॥
उसने आते ही बड़े भारी मेघ की भाँति बाणरूपी धाराओं की वर्षा प्रारम्भ कर दी और वह जल से भीगे हुए नगाड़े की तरह विकट गर्जना करने लगा॥८॥
आगच्छन्तं त्रिशिरसं राक्षसं प्रेक्ष्य राघवः।
धनुषा प्रतिजग्राह विधुन्वन् सायकान् शितान्॥
त्रिशिरा नामक राक्षस को आते देख श्रीरघुनाथजी ने धनुष के द्वारा पैने बाण छोड़ते हुए उसे अपने प्रतिद्वन्द्वी के रूप में ग्रहण किया (अथवा उसे आगे बढ़ने से रोक दिया)॥९॥
स सम्प्रहारस्तुमुलो रामत्रिशिरसोस्तदा।
सम्बभूवातिबलिनोः सिंहकुञ्जरयोरिव॥१०॥
अत्यन्त बलशाली श्रीराम और त्रिशिरा का वह संग्राम महाबली सिंह और गजराज के युद्ध की भाँति बड़ा भयंकर प्रतीत होता था॥१०॥
ततस्त्रिशिरसा बाणैर्ललाटे ताडितस्त्रिभिः।
अमर्षी कुपितो रामः संरब्ध इदमब्रवीत्॥११॥
उस समय त्रिशिरा ने तीन बाणों से श्रीरामचन्द्रजी के ललाट को बींध डाला। श्रीराम उसकी यह उद्दण्डता सहन न कर सके। वे कुपित हो रोषावेश में भरकर इस प्रकार बोले-॥११॥
अहो विक्रमशूरस्य राक्षसस्येदृशं बलम्।
पुष्पैरिव शरैर्योऽहं ललाटेऽस्मि परिक्षतः॥१२॥
ममापि प्रतिगृह्णीष्व शरांश्चापगुणाच्च्युतान्।
‘अहो! पराक्रम प्रकट करने में शूरवीर राक्षस का ऐसा ही बल है, जो तुमने फूलों-जैसे बाणों द्वारा मेरे ललाट पर प्रहार किया है। अच्छा, अब धनुष की डोरी से छूटे हुए मेरे बाणों को भी ग्रहण करो’॥१२ १/२॥
एवमुक्त्वा सुसंरब्धः शरानाशीविषोपमान्॥१३॥
त्रिशिरोवक्षसि क्रुद्धो निजघान चतुर्दश।
ऐसा कहकर रोष में भरे हुए श्रीराम ने त्रिशिरा की छाती में क्रोधपूर्वक चौदह बाण मारे, जो विषधर सौ के समान भयंकर थे॥१३ १/२॥
चतुर्भिस्तुरगानस्य शरैः संनतपर्वभिः॥१४॥
न्यपातयत तेजस्वी चतुरस्तस्य वाजिनः।
अष्टभिः सायकैः सूतं रथोपस्थे न्यपातयत्॥१५॥
तदनन्तर तेजस्वी रघुनाथजी ने झुकी गाँठ वाले चार बाणों से उसके चारों घोड़ों को मार गिराया। फिर आठ सायकों द्वारा उसके सारथि को भी रथ की बैठक में ही सुला दिया॥१४-१५॥
रामश्चिच्छेद बाणेन ध्वजं चास्य समुच्छ्रितम्।
ततो हतरथात् तस्मादुत्पतन्तं निशाचरम्॥१६॥
चिच्छेद रामस्तं बाणैर्हृदये सोऽभवज्जडः।
इसके बाद श्रीराम ने एक बाण से उसकी ध्वजा भी काट डाली। तदनन्तर जब वह उस नष्ट हुए रथ से कूदने लगा, उसी समय श्रीराघवेन्द्र ने अनेक बाणों द्वारा उस निशाचर की छाती छेद डाली फिर तो वह जडवत् हो गया॥१६ १/२॥
सायकैश्चाप्रमेयात्मा सामर्षस्तस्य रक्षसः॥१७॥
शिरांस्यपातयत् त्रीणि वेगवद्भिस्त्रिभिः शरैः।
इसके बाद अप्रमेयस्वरूप श्रीराम ने अमर्ष में भरकर तीन वेगशाली एवं विनाशकारी बाणों द्वारा उस राक्षस के तीनों मस्तक काट गिराये॥१७ १/२॥
स धूमशोणितोद्गारी रामबाणाभिपीडितः॥१८॥
न्यपतत् पतितैः पूर्वं समरस्थो निशाचरः।
समराङ्गण में खड़ा हुआ वह निशाचर श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से पीड़ित हो अपने धड़ से भापसहित रुधिर उगलता हुआ पहले गिरे हुए मस्तकों के साथ ही धराशायी हो गया॥१८ १/२॥
हतशेषास्ततो भग्ना राक्षसाः खरसंश्रयाः॥१९॥
द्रवन्ति स्म न तिष्ठन्ति व्याघ्रत्रस्ता मृगा इव।
तत्पश्चात् खर की सेवा में रहने वाले राक्षस, जो मरने से बचे हुए थे, भाग खड़े हुए। वे व्याघ्र से डरे हुए मृगों के समान भागते ही चले जाते थे, खड़े नहीं होते थे॥१९ १/२॥
तान् खरो द्रवतो दृष्ट्वा निवर्त्य रुषितस्त्वरन्।
राममेवाभिदुद्राव राहुश्चन्द्रमसं यथा॥२०॥
उन्हें भागते देख रोष में भरे हुए खर ने तुरंत लौटाया और जैसे राहु चन्द्रमा पर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने श्रीराम पर ही धावा किया॥२०॥
सर्ग २८
निहतं दूषणं दृष्ट्वा रणे त्रिशिरसा सह।
खरस्याप्यभवत् त्रासो दृष्ट्वा रामस्य विक्रमम्॥१॥
त्रिशिरासहित दूषण को रणभूमि में मारा गया देख श्रीराम के पराक्रमपर दृष्टिपात करके खर को भी बड़ा भय हुआ॥१॥
स दृष्ट्वा राक्षसं सैन्यमविषह्यं महाबलम्।
हतमेकेन रामेण दूषणस्त्रिशिरा अपि॥२॥
तबलं हतभूयिष्ठं विमनाः प्रेक्ष्य राक्षसः।
आससाद खरो रामं नमुचिर्वासवं यथा॥३॥
एकमात्र श्रीराम ने महान् बलशाली और असह्य राक्षस-सेना का वध कर डाला। दूषण और त्रिशिरा को भी मार गिराया तथा मेरी सेना के अधिकांश (चौदह हजार) प्रमुख वीरों को काल के गाल में भेज दिया यह सब देख और सोचकर राक्षस खर उदास हो गया। उसने श्रीराम पर उसी तरह आक्रमण किया, जैसे नमुचि ने इन्द्र पर किया था॥२-३॥
विकृष्य बलवच्चापं नाराचान् रक्तभोजनान्।
खरश्चिक्षेप रामाय क्रुद्धानाशीविषानिव॥४॥
खर ने एक प्रबल धनुष को खींचकर श्रीराम के प्रति बहुत-से नाराच चलाये, जो रक्त पीने वाले थे। वे समस्त नाराच रोष में भरे हुए विषधर सर्पो के समान प्रतीत होते थे॥४॥
ज्यां विधुन्वन् सुबहुशः शिक्षयास्त्राणि दर्शयन्।
चचार समरे मार्गान् शरै रथगतः खरः॥५॥
धनुर्विद्या के अभ्यास से प्रत्यञ्चा को हिलाता और नाना प्रकार के अस्त्रों का प्रदर्शन करता हुआ रथारूढ़ खर समराङ्गण में युद्ध के अनेक पैंतरे दिखाता हुआ विचरने लगा॥५॥
स सर्वाश्च दिशो बाणैः प्रदिशश्च महारथः।
पूरयामास तं दृष्ट्वा रामोऽपि सुमहद् धनुः॥६॥
उस महारथी वीर ने अपने बाणों से समस्त दिशाओं और विदिशाओं को ढक दिया। उसे ऐसा करते देख श्रीराम ने भी अपना विशाल धनुष उठाया और समस्त दिशाओं को बाणों से आच्छादित कर दिया॥६॥
स सायकैर्दुर्विषहैर्विस्फुलिङ्गैरिवाग्निभिः।
नभश्चकाराविवरं पर्जन्य इव वृष्टिभिः॥७॥
जैसे मेघ जल की वर्षा से आकाश को ढक देता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी ने भी आग की चिनगारियों के समान दुःसह सायकों की वर्षा करके आकाश को ठसाठस भर दिया। वहाँ थोड़ी-सी भी जगह खाली नहीं रहने दी॥७॥
तद् बभूव शितैर्बाणैः खररामविसर्जितैः।
पर्याकाशमनाकाशं सर्वतः शरसंकुलम्॥८॥
खर और श्रीराम द्वारा छोड़े गये पैने बाणों से व्याप्त हो सब ओर फैला हुआ आकाश चारों ओर से बाणों द्वारा भर जाने के कारण अवकाश रहित हो गया॥८॥
शरजालावृतः सूर्यो न तदा स्म प्रकाशते।
अन्योन्यवधसंरम्भादुभयोः सम्प्रयुध्यतोः॥९॥
एक-दूसरे के वध के लिये रोषपूर्वक जूझते हुए उन दोनों वीरों के बाणजाल से आच्छादित होकर सूर्यदेव प्रकाशित नहीं होते थे॥९॥
ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः।
आजघान रणे रामं तोत्रैरिव महाद्विपम्॥१०॥
तदनन्तर खर ने रणभूमि में श्रीराम पर नालीक, नाराच और तीखे अग्रभागवाले विकर्णि नामक बाणों द्वारा प्रहार किया, मानो किसी महान् गजराज को अङ्कशों द्वारा मारा गया हो॥१०॥
तं रथस्थं धनुष्पाणिं राक्षसं पर्यवस्थितम्।
ददृशुः सर्वभूतानि पाशहस्तमिवान्तकम्॥११॥
उस समय हाथ में धनुष लेकर रथ में स्थिरतापूर्वक बैठे हुए राक्षस खर को समस्त प्राणियों ने पाशधारी यमराज के समान देखा॥११॥
हन्तारं सर्वसैन्यस्य पौरुषे पर्यवस्थितम्।
परिश्रान्तं महासत्त्वं मेने रामं खरस्तदा॥१२॥
उस वेला में समस्त सेनाओं का वध करने वाले तथा पुरुषार्थ पर डटे हुए महान् बलशाली श्रीराम को खर ने थका हुआ समझा॥१२॥
तं सिंहमिव विक्रान्तं सिंहविक्रान्तगामिनम्।
दृष्ट्वा नोद्विजते रामः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥१३॥
यद्यपि वह सिंह के समान चलता और सिंह के ही तुल्य पराक्रम प्रकट करता था तो भी उस खर को देखकर श्रीराम उसी तरह उद्विग्न नहीं होते थे, जैसे छोटे-से मृग को देखकर सिंह भयभीत नहीं होता है॥१३॥
ततः सूर्यनिकाशेन रथेन महता खरः।
आससादाथ तं रामं पतङ्ग इव पावकम्॥१४॥
तत्पश्चात् जैसे पतिङ्गा आग के पास जाता है, उसी प्रकार खर अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी विशाल रथ के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के पास गया॥१४॥
ततोऽस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे महात्मनः।
खरश्चिच्छेद रामस्य दर्शयन् हस्तलाघवम्॥१५॥
वहाँ जाकर उस राक्षस खर ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए महात्मा श्रीराम के बाणसहित धनुष को मुट्ठी पकड़ने की जगह से काट डाला॥१५॥
स पुनस्त्वपरान् सप्त शरानादाय मर्मणि।
निजघान रणे क्रुद्धः शक्राशनिसमप्रभान्॥१६॥
फिर इन्द्र के वज्र की भाँति प्रकाशित होने वाले दूसरे सात बाण लेकर रणभूमि में कुपित हुए खर ने उनके द्वारा श्रीराम के मर्मस्थल में चोट पहुँचायी॥१६॥
ततः शरसहस्रेण राममप्रतिमौजसम्।
अर्दयित्वा महानादं ननाद समरे खरः॥१७॥
तदनन्तर अप्रतिम बलशाली श्रीराम को सहस्रों बाणों से पीड़ित करके निशाचर खर समर भूमि में जोर जोर से गर्जना करने लगा॥१७॥।
ततस्तत्प्रहतं बाणैः खरमुक्तैः सुपर्वभिः।
पपात कवचं भूमौ रामस्यादित्यवर्चसम्॥१८॥
खर के छोड़े हुए उत्तम गाँठ वाले बाणों द्वारा कटकर श्रीराम का सूर्यतुल्य तेजस्वी कवच पृथ्वी पर गिर पड़ा॥१८॥
स शरैरर्पितः क्रुद्धः सर्वगात्रेषु राघवः।
रराज समरे रामो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन्॥१९॥
उनके सभी अङ्गों में खर के बाण धंस गये थे। उस समय कुपित हो समर भूमि में खड़े हुए श्रीरघुनाथजी धूमरहित प्रज्वलित अग्नि की भाँति शोभा पा रहे थे॥१९॥
ततो गम्भीरनिर्हादं रामः शत्रुनिबर्हणः।
चकारान्ताय स रिपोः सज्यमन्यन्महद्धनुः॥२०॥
तब शत्रुओं का नाश करने वाले भगवान् श्रीराम ने अपने विपक्षी का विनाश करने के लिये एक-दूसरे विशाल धनुष पर, जिसकी ध्वनि बहुत ही गम्भीर थी, प्रत्यञ्चा चढ़ायी॥२०॥
सुमहद् वैष्णवं यत् तदतिसृष्टं महर्षिणा।
वरं तद् धनुरुद्यम्य खरं समभिधावत॥२१॥
महर्षि अगस्त्य ने जो महान् और उत्तम वैष्णव धनुष प्रदान किया था, उसी को लेकर उन्होंने खर पर धावा किया॥२१॥
ततः कनकपुडैस्तु शरैः संनतपर्वभिः।
चिच्छेद रामः संक्रुद्धः खरस्य समरे ध्वजम्॥२२॥
उस समय अत्यन्त क्रोध में भरकर श्रीराम ने सोने की पाँख और झुकी हुई गाँठ वाले बाणों द्वारा समराङ्गण में खर की ध्वजा काट डाली॥२२॥
स दर्शनीयो बहुधा विच्छिन्नः काञ्चनो ध्वजः।
जगाम धरणीं सूर्यो देवतानामिवाज्ञया॥२३॥
वह दर्शनीय सुवर्णमय ध्वज अनेक टुकड़ों में कटकर धरती पर गिर पड़ा, मानो देवताओं की आज्ञा से सूर्यदेव भूमि पर उतर आये हों॥२३॥
तं चतुर्भिः खरः क्रुद्धो रामं गात्रेषु मार्गणैः।
विव्याध हृदि मर्मज्ञो मातङ्गमिव तोमरैः॥२४॥
क्रोध में भरे हुए खर को मर्मस्थानों का ज्ञान था। उसने श्रीराम के अङ्गों में, विशेषतः उनकी छाती में चारबाण मारे, मानो किसी महावत ने गजराज पर तोमरों से प्रहार किया हो॥२४॥
स रामो बहुभिर्बाणैः खरकार्मुकनिःसृतैः।
विद्धो रुधिरसिक्ताङ्गो बभूव रुषितो भृशम्॥२५॥
खर के धनुष से छूटे हुए बहुसंख्यक बाणों से घायल होकर श्रीराम का सारा शरीर लहूलुहान हो गया। इससे उनको बड़ा रोष हुआ॥२५॥
स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठः संगृह्य परमाहवे।
मुमोच परमेष्वासः षट् शरानभिलक्षितान्॥२६॥
धनुर्धरों में श्रेष्ठ महाधनुर्धर श्रीराम ने युद्धस्थल में पूर्वोक्त श्रेष्ठ धनुष को हाथ में लेकर लक्ष्य निश्चित करके खर को छः बाण मारे॥२६॥
शिरस्येकेन बाणेन द्वाभ्यां बाह्वोरथार्पयत् ।
त्रिभिश्चन्द्रार्धवक्त्रैश्च वक्षस्यभिजघान ह॥२७॥
उन्होंने एक बाण उसके मस्तक में, दो से उसकी भुजाओं में और तीन अर्धचन्द्राकार बाण से उसकी छाती में गहरी चोट पहुँचायी॥२७॥
ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् भास्करोपमान्।
जघान राक्षसं क्रुद्धस्त्रयोदश शिलाशितान्॥२८॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने कुपित होकर उस राक्षस को शान पर तेज किये हुए और सूर्य के समान चमकने वाले तेरह बाण मारे॥२८॥
रथस्य युगमेकेन चतुर्भिः शबलान् हयान्।
षष्ठेन च शिरः संख्ये चिच्छेद खरसारथेः॥२९॥
एक बाण से तो उसके रथ का जूआ काट दिया, चार बाणों से चारों चितकबरे घोड़े मार डाले और छठे बाण से युद्धस्थल में खर के सारथि का मस्तक काट गिराया॥२९॥
त्रिभिस्त्रिवेणून् बलवान् द्वाभ्यामक्षं महाबलः।
द्वादशेन तु बाणेन खरस्य सशरं धनुः॥३०॥
छित्त्वा वज्रनिकाशेन राघवः प्रहसन्निव।
त्रयोदशेनेन्द्रसमो बिभेद समरे खरम्॥३१॥
तत्पश्चात् तीन बाणों से त्रिवेणु (जूए के आधारदण्ड) और दोसे रथ के धुरे को खण्डित करके महान् शक्तिशाली और बलवान् श्रीराम ने बारहवें बाण से खर के बाणसहित धनुष के दो टुकड़े कर दिये। इसके बाद इन्द्र के समान तेजस्वी श्रीराघवेन्द्र ने हँसते हँसते वज्रतुल्य तेरहवें बाण के द्वारा समराङ्गण में खर को घायल कर दिया॥३०-३१॥
प्रभग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।
गदापाणिरवप्लुत्य तस्थौ भूमौ खरस्तदा॥३२॥
धनुष के खण्डित होने, रथ के टूटने, घोड़ों के मारे जाने और सारथि के भी नष्ट हो जाने पर खर उस समय हाथ में गदा ले रथ से कूदकर धरती पर खड़ा हो गया॥३२॥
तत् कर्म रामस्य महारथस्य समेत्य देवाश्च महर्षयश्च।
अपूजयन् प्राञ्जलयः प्रहृष्टास्तदा विमानाग्रगताः समेताः॥३३॥
उस अवसर पर विमान पर बैठे हुए देवता और महर्षि हर्ष से उत्फुल्ल हो परस्पर मिलकर हाथ जोड़ महारथी श्रीराम के उस कर्म की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥३३॥
सर्ग २९
खरं तु विरथं रामो गदापाणिमवस्थितम्।
मृदुपूर्वं महातेजाः परुषं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
खर को रथहीन होकर गदा हाथ में लिये सामने उपस्थित देख महातेजस्वी भगवान् श्रीराम पहले कोमल और फिर कठोर वाणी में बोले-॥१॥
गजाश्वरथसम्बाधे बले महति तिष्ठता।
कृतं ते दारुणं कर्म सर्वलोकजुगुप्सितम्॥२॥
उद्वेजनीयो भूतानां नृशंसः पापकर्मकृत् ।
त्रयाणामपि लोकानामीश्वरोऽपि न तिष्ठति॥३॥
कर्म लोकविरुद्धं तु कुर्वाणं क्षणदाचर।
तीक्ष्णं सर्वजनो हन्ति सष दुष्टमिवागतम्॥४॥
‘निशाचर! हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई विशाल सेना के बीच में खड़े रहकर (असंख्य राक्षसों के स्वामित्व का अभिमान लेकर) तूने सदा जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, उसकी समस्त लोकों द्वारा निन्दा हुई है। जो समस्त प्राणियों को उद्वेग में डालने वाला, क्रूर और पापाचारी है, वह तीनों लोकों का ईश्वर हो तो भी अधिक काल तक टिक नहीं सकता। जो लोकविरोधी कठोर कर्म करने वाला है, उसे सब लोग सामने आये हुए दुष्ट सर्प की भाँति मारते हैं॥२-४॥
लोभात् पापानि कुर्वाणः कामाद् वा यो न बुध्यते।
हृष्टः पश्यति तस्यान्तं ब्राह्मणी करकादिव॥५॥
‘जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छा को ‘काम’ कहते हैं और प्राप्त हुई वस्तु को अधिक-से अधिक संख्या में पाने की इच्छा का नाम ‘लोभ’ है। जो काम अथवा लोभ से प्रेरित हो पाप करता है और उसके (विनाशकारी) परिणाम को नहीं समझता है, उलटे उस पाप में हर्ष का अनुभव करता है, वह उसी प्रकार अपना विनाशरूप परिणाम देखता है जैसे वर्षा के साथ गिरे हुए ओले को खाकर ब्राह्मणी (रक्तपुच्छिका) नाम वाली कीड़ी अपना विनाश देखती है॥५॥
वसतो दण्डकारण्ये तापसान् धर्मचारिणः।
किं नु हत्वा महाभागान् फलं प्राप्स्यसि राक्षस॥६॥
‘राक्षस! दण्डकारण्य में निवास करने वाले तपस्या में संलग्न धर्मपरायण महाभाग मुनियों की हत्या करके न जाने तू कौन-सा फल पायेगा?॥६॥
न चिरं पापकर्माणः क्रूरा लोकजुगुप्सिताः।
ऐश्वर्यं प्राप्य तिष्ठन्ति शीर्णमूला इव द्रुमाः॥७॥
‘जिनकी जड़ खोखली हो गयी हो, वे वृक्ष जैसे अधिक कालतक नहीं खड़े रह सकते, उसी प्रकार पापकर्म करने वाले लोकनिन्दित क्रूर पुरुष (किसी पूर्वपुण्य के प्रभाव से) ऐश्वर्य को पाकर भी चिरकाल तक उसमें प्रतिष्ठित नहीं रह पाते (उससे भ्रष्ट हो ही जाते हैं)॥७॥
अवश्यं लभते कर्ता फलं पापस्य कर्मणः।
घोरं पर्यागते काले द्रुमः पुष्पमिवार्तवम्॥८॥
‘जैसे समय आने पर वृक्ष में ऋतु के अनुसार फूल लगते ही हैं, उसी प्रकार पापकर्म करने वाले पुरुष को समयानुसार अपने उस पापकर्म का भयंकर फल अवश्य ही प्राप्त होता है॥८॥
नचिरात् प्राप्यते लोके पापानां कर्मणां फलम्।
सविषाणामिवान्नानां भुक्तानां क्षणदाचर॥९॥
‘निशाचर! जैसे खाये हुए विषमिश्रित अन्न का परिणाम तुरंत ही भोगना पड़ता है, उसी प्रकार लोक में किये गये पापकर्मों का फल शीघ्र ही प्राप्त होता है॥९॥
पापमाचरतां घोरं लोकस्याप्रियमिच्छताम्।
अहमासादितो राज्ञा प्राणान् हन्तुं निशाचर॥१०॥
‘राक्षस! जो संसार का बुरा चाहते हुए घोर पापकर्म में लगे हुए हैं, उन्हें प्राणदण्ड देने के लिये मेरे पिता महाराज दशरथ ने मुझे यहाँ वन में भेजा है। १०॥
अद्य भित्त्वा मया मुक्ताः शराः काञ्चनभूषणाः।
विदार्यातिपतिष्यन्ति वल्मीकमिव पन्नगाः॥११॥
‘आज मेरे छोड़े हुए सुवर्णभूषित बाण जैसे सर्प बाँबी को छेदकर निकलते हैं, उसी प्रकार तेरे शरीर को फाड़कर पृथ्वी को भी विदीर्ण करके पाताल में जाकर गिरेंगे॥११॥
ये त्वया दण्डकारण्ये भक्षिता धर्मचारिणः।
तानद्य निहतः संख्ये ससैन्योऽनुगमिष्यसि॥१२॥
‘तूने दण्डकारण्य में जिन धर्मपरायण ऋषियों का भक्षण किया है, आज युद्ध में मारा जाकर सेनासहित तू भी उन्हीं का अनुसरण करेगा॥१२॥
अद्य त्वां निहतं बाणैः पश्यन्तु परमर्षयः।
निरयस्थं विमानस्था ये त्वया निहताः पुरा॥१३॥
‘पहले तूने जिनका वध किया है, वे महर्षि विमान पर बैठकर आज तुझे मेरे बाणों से मारा गया और नरकतुल्य कष्ट भोगता हुआ देखें॥१३॥
प्रहरस्व यथाकामं कुरु यत्नं कुलाधम।
अद्य ते पातयिष्यामि शिरस्तालफलं यथा॥१४॥
कुलाधम! तेरी जितनी इच्छा हो, प्रहार कर। जितना सम्भव हो, मुझे परास्त करने का प्रयत्न कर, किंतु आज मैं तेरे मस्तक को ताड़के फल की भाँति अवश्य काट गिराऊँगा’॥१४॥
एवमुक्तस्तु रामेण क्रुद्धः संरक्तलोचनः।
प्रत्युवाच ततो रामं प्रहसन् क्रोधमूर्च्छितः॥१५॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर खर कुपित हो उठा। उसकी आँखें लाल हो गयीं। वह क्रोध से अचेत-सा होकर हँसता हुआ श्रीराम को इस प्रकार उत्तर देने लगा-॥१५॥
प्राकृतान् राक्षसान् हत्वा युद्धे दशरथात्मज।
आत्मना कथमात्मानमप्रशस्यं प्रशंससि॥१६॥
‘दशरथकुमार! तुम साधारण राक्षसों को युद्ध में मारकर स्वयं ही अपनी इतनी प्रशंसा कैसे कर रहे हो? तुम प्रशंसा के योग्य कदापि नहीं हो॥१६॥
विक्रान्ता बलवन्तो वा ये भवन्ति नरर्षभाः।
कथयन्ति न ते किंचित् तेजसा चातिगर्विताः॥१७॥
‘जो श्रेष्ठ पुरुष पराक्रमी अथवा बलवान् होते हैं, वे अपने प्रताप के कारण अधिक घमंड में भरकर कोई बात नहीं कहते हैं (अपने विषय में मौन ही रहते हैं)॥१७॥
प्राकृतास्त्वकृतात्मानो लोके क्षत्रियपांसनाः।
निरर्थकं विकत्थन्ते यथा राम विकत्थसे॥१८॥
‘राम! जो क्षुद्र, अजितात्मा और क्षत्रियकुलकलंक होते हैं, वे ही संसार में अपनी बड़ाई के लिये व्यर्थ डींग हाँका करते हैं; जैसे इस समय तुम (अपने विषय में) बढ़-बढ़कर बातें बना रहे हो। १८॥
कुलं व्यपदिशन् वीरः समरे कोऽभिधास्यति।
मृत्युकाले तु सम्प्राप्ते स्वयमप्रस्तवे स्तवम्॥१९॥
‘जब कि मृत्यु के समान युद्ध का अवसर उपस्थित है, ऐसे समय में बिना किसी प्रस्ताव के ही समराङ्गण में कौन वीर अपनी कुलीनता प्रकट करता हुआ आप ही अपनी स्तुति करेगा?॥१९॥
सर्वथा तु लघुत्वं ते कत्थनेन विदर्शितम्।
सुवर्णप्रतिरूपेण तप्तेनेव कुशाग्निना॥२०॥
‘जैसे पीतल सुवर्णशोधक आग में तपाये जाने पर अपनी लघुता (कालेपन) को ही व्यक्त करता है,उसी प्रकार अपनी झूठी प्रशंसा के द्वारा तुमने सर्वथा अपने ओछेपन का ही परिचय दिया है॥२०॥
न तु मामिह तिष्ठन्तं पश्यसि त्वं गदाधरम्।
धराधरमिवाकम्प्यं पर्वतं धातुभिश्चितम्॥२१॥
‘क्या तुम नहीं देखते कि मैं नाना प्रकार के धातुओं की खानों से युक्त तथा पृथ्वी को धारण करने वाले अविचल कुलपर्वत के समान यहाँ स्थिरभाव से तुम्हारे सामने गदा लेकर खड़ा हूँ॥२१॥
पर्याप्तोऽहं गदापाणिर्हन्तुं प्राणान् रणे तव।
त्रयाणामपि लोकानां पाशहस्त इवान्तकः॥२२॥
‘मैं अकेला ही पाशधारी यमराज की भाँति गदा हाथ में लेकर रणभूमि में तुम्हारे और तीनों लोकों के भी प्राण लेने की शक्ति रखता हूँ॥२२॥
कामं बह्वपि वक्तव्यं त्वयि वक्ष्यामि न त्वहम्।
अस्तं प्राप्नोति सविता युद्धविघ्नस्ततो भवेत्॥२३॥
‘यद्यपि तुम्हारे विषय में मैं इच्छानुसार बहुत कुछ कह सकता हूँ तथापि इस समय कुछ नहीं कहूँगा; क्योंकि सूर्यदेव अस्ताचल को जा रहे हैं, अतः युद्ध में विघ्न पड़ जायगा॥२३॥
चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां हतानि ते।
त्वद्विनाशात् करोम्यद्य तेषामश्रुप्रमार्जनम्॥२४॥
‘तुमने चौदह हजार राक्षसों का संहार किया है, अतः आज तुम्हारा भी विनाश करके मैं उन सबके आँसू पोलूंगा—उनकी मौत का बदला चुकाऊँगा’॥२४॥
इत्युक्त्वा परमक्रुद्धः स गदां परमाङ्गदाम्।
खरश्चिक्षेप रामाय प्रदीप्तामशनिं यथा॥२५॥
ऐसा कहकर अत्यन्त क्रोध से भरे हुए खर ने उत्तम वलय (कड़े) से विभूषित तथा प्रज्वलित वज्र के समान भयंकर गदा को श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर चलाया॥२५॥
खरबाहुप्रमुक्ता सा प्रदीप्ता महती गदा।
भस्म वृक्षांश्च गुल्मांश्च कृत्वागात् तत्समीपतः॥२६॥
खर के हाथों से छूटी हुई वह दीप्तिमान् विशाल गदा वृक्षों और लताओं को भस्म करके उनके समीप जा पहुँची॥२६॥
तामापतन्ती महतीं मृत्युपाशोपमां गदाम्।
अन्तरिक्षगतां रामश्चिच्छेद बहुधा शरैः॥२७॥
मृत्यु के पाश की भाँति उस विशाल गदा को अपने ऊपर आती देख श्रीरामचन्द्रजी ने अनेक बाण मारकर आकाश में ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥२७॥
सा विशीर्णा शरैर्भिन्ना पपात धरणीतले।
गदा मन्त्रौषधिबलैक्लीव विनिपातिता॥२८॥
बाणों से विदीर्ण एवं चूर-चूर होकर वह गदा पृथ्वी पर गिर पड़ी, मानो कोई सर्पिणी मन्त्र और ओषधियों के बल से गिरायी गयी हो॥२८॥
सर्ग ३०
भित्त्वा तु तां गदां बाणै राघवो धर्मवत्सलः।
स्मयमान इदं वाक्यं संरब्धमिदमब्रवीत्॥१॥
धर्म प्रेमी भगवान् श्रीराम ने अपने बाणों द्वारा खर की उस गदा को विदीर्ण करके मुसकराते हुए यह रोषसूचक बात कही-॥१॥
एतत् ते बलसर्वस्वं दर्शितं राक्षसाधम।
शक्तिहीनतरो मत्तो वृथा त्वमुपगर्जसि॥२॥
‘राक्षसाधम! यही तेरा सारा बल है, जिसे तूने इस गदा के साथ दिखाया है। अब सिद्ध हो गया कि तू मुझसे अत्यन्त शक्तिहीन है व्यर्थ ही अपने बल की डींग हाँक रहा था॥२॥
एषा बाणविनिर्भिन्ना गदा भूमितलं गता।
अभिधानप्रगल्भस्य तव प्रत्ययघातिनी॥३॥
‘मेरे बाणों से छिन्न-भिन्न होकर तेरी यह गदा पृथ्वी पर पड़ी हुई है। तेरे मन में जो यह विश्वास था कि मैं इस गदा से शत्रु का वध कर डालूँगा, इसका खण्डन तेरी इस गदा ने ही कर दिया। अब यह स्पष्ट हो गया कि तू केवल बातें बनाने में ढीठ है (तुझसे कोई पराक्रम नहीं हो सकता)॥३॥
यत् त्वयोक्तं विनष्टानामिदमश्रुप्रमार्जनम्।
राक्षसानां करोमीति मिथ्या तदपि ते वचः॥४॥
‘तूने जो यह कहा था कि मैं तुम्हारा वध करके तुम्हारे हाथ से मारे गये राक्षसों का अभी आँसू पोछूगा, तेरी वह बात भी झूठी हो गयी॥४॥
नीचस्य क्षुद्रशीलस्य मिथ्यावृत्तस्य रक्षसः।
प्राणानपहरिष्यामि गरुत्मानमृतं यथा॥५॥
‘तू नीच, क्षुद्रस्वभाव से युक्त और मिथ्याचारी राक्षस है। मैं तेरे प्राणों को उसी प्रकार हर लूँगा, जैसे गरुड़ने देवताओं के यहाँ से अमृत का अपहरण किया था॥५॥
अद्य ते भिन्नकण्ठस्य फेनबुबुदभूषितम्।
विदारितस्य मद्बाणैर्मही पास्यति शोणितम्॥६॥
‘अब मैं अपने बाणों से तेरे शरीर को विदीर्ण करके तेरा गला भी काट डालूँगा। फिर यह पृथ्वी फेन और बुदबुदों से युक्त तेरे गरम-गरम रक्त का पान करेगी॥६॥
पांसुरूषितसर्वाङ्गः स्रस्तन्यस्तभुजदयः।
स्वप्स्यसे गां समाश्लिष्य दुर्लभां प्रमदामिव॥७॥
‘तेरे सारे अङ्ग धूल से धूसर हो जायेंगे, तेरी दोनों भुजाएँ शरीर से अलग होकर पृथ्वी पर गिर जायँगी और उस दशा में तू दुर्लभ युवती के समान इस पृथ्वी का आलिङ्गन करके सदा के लिये सो जायगा॥७॥
प्रवृद्धनिद्रे शयिते त्वयि राक्षसपांसने।
भविष्यन्ति शरण्यानां शरण्या दण्डका इमे॥८॥
‘तेरे-जैसे राक्षसकुलकलङ्क के सदा के लिये महानिद्रा में सो जाने पर ये दण्डकवन के प्रदेश शरणार्थियों को शरण देने वाले हो जायेंगे॥८॥
जनस्थाने हतस्थाने तव राक्षस मच्छरैः।
निर्भया विचरिष्यन्ति सर्वतो मुनयो वने॥९॥
‘राक्षस! मेरे बाणों से जनस्थान में बने हुए तेरे निवासस्थान के नष्ट हो जाने पर मुनिगण इस वन में सब ओर निर्भय विचर सकेंगे॥९॥
अद्य विप्रसरिष्यन्ति राक्षस्यो हतबान्धवाः।
बाष्पार्द्रवदना दीना भयादन्यभयावहाः॥१०॥
‘जो अबतक दूसरों को भय देती थीं, वे राक्षसियाँ आज अपने बान्धवजनों के मारे जाने से दीन हो आँसुओं से भींगे मुँह लिये जनस्थान से स्वयं ही भय के कारण भाग जायँगी॥१०॥
अद्य शोकरसज्ञास्ता भविष्यन्ति निरर्थिकाः।
अनुरूपकुलाः पत्न्यो यासां त्वं पतिरीदृशः॥११॥
‘जिनका तुझ-जैसा दुराचारी पति है, वे तदनुरूप कुलवाली तेरी पत्नियाँ आज तेरे मारे जाने पर काम आदि पुरुषार्थों से वञ्चित हो शोकरूपी स्थायी भाव वाले करुण रस का अनुभव करने वाली होंगी॥११॥
नृशंसशील क्षुद्रात्मन् नित्यं ब्राह्मणकण्टक।
त्वत्कृते शङ्कितैरग्नौ मुनिभिः पात्यते हविः॥१२॥
‘क्रूरस्वभाववाले निशाचर ! तेरा हृदय सदा ही क्षुद्र विचारों से भरा रहता है। तू ब्राह्मणों के लिये कण्टकरूप है। तेरे ही कारण मुनिलोग शङ्कित रहकर ही अग्नि में हविष्य की आहुतियाँ डालते हैं’॥१२॥
तमेवमभिसंरब्धं ब्रुवाणं राघवं वने।
खरो निर्भर्त्सयामास रोषात् खरतरस्वरः॥१३॥
वन में श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार रोषपूर्ण बातें कह रहे थे, उस समय क्रोध के कारण खर का भी स्वर अत्यन्त कठोर हो गया और उसने उन्हें फटकारते हुए कहा-॥१३॥
दृढं खल्ववलिप्तोऽसि भयेष्वपि च निर्भयः।
वाच्यावाच्यं ततो हि त्वं मृत्योर्वश्यो न बुध्यसे॥१४॥
‘अहो! निश्चय ही तुम बड़े घमंडी हो, भय के अवसरों पर भी निर्भय बने हुए हो। जान पड़ता है कि तुम मृत्यु के अधीन हो गये हो, इस कारण से ही तुम्हें यह भी पता नहीं है कि कब क्या कहना चाहिये और क्या नहीं कहना चाहिये?॥१४॥
कालपाशपरिक्षिप्ता भवन्ति पुरुषा हि ये।
कार्याकार्यं न जानन्ति ते निरस्तषडिन्द्रियाः॥१५॥
‘जो पुरुष काल के फन्दे में फँस जाते हैं, उनकी छहों इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं; इसीलिये उन्हें कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान नहीं रह जाता है’। १५॥
एवमुक्त्वा ततो रामं संरुध्य भृकुटिं ततः।
स ददर्श महासालमविदूरे निशाचरः॥१६॥
रणे प्रहरणस्यार्थे सर्वतो ह्यवलोकयन्।
स तमुत्पाटयामास संदष्टदशनच्छदम्॥१७॥
ऐसा कहकर उस निशाचर ने एक बार श्रीराम की ओर भौहें टेढ़ी करके देखा और रणभूमि में उनपर प्रहार करने के लिये वह चारों ओर दृष्टिपात करने लगा। इतने में ही उसे एक विशाल साखू का वृक्ष दिखायी दिया, जो निकट ही था। खर ने अपने होठों को दाँतों से दबाकर उस वृक्ष को उखाड़ लिया। १६-१७॥
तं समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां विनर्दित्वा महाबलः।
राममुद्दिश्य चिक्षेप हतस्त्वमिति चाब्रवीत्॥१८॥
फिर उस महाबली निशाचर ने विकट गर्जना करके दोनों हाथों से उस वृक्ष को उठा लिया और श्रीराम पर दे मारा। साथ ही यह भी कहा-’लो, अब तुम मारे गये’॥१८॥
तमापतन्तं बाणौधैश्छित्त्वा रामः प्रतापवान्।
रोषमाहारयत् तीव्र निहन्तुं समरे खरम्॥१९॥
परमप्रतापी भगवान् श्रीराम ने अपने ऊपर आते हुए उस वृक्ष को बाण-समूहों से काट गिराया और उस समरभूमि में खर को मार डालने के लिये अत्यन्त क्रोध प्रकट किया॥१९॥
जातस्वेदस्ततो रामो रोषरक्तान्तलोचनः।
निर्बिभेद सहस्रेण बाणानां समरे खरम्॥२०॥
उस समय श्रीराम के शरीर में पसीना आ गया। उनके नेत्रप्रान्त रोष से रक्तवर्ण के हो गये। उन्होंने सहस्रों बाणों का प्रहार करके समराङ्गण में खर को क्षत-विक्षत कर दिया॥२०॥
तस्य बाणान्तराद् रक्तं बहु सुस्राव फेनिलम्।
गिरेः प्रस्रवणस्येव धाराणां च परिस्रवः॥२१॥
उनके बाणों के आघात से उस निशाचर के शरीर में जो घाव हुए थे, उनसे अधिक मात्रा में फेनयुक्त रक्त प्रवाहित होने लगा, मानो पर्वत के झरने से जल की धाराएँ गिर रही हों॥२१॥
विकलः स कृतो बाणैः खरो रामेण संयुगे।
मत्तो रुधिरगन्धेन तमेवाभ्यद्रवद् द्रुतम्॥२२॥
श्रीराम ने युद्धस्थल में अपने बाणों की मार से खर को व्याकुल कर दिया; तो भी (उसका साहस कम नहीं हुआ।) वह खून की गन्ध से उन्मत्त होकर बड़े वेग से श्रीराम की ओर ही दौड़ा॥२२॥
तमापतन्तं संक्रुद्धं कृतास्त्रो रुधिराप्लुतम्।
अपासर्पद द्वित्रिपदं किंचित्त्वरितविक्रमः॥२३॥
अस्त्र-विद्या के ज्ञाता भगवान् श्रीराम ने देखा कि यह राक्षस खून से लथपथ होने पर भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक मेरी ही ओर बढ़ा आ रहा है तो वे तुरंत चरणों का संचालन करके दो-तीन पग पीछे हट गये (क्योंकि बहुत निकट होने पर बाण चलाना सम्भव नहीं हो सकता था)॥२३॥
ततः पावकसंकाशं वधाय समरे शरम्।
खरस्य रामो जग्राह ब्रह्मदण्डमिवापरम्॥२४॥
तदनन्तर श्रीराम ने समराङ्गण में खर का वध करने के लिये एक अग्नि के समान तेजस्वी बाण हाथ में लिया, जो दूसरे ब्रह्मदण्ड के समान भयंकर था॥२४॥
स तद् दत्तं मघवता सुरराजेन धीमता।
संदधे च स धर्मात्मा मुमोच च खरं प्रति॥२५॥
वह बाण बुद्धिमान् देवराज इन्द्र का दिया हुआ था। धर्मात्मा श्रीराम ने उसे धनुष पर रखा और खर को लक्ष्य करके छोड़ दिया॥२५॥
स विमुक्तो महाबाणो निर्घातसमनिःस्वनः।
रामेण धनुरायम्य खरस्योरसि चापतत्॥२६॥
उस महाबाण के छूटते ही वज्रपात के समान भयानक शब्द हुआ। श्रीराम ने अपने धनुष को कान तक खींचकर उसे छोड़ा था। वह खर की छाती में जा लगा॥२६॥
स पपात खरो भूमौ दह्यमानः शराग्निना।
रुद्रेणेव विनिर्दग्धः श्वेतारण्ये यथान्धकः॥२७॥
जैसे श्वेतवन में भगवान् रुद्र ने अन्धकासुर को जलाकर भस्म किया था, उसी प्रकार दण्डकवन में श्रीराम के उस बाण की आग में जलता हुआ निशाचर खर पृथ्वी पर गिर पड़ा॥२७॥
स वृत्र इव वज्रेण फेनेन नमुचिर्यथा।
बलो वेन्द्राशनिहतो निपपात हतः खरः॥२८॥
जैसे वज्र से वृत्रासुर, फेन से नमुचि और इन्द्र की अशनि से बलासुर मारा गया था, उसी प्रकार श्रीराम के उस बाण से आहत होकर खर धराशायी हो गया॥२८॥
एतस्मिन्नन्तरे देवाश्चारणैः सह संगताः।
दुन्दुभीश्चाभिनिघ्नन्तः पुष्पवर्षं समन्ततः॥२९॥
रामस्योपरि संहृष्टा ववर्षुर्विस्मितास्तदा।
अर्धाधिकमुहूर्तेन रामेण निशितैः शरैः॥३०॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां कामरूपिणाम्।
खरदूषणमुख्यानां निहतानि महामृधे॥३१॥
इसी समय देवता चारणों के साथ मिलकर आये और हर्ष में भरकर दुन्दुभि बजाते हुए वहाँ श्रीराम के ऊपर चारों ओर से फूलों की वर्षा करने लगे। उस समय उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ था कि श्रीराम ने अपने पैने बाणों से डेढ़ मुहूर्त में ही इच्छानुसार रूप धारण करने वाले खर-दूषण आदि चौदह हजार राक्षसों का इस महासमर में संहार कर डाला॥२९–३१॥
अहो बत महत्कर्म रामस्य विदितात्मनः।
अहो वीर्यमहो दाढयं विष्णोरिव हि दृश्यते॥३२॥
वे बोले-’अहो! अपने स्वरूप को जानने वाले भगवान् श्रीराम का यह कर्म महान् और अद्भुत है, इनका बल-पराक्रम भी अद्भुत है और इनमें भगवान् विष्णु की भाँति आश्चर्यजनक दृढ़ता दिखायी देती है॥३२॥
इत्येवमुक्त्वा ते सर्वे ययुर्देवा यथागतम्।
ततो राजर्षयः सर्वे संगताः परमर्षयः॥३३॥
सभाज्य मुदिता रामं सागस्त्या इदमब्रुवन्।
ऐसा कहकर वे सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। तदनन्तर बहुत-से राजर्षि और अगस्त्य आदि महर्षि मिलकर वहाँ आये तथा प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम का सत्कार करके उनसे इस प्रकार बोले-॥३३ १/२॥
एतदर्थं महातेजा महेन्द्रः पाकशासनः॥३४॥
शरभङ्गाश्रमं पुण्यमाजगाम पुरंदरः।
आनीतस्त्वमिमं देशमुपायेन महर्षिभिः॥३५॥
‘रघुनन्दन! इसीलिये महातेजस्वी पाकशासन पुरंदर इन्द्र शरभङ्ग मुनि के पवित्र आश्रम पर आये थे और इसी कार्य की सिद्धि के लिये महर्षियों ने विशेष उपाय करके आपको पञ्चवटी के इस प्रदेश में पहुँचाया था। ३४-३५॥
एषां वधार्थं शत्रूणां रक्षसां पापकर्मणाम्।
तदिदं नः कृतं कार्यं त्वया दशरथात्मज॥३६॥
स्वधर्मं प्रचरिष्यन्ति दण्डकेषु महर्षयः।
‘मुनियों के शत्रुरूप इन पापाचारी राक्षसों के वध के लिये ही आपका यहाँ शुभागमन आवश्यक समझा गया था। दशरथनन्दन! आपने हमलोगोंका यह बहुत बड़ा कार्य सिद्ध कर दिया। अब बड़े-बड़े ऋषि-मुनि दण्डकारण्य के विभिन्न प्रदेशों में निर्भय होकर अपने धर्म का अनुष्ठान करेंगे’॥३६ १/२॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मणः सह सीतया।
गिरिदुर्गाद् विनिष्क्रम्य संविवेशाश्रमे सुखी॥३७॥
इसी बीच में वीर लक्ष्मण भी सीता के साथ पर्वत की कन्दरा से निकलकर प्रसन्नतापूर्वक आश्रम में आ गये॥३७॥
ततो रामस्तु विजयी पूज्यमानो महर्षिभिः॥३८॥
प्रविवेशाश्रमं वीरो लक्ष्मणेनाभिपूजितः।
तत्पश्चात् महर्षियों से प्रशंसित और लक्ष्मण से पूजित विजयी वीर श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश किया। ३८ १/२॥
तं दृष्ट्वा शत्रुहन्तारं महर्षीणां सुखावहम्॥३९॥
बभूव हृष्टा वैदेही भर्तारं परिषस्वजे।
मुदा परमया युक्ता दृष्ट्वा रक्षोगणान् हतान्।
रामं चैवाव्ययं दृष्ट्वा तुतोष जनकात्मजा॥४०॥
महर्षियों को सुख देने वाले अपने शत्रुहन्ता पति का दर्शन करके विदेहराजनन्दिनी सीता को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने परमानन्द में निमग्न होकर अपने स्वामी का आलिङ्गन किया। राक्षस-समूह मारे गये और श्रीराम को कोई क्षति नहीं पहँची-यह देख और जानकर जानकी जीको बहुत संतोष हुआ॥३९-४०॥
ततस्तु तं राक्षससङ्घमर्दनं सम्पूज्यमानं मुदितैर्महात्मभिः।
पुनः परिष्वज्य मुदान्वितानना बभूव हृष्टा जनकात्मजा तदा॥४१॥
प्रसन्नता से भरे हुए महात्मा मुनि जिनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे तथा जिन्होंने राक्षसों के समुदाय को कुचल डाला था, उन प्राणवल्लभ, श्रीराम का बारम्बार आलिङ्गन करके उस समय जनकनन्दिनी सीता को बड़ा हर्ष हुआ उनका मुख प्रसन्नता से खिल उठा॥४१॥
सर्ग ३१
त्वरमाणस्ततो गत्वा जनस्थानादकम्पनः।
प्रविश्य लङ्कां वेगेन रावणं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
तदनन्तर जनस्थान से अकम्पन नामक राक्षस बड़ी उतावली के साथ लङ्का की ओर गया और शीघ्र ही उस पुरी में प्रवेश करके रावण से इस प्रकार बोला –॥१॥
जनस्थानस्थिता राजन् राक्षसा बहवो हताः।
खरश्च निहतः संख्ये कथंचिदहमागतः॥२॥
‘राजन् ! जनस्थान में जो बहुत-से राक्षस रहते थे, वे मार डाले गये। खर युद्ध में मारा गया। मैं किसी तरह जान बचाकर यहाँ आया हूँ’॥२॥
एवमुक्तो दशग्रीवः क्रुद्धः संरक्तलोचनः।
अकम्पनमुवाचेदं निर्दहन्निव तेजसा॥३॥
अकम्पन के ऐसा कहते ही दशमुख रावण क्रोध से जल उठा और लाल आँखें करके उससे इस तरह बोला, मानो उसे अपने तेज से जलाकर भस्म कर डालेगा॥३॥
केन भीमं जनस्थानं हतं मम परासुना।
को हि सर्वेषु लोकेषु गतिं नाधिगमिष्यति॥४॥
वह बोला-’कौन मौत के मुख में जाना चाहता है, जिसने मेरे भयंकर जनस्थान का विनाश किया है? कौन वह दुःसाहसी है, जिसे समस्त लोकों में कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं मिलने वाला है ?॥४॥
न हि मे विप्रियं कृत्वा शक्यं मघवता सुखम्।
प्राप्तुं वैश्रवणेनापि न यमेन च विष्णुना॥५॥
‘मेरा अपराध करके इन्द्र, यम, कुबेर और विष्णु भी चैन से नहीं रह सकेंगे॥५॥
कालस्य चाप्यहं कालो दहेयमपि पावकम्।
मृत्यु मरणधर्मेण संयोजयितुमुत्सहे॥६॥
‘मैं काल का भी काल हूँ, आग को भी जला सकता हूँ तथा मौत को भी मृत्यु के मुख में डाल सकता हूँ॥६॥
वातस्य तरसा वेगं निहन्तुमपि चोत्सहे।
दहेयमपि संक्रुद्धस्तेजसाऽऽदित्यपावकौ॥७॥
‘यदि मैं क्रोध में भर जाऊँ तो अपने वेग से वायु की गति को भी रोक सकता हूँ तथा अपने तेज से सूर्य और अग्नि को भी जलाकर भस्म कर सकता हूँ’॥७॥
तथा क्रुद्धं दशग्रीवं कृताञ्जलिरकम्पनः ।
भयात् संदिग्धया वाचा रावणं याचतेऽभयम्॥८॥
रावण को इस प्रकार क्रोध से भरा देख भय के मारे अकम्पन की बोलती बंद हो गयी। उसने हाथ जोड़कर संशययुक्त वाणी में रावण से अभय की याचना की॥८॥
दशग्रीवोऽभयं तस्मै प्रददौ रक्षसां वरः।
स विस्रब्धोऽब्रवीद् वाक्यमसंदिग्धमकम्पनः॥९॥
तब राक्षसों में श्रेष्ठ दशग्रीव ने उसे अभय दान दिया। इससे अकम्पन को अपने प्राण बचने का विश्वास हुआ और वह संशयरहित होकर बोला-॥९॥
पुत्रो दशरथस्यास्ते सिंहसंहननो युवा।
रामो नाम महास्कन्धो वृत्तायतमहाभुजः॥१०॥
श्यामः पृथुयशाः श्रीमानतुल्यबलविक्रमः।
हतस्तेन जनस्थाने खरश्च सहदूषणः॥११॥
‘राक्षसराज! राजा दशरथ के नवयुवक पुत्र श्रीराम पञ्चवटी में रहते हैं। उनके शरीर की गठन सिंह के समान है, कंधे मोटे और भुजाएँ गोल तथा लम्बी हैं, शरीर का रंग साँवला है। वे बड़े यशस्वी और तेजस्वी दिखायी देते हैं। उनके बल और पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है। उन्होंने जनस्थान में रहने वाले खर और दूषण आदि का वध किया है’॥१०-११॥
अकम्पनवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसाधिपः।
नागेन्द्र इव निःश्वस्य इदं वचनमब्रवीत्॥१२॥
अकम्पन की यह बात सुनकर राक्षसराज रावण ने नागराज (महान् सर्प) की भाँति लम्बी साँस खींचकर इस प्रकार कहा-॥१२॥
स सुरेन्द्रेण संयुक्तो रामः सर्वामरैः सह।
उपयातो जनस्थानं ब्रूहि कच्चिदकम्पन॥१३॥
अकम्पन! बताओ तो सही क्या राम सम्पूर्ण देवताओं तथा देवराज इन्द्र के साथ जनस्थान में आये हैं?’॥१३॥
रावणस्य पुनर्वाक्यं निशम्य तदकम्पनः।
आचचक्षे बलं तस्य विक्रमं च महात्मनः॥१४॥
रावण का यह प्रश्न सुनकर अकम्पन ने महात्मा श्रीराम के बल और पराक्रम का पुनः इस प्रकार वर्णन किया॥१४॥
रामो नाम महातेजाः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्।
दिव्यास्त्रगुणसम्पन्नः परं धर्मं गतो युधि॥१५॥
‘लङ्गेश्वर! जिनका नाम राम है, वे संसार के समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं। दिव्यास्त्रों के प्रयोग का जो गुण है, उससे भी वे पूर्णतः सम्पन्न हैं। युद्ध की कला में तो वे पराकाष्ठा को पहुँचे हुए हैं॥१५॥
तस्यानुरूपो बलवान् रक्ताक्षो दुन्दुभिस्वनः।
कनीयाँल्लक्ष्मणो भ्राता राकाशशिनिभाननः॥१६॥
‘श्रीराम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी हैं, जो उन्हीं के समान बलवान् हैं। उनका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति मनोहर है। उनकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं और स्वर दुन्दुभि के समान गम्भीर है॥१६॥
स तेन सह संयुक्तः पावकेनानिलो यथा।
श्रीमान् राजवरस्तेन जनस्थानं निपातितम्॥१७॥
‘जैसे अग्नि के साथ वायु हों, उसी प्रकार अपने भाई के साथ संयुक्त हुए राजाधिराज श्रीमान् राम बड़े प्रबल हैं। उन्होंने ही जनस्थान को उजाड़ डाला है॥१७॥
नैव देवा महात्मानो नात्र कार्या विचारणा।
शरा रामेण तत्सृष्टा रुक्मपुङ्गाः पतत्त्रिणः॥१८॥
सर्पाः पञ्चानना भूत्वा भक्षयन्ति स्म राक्षसान्।
“उनके साथ न कोई देवता हैं, न महात्मा मुनि। इस विषय में आप कोई विचार न करें। श्रीराम के छोड़े हुए सोने की पाँखवाले बाण पाँच मुखवाले सर्प बनकर राक्षसों को खा जाते थे॥१८ १/२॥
येन येन च गच्छन्ति राक्षसा भयकर्षिताः॥१९॥
तेन तेन स्म पश्यन्ति राममेवाग्रतः स्थितम्।
इत्थं विनाशितं तेन जनस्थानं तवानघ॥२०॥
‘भय से कातर हुए राक्षस जिस-जिस मार्ग से भागते थे, वहाँ-वहाँ वे श्रीराम को ही अपने सामने खड़ा देखते थे। अनघ! इस प्रकार अकेले श्रीराम ने ही आपके जनस्थान का विनाश किया है’॥१९-२०॥
अकम्पनवचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत्।
गमिष्यामि जनस्थानं रामं हन्तुं सलक्ष्मणम्॥२१॥
अकम्पन की यह बात सुनकर रावण ने कहा-’मैं अभी लक्ष्मणसहित राम का वध करने के लिये जनस्थान को जाऊँगा’॥२१॥
अथैवमुक्ते वचने प्रोवाचेदमकम्पनः ।
शृणु राजन् यथावृत्तं रामस्य बलपौरुषम्॥२२॥
उसके ऐसा कहने पर अकम्पन बोला-’राजन्! श्रीराम का बल और पुरुषार्थ जैसा है, उसका यथावत् वर्णन मुझसे सुनिये॥२२॥
असाध्यः कुपितो रामो विक्रमेण महायशाः।
आपगायास्तु पूर्णाया वेगं परिहरेच्छरैः॥२३॥
सताराग्रहनक्षत्रं नभश्चाप्यवसादयेत्।
‘महायशस्वी श्रीराम यदि कुपित हो जायँ तो उन्हें अपने पराक्रम के द्वारा कोई भी काबू में नहीं कर सकता। वे अपने बाणों से भरी हुई नदी के वेग को भी पलट सकते हैं तथा तारा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित सम्पूर्ण आकाशमण्डल को पीड़ा दे सकते हैं॥२३ १/२॥
असौ रामस्तु सीदन्तीं श्रीमानभ्युद्धरेन्महीम्॥२४॥
भित्त्वा वेलां समुद्रस्य लोकानाप्लावयेद् विभुः।
वेगं वापि समुद्रस्य वायुं वा विधमेच्छरैः॥२५॥
‘वे श्रीमान् भगवान् राम समुद्र में डूबती हुई पृथ्वी को ऊपर उठा सकते हैं, महासागर की मर्यादा का भेदन करके समस्त लोकों को उसके जल से आप्लावित कर सकते हैं तथा अपने बाणों से समुद्र के वेग अथवा वायु को भी नष्ट कर सकते हैं॥२४-२५॥
संहृत्य वा पुनर्लोकान् विक्रमेण महायशाः।
शक्तः श्रेष्ठः स पुरुषः स्रष्टुं पुनरपि प्रजाः॥२६॥
‘वे महायशस्वी पुरुषोत्तम अपने पराक्रम से सम्पूर्ण लोकों का संहार करके पुनः नये सिरे से प्रजा की सृष्टि करने में समर्थ हैं॥२६॥
नहि रामो दशग्रीव शक्यो जेतुं रणे त्वया।
रक्षसां वापि लोकेन स्वर्गः पापजनैरिव॥२७॥
‘दशग्रीव! जैसे पापी पुरुष स्वर्ग पर अधिकार नहीं प्राप्त कर सकते, उसी प्रकार आप अथवा समस्त राक्षस-जगत् भी युद्ध में श्रीराम को नहीं जीत सकते॥२७॥
न तं वध्यमहं मन्ये सर्वैर्देवासुरैरपि।
अयं तस्य वधोपायस्तन्ममैकमनाः शृणु॥२८॥
‘मेरी समझ में सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते। उनके वध का यह एक उपाय मुझे सूझा है, उसे आप मेरे मुख से एकचित्त होकर सुनिये॥२८॥
भार्या तस्योत्तमा लोके सीता नाम सुमध्यमा।
श्यामा समविभक्ताङ्गी स्त्रीरत्नं रत्नभूषिता॥२९॥
‘श्रीराम की पत्नी सीता संसार की सर्वोत्तम सुन्दरी है। उसने यौवन के मध्य में पदार्पण किया है। उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुन्दर और सुडौल हैं। वह रत्नमय आभूषणों से विभूषित रहती है। सीता सम्पूर्ण स्त्रियों में एक रत्न है॥२९॥
नैव देवी न गन्धर्वी नाप्सरा न च पन्नगी।
तुल्या सीमन्तिनी तस्या मानुषी तु कुतो भवेत्॥३०॥
‘देवकन्या, गन्धर्वकन्या, अप्सरा अथवा नागकन्या कोई भी रूप में उसकी समानता नहीं कर सकती, फिर मनुष्य-जाति की दूसरी कोई नारी उसके समान कैसे हो सकती है॥३०॥
तस्यापहर भार्यां त्वं तं प्रमथ्य महावने।
सीतया रहितो रामो न चैव हि भविष्यति॥३१॥
‘उस विशाल वन में जिस किसी भी उपाय से श्रीराम को धोखे में डालकर आप उनकी पत्नी का अपहरण कर लें। सीता से बिछुड़ जाने पर श्रीराम कदापि जीवित नहीं रहेंगे’॥३१॥
अरोचयत तद्वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः।
चिन्तयित्वा महाबाहुरकम्पनमुवाच ह॥३२॥
राक्षसराज रावण को अकम्पन की वह बात पसंद आ गयी। उस महाबाहु दशग्रीव ने कुछ सोचकर अकम्पन से कहा-॥३२॥
बाढं कल्यं गमिष्यामि ह्येकः सारथिना सह।
आनेष्यामि च वैदेहीमिमां हृष्टो महापुरीम्॥३३॥
‘ठीक है, कल प्रातःकाल सारथि के साथ मैं अकेला ही जाऊँगा और विदेहकुमारी सीता को प्रसन्नतापूर्वक इस महापुरी में ले आऊँगा’॥३३॥
तदेवमुक्त्वा प्रययौ खरयुक्तेन रावणः।
रथेनादित्यवर्णेन दिशः सर्वाः प्रकाशयन्॥३४॥
ऐसा कहकर रावण गधों से जुते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर आरूढ़ हो सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ वहाँ से चला॥३४॥
स रथो राक्षसेन्द्रस्य नक्षत्रपथगो महान्।
चञ्चूर्यमाणः शुशुभे जलदे चन्द्रमा इव॥३५॥
नक्षत्रों के मार्ग पर विचरता हुआ राक्षसराज का वह विशाल रथ बादलों की आड़ में प्रकाशित होने वाले चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था॥३५॥
स दूरे चाश्रमं गत्वा ताटकेयमुपागमत्।
मारीचेनार्चितो राजा भक्ष्यभोज्यैरमानुषैः॥३६॥
कुछ दूर पर स्थित एक आश्रम में जाकर वह ताटकापुत्र मारीच से मिला। मारीच ने अलौकिक भक्ष्य-भोज्य अर्पित करके राजा रावण का स्वागत सत्कार किया॥३६॥
तं स्वयं पूजयित्वा तु आसनेनोदकेन च।
अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत्॥३७॥
आसन और जल आदि के द्वारा स्वयं ही उसका पूजन करके मारीच ने अर्थयुक्त वाणी में पूछा-॥३७॥
कच्चित् सकुशलं राजैल्लोकानां राक्षसाधिप।
आशङ्के नाधिजाने त्वं यतस्तूर्णमुपागतः॥३८॥
‘राक्षसराज ! तुम्हारे राज्य में लोगों की कुशल तो है न? तुम बड़ी उतावली के साथ आ रहे हो, इसलिये मेरे मन में कुछ खटका हुआ है। मैं समझता हूँ, तुम्हारे यहाँ का अच्छा हाल नहीं है’॥३८॥
एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावणः।
ततः पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविदः॥३९॥
मारीच के इस प्रकार पूछने पर बातचीत की कला को जानने वाले महातेजस्वी रावण ने इस प्रकार कहा-॥३९॥
आरक्षो मे हतस्तात रामेणाक्लिष्टकारिणा।
जनस्थानमवध्यं तत् सर्वं युधि निपातितम्॥४०॥
‘तात! अनायास ही महान् पराक्रम दिखाने वाले श्रीराम ने मेरे राज्य की सीमा के रक्षक खर-दूषण आदि को मार डाला है तथा जो जनस्थान अवध्य समझा जाता था, वहाँ के सारे राक्षसों को उन्होंने युद्ध में मार गिराया है॥४०॥
तस्य मे कुरु साचिव्यं तस्य भार्यापहारणे।
राक्षसेन्द्रवचः श्रुत्वा मारीचो वाक्यमब्रवीत्॥४१॥
‘अतः इसका बदला लेने के लिये मैं उनकी स्त्री का अपहरण करना चाहता हूँ। इस कार्य में तुम मेरी सहायता करो।’ राक्षसराज रावण का यह वचन सुनकर मारीच बोला-॥४१॥
आख्याता केन वा सीता मित्ररूपेण शत्रुणा।
त्वया राक्षसशार्दूल को न नन्दति नन्दितः॥४२॥
‘निशाचरशिरोमणे! मित्र के रूप में तुम्हारा वह कौन-सा ऐसा शत्रु है, जिसने तुम्हें सीता को हर लेने की सलाह दी है? कौन ऐसा पुरुष है, जो तुमसे सुख और आदर पाकर भी प्रसन्न नहीं है, अतः तुम्हारी बुराई करना चाहता है ?॥४२॥
सीतामिहानयस्वेति को ब्रवीति ब्रवीहि मे।
रक्षोलोकस्य सर्वस्य कः शृङ्ग छेत्तुमिच्छति॥४३॥
‘कौन कहता है कि तुम सीता को यहाँ हर ले आओ? मुझे उसका नाम बताओ। वह कौन है, जो समस्त राक्षस-जगत् का सींग काट लेना चाहता है?॥४३॥
प्रोत्साहयति यश्च त्वां स च शत्रुरसंशयम्।
आशीविषमुखाद दंष्टामुद्धां चेच्छति त्वया॥४४॥
‘जो इस कार्य में तुम्हें प्रोत्साहन दे रहा है, वह तुम्हारा शत्रु है, इसमें संशय नहीं है। वह तुम्हारे हाथों विषधर सर्प के मुख से उसके दाँत उखड़वाना चाहता है॥४४॥
कर्मणानेन केनासि कापथं प्रतिपादितः।
सुखसुप्तस्य ते राजन् प्रहृतं केन मूर्धनि॥४५॥
‘राजन्! किसने तुम्हें ऐसी खोटी सलाह देकर कुमार्ग पर पहुँचाया है? किसने सुखपूर्वक सोते समय तुम्हारे मस्तक पर लात मारी है॥४५॥
विशुद्धवंशाभिजनाग्रहस्ततेजोमदः संस्थितदोर्विषाणः।
उदीक्षितुं रावण नेह युक्तः स संयुगे राघवगन्धहस्ती॥४६॥
‘रावण! राघवेन्द्र श्रीराम वह गन्धयुक्त गजराज हैं, जिसकी गन्ध सूंघकर ही गजरूपी योद्धा दूर भाग जाते हैं। विशुद्ध कुल में जन्म ग्रहण करना ही उस राघवरूपी गजराज का शुण्डदण्ड है, प्रताप ही मद है और सुडौल बाँहें ही दोनों दाँत हैं। युद्धस्थल में उनकी ओर देखना भी तुम्हारे लिये उचित नहीं है; फिर जूझने की तो बात ही क्या है।॥४६॥
असौ रणान्तःस्थितिसंधिवालो विदग्धरक्षोमृगहा नृसिंहः।
सुप्तस्त्वया बोधयितुं न शक्यः शराङ्गपूर्णो निशितासिदंष्ट्रः॥४७॥
“वे श्रीराम मनुष्य के रूप में एक सिंह हैं। रणभूमि के भीतर स्थित होना ही उनके अङ्गों की संधियाँ तथाबाल हैं। वह सिंह चतुर राक्षसरूपी मृगों का वध करनेवाला है, बाणरूपी अङ्गों से परिपूर्ण है तथा तलवारें ही उसकी तीखी दाढ़ें हैं। उस सोते हुए सिंह को तुम नहीं जगा सकते॥४७॥
चापापहारे भुजवेगपङ्के शरोर्मिमाले सुमहाहवौघे।
न रामपातालमुखेऽतिघोरे प्रस्कन्दितुं राक्षसराज युक्तम्॥४८॥
‘राक्षसराज! श्रीराम एक पातालतलव्यापी महासागर हैं, धनुष ही उस समुद्र के भीतर रहने वाला ग्राह है, भुजाओं का वेग ही कीचड़ है, बाण ही तरंगमालाएँ हैं और महान् युद्ध ही उसकी अगाध जलराशि है। उसके अत्यन्त भयंकर मुख अर्थात् बड़वानल में कूद पड़ना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है॥४८॥
प्रसीद लङ्केश्वर राक्षसेन्द्र लङ्कां प्रसन्नो भव साधु गच्छ।
त्वं स्वेषु दारेषु रमस्व नित्यं रामः सभार्यो रमतां वनेषु॥४९॥
‘लंकेश्वर ! प्रसन्न होओ। राक्षसराज! सानन्द रहो और सकुशल लंका को लौट जाओ। तुम सदा पुरी में अपनी स्त्रियों के साथ रमण करो और राम अपनी पत्नी के साथ वन में विहार करें’॥४९॥
एवमुक्तो दशग्रीवो मारीचेन स रावणः।
न्यवर्तत पुरीं लङ्कां विवेश च गृहोत्तमम्॥५०॥
मारीच के ऐसा कहने पर दशमुख रावण लंका को लौटा और अपने सुन्दर महल में चला गया॥५०॥
सर्ग ३२
ङ्के ततः शार्पणखा दृष्ट्या सहस्राणि चातुर्दशा ।
हतान्येकेन रामेण रक्षसां भीमकर्मणाम्॥१॥
दूषणं च खरं चैव हतं त्रिशिरसं रणे।
दृष्ट्वा पुनर्महानादान् ननाद जलदोपमा॥२॥
उधर शूर्पणखा ने जब देखा कि श्रीराम ने भयंकर कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षसों को अकेले ही मार गिराया तथा युद्ध के मैदान में दूषण, खर और त्रिशिरा को भी मौत के घाट उतार दिया, तब वह शोक के कारण मेघ गर्जना के समान पुनः बड़े जोर-जोर से घोर चीत्कार करने लगी॥१-२॥
सा दृष्ट्वा कर्म रामस्य कृतमन्यैः सुदुष्करम्।
जगाम परमोद्विग्ना लङ्कां रावणपालिताम्॥३॥
श्रीराम ने वह कर्म कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुष्कर है; यह अपनी आँखों देखकर वहअत्यन्त उद्विग्न हो उठी और रावण द्वारा सुरक्षित लंकापुरी को गयी॥३॥
सा ददर्श विमानाग्रे रावणं दीप्ततेजसम्।
उपोपविष्टं सचिवैर्मरुद्भिरिव वासवम्॥४॥
वहाँ पहुँचकर उसने देखा, रावण पुष्पक विमान (या सतमहले मकान) के ऊपरी भाग में बैठा हुआ है। उसका राजोचित तेज उद्दीप्त हो रहा है तथा मरुद्गणों से घिरे हुए इन्द्र की भाँति वह आस-पास बैठे हुए मन्त्रियों से घिरा है॥४॥
आसीनं सूर्यसंकाशे काञ्चने परमासने।
रुक्मवेदिगतं प्राज्यं ज्वलन्तमिव पावकम्॥५॥
रावण जिस उत्तम सुवर्णमय सिंहासन पर विराजमान था, वह सूर्य के समान जगमगा रहा था। जैसे सोने की ईंटों से बनी हुई वेदी पर स्थापित अग्निदेव घी की अधिक आहुति पाकर प्रज्वलित हो उठे हों, उसी प्रकार उस स्वर्णसिंहासन पर रावण शोभा पा रहा था॥५॥
देवगन्धर्वभूतानामृषीणां च महात्मनाम्।
अजेयं समरे घोरं व्यात्ताननमिवान्तकम्॥६॥
देवासुरविमर्देषु वज्राशनिकृतव्रणम्।
ऐरावतविषाणाग्रैरुत्कृष्टकिणवक्षसम्॥७॥
देवता, गन्धर्व, भूत और महात्मा ऋषि भी उसे जीतने में असमर्थ थे। समरभूमि में वह मुँह फैलाकर खड़े हुए यमराज की भाँति भयानक जान पड़ता था। देवताओं और असुरों के संग्राम के अवसरों पर उसके शरीर में वज्र और अशनि के जो घाव हुए थे, उनके चिह्न अब तक विद्यमान थे। उसकी छाती में ऐरावत हाथी ने जो अपने दाँत गड़ाये थे, उसके निशान अब भी दिखायी देते थे॥६-७॥
विंशद्भुजं दशग्रीवं दर्शनीयपरिच्छदम्।
विशालवक्षसं वीरं राजलक्षणलक्षितम्॥८॥
नद्धवैदूर्यसंकाशं तप्तकाञ्चनभूषणम्।
सुभुजं शुक्लदशनं महास्यं पर्वतोपमम्॥९॥
उसके बीस भुजाएँ और दस मस्तक थे। उसके छत्र, चँवर और आभूषण आदि उपकरण देखने ही योग्य थे। वक्षःस्थल विशाल था। वह वीर राजोचित लक्षणों से सम्पन्न दिखायी देता था। वह अपने शरीर में जो वैदूर्यमणि (नीलम) का आभूषण पहने हुए था, उसके समान ही उसके शरीर की कान्ति भी थी। उसने तपाये हुए सोने के आभूषण भी पहन रखे थे। उसकी भुजाएँ सुन्दर, दाँत सफेद, मुँह बहुत बड़ा और शरीर पर्वत के समान विशाल था॥८-९॥
विष्णुचक्रनिपातैश्च शतशो देवसंयुगे।
अन्यैः शस्त्रैः प्रहारैश्च महायुद्धेषु ताडितम्॥१०॥
देवताओं के साथ युद्ध करते समय उसके अङ्गों पर सैकड़ों बार भगवान् विष्णु के चक्र का प्रहार हुआ था। बड़े-बड़े युद्धों में अन्यान्य अस्त्र-शस्त्रों की भी उसपर ङ्केअर पड़ी थी ( उन सबके चिह्न दृष्टिगोचर होते थे)॥१०॥
अहताङ्गैः समस्तैस्तं देवप्रहरणैस्तदा।
अक्षोभ्याणां समुद्राणां क्षोभणं क्षिप्रकारिणम्॥११॥
देवताओं के समस्त आयुधों के प्रहारों से भी जो खण्डित न हो सके थे, उन्हीं अङ्गों से वह अक्षोभ्य समुद्रों में भी क्षोभ (हलचल) पैदा कर देता था। वह सभी कार्य बड़ी शीघ्रता से करता था॥११॥
क्षेप्तारं पर्वताग्राणां सुराणां च प्रमर्दनम्।
उच्छेत्तारं च धर्माणां परदाराभिमर्शनम्॥१२॥
पर्वतशिखरों को भी तोड़कर फेंक देता था,देवताओं को भी रौंद डालता था। धर्म की तो वह जड़ ही काट देता था और परायी स्त्रियों के सतीत्व का नाश करने वाला था॥१२॥
सर्वदिव्यास्त्रयोक्तारं यज्ञविघ्नकरं सदा।
पुरीं भोगवतीं गत्वा पराजित्य च वासुकिम्॥१३॥
तक्षकस्य प्रियां भार्यां पराजित्य जहार यः।
वह सब प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने वाला और सदा यज्ञों में विघ्न डालने वाला था। एक समय पाताल की भोगवती पुरी में जाकर नागराज वासुकि को परास्त करके तक्षक को भी हराकर उसकी प्यारी पत्नी को वह हर ले आया था॥१३ १/२॥
कैलासं पर्वतं गत्वा विजित्य नरवाहनम्॥१४॥
विमानं पुष्पकं तस्य कामगं वै जहार यः।
इसी तरह कैलास पर्वत पर जाकर कुबेर को युद्ध में पराजित करके उसने उनके इच्छानुसार चलने वाले पुष्पकविमान को अपने अधिकार में कर लिया॥१४ १/२॥
वनं चैत्ररथं दिव्यं नलिनी नन्दनं वनम्॥१५॥
विनाशयति यः क्रोधाद् देवोद्यानानि वीर्यवान्।
वह पराक्रमी निशाचर क्रोधपूर्वक कुबेर के दिव्य चैत्ररथ वन को, सौगन्धिक कमलों से युक्त नलिनी नामवाली पुष्करिणीको, इन्द्र के नन्दनवन को तथा देवताओं के दूसरे-दूसरे उद्यानों को नष्ट करता रहता था॥१५ १/२॥
चन्द्रसूर्यौ महाभागावुत्तिष्ठन्तौ परंतपौ॥१६॥
निवारयति बाहभ्यां यः शैलशिखरोपमः।
वह पर्वत-शिखर के समान आकार धारण करके शत्रुओं को संताप देने वाले महाभाग चन्द्रमा और सूर्य को उनके उदयकाल में अपने हाथों से रोक देता था॥१६ १/२॥
दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने॥१७॥
पुरा स्वयंभुवे धीरः शिरांस्युपजहार यः।
उस धीर स्वभाव वाले रावण ने पूर्वकाल में एक विशाल वन के भीतर दस हजार वर्षां तक घोर तपस्या करके ब्रह्माजी को अपने मस्तकों की बलि दे दी थी॥१७ १/२॥
देवदानवगन्धर्वपिशाचपतगोरगैः॥१८॥
अभयं यस्य संग्रामे मृत्युतो मानुषादृते।
उसके प्रभाव से उसे देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और साँसे भी संग्राम में अभय प्राप्त हो गया था। मनुष्य के सिवा और किसी के हाथ से उसे मृत्यु का भय नहीं था॥१८ १/२॥
मन्त्रैरभिष्टुतं पुण्यमध्वरेषु द्विजातिभिः॥१९॥
हविर्धानेषु यः सोममुपहन्ति महाबलः।
वह महाबली राक्षस सोमसवनकर्मविशिष्ट यज्ञों में द्विजातियों द्वारा वेदमन्त्रों के उच्चारणपूर्वक निकाले गये तथा वैदिक मन्त्रों से ही सुसंस्कृत एवं स्तुत हुए पवित्र सोमरस को वहाँ पहुँचकर नष्ट कर देता था। १९ १/२॥
प्राप्तयज्ञहरं दुष्टं ब्रह्मघ्नं क्रूरकारिणम्॥२०॥
कर्कशं निरनुक्रोशं प्रजानामहिते रतम्।
समाप्ति के निकट पहुँचे हुए यज्ञों का विध्वंस करने वाला वह दुष्ट निशाचर ब्राह्मणों की हत्या तथा दूसरे-दूसरे क्रूर कर्म करता था। वह बड़े ही रूखे स्वभाव का और निर्दय था। सदा प्रजाजनों के अहित में ही लगा रहता था। २० १/२॥
रावणं सर्वभूतानां सर्वलोकभयावहम्॥२१॥
राक्षसी भ्रातरं क्रूरं सा ददर्श महाबलम्।
समस्त लोकों को भय देने वाले और सम्पूर्ण प्राणियों को रुलाने वाले अपने इस महाबली क्रूर भाई को राक्षसी शूर्पणखा ने उस समय देखा॥२१ १/२॥
तं दिव्यवस्त्राभरणं दिव्यमाल्योपशोभितम्॥२२॥
आसने सूपविष्टं तं काले कालमिवोद्यतम्।
राक्षसेन्द्रं महाभागं पौलस्त्यकुलनन्दनम्॥२३॥
वह दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से विभूषित था। दिव्य पुष्पों की मालाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। सिंहासन पर बैठा हुआ राक्षसराज पुलस्त्यकुलनन्दन महाभाग दशग्रीव प्रलयकाल में संहार के लिये उद्यत हुए महाकाल के समान जान पड़ता था॥२२-२३॥
उपगम्याब्रवीद वाक्यं राक्षसी भयविह्वला।
रावणं शत्रुहन्तारं मन्त्रिभिः परिवारितम्॥२४॥
मन्त्रियों से घिरे हुए शत्रुहन्ता भाई रावण के पास जाकर भय से विह्वल हुई वह राक्षसी कुछ कहने को उद्यत हुई।॥२४॥
तमब्रवीद् दीप्तविशाललोचनं प्रदर्शयित्वा भयलोभमोहिता।
सुदारुणं वाक्यमभीतचारिणी महात्मना शूर्पणखा विरूपिता॥२५॥
महात्मा लक्ष्मण ने नाक-कान काटकर जिसे कुरूप कर दिया था तथा जो निर्भय विचरने वाली थी, वह भय और लोभ से मोहित हुई शूर्पणखा बड़े-बड़े चमकीले नेत्रों वाले अत्यन्त क्रूर रावण को अपनी दुर्दशा दिखाकर उससे बोली॥२५॥
सर्ग ३४
ततः शूर्पणखा दीना रावणं लोकरावणम्।
अमात्यमध्ये संक्रुद्धा परुषं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
उस समय शूर्पणखा श्रीराम से तिरस्कृत होने के कारण बहुत दुःखी थी। उसने मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए समस्त लोकों को रुलाने वाले रावण से अत्यन्त कुपित होकर कठोर वाणी में कहा-॥१॥
प्रमत्तः कामभोगेषु स्वैरवृत्तो निरङ्कशः।
समुत्पन्नं भयं घोरं बोद्धव्यं नावबुध्यसे॥२॥
‘राक्षसराज! तुम स्वेच्छाचारी और निरङ्कश होकर विषय-भोगों में मतवाले हो रहे हो। तुम्हारे लिये घोरभय उत्पन्न हो गया है। तुम्हें इसकी जानकारी होनी चाहिये थी, किंतु तुम इसके विषय में कुछ नहीं जानते हो॥२॥
सक्तं ग्राम्येषु भोगेषु कामवृत्तं महीपतिम्।
लुब्धं न बहु मन्यन्ते श्मशानाग्निमिव प्रजाः॥३॥
‘जो राजा निम्न श्रेणी के भोगों में आसक्त हो स्वेच्छाचारी और लोभी हो जाता है, उसे मरघट की आग के समान हेय मानकर प्रजा उसका अधिक आदर नहीं करती है॥३॥
स्वयं कार्याणि यः काले नानुतिष्ठति पार्थिवः।
स तु वै सह राज्येन तैश्च कार्यैर्विनश्यति॥४॥
‘जो राजा ठीक समय पर स्वयं ही अपने कार्यों का सम्पादन नहीं करता है, वह राज्य और उन कार्यों के साथ ही नष्ट हो जाता है॥४॥
अयुक्तचारं दुर्दर्शमस्वाधीनं नराधिपम्।
वर्जयन्ति नरा दूरान्नदीपङ्कमिव द्विपाः॥५॥
‘जो राज्य की देखभाल के लिये गुप्तचरों को नियुक्त नहीं करता है, प्रजाजनों को जिसका दर्शन दुर्लभ हो जाता है और कामिनी आदि भोगों में आसक्त होने के कारण अपनी स्वाधीनता खो बैठता है, ऐसे राजा को प्रजा दूर से ही त्याग देती है। ठीक उसी तरह, जैसे हाथी नदी की कीचड़ से दूर ही रहते हैं॥५॥
ये न रक्षन्ति विषयमस्वाधीनं नराधिपाः।
ते न वृद्ध्या प्रकाशन्ते गिरयः सागरे यथा॥६॥
जो नरेश अपने राज्य के उस प्रान्त की, जो अपनी ही असावधानी के कारण दूसरे के अधिकार में चला गया हो, रक्षा नहीं करते—उसे पुनः अपने अधिकार में नहीं लाते, वे समुद्र में डूबे हुए पर्वतों की भाँति अपने अभ्युदय से प्रकाशित नहीं होते हैं।॥६॥
आत्मवद्भिर्विगृह्य त्वं देवगन्धर्वदानवैः।
अयुक्तचारश्चपलः कथं राजा भविष्यसि॥७॥
‘जो अपने मन को काबू में रखने वाले एवं प्रयत्नशील हैं, उन देवताओं, गन्धर्वो तथा दानवों के साथ विरोध करके तुमने अपने राज्य की देखभाल के लिये गुप्तचर नहीं नियुक्त किये हैं, ऐसी दशा में तुम जैसा विषयलोलुप चपल पुरुष कैसे राजा बना रह सकेगा?॥७॥
त्वं तु बालस्वभावश्च बुद्धिहीनश्च राक्षस।
ज्ञातव्यं तन्न जानीषे कथं राजा भविष्यसि॥८॥
‘राक्षस! तुम्हारा स्वभाव बालकों-जैसा है। तुम निरे बुद्धिहीन हो। तुम्हें जानने योग्य बातों का भी ज्ञान नहीं है। ऐसी दशा में तुम किस तरह राजा बने रह सकोगे?॥८॥
येषां चाराश्च कोशश्च नयश्च जयतां वर।
अस्वाधीना नरेन्द्राणां प्राकृतैस्ते जनैः समाः॥९॥
“विजयी वीरों में श्रेष्ठ निशाचरपते! जिन नरेशों के गुप्तचर, कोष और नीति—ये सब अपने अधीन नहीं हैं, वे साधारण लोगों के ही समान हैं॥९॥
यस्मात् पश्यन्ति दूरस्थान् सर्वानर्थान् नराधिपाः।
चारेण तस्मादुच्यन्ते राजानो दीर्घचक्षुषः॥१०॥
‘गुप्तचरों की सहायता से राजालोग दूर-दूर के सारे कार्यों की देखभाल करते रहते हैं, इसीलिये वे दीर्घदर्शी या दूरदर्शी कहलाते हैं॥१०॥
अयुक्तचारं मन्ये त्वां प्राकृतैः सचिवैर्युतः।
स्वजनं च जनस्थानं निहतं नावबुध्यसे॥११॥
मैं समझती हूँ, तुम गवाँर मन्त्रियों से घिरे हुए हो, तभी तो तुमने अपने राज्य के भीतर गुप्तचर नहीं तैनात किये हैं। तुम्हारे स्वजन मारे गये और जनस्थान उजाड़ हो गया, फिर भी तुम्हें इसका पता नहीं लगा है।॥११॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
हतान्येकेन रामेण खरश्च सहदूषणः॥१२॥
ऋषीणामभयं दत्तं कृतक्षेमाश्च दण्डकाः।
धर्षितं च जनस्थानं रामेणाक्लिष्टकारिणा॥१३॥
‘अकेले राम ने, जो अनायास ही महान् कर्म करने वाले हैं, भीमकर्मा राक्षसों की चौदह हजार सेना को यमलोक पहुँचा दिया, खर और दूषण के भी प्राण ले लिये, ऋषियों को भी अभय दान कर दिया तथा दण्डकारण्य में राक्षसों की ओर से जो विघ्नबाधाएँ थीं, उन सबको दूर करके वहाँ शान्ति स्थापित कर दी। जनस्थान को तो उन्होंने चौपट ही कर डाला॥१२-१३॥
त्वं तु लुब्धः प्रमत्तश्च पराधीनश्च राक्षस।
विषये स्वे समुत्पन्नं यद् भयं नावबुध्यसे॥१४॥
‘राक्षस! तुम तो लोभ और प्रमाद में फँसकर पराधीन हो रहे हो, अतः अपने ही राज्य में उत्पन्न हुए भय का तुम्हें कुछ पता ही नहीं है॥१४॥
तीक्ष्णमल्पप्रदातारं प्रमत्तं गर्वितं शठम्।
व्यसने सर्वभूतानि नाभिधावन्ति पार्थिवम्॥१५॥
‘जो राजा कठोरतापूर्ण बर्ताव करता अथवा तीखे स्वभाव का परिचय देता है, सेवकों को बहुत कम वेतन देता है, प्रमाद में पड़ा और गर्व में भरा रहता है तथा स्वभाव से ही शठ होता है, उसके संकट में पड़ने पर सभी प्राणी उसका साथ छोड़ देते हैं उसकी सहायता के लिये आगे नहीं बढ़ते हैं॥१५॥
अतिमानिनमग्राह्यमात्मसम्भावितं नरम्।
क्रोधनं व्यसने हन्ति स्वजनोऽपि नराधिपम्॥१६॥
‘जो अत्यन्त अभिमानी, अपनाने के अयोग्य, आप ही अपने को बहुत बड़ा मानने वाला और क्रोधी होता है, ऐसे नर अथवा नरेश को संकटकाल में आत्मीय जन भी मार डालते हैं॥१६॥
नानुतिष्ठति कार्याणि भयेषु न बिभेति च।
क्षिप्रं राज्याच्च्युतो दीनस्तृणैस्तुल्यो भवेदिह॥१७॥
‘जो राजा अपने कर्तव्य का पालन अथवा करने योग्य कार्यों का सम्पादन नहीं करता तथा भय के अवसरों पर भयभीत (एवं अपनी रक्षा के लिये सावधान) नहीं होता, वह शीघ्र ही राज्य से भ्रष्ट एवं दीन होकर इस भूतल पर तिनकों के समान उपेक्षणीय हो जाता है।॥१७॥
शुष्ककाष्ठैर्भवेत् कार्यं लोष्ठैरपि च पांसुभिः।
न तु स्थानात् परिभ्रष्टैः कार्यं स्याद् वसुधाधिपैः॥१८॥
‘लोगों को सूखे काठों से, मिट्टी के ढेलों तथा धूल से भी कुछ प्रयोजन होता है, किंतु स्थानभ्रष्ट राजाओं से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं रहता॥१८॥
उपभुक्तं यथा वासः स्रजो वा मृदिता यथा।
एवं राज्यात् परिभ्रष्टः समर्थोऽपि निरर्थकः॥१९॥
‘जैसे पहना हुआ वस्त्र और मसल डाली गयी फूलों की माला दूसरों के उपयोग में आने योग्य नहीं होती, इसी प्रकार राज्य से भ्रष्ट हुआ राजा समर्थ होने पर भी दूसरों के लिये निरर्थक है॥१९॥
अप्रमत्तश्च यो राजा सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः।
कृतज्ञो धर्मशीलश्च स राजा तिष्ठते चिरम्॥२०॥
‘परंतु जो राजा सदा सावधान रहता, राज्य के समस्त कार्यों की जानकारी रखता, इन्द्रियों को वश में किये रहता, कृतज्ञ (दूसरों के उपकार को मानने वाला) तथा स्वभाव से ही धर्मपरायण होता है, वह राजा बहुत दिनों तक राज्य करता है॥२०॥
नयनाभ्यां प्रसुप्तो वा जागर्ति नयचक्षुषा।
व्यक्तक्रोधप्रसादश्च स राजा पूज्यते जनैः॥२१॥
‘जो स्थूल आँखों से तो सोता है, परंतु नीति की आँखों से सदा जागता रहता है तथा जिसके क्रोध और अनुग्रह का फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है, उसी राजा की लोग पूजा करते हैं॥२१॥
त्वं तु रावण दुर्बुद्धिर्गुणैरेतैर्विवर्जितः।
यस्य तेऽविदितश्चारै रक्षसां सुमहान् वधः॥२२॥
‘रावण! तुम्हारी बुद्धि दूषित है और तुम इन सभी राजोचित गुणों से वञ्चित हो; क्योंकि तुम्हें अबतक गुप्तचरों की सहायता से राक्षसों के इस महान् संहार का समाचार ज्ञात नहीं हो सका था॥२२॥
परावमन्ता विषयेषु सङ्गवान् न देशकालप्रविभागतत्त्ववित्।
अयुक्तबुद्धिर्गुणदोषनिश्चये विपन्नराज्यो न चिराद् विपत्स्यसे॥२३॥
‘तुम दूसरों का अनादर करने वाले, विषयासक्त और देश-काल के विभाग को यथार्थ रूप से न जानने वाले हो, तुमने गुण और दोष के विचार एवं निश्चय में कभी अपनी बुद्धि को नहीं लगाया है, अतः तुम्हारा राज्य शीघ्र हीनष्ट हो जायगा और तुम स्वयं भी भारी विपत्ति में पड़ जाओगे’॥२३॥
इति स्वदोषान् परिकीर्तितांस्तथा समीक्ष्य बुद्ध्या क्षणदाचरेश्वरः।
धनेन दर्पण बलेन चान्वितो विचिन्तयामास चिरं स रावणः॥२४॥
शूर्पणखा के द्वारा कहे गये अपने दोषों पर बुद्धिपूर्वक विचार करके धन, अभिमान और बल से सम्पन्न वह निशाचर रावण बहुत देर तक सोच विचार एवं चिन्ता में पड़ा रहा।॥२४॥
सर्ग ३४
ततः शूर्पणखां दृष्ट्वा ब्रुवन्तीं परुषं वचः।
अमात्यमध्ये संक्रुद्धः परिपप्रच्छ रावणः॥१॥
शूर्पणखा को इस प्रकार कठोर बातें कहती देख मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए रावण ने अत्यन्त कुपित होकर पूछा-॥१॥
कश्च रामः कथंवीर्यः किंरूपः किंपराक्रमः।
किमर्थं दण्डकारण्यं प्रविष्टश्च सुदुस्तरम्॥२॥
‘राम कौन है ? उसका बल कैसा है ? रूप और पराक्रम कैसे हैं? अत्यन्त दुस्तर दण्डकारण्य में उसने किस लिये प्रवेश किया है ?॥२॥
आयुधं किं च रामस्य येन ते राक्षसा हताः।
खरश्च निहतः संख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा॥३॥
‘राम के पास कौन-सा ऐसा अस्त्र है, जिससे वे सब राक्षस मारे गये तथा युद्ध में खर, दूषण और त्रिशिरा का भी संहार हो गया॥३॥
तत्त्वं ब्रूहि मनोज्ञाङ्गि केन त्वं च विरूपिता।
इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता॥४॥
‘मनोहर अङ्गों वाली शूर्पणखे! ठीक-ठीक बताओ, किसने तुम्हें कुरूप बनाया है—किसने तुम्हारी नाक और कान काट डाले हैं?’ राक्षसराज रावण के इस प्रकार पूछने पर वह राक्षसी क्रोध से अचेत-सी हो उठी॥४॥
ततो रामं यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे।
दीर्घबाहुर्विशालाक्षश्चीरकृष्णाजिनाम्बरः॥५॥
कन्दर्पसमरूपश्च रामो दशरथात्मजः।
तदनन्तर उसने श्रीराम का यथावत् परिचय देना आरम्भ किया—’भैया! श्रीरामचन्द्र राजा दशरथ के पुत्र हैं, उनकी भुजाएँ लंबी, आँखें बड़ी-बड़ी और रूप कामदेव के समान है। वे चीर और काला मृगचर्म धारण करते हैं॥५ १/२॥
शक्रचापनिभं चापं विकृष्य कनकाङ्गदम्॥६॥
दीप्तान् क्षिपति नाराचान् सर्पानिव महाविषान्।
‘श्रीराम इन्द्रधनुष के समान अपने विशाल धनुष को, जिसमें सोने के छल्ले शोभा दे रहे हैं, खींचकर उसके द्वारा महाविषैले सर्पा के समान तेजस्वी नाराचों की वर्षा करते हैं। ६ १/२॥
नाददानं शरान् घोरान् विमुञ्चन्तं महाबलम्॥७॥
न कार्मुकं विकर्षन्तं रामं पश्यामि संयुगे।
‘वे महाबली राम युद्धस्थल में कब धनुष खींचते, कब भयंकर बाण हाथ में लेते और कब उन्हें छोड़ते हैं—यह मैं नहीं देख पाती थी॥७ १/२॥
हन्यमानं तु तत्सैन्यं पश्यामि शरवृष्टिभिः॥८॥
इन्द्रेणेवोत्तमं सस्यमाहतं त्वश्मवृष्टिभिः।
‘उनके बाणों की वर्षा से राक्षसों की सेना मर रही है – इतना ही मुझे दिखायी देता था। जैसे इन्द्र (मेघ) द्वारा बरसाये गये ओलों की वृष्टि से अच्छी खेती चौपट हो जाती है, उसी प्रकार राम के बाणों से राक्षसों का विनाश हो गया॥८ १/२॥
रक्षसां भीमवीर्याणां सहस्राणि चतुर्दश॥९॥
निहतानि शरैस्तीक्ष्णैस्तेनैकेन पदातिना।
अर्धाधिकमुहूर्तेन खरश्च सहदूषणः॥१०॥
ऋषीणामभयं दत्तं कृतक्षेमाश्च दण्डकाः॥
‘श्रीराम अकेले और पैदल थे, तो भी उन्होंने डेढ़ मुहूर्त (तीन घड़ी) के भीतर ही खर और दूषणसहित चौदह हजार भयंकर बलशाली राक्षसों का तीखे बाणों से संहार कर डाला, ऋषियों को अभय दे दिया और समस्त दण्डक वन को राक्षसों की विघ्न-बाधा से रहित कर दिया॥९–११॥
एका कथंचिन्मुक्ताहं परिभूय महात्मना।
स्त्रीवधं शङ्कमानेन रामेण विदितात्मना॥१२॥
‘आत्मज्ञानी महात्मा श्रीराम ने स्त्री का वध हो जाने के भय से एकमात्र मुझे किसी तरह केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया॥१२॥
भ्राता चास्य महातेजा गुणतस्तुल्यविक्रमः।
अनुरक्तश्च भक्तश्च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥१३॥
अमर्षी दुर्जयो जेता विक्रान्तो बुद्धिमान् बली।
रामस्य दक्षिणो बाहुर्नित्यं प्राणो बहिश्चरः॥१४॥
‘उनका एक बड़ा ही तेजस्वी भाई है, जो गुण और पराक्रम में उन्हीं के समान है। उसका नाम है लक्ष्मण। वह पराक्रमी वीर अपने बड़े भाई का प्रेमी और भक्त है, उसकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण है, वह अमर्षशील, दुर्जय, विजयी तथा बल-विक्रम से सम्पन्न है। श्रीराम का वह मानो दाहिना हाथ और सदा बाहर विचरने वाला प्राण है॥१३-१४॥
रामस्य तु विशालाक्षी पूर्णेन्दुसदृशानना।
धर्मपत्नी प्रिया नित्यं भर्तुः प्रियहिते रता॥१५॥
‘श्रीराम की धर्मपत्नी भी उनके साथ है। वह पति को बहुत प्यारी है और सदा अपने स्वामी का प्रिय तथा हित करने में ही लगी रहती है। उसकी आँखें विशाल और मुख पूर्ण चन्द्र के समान मनोरम है॥१५॥
सा सुकेशी सुनासोरूः सुरूपा च यशस्विनी।
देवतेव वनस्यास्य राजते श्रीरिवापरा॥१६॥
‘उसके केश, नासिका, ऊरु तथा रूप बड़े ही सुन्दर तथा मनोहर हैं। वह यशस्विनी राजकुमारी इस दण्डक वन की देवी-सी जान पड़ती है और दूसरी लक्ष्मी के समान शोभा पाती है॥१६॥
तप्तकाञ्चनवर्णाभा रक्ततुङ्गनखी शुभा।
सीता नाम वरारोहा वैदेही तनुमध्यमा॥१७॥
‘उसका सुन्दर शरीर तपाये हुए सुवर्ण की कान्ति धारण करता है, नख ऊँचे तथा लाल हैं। वह शुभलक्षणों से सम्पन्न है। उसके सभी अङ्ग सुडौल हैं और कटिभाग सुन्दर तथा पतला है। वह विदेहराज जनक की कन्या है और सीता उसका नाम है॥१७॥
नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी।
तथारूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले॥१८॥
‘देवताओं, गन्धर्वो, यक्षों और किन्नरों की स्त्रियों में भी कोई उसके समान सुन्दरी नहीं है। इस भूतलपर वैसी रूपवती नारी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी॥१८॥
यस्य सीता भवेद् भार्या यं च हृष्टा परिष्वजेत्।
अभिजीवेत् स सर्वेषु लोकेष्वपि पुरंदरात्॥१९॥
‘सीता जिसकी भार्या हो और वह हर्ष में भरकर जिसका आलिङ्गन करे, समस्त लोकों में उसीका जीवन इन्द्र से भी अधिक भाग्यशाली है॥१९॥
सा सुशीला वपुःश्लाघ्या रूपेणाप्रतिमा भुवि।
तवानुरूपा भार्या सा त्वं च तस्याः पतिर्वरः॥२०॥
“उसका शील-स्वभाव बड़ा ही उत्तम है। उसका एक-एक अङ्ग स्तुत्य एवं स्पृहणीय है। उसके रूप की समानता करने वाली भूमण्डल में दूसरी कोई स्त्री नहीं है। वह तुम्हारे योग्य भार्या होगी और तुम भी उसके योग्य श्रेष्ठ पति होओगे॥२०॥
तां तु विस्तीर्णजघनां पीनोत्तुङ्गपयोधराम्।
भार्यार्थे तु तवानेतुमुद्यताहं वराननाम्॥२१॥
विरूपितास्मि क्रूरेण लक्ष्मणेन महाभुज।
‘महाबाहो! विस्तृत जघन और उठे हुए पुष्ट कुचों वाली उस सुमुखी स्त्री को जब मैं तुम्हारी भार्या बनाने के लिये ले आने को उद्यत हुई, तब क्रूर लक्ष्मण ने मुझे इस तरह कुरूप कर दिया॥२१ १/२॥
तां तु दृष्ट्वाद्य वैदेहीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम्॥२२॥
मन्मथस्य शराणां च त्वं विधेयो भविष्यसि।
‘पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली विदेहराजकुमारी सीता को देखते ही तुम कामदेव के बाणों के लक्ष्य बन जाओगे॥२२ १/२॥
यदि तस्यामभिप्रायो भार्यात्वे तव जायते।
शीघ्रमुद्धियतां पादो जयार्थमिह दक्षिणः॥२३॥
‘यदि तम्हें सीता को अपनी भार्या बनाने की इच्छा हो तो शीघ्र ही श्रीराम को जीतने के लिये यहाँ अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाओ॥२३॥
रोचते यदि ते वाक्यं ममैतद् राक्षसेश्वर।
क्रियतां निर्विशङ्केन वचनं मम रावण॥२४॥
‘राक्षसराज रावण! यदि तुम्हें मेरी यह बात पसंद हो तो निःशङ्क होकर मेरे कथनानुसार कार्य करो॥२४॥
विज्ञायैषामशक्तिं च क्रियतां च महाबल।
सीता तवानवद्याङ्गी भार्यात्वे राक्षसेश्वर॥२५॥
‘महाबली राक्षसेश्वर! इन राम आदि की असमर्थता और अपनी शक्ति का विचार करके सर्वाङ्गसुन्दरी सीता को अपनी भार्या बनाने का प्रयत्न करो (उसे हर लाओ)॥२५॥
निशम्य रामेण शरैरजिह्मगैर्हताञ्जनस्थानगतान् निशाचरान्।
खरं च दृष्ट्वा निहतं च दूषणं त्वमद्य कृत्यं प्रतिपत्तुमर्हसि॥२६॥
‘श्रीराम ने अपने सीधे जाने वाले बाणों द्वारा जनस्थाननिवासी निशाचरों को मार डाला और खर तथा दूषण को भी मौत के घाट उतार दिया, यह सब सुनकर और देखकर अब तुम्हारा क्या कर्तव्य है, इसका निश्चय तुम्हें कर लेना चाहिये’॥२६॥
सर्ग ३५
ततः शूर्पणखावाक्यं तच्छ्रुत्वा रोमहर्षणम्।
सचिवानभ्यनुज्ञाय कार्यं बुद्ध्वा जगाम ह॥१॥
शूर्पणखा की ये रोंगटे खड़ी कर देने वाली बातें सुनकर रावण मन्त्रियों से सलाह ले अपने कर्तव्य का निश्चय करके वहाँ से चल दिया॥१॥
तत् कार्यमनुगम्यान्तर्यथावदुपलभ्य च।
दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम्॥२॥
इति कर्तव्यमित्येव कृत्वा निश्चयमात्मनः।
स्थिरबुद्धिस्ततो रम्यां यानशालां जगाम ह॥३॥
उसने पहले सीताहरणरूपी कार्य पर मन-ही-मन विचार किया। फिर उसके दोषों और गुणों का यथावत् ज्ञान प्राप्त करके बलाबल का निश्चय किया। अन्त में यह स्थिर किया कि इस काम को करना ही चाहिये। जब इस बात पर उसकी बुद्धि जम गयी, तब वह रमणीय रथशाला में गया॥२-३॥
यानशालां ततो गत्वा प्रच्छन्नं राक्षसाधिपः।
सूतं संचोदयामास रथः संयुज्यतामिति॥४॥
गुप्त रूप से रथशाला में जाकर राक्षसराज रावण ने अपने सारथि को यह आज्ञा दी कि ‘मेरा रथ जोतकर तैयार करो’॥४॥
एवमुक्तः क्षणेनैव सारथिर्लघुविक्रमः।
रथं संयोजयामास तस्याभिमतमुत्तमम्॥५॥
सारथि शीघ्रतापूर्वक कार्य करने में कुशल था। रावण की उपर्युक्त आज्ञा पाकर उसने एक ही क्षण में उसके मन के अनुकूल उत्तम रथ जोतकर तैयार कर दिया॥५॥
कामगं रथमास्थाय काञ्चनं रत्नभूषितम्।
पिशाचवदनैर्युक्तं खरैः कनकभूषणैः॥६॥
वह रथ इच्छानुसार चलने वाला तथा सुवर्णमय था। उसे रत्नों से विभूषित किया गया था। उसमें सोने के साज-बाजों से सजे हुए गधे जुते थे, जिनका मुख पिशाचों के समान था। रावण उस पर आरूढ़ होकर चला॥६॥
मेघप्रतिमनादेन स तेन धनदानुजः।
राक्षसाधिपतिः श्रीमान् ययौ नदनदीपतिम्॥७॥
वह रथ मेघ-गर्जना के समान गम्भीर घर-घर ध्वनि फैलाता हुआ चलता था। उसके द्वारा वह कुबेर का छोटा भाई श्रीमान् राक्षसराज रावण समुद्र के तट पर गया॥७॥
स श्वेतवालव्यजनः श्वेतच्छत्रो दशाननः।
स्निग्धवैदूर्यसंकाशस्तप्तकाञ्चनभूषणः॥८॥
दशग्रीवो विंशतिभुजो दर्शनीयपरिच्छदः।
त्रिदशारिर्मुनीन्द्रघ्नो दशशीर्ष इवाद्रिराट्॥९॥
उस समय उसके लिये सफेद चँवर से हवा की जा रही थी। सिर के ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था। उसकी अङ्गकान्ति स्निग्ध वैदूर्यमणि के समान नीली या काली थी। वह पक्के सोने के आभूषणों से विभूषित था। उसके दस मुख, दस कण्ठ और बीस भुजाएँ थीं। उसके वस्त्राभूषण आदि अन्य उपकरण भी देखने ही योग्य थे। देवताओं का शत्रु और मुनीश्वरों का हत्यारा वह निशाचर दस शिखरों वाले पर्वतराज के समान प्रतीत होता था॥८-९॥
कामगं रथमास्थाय शुशुभे राक्षसाधिपः।
विद्युन्मण्डलवान् मेघः सबलाक इवाम्बरे॥१०॥
इच्छानुसार चलने वाले उस रथ पर आरूढ़ हो राक्षसराज रावण आकाश में विद्युन्मण्डल से घिरे हुए तथा वकपंक्तियों से सुशोभित मेघ के समान शोभा पा रहा था॥१०॥
सशैलसागरानूपं वीर्यवानवलोकयन्।
नानापुष्पफलैर्वृक्षैरनुकीर्णं सहस्रशः॥११॥
शीतमङ्गलतोयाभिः पद्मिनीभिः समन्ततः।
विशालैराश्रमपदैर्वेदिमद्भिरलंकृतम्॥१२॥
पराक्रमी रावण पर्वतयुक्त समुद्र के तट पर पहुँचकर उसकी शोभा देखने लगा। सागर का वह किनारा नाना प्रकार के फल-फूलवाले सहस्रों वृक्षों से व्याप्त था। चारों ओर मङ्गलकारी शीतल जल से भरी हुई पुष्करिणियाँ और वेदिकाओं से मण्डित विशाल आश्रम उस सिन्धुतट की शोभा बढ़ा रहे थे॥११-१२॥
कदल्यटविसंशोभं नारिकेलोपशोभितम्।
सालैस्तालैस्तमालैश्च तरुभिश्च सुपुष्पितैः॥१३॥
कहीं कदलीवन और कहीं नारियल के कुञ्ज शोभा दे रहे थे। साल, ताल, तमाल तथा सुन्दर फूलों से भरे हुए दूसरे-दूसरे वृक्ष उस तटप्रान्त को अलंकृत कर रहे थे॥
अत्यन्तनियताहारैः शोभितं परमर्षिभिः।
नागैः सुपर्णैर्गन्धर्वैः किंनरैश्च सहस्रशः॥१४॥
अत्यन्त नियमित आहार करने वाले बड़े-बड़े महर्षियों, नागों, सुपर्णों (गरुड़ों), गन्धर्वो तथा सहस्रों किन्नरों से भी उस स्थान की बड़ी शोभा हो रही थी॥१४॥
जितकामैश्च सिद्धैश्च चारणैश्चोपशोभितम्।
आजैर्वैखानसैर्माषैर्वालखिल्यैर्मरीचिपैः॥१५॥
कामविजयी सिद्धों, चारणों, ब्रह्माजी के पुत्रों, वानप्रस्थों, माष गोत्र में उत्पन्न मुनियों, बालखिल्य महात्माओं तथा केवल सूर्य-किरणों का पान करने वाले तपस्वीजनों से भी वह सागर का तटप्रान्त सुशोभित हो रहा था। १५॥
दिव्याभरणमाल्याभिर्दिव्यरूपाभिरावृतम्।
क्रीडारतविधिज्ञाभिरप्सरोभिः सहस्रशः॥१६॥
सेवितं देवपत्नीभिः श्रीमतीभिरुपासितम्।
देवदानवसङ्घश्च चरितं त्वमृताशिभिः॥१७॥
दिव्य आभूषणों और पुष्पमालाओं को धारण करने वाली तथा क्रीड़ा-विहार की विधि को जानने वाली सहस्रों दिव्यरूपिणी अप्सराएँ वहाँ सब ओर विचर रही थीं। कितनी ही शोभाशालिनी देवाङ्गनाएँ उस सिन्धुतट का सेवन करती हुई आस-पास बैठी थीं। देवताओं और दानवों के समूह तथा अमृतभोजी देवगण वहाँ विचर रहे थे॥१६-१७॥
हंसक्रौञ्चप्लवाकीर्णं सारसैः सम्प्रसादितम्।
वैदूर्यप्रस्तरं स्निग्धं सान्द्रं सागरतेजसा॥१८॥
सिन्धु का वह तट समुद्र के तेज से उसकी तरङ्गमालाओं के स्पर्श से स्निग्ध एवं शीतल था। वहाँ हंस, क्रौञ्च तथा मेढक सब ओर फैले हुए थे और सारस उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस तट पर वैदर्यमणि के सदृश श्याम रंग के प्रस्तर दिखायी देते थे॥१८॥
पाण्डुराणि विशालानि दिव्यमाल्ययुतानि च।
तूर्यगीताभिजुष्टानि विमानानि समन्ततः॥१९॥
तपसा जितलोकानां कामगान्यभिसम्पतन्।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव ददर्श धनदानुजः॥२०॥
आकाशमार्ग से यात्रा करते हुए कुबेर के छोटे भाई रावण ने रास्ते में सब ओर बहुत-से श्वेत वर्ण के विमानों, गन्धर्वो तथा अप्सराओं को भी देखा। वे इच्छानुसार चलने वाले विशाल विमान उन पुण्यात्मा पुरुषों के थे, जिन्होंने तपस्या से पुण्यलोकों पर विजय पायी थी। उन विमानों को दिव्य पुष्पों से सजाया गयाथा और उनके भीतर से गीत-वाद्य की ध्वनि प्रकट हो रही थी। १९-२०॥
निर्यासरसमूलानां चन्दनानां सहस्रशः।
वनानि पश्यन् सौम्यानि घ्राणतृप्तिकराणि च॥२१॥
आगे बढ़ने पर उसने, जिनकी जड़ों से गोंद निकले हुए थे, ऐसे चन्दनों के सहस्रों वन देखे, जो बड़े ही सुहावने और अपनी सुगन्ध से नासिका को तृप्त करने वाले थे॥२१॥
अगुरूणां च मुख्यानां वनान्युपवनानि च।
तक्कोलानां च जात्यानां फलिनां च सुगन्धिनाम्॥२२॥
पुष्पाणि च तमालस्य गुल्मानि मरिचस्य च।
मुक्तानां च समूहानि शुष्यमाणानि तीरतः॥२३॥
शैलानि प्रवरांश्चैव प्रवालनिचयांस्तथा।
काञ्चनानि च शृङ्गाणि राजतानि तथैव च॥२४॥
प्रस्रवाणि मनोज्ञानि प्रसन्नान्यद्भुतानि च।
धनधान्योपपन्नानि स्त्रीरत्नैरावृतानि च॥२५॥
हस्त्यश्वरथगाढानि नगराणि विलोकयन्।
कहीं श्रेष्ठ अगुरु के वन थे, कहीं उत्तम जाति के सुगन्धित फल वाले तक्कोलों (वृक्ष विशेषों) के उपवन थे। कहीं तमाल के फूल खिले हुए थे। कहीं गोल मिर्च की झाड़ियाँ शोभा पाती थीं और कहीं समुद्र के तट पर ढेर-के-ढेर मोती सूख रहे थे। कहीं श्रेष्ठ पर्वतमालाएँ, कहीं मूगों की राशियाँ, कहीं सोनेचाँदी के शिखर तथा कहीं सुन्दर, अद्भुत और स्वच्छ पानी के झरने दिखायी देते थे। कहीं धन-धान्य से सम्पन्न, स्त्री-रत्नों से भरे हुए तथा हाथी, घोड़े और रथों से व्याप्त नगर दृष्टिगोचर होते थे। इन सबको देखता हुआ रावण आगे बढ़ा॥२२–२५ १/२॥
तं समं सर्वतः स्निग्धं मृदुसंस्पर्शमारुतम्॥२६॥
अनूपे सिन्धुराजस्य ददर्श त्रिदिवोपमम्।
फिर उसने सिंधुराज के तट पर एक ऐसा स्थान देखा, जो स्वर्ग के समान मनोहर, सब ओर से समतलऔर स्निग्ध था। वहाँ मन्द-मन्द वायु चलती थी, जिसका स्पर्श बड़ा कोमल जान पड़ता था॥२६ १/२॥
तत्रापश्यत् स मेघाभं न्यग्रोधं मुनिभिर्वृतम्॥२७॥
समन्ताद् यस्य ताः शाखाः शतयोजनमायताः।
वहाँ सागर तट पर एक बरगद का वृक्ष दिखायी दिया, जो अपनी घनी छाया के कारण मेघों की घटा के समान प्रतीत होता था। उसके नीचे चारों ओर मुनि निवास करते थे। उस वृक्ष की सुप्रसिद्ध शाखाएँ चारों ओर सौ योजनों तक फैली हुई थीं॥२७ १/२॥
यस्य हस्तिनमादाय महाकायं च कच्छपम्॥२८॥
भक्षार्थं गरुडः शाखामाजगाम महाबलः।
यह वही वृक्ष था, जिसकी शाखा पर किसी समय महाबली गरुड़ एक विशालकाय हाथी और कछुए को लेकर उन्हें खाने के लिये आ बैठे थे॥२८ १/२॥
तस्य तां सहसा शाखां भारेण पतगोत्तमः॥२९॥
सुपर्णः पर्णबहुलां बभञ्जाथ महाबलः।
पक्षियों में श्रेष्ठ महाबली गरुड़ ने बहुसंख्यक पत्तों से भरी हुई उस शाखा को सहसा अपने भार से तोड़ डाला था॥२९ १/२॥
तत्र वैखानसा माषा वालखिल्या मरीचिपाः॥३०॥
आजा बभूवुधूम्राश्च संगताः परमर्षयः।
उस शाखा के नीचे बहुत-से वैखानस, माष, बालखिल्य, मरीचिप (सूर्य-किरणों का पान करने वाले), ब्रह्मपुत्र और धूम्रप संज्ञा वाले महर्षि एक साथ रहते थे॥३० १/२॥
तेषां दयार्थं गरुडस्तां शाखां शतयोजनाम्॥३१॥
भग्नामादाय वेगेन तौ चोभौ गजकच्छपौ।
एकपादेन धर्मात्मा भक्षयित्वा तदामिषम्॥३२॥
निषादविषयं हत्वा शाखया पतगोत्तमः।
प्रहर्षमतुलं लेभे मोक्षयित्वा महामुनीन्॥३३॥
उन पर दया करके उनके जीवन की रक्षा करने के लिये पक्षियों में श्रेष्ठ धर्मात्मा गरुड़ ने उस टूटी हुई सौयोजन लंबी शाखा को और उन दोनों हाथी तथा कछुए को भी वेगपूर्वक एक ही पंजे से पकड़ लिया तथा आकाश में ही उन दोनों जंतुओं के मांस खाकर फेंकी हुई उस डाली के द्वारा निषाद देश का संहार कर डाला। उस समय पूर्वोक्त महामुनियों को मृत्यु के संकट से बचा लेने से गरुड़ को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥३१-३३॥
स तु तेन प्रहर्षेण द्विगुणीकृतविक्रमः।
अमृतानयनार्थं वै चकार मतिमान् मतिम्॥३४॥
उस महान् हर्ष से बुद्धिमान् गरुड़ का पराक्रम दूना हो गया और उन्होंने अमृत ले आने के लिये पक्का निश्चय कर लिया॥३४॥
अयोजालानि निर्मथ्य भित्त्वा रत्नगृहं वरम्।
महेन्द्रभवनाद् गुप्तमाजहारामृतं ततः॥३५॥
तत्पश्चात् इन्द्रलोक में जाकर उन्होंने इन्द्रभवन की उन जालियों को तोड़ डाला, जो लोहे की सींकचों से बनी हुई थीं। फिर रत्ननिर्मित श्रेष्ठ भवन को नष्ट-भ्रष्ट करके वहाँ छिपाकर रखे हुए अमृत को वे महेन्द्रभवन से हर लाये॥३५॥
तं महर्षिगणैर्जुष्टं सुपर्णकृतलक्षणम्।
नाम्ना सुभद्रं न्यग्रोधं ददर्श धनदानुजः॥३६॥
गरुड़ के द्वारा तोड़ी हुई डाली का वह चिह्न उस बरगद में उस समय भी मौजूद था। उस वृक्ष का नाम था सुभद्रवट। बहुत-से महर्षि उस वृक्ष की छाया में निवास करते थे। कुबेर के छोटे भाई रावण ने उस वटवृक्ष को देखा॥३६॥
तं तु गत्वा परं पारं समुद्रस्य नदीपतेः।
ददर्शाश्रममेकान्ते पुण्ये रम्ये वनान्तरे॥३७॥
नदियों के स्वामी समुद्र के दूसरे तट पर जाकर उसने एक रमणीय वन के भीतर पवित्र एवं एकान्त स्थान में एक आश्रम का दर्शन किया॥३७॥
तत्र कृष्णाजिनधरं जटामण्डलधारिणम्।
ददर्श नियताहारं मारीचं नाम राक्षसम्॥३८॥
वहाँ शरीर में काला मृगचर्म और सिर पर जटाओं का समूह धारण किये नियमित आहार करते हुए मारीच नामक राक्षस निवास करता था। रावण वहाँ जाकर उससे मिला॥३८॥
स रावणः समागम्य विधिवत् तेन रक्षसा।
मारीचेनार्चितो राजा सर्वकामैरमानुषैः॥३९॥
मिलने पर उस राक्षस मारीच ने सब प्रकार के अलौकिक कमनीय पदार्थ अर्पित करके राजा रावण का विधिपूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया॥३९॥
तं स्वयं पूजयित्वा च भोजनेनोदकेन च।
अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत्॥४०॥
अन्न और जल से स्वयं उसका पूर्ण सत्कार करके मारीच ने प्रयोजन की बातें पूछते हुए उससे इस प्रकार कहा-॥४०॥
कच्चित्ते कुशलं राजन् लङ्कायां राक्षसेश्वर।
केनार्थेन पुनस्त्वं वै तूर्णमेव इहागतः॥४१॥
‘राजन् ! तुम्हारी लङ्का में कुशल तो है ? राक्षसराज! तुम किस काम के लिये पुनः इतनी जल्दी यहाँ आये हो?॥४१॥
एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावणः।
ततः पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविदः॥४२॥
मारीच के इस प्रकार पूछने पर बातचीत करने में कुशल महातेजस्वी रावण ने उससे इस प्रकार कहा॥४२॥
सर्ग ३६
मारीच श्रूयतां तात वचनं मम भाषतः।
आर्तोऽस्मि मम चार्तस्य भवान् हि परमा गतिः॥१॥
‘तात मारीच! मैं सब बता रहा हूँ। मेरी बात सुनो। इस समय मैं बहुत दुःखी हूँ और इस दुःख की अवस्था में तुम्हीं मुझे सबसे बढ़कर सहारा देने वाले हो॥१॥
जानीषे त्वं जनस्थानं भ्राता यत्र खरो मम।
दूषणश्च महाबाहुः स्वसा शूर्पणखा च मे॥२॥
त्रिशिराश्च महाबाहू राक्षसः पिशिताशनः।
अन्ये च बहवः शूरा लब्धलक्षा निशाचराः॥३॥
‘तुम जनस्थान को जानते हो, जहाँ मेरा भाई खर, महाबाहु दूषण, मेरी बहिन शूर्पणखा, मांसभोजी राक्षस महाबाहु त्रिशिरा तथा और भी बहुत-से लक्ष्यवेध में कुशल शूरवीर निशाचर रहा करते थे। २-३॥
वसन्ति मन्नियोगेन अधिवासं च राक्षसाः।
बाधमाना महारण्ये मुनीन् ये धर्मचारिणः॥४॥
‘वे सभी राक्षस मेरी आज्ञा से वहाँ घर बनाकर रहते थे और उस विशाल वन में जो धर्माचरण करने वाले मुनि थे, उन्हें सताया करते थे॥४॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
शूराणां लब्धलक्षाणां खरचित्तानुवर्तिनाम्॥५॥
‘वहाँ खर के मन का अनुसरण करने वाले तथा युद्धविषयक उत्साह से सम्पन्न चौदह हजार शूरवीर राक्षस रहते थे, जो भयंकर कर्म करने वाले थे॥५॥
ते त्विदानीं जनस्थाने वसमाना महाबलाः।
सङ्गताः परमायत्ता रामेण सह संयुगे॥६॥
‘जनस्थान में निवास करने वाले जितने महाबली राक्षस थे, वे सब-के-सब उस समय अच्छी तरह सन्नद्ध होकर युद्धक्षेत्र में राम के साथ जा भिड़े थे। ६॥
नानाशस्त्रप्रहरणाः खरप्रमुखराक्षसाः।
तेन संजातरोषेण रामेण रणमूर्धनि॥७॥
अनुक्त्वा परुषं किंचिच्छरैर्व्यापारितं धनुः।
‘वे खर आदि राक्षस नाना प्रकार के अस्त्रशस्त्रों का प्रहार करने में कुशल थे, परंतु युद्ध के मुहाने पर रोष में भरे हुए श्रीराम ने अपने मुँह से कोई कड़वी बात न कहकर बाणों के साथ धनुष का ही व्यापार आरम्भ किया॥७ १/२॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसामुग्रतेजसाम्॥८॥
निहतानि शरैर्दीप्तैर्मानुषेण पदातिना।
खरश्च निहतः संख्ये दूषणश्च निपातितः॥९॥
हत्वा त्रिशिरसं चापि निर्भया दण्डकाः कृताः।
‘पैदल और मनुष्य होकर भी राम ने अपने दमकते हुए बाणों से भयंकर तेजवाले चौदह हजार राक्षसों का विनाश कर डाला और उसी युद्ध में खर को भी मौत के घाट उतारकर दूषण को भी मार गिराया। साथ ही त्रिशिरा का वध करके उसने दण्डकारण्य को दूसरों के लिये निर्भय बना दिया॥८-९ १/२॥
पित्रा निरस्तः क्रुद्धेन सभार्यः क्षीणजीवितः॥१०॥
स हन्ता तस्य सैन्यस्य रामः क्षत्रियपांसनः।
‘उसके पिता ने कुपित होकर उसे पत्नीसहित घर से निकाल दिया है। उसका जीवन क्षीण हो चला है। यह क्षत्रियकुल-कलङ्क राम ही उस राक्षस-सेना का घातक है॥१० १/२॥
अशीलः कर्कशस्तीक्ष्णो मूर्यो लुब्धोऽजितेन्द्रियः॥११॥
त्यक्तधर्मा त्वधर्मात्मा भूतानामहिते रतः।
येन वैरं विनारण्ये सत्त्वमास्थाय केवलम्॥१२॥
कर्णनासापहारेण भगिनी मे विरूपिता।
अस्य भार्यां जनस्थानात् सीतां सुरसुतोपमाम्॥१३॥
ङ्केआनयिष्यामि विक्रम्य सहायस्तत्र में भी ‘वह शीलरहित, क्रूर, तीखे स्वभाव वाला, मूर्ख, लोभी, अजितेन्द्रिय, धर्मत्यागी, अधर्मात्मा और समस्त प्राणियों के अहित में तत्पर रहने वाला है। जिसने बिना किसी वैर-विरोध के केवल बल का आश्रय ले मेरी बहिन के नाक-कान काटकर उसका रूप बिगाड़ दिया, उससे बदला लेने के लिये मैं भी उसकी देवकन्या के समान सुन्दरी पत्नी सीता को जनस्थान से बलपूर्वक हर लाऊँगा। तुम उस कार्य में मेरी सहायता करो॥११–१३ १/२॥
त्वया ह्यहं सहायेन पावस्थेन महाबल॥१४॥
भ्रातृभिश्च सुरान् सर्वान् नाहमत्राभिचिन्तये।
तत्सहायो भव त्वं मे समर्थो ह्यसि राक्षस॥१५॥
‘महाबली राक्षस! तुम-जैसे पार्श्ववर्ती सहायक के और अपने भाइयों के बलपर ही मैं समस्त देवताओं की यहाँ कोई परवा नहीं करता, अतः तुम मेरे सहायक हो जाओ; क्योंकि तुम मेरी सहायता करने में समर्थ हो॥१५ १/२॥
वीर्ये युद्धे च दर्प च न ह्यस्ति सदृशस्तव।
उपायतो महान् शूरो महामायाविशारदः॥१६॥
‘पराक्रम में, युद्ध में और वीरोचित अभिमान में तुम्हारे समान कोई नहीं है। नाना प्रकार के उपाय बताने में भी तुम बड़े बहादुर हो। बड़ी-बड़ी मायाओं का प्रयोग करने में भी विशेष कुशल हो॥१६॥
एतदर्थमहं प्राप्तस्त्वत्समीपं निशाचर।
शृणु तत् कर्म साहाय्ये यत् कार्यं वचनान्मम॥१७॥
‘निशाचर! इसीलिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ। सहायता के लिये मेरे कथनानुसार तुम्हें कौन-सा काम करना है, वह भी सुनो॥१७॥
सौवर्णस्त्वं मृगो भूत्वा चित्रो रजतबिन्दुभिः।
आश्रमे तस्य रामस्य सीतायाः प्रमुखे चर॥१८॥
‘तुम सोने के बने हुए मृग-जैसा रूप धारण करके रजतमय बिन्दुओं से युक्त चितकबरे हो जाओ और राम के आश्रम में सीता के सामने विचरो॥१८॥
त्वां तु निःसंशयं सीता दृष्ट्वा तु मृगरूपिणम्।
गृह्यतामिति भर्तारं लक्ष्मणं चाभिधास्यति॥१९॥
‘विचित्र मृग के रूप में तुम्हें देखकर सीता अवश्य ही अपने पति राम से तथा लक्ष्मण से भी कहेगी कि आपलोग इसे पकड़ लावें॥१९॥
ततस्तयोरपाये तु शून्ये सीतां यथासुखम्।
निराबाधो हरिष्यामि राहुश्चन्द्रप्रभामिव॥२०॥
‘जब वे दोनों तुम्हें पकड़ने के लिये दूर निकल जायँगे, तब मैं बिना किसी विघ्न-बाधा के सूने आश्रम से सीता को उसी तरह सुखपूर्वक हर लाऊँगा, जैसे राहु चन्द्रमा की प्रभा का अपहरण कर लेता है। २०॥
ततः पश्चात् सुखं रामे भार्याहरणकर्शिते।
विश्रब्धं प्रहरिष्यामि कृतार्थेनान्तरात्मना॥२१॥
“उसके बाद स्त्री का अपहरण हो जाने से जब राम अत्यन्त दुःखी और दुर्बल हो जायगा, उस समय मैं निर्भय हो सुखपूर्वक उसके ऊपर कृतार्थचित्त से प्रहार करूँगा’॥२१॥
तस्य रामकथां श्रुत्वा मारीचस्य महात्मनः।
शुष्कं समभवद् वक्त्रं परित्रस्तो बभूव च॥२२॥
रावण के मुख से श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा सुनकर महात्मा मारीच का मुँह सूख गया। वह भय से थर्रा उठा॥२२॥
ओष्ठौ परिलिहन् शुष्कौ नेत्रैरनिमिषैरिव।
मृतभूत इवार्तस्तु रावणं समुदैक्षत॥२३॥
वह अपलक नेत्रों से देखता हुआ अपने सूखे ओठों को चाटने लगा। उसे इतना दुःख हुआ कि वह मुर्दा-सा दिखायी देने लगा। उसी अवस्था में उसने रावण की ओर देखा॥२३॥
स रावणं त्रस्तविषण्णचेता महावने रामपराक्रमज्ञः।
कृताञ्जलिस्तत्त्वमुवाच वाक्यं हितं च तस्मै हितमात्मनश्च॥२४॥
उसे महान् वन में श्रीरामचन्द्रजी के पराक्रम का ज्ञान हो चुका था; इसलिये वह मन-ही-मन अत्यन्त भयभीत और दुःखी हो गया तथा हाथ जोड़कर रावण से यथार्थ वचन बोला। उसकी वह बात रावण के तथा अपने लिये भी हितकर थी॥२४॥
सर्ग ३७
तच्छ्रत्वा राक्षसेन्द्रस्य वाक्यं वाक्यविशारदः।
प्रत्युवाच महातेजा मारीचो राक्षसेश्वरम्॥१॥
राक्षसराज रावण की पूर्वोक्त बात सुनकर बातचीत करने में कुशल महातेजस्वी मारीच ने उसे इस प्रकार उत्तर दिया-॥१॥
सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥२॥
‘राजन् ! सदा प्रिय वचन बोलने वाले पुरुष तो सर्वत्र सुलभ होते हैं; परंतु जो अप्रिय होने पर भी हितकर हो, ऐसी बात के कहने और सुनने वाले दोनों ही दुर्लभ हैं॥२॥
न नूनं बुध्यसे रामं महावीर्यगुणोन्नतम्।
अयुक्तचारश्चपलो महेन्द्रवरुणोपमम्॥३॥
‘तुम कोई गुप्तचर तो रखते नहीं और तुम्हारा हृदय भी बहुत ही चञ्चल है; अतः निश्चय ही तुम श्रीरामचन्द्रजी को बिलकुल नहीं जानते। वे पराक्रमोचित गुणों में बहुत बढ़े-चढ़े तथा इन्द्र और वरुण के समान हैं॥३॥
अपि स्वस्ति भवेत् तात सर्वेषामपि रक्षसाम्।
अपि रामो न संक्रुद्धः कुर्याल्लोकानराक्षसान्॥४॥
‘तात! मैं तो यही चाहता हूँ कि समस्त राक्षसों का कल्याण हो। कहीं ऐसा न हो कि श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त कुपित हो समस्त लोकों को राक्षसों से शून्य कर दें?॥४॥
अपि ते जीवितान्ताय नोत्पन्ना जनकात्मजा।
अपि सीतानिमित्तं च न भवेद् व्यसनं महत्॥५॥
‘जनकनन्दिनी सीता तुम्हारे जीवन का अन्त करने के लिये तो नहीं उत्पन्न हुई है ? कहीं ऐसा न हो कि सीता के कारण तुम्हारे ऊपर कोई बहुत बड़ा सङ्कट आ जाय?॥५॥
अपि त्वामीश्वरं प्राप्य कामवृत्तं निरङ्कशम्।
न विनश्येत् पुरी लङ्का त्वया सह सराक्षसा॥६॥
‘तुम-जैसे स्वेच्छाचारी और उच्छृङ्खल राजा को पाकर लङ्कापुरी तुम्हारे और राक्षसों के साथ ही नष्ट न हो जाय?॥६॥
त्वद्विधः कामवृत्तो हि दुःशीलः पापमन्त्रितः।
आत्मानं स्वजनं राष्ट्र स राजा हन्ति दुर्मतिः॥७॥
‘जो राजा तुम्हारे समान दुराचारी, स्वेच्छाचारी, पापपूर्ण विचार रखने वाला और खोटी बुद्धिवाला होता है, वह अपना, अपने स्वजनों का तथा समूचे राष्ट्र का भी विनाश कर डालता है॥७॥
न च पित्रा परित्यक्तो नामर्यादः कथंचन।
न लुब्धो न च दुःशीलो न च क्षत्रियपांसनः॥८॥
‘श्रीरामचन्द्रजी न तो पिता द्वारा त्यागे या निकाले गये हैं, न उन्होंने धर्म की मर्यादा का किसी तरह त्याग किया है, न वे लोभी, न दूषित आचार-विचार वाले और न क्षत्रियकुल-कलङ्क ही हैं॥८॥
न च धर्मगुणहीनः कौसल्यानन्दवर्धनः।
न च तीक्ष्णो हि भूतानां सर्वभूतहिते रतः॥९॥
‘कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले श्रीराम धर्मसम्बन्धी गुणों से हीन नहीं हुए हैं। उनका स्वभावभी किसी प्राणी के प्रति तीखा नहीं है। वे सदा समस्त प्राणियों के हित में ही तत्पर रहते हैं॥९॥
वञ्चितं पितरं दृष्ट्वा कैकेय्या सत्यवादिनम्।
करिष्यामीति धर्मात्मा ततः प्रव्रजितो वनम्॥१०॥
‘रानी कैकेयी ने पिता को धोखे में डालकर मेरे वनवास का वर माँग लिया—यह देखकर धर्मात्मा श्रीराम ने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि मैं पिता को सत्यवादी बनाऊँगा (उनके दिये हुए वर या वचन को पूरा करूँगा); इस निश्चय के अनुसार वे स्वयं ही वन को चल दिये॥१०॥
कैकेय्याः प्रियकामार्थं पितुर्दशरथस्य च।
हित्वा राज्यं च भोगांश्च प्रविष्टो दण्डकावनम्॥११॥
‘माता कैकेयी और पिता राजा दशरथ का प्रिय करने की इच्छा से ही वे स्वयं राज्य और भोगों का परित्याग करके दण्डक वन में प्रविष्ट हुए हैं॥११॥
न रामः कर्कशस्तात नाविद्वान् नाजितेन्द्रियः।
अनृतं न श्रुतं चैव नैव त्वं वक्तुमर्हसि॥१२॥
‘तात! श्रीराम कर नहीं हैं। वे मुर्ख और अजितेन्द्रिय भी नहीं हैं। श्रीराम में मिथ्याभाषण का दोष मैंने कभी नहीं सुना है; अतः उनके विषय में तुम्हें ऐसी उलटी बातें कभी नहीं कहनी चाहिये। १२॥
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामिव वासवः॥१३॥
‘श्रीराम धर्म के मूर्तिमान् स्वरूप हैं। वे साधु और सत्यपराक्रमी हैं। जैसे इन्द्र समस्त देवताओं के अधिपति हैं, उसी प्रकार श्रीराम भी सम्पूर्ण जगत् के राजा हैं॥१३॥
कथं नु तस्य वैदेहीं रक्षितां स्वेन तेजसा।
इच्छसे प्रसभं हर्तुं प्रभामिव विवस्वतः॥१४॥
‘उनकी पत्नी विदेहराजकुमारी सीता अपने ही पातिव्रत्य के तेज से सुरक्षित हैं। जैसे सूर्य की प्रभा उस से अलग नहीं की जा सकती, उसी तरह सीता को श्रीराम से अलग करना असम्भव है। ऐसी दशा में तुम बलपूर्वक उनका अपहरण कैसे करना चाहते हो?॥१४॥
शरार्चिषमनाधृष्यं चापखड्गेन्धनं रणे।
रामाग्निं सहसा दीप्तं न प्रवेष्टं त्वमर्हसि॥१५॥
‘श्रीराम प्रज्वलित अग्नि के समान हैं। बाण ही उस अग्नि की ज्वाला है। धनुष और खड्ग ही उसके लिये ईंधन का काम करते हैं। तुम्हें युद्ध के लिये सहसा उस अग्नि में प्रवेश नहीं करना चाहिये॥१५॥
धनादितदीप्तास्यं शरार्चिषममर्षणम्।
चापबाणधरं तीक्ष्णं शत्रुसेनापहारिणम्॥१६॥
राज्यं सुखं च संत्यज्य जीवितं चेष्टमात्मनः।
नात्यासादयितुं तात रामान्तकमिहार्हसि॥१७॥
‘तात! धनुष ही जिसका फैला हुआ दीप्तिमान् मुख है और बाण ही प्रभा है, जो अमर्ष में भरा हुआ है, धनुष और बाण धारण किये खड़ा है, रोषवश तीखे स्वभाव का परिचय देता है और शत्रु सेना के प्राण लेने में समर्थ है, उस रामरूपी यमराज के पास तुम्हें यहाँ अपने राज्यसुख और प्यारे प्राणों का मोह छोड़कर सहसा नहीं जाना चाहिये॥१६-१७॥
अप्रमेयं हि तत्तेजो यस्य सा जनकात्मजा।
न त्वं समर्थस्तां हर्तुं रामचापाश्रयां वने॥१८॥
‘जनककिशोरी सीता जिनकी धर्मपत्नी हैं, उनका तेज अप्रमेय है। श्रीरामचन्द्रजी का धनुष उनका आश्रय है, अतः तुममें इतनी शक्ति नहीं है कि वन में उनका अपहरण कर सको॥१८॥
तस्य वै नरसिंहस्य सिंहोरस्कस्य भामिनी।
प्राणेभ्योऽपि प्रियतरा भार्या नित्यमनुव्रता॥१९॥
‘श्रीरामचन्द्रजी मनुष्यों में सिंह के समान पराक्रमी हैं। उनका वक्षःस्थल सिंह के समान उन्नत है। भामिनी सीता उनकी प्राणों से भी अधिक प्रियतमा पत्नी हैं। वे सदा अपने पति का ही अनुसरण करती हैं॥१९॥
न सा धर्षयितुं शक्या मैथिल्योजस्विनः प्रिया।
दीप्तस्येव हुताशस्य शिखा सीता सुमध्यमा॥२०॥
‘मिथिलेशकुमारी सीता ओजस्वी श्रीराम की प्यारी पत्नी हैं। वे प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला के समान असह्य हैं, अतः उन सुन्दरी सीता पर बलात् नहीं किया जा सकता॥२०॥
किमुद्यम व्यर्थमिमं कृत्वा ते राक्षसाधिप।
दृष्टश्चेत् त्वं रणे तेन तदन्तमुपजीवितम्॥२१॥
राक्षसराज ! यह व्यर्थ का उद्योग करने से तुम्हें क्या लाभ होगा? जिस दिन युद्ध में तुम्हारे ऊपर श्रीराम की दृष्टि पड़ जाय, उसी दिन तुम अपने जीवन का अन्त समझना॥२१॥
जीवितं च सुखं चैव राज्यं चैव सुदुर्लभम्।
यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम्॥२२॥
‘यदि तुम अपने जीवन का, सुख का और परम दुर्लभ राज्य का चिरकाल तक उपभोग करना चाहते हो तो श्रीराम का अपराध न करो॥२२॥
स सर्वैः सचिवैः सार्धं विभीषणपुरस्कृतैः।
मन्त्रयित्वा स धर्मिष्ठैः कृत्वा निश्चयमात्मनः।
दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम्॥२३॥
आत्मनश्च बलं ज्ञात्वा राघवस्य च तत्त्वतः।
हितं हि तव निश्चित्य क्षमं त्वं कर्तुमर्हसि॥२४॥
तुम विभीषण आदि सभी धर्मात्मा मन्त्रियों के साथ सलाह करके अपने कर्तव्य का निश्चय करो। अपने और श्रीराम के दोषों तथा गुणों के बलाबल पर भलीभाँति विचार करके अपनी और श्रीरामचन्द्रजी की शक्ति को ठीक-ठीक समझ लो। फिर क्या करने से तुम्हारा हित होगा, इसका निश्चय करके जो उचित जान पड़े, वही कार्य तुम्हें करना चाहिये॥२३-२४॥
अहं तु मन्ये तव न क्षमं रणे समागमं कोसलराजसूनुना।
इदं हि भूयः शृणु वाक्यमुत्तमं क्षमं च युक्तं च निशाचराधिप॥२५॥
‘निशाचरराज! मैं तो समझता हूँ कि कोसलराजकुमार श्रीरामचन्द्रजी के साथ तुम्हारा युद्ध करना उचित नहीं है। अब पुनः मेरी एक बात और सुनो, यह तुम्हारे लिये बहुत ही उत्तम, उचित और उपयुक्त सिद्ध होगी’॥२५॥
सर्ग ३८
कदाचिदप्यहं वीर्यात् पर्यटन् पृथिवीमिमाम्।
बलं नागसहस्रस्य धारयन् पर्वतोपमः॥१॥
‘एक समय की बात है कि मैं अपने पराक्रम के अभिमान में आकर पर्वत के समान शरीर धारण किये इस पृथ्वीपर चक्कर लगा रहा था। उस समय मुझमें एक हजार हाथियोंका बल था॥१॥
नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।
भयं लोकस्य जनयन् किरीटी परिघायुधः॥२॥
व्यचरन् दण्डकारण्यमृषिमांसानि भक्षयन्।
‘मेरा शरीर नील मेघ के समान काला था। मैंने कानों में पक्के सोने के कुण्डल पहन रखे थे। मेरे मस्तक पर किरीट था और हाथ में परिघ मैं ऋषियों के मांस खाता और समस्त जगत् के मन में भय उत्पन्न करता हुआ दण्डकारण्य में विचर रहा था॥२ १/२॥
विश्वामित्रोऽथ धर्मात्मा मद्वित्रस्तो महामुनिः॥३॥
स्वयं गत्वा दशरथं नरेन्द्रमिदमब्रवीत्।
‘उन दिनों धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्र को मुझसे बड़ा भय हो गया था। वे स्वयं राजा दशरथ के पास गये और उनसे इस प्रकार बोले-॥३ १/२॥
अयं रक्षतु मां रामः पर्वकाले समाहितः॥४॥
मारीचान्मे भयं घोरं समुत्पन्नं नरेश्वर।
‘नरेश्वर! मुझे मारीच नामक राक्षस से घोर भय प्राप्त हुआ है, अतः ये श्रीराम मेरे साथ चलें और पर्व के दिन एकाग्रचित्त हो मेरी रक्षा करें’॥४ १/२॥
इत्येवमुक्तो धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा॥५॥
प्रत्युवाच महाभागं विश्वामित्रं महामुनिम्।
‘मुनिके ऐसा कहने पर उस समय धर्मात्मा राजा दशरथ ने महाभाग महामुनि विश्वामित्र को इस प्रकार उत्तर दिया-॥५॥
ऊनद्वादशवर्षोऽयमकृतास्त्रश्च राघवः॥६॥
कामं तु मम तत् सैन्यं मया सह गमिष्यति।
बलेन चतुरङ्गेण स्वयमेत्य निशाचरम्॥७॥
वधिष्यामि मुनिश्रेष्ठ शत्रु तव यथेप्सितम्।
‘मुनिश्रेष्ठ! रघुकुलनन्दन राम की अवस्था अभी बारह वर्ष से भी कम है। इन्हें अस्त्र-शस्त्रों के चलाने का पूरा अभ्यास भी नहीं है। आप चाहें तो मेरे साथ मेरी सारी सेना वहाँ चलेगी और मैं चतुरङ्गिणी सेना के साथ स्वयं ही चलकर आपकी इच्छा के अनुसार उस शत्रुरूप निशाचर का वध करूँगा’॥६-७ १/२॥
एवमुक्तः स तु मुनी राजानमिदमब्रवीत्॥८॥
रामान्नान्यद बलं लोके पर्याप्तं तस्य रक्षसः।
‘राजा के ऐसा कहने पर मुनि उनसे इस प्रकार बोले - ’उस राक्षस के लिये श्रीराम के सिवा दूसरी कोई शक्ति पर्याप्त नहीं है॥८ १/२॥
देवतानामपि भवान् समरेष्वभिपालकः॥९॥
आसीत् तव कृतं कर्म त्रिलोकविदितं नृप।
‘राजन्! इसमें संदेह नहीं कि आप समरभूमि में देवताओं की भी रक्षा करने में समर्थ हैं। आपने जो महान् कार्य किया है, वह तीनों लोकों में प्रसिद्ध है॥९ १/२॥
काममस्ति महत् सैन्यं तिष्ठत्विह परंतप॥१०॥
बालोऽप्येष महातेजाः समर्थस्तस्य निग्रहे।
गमिष्ये राममादाय स्वस्ति तेऽस्तु परंतप॥११॥
‘शत्रुओं को संताप देनेवाले नरेश! आपके पास जो विशाल सेना है, वह आपकी इच्छा हो तो यहीं रहे(आप भी यहीं रहें।) महातेजस्वी श्रीराम बालक हैं तो भी उस राक्षस का दमन करने में समर्थ हैं, अतः मैं श्रीराम को ही साथ लेकर जाऊँगा; आपका कल्याण हो’॥१०-११॥
इत्येवमुक्त्वा स मुनिस्तमादाय नृपात्मजम्।
जगाम परमप्रीतो विश्वामित्रः स्वमाश्रमम्॥१२॥
‘ऐसा कहकर (लक्ष्मणसहित) राजकुमार श्रीराम को साथ ले महामुनि विश्वामित्र बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने आश्रम को गये॥१२॥
तं तथा दण्डकारण्ये यज्ञमुद्दिश्य दीक्षितम्।
बभूवोपस्थितो रामश्चित्रं विस्फारयन् धनुः॥१३॥
‘इस प्रकार दण्डकारण्य में जाकर उन्होंने यज्ञ के लिये दीक्षा ग्रहण की और श्रीराम अपने अद्भुत धनुष की टङ्कार करते हुए उनकी रक्षा के लिये पास ही खड़े हो गये॥१३॥
अजातव्यञ्जनः श्रीमान् बालः श्यामः शुभेक्षणः।
एकवस्त्रधरो धन्वी शिखी कनकमालया॥१४॥
‘उस समय तक श्रीराम में जवानी के चिह्न प्रकट नहीं हुए थे। (उनकी किशोरावस्था थी।) वे एक शोभाशाली बालक के रूप में दिखायी देते थे। उनके श्रीअङ्ग का रंग साँवला और आँखें बड़ी सुन्दर थीं। वे एक वस्त्र धारण किये, हाथों में धनुष लिये सुन्दर शिखा और सोने के हार से सुशोभित थे॥१४॥
शोभयन् दण्डकारण्यं दीप्तेन स्वेन तेजसा।
अदृश्यत तदा रामो बालचन्द्र इवोदितः॥१५॥
‘उस समय अपने उद्दीप्त तेज से दण्डकारण्य की शोभा बढ़ाते हुए श्रीरामचन्द्र नवोदित बालचन्द्र के समान दृष्टिगोचर होते थे॥१५॥
ततोऽहं मेघसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।
बली दत्तवरो दादाजगामाश्रमान्तरम्॥१६॥
‘इधर मैं भी मेघ के समान काले शरीर से बड़े घमंड के साथ उस आश्रम के भीतर घुसा। मेरे कानों में तपाये हुए सुवर्ण के कुण्डल झलमला रहे थे। मैं बलवान् तो था ही, मुझे वरदान भी मिल चुका था कि देवता मुझे मार नहीं सकेंगे॥१६॥
तेन दृष्टः प्रविष्टोऽहं सहसैवोद्यतायुधः।
मां तु दृष्ट्वा धनुः सज्यमसम्भ्रान्तश्चकार ह॥१७॥
‘भीतर प्रवेश करते ही श्रीरामचन्द्रजी की दृष्टि मुझपर पड़ी। मुझे देखते ही उन्होंने सहसा धनुष उठा लिया और बिना किसी घबराहट के उस पर डोरी चढ़ा दी॥१७॥
अवजानन्नहं मोहाद् बालोऽयमिति राघवम्।
विश्वामित्रस्य तां वेदिमभ्यधावं कृतत्वरः॥१८॥
‘मैं मोहवश श्रीरामचन्द्रजी को ‘यह बालक है’ ऐसा समझकर उनकी अवहेलना करता हुआ बड़ी तेजी के साथ विश्वामित्र की उस यज्ञवेदी की ओर दौड़ा॥१८॥
तेन मुक्तस्ततो बाणः शितः शत्रुनिबर्हणः।
तेनाहं ताडितः क्षिप्तः समुद्रे शतयोजने॥१९॥
‘इतने ही में श्रीराम ने एक ऐसा तीखा बाण छोड़ा,जो शत्रु का संहार करने वाला था; परंतु उस बाण की चोट खाकर (मैं मरा नहीं) सौ योजन दूर समुद्र में आकर गिर पड़ा॥१९॥
नेच्छता तात मां हन्तुं तदा वीरेण रक्षितः।
रामस्य शरवेगेन निरस्तो भ्रान्तचेतनः॥२०॥
पातितोऽहं तदा तेन गम्भीरे सागराम्भसि।
प्राप्य संज्ञां चिरात् तात लङ्कां प्रति गतः पुरीम्॥२१॥
‘तात! वीर श्रीरामचन्द्रजी उस समय मुझे मारना नहीं चाहते थे, इसीलिये मेरी जान बच गयी। उनके बाण के वेग से मैं भ्रान्तचित्त होकर दूर फेंक दिया गया और समुद्र के गहरे जल में गिरा दिया गया। तात! फिर दीर्घकाल के पश्चात् जब मुझे चेत हुआ, तब मैं लंकापुरी में गया॥२०-२१॥
एवमस्मि तदा मुक्तः सहायास्ते निपातिताः।
अकृतास्त्रेण रामेण बालेनाक्लिष्टकर्मणा॥२२॥
‘इस प्रकार उस समय मैं मरने से बचा। अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम उन दिनों अभी ङ्केबालक थे और उन्हें अस्त्र चलाने का पूरा अभ्यास भी नहीं था तो भी उन्होंने मेरे उन सभी सहायकों को मार गिराया, जो मेरे साथ गये थे॥२२॥
तन्मया वार्यमाणस्तु यदि रामेण विग्रहम्।
करिष्यस्यापदां घोरां क्षिप्रं प्राप्य न शिष्यसि॥२३॥
‘इसलिये मेरे मना करने पर भी यदि तुम श्रीराम के साथ विरोध करोगे तो शीघ्र ही घोर आपत्ति में पड़ जाओगे और अन्तमें अपने जीवन से भी हाथ धो बैठोगे॥२३॥
क्रीडारतिविधिज्ञानां समाजोत्सवदर्शिनाम्।
रक्षसां चैव संतापमनर्थं चाहरिष्यसि॥२४॥
‘खेल-कूद और भोग-विलास के क्रम को जानने वाले तथा सामाजिक उत्सवों को ही देखदेखकर दिल बहलाने वाले राक्षसों के लिये तुम संताप और अनर्थ (मौत) बुला लाओगे॥२४॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानारत्नविभूषिताम्।
द्रक्ष्यसि त्वं पुरीं लङ्कां विनष्टां मैथिलीकृते॥२५॥
‘मिथिलेशकुमारी सीता के लिये तुम्हें धनियों की अट्टालिकाओं तथा राजभवनों से भरी हुई एवं नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित लंकापुरी का विनाश भी अपनी आँखों देखना पड़ेगा॥२५॥
अकुर्वन्तोऽपि पापानि शुचयः पापसंश्रयात्।
परपापैर्विनश्यन्ति मत्स्या नागह्रदे यथा॥२६॥
‘जो लोग आचार-विचार से शुद्ध हैं और पाप या अपराध नहीं करते हैं, वे भी यदि पापियों के सम्पर्क में चले जायँ तो दूसरों के पापों से ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे साँपवाले सरोवर में निवास करने वाली मछलियाँ उस सर्प के साथ ही मारी जाती हैं॥२६॥
दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गान् दिव्याभरणभूषितान्।
द्रक्ष्यस्यभिहतान् भूमौ तव दोषात् तु राक्षसान्॥२७॥
‘तुम देखोगे कि जिनके अङ्ग दिव्य चन्दन से चर्चित होते थे तथा जो दिव्य आभूषणों से विभूषित रहते थे, वे ही राक्षस तुम्हारे ही अपराध से मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हुए हैं॥२७॥
हृतदारान् सदारांश्च दश विद्रवतो दिशः।
हतशेषानशरणान् द्रक्ष्यसि त्वं निशाचरान्॥२८॥
‘तुम्हें यह भी दिखायी देगा कि कितने ही निशाचरों की स्त्रियाँ हर ली गयी हैं और कुछ की स्त्रियाँ साथ हैं तथा वे युद्ध में मरने से बचकर असहाय अवस्था में दसों दिशाओं की ओर भाग रहे हैं॥२८॥
शरजालपरिक्षिप्तामग्निज्वालासमावृताम्।
प्रदग्धभवनां लङ्कां द्रक्ष्यसि त्वमसंशयम्॥२९॥
‘निःसंदेह तुम्हारे सामने वह दृश्य भी आयेगा कि लंकापुरी पर बाणों का जाल-सा बिछ गया है। वह आग की ज्वालाओं से घिर गयी है और उसका एक एक घर जलकर भस्म हो गया है॥२९॥
परदाराभिमर्शात् तु नान्यत् पापतरं महत्।
प्रमदानां सहस्राणि तव राजन् परिग्रहे॥३०॥
भव स्वदारनिरतः स्वकुलं रक्ष राक्षसान्।
मानं वृद्धिं च राज्यं च जीवितं चेष्टमात्मनः॥३१॥
‘राजन् ! परायी स्त्री के संसर्ग से बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं है। तुम्हारे अन्तःपुर में हजारों युवती स्त्रियाँ हैं, उन अपनी ही स्त्रियों में अनुराग रखो। अपने कुल की रक्षा करो, राक्षसों के प्राण बचाओ तथा अपनी मान, प्रतिष्ठा, उन्नति, राज्य और प्यारे जीवन को नष्ट न होने दो॥३०-३१॥
कलत्राणि च सौम्यानि मित्रवर्गं तथैव च।
यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम्॥३२॥
‘यदि तुम अपनी सुन्दरी स्त्रियों तथा मित्रों का सुख अधिक काल तक भोगना चाहते हो तो श्रीराम का अपराध न करो॥३२॥
निवार्यमाणः सुहृदा मया भृशं प्रसह्य सीतां यदि धर्षयिष्यसि।
गमिष्यसि क्षीणबलः सबान्धवो यमक्षयं रामशरास्तजीवितः॥३३॥
‘मैं तुम्हारा हितैषी सुहृद् हूँ। यदि मेरे बारंबार मना करने पर भी तुम हठपूर्वक सीता का अपहरण करोगे तो तुम्हारी सारी सेना नष्ट हो जायगी और तुम श्रीराम के बाणों से अपने प्राण गँवाकर बन्धु-बान्धवों के साथ यमलोक की यात्रा करोगे’॥३३॥
सर्ग ३९
एवमस्मि तदा मुक्तः कथंचित् तेन संयुगे।
इदानीमपि यद् वृत्तं तच्छृणुष्व यदुत्तरम्॥१॥
‘इस प्रकार इस समय तो मैं किसी तरह श्रीरामचन्द्रजी के हाथ से जीवित बच गया। उसके बाद इन दिनों जो घटना घटित हुई है, उसे भी सुन लो॥१॥
राक्षसाभ्यामहं द्वाभ्यामनिर्विण्णस्तथाकृतः।
सहितो मृगरूपाभ्यां प्रविष्टो दण्डकावने॥२॥
‘श्रीराम ने मेरी वैसी दुर्दशा कर दी थी, तो भी मैं उनके विरोध से बाज नहीं आया। एक दिन मृगरूपधारी दो राक्षसों के साथ मैं भी मृग का ही रूप धारण करके दण्डक वन में गया॥२॥
दीप्तजिह्वो महादंष्ट्रस्तीक्ष्णशृङ्गो महाबलः।
व्यचरन् दण्डकारण्यं मांसभक्षो महामृगः॥३॥
‘मैं महान् बलशाली तो था ही, मेरी जीभ आग के समान उद्दीप्त हो रही थी। दाढ़ें भी बहुत बड़ी थीं,सींग तीखे थे और मैं महान् मृग के रूपमें मांस खाता हुआ दण्डकारण्य में विचरने लगा॥३॥
अग्निहोत्रेषु तीर्थेषु चैत्यवृक्षेषु रावण।
अत्यन्तघोरो व्यचरंस्तापसांस्ता प्रधर्षयन्॥४॥
‘रावण! मैं अत्यन्त भयंकर रूप धारण किये अग्निशालाओं में, जलाशयों के घाटों पर तथा देववृक्षों के नीचे बैठे हुए तपस्वीजनों को तिरस्कृत करता हुआ सब ओर विचरण करने लगा॥४॥
निहत्य दण्डकारण्ये तापसान् धर्मचारिणः।
रुधिराणि पिबंस्तेषां तन्मांसानि च भक्षयन्॥५॥
‘दण्डकारण्य के भीतर धर्मानुष्ठान में लगे हुए तापसों को मारकर उनका रक्त पीना और मांस खाना यही मेरा काम था॥५॥
ऋषिमांसाशनः क्रूरस्त्रासयन् वनगोचरान्।
तदा रुधिरमत्तोऽहं व्यचरं दण्डकावनम्॥६॥
‘मेरा स्वभाव तो क्रूर था ही, मैं ऋषियों के मांस खाता और वन में विचरने वाले प्राणियों को डराता हुआ रक्तपान करके मतवाला हो दण्डक वन में घूमने लगा॥६॥
तदाहं दण्डकारण्ये विचरन् धर्मदूषकः।
आसादयं तदा रामं तापसं धर्ममाश्रितम्॥७॥
वैदेहीं च महाभागां लक्ष्मणं च महारथम्।
तापसं नियताहारं सर्वभूतहिते रतम्॥८॥
‘इस प्रकार उस समय दण्डकारण्य में विचरता हुआ धर्म को कलङ्कित करने वाला मैं मारीच तापस धर्म का आश्रय लेने वाले श्रीराम, विदेहनन्दिनी महाभागा सीता तथा मिताहारी तपस्वी के रूप में समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले महारथी लक्ष्मण के पास जा पहुँचा॥७-८॥
सोऽहं वनगतं रामं परिभूय महाबलम्।
तापसोऽयमिति ज्ञात्वा पूर्ववैरमनुस्मरन्॥९॥
अभ्यधावं सुसंक्रुद्धस्तीक्ष्णशृङ्गो मृगाकृतिः।
जिघांसुरकृतप्रज्ञस्तं प्रहारमनुस्मरन्॥१०॥
‘वन में आये हुए महाबली श्रीराम को ‘यह एक तपस्वी है’ ऐसा जानकर उनकी अवहेलना करके मैं आगे बढ़ा और पहले के वैर का बारंबार स्मरण करके अत्यन्त कुपित हो उनकी ओर दौड़ा। उस समय मेरी आकृति मृग के ही समान थी। मेरे सींग बड़े तीखे थे। उनके पहले के प्रहार को याद करके मैं उन्हें मार डालना चाहता था। मेरी बुद्धि शुद्ध न होने के कारण मैं उनकी शक्ति और प्रभाव को भूल-सा गया था॥९-१०॥
तेन त्यक्तास्त्रयो बाणाः शिताः शत्रुनिबर्हणाः।
विकृष्य सुमहच्चापं सुपर्णानिलतुल्यगाः॥११॥
‘हम तीनों को आते देख श्रीराम ने अपने विशाल धनुष को खींचकर तीन पैने बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायु के समान शीघ्रगामी तथा शत्रु के प्राण लेने वाले थे॥११॥
ते बाणा वज्रसंकाशाः सुघोरा रक्तभोजनाः।
आजग्मुः सहिताः सर्वे त्रयः संनतपर्वणः॥१२॥
‘झुकी हुई गाँठवाले वे सब तीनों बाण, जो वज्र के समान दुःसह, अत्यन्त भयंकर तथा रक्त पीने वाले थे, एक साथ ही हमारी ओर आये॥१२॥
पराक्रमज्ञो रामस्य शठो दृष्टभयः पुरा।
समुत्क्रान्तस्ततो मुक्तस्तावुभौ राक्षसौ हतौ॥१३॥
‘मैं तो श्रीराम के पराक्रम को जानता था और पहले एक बार उनके भय का सामना कर चुका था, इसलिये शठतापूर्वक उछलकर भाग निकला। भाग जाने से मैं तो बच गया; किंतु मेरे वे दोनों साथी राक्षस मारे गये॥१३॥
शरेण मुक्तो रामस्य कथंचित् प्राप्य जीवितम्।
इह प्रव्राजितो युक्तस्तापसोऽहं समाहितः॥१४॥
‘इस बार श्रीराम के बाण से किसी तरह छुटकारा पाकर मुझे नया जीवन मिला और तभी से संन्यास लेकर समस्त दुष्कर्मों का परित्याग करके स्थिरचित्त हो योगाभ्यास में तत्पर रहकर तपस्या में लग गया॥१४॥
वृक्षे वृक्षे हि पश्यामि चीरकृष्णाजिनाम्बरम्।
गृहीतधनुषं रामं पाशहस्तमिवान्तकम्॥१५॥
‘अब मुझे एक-एक वृक्ष में चीर, काला मृगचर्म और धनुष धारण किये श्रीराम ही दिखायी देते हैं, जो मुझे पाशधारी यमराज के समान प्रतीत होते हैं॥१५॥
अपि रामसहस्राणि भीतः पश्यामि रावण।
रामभूतमिदं सर्वमरण्यं प्रतिभाति मे॥१६॥
‘रावण! मैं भयभीत होकर हजारों रामों को अपने सामने खड़ा देखता हूँ। यह सारा वन ही मुझे राममय प्रतीत हो रहा है॥१६॥
राममेव हि पश्यामि रहिते राक्षसेश्वर।
दृष्ट्वा स्वप्नगतं राममुद्भमामि विचेतनः॥१७॥
‘राक्षसराज! जब मैं एकान्त में बैठता हूँ, तब मुझे श्रीराम के ही दर्शन होते हैं। सपने में श्रीराम को देखकर मैं उद्भ्रान्त और अचेत-सा हो उठता हूँ॥१७॥
रकारादीनि नामानि रामत्रस्तस्य रावण।
रत्नानि च रथाश्चैव वित्रासं जनयन्ति मे॥१८॥
‘रावण! मैं राम से इतना भयभीत हो गया हूँ कि रत्न और रथ आदि जितने भी रकारादि नाम हैं, वे मेरे कानों में पड़ते ही मन में भारी भय उत्पन्न कर देते हैं॥१८॥
अहं तस्य प्रभावज्ञो न युद्धं तेन ते क्षमम्।
बलिं वा नमुचिं वापि हन्याद्धि रघुनन्दनः॥१९॥
‘मैं उनके प्रभाव को अच्छी तरह जानता हूँ। इसीलिये कहता हूँ कि श्रीराम के साथ तुम्हारा युद्ध करना कदापि उचित नहीं है। रघुकुलनन्दन श्रीराम राजा बलि अथवा नमुचि का भी वध कर सकते हैं॥१९॥
रणे रामेण युद्धस्व क्षमां वा कुरु रावण।
न ते रामकथा कार्या यदि मां द्रष्टमिच्छसि॥२०॥
‘रावण! तुम्हारी इच्छा हो तो रणभूमि में श्रीराम के साथ युद्ध करो अथवा उन्हें क्षमा कर दो, किंतु यदि मुझे जीवित देखना चाहते हो तो मेरे सामने श्रीराम की चर्चा न करो॥२०॥
बहवः साधवो लोके युक्ता धर्ममनुष्ठिताः।
परेषामपराधेन विनष्टाः सपरिच्छदाः॥२१॥
‘लोक में बहुत-से साधुपुरुष, जो योगयुक्त होकर केवल धर्म के ही अनुष्ठान में लगे रहते थे, दूसरों के अपराध से ही परिकरोंसहित नष्ट हो गये॥२१॥
सोऽहं परापराधेन विनशेयं निशाचर।
कुरु यत् ते क्षमं तत्त्वमहं त्वां नानुयामि वै॥२२॥
‘निशाचर! मैं भी किसी तरह दूसरों के अपराध से नष्ट हो सकता हूँ, अतः तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो। मैं इस कार्य में तुम्हारा साथ नहीं दे सकता॥२२॥
रामश्च हि महातेजा महासत्त्वो महाबलः।
अपि राक्षसलोकस्य भवेदन्तकरोऽपि हि॥२३॥
‘क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी बड़े तेजस्वी, महान् आत्मबल से सम्पन्न तथा अधिक बलशाली हैं। वे समस्त राक्षस-जगत् का भी संहार कर सकते हैं। २३॥
यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगतः खरः।
अतिवृत्तो हतः पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा।
अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रमः॥२४॥
‘यदि शूर्पणखा का बदला लेने के लिये जनस्थाननिवासी खर पहले श्रीराम पर चढ़ाई करने के लिये गया और अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम के हाथ से मारा गया तो तुम्हीं ठीक-ठीक बताओ, इसमें श्रीराम का क्या अपराध है ?॥२४॥
इदं वचो बन्धुहितार्थिना मया यथोच्यमानं यदि नाभिपत्स्यसे।
सबान्धवस्त्यक्ष्यसि जीवितं रणे हतोऽद्य रामेण शरैरजिह्मगैः॥२५॥
‘तुम मेरे बन्धु हो। मैं तुम्हारा हित करने की इच्छा से ही ये बातें कह रहा हूँ। यदि नहीं मानोगे तो युद्ध में आज राम के सीधे जाने वाले बाणों द्वारा घायल होकर तुम्हें बन्धु-बान्धवोंसहित प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा’॥२५॥
सर्ग ४०
मारीचस्य तु तद् वाक्यं क्षमं युक्तं च रावणः।
उक्तो न प्रतिजग्राह मर्तुकाम इवौषधम्॥१॥
मारीच का वह कथन उचित और मानने योग्य था तो भी जैसे मरने की इच्छावाला रोगी दवा नहीं लेता, उसी प्रकार उसके बहुत कहने पर भी रावण ने उसकी बात नहीं मानी॥१॥
तं पथ्यहितवक्तारं मारीचं राक्षसाधिपः।
अब्रवीत् परुषं वाक्यमयुक्तं कालचोदितः॥२॥
काल से प्रेरित हुए उस राक्षसराज ने यथार्थ और हित की बात बताने वाले मारीच से अनुचित और कठोर वाणी में कहा-॥२॥
दुष्कुलैतदयुक्तार्थं मारीच मयि कथ्यते।
वाक्यं निष्फलमत्यर्थं बीजमुप्तमिवोषरे॥३॥
‘दूषित कुल में उत्पन्न मारीच! तुमने मेरे प्रति जो ये अनाप-शनाप बातें कही हैं, ये मेरे लिये अनुचित और असंगत हैं, ऊसर में बोये हुए बीज के समान अत्यन्त निष्फल हैं॥३॥
त्वद्वाक्यैर्न तु मां शक्यं भेत्तुं रामस्य संयुगे।
मूर्खस्य पापशीलस्य मानुषस्य विशेषतः॥४॥
‘तुम्हारे इन वचनों द्वारा मूर्ख, पापाचारी और विशेषतः मनुष्य राम के साथ युद्ध करने अथवा उसकी स्त्री का अपहरण करने के निश्चय से मुझे विचलित नहीं किया जा सकता॥४॥
यस्त्यक्त्वा सुहृदो राज्यं मातरं पितरं तथा।
स्त्रीवाक्यं प्राकृतं श्रुत्वा वनमेकपदे गतः॥५॥
अवश्यं तु मया तस्य संयुगे खरघातिनः।
प्राणैः प्रियतरा सीता हर्तव्या तव संनिधौ॥६॥
‘एक स्त्री (कैकेयी) के मूर्खतापूर्ण वचन सुनकर जो राज्य, मित्र, माता और पिता को छोड़कर सहसाजंगल में चला आया है तथा जिसने युद्ध में खर का वध किया है, उस रामचन्द्र की प्राणों से भी प्यारी भार्या सीता का मैं तुम्हारे निकट ही अवश्य हरण करूँगा।
एवं मे निश्चिता बुद्धिर्हदि मारीच विद्यते।
न व्यावर्तयितुं शक्या सेन्ट्रैरपि सुरासुरैः॥७॥
‘मारीच! ऐसा मेरे हृदय का निश्चित विचार है, इसे इन्द्र आदि देवता और सारे असुर मिलकर भी बदल नहीं सकते॥७॥
दोषं गुणं वा सम्पृष्टस्त्वमेवं वक्तुमर्हसि।
अपायं वा उपायं वा कार्यस्यास्य विनिश्चये॥८॥
‘यदि इस कार्य का निर्णय करने के लिये तुमसे पूछा जाता ‘इसमें क्या दोष है, क्या गुण है, इसकी सिद्धि में कौन-सा विघ्न है अथवा इस कार्य को सिद्ध करने का कौन-सा उपाय है’ तो तुम्हें ऐसी बातें कहनी चाहिये थीं॥८॥
सम्पृष्टेन तु वक्तव्यं सचिवेन विपश्चिता।
उद्यताञ्जलिना राज्ञो य इच्छेद् भूतिमात्मनः॥९॥
‘जो अपना कल्याण चाहता हो, उस बुद्धिमान् मन्त्री को उचित है कि वह राजा से उसके पूछने पर ही अपना अभिप्राय प्रकट करे और वह भी हाथ जोड़कर नम्रता के साथ॥९॥
वाक्यमप्रतिकूलं तु मृदुपूर्वं शुभं हितम्।
उपचारेण वक्तव्यो युक्तं च वसुधाधिपः॥१०॥
‘राजा के सामने ऐसी बात कहनी चाहिये, जो सर्वथा अनुकूल, मधुर, उत्तम, हितकर, आदर से युक्त और उचित हो॥१०॥
सावमदं तु यद्वाक्यमथवा हितमुच्यते।
नाभिनन्देत तद् राजा मानार्थी मानवर्जितम्॥११॥
‘राजा सम्मान का भूखा होता है। उसकी बात का खण्डन करके आक्षेपपूर्ण भाषा में यदि हितकर वचन भी कहा जाय तो उस अपमानपूर्ण वचन का वह कभी अभिनन्दन नहीं कर सकता॥११॥
पञ्च रूपाणि राजानो धारयन्त्यमितौजसः।
अग्नेरिन्द्रस्य सोमस्य यमस्य वरुणस्य च॥१२॥
औष्ण्यं तथा विक्रमं च सौम्यं दण्डं प्रसन्नताम्।
धारयन्ति महात्मानो राजानः क्षणदाचर॥१३॥
‘निशाचर! अमित तेजस्वी महामनस्वी राजा अग्नि, इन्द्र, सोम, यम और वरुण-इन पाँच देवताओं के स्वरूप धारण किये रहते हैं, इसीलिये वे अपने में इन पाँचों के गुण-प्रताप, पराक्रम, सौम्यभाव, दण्ड और प्रसन्नता भी धारण करते हैं ॥१२-१३॥
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु मान्याः पूज्याश्च
नित्यदा। त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं मोहमाश्रितः॥१४॥
अभ्यागतं तु दौरात्म्यात् परुषं वदसीदृशम्।
गुणदोषौ न पृच्छामि क्षेमं चात्मनि राक्षस॥१५॥
‘अतः सभी अवस्थाओं में सदा राजाओं का सम्मान और पूजन ही करना चाहिये। तुम तो अपने धर्म को न जानकर केवल मोह के वशीभूत हो रहे हो। मैं तुम्हारा अभ्यागत-अतिथि हूँ तो भी तुम दुष्टतावश मुझसे ऐसी कठोर बातें कह रहे हो। राक्षस! मैं तुमसे अपने कर्तव्य के गुण-दोष नहीं पूछता हूँ और न यही जानना चाहता हूँ कि मेरे लिये क्या उचित है॥१४-१५॥
मयोक्तमपि चैतावत् त्वां प्रत्यमितविक्रम।
अस्मिंस्तु स भवान् कृत्ये साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥१६॥
‘अमितपराक्रमी मारीच! मैंने तो तुमसे इतना ही कहा था कि इस कार्य में तुम्हें मेरी सहायता करनी चाहिये॥१६॥
शृणु तत्कर्म साहाय्ये यत्कार्यं वचनान्मम।
सौवर्णस्त्वं मृगो भूत्वा चित्रो रजतबिन्दुभिः॥१७॥
आश्रमे तस्य रामस्य सीतायाः प्रमुखे चर।
प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि॥१८॥
‘अच्छा, अब तुम्हें सहायता के लिये मेरे कथनानुसार जो कार्य करना है, उसे सुनो। तुम सुवर्णमय चर्म से युक्त चितकबरे रंगके मृग हो जाओ। तुम्हारे सारे अङ्ग में चाँदी की-सी सफेद बूंदें रहनी चाहिये। ऐसा रूप धारण करके तुम राम के आश्रम में सीता के सामने विचरो। एक बार विदेहकुमारी को लुभाकर जहाँ तुम्हारी इच्छा हो उधर ही चले जाओ॥१७-१८॥
त्वां हि मायामयं दृष्ट्वा काञ्चनं जातविस्मया।
आनयनमिति क्षिप्रं रामं वक्ष्यति मैथिली॥१९॥
‘तुम मायामय काञ्चन मृग को देखकर मिथिलेशकुमारी सीता को बड़ा आश्चर्य होगा और वह शीघ्र ही राम से कहेगी कि आप इसे पकड़ लाइये॥१९॥
अपक्रान्ते च काकुत्स्थे दूरं गत्वाप्युदाहर।
हा सीते लक्ष्मणेत्येवं रामवाक्यानुरूपकम्॥२०॥
‘जब राम तुम्हें पकड़ने के लिये आश्रम से दूर चले जायँ तो तुम भी दूर तक जाकर श्रीराम की बोली के अनुरूप ही–ठीक उन्हीं के स्वर में ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ कहकर पुकारना॥२०॥
तच्छ्रुत्वा रामपदवीं सीतया च प्रचोदितः।
अनुगच्छति सम्भ्रान्तः सौमित्रिरपि सौहृदात्॥२१॥
‘तुम्हारी उस पुकार को सुनकर सीता की प्रेरणा से सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी स्नेहवश घबराये हुए अपने भाई के ही मार्ग का अनुसरण करेंगे॥२१॥
अपक्रान्ते च काकुत्स्थे लक्ष्मणे च यथासुखम्।
आहरिष्यामि वैदेहीं सहस्राक्षः शचीमिव॥२२॥
‘इस प्रकार राम और लक्ष्मण दोनों के आश्रम से दूर निकल जाने पर मैं सुखपूर्वक सीता को हर लाऊँगा, ठीक उसी तरह जैसे इन्द्र शची को हर लाये थे॥२२॥
एवं कृत्वा त्विदं कार्यं यथेष्टं गच्छ राक्षस।
राज्यस्यार्धं प्रदास्यामि मारीच तव सुव्रत॥२३॥
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले राक्षस मारीच! इस प्रकार इस कार्य को सम्पन्न करके जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाना। मैं इसके लिये तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूंगा॥२३॥
गच्छ सौम्य शिवं मार्ग कार्यस्यास्य विवृद्धये।
अहं त्वानुगमिष्यामि सरथो दण्डकावनम्॥२४॥
‘सौम्य! अब इस कार्य की सिद्धि के लिये प्रस्थान करो। तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो। मैं रथ पर बैठकर दण्डक वन तक तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा॥२४॥
प्राप्य सीतामयुद्धेन वञ्चयित्वा तु राघवम्।
लङ्कां प्रति गमिष्यामि कृतकार्यः सह त्वया॥२५॥
‘राम को धोखा देकर बिना युद्ध किये ही सीता को अपने हाथ में करके कृतार्थ हो तुम्हारे साथ ही लंका को लौट चलूँगा॥२५॥
नो चेत् करोषि मारीच हन्मि त्वामहमद्य वै।
एतत् कार्यमवश्यं मे बलादपि करिष्यसि।
राज्ञो विप्रतिकूलस्थो न जातु सुखमेधते॥२६॥
‘मारीच! यदि तुम इनकार करोगे तो तुम्हें अभी मार डालूँगा। मेरा यह कार्य तुम्हें अवश्य करना पड़ेगा। मैं बलप्रयोग करके भी तुमसे यह काम कराऊँगा। राजा के प्रतिकूल चलने वाला पुरुष कभी सुखी नहीं होता है॥२६॥
आसाद्य तं जीवितसंशयस्ते मृत्युर्बुवो ह्यद्य मया विरुध्यतः।
एतद् यथावत् परिगण्य बुद्ध्या यदत्र पथ्यं कुरु तत्तथा त्वम्॥२७॥
‘राम के सामने जाने पर तुम्हारे प्राण जाने का संदेहमात्र है, परंतु मेरे साथ विरोध करने पर तो आज ही तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। इन बातों पर बुद्धि लगाकर भलीभाँति विचार कर लो। उसके बाद यहाँ जो हितकर जान पड़े, उसे उसी प्रकार तुम करो’॥२७॥
सर्ग ४१
आज्ञप्तो रावणेनेत्थं प्रतिकूलं च राजवत्।
अब्रवीत् परुषं वाक्यं निःशङ्को राक्षसाधिपम्॥
रावण ने जब राजा की भाँति उसे ऐसी प्रतिकूल आज्ञा दी, तब मारीच ने निःशङ्क होकर उस राक्षसराज से कठोर वाणी में कहा-॥१॥
केनायमुपदिष्टस्ते विनाशः पापकर्मणा।
सपुत्रस्य सराज्यस्य सामात्यस्य निशाचर॥२॥
‘निशाचर! किस पापी ने तुम्हें पुत्र, राज्य और मन्त्रियों सहित तुम्हारे विनाश का यह मार्ग बताया है?॥२॥
कस्त्वया सुखिना राजन् नाभिनन्दति पापकृत्।
केनेदमुपदिष्टं ते मृत्युद्वारमुपायतः॥३॥
‘राजन्! कौन ऐसा पापाचारी है, जो तुम्हें सुखी देखकर प्रसन्न नहीं हो रहा है ? किसने युक्ति से तुम्हें मौत के द्वार पर जाने की यह सलाह दी है ?॥३॥
शत्रवस्तव सुव्यक्तं हीनवीर्या निशाचर।
इच्छन्ति त्वां विनश्यन्तमुपरुद्धं बलीयसा॥४॥
‘निशाचर! आज यह बात स्पष्ट रूप से ज्ञात हो गयी कि तुम्हारे दुर्बल शत्रु तुम्हें किसी बलवान् से भिड़ाकर नष्ट होते देखना चाहते हैं।॥४॥
केनेदमुपदिष्टं ते क्षुद्रेणाहितबुद्धिना।
यस्त्वामिच्छति नश्यन्तं स्वकृतेन निशाचर॥५॥
‘राक्षसराज! तुम्हारे अहित का विचार रखने वाले किस नीच ने तुम्हें यह पाप करने का उपदेश दिया है ? जान पड़ता है कि वह तुम्हें अपने ही कुकर्म से नष्ट होते देखना चाहता है॥५॥
वध्याः खलु न वध्यन्ते सचिवास्तव रावण।
ये त्वामुत्पथमारूढं न निगृह्णन्ति सर्वशः॥६॥
‘रावण! निश्चय ही वध के योग्य तुम्हारे वे मन्त्री हैं, जो कुमार्ग पर आरूढ़ हुए तुम-जैसे राजा को सब प्रकार से रोक नहीं रहे हैं; किंतु तुम उनका वध नहीं करते हो॥६॥
अमात्यैः कामवृत्तो हि राजा कापथमाश्रितः।
निग्राह्यः सर्वथा सद्भिः स निग्राह्यो न गृह्यसे॥७॥
‘अच्छे मन्त्रियों को चाहिये कि जो राजा स्वेच्छाचारी होकर कुमार्ग पर चलने लगे, उसे सब प्रकार से वे रोकें। तुम भी रोकने के ही योग्य हो; फिर भी वे मन्त्री तुम्हें रोक नहीं रहे हैं॥७॥
धर्ममर्थं च कामं च यशश्च जयतां वर।
स्वामिप्रसादात् सचिवाः प्राप्नुवन्ति निशाचर॥८॥
‘विजयी वीरों में श्रेष्ठ निशाचर! मन्त्री अपने स्वामी राजा की कृपा से ही धर्म, अर्थ, काम और यश पाते हैं॥८॥
विपर्यये तु तत्सर्वं व्यर्थं भवति रावण।
व्यसनं स्वामिवैगुण्यात् प्राप्नुवन्तीतरे जनाः॥९॥
‘रावण! यदि स्वामी की कृपा न हो तो सब व्यर्थ हो जाता है। राजा के दोष से दूसरे लोगों को भी कष्ट भोगना पड़ता है॥९॥
राजमूलो हि धर्मश्च यशश्च जयतां वर।
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षितव्या नराधिपाः॥१०॥
‘विजयशीलों में श्रेष्ठ राक्षसराज! धर्म और यश की प्राप्ति का मूल कारण राजा ही है; अतः सभी अवस्थाओं में राजा की रक्षा करनी चाहिये॥१०॥
राज्यं पालयितुं शक्यं न तीक्ष्णेन निशाचर।
न चातिप्रतिकूलेन नाविनीतेन राक्षस॥११॥
‘रात्रि में विचरने वाले राक्षस! जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा हो, जो जनता के अत्यन्त प्रतिकूल चलने वाला और उद्दण्ड हो, ऐसे राजा से राज्य की रक्षा नहीं हो सकती॥११॥
ये तीक्ष्णमन्त्राः सचिवा भुज्यन्ते सह तेन वै।
विषमेषु रथाः शीघ्रं मन्दसारथयो यथा॥१२॥
‘जो मन्त्री तीखे उपाय का उपदेश करते हैं, वे अपनी सलाह मानने वाले उस राजा के साथ ही दुःख भोगते हैं, जैसे जिनके सारथि मूर्ख हों, ऐसे रथ नीची-ऊँची भूमि में जाने पर सारथियों के साथ ही संकट में पड़ जाते हैं॥१२॥
बहवः साधवो लोके युक्तधर्ममनुष्ठिताः।
परेषामपराधेन विनष्टाः सपरिच्छदाः॥१३॥
‘उपयुक्त धर्म का अनुष्ठान करने वाले बहुत-से साधुपुरुष इस जगत् में दूसरों के अपराध से परिवारसहित नष्ट हो गये हैं॥१३॥
स्वामिना प्रतिकूलेन प्रजास्तीक्ष्णेन रावण।
रक्ष्यमाणा न वर्धन्ते मेषा गोमायुना यथा॥१४॥
‘रावण! प्रतिकूल बर्ताव और तीखे स्वभाव वाले राजा से रक्षित होने वाली प्रजा उसी तरह वृद्धि को नहीं प्राप्त होती है, जैसे गीदड़ या भेड़िये से पालित होने वाली भेड़ें॥१४॥
अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः।
येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः॥१५॥
‘रावण! जिनके तुम क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा हो, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायेंगे॥१५॥
तदिदं काकतालीयं घोरमासादितं मया।
अत्र त्वं शोचनीयोऽसि ससैन्यो विनशिष्यसि॥१६॥
‘काकतालीय न्याय के अनुसार मुझे तुमसे अकस्मात् ही यह घोर दुःख प्राप्त हो गया। इस विषय में मुझे तुम ही शोक के योग्य जान पड़ते हो; क्योंकि सेनासहित तुम्हारा नाश हो जायगा॥१६॥
मां निहत्य तु रामोऽसावचिरात् त्वां वधिष्यति।
अनेन कृतकृत्योऽस्मि म्रिये चाप्यरिणा हतः॥१७॥
‘श्रीरामचन्द्रजी मुझे मारकर तुम्हारा भी शीघ्र ही वध कर डालेंगे। जब दोनों ही तरह से मेरी मृत्यु निश्चित है, तब श्रीराम के हाथ से होने वाली जो यह मृत्यु है, इसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा; क्योंकि शत्रु के द्वारा युद्ध में मारा जाकर प्राणत्याग करूँगा (तुम-जैसे राजा के हाथ से बलपूर्वक प्राणदण्ड पाने का कष्ट नहीं भोगूंगा)॥१७॥
दर्शनादेव रामस्य हतं मामवधारय।
आत्मानं च हतं विद्धि हृत्वा सीतां सबान्धवम्॥१८॥
‘राजन्! यह निश्चित समझो कि श्रीराम के सामने जाकर उनकी दृष्टि पड़ते ही मैं मारा जाऊँगा और यदि तुमने सीता का हरण किया तो तुम अपने को भी बन्धु-बान्धवोंसहित मरा हुआ ही मानो॥१८॥
आनयिष्यसि चेत् सीतामाश्रमात् सहितो मया।
नैव त्वमपि नाहं वै नैव लङ्का न राक्षसाः॥१९॥
‘यदि तुम मेरे साथ जाकर श्रीराम के आश्रम से सीता का अपहरण करोगे, तब न तो तुम जीवित बचोगे और न मैं ही न लंकापुरी रहने पायेगी और न वहाँ के निवासी राक्षस ही॥१९॥
निवार्यमाणस्तु मया हितैषिणा न मृष्यसे वाक्यमिदं निशाचर।
परेतकल्पा हि गतायुषो नरा हितं न गृह्णन्ति सुहृद्भिरीरितम्॥२०॥
‘निशाचर! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिये तुम्हें पापकर्म से रोक रहा हूँ; किंतु तुम्हें मेरी बात सहन नहीं होती है। सच है जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, वे मरणासन्न पुरुष अपने सुहृदों की कही हुई हितकर बातें नहीं स्वीकार करते हैं॥२०॥
सर्ग ४२
एवमुक्त्वा तु परुषं मारीचो रावणं ततः।
गच्छावेत्यब्रवीद् दीनो भयाद रात्रिंचरप्रभोः॥१॥
रावण से इस प्रकार कठोर बातें कहकर उस निशाचरराज के भय से दुःखी हुए मारीच ने कहा —’चलो चलें॥१॥
दृष्टश्चाहं पुनस्तेन शरचापासिधारिणा।
मद्धोद्यतशस्त्रेण निहतं जीवितं च मे॥२॥
‘मेरे वध के लिये जिनका हथियार सदा उठा ही रहता है, उन धनुष-बाण और तलवार धारण करने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने यदि फिर मुझे देख लिया तो मेरे जीवन का अन्त निश्चित है॥२॥
नहि रामं पराक्रम्य जीवन् प्रतिनिवर्तते।
वर्तते प्रतिरूपोऽसौ यमदण्डहतस्य ते॥३॥
‘श्रीरामचन्द्रजी के साथ पराक्रम दिखाकर कोई जीवित नहीं लौटता है। तुम यमदण्ड से मारे गये हो (इसीलिये उनसे भिड़ने की बात सोचते हो)। वे श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे लिये यमदण्ड के ही समान हैं॥३॥
किं नु कर्तुं मया शक्यमेवं त्वयि दुरात्मनि।
एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर॥४॥
‘परंतु जब तुम इस प्रकार दुष्टतापर उतारू हो गये, तब मैं क्या कर सकता हूँ लो, यह मैं चलता हूँ। तात निशाचर ! तुम्हारा कल्याण हो’॥४॥
प्रहृष्टस्त्वभवत् तेन वचनेन स राक्षसः।
परिष्वज्य सुसंश्लिष्टमिदं वचनमब्रवीत्॥५॥
मारीच के उस वचन से राक्षस रावण को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उसे कसकर हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा-॥५॥
एतच्छौटीर्ययुक्तं ते मच्छन्दवशवर्तिनः।
इदानीमसि मारीचः पूर्वमन्यो हि राक्षसः॥६॥
‘यह तुमने वीरता की बात कही है; क्योंकि अब तुम मेरी इच्छा के वशवर्ती हो गये हो। इस समय तुम वास्तव में मारीच हो। पहले तुममें किसी दूसरे राक्षस का आवेश हो गया था॥६॥
आरुह्यतामयं शीघ्रं खगो रत्नविभूषितः।
मया सह रथो युक्तः पिशाचवदनैः खरैः॥७॥
‘यह रत्नों से विभूषित मेरा आकाशगामी रथ तैयार है, इसमें पिशाचों के-से मुखवाले गधे जुते हुए हैं, इसपर मेरे साथ जल्दी से बैठ जाओ॥७॥
प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि।
तां शून्ये प्रसभं सीतामानयिष्यामि मैथिलीम्॥८॥
‘(तुम्हारे जिम्मे एक ही काम है) विदेहकुमारी सीता के मन में अपने लिये लोभ उत्पन्न कर दो। उसे लुभाकर तुम जहाँ चाहो जा सकते हो। आश्रम सूना हो जाने पर मैं मिथिलेशकुमारी सीता को जबरदस्ती उठा लाऊँगा’॥८॥
ततस्तथेत्युवाचैनं रावणं ताटकासुतः।
ततो रावणमारीचौ विमानमिव तं रथम्॥९॥
आरुह्याययतुः शीघ्रं तस्मादाश्रममण्डलात्।
तब ताटकाकुमार मारीच ने रावण से कहा-'तथास्तु’ ऐसा ही हो। तदनन्तर रावण और मारीच दोनों उस विमानाकार रथ पर बैठकर शीघ्र ही उस आश्रममण्डल से चल दिये॥९ १/२॥
तथैव तत्र पश्यन्तौ पत्तनानि वनानि च॥१०॥
गिरीश्च सरितः सर्वा राष्ट्राणि नगराणि च।
समेत्य दण्डकारण्यं राघवस्याश्रमं ततः॥११॥
ददर्श सहमारीचो रावणो राक्षसाधिपः।
मार्ग में पहले की ही भाँति अनेकानेक पत्तनों, वनों, पर्वतों, समस्त नदियों, राष्ट्रों तथा नगरों को देखते हुए दोनों ने दण्डकारण्य में प्रवेश किया और वहाँ मारीचसहित राक्षसराज रावण ने श्रीरामचन्द्रजी का आश्रम देखा॥१०-११ १/२॥
अवतीर्य रथात् तस्मात् ततः काञ्चनभूषणात्॥१२॥
हस्ते गृहीत्वा मारीचं रावणो वाक्यमब्रवीत्।
तब उस सुवर्णभूषित रथ से उतरकर रावण ने मारीच का हाथ अपने हाथ में ले उससे कहा-॥१२ १/२॥
एतद् रामाश्रमपदं दृश्यते कदलीवृतम्॥१३॥
क्रियतां तत् सखे शीघ्रं यदर्थं वयमागताः।
‘सखे! यह केलों से घिरा हुआ राम का आश्रम दिखायी दे रहा है। अब शीघ्र ही वह कार्य करो, जिसके लिये हमलोग यहाँ आये हैं’॥१३ १/२॥
स रावणवचः श्रुत्वा मारीचो राक्षसस्तदा॥१४॥
मृगो भूत्वाऽऽश्रमद्वारि रामस्य विचचार ह।
रावण की बात सुनकर राक्षस मारीच उस समय मृग का रूप धारण करके श्रीराम के आश्रम के द्वार पर विचरने लगा॥१४ १/२॥
स तु रूपं समास्थाय महदद्भुतदर्शनम्॥१५॥
मणिप्रवरशृङ्गाग्रः सितासितमुखाकृतिः।
रक्तपद्मोत्पलमुख इन्द्रनीलोत्पलश्रवाः॥१६॥
किंचिदभ्युन्नतग्रीव इन्द्रनीलनिभोदरः।
मधूकनिभपार्श्वश्च कञ्जकिञ्जल्कसंनिभः॥१७॥
उस समय उसने देखने में बड़ा ही अद्भुत रूप धारण कर रखा था। उसके सींगों के ऊपरी भागइन्द्रनील नामक श्रेष्ठ मणि के बने हुए जान पड़ते थे, मुखमण्डलपर सफेद और काले रंग की बूंदें थीं, मुख का रंग लाल कमल के समान था। उसके कान नीलकमल के तुल्य थे और गरदन कुछ ऊँची थी, उदर का भाग इन्द्रनीलमणि की कान्ति धारण कर रहा था। पार्श्वभाग महुए के फूल के समान श्वेतवर्ण के थे, शरीर का सुनहरा रंग कमल के केसर की भाँति सुशोभित होता था॥१५–१७॥
वैदूर्यसंकाशखुरस्तनुजङ्घः सुसंहतः।
इन्द्रायुधसवर्णेन पुच्छेनोर्ध्वं विराजितः॥१८॥
उसके खुर वैदूर्यमणि के समान, पिंडलियाँ पतली और पूँछ ऊपर से इन्द्रधनुष के रंगकी थी, जिससे उसका संगठित शरीर विशेष शोभा पा रहा था॥१८॥
मनोहरस्निग्धवर्णो रत्नैर्नानाविधैर्वृतः।
क्षणेन राक्षसो जातो मृगः परमशोभनः॥१९॥
उसकी देह की कान्ति बड़ी ही मनोहर और चिकनी थी। वह नाना प्रकार की रत्नमयी बँदकियों से विभूषित दिखायी देता था। राक्षस मारीच क्षणभर में ही परम शोभाशाली मृग बन गया॥१९॥
वनं प्रज्वलयन् रम्यं रामाश्रमपदं च तत्।
मनोहरं दर्शनीयं रूपं कृत्वा स राक्षसः॥२०॥
प्रलोभनार्थं वैदेह्या नानाधातुविचित्रितम्।
विचरन् गच्छते सम्यक् शादलानि समन्ततः॥
सीता को लुभाने के लिये विविध धातुओं से चित्रित मनोहर एवं दर्शनीय रूप बनाकर वह निशाचर उस रमणीय वन तथा श्रीराम के उस आश्रम को प्रकाशित करता हुआ सब ओर उत्तम घासों को चरने और विचरने लगा॥२०-२१॥
रौप्यैर्बिन्दुशतैश्चित्रं भूत्वा च प्रियदर्शनः।
विटपीनां किसलयान् भक्षयन् विचचार ह॥२२॥
सैकड़ों रजतमय विन्दुओं से युक्त विचित्र रूप धारण करके वह मृग बड़ा प्यारा दिखायी देता था। वह वृक्षों के कोमल पल्लवों को खाता हुआ इधर-उधर विचरने लगा॥२२॥
कदलीगृहकं गत्वा कर्णिकारानितस्ततः।
समाश्रयन् मन्दगतिं सीतासंदर्शनं ततः॥२३॥
केले के बगीचे में जाकर वह कनेरों के कुञ्ज में जा पहुँचा। फिर जहाँ सीता की दृष्टि पड़ सके, ऐसे स्थान में जाकर मन्दगति का आश्रय ले इधर-उधर घूमने लगा॥२३॥
राजीवचित्रपृष्ठः स विरराज महामृगः।
रामाश्रमपदाभ्याशे विचचार यथासुखम्॥२४॥
उसका पृष्ठभाग कमल के केसर की भाँति सुनहरे रंग का होने के कारण विचित्र दिखायी देता था, इससे उस महान् मृग की बड़ी शोभा हो रही थी। श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम के निकट ही वह अपनी मौज से घूम रहा था॥२४॥
पुनर्गत्वा निवृत्तश्च विचचार मृगोत्तमः ।
गत्वा मुहूर्तं त्वरया पुनः प्रतिनिवर्तते॥२५॥
वह श्रेष्ठ मृग कुछ दूर जाकर फिर लौट आता था और वहीं घूमने लगता था। दो घड़ी के लिये कहीं चला जाता और फिर बड़ी उतावली के साथ लौट आता था॥२५॥
विक्रीडंश्च क्वचिद् भूमौ पुनरेव निषीदति।
आश्रमद्वारमागम्य मृगयूथानि गच्छति॥२६॥
वह कहीं खेलता, कूदता और पुनः भूमि पर ही बैठ जाता था, फिर आश्रम के द्वार पर आकर मृगों के झुंड के पीछे-पीछे चल देता॥२६॥
मृगयूथैरनुगतः पुनरेव निवर्तते।
सीतादर्शनमाकांक्षन् राक्षसो मृगतां गतः॥२७॥
तत्पश्चात् झुंड-के-झुंड मृगों को साथ लिये फिर लौट आता था। उस मृगरूपधारी राक्षस के मन में केवल यह अभिलाषा थी कि किसी तरह सीता की दृष्टि मुझ पर पड़ जाय॥२७॥
परिभ्रमति चित्राणि मण्डलानि विनिष्पतन्।
समुद्रीक्ष्य च सर्वे तं मृगा येऽन्ये वनेचराः॥२८॥
उपगम्य समाघ्राय विद्रवन्ति दिशो दश।
सीता के समीप आते समय वह विचित्र मण्डल(पैंतरे) दिखाता हुआ चारों ओर चक्कर लगाता था। उस वन में विचरने वाले जो दूसरे मृग थे, वे सब उसे देखकर पास आते और उसे सूंघकर दसों दिशाओं में भाग जाते थे॥२८ १/२॥
राक्षसः सोऽपि तान् वन्यान् मृगान् मृगवधे रतः॥२९॥
प्रच्छादनार्थं भावस्य न भक्षयति संस्पृशन्।
राक्षस मारीच यद्यपि मृगों के वध में ही तत्पर रहता था तथापि उस समय अपने भाव को छिपाने के लिये उन वन्य मृगों का स्पर्श करके भी उन्हें खाता नहीं था॥२९ १/२॥
तस्मिन् नेव ततः काले वैदेही शुभलोचना॥३०॥
कुसुमापचये व्यग्रा पादपानत्यवर्तत।
कर्णिकारानशोकांश्च चूतांश्च मदिरेक्षणा॥३१॥
उसी समय मदभरे सुन्दर नेत्रोंवाली विदेहनन्दिनी सीता, जो फूल चुनने में लगी हुई थीं, कनेर, अशोक और आम के वृक्षों को लाँघती हुई उधर आ निकलीं॥३०-३१ १/२॥
कुसुमान्यपचिन्वन्ती चचार रुचिरानना।
अनर्हा वनवासस्य सा तं रत्नमयं मृगम्॥३२॥
मुक्तामणिविचित्राङ्गं ददर्श परमाङ्गना।
फूलों को चुनती हुई वे वहीं विचरने लगीं। उनका मुख बड़ा ही सुन्दर था। वे वनवास का कष्ट भोगने के योग्य नहीं थीं। परम सुन्दरी सीता ने उस रत्नमय मृग को देखा, जिसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग मुक्तामणियों से चित्रित-सा जान पड़ता था॥३२ १/२॥
तं वै रुचिरदन्तोष्ठं रूप्यधातुतनूरुहम्॥३३॥
विस्मयोत्फुल्लनयना सस्नेहं समुदैक्षत।
उसके दाँत और ओठ बड़े सुन्दर थे तथा शरीर के रोएँ चाँदी एवं ताँबे आदि धातुओं के बने हुए जान पड़ते थे। उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही सीताजी की आँखें आश्चर्य से खिल उठीं और वे बड़े स्नेह से उसकी ओर निहारने लगीं॥३३ १/२॥
स च तां रामदयितां पश्यन् मायामयो मृगः॥३४॥
विचचार ततस्तत्र दीपयन्निव तद् वनम्।
वह मायामय मृग भी श्रीराम की प्राणवल्लभा सीता को देखता और उस वन को प्रकाशित-सा करता हुआ वहीं विचरने लगा॥३४ १/२॥
अदृष्टपूर्वं दृष्ट्वा तं नानारत्नमयं मृगम्।
विस्मयं परमं सीता जगाम जनकात्मजा॥३५॥
सीता ने वैसा मृग पहले कभी नहीं देखा था। वह नाना प्रकार के रत्नों का ही बना जान पड़ता था। उसे देखकर जनककिशोरी सीता को बड़ा विस्मय हुआ। ३५॥
सर्ग ४३
सा तं सम्प्रेक्ष्य सुश्रोणी कुसुमानि विचिन्वती।
हेमराजतवर्णाभ्यां पार्वाभ्यामुपशोभितम्॥१॥
प्रहृष्टा चानवद्याङ्गी मृष्टहाटकवर्णिनी।
भर्तारमपि चक्रन्द लक्ष्मणं चैव सायुधम्॥२॥
वह मृग सोने और चाँदी के समान कान्तिवाले पार्श्व-भागों से सुशोभित था। शुद्ध सुवर्ण के समान कान्ति तथा निर्दोष अङ्गोंवाली सुन्दरी सीता फूल चुनते-चुनते ही उस मृग को देखकर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं और अपने पति श्रीराम तथा देवर लक्ष्मण को हथियार लेकर आने के लिये पुकारने लगीं॥१-२॥
आहूयाहूय च पुनस्तं मृगं साधु वीक्षते।
आगच्छागच्छ शीघ्रं वै आर्यपुत्र सहानुज॥३॥
वे बार-बार उन्हें पुकारती और फिर उस मृग को अच्छी तरह देखने लगती थीं। वे बोलीं, ‘आर्यपुत्र ! अपने भाई के साथ आइये, शीघ्र आइये’॥३॥
तावाहूतौ नरव्याघ्रौ वैदेह्या रामलक्ष्मणौ।
वीक्षमाणौ तु तं देशं तदा ददृशतुगम्॥४॥
विदेहकुमारी सीता के द्वारा पुकारे जाने पर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ आये और उस स्थान पर सब ओर दृष्टि डालते हुए उन्होंने उस समय उस मृग को देखा॥४॥
शङ्कमानस्तु तं दृष्ट्वा लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।
तमेवैनमहं मन्ये मारीचं राक्षसं मृगम्॥५॥
उसे देखकर लक्ष्मण के मन में संदेह हुआ और वे बोले-’भैया! मैं तो समझता हूँ कि इस मृग के रूप में वह मारीच नाम का राक्षस ही आया है॥५॥
चरन्तो मृगयां हृष्टाः पापेनोपाधिना वने।
अनेन निहता राम राजानः कामरूपिणा॥६॥
‘श्रीराम! स्वेच्छानुसार रूप धारण करने वाले इस पापी ने कपट-वेष बनाकर वन में शिकार खेलने के लिये आये हुए कितने ही हर्षोत्फुल्ल नरेशों का वध किया है॥६॥
अस्य मायाविदो माया मृगरूपमिदं कृतम्।
भानुमत् पुरुषव्याघ्र गन्धर्वपुरसंनिभम्॥७॥
‘पुरुषसिंह! यह अनेक प्रकार की मायाएँ जानता है। इसकी जो माया सुनी गयी है, वही इस प्रकाशमान मृगरूप में परिणत हो गयी है। यह गन्धर्वनगर के समान देखने भर के लिये ही है (इसमें वास्तविकता नहीं है)॥७॥
मृगो ह्येवंविधो रत्नविचित्रो नास्ति राघव।
जगत्यां जगतीनाथ मायैषा हि न संशयः॥८॥
‘रघुनन्दन! पृथ्वीनाथ! इस भूतलपर कहीं भी ऐसा विचित्र रत्नमय मृग नहीं है; अतः निःसंदेह यह माया ही है’॥८॥
एवं ब्रुवाणं काकुत्स्थं प्रतिवार्य शुचिस्मिता।
उवाच सीता संहृष्टा छद्मना हृतचेतना॥९॥
मारीच के छल से जिनकी विचारशक्ति हर ली गयी थी, उन पवित्र मुसकानवाली सीता ने उपर्युक्त बातें कहते हुए लक्ष्मण को रोककर स्वयं ही बड़े हर्ष के साथ कहा-॥९॥
आर्यपुत्राभिरामोऽसौ मृगो हरति मे मनः।
आनयैनं महाबाहो क्रीडार्थं नो भविष्यति॥१०॥
‘आर्यपुत्र ! यह मृग बड़ा ही सुन्दर है। इसने मेरे मन को हर लिया है। महाबाहो! इसे ले आइये। यह हमलोगों के मन-बहलाव के लिये रहेगा॥१०॥
इहाश्रमपदेऽस्माकं बहवः पुण्यदर्शनाः।
मृगाश्चरन्ति सहिताश्चमराः सृमरास्तथा॥११॥
ऋक्षाः पृषतसङ्घाश्च वानराः किन्नरास्तथा।
विहरन्ति महाबाहो रूपश्रेष्ठा महाबलाः॥१२॥
न चान्यः सदृशो राजन् दृष्टः पूर्वं मृगो मया।
तेजसा क्षमया दीप्त्या यथायं मृगसत्तमः॥१३॥
‘राजन्! महाबाहो! यद्यपि हमारे इस आश्रम पर बहुत-से पवित्र एवं दर्शनीय मृग एक साथ आकर चरते हैं तथा सृमर (काली पूँछवाली चवँरी गाय), चमर (सफेद पूँछवाली चवँरी गाय), रीछ, चितकबरे मृगों के झुंड, वानर तथा सुन्दर रूपवाले महाबली किन्नर भी विचरण करते हैं, तथापि आज के पहले मैंने दूसरा कोई ऐसा तेजस्वी, सौम्य और दीप्तिमान् मृग नहीं देखा था, जैसा कि यह श्रेष्ठ मृग दिखायी दे रहा है॥११–१३॥
नानावर्णविचित्राङ्गो रत्नभूतो ममाग्रतः।
द्योतयन् वनमव्यग्रं शोभते शशिसंनिभः॥१४॥
‘नाना प्रकार के रंगों से युक्त होने के कारण इसके अङ्ग विचित्र जान पड़ते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो यह अङ्गों का ही बना हुआ हो। मेरे आगे निर्भय एवं शान्तभाव से स्थित होकर इस वन को प्रकाशित करता हुआ यह चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा है॥१४॥
अहो रूपमहो लक्ष्मीः स्वरसम्पच्च शोभना।
मृगोऽद्भुतो विचित्राङ्गो हृदयं हरतीव मे॥१५॥
‘इसका रूप अद्भुत है। इसकी शोभा अवर्णनीय है। इसकी स्वरसम्पत्ति (बोली) बड़ी सुन्दर है। विचित्र अङ्गों से सुशोभित यह अद्भुत मृग मेरे मन को मोहे लेता है॥१५॥
यदि ग्रहणमभ्येति जीवन् नेव मृगस्तव।
आश्चर्यभूतं भवति विस्मयं जनयिष्यति॥१६॥
‘यदि यह मृग जीते-जी ही आपकी पकड़ में आ जाय तो एक आश्चर्य की वस्तु होगा और सबके हृदय में विस्मय उत्पन्न कर देगा॥१६॥
समाप्तवनवासानां राज्यस्थानां च नः पुनः।
अन्तःपुरे विभूषार्थो मृग एष भविष्यति॥१७॥
‘जब हमारे वनवास की अवधि पूरी हो जायगी और हम पुनः अपना राज्य पा लेंगे, उस समय यह मृग हमारे अन्तःपुर की शोभा बढ़ायेगा॥१७॥
भरतस्यार्यपुत्रस्य श्वश्रूणां मम च प्रभो।
मृगरूपमिदं दिव्यं विस्मयं जनयिष्यति॥१८॥
‘प्रभो! इस मृग का यह दिव्य रूप भरत के, आपके, मेरी सासुओं के और मेरे लिये भी विस्मयजनक होगा॥१८॥
जीवन्न यदि तेऽभ्येति ग्रहणं मृगसत्तमः।
अजिनं नरशार्दूल रुचिरं तु भविष्यति॥१९॥
‘पुरुषसिंह ! यदि कदाचित् यह श्रेष्ठ मृग जीते-जी पकड़ा न जा सके तो इसका चमड़ा ही बहुत सुन्दर होगा॥१९॥
निहतस्यास्य सत्त्वस्य जाम्बूनदमयत्वचि।
शष्पबृस्यां विनीतायामिच्छाम्यहमुपासितुम्॥२०॥
‘घास-फूसकी बनी हुई चटाई पर इस मरे हुए मृग का सुवर्णमय चमड़ा बिछाकर मैं इस पर आपके साथ बैठना चाहती हूँ॥२०॥
कामवृत्तमिदं रौद्रं स्त्रीणामसदृशं मतम्।
वपुषा त्वस्य सत्त्वस्य विस्मयो जनितो मम॥२१॥
‘यद्यपि स्वेच्छा से प्रेरित होकर अपने पति को ऐसे काम में लगाना यह भयंकर स्वेच्छाचार है और साध्वी स्त्रियों के लिये उचित नहीं माना गया है तथापि इस जन्तु के शरीर ने मेरे हृदय में विस्मय उत्पन्न कर दिया है (इसीलिये मैं इसको पकड़ लाने के लिये अनुरोध करती हूँ)’॥२१॥
तेन काञ्चनरोम्णा तु मणिप्रवरशृङ्गिणा।
तरुणादित्यवर्णेन नक्षत्रपथवर्चसा॥२२॥
बभूव राघवस्यापि मनो विस्मयमागतम्।
इति सीतावचः श्रुत्वा दृष्ट्वा च मृगमद्भुतम्॥२३॥
लोभितस्तेन रूपेण सीतया च प्रचोदितः।
उवाच राघवो हृष्टो भ्रातरं लक्ष्मणं वचः॥२४॥
सुनहरी रोमावली, इन्द्रनील मणि के समान सींग, उदयकाल के सूर्य की-सी कान्ति तथा नक्षत्रलोक की भाँति विन्दुयुक्त तेज से सुशोभित उस मृग को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का मन भी विस्मित हो उठा। सीता की पूर्वोक्त बात को सुनकर, उस मृग के अद्भुत रूप को देखकर, उसके उस रूपपर लुभाकर और सीता से प्रेरित होकर हर्ष से भरे हुए श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण से कहा-॥२२–२४॥
पश्य लक्ष्मण वैदेह्याः स्पृहामुल्लसितामिमाम्।
रूपश्रेष्ठतया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति॥२५॥
‘लक्ष्मण! देखो तो सही, विदेहनन्दिनी सीता के मन में इस मृग को पाने के लिये कितनी प्रबल इच्छाजाग उठी है ? वास्तव में इसका रूप है भी बहुत ही सुन्दर। अपने रूप की इस श्रेष्ठता के कारण ही यह मृग आज जीवित नहीं रह सकेगा॥२५॥
न वने नन्दनोद्देशे न चैत्ररथसंश्रये।
कुतः पृथिव्यां सौमित्रे योऽस्य कश्चित् समो मृगः॥२६॥
‘सुमित्रानन्दन! देवराज इन्द्र के नन्दन वन में और कुबेर के चैत्ररथ वन में भी कोई ऐसा मृग नहीं होगा, जो इसकी समानता कर सके। फिर पृथ्वी पर तो हो ही कहाँ से सकता है॥२६॥
प्रतिलोमानुलोमाश्च रुचिरा रोमराजयः।
शोभन्ते मृगमाश्रित्य चित्राः कनकबिन्दुभिः॥२७॥
‘टेढ़ी और सीधी रुचिर रोमावलियाँ इस मृग के शरीर का आश्रय ले सुनहरे विन्दुओं से चित्रित हो बड़ी शोभा पा रही हैं॥२७॥
पश्यास्य जृम्भमाणस्य दीप्तामग्निशिखोपमाम्।
जिह्वां मुखान्निःसरन्तीं मेघादिव शतहदाम्॥२८॥
‘देखो न, जब यह जंभाई लेता है, तब इसके मुख से प्रज्वलित अग्निशिखा के समान दमकती हुई जिह्वा बाहर निकल आती है और मेघ से प्रकट हुई बिजली के समान चमकने लगती है॥२८॥
मसारगल्वर्कमुखः शङ्खमुक्तानिभोदरः।
कस्य नामानिरूप्योऽसौ न मनो लोभयेन्मृगः॥२९॥
‘इसका मुख-सम्पुट इन्द्रनीलमणि के बने हुए चषक (पानपात्र) के समान जान पड़ता है, उदर ङ्केशार और मोती के समान सफेद है। यह अवर्णनीय मृग किसके मन को नहीं लुभा लेगा॥२९॥
कस्य रूपमिदं दृष्ट्वा जाम्बूनदमयप्रभम्।
नानारत्नमयं दिव्यं न मनो विस्मयं व्रजेत्॥३०॥
‘नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित इसके सुनहरी प्रभावाले दिव्य रूप को देखकर किसके मन में विस्मय नहीं होगा॥३०॥
मांसहेतोरपि मृगान् विहारार्थं च धन्विनः।
घ्नन्ति लक्ष्मण राजानो मृगयायां महावने॥३१॥
‘लक्ष्मण! राजालोग बड़े-बड़े वनों में मृगया खेलते समय मांस (मृगचर्म) के लिये और शिकार खेलने का शौक पूरा करने के लिये भी धनुष हाथ में लेकर मृगों को मारते हैं॥३१॥
धनानि व्यवसायेन विचीयन्ते महावने।
धातवो विविधाश्चापि मणिरत्नसुवर्णिनः॥३२॥
‘मृगया के उद्योग से ही राजालोग विशाल वन में धन का भी संग्रह करते हैं; क्योंकि वहाँ मणि, रत्नऔर सुवर्ण आदि से युक्त नाना प्रकार की धातुएँ उपलब्ध होती हैं॥३२॥
तत् सारमखिलं नृणां धनं निचयवर्धनम्।
मनसा चिन्तितं सर्वं यथा शुक्रस्य लक्ष्मण॥३३॥
‘लक्ष्मण! कोश की वृद्धि करने वाला वह वन्य धन मनुष्यों के लिये अत्यन्त उत्कृष्ट होता है। ठीक उसी तरह, जैसे ब्रह्मभाव को प्राप्त हुए पुरुष के लिये मन के चिन्तनमात्र से प्राप्त हुई सारी वस्तुएँ अत्यन्त उत्तम बतायी गयी हैं॥३३॥
अर्थी येनार्थकृत्येन संव्रजत्यविचारयन्।
तमर्थमर्थशास्त्रज्ञाः प्राहुरर्थ्याः सुलक्ष्मण॥३४॥
‘लक्ष्मण! अर्थी मनुष्य जिस अर्थ (प्रयोजन) का सम्पादन करने के लिये उसके प्रति आकृष्ट हो बिना विचारे ही चल देता है, उस अत्यन्त आवश्यक प्रयोजन को ही अर्थसाधन में चतुर एवं अर्थशास्त्र के ज्ञाता विद्वान् ‘अर्थ’ कहते हैं॥३४॥
एतस्य मृगरत्नस्य पराये काञ्चनत्वचि।
उपवेक्ष्यति वैदेही मया सह सुमध्यमा॥३५॥
‘इस रत्नस्वरूप श्रेष्ठ मृग के बहुमूल्य सुनहरे चमड़े पर सुन्दरी विदेहराजनन्दिनी सीता मेरे साथ बैठेगी॥३५॥
न कादली न प्रियकी न प्रवेणी न चाविकी।
भवेदेतस्य सदृशी स्पर्शेऽनेनेति मे मतिः॥३६॥
‘कदली (कोमल ऊँचे चितकबरे और नीलाग्ररोम वाले मृगविशेष), प्रियक (कोमल ऊँचे चिकने और घने रोम वाले मृगविशेष), प्रवेण (विशेष प्रकार के बकरे) और अवि (भेड़) की त्वचा भी स्पर्श करने में इस काञ्चन मृग के छाले के समान कोमल एवं सुखद नहीं हो सकती, ऐसा मेरा विश्वास है।॥३६॥
एष चैव मृगः श्रीमान् यश्च दिव्यो नभश्चरः।
उभावेतौ मृगौ दिव्यौ तारामृगमहीमृगौ॥३७॥
‘यह सुन्दर मृग और वह जो दिव्य आकाशचारी मृग (मृगशिरा नक्षत्र) है, ये दोनों ही दिव्य मृग हैं। इनमें से एक तारामृग और दूसरा महीमृग है॥३७॥१. नक्षत्रलोक में विचरने वाला मृग (मृगशिरा नक्षत्र)। २. दूसरा पृथ्वी पर विचरने वाला काञ्चन मृग॥३७॥
यदि वायं तथा यन्मां भवेद् वदसि लक्ष्मण।
मायैषा राक्षसस्येति कर्तव्योऽस्य वधो मया॥३८॥
‘लक्ष्मण! तुम मुझसे जैसा कह रहे हो यदि वैसा ही यह मृग हो, यदि यह राक्षस की माया ही हो तो भी मुझे उसका वध करना ही चाहिये॥३८॥
एतेन हि नृशंसेन मारीचेनाकृतात्मना।
वने विचरता पूर्वं हिंसिता मुनिपुंगवाः॥३९॥
‘क्योंकि अपवित्र (दुष्ट) चित्तवाले इस क्रूरकर्मा मारीच ने वन में विचरते समय पहले अनेकानेक श्रेष्ठ मुनियों की हत्या की है॥३९॥
उत्थाय बहवोऽनेन मृगयायां जनाधिपाः।
निहताः परमेष्वासास्तस्माद् वध्यस्त्वयं मृगः॥४०॥
‘इसने मृगया के समय प्रकट होकर बहुत-से महाधनुर्धर नरेशों का वध किया है, अतः इस मृग के रूप में इसका भी वध अवश्य करने योग्य है॥४०॥
पुरस्तादिह वातापिः परिभूय तपस्विनः।
उदरस्थो द्विजान् हन्ति स्वगर्भोऽश्वतरीमिव॥४१॥
‘इसी वन में पहले वातापि नामक राक्षस रहता था, जो तपस्वी महात्माओं का तिरस्कार करके कपटपूर्ण उपाय से उनके पेट में पहुँच जाता और जैसे खच्चरी को अपने ही गर्भ का बच्चा नष्ट कर देता है, उसी प्रकार उन ब्रह्मर्षियों को नष्ट कर देता था॥४१॥
स कदाचिच्चिराल्लोभादाससाद महामुनिम्।
अगस्त्यं तेजसा युक्तं भक्ष्यस्तस्य बभूव ह॥४२॥
‘वह वातापि एक दिन दीर्घकाल के पश्चात् लोभवश तेजस्वी महामुनि अगस्त्यजी के पास जा पहुँचा और (श्राद्धकाल में) उनका आहार बन गया। उनके पेट में पहुँच गया॥४२॥
समुत्थाने च तद्पं कर्तुकामं समीक्ष्य तम्।
उत्स्मयित्वा तु भगवान् वातापिमिदमब्रवीत्॥४३॥
‘श्राद्ध के अन्त में जब वह अपना राक्षसरूप प्रकट करने की इच्छा करने लगा—उनका पेट फाड़कर निकल आने को उद्यत हुआ, तब उस वातापि को लक्ष्य करके भगवान् अगस्त्य मुसकराये और उससे इस प्रकार बोले-॥४३॥
त्वयाविगण्य वातापे परिभूताश्च तेजसा।
जीवलोके द्विजश्रेष्ठास्तस्मादसि जरां गतः॥४४॥
‘वातापे! तुमने बिना सोचे-विचारे इस जीव-जगत् में बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अपने तेज से तिरस्कृत किया है, उसी पाप से अब तुम पच गये’॥४४॥
तद् रक्षो न भवेदेव वातापिरिव लक्ष्मण।
मद्विधं योऽतिमन्येत धर्मनित्यं जितेन्द्रियम्॥४५॥
‘लक्ष्मण! जो सदा धर्म में तत्पर रहने वाले मुझ-जैसे जितेन्द्रिय पुरुष का भी अतिक्रमण करे, उस मारीच नामक राक्षस को भी वातापि के समान ही नष्ट हो जाना चाहिये॥४५॥
भवेद्धतोऽयं वातापिरगस्त्येनेव मा गतः।
इह त्वं भव संनद्धो यन्त्रितो रक्ष मैथिलीम्॥४६॥
‘जैसे वातापि अगस्त्य के द्वारा नष्ट हुआ, उसी प्रकार यह मारीच अब मेरे सामने आकर अवश्य ही मारा जायगा। तुम अस्त्र और कवच आदि से सुसज्जित हो जाओ और यहाँ सावधानी के साथ मिथिलेशकुमारी की रक्षा करो॥४६॥
अस्यामायत्तमस्माकं यत् कृत्यं रघुनन्दन।
अहमेनं वधिष्यामि ग्रहीष्याम्यथवा मृगम्॥४७॥
‘रघुनन्दन ! हमलोगों का जो आवश्यक कर्तव्य है, वह सीता की रक्षा के ही अधीन है। मैं इस मृग को मार डालूँगा अथवा इसे जीता ही पकड़ लाऊँगा॥४७॥
यावद् गच्छामि सौमित्रे मृगमानयितुं द्रुतम्।
पश्य लक्ष्मण वैदेह्या मृगत्वचि गतां स्पृहाम्॥४८॥
‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण! देखो, इस मृग का चर्म हस्तगत करने के लिये विदेहनन्दिनी को कितनी उत्कण्ठा हो रही है, इसलिये इस मृग को ले आने के लिये मैं तुरंत ही जा रहा हूँ॥४८॥
त्वचा प्रधानया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति।
अप्रमत्तेन ते भाव्यमाश्रमस्थेन सीतया॥४९॥
यावत् पृषतमेकेन सायकेन निहन्म्यहम्।
हत्वैतच्चर्म चादाय शीघ्रमेष्यामि लक्ष्मण॥५०॥
‘इस मृग को मारने का प्रधान हेतु है, इसके चमड़े को प्राप्त करना। आज इसी के कारण यह मृग जीवित नहीं रह सकेगा। लक्ष्मण! तुम आश्रम पर रहकर सीता के साथ सावधान रहना–सावधानी के साथ तब तक इसकी रक्षा करना, जबतक कि मैं एक ही बाण से इस चितकबरे मृग को मार नहीं डालता हूँ। मारने के पश्चात् इसका चमड़ा लेकर मैं शीघ्र लौट आऊँगा॥४९-५०॥
प्रदक्षिणेनातिबलेन पक्षिणा जटायुषा बुद्धिमता च लक्ष्मण।
भवाप्रमत्तः प्रतिगृह्य मैथिली प्रतिक्षणं सर्वत एव शङ्कितः॥५१॥
‘लक्ष्मण! बुद्धिमान् पक्षी गृध्रराज जटायु बड़े ही बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं। उनके साथ ही यहाँ सदा सावधान रहना। मिथिलेशकुमारी सीता को अपने संरक्षण में लेकर प्रतिक्षण सब दिशाओं में रहने वाले राक्षसों की ओर से चौकन्ने रहना’॥५१॥
सर्ग ४४
तथा तु तं समादिश्य भ्रातरं रघुनन्दनः।
बबन्धासिं महातेजा जाम्बूनदमयत्सरुम्॥१॥
लक्ष्मण को इस प्रकार आदेश देकर रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने सोने की गूंठवाली तलवार कमर में बाँध ली॥१॥
ततस्त्रिविनतं चापमादायात्मविभूषणम्।
आबध्य च कपालौ द्वौ जगामोदग्रविक्रमः॥२॥
तत्पश्चात् महापराक्रमी रघुनाथजी तीन स्थानों में झुके हुए अपने आभूषण रूप धनुष को हाथ में ले पीठ पर दो तरकस बाँधकर वहाँ से चल दिये॥२॥
तं वन्यराजो राजेन्द्रमापतन्तं निरीक्ष्य वै।
बभूवान्तर्हितस्त्रासात् पुनः संदर्शनेऽभवत्॥३॥
राजाधिराज श्रीराम को आते देख वह वन्य मृगों का राजा काञ्चनमृग भय के मारे छिप गया, किंतु फिर तुरंत ही उनके दृष्टिपथ में आ गया॥३॥
बद्धासिर्धनुरादाय प्रदुद्राव यतो मृगः।
तं स्म पश्यति रूपेण द्योतयन्तमिवाग्रतः॥४॥
अवेक्ष्यावेक्ष्य धावन्तं धनुष्पाणिर्महावने।
अतिवृत्तमिवोत्पाताल्लोभयानं कदाचन॥५॥
शङ्कितं तु समुद्घान्तमुत्पतन्तमिवाम्बरम्।
दृश्यमानमदृश्यं च वनोद्देशेषु केषुचित्॥६॥
छिन्नाभैरिव संवीतं शारदं चन्द्रमण्डलम्।
मुहूर्तादेव ददृशे मुहर्दूरात् प्रकाशते॥७॥
तब तलवार बाँधे और धनुष लिये श्रीराम जिस ओर वह मृग था, उसी ओर दौड़े। धनुर्धर श्रीराम ने देखा, वह अपने रूप से सामने की दिशा को प्रकाशित सी कर रहा था। उस महान् वन में वह पीछे की ओर देख-देखकर आगे की ओर भाग रहा था। कभी छलाँगें मारकर बहुत दूर निकल जाता और कभी इतना निकट दिखायी देता कि हाथ से पकड़ लेने का लोभ पैदा कर देता था। कभी डरा हुआ, कभी घबराया हुआ और कभी आकाश में उछलता हुआ दीख पड़ता था। कभी वन के किन्हीं स्थानों में छिपकर अदृश्य हो जाता था, मानो शरद्-ऋतु का चन्द्रमण्डल मेघखण्डों से आवृत हो गया हो। एक ही मुहूर्त में वह निकट दिखायी देता और पुनः बहुत दूर के स्थान चमक उठता था॥४–७॥
दर्शनादर्शनेनैव सोऽपाकर्षत राघवम्।
स दूरमाश्रमस्यास्य मारीचो मृगतां गतः॥८॥
इस तरह प्रकट होता और छिपता हुआ वह मृगरूपधारी मारीच श्रीरघुनाथजी को उनके आश्रम से बहुत दूर खींच ले गया॥८॥
आसीत् क्रुद्धस्तु काकुत्स्थो विवशस्तेन मोहितः।
अथावतस्थे सुश्रान्तश्छायामाश्रित्य शादले॥९॥
उस समय उससे मोहित और विवश होकर श्रीराम कुछ कुपित हो उठे और थककर एक जगह छाया का आश्रय ले हरी-हरी घासवाली भूमिपर खड़े हो गये॥९॥
स तमुन्मादयामास मृगरूपो निशाचरः।
मृगैः परिवृतोऽथान्यैरदूरात् प्रत्यदृश्यत॥१०॥
इस मृगरूपधारी निशाचर ने उन्हें उन्मत्त-सा कर दिया था। थोड़ी ही देर में वह दूसरे मृगों से घिरा हुआ पास ही दिखायी दिया॥१०॥
ग्रहीतुकामं दृष्ट्वा तं पुनरेवाभ्यधावत।
तत्क्षणादेव संत्रासात् पुनरन्तर्हितोऽभवत्॥११॥
श्रीराम मुझे पकड़ना चाहते हैं, यह देखकर वह फिर भागा और भय के मारे पुनः तत्काल ही अदृश्य हो गया॥११॥
पुनरेव ततो दूराद् वृक्षखण्डाद् विनिःसृतः।
दृष्ट्वा रामो महातेजास्तं हन्तुं कृतनिश्चयः॥१२॥
तदनन्तर वह पुनः दूरवर्ती वृक्ष-समूह से होकर निकला। उसे देखकर महातेजस्वी श्रीराम ने मार डालने का निश्चय किया॥१२॥
भूयस्तु शरमुद्धृत्य कुपितस्तत्र राघवः।
सूर्यरश्मिप्रतीकाशं ज्वलन्तमरिमर्दनम्॥१३॥
संधाय सुदृढे चापे विकृष्य बलवबली।
तमेव मृगमुद्दिश्य श्वसन्तमिव पन्नगम्॥१४॥
मुमोच ज्वलितं दीप्तमस्त्रं ब्रह्मविनिर्मितम्।
तब वहाँ क्रोध में भरे हुए बलवान् राघवेन्द्र श्रीराम ने तरकस से सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी एक प्रज्वलित एवं शत्रु-संहारक बाण निकालकर उसे अपने सुदृढ़ धनुष पर रखा और उस धनुष को जोर से खींचकर उस मृग को ही लक्ष्य करके फुफकारते सर्प के समान सनसनाता हुआ वह प्रज्वलित एवं तेजस्वी बाण, जिसे ब्रह्माजी ने बनाया था, छोड़ दिया॥१३-१४॥
शरीरं मृगरूपस्य विनिर्भिद्य शरोत्तमः॥१५॥
मारीचस्यैव हृदयं बिभेदाशनिसंनिभः।
वज्र के समान तेजस्वी उस उत्तम बाण ने मृगरूपधारी मारीच के शरीर को चीरकर उसके हृदय को भी विदीर्ण कर दिया॥१५ १/२॥
तालमात्रमथोत्प्लुत्य न्यपतत् स भृशातुरः॥१६॥
व्यनदद् भैरवं नादं धरण्यामल्पजीवितः।
“उसकी चोट से अत्यन्त आतुर हो वह राक्षस ताड़ के बराबर उछलकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसका जीवन समाप्त हो चला। वह पृथ्वी पर पड़ा-पड़ा भयंकर गर्जना करने लगा॥१६ १/२॥
म्रियमाणस्तु मारीचो जहौ तां कृत्रिमा तनुम्॥१७॥
स्मृत्वा तद्वचनं रक्षो दध्यौ केन तु लक्ष्मणम्।
इह प्रस्थापयेत् सीता तां शून्ये रावणो हरेत्॥१८॥
मरते समय मारीच ने अपने उस कृत्रिम शरीर को त्याग दिया। फिर रावण के वचन का स्मरण करके उस राक्षस ने सोचा, किस उपाय से सीता लक्ष्मण को यहाँ भेज दे और सूने आश्रम से रावण उसे हर ले जाय॥१८ १/२॥
स प्राप्तकालमाज्ञाय चकार च ततः स्वनम्।
सदृशं राघवस्येव हा सीते लक्ष्मणेति च॥१९॥
रावण के बताये हुए उपाय को काम में लाने का अवसर आ गया है—यह समझकर उसने श्रीरामचन्द्रजी के ही समान स्वर में ‘हा सीते! हा लक्ष्मण !’ कहकर पुकारा॥१९॥
तेन मर्मणि निर्विद्धं शरेणानुपमेन हि।
मृगरूपं तु तत् त्यक्त्वा राक्षसं रूपमास्थितः॥२०॥
श्रीराम के अनुपम बाण से उसका मर्म विदीर्ण हो गया था, अतः उस मृगरूप को त्यागकर उसने राक्षसरूप धारण कर लिया॥२०॥
चक्रे स सुमहाकायं मारीचो जीवितं त्यजन्।
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ राक्षसं भीमदर्शनम्॥२१॥
रामो रुधिरसिक्ताङ्गं चेष्टमानं महीतले।
जगाम मनसा सीतां लक्ष्मणस्य वचः स्मरन्॥२२॥
प्राणत्याग करते समय मारीच ने अपने शरीर को बहुत बड़ा बना लिया था। भयंकर दिखायी देने वाले उस राक्षस को भूमिपर पड़कर खून से लथपथ हो धरती पर लोटते और छटपटाते देख श्रीराम को लक्ष्मण की कही हुई बात याद आ गयी और वे मन ही-मन सीता की चिन्ता करने लगे॥२१-२२॥
मारीचस्य तु मायैषा पूर्वोक्तं लक्ष्मणेन तु।
तत् तथा ह्यभवच्चाद्य मारीचोऽयं मया हतः॥२३॥
वे सोचने लगे, ‘अहो! जैसा लक्ष्मण ने पहले कहा था, उसके अनुसार यह वास्तव में मारीच की माया ही थी। लक्ष्मण की बात ठीक निकली। आज मेरे द्वारा यह मारीच ही मारा गया॥२३॥
हा सीते लक्ष्मणेत्येवमाक्रुश्य तु महास्वनम्।
ममार राक्षसः सोऽयं श्रुत्वा सीता कथं भवेत्॥२४॥
लक्ष्मणश्च महाबाहुः कामवस्थां गमिष्यति।
‘परंतु यह राक्षस उच्च स्वर से ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ की पुकार करके मरा है। उसके उस शब्दको सुनकर सीता की कैसी अवस्था हो जायगी और महाबाहु लक्ष्मण की भी क्या दशा होगी?’॥२४ १/२॥
इति संचिन्त्य धर्मात्मा रामो हृष्टतनूरुहः॥२५॥
तत्र रामं भयं तीव्रमाविवेश विषादजम्।
राक्षसं मृगरूपं तं हत्वा श्रुत्वा च तत्स्वनम्॥२६॥
ऐसा सोचकर धर्मात्मा श्रीराम के रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ मृगरूपधारी उस राक्षस को मारकर और उसके उस शब्द को सुनकर श्रीराम के मन में विषादजनित तीव्र भय समा गया॥२५-२६॥
निहत्य पृषतं चान्यं मांसमादाय राघवः।
त्वरमाणो जनस्थानं ससाराभिमुखं तदा॥२७॥
उस लोकविलक्षण मृग का वध करके तपस्वी के उपभोग में आने योग्य फल-मूल आदि लेकर श्रीराम तत्काल ही जनस्थान के निकटवर्ती पञ्चवटी में स्थित अपने आश्रम की ओर बड़ी उतावली के साथ चले॥२७॥
सर्ग ४५
आर्तस्वरं तु तं भर्तुर्विज्ञाय सदृशं वने।
उवाच लक्ष्मणं सीता गच्छ जानीहि राघवम्॥
उस समय वन में जो आर्तनाद हुआ, उसे अपने पति के स्वर से मिलता-जुलता जान श्रीसीताजी लक्ष्मण से बोलीं-’भैया! जाओ, श्रीरघुनाथजी की सुधि लो—उनका समाचार जानो॥१॥
नहि मे जीवितं स्थाने हृदयं वावतिष्ठते।
क्रोशतः परमार्तस्य श्रुतः शब्दो मया भृशम्॥२॥
‘उन्होंने बड़े आर्तस्वर से हमलोगों को पुकारा है। मैंने उनका वह शब्द सुना है। वह बहुत उच्च स्वर से बोला गया था। उसे सुनकर मेरे प्राण और मन अपने स्थान पर नहीं रह गये हैं-मैं घबरा उठी हूँ॥२॥
आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि।
तंक्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम्॥३॥
रक्षसां वशमापन्नं सिंहानामिव गोवृषम्।
न जगाम तथोक्तस्तु भ्रातुराज्ञाय शासनम्॥४॥
‘तुम्हारे भाई वन में आर्तनाद कर रहे हैं। वे कोई शरण-रक्षा का सहारा चाहते हैं। तुम उन्हें बचाओ। ङ्के जल्दी ही अपने भाई के पास दौड़े हुए जाओ। जैसे कोई साँड सिंहों के पंजे में फँस गया हो, उसी प्रकार वे राक्षसों के वश में पड़ गये हैं, अतः जाओ।’ सीताके ऐसा कहने पर भी भाई के आदेश का विचार करके लक्ष्मण नहीं गये॥३-४॥
तमुवाच ततस्तत्र क्षुभिता जनकात्मजा।
सौमित्रे मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि शत्रुवत्॥५॥
यस्त्वमस्यामवस्थायां भ्रातरं नाभिपद्यसे।
इच्छसि त्वं विनश्यन्तं रामं लक्ष्मण मत्कृते॥६॥
उनके इस व्यवहार से वहाँ जनककिशोरी सीता क्षुब्ध हो उठीं और उनसे इस प्रकार बोलीं—’सुमित्राकुमार! तुम मित्र रूप में अपने भाई के शत्रु ही जान पड़ते हो, इसीलिये तुम इस संकट की अवस्था में भी भाई के पास नहीं पहुंच रहे हो। लक्ष्मण ! मैं जानती हूँ, तुम मुझ पर अधिकार करने के लिये इस समय श्रीराम का विनाश ही चाहते हो॥५-६॥
लोभात्तु मत्कृते नूनं नानुगच्छसि राघवम्।
व्यसनं ते प्रियं मन्ये स्नेहो भ्रातरि नास्ति ते॥७॥
‘मेरे लिये तुम्हारे मन में लोभ हो गया है, निश्चय ही इसीलिये तुम श्रीरघुनाथजी के पीछे नहीं जा रहे हो। मैं समझती हूँ, श्रीराम का संकटमें पड़ना ही तुम्हें प्रिय है। तुम्हारे मन में अपने भाई के प्रति स्नेह नहीं है॥७॥
तेन तिष्ठसि विस्रब्धं तमपश्यन् महाद्युतिम्।
किं हि संशयमापन्ने तस्मिन्निह मया भवेत्॥८॥
कर्तव्यमिह तिष्ठन्त्या यत्प्रधानस्त्वमागतः।
‘यही कारण है कि तुम उन महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी को देखने न जाकर यहाँ निश्चिन्त खड़े हो। हाय! जो मुख्यतः तुम्हारे सेव्य हैं, जिनकी रक्षा और सेवा के लिये तुम यहाँ आये हो, यदि उन्हीं के प्राण संकट में पड़ गये तो यहाँ मेरी रक्षा से क्या होगा?’॥८ १/२॥
एवं ब्रुवाणां वैदेहीं बाष्पशोकसमन्विताम्॥९॥
अब्रवील्लक्ष्मणस्त्रस्तां सीतां मृगवधूमिव।
‘विदेहकमारी सीताजी की दशा भयभीत हई हरिणी के समान हो रही थी। उन्होंने शोकमग्न होकर आँसू बहाते हुए जब उपर्युक्त बातें कहीं, तब लक्ष्मण उनसे इस प्रकार बोले-॥९ १/२॥
पन्नगासुरगन्धर्वदेवदानवराक्षसैः॥१०॥
अशक्यस्तव वैदेहि भर्ता जेतुं न संशयः।
‘विदेहनन्दिनि! आप विश्वास करें, नाग, असुर, गन्धर्व, देवता, दानव तथा राक्षस-ये सब मिलकर भी आपके पति को परास्त नहीं कर सकते, मेरे इस कथन में संशय नहीं है॥१० १/२॥
देवि देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु पतत्रिषु॥११॥
राक्षसेषु पिशाचेषु किन्नरेषु मृगेषु च।
दानवेषु च घोरेषु न स विद्येत शोभने॥१२॥
यो रामं प्रतियुध्येत समरे वासवोपमम्।
अवध्यः समरे रामो नैवं त्वं वक्तमर्हसि॥१३॥
‘देवि! शोभने! देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वो, पक्षियों, राक्षसों, पिशाचों, किन्नरों, मृगों तथा घोर दानवों में भी ऐसा कोई वीर नहीं है, जो समराङ्गण में इन्द्र के समान पराक्रमी श्रीराम का सामना कर सके। भगवान् श्रीराम युद्ध में अवध्य हैं, अतएव आपको ऐसी बात ही नहीं कहनी चाहिये॥११–१३॥
न त्वामस्मिन् वने हातुमुत्सहे राघवं विना।
अनिवार्यं बलं तस्य बलैर्बलवतामपि॥१४॥
त्रिभिर्लोकैः समुदितैः सेश्वरैः सामरैरपि।
हृदयं निर्वृतं तेऽस्तु संतापस्त्यज्यतां तव॥१५॥
‘श्रीरामचन्द्रजी की अनुपस्थिति में इस वन के भीतर मैं आपको अकेली नहीं छोड़ सकता। सैनिक-बल से सम्पन्न बड़े-बड़े राजा अपनी सारी सेनाओं के द्वारा भी श्रीराम के बल को कुण्ठित नहीं कर सकते। देवताओं तथा इन्द्र आदि के साथ मिले हुए तीनों लोक भी यदि आक्रमण करें तो वे श्रीराम के बल का वेग नहीं रोक सकते; अतः आपका हृदय शान्त हो। आप संताप छोड़ दें॥१४-१५॥
आगमिष्यति ते भर्ता शीघ्रं हत्वा मृगोत्तमम्।
न स तस्य स्वरो व्यक्तं न कश्चिदपि दैवतः॥१६॥
गन्धर्वनगरप्रख्या माया तस्य च रक्षसः।
‘आपके पतिदेव उस सुन्दर मृग को मारकर शीघ्र ही लौट आयेंगे। वह शब्द जो आपने सुना था, अवश्य ही उनका नहीं था। किसी देवता ने कोई शब्द प्रकट किया हो, ऐसी बात भी नहीं है। वह तो उस राक्षस की गन्धर्वनगर के समान झूठी माया ही थी॥१६ १/२॥
न्यासभूतासि वैदेहि न्यस्ता मयि महात्मना॥१७॥
रामेण त्वं वरारोहे न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे।
‘सुन्दरि! विदेहनन्दिनि! महात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने मुझपर आपकी रक्षा का भार सौंपा है। इस समय आप मेरे पास उनकी धरोहर के रूप में हैं। अतः आपको मैं यहाँ अकेली नहीं छोड़ सकता॥१७ १/२॥
कृतवैराश्च कल्याणि वयमेतैर्निशाचरैः॥१८॥
खरस्य निधने देवि जनस्थानवधं प्रति।
‘कल्याणमयी देवि! जिस समय खर का वध किया गया, उस समय जनस्थान निवासी दूसरे बहुत-से राक्षस भी मारे गये थे, इस कारण इन निशाचरों ने हमारे साथ वैर बाँध लिया है॥१८ १/२॥
राक्षसा विविधा वाचो व्याहरन्ति महावने॥१९॥
हिंसाविहारा वैदेहि न चिन्तयितुमर्हसि।
‘विदेहनन्दिनि! प्राणियों की हिंसा ही जिनका क्रीड़ा-विहार या मनोरञ्जन है, वे राक्षस ही इस विशाल वन में नाना प्रकार की बोलियाँ बोला करते हैं; अतः आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये’॥१९ १/२॥
लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु क्रुद्धा संरक्तलोचना॥२०॥
अब्रवीत् परुषं वाक्यं लक्ष्मणं सत्यवादिनम्।
लक्ष्मण के ऐसा कहने पर सीता को बड़ा क्रोध हुआ, उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे सत्यवादी लक्ष्मण से कठोर बातें कहने लगीं-॥२० १/२॥
अनार्याकरुणारम्भ नृशंस कुलपांसन॥२१॥
अहं तव प्रियं मन्ये रामस्य व्यसनं महत्।
रामस्य व्यसनं दृष्ट्वा तेनैतानि प्रभाषसे॥२२॥
‘अनार्य! निर्दयी! क्रूरकर्मा! कुलाङ्गार! मैं तुझे खूब समझती हूँ। श्रीराम किसी भारी विपत्ति में पड़ जायँ, यही तुझे प्रिय है। इसीलिये तू राम पर संकट आया देखकर भी ऐसी बातें बना रहा है॥२१-२२॥
नैव चित्रं सपनेषु पापं लक्ष्मण यद् भवेत्।
त्वद्विधेषु नृशंसेषु नित्यं प्रच्छन्नचारिषु॥२३॥
‘लक्ष्मण! तेरे-जैसे क्रूर एवं सदा छिपे हुए शत्रुओं के मन में इस तरह का पापपूर्ण विचार होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है॥२३॥
सुदुष्टस्त्वं वने राममेकमेकोऽनुगच्छसि।
मम हेतोः प्रतिच्छन्नः प्रयुक्तो भरतेन वा॥२४॥
‘तू बड़ा दुष्ट है, श्रीराम को अकेले वन में आते देख मुझे प्राप्त करने के लिये ही अपने भाव को छिपाकर तू भी अकेला ही उनके पीछे-पीछे चला आया है, अथवा यह भी सम्भव है कि भरत ने ही तुझे भेजा हो॥२४॥
तन्न सिध्यति सौमित्रे तवापि भरतस्य वा।
कथमिन्दीवरश्यामं रामं पद्मनिभेक्षणम्॥२५॥
उपसंश्रित्य भर्तारं कामयेयं पृथग्जनम्।
‘परंतु सुमित्राकुमार! तेरा या भरत का वह मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता। नीलकमल के समान श्यामसुन्दर कमलनयन श्रीराम को पतिरूप में पाकर मैं दूसरे किसी क्षुद्र पुरुष की कामना कैसे कर सकती हूँ?॥२५॥
समक्षं तव सौमित्रे प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम्॥२६॥
रामं विना क्षणमपि नैव जीवामि भूतले।
‘सुमित्राकुमार! मैं तेरे सामने ही निःसंदेह अपने प्राण त्याग दूंगी, किंतु श्रीराम के बिना एक क्षण भी इस भूतलपर जीवित नहीं रह सकूँगी’॥२६ १/२॥
इत्युक्तः परुषं वाक्यं सीतया रोमहर्षणम्॥२७॥
अब्रवील्लक्ष्मणः सीतां प्राञ्जलिः स जितेन्द्रियः।
उत्तरं नोत्सहे वक्तुं दैवतं भवती मम॥२८॥
सीता ने जब इस प्रकार कठोर तथा रोंगटे खड़े कर देने वाली बात कही, तब जितेन्द्रिय लक्ष्मण हाथ जोड़कर उनसे बोले—’देवि! मैं आपकी बातका जवाब नहीं दे सकता; क्योंकि आप मेरे लिये आराधनीया देवी के समान हैं॥२७-२८॥
वाक्यमप्रतिरूपं तु न चित्रं स्त्रीषु मैथिलि।
स्वभावस्त्वेष नारीणामेषु लोकेषु दृश्यते॥२९॥
‘मिथिलेशकुमारी! ऐसी अनुचित और प्रतिकूल बातें मुँह से निकालना स्त्रियों के लिये आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि इस संसार में नारियों का ऐसा स्वभाव बहुधा देखा जाता है।॥२९॥
विमुक्तधर्माश्चपलास्तीक्ष्णा भेदकराः स्त्रियः।
न सहे हीदृशं वाक्यं वैदेहि जनकात्मजे॥३०॥
श्रोत्रयोरुभयोर्मध्ये तप्तनाराचसंनिभम्।
‘स्त्रियाँ प्रायः विनय आदि धर्मोंसे रहित, चञ्चल, कठोर तथा घरमें फूट डालनेवाली होती हैं। विदेहकुमारी जानकी! आपकी यह बात मेरे दोनों कानोंमें तपाये हुए लोहेके समान लगी है। मैं ऐसी बात सह नहीं सकता। ३० १/२॥
उपशृण्वन्तु मे सर्वे साक्षिणो हि वनेचराः॥३१॥
न्यायवादी यथा वाक्यमुक्तोऽहं परुषं त्वया।
धिक् त्वामद्य विनश्यन्तीं यन्मामेवं विशङ्कसे॥३२॥
स्त्रीत्वाद् दुष्टस्वभावेन गुरुवाक्ये व्यवस्थितम्।
ङ्केाच्छामि काकुत्स्थः स्वस्ति तेऽस्तु वरानने ३३॥
‘इस वन में विचरने वाले सभी प्राणी साक्षी होकर मेरा कथन सुनें। मैंने न्याययुक्त बात कही है तो भी आपने मेरे प्रति ऐसी कठोर बात अपने मुँह से निकाली है। निश्चय ही आज आपकी बुद्धि मारी गयी है। आप नष्ट होना चाहती हैं। धिक्कार है आपको, जो आप मुझपर ऐसा संदेह करती हैं। मैं बड़े भाई की आज्ञा का पालन करने में दृढ़तापूर्वक तत्पर हूँ और आप केवल नारी होने के कारण साधारण स्त्रियों के दुष्ट स्वभाव को अपनाकर मेरे प्रति ऐसी आशङ्का करती हैं। अच्छा अब मैं वहीं जाता हूँ, जहाँ भैया श्रीराम गये हैं। सुमुखि! आपका कल्याण हो॥३१-३३॥
रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताः।
निमित्तानि हि घोराणि यानि प्रादुर्भवन्ति मे।
अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः॥३४॥
‘विशाललोचने! वन के सम्पूर्ण देवता आपकी रक्षा करें; क्योंकि इस समय मेरे सामने जो बड़े भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उन्होंने मुझे संशय में डाल दिया है। क्या मैं श्रीरामचन्द्रजी के साथ लौटकर पुनः आपको सकुशल देख सकूँगा?’॥३४॥
लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु रुदती जनकात्मजा।
प्रत्युवाच ततो वाक्यं तीव्रबाष्पपरिप्लुता॥३५॥
लक्ष्मण के ऐसा कहने पर जनककिशोरी सीता रोने लगीं। उनके नेत्रों से आँसुओं की तीव्र धारा बह चली। वे उन्हें इस प्रकार उत्तर देती हुई बोलीं-॥३५॥
गोदावरी प्रवेक्ष्यामि हीना रामेण लक्ष्मण।
आबन्धिष्येऽथवा त्यक्ष्ये विषमे देहमात्मनः॥३६॥
पिबामि वा विषं तीक्ष्णं प्रवेक्ष्यामि हताशनम।
न त्वहं राघवादन्यं कदापि पुरुषं स्पृशे॥३७॥
‘लक्ष्मण! मैं श्रीराम से बिछुड़ जाने पर गोदावरी नदी में समा जाऊँगी अथवा गले में फाँसी लगा लूँगी अथवा पर्वत के दुर्गम शिखर पर चढ़कर वहाँ से अपने शरीर को नीचे डाल दूँगी या तीव्र विष पान कर लूँगी अथवा जलती आग में प्रवेश कर जाऊँगी, परंतु श्रीरघुनाथजी के सिवा दूसरे किसी पुरुष का कदापि स्पर्श नहीं करूँगी’॥३६-३७॥
इति लक्ष्मणमाश्रुत्य सीता शोकसमन्विता।
पाणिभ्यां रुदती दुःखादुदरं प्रजघान ह॥३८॥
लक्ष्मण के सामने यह प्रतिज्ञा करके शोकमग्न होकर रोती हुई सीता अधिक दुःख के कारण दोनों हाथों से अपने उदरपर आघात करने लगी छाती पीटने लगीं॥३८॥
तामार्तरूपां विमना रुदन्ती सौमित्रिरालोक्य विशालनेत्राम्।
आश्वासयामास न चैव भर्तुस्तं भ्रातरं किंचिदुवाच सीता॥३९॥
विशाललोचना सीता को आर्त होकर रोती देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने मन-ही-मन उन्हें सान्त्वना दी, परंतु सीता उस समय अपने देवर से कुछ नहीं बोलीं॥३९॥
ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मणः कृताञ्जलिः किंचिदभिप्रणम्य।
अवेक्षमाणो बहुशः स मैथिली जगाम रामस्य समीपमात्मवान्॥४०॥
तब मन को वश में रखने वाले लक्ष्मण ने दोनों हाथ जोड़ कुछ झुककर मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम किया और बारंबार उनकी ओर देखते हुए वे श्रीरामचन्द्रजी के पास चल दिये॥४०॥
सर्ग ४६
तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः।
स विकांक्षन भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव॥१॥
सीता के कठोर वचन कहने पर कुपित हुए लक्ष्मण श्रीराम से मिलने की विशेष इच्छा रखकर शीघ्र ही वहाँ से चल दिये॥१॥
तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः।
अभिचक्राम वैदेही परिव्राजकरूपधृक्॥२॥
लक्ष्मण के चले जाने पर रावण को मौका मिल गया, अतः वह संन्यासी का वेष धारण करके शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता के समीप गया॥२॥
श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही।
वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू॥३॥
वह शरीर पर साफ-सुथरा गेरुए रंग का वस्त्र लपेटे हुए था। उसके मस्तक पर शिखा, हाथ में छाता और पैरों में जूते थे। उसने बायें कंधे पर डंडा रखकर उसमें कमण्डलु लटका रखा था॥३॥
परिव्राजकरूपेण वैदेहीमन्ववर्तत।
तामाससादातिबलो भ्रातृभ्यां रहितां वने॥४॥
अत्यन्त बलवान् रावण उस वन में परिव्राजक का रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण दोनों बन्धुओं से रहित हुई अकेली विदेहकुमारी सीता के पास गया॥४॥
रहितां सूर्यचन्द्राभ्यां संध्यामिव महत्तमः।
तामपश्यत् ततो बालां राजपुत्रीं यशस्विनीम्॥
रोहिणीं शशिना हीनां ग्रहवद् भृशदारुणः।
जैसे सूर्य और चन्द्रमा से हीन हुई संध्या के पास महान् अंधकार उपस्थित हो, उसी प्रकार वह सीता के निकट गया। तदनन्तर जैसे चन्द्रमा से रहित हुई रोहिणी पर अत्यन्त दारुण ग्रह मंगल या शनैश्चर की दृष्टि पड़े, उसी प्रकार उस अतिशय क्रूर रावण ने उस भोली-भाली यशस्विनी राजकुमारी की ओर देखा॥५ १/२॥
तमुग्रं पापकर्माणं जनस्थानगता द्रुमाः॥६॥
संदृश्य न प्रकम्पन्ते न प्रवाति च मारुतः।
शीघ्रस्रोताश्च तं दृष्ट्वा वीक्षन्तं रक्तलोचनम्॥७॥
स्तिमितं गन्तुमारेभे भयाद् गोदावरी नदी।
उस भयंकर पापाचारी को आया देख जनस्थान के वृक्षों ने हिलना बंद कर दिया और हवा का वेग रुक गया। लाल नेत्रों वाले रावण को अपनी ओर दृष्टिपात करते देख तीव्र गति से बहने वाली गोदावरी नदी भय के मारे धीरे-धीरे बहने लगी॥६-७ १/२॥
रामस्य त्वन्तरं प्रेप्सुर्दशग्रीवस्तदन्तरे॥८॥
उपतस्थे च वैदेहीं भिक्षुरूपेण रावणः।
राम से बदला लेने का अवसर ढूँढ़ने वाला दशमुख रावण उस समय भिक्षु रूप से विदेहकुमारी सीता के पास पहुँचा॥८ १/२॥
अभव्यो भव्यरूपेण भर्तारमनुशोचतीम्॥९॥
अभ्यवर्तत वैदेहीं चित्रामिव शनैश्चरः।
उस समय विदेहराजकुमारी सीता अपने पति के लिये शोक और चिन्ता में डूबी हुई थीं। उसी अवस्था में अभव्य रावण भव्य रूप धारण करके उनके सामने उपस्थित हुआ, मानो शनैश्चर ग्रह चित्रा के सामने जा पहुँचा हो॥९ १/२॥
सहसा भव्यरूपेण तृणैः कूप इवावृतः॥१०॥
ङ्केअतिष्ठत् प्रेक्ष्य वैदेही रामपत्नी यशस्विनीम।
जैसे कुआँ तिनकों से ढका हुआ हो, उसी प्रकार भव्य रूप से अपनी अभव्यता को छिपाकर रावण सहसा वहाँ जा पहुंचा और यशस्विनी रामपत्नी वैदेही को देखकर खड़ा हो गया॥१०॥
तिष्ठन् सम्प्रेक्ष्य च तदा पत्नी रामस्य रावणः॥११॥
शुभां रुचिरदन्तोष्ठी पूर्णचन्द्रनिभाननाम्।
आसीनां पर्णशालायां बाष्पशोकाभिपीडिताम्॥१२॥
उस समय रावण वहाँ खड़ा-खड़ा रामपत्नी सीता को देखने लगा। वे बड़ी सुन्दरी थीं। उनके दाँत और ओठ भी सुन्दर थे, मुख पूर्ण चन्द्रमा की शोभा को छीने लेता था। वे पर्णशाला में बैठी हुई शोक से पीड़ित हो आँसू बहा रही थीं॥११-१२॥
स तां पद्मपलाशाक्षीं पीतकौशेयवासिनीम्।
अभ्यगच्छत वैदेहीं हृष्टचेता निशाचरः॥१३॥
वह निशाचर प्रसन्नचित्त हो रेशमी पीताम्बर से सुशोभित कमलनयनी विदेहकुमारी के सामने गया॥१३॥
दृष्ट्वा कामशराविद्धो ब्रह्मघोषमुदीरयन्।
अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपः॥१४॥
उन्हें देखते ही कामदेव के बाणों से घायल हो राक्षसराज रावण वेदमन्त्र का उच्चारण करने लगा और उस एकान्त स्थान में विनीतभाव से उनसे कुछ कहने को उद्यत हुआ॥१४॥
तामुत्तमां त्रिलोकानां पद्महीनामिव श्रियम्।
विभ्राजमानां वपुषा रावणः प्रशशंस ह॥१५॥
त्रिलोकसुन्दरी सीता अपने शरीर से कमल से रहित कमलालया लक्ष्मी की भाँति शोभा पा रही थीं। रावण उनकी प्रशंसा करता हुआ बोला-॥१५॥
रौप्यकाञ्चनवर्णाभे पीतकौशेयवासिनि।
कमलानां शुभां मालां पद्मिनीव च बिभ्रती॥१६॥
‘उत्तम सुवर्ण की-सी कान्तिवाली तथा रेशमी पीताम्बर धारण करने वाली सुन्दरी! (तुम कौन हो?) तुम्हारे मुख, नेत्र, हाथ और पैर कमलों के समान हैं, अतः तुम पद्मिनी (पुष्करिणी) की भाँति कमलों की सुन्दर-सी माला धारण करती हो॥१६॥
हीः श्रीः कीर्तिः शुभा लक्ष्मीरप्सरा वा शुभानने।
भूतिर्वा त्वं वरारोहे रतिर्वा स्वैरचारिणी॥१७॥
‘शुभानने! तुम श्री, ह्री, कीर्ति, शुभस्वरूपा लक्ष्मी अथवा अप्सरा तो नहीं हो? अथवा वरारोहे! तुम भूति या स्वेच्छापूर्वक विहार करने वाली कामदेव की पत्नी रति तो नहीं हो?॥१७॥
समाः शिखरिणः स्निग्धाः पाण्डुरा दशनास्तव।
विशाले विमले नेत्रे रक्तान्ते कृष्णतारके॥१८॥
विशालं जघनं पीनमूरू करिकरोपमौ।
तुम्हारे दाँत बराबर हैं। उनके अग्रभाग कुन्द की कलियों के समान शोभा पाते हैं। वे सब-के-सब चिकने और सफेद हैं। तुम्हारी दोनों आँखें बड़ी-बड़ी और निर्मल हैं। उनके दोनों कोये लाल हैं और पुतलियाँ काली हैं। कटि का अग्रभाग विशाल एवं मांसल है। दोनों जाँधे हाथी की (सूंड़ के) समान शोभा पाती हैं॥१८ १/२॥
एतावुपचितौ वृत्तौ संहतौ सम्प्रगल्भितौ॥१९॥
पीनोन्नतमुखौ कान्तौ स्निग्धतालफलोपमौ।
मणिप्रवेकाभरणौ रुचिरौ ते पयोधरौ॥२०॥
‘तुम्हारे ये दोनों स्तन पुष्ट, गोलाकार, परस्पर सटे हुए, प्रगल्भ, मोटे, उठे हुए मुखवाले, कमनीय, चिकने ताड़फल के समान आकार वाले, परम सुन्दर और श्रेष्ठ मणिमय आभूषणों से विभूषित हैं॥१९-२०॥
चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि।
मनो हरसि मे रामे नदीकूलमिवाम्भसा॥२१॥
‘सुन्दर मुसकान, रुचिर दन्तावली और मनोहर नेत्रवाली विलासिनी रमणी! तुम अपने रूप-सौन्दर्य से मेरे मन को वैसे ही हरे लेती हो, जैसे नदी जल के द्वारा अपने तट का अपहरण करती है॥२१॥
करान्तमितमध्यासि सुकेशे संहतस्तनि।
नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी॥२२॥
‘तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी में आ जाय। केश चिकने और मनोहर हैं। दोनों स्तन एक दूसरे से सटे हुए हैं। सुन्दरी! देवता, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर जाति की स्त्रियों में भी कोई तुम-जैसी नहीं हैसूं२२॥
नैवंरूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले।
रूपमग्रयं च लोकेषु सौकुमार्यं वयश्च ते॥२३॥
इह वासश्च कान्तारे चित्तमुन्माथयन्ति मे।
सा प्रतिक्राम भद्रं ते न त्वं वस्तुमिहार्हसि॥२४॥
‘पृथ्वी पर तो ऐसी रूपवती नारी मैंने आज से पहले कभी देखी ही नहीं थी। कहाँ तो तुम्हारा यह तीनों लोकों में सबसे सुन्दर रूप, सुकुमारता और नयी अवस्था और कहाँ इस दुर्गम वन में निवास! ये सब बातें ध्यान में आते ही मेरे मन को मथे डालती हैं। तुम्हारा कल्याण हो। यहाँ से चली जाओ। तुम यहाँ रहने के योग्य नहीं हो॥२३-२४॥
राक्षसानामयं वासो घोराणां कामरूपिणाम्।
प्रासादाग्राणि रम्याणि नगरोपवनानि च॥२५॥
सम्पन्नानि सुगन्धीनि युक्तान्याचरितुं त्वया।
‘यह तो इच्छानुसार रूप धारण करने वाले भयंकर राक्षसों के रहने की जगह है। तुम्हें तो रमणीय राजमहलों, समृद्धिशाली नगरों और सुगन्धयुक्त उपवनों में निवास करना और विचरना चाहिये॥२५ १/२॥
वरं माल्यं वरं गन्धं वरं वस्त्रं च शोभने॥२६॥
भर्तारं च वरं मन्ये त्वद्युक्तमसितेक्षणे।
‘शोभने! वही पुरुष श्रेष्ठ है, वही गन्ध उत्तम है और वही वस्त्र सुन्दर है, जो तुम्हारे उपयोग में आये। कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरि! मैं उसी को श्रेष्ठ पति मानता हूँ, जिसे तुम्हारा सुखद संयोग प्राप्त हो॥२६ १/२॥
का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा शुचिस्मिते॥२७॥
वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे।
‘पवित्र मुसकान और सुन्दर अङ्गोंवाली देवि! तुम कौन हो? मुझे तो तुम रुद्रों, मरुद्गणों अथवा वसुओं से सम्बन्ध रखने वाली देवी जान पड़ती हो॥२७ १/२॥
नेह गच्छन्ति गन्धर्वा न देवा न च किन्नराः॥२८॥
राक्षसानामयं वासः कथं तु त्वमिहागता।
‘यहाँ गन्धर्व, देवता तथा किन्नर नहीं आते-जाते हैं। यह राक्षसों का निवास स्थान है, फिर तुम कैसे यहाँ आ गयी॥२८ १/२॥
इह शाखामृगाः सिंहा दीपिव्याघ्रमृगा वृकाः॥२९॥
ऋक्षास्तरक्षवः कङ्काः कथं तेभ्यो न बिभ्यसे।
‘यहाँ वानर, सिंह, चीते, व्याघ्र, मृग, भेड़िये, रीछ, शेर और कंक (गीध आदि पक्षी) रहते हैं। तुम्हें इनसे भय क्यों नहीं हो रहा है?॥२९ १/२॥
मदान्वितानां घोराणां कुञ्जराणां तरस्विनाम्॥३०॥
कथमेका महारण्ये न बिभेषि वरानने।
‘वरानने! इस विशाल वन के भीतर अत्यन्त वेगशाली और भयंकर मदमत्त गजराजों के बीच अकेली रहती हुई तुम भयभीत कैसे नहीं होती हो?॥३० १/२॥
कासि कस्य कुतश्च त्वं किं निमित्तं च दण्डकान्॥३१॥
एका चरसि कल्याणि घोरान् राक्षससेवितान्।
‘कल्याणमयी देवि! बताओ, तुम कौन हो? किसकी हो? और कहाँ से आकर किस कारण इस राक्षससेवित घोर दण्डकारण्य में अकेली विचरण करती हो?’॥३१ १/२॥
इति प्रशस्ता वैदेही रावणेन महात्मना॥३२॥
द्विजातिवेषेण हि तं दृष्ट्वा रावणमागतम्।
सर्वैरतिथिसत्कारैः पूजयामास मैथिली॥३३॥
वेशभूषा से महात्मा बनकर आये हुए रावण ने जब विदेहकुमारी सीता की इस प्रकार प्रशंसा की, तब ब्राह्मण वेष में वहाँ पधारे हुए रावण को देखकर मैथिली ने अतिथि-सत्कार के लिये उपयोगी सभी सामग्रियों द्वारा उसका पूजन किया॥३२-३३॥
उपानीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च।
अब्रवीत् सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम्॥३४॥
पहले बैठने के लिये आसन दे, पाद्य (पैर धोने के लिये जल) निवेदन किया। तदनन्तर ऊपर से सौम्य दिखायी देने वाले उस अतिथि को भोजन के लिये निमन्त्रण देते हुए कहा—’ब्रह्मन्! भोजन तैयार है, ग्रहण कीजिये॥३४॥
द्विजातिवेषेण समीक्ष्य मैथिली समागतं पात्रकुसुम्भधारिणम्।
अशक्यमुद्देष्टमुपायदर्शनान्यमन्त्रयद् ब्राह्मणवत् तथागतम्॥३५॥
वह ब्राह्मण के वेष में आया था, कमण्डलु और गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए था। ब्राह्मण-वेष में आये हुए अतिथि की उपेक्षा असम्भव थी। उसकी वेशभूषा में ब्राह्मणत्व का निश्चय कराने वाले चिह्न दिखायी देते थे, अतः उस रूप में आये हुए उस रावण को देखकर मैथिली ने ब्राह्मण के योग्य सत्कार करने के लिये ही उसे निमन्त्रित किया॥३५॥
इयं बृसी ब्राह्मण काममास्यतामिदं च पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति।
इदं च सिद्धं वनजातमुत्तमं त्वदर्थमव्यग्रमिहोपभुज्यताम्॥३६॥
वे बोलीं—’ब्राह्मण! यह चटाई है, इस पर इच्छानुसार बैठ जाइये। यह पैर धोने के लिये जल है, इसे ग्रहण कीजिये और यह वन में ही उत्पन्न हुआ उत्तम फल-मूल आपके लिये ही तैयार करके रखा गया है, यहाँ शान्तभाव से उसका उपभोग कीजिये’॥३६॥
निमन्त्र्यमाणः प्रतिपूर्णभाषिणीं नरेन्द्रपत्नी प्रसमीक्ष्य मैथिलीम्।
प्रसह्य तस्या हरणे दृढं मनः समर्पयामास वधाय रावणः॥३७॥
‘अतिथि के लिये सब कुछ तैयार है’ ऐसा कहकर । सीता ने जब उसे भोजन के लिये निमन्त्रित किया, तब रावण ने ‘सर्वं सम्पन्नम्’ कहने वाली राजरानी मैथिली की ओर देखा और अपने ही वध के लिये उसने हठपूर्वक सीता का हरण करने के निमित्त मन में दृढ़ निश्चय कर लिया॥३७॥
ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा।
निरीक्षमाणा हरितं ददर्श तन्महद् वनं नैव तु रामलक्ष्मणौ॥३८॥
तदनन्तर सीता शिकार खेलने के लिये गये हुए लक्ष्मणसहित अपने सुन्दर वेषधारी पति श्रीरामचन्द्रजी की प्रतीक्षा करने लगीं। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, किंतु उन्हें सब ओर हराभरा विशाल वन ही दिखायी दिया, श्रीराम और लक्ष्मण नहीं दीख पड़े॥३८॥
सर्ग ४७
रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा।
परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना॥१॥
सीता को हरने की इच्छा से परिव्राजक (संन्यासी)का रूप धारण करके आये हुए रावण ने उस समय जब विदेहराजकुमारी से इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने स्वयं ही अपना परिचय दिया॥१॥
ब्राह्मणश्चातिथिश्चैष अनुक्तो हि शपेत माम्।
इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत्॥२॥
वे दो घड़ी तक इस विचार में पड़ी रहीं कि ये ब्राह्मण और अतिथि हैं, यदि इनकी बात का उत्तर न दिया जाय तो ये मुझे शाप दे देंगे। यह सोचकर सीता ने इस प्रकार कहना आरम्भ किया-॥२॥
दुहिता जनकस्याहं मैथिलस्य महात्मनः।
सीता नाम्नास्मि भद्रं ते रामस्य महिषी प्रिया॥२॥
‘ब्रह्मन्! आपका भला हो। मैं मिथिलानरेश महात्मा जनक की पुत्री और अवधनरेश श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी रानी हूँ। मेरा नाम सीता है॥३॥
उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने।
भुजाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥४॥
‘विवाह के बाद बारह वर्षों तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में रहकर मैंने अपने पति के साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं। मैं वहाँ सदा मनोवाञ्छित सुख-सुविधाओं से सम्पन्न रही हूँ॥४॥
तत्र त्रयोदशे वर्षे राजाऽमन्त्रयत प्रभुः।
अभिषेचयितं रामं समेतो राजमन्त्रिभिः॥५॥
‘तेरहवें वर्ष के प्रारम्भ में सामर्थ्यशाली महाराज दशरथ ने राजमन्त्रियों से मिलकर सलाह की और श्रीरामचन्द्रजी का युवराजपद पर अभिषेक करने का निश्चय किया॥५॥
तस्मिन् सम्भ्रियमाणे तु राघवस्याभिषेचने।
कैकेयी नाम भर्तारं ममार्या याचते वरम्॥६॥
‘जब श्रीरघुनाथजी के राज्याभिषेक की सामग्री जुटायी जाने लगी, उस समय मेरी सास कैकेयी ने अपने पति से वर माँगा॥६॥
परिगृह्य तु कैकेयी श्वशुरं सुकृतेन मे।
मम प्रव्राजनं भर्तुर्भरतस्याभिषेचनम्॥७॥
द्वावयाचत भर्तारं सत्यसंधं नृपोत्तमम्।
‘कैकेयी ने मेरे श्वशुर को पुण्य की शपथ दिलाकर वचनबद्ध कर लिया, फिर अपने सत्यप्रतिज्ञ पति उन राजशिरोमणि से दो वर माँगे-मेरे पति के लिये वनवास और भरत के लिये राज्याभिषेक॥७ १/२॥
नाद्य भोक्ष्ये न च स्वप्स्ये न पास्ये न कदाचन॥८॥
एष मे जीवितस्यान्तो रामो यदभिषिच्यते।
‘कैकेयी हठपूर्वक कहने लगीं यदि आज श्रीराम का अभिषेक किया गया तो मैं न तो खाऊँगी, न पीऊँगी और न कभी सोऊँगी ही। यही मेरे जीवन का अन्त होगा॥८ १/२॥
इति ब्रुवाणां कैकेयीं श्वशुरो मे स पार्थिवः
अयाचतार्थैरन्वथैर्न च याच्यां चकार सा॥९॥
‘ऐसी बात कहती हुई कैकेयी से मेरे श्वशुर महाराज दशरथ ने यह याचना की कि ‘तुम सब प्रकार की उत्तम वस्तुएँ ले लो; किंतु श्रीराम के अभिषेक में विघ्न न डालो।’ किंतु कैकेयी ने उनकी वह याचना सफल नहीं की॥९॥
मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः॥१०॥
अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।
‘उस समय मेरे महातेजस्वी पति की अवस्था पचीस साल से ऊपर की थी और मेरे जन्मकाल से लेकर वनगमन काल तक मेरी अवस्था वर्षगणना के अनुसार अठारह साल की हो गयी थी॥१० १/२॥
रामेति प्रथितो लोके सत्यवान् शीलवान् शुचिः॥११॥
विशालाक्षो महाबाहुः सर्वभूतहिते रतः।
‘श्रीराम जगत् में सत्यवादी, सुशील और पवित्र रूप से विख्यात हैं। उनके नेत्र बड़े-बड़े और भुजाएँ विशाल हैं। वे समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहते हैं॥११ १/२॥
कामार्तश्च महाराजः पिता दशरथः स्वयम्॥१२॥
कैकेय्याः प्रियकामार्थं तं रामं नाभ्यषेचयत्।
“उनके पिता महाराज दशरथ ने स्वयं काम पीड़ित होने के कारण कैकेयी का प्रिय करने की इच्छा से श्रीराम का अभिषेक नहीं किया॥१२ १/२॥
अभिषेकाय तु पितुः समीपं राममागतम्॥१३॥
कैकेयी मम भर्तारमित्युवाच द्रुतं वचः।
‘श्रीरामचन्द्रजी जब अभिषेक के लिये पिता के समीप आये, तब कैकेयी ने मेरे उन पतिदेव से तुरंत यह बात कही॥१३ १/२॥
तव पित्रा समाज्ञप्तं ममेदं शृणु राघव॥१४॥
भरताय प्रदातव्यमिदं राज्यमकण्टकम्।
त्वया तु खलु वस्तव्यं नव वर्षाणि पञ्च च॥१५॥
वने प्रव्रज काकुत्स्थ पितरं मोचयानृतात्।
‘रघुनन्दन! तुम्हारे पिता ने जो आज्ञा दी है, इसे मेरे मुँह से सुनो। यह निष्कण्टक राज्य भरत को दिया जायगा, तुम्हें तो चौदह वर्षों तक वन में ही निवास करना होगा। काकुत्स्थ! तुम वन को जाओ और पिता को असत्य के बन्धन से छुड़ाओ॥१४-१५ १/२॥
तथेत्युवाच तां रामः कैकेयीमकुतोभयः॥१६॥
चकार तद्वचः श्रुत्वा भर्ता मम दृढव्रतः।
‘किसी से भी भय न मानने वाले श्रीराम ने कैकेयी की वह बात सुनकर कहा-’बहुत अच्छा’। उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। मेरे स्वामी दृढ़तापूर्वक अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने वाले हैं॥१६ १/२॥
दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम्॥१७॥
एतद् ब्राह्मण रामस्य व्रतं धृतमनुत्तमम्।
‘श्रीराम केवल देते हैं, किसी से कुछ लेते नहीं। वे सदा सत्य बोलते हैं, झूठ नहीं। ब्राह्मण! यह श्रीरामचन्द्रजी का सर्वोत्तम व्रत है, जिसे उन्होंने धारण कर रखा है॥१७ १/२॥
तस्य भ्राता तु वैमात्रो लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥१८॥
रामस्य पुरुषव्याघ्रः सहायः समरेऽरिहा ।
स भ्राता लक्ष्मणो नाम ब्रह्मचारी दृढव्रतः॥१९॥
‘श्रीराम के सौतेले भाई लक्ष्मण बड़े पराक्रमी हैं। समरभूमि में शत्रुओं का संहार करने वाले पुरुषसिंह लक्ष्मण श्रीराम के सहायक हैं, बन्धु हैं, ब्रह्मचारी और उत्तम व्रत का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले हैं॥१८-१९॥
अन्वगच्छद् धनुष्पाणिः प्रव्रजन्तं मया सह।
जटी तापसरूपेण मया सह सहानुजः॥२०॥
प्रविष्टो दण्डकारण्यं धर्मनित्यो दृढव्रतः।
‘श्रीरघुनाथजी मेरे साथ जब वन में आने लगे, तब लक्ष्मण भी हाथ में धनुष लेकर उनके पीछे हो लिये। इस प्रकार मेरे और अपने छोटे भाई के साथ श्रीराम इस दण्डकारण्य में आये हैं। वे दृढ़प्रतिज्ञ तथा नित्यनिरन्तर धर्म में तत्पर रहने वाले हैं और सिरपर जटा धारण किये तपस्वी के वेश में यहाँ रहते हैं॥२० १/२॥
ते वयं प्रच्युता राज्यात् कैकेय्यास्तु कृते त्रयः॥२१॥
विचराम द्विजश्रेष्ठ वनं गम्भीरमोजसा।
समाश्वस मुहूर्तं तु शक्यं वस्तुमिह त्वया॥२२॥
आगमिष्यति मे भर्ता वन्यमादाय पुष्कलम्।
‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार हम तीनों कैकेयी के कारण राज्य से वञ्चित हो इस गम्भीर वन में अपने ही बल के भरोसे विचरते हैं। आप यहाँ ठहर सकें तो दो घड़ी विश्राम करें। अभी मेरे स्वामी प्रचुरमात्रा में जंगली फल-मूल लेकर आते होंगे॥२१-२२ १/२॥
रुरून् गोधान् वराहांश्च हत्वाऽऽदायामिषं बहु॥२३॥
स त्वं नाम च गोत्रं च कुलमाचक्ष्व तत्त्वतः।
एकश्च दण्डकारण्ये किमर्थं चरसि द्विज॥२४॥
‘रुरु, गोह और जंगली सूअर आदि हिंसक पशुओं का वध करके तपस्वी जनों के उपभोग में आने योग्य बहुत-सा फल-मूल लेकर वे अभी आयँगे (उस समय आपका विशेष सत्कार होगा)। ब्रह्मन् ! । अब आप भी अपने नाम-गोत्र और कुल का ठीक ठीक परिचय दीजिये। आप अकेले इस दण्डकारण्य में किसलिये विचरते हैं!’॥२३-२४॥
एवं ब्रुवत्यां सीतायां रामपत्न्यां महाबलः।
प्रत्युवाचोत्तरं तीव्र रावणो राक्षसाधिपः॥२५॥
श्रीरामपत्नी सीता के इस प्रकार पूछने पर महाबली राक्षसराज रावण ने अत्यन्त कठोर शब्दों में उत्तर दिया॥२५॥
येन वित्रासिता लोकाः सदेवासुरमानुषाः।
अहं स रावणो नाम सीते रक्षोगणेश्वरः॥२६॥
‘सीते! जिसके नाम से देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक थर्रा उठते हैं, मैं वही राक्षसों का राजा रावण हूँ॥२६॥
त्वां तु काञ्चनवर्णाभां दृष्ट्वा कौशेयवासिनीम्।
रतिं स्वकेषु दारेषु नाधिगच्छाम्यनिन्दिते॥२७॥
‘अनिन्द्यसुन्दरि! तुम्हारे अङ्गों की कान्ति सुवर्ण के समान है, जिनपर रेशमी साड़ी शोभा पा रही है। तुम्हें देखकर अब मेरा मन अपनी स्त्रियों की ओर नहीं जाता है।॥२७॥
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्ततः।
सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव॥२८॥
‘मैं इधर-उधर से बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियों को हर लाया हूँ। उन सबमें तुम मेरी पटरानी बनो। तुम्हारा भला हो॥२८॥
लङ्का नाम समुद्रस्य मध्ये मम महापुरी।
सागरेण परिक्षिप्ता निविष्टा गिरिमूर्धनि॥२९॥
‘मेरी राजधानी का नाम लङ्का है। वह महापुरी समुद्र के बीच में एक पर्वत के शिखर पर बसी हुई है। समुद्र ने उसे चारों ओर से घेर रखा है॥२९॥
तत्र सीते मया सार्धं वनेषु विचरिष्यसि।
न चास्य वनवासस्य स्पृहयिष्यसि भामिनि॥३०॥
‘सीते! वहाँ रहकर तुम मेरे साथ नाना प्रकार के वनों में विचरण करोगी। भामिनि ! फिर तुम्हारे मन में इस वनवास की इच्छा कभी नहीं होगी॥३०॥
पञ्च दास्यः सहस्राणि सर्वाभरणभूषिताः।
सीते परिचरिष्यन्ति भार्या भवसि मे यदि॥३१॥
‘सीते! यदि तुम मेरी भार्या हो जाओगी तो सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित पाँच हजार दासियाँ सदा तुम्हारी सेवा किया करेंगी’॥३१॥
रावणेनैवमुक्ता तु कुपिता जनकात्मजा।
प्रत्युवाचानवद्याङ्गी तमनादृत्य राक्षसम्॥३२॥
रावण के ऐसा कहने पर निर्दोष अङ्गोंवाली जनकनन्दिनी सीता कुपित हो उठीं और राक्षस का तिरस्कार करके उसे यों उत्तर देने लगीं-॥३२॥
महागिरिमिवाकम्प्यं महेन्द्रसदृशं पतिम्।
महोदधिमिवाक्षोभ्यमहं राममनुव्रता॥३३॥
‘मेरे पतिदेव भगवान् श्रीराम महान् पर्वत के समान अविचल हैं, इन्द्र के तुल्य पराक्रमी हैं और महासागर के समान प्रशान्त हैं, उन्हें कोई क्षुब्ध नहीं कर सकता। मैं तन-मन-प्राण से उन्हीं का अनुसरण करने वाली तथा उन्हीं की अनुरागिणी हूँ॥३३॥
सर्वलक्षणसम्पन्नं न्यग्रोधपरिमण्डलम्।
सत्यसंधं महाभागमहं राममनूव्रता॥३४॥
‘श्रीरामचन्द्रजी समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, वटवृक्ष की भाँति सबको अपनी छाया में आश्रय देने वाले, सत्यप्रतिज्ञ और महान् सौभाग्यशाली हैं। मैं उन्हीं की अनन्य अनुरागिणी हूँ॥३४॥
महाबाहुं महोरस्कं सिंहविक्रान्तगामिनम्।
नृसिंहं सिंहसंकाशमहं राममनुव्रता॥३५॥
‘उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और छाती चौड़ी है। वे सिंह के समान पाँव बढ़ाते हुए बड़े गर्व के साथ चलते हैं और सिंह के ही समान पराक्रमी हैं। मैं उन पुरुषसिंह श्रीराम में ही अनन्य भक्ति रखने वाली हूँ। ३५॥
पूर्णचन्द्राननं रामं राजवत्सं जितेन्द्रियम्।
पृथुकीर्तिं महाबाहुमहं राममनुव्रता॥३६॥
‘राजकुमार श्रीराम का मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर है। वे जितेन्द्रिय हैं और उनका यश महान् है। उन महाबाहु श्रीराम में ही दृढ़तापूर्वक मेरा मन लगा हुआ है॥३६॥
त्वं पुनर्जम्बुकः सिंहीं मामिहेच्छसि दुर्लभाम्।
नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टमादित्यस्य प्रभा यथा॥३७॥
‘पापी निशाचर ! तू सियार है और मैं सिंहिनी हूँ। मैं तेरे लिये सर्वथा दुर्लभ हूँ। क्या तू यहाँ मुझे प्राप्त करने की इच्छा रखता है। अरे! जैसे सूर्य की प्रभा पर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार तू मुझे छू भी नहीं सकता॥३७॥
पादपान् काञ्चनान् नूनं बहून् पश्यसि मन्दभाक्।
राघवस्य प्रियां भार्यां यस्त्वमिच्छसि राक्षस॥३८॥
‘अभागे राक्षस! तेरा इतना साहस! तू श्रीरघुनाथजी की प्यारी पत्नी का अपहरण करना चाहता है! निश्चय ही तुझे बहुत-से सोने के वृक्ष दिखायी देने लगे हैं-अब तू मौत के निकट जा पहुँचा है॥३८॥
क्षुधितस्य च सिंहस्य मृगशत्रोस्तरस्विनः।
आशीविषस्य वदनाद् दंष्ट्रामादातुमिच्छसि॥३९॥
मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं पाणिना हर्तुमिच्छसि।
कालकूटं विषं पीत्वा स्वस्तिमान् गन्तुमिच्छसि॥४०॥
अक्षि सूच्या प्रमृजसि जिह्वया लेढि च क्षुरम्।
राघवस्य प्रियां भार्यामधिगन्तुं त्वमिच्छसि॥४१॥
‘तू श्रीराम की प्यारी पत्नी को हस्तगत करना चाहता है। जान पड़ता है, अत्यन्त वेगशाली मृगवैरी भूखे सिंह और विषधर सर्प के मुख से उनके दाँत तोड़ लेना चाहता है, पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल को हाथ से उठाकर ले जाने की इच्छा करता है, कालकूट विष को पीकर कुशलपूर्वक लौट जाने की अभिलाषा रखता है तथा आँख को सूई से पोंछता और छुरे को जीभसे चाटता है॥३९-४१॥
अवसज्य शिलां कण्ठे समुद्रं तर्तुमिच्छसि।
सूर्याचन्द्रमसौ चोभौ पाणिभ्यां हर्तुमिच्छसि॥४२॥
यो रामस्य प्रियां भार्यां प्रधर्षयितुमिच्छसि।
‘क्या तू अपने गले में पत्थर बाँधकर समुद्र को पार करना चाहता है? सूर्य और चन्द्रमा दोनों को अपने दोनों हाथों से हर लाने की इच्छा करता है? जो श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पत्नी पर बलात् करने को उतारू हुआ है॥४२ १/२॥
अग्निं प्रज्वलितं दृष्ट्वा वस्त्रेणाहर्तुमिच्छसि॥४३॥
कल्याणवृत्तां यो भार्यां रामस्याहर्तुमिच्छसि।
‘यदि तू कल्याणमय आचार का पालन करने वाली श्रीराम की भार्या का अपहरण करना चाहता है तो अवश्य ही जलती हुई आग को देखकर भी तू उसे कपड़े में बाँधकर ले जाने की इच्छा करता है॥४३ १/२॥
अयोमुखानां शूलानामग्रे चरितुमिच्छसि।
रामस्य सदृशीं भार्यां योऽधिगन्तुं त्वमिच्छसि॥४४॥
‘अरे तू श्रीराम की भार्या को, जो सर्वथा उन्हीं के योग्य है, हस्तगत करना चाहता है, तो निश्चय ही लोहमय मुखवाले शूलों की नोक पर चलने की अभिलाषा करता है॥४४॥
यदन्तरं सिंहसृगालयोर्वने यदन्तरं स्यन्दनिकासमुद्रयोः।
सुराग्रयसौवीरकयोर्यदन्तरं तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥४५॥
‘वन में रहने वाले सिंह और सियार में, समुद्र और छोटी नदी में तथा अमृत और काँजी में जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम में और तुझमें है॥। ४५॥
यदन्तरं काञ्चनसीसलोहयोर्यदन्तरं चन्दनवारिपङ्कयोः।
यदन्तरं हस्तिबिडालयोर्वने तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥४६॥
‘सोने और सीसे में, चन्दनमिश्रित जल और कीचड़ में तथा वन में रहने वाले हाथी और बिलाव में जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥४६॥
यदन्तरं वायसवैनतेययोर्यदन्तरं मद्गुमयूरयोरपि।
यदन्तरं हंसकगृध्रयोर्वने तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥४७॥
‘गरुड़ और कौए में, मोर और जलकाक में तथा वनवासी हंस और गीध में जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥४७॥
तस्मिन् सहस्राक्षसमप्रभावे रामे स्थिते कार्मुकबाणपाणौ।
हृतापि तेऽहं न जरां गमिष्ये आज्यं यथा मक्षिकयावगीर्णम्॥४८॥
‘जिस समय सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के समान प्रभावशाली श्रीरामचन्द्रजी हाथ में धनुष और बाण लेकर खड़े हो जायँगे, उस समय तू मेरा अपहरण करके भी मुझे पचा नहीं सकेगा, ठीक उसी तरह जैसे मक्खी घी पीकर उसे पचा नहीं सकती’॥४८॥
इतीव तद्वाक्यमदुष्टभावा सुदुष्टमुक्त्वा रजनीचरं तम्।
गात्रप्रकम्पाद् व्यथिता बभूव वातोद्धता सा कदलीव तन्वी॥४९॥
सीता के मन में कोई दुर्भाव नहीं था तो भी उस राक्षस से यह अत्यन्त दुःखजनक बात कहकर सीता रोष से काँपने लगीं। शरीर के कम्पन से कृशाङ्गी सीता हवा से हिलायी गयी कदली के समान व्यथित हो उठीं॥४९॥
तां वेपमानामुपलक्ष्य सीतां स रावणो मृत्युसमप्रभावः।
कुलं बलं नाम च कर्म चात्मनः समाचचक्षे भयकारणार्थम्॥५०॥
सीता को काँपती देख मौत के समान प्रभाव रखने वाला रावण उनके मन में भय उत्पन्न करने के लिये अपने कुल, बल, नाम और कर्म का परिचय देने लगा॥५०॥
सर्ग ४८
एवं ब्रुवत्यां सीतायां संरब्धः परुषं वचः।
ललाटे भ्रकुटिं कृत्वा रावणः प्रत्युवाच ह॥१॥
सीता के ऐसा कहने पर रावण रोष में भर गया और ललाट में भौहें टेढ़ी करके वह कठोर वाणी में बोला –॥१॥
भ्राता वैश्रवणस्याहं सापत्नो वरवर्णिनि।
रावणो नाम भद्रं ते दशग्रीवः प्रतापवान्॥२॥
‘सुन्दरि! मैं कुबेर का सौतेला भाई परम प्रतापी दशग्रीव रावण हूँ। तुम्हारा भला हो॥२॥
यस्य देवाः सगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः।
विद्रवन्ति सदा भीता मृत्योरिव सदा प्रजाः॥३॥
येन वैश्रवणो भ्राता वैमात्राः कारणान्तरे।
द्वन्द्वमासादितः क्रोधाद् रणे विक्रम्य निर्जितः॥४॥
‘जैसे प्रजा मौत के भय से सदा डरती रहती है, उसी प्रकार देवता, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग सदा जिससे भयभीत होकर भागते हैं, जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेर के साथ द्वन्द्वयुद्ध किया और क्रोधपूर्वक पराक्रम करके रणभूमि में उन्हें परास्त कर दिया था, वही रावण मैं हूँ॥३-४॥
मद्भयार्तः परित्यज्य स्वमधिष्ठानमृद्धिमत्।
कैलास पर्वतश्रेष्ठमध्यास्ते नरवाहनः॥५॥
‘मेरे ही भय से पीड़ित हो नरवाहन कुबेर ने अपनी समृद्धिशालिनी पुरी लङ्का का परित्याग करके इस समय पर्वतश्रेष्ठ कैलास की शरण ली है॥५॥
यस्य तत् पुष्पकं नाम विमानं कामगं शुभम्।
वीर्यादावर्जितं भद्रे येन यामि विहायसम्॥६॥
‘भद्रे! उनका सुप्रसिद्ध पुष्पक नामक सुन्दर विमान, जो इच्छा के अनुसार चलने वाला है, मैंने पराक्रम से जीत लिया है और उसी विमान के द्वारा मैं आकाश में विचरता हूँ॥६॥
मम संजातरोषस्य मुखं दृष्ट्वैव मैथिलि।
विद्रवन्ति परित्रस्ताः सुराः शक्रपुरोगमाः॥७॥
‘मिथिलेशकुमारी! जब मुझे रोष चढ़ता है, उस समय इन्द्र आदि सब देवता मेरा मुँह देखकर ही भय से थर्रा उठते हैं और इधर-उधर भाग जाते हैं॥७॥
यत्र तिष्ठाम्यहं तत्र मारुतो वाति शङ्कितः।
तीव्रांशुः शिशिरांशुश्च भयात् सम्पद्यते दिवि॥८॥
‘जहाँ मैं खड़ा होता हूँ, वहाँ हवा डरकर धीरे-धीरे चलने लगती है। मेरे भय से आकाश में प्रचण्ड किरणों वाला सूर्य भी चन्द्रमा के समान शीतल हो जाता है॥८॥
निष्कम्पपत्रास्तरवो नद्यश्च स्तिमितोदकाः।
भवन्ति यत्र तत्राहं तिष्ठामि च चरामि च॥९॥
‘जिस स्थान पर मैं ठहरता या भ्रमण करता हूँ, वहाँ वृक्षों के पत्ते तक नहीं हिलते और नदियों का पानी स्थिर हो जाता है॥९॥
मम पारे समुद्रस्य लङ्का नाम पुरी शुभा।
सम्पूर्णा राक्षसैोरैर्यथेन्द्रस्यामरावती॥१०॥
‘समुद्र के उस पार लङ्का नामक मेरी सुन्दर पुरी है, जो इन्द्र की अमरावती के समान मनोहर तथा घोरराक्षसों से भरी हुई है॥१०॥
प्राकारेण परिक्षिप्ता पाण्डुरेण विराजिता।
हेमकक्ष्या पुरी रम्या वैदूर्यमयतोरणा॥११॥
‘उसके चारों ओर बनी हुई सफेद चहारदिवारी उस पुरी की शोभा बढ़ाती है। लङ्कापुरी के महलों के दालान, फर्श आदि सोने के बने हैं और उसके बाहरी दरवाजे वैदूर्यमय हैं। वह पुरी बहुत ही रमणीय है॥११॥
हस्त्यश्वरथसम्बाधा तूर्यनादविनादिता।
सर्वकामफलैर्वृक्षैः संकुलोद्यानभूषिता॥१२॥
‘हाथी, घोड़े और रथों से वहाँ की सड़कें भरी रहती हैं। भाँति-भाँति के वाद्यों की ध्वनि गूंजा करती है। सब प्रकार के मनोवाञ्छित फल देने वाले वृक्षों से लङ्कापुरी व्याप्त है। नाना प्रकार के उद्यान उसकी शोभा बढ़ाते हैं॥१२॥
तत्र त्वं वस हे सीते राजपुत्रि मया सह।
न स्मरिष्यसि नारीणां मानुषीणां मनस्विनि॥१३॥
‘राजकुमारी सीते! तुम मेरे साथ उस पुरी में चलकर निवास करो। मनस्विनि! वहाँ रहकर तुम मानवी स्त्रियों को भूल जाओगी॥१३॥
भुञ्जाना मानुषान् भोगान् दिव्यांश्च वरवर्णिनि।
न स्मरिष्यसि रामस्य मानुषस्य गतायुषः॥१४॥
‘सुन्दरि! लङ्का में दिव्य और मानुष-भोगों का उपभोग करती हुई तुम उस मनुष्य राम का कभी स्मरण नहीं करोगी, जिसकी आयु अब समाप्त हो चली है॥१४॥
स्थापयित्वा प्रियं पुत्रं राज्ये दशरथो नृपः।
मन्दवीर्यस्ततो ज्येष्ठः सुतः प्रस्थापितो वनम्॥
तेन किं भ्रष्टराज्येन रामेण गतचेतसा।
करिष्यसि विशालाक्षि तापसेन तपस्विना॥१६॥
‘विशाललोचने! राजा दशरथ ने अपने प्यारे पुत्र को राज्य पर बिठाकर जिस अल्पपराक्रमी ज्येष्ठ पुत्र को वन में भेज दिया, उस राज्यभ्रष्ट, बुद्धिहीन एवं तपस्या में लगे हुए तापस राम को लेकर क्या करोगी?॥१५-१६॥
रक्ष राक्षसभर्तारं कामय स्वयमागतम्।
न मन्मथशराविष्टं प्रत्याख्यातुं त्वमर्हसि॥१७॥
‘यह राक्षसों का स्वामी स्वयं तुम्हारे द्वार पर आया है, तुम इसकी रक्षा करो, इसे मन से चाहो यह कामदेव के बाणों से पीड़ित है। इसे ठुकराना तुम्हारे लिये उचित नहीं है॥१७॥
प्रत्याख्याय हि मां भीरु पश्चात्तापं गमिष्यसि।
चरणेनाभिहत्येव पुरूरवसमर्वशी॥१८॥
‘भीरु ! मुझे ठुकराकर तुम उसी तरह पश्चात्ताप करोगी, जैसे पुरूरवा को लात मारकर उर्वशी पछतायी थी॥१८॥
अङ्गल्या न समो रामो मम युद्धे स मानुषः।
तव भाग्येन सम्प्राप्तं भजस्व वरवर्णिनि॥१९॥
‘सुन्दरि! युद्ध में मनुष्यजातीय राम मेरी एक अङ्गुलि के बराबर भी नहीं है। तुम्हारे भाग्य से मैं आ गया हूँ। तुम मुझे स्वीकार करो’॥१९॥
एवमुक्ता तु वैदेही क्रुद्धा संरक्तलोचना।
अब्रवीत् परुषं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपम्॥२०॥
रावण के ऐसा कहने पर विदेहकुमारी सीता के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने उस एकान्त स्थान में राक्षसराज रावण से कठोर वाणी में कहा-॥२०॥
कथं वैश्रवणं देवं सर्वदेवनमस्कृतम्।
भ्रातरं व्यपदिश्य त्वमशुभं कर्तुमिच्छसि॥२१॥
‘अरे! भगवान् कुबेर तो सम्पूर्ण देवताओं के वन्दनीय हैं। तू उन्हें अपना भाई बताकर ऐसा पापकर्म कैसे करना चाहता है ?॥२१॥
अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः।
येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः॥२२॥
‘रावण! जिनका तुझ-जैसा क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा है, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे॥२२॥
अपहृत्य शची भार्यां शक्यमिन्द्रस्य जीवितुम्।
नहि रामस्य भार्यां मामानीय स्वस्तिमान् भवेत्॥२३॥
‘इन्द्रकी पत्नी शची का अपहरण करके सम्भव है कोई जीवित रह जाय; किंतु रामपत्नी मुझ सीता का हरण करके कोई कुशल से नहीं रह सकता॥२३॥
जीवेच्चिरं वज्रधरस्य पश्चाच्छची प्रधृष्याप्रतिरूपरूपाम्।
न मादृशीं राक्षस धर्षयित्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्षः॥२४॥
‘राक्षस! वज्रधारी इन्द्र की अनुपम रूपवती भार्या शची का तिरस्कार करके सम्भव है कोई उसके बाद भी चिरकाल तक जीवित रह जाय; परंतु मेरी-जैसी स्त्री का अपमान करके तू अमृत पी ले तो भी तुझे जीते-जी छुटकारा नहीं मिल सकता’॥२४॥
सर्ग ४९
सीताया वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान्।
हस्ते हस्तं समाहत्य चकार सुमहद् वपुः॥१॥
सीता के इस वचन को सुनकर प्रतापी दशमुखरावण ने अपने हाथ पर हाथ मारकर शरीर को बहुत बड़ा बना लिया॥
स मैथिली पुनर्वाक्यं बभाषे वाक्यकोविदः।
नोन्मत्तया श्रुतौ मन्ये मम वीर्यपराक्रमौ॥२॥
वह बातचीत करने की कला जानता था। उसने मिथिलेशकुमारी सीता से फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया-’मेरी समझ में तुम पागल हो गयी हो, इसीलिये तुमने मेरे बल और पराक्रम की बातें अनसुनी कर दी हैं॥२॥
उदहेयं भुजाभ्यां तु मेदिनीमम्बरे स्थितः।
आपिबेयं समुद्रं च मृत्युं हन्यां रणे स्थितः॥३॥
‘अरी! मैं आकाश में खड़ा हो इन दोनों भुजाओं से ही सारी पृथ्वी को उठा ले जा सकता हूँ। समुद्र को पी सकता हूँ और युद्ध में स्थित हो मौत को भी मार सकता हूँ॥३॥
अर्कं तुद्यां शरैस्तीक्ष्णैर्विभिन्द्यां हि महीतलम्।
कामरूपेण उन्मत्ते पश्य मां कामरूपिणम्॥४॥
‘काम तथा रूप से उन्मत्त रहने वाली नारी! यदि चाहूँ तो अपने तीखे बाणों से सूर्य को भी व्यथित कर दूँ और इस भूतल को भी विदीर्ण कर डालूँ। मैं इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हूँ तुम मेरी ओर देखो’॥४॥
एवमुक्तवतस्तस्य रावणस्य शिखिप्रभे।
क्रुद्धस्य हरिपर्यन्ते रक्ते नेत्रे बभूवतुः॥५॥
ऐसा कहते-कहते क्रोध से भरे हुए रावण की आँखें, जिनके प्रान्तभाग काले थे, जलती आग के समान लाल हो गयीं॥५॥
सद्यः सौम्यं परित्यज्य तीक्ष्णरूपं स रावणः।
स्वं रूपं कालरूपाभं भेजे वैश्रवणानुजः॥६॥
कुबेर के छोटे भाई रावण ने तत्काल अपने सौम्य रूप को त्यागकर तीखा एवं काल के समान विकराल अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया॥६॥
संरक्तनयनः श्रीमांस्तप्तकाञ्चनभूषणः।
क्रोधेन महताविष्टो नीलजीमूतसंनिभः॥७॥
उस समय श्रीमान् रावण के सभी नेत्र लाल हो रहे थे। वह पक्के सोने के आभूषणों से अलंकृत था और महान् क्रोध से आविष्ट हो नीलमेघ के समान काला दिखायी देने लगा॥७॥
दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचरः।
स परिव्राजकच्छद्म महाकायो विहाय तत्॥८॥
वह विशालकाय निशाचर परिव्राजक के उस छद्मवेश को त्यागकर दस मुखों और बीस भुजाओं से संयुक्त हो गया॥८॥
प्रतिपेदे स्वकं रूपं रावणो राक्षसाधिपः।
रक्ताम्बरधरस्तस्थौ स्त्रीरत्नं प्रेक्ष्य मैथिलीम्॥९॥
उस समय राक्षसराज रावण ने अपने सहज रूप को ग्रहण कर लिया और लाल रंग के वस्त्र पहनकर वह स्त्री-रत्न सीता की ओर देखता हुआ खड़ा हो गया॥९॥
स तामसितकेशान्तां भास्करस्य प्रभामिव।
वसनाभरणोपेतां मैथिली रावणोऽब्रवीत्॥१०॥
काले केशवाली मैथिली वस्त्राभूषणों से विभूषित हो सूर्य की प्रभा-सी जान पड़ती थीं। रावण ने उनसे कहा –॥१०॥
त्रिषु लोकेषु विख्यातं यदि भर्तारमिच्छसि।
मामाश्रय वरारोहे तवाहं सदृशः पतिः॥११॥
‘वरारोहे ! यदि तुम तीनों लोकों में विख्यात पुरुष को अपना पति बनाना चाहती हो तो मेरा आश्रय लो। मैं ही तुम्हारे योग्य पति हूँ॥११॥
मां भजस्व चिराय त्वमहं श्लाघ्यः पतिस्तव।
नैव चाहं क्वचिद् भद्रे करिष्ये तव विप्रियम्॥१२॥
‘भद्रे! मुझे सुदीर्घकाल के लिये स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये स्पृहणीय एवं प्रशंसनीय पति होऊँगा तथा कभी तुम्हारे मन के प्रतिकूल कोई बर्ताव नहीं करूँगा॥१२॥
त्यज्यतां मानुषो भावो मयि भावः प्रणीयताम्।
राज्याच्च्यतमसिद्धार्थं रामं परिमितायुषम्॥१३॥
कैर्गुणैरनुरक्तासि मूढे पण्डितमानिनि।
‘मनुष्य राम के विषय में जो तुम्हारा अनुराग है, उसे त्याग दो और मुझसे स्नेह करो। अपने को पण्डित (बुद्धिमती) मानने वाली मूढ़ नारी! जो राज्य से भ्रष्ट है, जिसका मनोरथ सफल नहीं हुआ तथा जिसकी आयु सीमित है, उस राम में किन गुणों के कारण तुम अनुरक्त हो॥१३ १/२॥
यः स्त्रियो वचनाद् राज्यं विहाय ससुहृज्जनम्॥१४॥
अस्मिन् व्यालानुचरिते वने वसति दुर्मतिः।
‘जो एक स्त्री के कहने से सुहृदोंसहित सारे राज्य का त्याग करके इस हिंसक जन्तुओं से सेवित वन में निवास करता है, उसकी बुद्धि कैसी खोटी है ? (वह सर्वथा मूढ़ है)’॥१४ १/२॥
इत्युक्त्वा मैथिली वाक्यं प्रियाहाँ प्रियवादिनीम्॥१५॥
अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः।
जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीमिव॥१६॥
जो प्रिय वचन सुनने के योग्य और सबसे प्रिय वचन बोलने वाली थीं, उन मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा अप्रिय वचन कहकर काम से मोहित हुए उस अत्यन्त दुष्टात्मा राक्षस रावण ने निकट जाकर (माता के समान आदरणीया) सीता को पकड़ लिया, मानो बुधने आकाश में अपनी माता रोहिणी को पकड़ने का दुस्साहस किया हो॥१५-१६॥
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः।
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना॥१७॥
उसने बायें हाथ से कमलनयनी सीता के केशोंसहित मस्तक को पकड़ा तथा दाहिना हाथ उनकी दोनों जाँघों के नीचे लगाकर उसके द्वारा उन्हें उठा लिया॥१७॥
तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाभुजम्।
प्राद्रवन् मृत्युसंकाशं भयार्ता वनदेवताः॥१८॥
उस समय तीखी दाढ़ों और विशाल भुजाओं से युक्त पर्वतशिखर के समान प्रतीत होने वाले उसकाल के समान विकराल राक्षस को देखकर वन के समस्त देवता भयभीत होकर भाग गये॥१८॥
स च मायामयो दिव्यः खरयुक्तः खरस्वनः।
प्रत्यदृश्यत हेमाङ्गो रावणस्य महारथः॥१९॥
इतने ही में गधों से जुता हुआ और गधों के समान ही शब्द करने वाला रावण का वह विशाल सुवर्णमय मायानिर्मित दिव्य रथ वहाँ दिखायी दिया॥१९॥
ततस्तां परुषैर्वाक्यैरभितर्ध्य महास्वनः।
अंकेनादाय वैदेहीं रथमारोपयत् तदा॥२०॥
रथ के प्रकट होते ही जोर-जोर से गर्जना करने वाले रावण ने कठोर वचनों द्वारा विदेहनन्दिनी सीता को डाँटा और पूर्वोक्त रूप से गोद में उठाकर तत्काल रथपर बिठा दिया॥२०॥
सा गृहीतातिचुक्रोश रावणेन यशस्विनी।
रामेति सीता दुःखार्ता रामं दूरं गतं वने॥२१॥
रावण के द्वारा पकड़ी जाने पर यशस्विनी सीता दुःख से व्याकुल हो गयीं और वन में दूर गये हुए श्रीरामचन्द्रजी को ‘हे राम!’ कहकर जोर-जोर से पुकारने लगीं॥२१॥
तामकामां स कामार्तः पन्नगेन्द्रवधूमिव।
विचेष्टमानामादाय उत्पपाताथ रावणः॥२२॥
सीता के मन में रावण की कामना नहीं थी-वे उसकी ओर से सर्वथा विरक्त थीं और उसकी कैद से अपने को छुड़ाने के लिये चोट खायी हुई नागिन की तरह उस रथ पर छटपटा रही थीं। उसी अवस्था में कामपीड़ित राक्षस उन्हें लेकर आकाश में उड़ चला॥२२॥
ततः सा राक्षसेन्द्रेण ह्रियमाणा विहायसा।
भृशं चक्रोश मत्तेव भ्रान्तचित्ता यथातुरा॥२३॥
राक्षसराज जब सीता को हरकर आकाशमार्ग से ले जाने लगा, उस समय उनका चित्त भ्रमित हो उठा।वे पगली-सी हो गयीं और दुःख से आतुर-सी होकर जोर-जोर से विलाप करने लगीं-॥२३॥
हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक।
ह्रियमाणां न जानीषे रक्षसा कामरूपिणा॥२४॥
‘हा महाबाहु लक्ष्मण! तुम गुरुजनों के मन को प्रसन्न करने वाले हो। इस समय इच्छानुसार रूप धारण करने वाला राक्षस मुझे हरकर लिये जाता है, किंतु तुम्हें इसका पता नहीं है।॥२४॥
जीवितं सुखमर्थं च धर्महेतोः परित्यजन्।
ह्रियमाणामधर्मेण मां राघव न पश्यसि॥२५॥
‘हा रघुनन्दन! आपने धर्म के लिये प्राणों का मोह, शरीर का सुख तथा राज्य-वैभव सब कुछ छोड़ दिया है। यह राक्षस मुझे अधर्मपूर्वक हरकर लिये जा रहा है, परंतु आप नहीं देखते हैं॥२५॥
ननु नामाविनीतानां विनेतासि परंतप।
कथमेवंविधं पापं न त्वं शाधि हि रावणम्॥२६॥
‘शत्रुओं को संताप देनेवाले आर्यपुत्र! आप तो कुमार्ग पर चलने वाले उद्दण्ड पुरुषों को दण्ड देकर उन्हें राह पर लाने वाले हैं, फिर ऐसे पापी रावण को क्यों नहीं दण्ड देते हैं॥२६॥
न तु सद्योऽविनीतस्य दृश्यते कर्मणः फलम्।
कालोऽप्यङ्गीभवत्यत्र सस्यानामिव पक्तये॥२७॥
‘उद्दण्ड पुरुष के उद्दण्डतापूर्ण कर्म का फल तत्काल मिलता नहीं दिखायी देता है; क्योंकि इसमें काल भी सहकारी कारण होता है, जैसे कि खेती के पकने के लिये तदनुकूल समय की अपेक्षा होती है॥२७॥
त्वं कर्म कृतवानेतत् कालोपहतचेतनः।
जीवितान्तकरं घोरं रामाद् व्यसनमाप्नुहि॥२८॥
‘रावण! तेरे सिर पर काल नाच रहा है। उसी ने तेरी विचारशक्ति को नष्ट कर दी है, इसीलिये तूने ऐसा पापकर्म किया है। तुझे श्रीराम से वह भयंकर संकट प्राप्त हो, जो तेरे प्राणों का अन्त कर डाले॥२८॥
हन्तेदानीं सकामा त कैकेयी बान्धवैः सह।
ह्रियेयं धर्मकामस्य धर्मपत्नी यशस्विनः॥२९॥
‘हाय! इस समय कैकेयी अपने बन्धुबान्धवोंसहित सफलमनोरथ हो गयी; क्योंकि धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले यशस्वी श्रीरामकी धर्मपत्नी होकर भी मैं एक राक्षसद्वारा हरी जा रही हूँ॥२९॥
आमन्त्रये जनस्थाने कर्णिकारांश्च पुष्पितान्।
क्षिप्रं रामाय शंसध्वं सीतां हरति रावणः॥३०॥
‘मैं जनस्थान में खिले हुए कनेर वृक्षों से प्रार्थना करती हूँ, तुमलोग शीघ्र ही श्रीराम से कहना कि सीता को रावण हर ले जा रहा है॥३०॥
हंससारससंघुष्टां वन्दे गोदावरी नदीम्।
क्षिप्रं रामाय शंस त्वं सीतां हरति रावणः॥३१॥
‘हंसों और सारसों के कलरवों से मुखरित हुई गोदावरी नदी को मैं प्रणाम करती हूँ। माँ! तुम श्रीराम से शीघ्र ही कह देना, सीता को रावण हर ले जा रहा है॥३१॥
दैवतानि च यान्यस्मिन् वने विविधपादपे।
नमस्करोम्यहं तेभ्यो भर्तुः शंसत मां हृताम्॥३२॥
‘इस वन के विभिन्न वृक्षों पर निवास करने वाले जो-जो देवता हैं, उन सबको मैं नमस्कार करती हूँ। आप सब लोग शीघ्र ही मेरे स्वामी को सूचना दे दें कि आपकी स्त्री को राक्षस हर ले गया॥३२॥
यानि कानिचिदप्यत्र सत्त्वानि विविधानि च।
सर्वाणि शरणं यामि मृगपक्षिगणानि वै॥३३॥
ह्रियमाणां प्रियां भर्तुः प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्।
विवशा ते हृता सीता रावणेनेति शंसत॥३४॥
‘यहाँ पशु-पक्षी आदि जो कोई भी नाना प्रकार के प्राणी रहते हों, उन सबकी मैं शरण लेती हूँ। वे मेरे स्वामी श्रीरामचन्द्रजी से कहें कि जो आपको प्राणों से भी बढ़कर प्रिय थी, वह सीता हरी गयी। आपकी सीता को असहाय अवस्था में रावण हर ले गया॥३३-३४॥
विदित्वा तु महाबाहुरमुत्रापि महाबलः।
आनेष्यति पराक्रम्य वैवस्वतहृतामपि॥३५॥
‘महाबाहु श्रीराम बड़े बलवान् हैं। वे मुझे परलोक में भी गयी हुई जान लें तो यमराज के द्वारा अपहृत होने पर भी मुझको पराक्रमपूर्वक वहाँ से लौटा लायेंगे’॥३५॥
सा तदा करुणा वाचो विलपन्ती सुदुःखिता।
वनस्पतिगतं गृधं ददर्शायतलोचना॥३६॥
उस समय अत्यन्त दुःखी हो करुणाजनक बातें कहकर विलाप करती हुई विशाललोचना सीता ने एक वृक्ष पर बैठे हुए गृध्रराज जटायु को देखा॥३६॥
सा तमुद्रीक्ष्य सुश्रोणी रावणस्य वशंगता।
समाक्रन्दद् भयपरा दुःखोपहतया गिरा॥३७॥
रावण के वश में पड़ जाने के कारण सुन्दरी सीता अत्यन्त भयभीत हो रही थीं। जटायु को देखकर वे दुःखभरी वाणी में करुण क्रन्दन करने लगीं-॥३७॥
जटायो पश्य मामार्य ह्रियमाणामनाथवत्।
अनेन राक्षसेन्द्रेणाकरुणं पापकर्मणा॥३८॥
‘आर्य जटायो! देखिये, यह पापाचारी राक्षसराज अनाथ की भाँति मुझे निर्दयतापूर्वक हरकर लिये जा रहा है॥३८॥
नैष वारयितुं शक्यस्त्वया क्रूरो निशाचरः।
सत्ववाञ्जितकाशी च सायुधश्चैव दुर्मतिः॥३९॥
‘परंतु आप इस क्रूर निशाचर को रोक नहीं सकते; क्योंकि यह बलवान् है, अनेक युद्धों में विजय पाने के कारण इसका दुस्साहस बढ़ा हुआ है। इसके हाथों में हथियार है और इसके मन में दुष्टता भी भरी हुई है॥३९॥
रामाय तु यथातत्त्वं जटायो हरणं मम।
लक्ष्मणाय च तत् सर्वमाख्यातव्यमशेषतः॥४०॥
‘आर्य जटायो! जिस प्रकार मेरा अपहरण हुआ है, यह सब समाचार आप श्रीराम और लक्ष्मण से ज्यों का-ज्यों पूर्णरूप से बता दीजियेगा’॥४०॥
सर्ग ५०
तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे।
निरैक्षद् रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श सः॥१॥
जटायु उस समय सो रहे थे। उसी अवस्था में उन्होंने सीता की वह करुण पुकार सुनी। सुनते ही तुरंत आँख खोलकर उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता तथा रावण को देखा॥१॥
ततः पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः।
वनस्पतिगतः श्रीमान् व्याजहार शुभां गिरम्॥२॥
पक्षियों में श्रेष्ठ श्रीमान् जटायु का शरीर पर्वतशिखर के समान ऊँचा था और उनकी चोंच बड़ी ही तीखी थी। वे पेड़ पर बैठे-ही-बैठे रावण को लक्ष्य करके यह शुभ वचन बोले-॥२॥
दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्यसंश्रयः।
भ्रातस्त्वं निन्दितं कर्म कर्तुं नार्हसि साम्प्रतम्॥३॥
जटायुर्नाम नाम्नाहं गृध्रराजो महाबलः।
‘दशमुख रावण! मैं प्राचीन (सनातन) धर्म में स्थित, सत्यप्रतिज्ञ और महाबलवान् गृध्रराज हूँ। मेरा नाम जटायु है। भैया! इस समय मेरे सामने तुम्हें ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये॥३ १/२॥
राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः॥४॥
लोकानां च हिते युक्तो रामो दशरथात्मजः।
‘दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, इन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी तथा सब लोगों के हित में संलग्न रहने वाले हैं। ४ १/२॥
तस्यैषा लोकनाथस्य धर्मपत्नी यशस्विनी॥५॥
सीता नाम वरारोहा यां त्वं हर्तुमिहेच्छसि।
‘ये उन्हीं जगदीश्वर श्रीराम की यशस्विनी धर्मपत्नी हैं। इन सुन्दर शरीरवाली देवी का नाम सीता है, जिन्हें तुम हरकर ले जाना चाहते हो॥५ १/२॥
कथं राजा स्थितो धर्मे परदारान् परामृशेत्॥६॥
रक्षणीया विशेषेण राजदारा महाबल।
निवर्तय गतिं नीचां परदाराभिमर्शनात्॥७॥
‘अपने धर्म में स्थित रहने वाला कोई भी राजा भला परायी स्त्री का स्पर्श कैसे कर सकता है? महाबली रावण! राजाओं की स्त्रियों की तो सभी को विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिये। परायी स्त्री के स्पर्श से जो नीच गति प्राप्त होनेवाली है, उसे अपने-आपसे दूर हटा दो॥६-७॥
न तत् समाचरेद् धीरो यत् परोऽस्य विगर्हयेत्।
यथाऽऽत्मनस्तथान्येषां दारा रक्ष्या विमर्शनात्॥८॥
‘धीर (बुद्धिमान्) वह कर्म न करे जिसकी दूसरे लोग निन्दा करें। जैसे पराये पुरुषों के स्पर्श से अपनी स्त्री की रक्षा की जाती है, उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों की भी रक्षा करनी चाहिये॥८॥
अर्थं वा यदि वा कामं शिष्टाः शास्त्रेष्वनागतम्।
व्यवस्यन्त्यनुराजानं धर्मं पौलस्त्यनन्दन॥९॥
‘पुलस्त्यकुलनन्दन ! जिनकी शास्त्रों में चर्चा नहीं है ऐसे धर्म, अर्थ अथवा काम का भी श्रेष्ठ पुरुष केवल राजा की देखादेखी आचरण करने लगते हैं (अतःराजा को अनुचित या अशास्त्रीय कर्म में प्रवृत्त नहीं होना चाहिये)॥९॥
राजा धर्मश्च कामश्च द्रव्याणां चोत्तमो निधिः।
धर्मः शुभं वा पापं वा राजमूलं प्रवर्तते॥१०॥
‘राजा धर्म और काम का प्रवर्तक तथा द्रव्यों की उत्तम निधि है, अतः धर्म, सदाचार अथवा पापइन की प्रवृत्ति का मूल कारण राजा ही है॥१०॥
पापस्वभावश्चपलः कथं त्वं रक्षसां वर।
ऐश्वर्यमभिसम्प्राप्तो विमानमिव दुष्कृती॥११॥
‘राक्षसराज! जब तुम्हारा स्वभाव ऐसा पापपूर्ण है और तुम इतने चपल हो, तब पापी को देवताओं के विमान की भाँति तुम्हें यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हो गया?॥
कामस्वभावो यःसोऽसौ न शक्यस्तं प्रमार्जितुम्।
नहि दुष्टात्मनामार्यमावसत्यालये चिरम्॥१२॥
‘जिसके स्वभाव में काम की प्रधानता है, उसके उस स्वभाव का परिमार्जन नहीं किया जा सकता; क्योंकि दुष्टात्माओं के घर में दीर्घकाल के बाद भी पुण्य का आवास नहीं होता॥१२॥
विषये वा पुरे वा ते यदा रामो महाबलः।
नापराध्यति धर्मात्मा कथं तस्यापराध्यसि॥१३॥
‘जब महाबली धर्मात्मा श्रीराम तुम्हारे राज्य अथवा नगर में कोई अपराध नहीं करते हैं, तब तुम उनका अपराध कैसे कर रहे हो?॥१३॥
यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगतः खरः।
अतिवृत्तो हतः पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा॥१४॥
अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रमः।
यस्य त्वं लोकनाथस्य हृत्वा भार्यां गमिष्यसि॥१५॥
‘यदि पहले शूर्पणखा का बदला लेने के लिये चढ़कर आये हुए अत्याचारी खर का अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम ने वध किया तो तुम्हीं । ठीक-ठीक बताओ कि इसमें श्रीराम का क्या अपराध है, जिससे तुम उन जगदीश्वर की पत्नी को हर ले जाना चाहते हो?॥१४-१५॥
क्षिप्रं विसृज वैदेहीं मा त्वा घोरेण चक्षुषा।
दहेद् दहनभूतेन वृत्रमिन्द्राशनिर्यथा॥१६॥
‘रावण! अब शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता को छोड़ दो जिससे श्रीरामचन्द्रजी अपनी अग्नि के समान भयंकर दृष्टि से तुम्हें जलाकर भस्म न कर डालें। जैसे इन्द्र का वज्र वृत्रासुर का विनाश कर डाला था, उसी प्रकार श्रीराम की रोषपूर्ण दृष्टि दग्ध कर डालेगी॥१६॥
सर्पमाशीविषं बद्ध्वा वस्त्रान्ते नावबुध्यसे।
ग्रीवायां प्रतिमुक्तं च कालपाशं न पश्यसि॥१७॥
‘तुमने अपने कपड़े में विषधर सर्प को बाँध लिया है, फिर भी इस बात को समझ नहीं पाते हो। तुमने अपने गले में मौत की फाँसी डाल ली है, फिर भी यह तुम्हें सूझ नहीं रहा है॥१७॥
स भारः सौम्य भर्तव्यो यो नरं नावसादयेत्।
तदन्नमपि भोक्तव्यं जीर्यते यदनामयम्॥१८॥
‘सौम्य! पुरुष को उतना ही बोझ उठाना चाहिये, जो उसे शिथिल न कर दे और वही अन्न भोजन करना चाहिये, जो पेट में जाकर पच जाय, रोग न पैदा करे॥१८॥
यत् कृत्वा न भवेद् धर्मो न कीर्तिर्न यशो ध्रुवम्।
शरीरस्य भवेत् खेदः कस्तत् कर्म समाचरेत्॥१९॥
‘जो कार्य करने से न तो धर्म होता हो, न कीर्ति बढ़ती हो और न अक्षय यश ही प्राप्त होता हो, उल्टे शरीर को खेद हो रहा हो, उस कर्म का अनुष्ठान कौन करेगा?॥१९॥
षष्टिवर्षसहस्राणि जातस्य मम रावण।
पितृपैतामहं राज्यं यथावदनुतिष्ठतः॥२०॥
‘रावण! बाप-दादों से प्राप्त इस पक्षियों के राज्य का विधिवत् पालन करते हुए मुझे जन्म से लेकर अबतक साठ हजार वर्ष बीत गये॥२०॥
वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथः कवची शरी।
न चाप्यादाय कुशली वैदेहीं मे गमिष्यसि॥२१॥
‘अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और तुम नवयुवक हो (मेरे पास कोई युद्ध का साधन नहीं है, किंतु) तुम्हारे पास धनुष, कवच, बाण तथा रथ सब कुछ है, फिर भी तुम सीताको लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे॥२१॥
न शक्तस्त्वं बलाद्धा वैदेहीं मम पश्यतः।
हेतुभिर्यायसंयुक्तैर्बुवां वेदश्रुतीमिव॥२२॥
‘मेरे देखते-देखते तुम विदेहनन्दिनी सीता का बलपूर्वक अपहरण नहीं कर सकते; ठीक उसी तरह जैसे कोई न्यायसङ्गत हेतुओं से सत्य सिद्ध हुई वैदिक श्रुति को अपनी युक्तियों के बलपर पलट नहीं सकता॥२३॥
युध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण।
शयिष्यसे हतो भूमौ यथा पूर्वं खरस्तथा॥२३॥
‘रावण! यदि शूरवीर हो तो युद्ध करो। मेरे सामने दो घड़ी ठहर जाओ; फिर जैसे पहले खर मारा गया था, उसी प्रकार तुम भी मेरे द्वारा मारे जाकर सदा के लिये सो जाओगे॥२३॥
असकृत्संयुगे येन निहता दैत्यदानवाः।
न चिराच्चीरवासास्त्वां रामो युधि वधिष्यति॥२४॥
‘जिन्होंने युद्ध में अनेक बार दैत्यों और दानवों का वध किया है, वे चीरवस्त्रधारी भगवान् श्रीराम तुम्हारा भी शीघ्र ही युद्धभूमि में विनाश करेंगे॥२४॥
किं नु शक्यं मया कर्तुं गतौ दूरं नृपात्मजौ।
क्षिप्रं त्वं नश्यसे नीच तयोर्भातो न संशयः॥२५॥
‘इस समय मैं क्या कर सकता हूँ, वे दोनों राजकुमार बहुत दूर चले गये हैं। नीच! (यदि मैं उन्हें बुलाने जाऊँ तो) तुम उन दोनों से भयभीत होकर शीघ्र ही भाग जाओगे (आँखों से ओझल हो जाओगे), इसमें संशय नहीं है॥२५॥
नहि मे जीवमानस्य नयिष्यसि शुभामिमाम्।
सीतां कमलपत्राक्षीं रामस्य महिषीं प्रियाम्॥२६॥
‘कमल के समान नेत्रोंवाली ये शुभलक्षणा सीता श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पटरानी हैं। इन्हें मेरे जीते-जी तुम नहीं ले जाने पाओगे॥२६॥
अवश्यं त् मया कार्यं प्रियं तस्य महात्मनः।
जीवितेनापि रामस्य तथा दशरथस्य च॥२७॥
‘मुझे अपने प्राण देकर भी महात्मा श्रीराम तथा राजा दशरथ का प्रिय कार्य अवश्य करना होगा। २७॥
तिष्ठ तिष्ठ दशग्रीव मुहूर्तं पश्य रावण।
वृन्तादिव फलं त्वां तु पातयेयं रथोत्तमात्।
युद्धातिथ्यं प्रदास्यामि यथाप्राणं निशाचर॥२८॥
‘दशमुख रावण! ठहरो, ठहरो! केवल दो घड़ी रुक जाओ, फिर देखो, जैसे डंठल से फल गिरता है, उसी प्रकार तुम्हें इस उत्तम रथ से नीचे गिराये देता हूँ। निशाचर! अपनी शक्ति के अनुसार युद्ध में मैं तुम्हारा पूरा आतिथ्य-सत्कार करूँगा–तुम्हें भलीभाँति भेंट पूजा दूंगा’॥२८॥
सर्ग ५१
इत्युक्तः क्रोधताम्राक्षस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।
राक्षसेन्द्रोऽभिदुद्राव पतगेन्द्रममर्षणः॥१॥
जटायु के ऐसा कहने पर राक्षसराज रावण क्रोध से आँखें लाल किये अमर्ष में भरकर उन पक्षिराज की ओर दौड़ा। उस समय उसके कानों में तपाये हुए सोने के कुण्डल झलमला रहे थे॥१॥
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोस्तस्मिन् महामृधे।
बभूव वातो तयोर्मेघयोर्गगने यथा॥२॥
उस महासमर में उन दोनों का एक-दूसरे पर भयंकर प्रहार होने लगा, मानो आकाश में वायु से उड़ाये गये दो मेघखण्ड आपस में टकरा गये हों॥२॥
तद् बभूवाद्भुतं युद्धं गृध्रराक्षसयोस्तदा।
सपक्षयोर्माल्यवतोर्महापर्वतयोरिव॥३॥
उस समय गृध्र और राक्षस में वह बड़ा अद्भुत युद्ध होने लगा, मानो दो पंखधारी माल्यवान् पर्वत एक दूसरे से भिड़ गये हों॥३॥
ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः ।
अभ्यवर्षन्महाघोरैर्गृध्रराजं महाबलम्॥४॥
रावण ने महाबली गृध्रराज जटायुपर नालीक, नाराच तथा तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक महाभयंकर अस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी॥४॥
स तानि शरजालानि गृध्रः पत्ररथेश्वरः।
जटायुः प्रतिजग्राह रावणास्त्राणि संयुगे॥५॥
पक्षिराज गृध्रजातीय जटायु ने युद्ध में रावण के उन बाणसमूहों तथा अन्य अस्त्रों का आघात सह लिया॥५॥
तस्य तीक्ष्णनखाभ्यां तु चरणाभ्यां महाबलः।
चकार बहुधा गात्रे व्रणान् पतगसत्तमः॥६॥
साथ ही उन महाबली पक्षिशिरोमणि ने अपने तीखे नखोंवाले पंजों से मार-मारकर रावण के शरीर में बहुत से घाव कर दिये॥६॥
अथ क्रोधाद दशग्रीवो जग्गाह दशा मागणाना
मृत्युदण्डनिभान् घोरान् शत्रोर्निधनकांक्षया॥७॥
तब दशग्रीव ने क्रोध में भरकर अपने शत्रु को मार डालने की इच्छा से दस बाण हाथ में लिये, जो कालदण्ड के समान भयंकर थे॥७॥
स तैर्बाणैर्महावीर्यः पूर्णमुक्तैरजिह्मगैः।
बिभेद निशितैस्तीक्ष्णैर्गुरूं घोरैः शिलीमुखैः॥८॥
महापराक्रमी रावण ने धनुष को पूर्णतः खींचकर छोड़े गये उन सीधे जाने वाले तीखे, पैने और भयंकर बाणों द्वारा, जिनके मुखपर शल्य (काँटे) लगे हुए थे। गृध्रराज को क्षत-विक्षत कर दिया॥८॥
स राक्षसरथे पश्यञ्जानकी बाष्पलोचनाम्।
अचिन्तयित्वा बाणांस्तान् राक्षसं समभिद्रवत्॥९॥
जटायु ने देखा, जनकनन्दिनी सीता राक्षस के रथ पर बैठी हैं और नेत्रों से आँसू बहा रही हैं। उन्हें देखकर गृध्रराज अपने शरीर में लगते हुए उन बाणों की परवा न करके सहसा उस राक्षस पर टूट पड़े॥९॥
ततोऽस्य सशरं चापं मुक्तामणिविभूषितम्।
चरणाभ्यां महातेजा बभञ्ज पतगोत्तमः॥१०॥
महातेजस्वी पक्षिराज जटायु ने मोती-मणियों से विभूषित, बाणसहित रावण के धनुष को अपने दोनों पैरों से मारकर तोड़ दिया॥१०॥
ततोऽन्यद् धनुरादाय रावणः क्रोधमूर्च्छितः।
ववर्ष शरवर्षाणि शतशोऽथ सहस्रशः॥११॥
फिर तो रावण क्रोध से भर गया और दूसरा धनुष हाथ में लेकर उसने सैकड़ों-हजारों बाणों की झड़ी लगा दी॥११॥
शरैरावारितस्तस्य संयुगे पतगेश्वरः।
कुलायमभिसम्प्राप्तः पक्षिवच्च बभौ तदा॥१२॥
उस समय उस युद्धस्थल में गृध्रराज के चारों ओर बाणों का जाल-सा तन गया। वे उस समय घोंसले में बैठे हुए पक्षी के समान प्रतीत होने लगे॥१२॥
स तानि शरजालानि पक्षाभ्यां तु विधूय ह।
चरणाभ्यां महातेजा बभञ्जास्य महद् धनुः॥१३॥
तब महातेजस्वी जटायु ने अपने दोनों पंखों से ही उन बाणों को उड़ा दिया और पंजों की मार से पुनः उसके धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥१३॥
तच्चाग्निसदृशं दीप्तं रावणस्य शरावरम्।
पक्षाभ्यां च महातेजा व्यधुनोत् पतगेश्वरः॥१४॥
रावणका कवच अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था। महातेजस्वी पक्षिराज ने उसे भी पंखों से ही मारकर छिन्न-भिन्न कर दिया॥१४॥
काञ्चनोरश्छदान् दिव्यान् पिशाचवदनान् खरान्।
तांश्चास्य जवसम्पन्नाञ्जघान समरे बली॥१५॥
तत्पश्चात् उन बलवान् वीर ने समराङ्गण में पिशाच के-से मुखवाले उन वेगशाली गधों को भी, जिनकी छाती पर सोने के कवच बँधे हुए थे, मार डाला॥१५॥
अथ त्रिवेणुसम्पन्नं कामगं पावकार्चिषम्।
मणिसोपानचित्राङ्गं बभञ्ज च महारथम्॥१६॥
तदनन्तर अग्नि की भाँति दीप्तिमान्, मणिमय सोपान से विचित्र अङ्गोंवाले तथा इच्छानुसार चलने वाले उसके त्रिवेणुसम्पन्न विशाल रथ को भी तोड़-फोड़ डाला॥१६॥
पूर्णचन्द्रप्रतीकाशं छत्रं च व्यजनैः सह।
पातयामास वेगेन ग्राहिभी राक्षसैः सह॥१७॥
सारथेश्चास्य वेगेन तुण्डेन च महच्छिरः।
पुनर्व्यपहनच्छ्रीमान् पक्षिराजो महाबलः॥१८॥
इसके बाद पूर्ण चन्द्रमा की भाँति सुशोभित छत्र और चवँर को भी उन्हें धारण करने वाले राक्षसों के साथ ही वेगपूर्वक मार गिराया। फिर उन महाबली तेजस्वी पक्षिराज ने बड़े वेग से चोंच मारकर रावण के सारथि का विशाल मस्तक भी धड़ से अलग कर दिया॥१७-१८॥
स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।
अङ्केनादाय वैदेहीं पपात भुवि रावणः॥१९॥
इस प्रकार जब धनुष टूटा, रथ चौपट हुआ, घोड़े मारे गये और सारथि भी काल के गाल में चला गया, तब रावण सीता को गोद में लिये-लिये पृथ्वी पर गिर पड़ा॥१९॥
दृष्ट्वा निपतितं भूमौ रावणं भग्नवाहनम्।
साधु साध्विति भूतानि गृध्रराजमपूजयन्॥२०॥
रथ टूट जाने से रावण को धरती पर पड़ा देख सब प्राणी ‘साधु-साधु’ कहकर गृध्रराज की प्रशंसा करने लगे॥२०॥
परिश्रान्तं तु तं दृष्ट्वा जरया पक्षियूथपम्।
उत्पपात पुनहष्टो मैथिली गृह्य रावणः॥२१॥
वृद्धावस्था के कारण पक्षिराज को थका हुआ देख रावण को बड़ा हर्ष हुआ और वह मैथिली को लिये हुए फिर आकाश में उड़ चला॥२१॥
तं प्रहृष्टं निधायाङ्के रावणं जनकात्मजाम्।
गच्छन्तं खड्गशेषं च प्रणष्टहतसाधनम्॥२२॥
गृध्रराजः समुत्पत्य रावणं समभिद्रवत्।
समावार्य महातेजा जटायुरिदमब्रवीत्॥२३॥
जनककिशोरी को गोद में लेकर जब रावण प्रसन्नतापूर्वक जाने लगा, उस समय उसके अन्य सब साधन तो नष्ट हो गये थे, किंतु एक तलवार उसके पास शेष रह गयी थी। उसे जाते देख महातेजस्वी गृध्रराज जटायु उड़कर रावण की ओर दौड़े और उसे रोककर इस प्रकार बोले-॥२२-२३॥
वज्रसंस्पर्शबाणस्य भार्यां रामस्य रावण।
अल्पबुद्धे हरस्येनां वधाय खलु रक्षसाम्॥२४॥
‘मन्दबुद्धि रावण! जिनके बाणों का स्पर्श वज्र के समान है, उन श्रीराम की इन धर्मपत्नी सीता को तुम अवश्य राक्षसों के वध के लिये ही लिये जा रहे हो॥२४॥
समित्रबन्धुः सामात्यः सबलः सपरिच्छदः।
विषपानं पिबस्येतत् पिपासित इवोदकम्॥२५॥
‘जैसे प्यासा मनुष्य जल पी रहा हो, उसी प्रकार तुम मित्र, बन्धु, मन्त्री, सेना तथा परिवारसहित यह विषपान कर रहे हो॥२५॥
अनुबन्धमजानन्तः कर्मणामविचक्षणाः।
शीघ्रमेव विनश्यन्ति यथा त्वं विनशिष्यसि॥२६॥
‘अपने कर्मों का परिणाम न जानने वाले अज्ञानीजन जैसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम भी विनाश के गर्त में गिरोगे॥२६॥
बद्धस्त्वं कालपाशेन क्व गतस्तस्य मोक्ष्यसे।
वधाय बडिशं गृह्य सामिषं जलजो यथा॥२७॥
‘तुम कालपाश में बँध गये हो। कहाँ जाकर उससे छुटकारा पाओगे? जैसे जल में उत्पन्न होने वाला मत्स्य मांसयुक्त बंसी को अपने वध के लिये ही निगल जाता है, उसी प्रकार तुम भी अपने मौत के लिये ही सीता का अपहरण करते हो॥२७॥
नहि जातु दुराधर्षों काकुत्स्थौ तव रावण।
धर्षणं चाश्रमस्यास्य क्षमिष्येते तु राघवौ॥२८॥
‘रावण! ककुत्स्थकुलभूषण रघुकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई दुर्धर्ष वीर हैं। वे तुम्हारे द्वारा अपने आश्रम पर किये गये इस अपमानजनक अपराध को कभी क्षमा नहीं करेंगे॥२८॥
यथा त्वया कृतं कर्म भीरुणा लोकगर्हितम्।
तस्कराचरितो मार्गो नैष वीरनिषेवितः॥२९॥
‘तुम कायर और डरपोक हो। तुमने जैसा लोकनिन्दित कर्म किया है, यह चोरों का मार्ग है। वीर पुरुष ऐसे मार्ग का आश्रय नहीं लेते हैं॥२९॥
युद्ध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण।
शयिष्यसे हतो भूमौ यथा भ्राता खरस्तथा॥३०॥
‘रावण! यदि शूरवीर हो तो दो घड़ी और ठहरो और मुझसे युद्ध करो। फिर तो तुम भी उसी प्रकार मरकर पृथ्वी पर सो जाओगे, जैसे तुम्हारा भाई खर सोया था॥३०॥
परेतकाले पुरुषो यत् कर्म प्रतिपद्यते।
विनाशायात्मनोऽधर्म्यं प्रतिपन्नोऽसि कर्म तत्॥३१॥
‘विनाश के समय पुरुष जैसा कर्म करता है, तुमने भी अपने विनाश के लिये वैसे ही अधर्मपूर्ण कर्म को अपनाया है॥३१॥
पापानुबन्धो वै यस्य कर्मणः को नु तत् पुमान्।
कर्वीत लोकाधिपतिः स्वयंभूर्भगवानपि॥३२॥
‘जिस कर्म को करने से कर्ता का पाप के फल से सम्बन्ध होता है, उस कर्म को कौन पुरुष निश्चित रूप से कर सकता है। लोकपाल इन्द्र तथा भगवान् स्वयम्भू (ब्रह्मा) भी वैसा कर्म नहीं कर सकते’॥३२॥
एवमुक्त्वा शुभं वाक्यं जटायुस्तस्य रक्षसः।
निपपात भृशं पृष्ठे दशग्रीवस्य वीर्यवान्॥३३॥
तं गृहीत्वा नखैस्तीक्ष्णैर्विददार समन्ततः।
अधिरूढो गजारोहो यथा स्याद् दुष्टवारणम्॥३४॥
इस प्रकार उत्तम वचन कहकर पराक्रमी जटायु उस राक्षस दशग्रीव की पीठ पर बड़े वेग से जा बैठे और उसे पकड़कर अपने तीखे नखों द्वारा चारों ओर से चीरने लगे। मानो कोई हाथीवान् किसी दुष्ट हाथी के ऊपर सवार होकर उसे अंकुश से छेद रहा हो॥३३-३४॥
विददार नखैरस्य तुण्डं पृष्ठे समर्पयन्।
केशांश्चोत्पाटयामास नखपक्षमुखायुधः॥३५॥
नख, पाँख और चोंच-ये ही जटायु के हथियार थे। वे नखों से खरोंचते थे, पीठ पर चोंच मारते थे और बाल पकड़कर उखाड़ लेते थे॥३५॥
स तथा गृध्रराजेन क्लिश्यमानो मुहर्मुहुः।
अमर्षस्फुरितोष्ठः सन् प्राकम्पत च राक्षसः॥३६॥
इस प्रकार जब गृध्रराज ने बारंबार क्लेश पहुँचाया, तब राक्षस रावण काँप उठा। क्रोध के मारे उसके ओठ फड़कने लगे॥३६॥
सम्परिष्वज्य वैदेहीं वामेनाङ्केन रावणः।
तलेनाभिजघाना जटायुं क्रोधमूर्च्छितः॥३७॥
उस समय क्रोध से भरे रावण ने विदेहनन्दिनी सीता को बायीं गोद में करके अत्यन्त पीड़ित हो जटायु पर तमाचे का प्रहार किया॥३७॥
जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः।
वामबाहून् दश तदा व्यपाहरदरिंदमः॥३८॥
परंतु उस वार को बचाकर शत्रुदमन गृध्रराज जटायु ने अपनी चोंच से मार-मारकर रावण की दसों बायीं भुजाओं को उखाड़ लिया।॥३८॥
संछिन्नबाहोः सद्यो वै बाहवः सहसाभवन्।
विषज्वालावलीयुक्ता वल्मीकादिव पन्नगाः॥३९॥
उन बाँहों के कट जाने पर बाँबी से प्रकट होने वाले विष की ज्वाला-मालाओं से युक्त सर्पो की भाँति तुरंत दूसरी नयी भुजाएँ सहसा उत्पन्न हो गयीं॥३९॥
ततः क्रोधाद् दशग्रीवः सीतामुत्सृज्य वीर्यवान्।
मुष्टिभ्यां चरणाभ्यां च गृध्रराजमपोथयत्॥४०॥
तब पराक्रमी दशानन ने सीता को तो छोड़ दिया और गृध्रराज को क्रोधपूर्वक मुक्कों और लातों से मारना आरम्भ किया॥४०॥
ततो मुहूर्तं संग्रामो बभूवातुलवीर्ययोः।
राक्षसानां च मुख्यस्य पक्षिणां प्रवरस्य च॥४१॥
उस समय उन दोनों अनुपम पराक्रमी वीर राक्षसराज रावण और पक्षिराज जटायु में दो घड़ी तक घोर संग्राम होता रहा॥४१॥
तस्य व्यायच्छमानस्य रामस्यार्थे स रावणः।
पक्षौ पादौ च पाश्वौ च खड्गमुद्धृत्य सोऽच्छिनत्॥४२॥
तदनन्तर रावण ने तलवार निकाली और श्रीरामचन्द्रजी के लिये पराक्रम करने वाले जटायु के दोनों पंख, पैर तथा पार्श्वभाग काट डाले॥४२॥
स च्छिन्नपक्षः सहसा रक्षसा रौद्रकर्मणा।
निपपात महागृध्रो धरण्यामल्पजीवितः॥४३॥
भयंकर कर्म करने वाले उस राक्षस के द्वारा सहसा पंख काट लिये जाने पर महागृध्र जटायु पृथ्वी पर गिर पड़े। अब वे थोड़ी ही देर के मेहमान थे। ४३॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ क्षतजा जटायुषम्।
अभ्यधावत वैदेही स्वबन्धुमिव दुःखिता॥४४॥
अपने बान्धव के समान जटायु को खून से लथपथ होकर पृथ्वी पर पड़ा देख सीता दुःख से व्याकुल हो उनकी ओर दौड़ी॥४४॥
तं नीलजीमूतनिकाशकल्पं सपाण्डुरोरस्कमुदारवीर्यम्।
ददर्श लङ्काधिपतिः पृथिव्यां जटायुषं शान्तमिवाग्निदावम्॥४५॥
जटायु के शरीर की कान्ति नीले मेघ के समान काली थी। उनकी छाती का रंग श्वेत था। वे बड़े पराक्रमी थे, तो भी उस समय बुझे हुए दावानल के समान पृथ्वी पर पड़ गये। लङ्कापति रावण ने उन्हें इस अवस्था में देखा॥४५॥
ततस्तु तं पत्ररथं महीतले निपातितं रावणवेगमर्दितम्।
पुनश्च संगृह्य शशिप्रभानना रुरोद सीता जनकात्मजा तदा॥४६॥
तदनन्तर रावण के वेग से रौंदे जाकर धराशायी हुए जटायु को पकड़कर चन्द्रमुखी जनकनन्दिनी सीता पुनः उस समय वहाँ रोने लगीं॥४६॥
सर्ग ५२
सा तु ताराधिपमुखी रावणेन निरीक्ष्य तम्।
गृध्रराजं विनिहतं विललाप सुदुःखिता॥१॥
रावण के द्वारा मारे गये गृध्रराज की ओर देखकर चन्द्रमुखी सीता अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगीं-॥१॥
निमित्तं लक्षणं स्वप्नं शकुनिस्वरदर्शनम्।
अवश्यं सुखदुःखेषु नराणां परिदृश्यते॥२॥
‘मनुष्यों को सुख-दुःख की प्राप्ति के सूचक लक्षण, स्वप्न, पक्षियों के स्वर तथा उनके दायें-बायें दर्शन आदि शुभाशुभ निमित्त अवश्य दिखायी देते हैं॥२॥
न नूनं राम जानासि महद्व्यसनमात्मनः।।
धावन्ति नूनं काकुत्स्थ मदर्थं मृगपक्षिणः॥३॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मेरे अपहरण की सूचना देने के लिये निश्चय ही ये मृग और पक्षी अशुभसूचक मार्ग से दौड़ रहे हैं, परंतु उनके द्वारा सूचित होने पर भी अपने इस महान् संकट को अवश्य ही आप नहीं जानते हैं (क्योंकि जानने पर आप इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे)॥३॥
अयं हि कृपया राम मां त्रातुमिह संगतः।
शेते विनिहतो भूमौ ममाभाग्याद् विहंगमः॥४॥
‘हा राम! मेरा कैसा अभाग्य है कि जो कृपा करके मुझे बचाने के लिये यहाँ आये थे, वे पक्षिप्रवर जटायु इस निशाचर द्वारा मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हैं॥४॥
त्राहि मामद्य काकुत्स्थ लक्ष्मणेति वराङ्गना।
सुसंत्रस्ता समाक्रन्दच्छृण्वतां तु यथान्तिके॥५॥
‘हे राम! हे लक्ष्मण! अब आप ही दोनों मेरी रक्षा करें।’ यों कहकर अत्यन्त डरी हुई सुन्दरी सीता इस प्रकार क्रन्दन करने लगी, जिससे निकटवर्ती देवता और मनुष्य सुन सकें॥५॥
तां क्लिष्टमाल्याभरणां विलपन्तीमनाथवत्।
अभ्यधावत वैदेहीं रावणो राक्षसाधिपः॥६॥
उनके पुष्पहार और आभूषण मसलकर छिन्नभिन्न हो गये थे। वे अनाथ की भाँति विलाप कर रही थीं। उसी अवस्था में राक्षसराज रावण उन विदेहकुमारी सीता की ओर दौड़ा॥६॥
तां लतामिव वेष्टन्तीमालिङ्गन्तीं महाद्रुमान्।
मुञ्च मुञ्चेति बहुशः प्राप तां राक्षसाधिपः॥७॥
वे लिपटी हुई लता की भाँति बड़े-बड़े वृक्षों से लिपट जातीं और बारंबार कहतीं—’मुझे इस संकट से छुड़ाओ, छुड़ाओ।’ इतने ही में वह निशाचरराज उनके पास जा पहुँचा॥७॥
क्रोशन्तीं राम रामेति रामेण रहितां वने।
जीवितान्ताय केशेषु जग्राहान्तकसंनिभः॥८॥
प्रधर्षितायां वैदेह्यां बभूव सचराचरम्।
जगत् सर्वममर्यादं तमसान्धेन संवृतम्॥९॥
वन में श्रीराम से रहित होकर सीता को राम-राम की रट लगाती देख उस काल के समान विकराल राक्षस ने अपने ही विनाश के लिये उनके केश पकड़ लिये। सीता का इस प्रकार तिरस्कार होने पर समस्त चराचरजगत् मर्यादारहित तथा अन्धकार से आच्छन्नसा हो गया॥८-९॥
न वाति मारुतस्तत्र निष्प्रभोऽभून दिवाकरः।
दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां देवो दिव्येन चक्षुषा॥१०॥
कृतं कार्यमिति श्रीमान् व्याजहार पितामहः।
वहाँ वायु की गति रुक गयी और सूर्य की भी प्रभा फीकी पड़ गयी। श्रीमान् पितामह ब्रह्माजी दिव्यदृष्टि से विदेहनन्दिनी का वह राक्षस के द्वारा केशाकर्षणरूप अपमान देखकर बोले-’बस अब कार्य सिद्ध हो गया’॥१० १/२॥
प्रहृष्टा व्यथिताश्चासन् सर्वे ते परमर्षयः॥११॥
दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां दण्डकारण्यवासिनः।
रावणस्य विनाशं च प्राप्तं बुद्ध्वा यदृच्छया॥१२॥
सीता के केशों का खींचा जाना देखकर दण्डकारण्य में निवास करने वाले वे सब महर्षि मन ही-मन व्यथित हो उठे। साथ ही अकस्मात् रावण का विनाश निकट आया जान उनको बड़ा हर्ष हुआ॥११-१२॥
स तु तां राम रामेति रुदती लक्ष्मणेति च।
जगामादाय चाकाशं रावणो राक्षसेश्वरः॥१३॥
बेचारी सीता ‘हा राम! हा राम’ कहकर रो रही थीं। लक्ष्मण को भी पुकार रही थीं। उसी अवस्था में राक्षसों का राजा रावण उन्हें लेकर आकाशमार्ग से चल दिया॥१३॥
तप्ताभरणवर्णाङ्गी पीतकौशेयवासिनी।
रराज राजपुत्री तु विद्युत्सौदामनी यथा॥१४॥
तपाये हुए सोने के आभूषणों से उनका सारा अङ्ग विभूषित था। वे पीले रंग की रेशमी साड़ी पहने हुए थीं। अतः उस समय राजकुमारी सीता सुदाम पर्वत से प्रकट हुई विद्युत् के समान प्रकाशित हो रही थीं॥१४॥
उद्धृतेन च वस्त्रेण तस्याः पीतेन रावणः।
अधिकं परिबभ्राज गिरिर्दीप्त इवाग्निना॥१५॥
उनके फहराते हुए पीले वस्त्र से उपलक्षित रावण दावानल से उद्भासित होने वाले पर्वत के समान अधिक शोभा पाने लगा॥१५॥
तस्याः परमकल्याण्यास्ताम्राणि सुरभीणि च।
पद्मपत्राणि वैदेह्या अभ्यकीर्यन्त रावणम्॥१६॥
उन परम कल्याणी विदेहकुमारी के अङ्गों में जो कमलपुष्प थे, उनके किंचित् अरुण और सुगन्धित दल बिखर-बिखरकर रावण पर गिरने लगे॥१६॥
तस्याः कौशेयमुद्धृतमाकाशे कनकप्रभम्।
बभौ चादित्यरागेण ताम्रमभ्रमिवातपे॥१७॥
आकाश में उड़ता हुआ उनका सुवर्ण के समान कान्तिमान् रेशमी पीताम्बर संध्याकाल में सूर्य की किरणों से रँगे हुए ताम्रवर्ण के मेघखण्ड की भाँति शोभा पाता था॥१७॥
तस्यास्तद् विमलं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम्।
न रराज विना रामं विनालमिव पङ्कजम्॥१८॥
आकाश में रावण के अङ्क में स्थित सीता का निर्मल मुख श्रीराम के बिना नालरहित कमल की भाँति शोभित नहीं होता था॥१८॥
बभूव जलदं नीलं भित्त्वा चन्द्र इवोदितः।
सुललाटं सुकेशान्तं पद्मगर्भाभमव्रणम्॥१९॥
शुक्लैः सुविमलैर्दन्तैः प्रभावद्भिरलंकृतम्।
तस्याः सुनयनं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम्॥२०॥
सुन्दर ललाट और मनोहर केशों से युक्त कमल के भीतरी भाग के समान कान्तिमान्, चेचक आदि के दाग से रहित, श्वेत, निर्मल और दीप्तिमान् दाँतों से अलंकृत तथा सुन्दर नेत्रों से सुशोभित सीता का मुख आकाश में रावण के अङ्क में ऐसा जान पड़ता था मानो मेघों की काली घटा का भेदन करके चन्द्रमा उदित हुआ हो॥१९-२०॥
रुदितं व्यपमृष्टास्रं चन्द्रवत् प्रियदर्शनम्।
सुनासं चारुताम्रोष्ठमाकाशे हाटकप्रभम्॥२१॥
राक्षसेन्द्रसमाधूतं तस्यास्तद् वदनं शुभम्।
शुशुभे न विना रामं दिवा चन्द्र इवोदितः॥२२॥
चन्द्रमा के समान प्यारा दिखायी देने वाला सीता का वह सुन्दर मुख तुरंत का रोया हुआ था। उसके आँसू पोंछ दिये गये थे। उसकी सुघड़ नासिका तथा ताँबे जैसे लाल-लाल मनोहर ओठ थे। आकाश में वह अपनी सुनहरी प्रभा बिखेर रहा था तथा राक्षसराज के वेगपूर्वक चलने से उसमें कम्पन हो रहा था। इस प्रकार वह मनोहर मुख भी श्रीराम के बिना उस समय दिन में उगे हुए चन्द्रमा के समान शोभाहीन प्रतीत होता था॥२१-२२॥
सा हेमवर्णा नीलाऊं मैथिली राक्षसाधिपम्।
शुशुभे काञ्चनी काञ्ची नीलं गजमिवाश्रिता॥२३॥
मिथिलेशकुमारी सीता का श्रीअङ्ग सुवर्ण के समान दीप्तिमान् था और राक्षसराज रावण का शरीर बिलकुल काला था। उसकी गोद में वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो काले हाथी को सोने की करधनी पहना दी गयी हो॥२३॥
सा पद्मपीता हेमाभा रावणं जनकात्मजा।
विद्युद् घनमिवाविश्य शुशुभे तप्तभूषणा॥२४॥
कमल के केसर की भाँति पीली एवं सुनहरी कान्तिवाली जनककुमारी सीता तपे हुए सोने के आभूषण धारण किये रावण की पीठपर वैसी ही शोभा पा रही थीं, जैसे मेघमाला का आश्रय लेकर बिजली चमक रही हो॥२४॥
तस्या भूषणघोषेण वैदेह्या राक्षसेश्वरः।
बभूव विमलो नीलः सघोष इव तोयदः॥२५॥
विदेहनन्दिनी के आभूषणों की झनकार से राक्षसराज रावण गर्जना करते हुए निर्मल नील मेघ के समान प्रतीत होता था॥२५॥
उत्तमाङ्गच्युता तस्याः पुष्पवृष्टिः समन्ततः।
सीताया ह्रियमाणायाः पपात धरणीतले॥२६॥
हरकर ले जायी जाती हुई सीता के सिर से उनके केशों में गुंथे हुए फूल बिखरकर सब ओर पृथ्वी पर गिर रहे थे॥२६॥
सा तु रावणवेगेन पुष्पवृष्टिः समन्ततः।
समाधूता दशग्रीवं पुनरेवाभ्यवर्तत॥२७॥
चारों ओर होने वाली वह फूलों की वर्षा रावण के वेग से उठी हुई वायु के द्वारा प्रेरित हो फिर उस दशानन पर ही आकर पड़ती थी॥२७॥
अभ्यवर्तत पुष्पाणां धारा वैश्रवणानुजम्।
नक्षत्रमाला विमला मेरुं नगमिवोन्नतम्॥२८॥
कुबेर के छोटे भाई रावण के ऊपर जब वह फूलों की धारा गिरती थी, उस समय ऊँचे मेरुपर्वत पर उतरने वाली निर्मल नक्षत्रमाला की भाँति शोभा पाती थी॥२८॥
चरणान्नूपुरं भ्रष्टं वैदेह्या रत्नभूषितम्।
विद्युन्मण्डलसंकाशं पपात धरणीतले॥२९॥
विदेहनन्दिनी का रत्नजटित नूपुर उनके एक चरण से खिसककर विद्युन्मण्डल के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा॥२९॥
तरुप्रवालरक्ता सा नीलाङ्गं राक्षसेश्वरम्।
प्रशोभयत वैदेही गजं कक्ष्येव काञ्चनी॥३०॥
वृक्षों के नूतन पल्लवों के समान किंचित् अरुण वर्णवाली सीता उस काले-कलूटे राक्षसराज को उसी प्रकार सुशोभित कर रही थीं जैसे हाथी को कसने वाला सुनहरा रस्सा उसकी शोभा बढ़ाता हो। ३०॥
तां महोल्कामिवाकाशे दीप्यमानां स्वतेजसा।
जहाराकाशमाविश्य सीतां वैश्रवणानुजः॥३१॥
आकाश में अपने तेज से बहुत बड़ी उल्का के समान प्रकाशित होने वाली सीता को रावण आकाशमार्ग का ही आश्रय ले हर ले गया॥३१॥
तस्यास्तान्यग्निवर्णानि भूषणानि महीतले।
सघोषाण्यवशीर्यन्त क्षीणास्तारा इवाम्बरात्॥३२॥
जानकी के शरीर पर अग्नि के समान प्रकाशमान आभूषण थे। वे उस समय खन-खन की आवाज करते हुए एक-एक करके गिरने लगे, मानो आकाश से ताराएँ टूट-टूटकर पृथ्वी पर गिर रही हों॥३२॥
तस्याः स्तनान्तराद् भ्रष्टो हारस्ताराधिपद्युतिः।
वैदेह्या निपतन् भाति गङ्गेव गगनच्युता॥३३॥
उन विदेहनन्दिनी सीता के स्तनों के बीच से खिसककर गिरता हुआ चन्द्रमा के समान उज्ज्वलहार गगनमण्डल से उतरती हुई गङ्गा के समान प्रतीत हुआ॥३३॥
उत्पातवाताभिरता नानाद्विजगणायुताः।
मा भैरिति विधूताग्रा व्याजहरिव पादपाः॥३४॥
रावण के वेग से उत्पन्न हुई उत्पातसूचक वायु के झकोरों से हिलते हुए वृक्षों पर नाना प्रकार के पक्षी कोलाहल कर रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे वृक्ष अपने सिरों को हिला-हिलाकर संकेत करते हुए सीता से कह रहे हैं कि ‘तुम डरो मत’॥३४॥
नलिन्यो ध्वस्तकमलास्त्रस्तमीनजलेचराः।
सखीमिव गतोत्साहां शोचन्तीव स्म मैथिलीम्॥३५॥
जिनके कमल सूख गये थे और मत्स्य आदि जलचर जीव डर गये थे, वे पुष्करिणियाँ उत्साहहीन हुई मिथिलेशकुमारी सीता को मानो अपनी सखी मानकर उनके लिये शोक कर रही थीं॥३५॥
समन्तादभिसम्पत्य सिंहव्याघ्रमृगद्विजाः।
अन्वधावंस्तदा रोषात् सीताच्छायानुगामिनः॥३६॥
उस सीताहरण के समय रावण पर रोष-सा करके सिंह, व्याघ्र, मृग और पक्षी सब ओर से सीता की परछाहीं का अनुसरण करते हुए दौड़ रहे थे॥३६॥
जलप्रपातास्रमुखाः शृङ्गैरुच्छ्रितबाहुभिः।
सीतायां ह्रियमाणायां विक्रोशन्तीव पर्वताः॥३७॥
जब सीता हरी जाने लगी, उस समय वहाँके पर्वत झरनोंके रूपमें आँसू बहाते हुए, ऊँचे शिखरोंके रूपमें अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर मानो जोर-जोरसे चीत्कार कर रहे थे॥३७॥
ह्रियमाणां तु वैदेहीं दृष्ट्वा दीनो दिवाकरः।
प्रविध्वस्तप्रभः श्रीमानासीत् पाण्डुरमण्डलः॥३८॥
सीता का हरण होता देख श्रीमान् सूर्यदेव दुःखी हो गये। उनकी प्रभा नष्ट-सी हो गयी तथा उनका मण्डल पीला पड़ गया॥३८॥।
नास्ति धर्मः कुतः सत्यं नार्जवं नानृशंसता।
यत्र रामस्य वैदेहीं सीतां हरति रावणः॥३९॥
इति भूतानि सर्वाणि गणशः पर्यदेवयन्।
वित्रस्तका दीनमुखा रुरुदुर्भुगपोतकाः॥४०॥
हाय! हाय! जब श्रीरामचन्द्रजी की धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीता को रावण हरकर लिये जा रहा है, तब यही कहना पड़ता है कि ‘संसार में धर्म नहीं है, सत्य भी कहाँ है? सरलता और दया का भी सर्वथा लोप हो गया है।’ इस प्रकार वहाँ झुंड-के-झुंड एकत्र हो सब प्राणी विलाप कर रहे थे। मृगों के बच्चे भयभीत हो दीनमुख से रो रहे थे॥३९-४०॥
उदीक्ष्योगीक्ष्य नयनर्भयादिव विलक्षणैः।
सुप्रवेपितगात्राश्च बभूवुर्वनदेवताः॥४१॥
विक्रोशन्तीं दृढं सीतां दृष्ट्वा दुःखं तथा गताम्।
श्रीराम को जोर-जोर से पुकारती और वैसे भारी दुःख में पड़ी हुई सीता को अपनी विलक्षण आँखों से बारंबार देख-देखकर भय के मारे वनदेवताओं के अङ्ग थर-थर काँपने लगे॥४१ १/२॥
तां तु लक्ष्मण रामेति क्रोशन्तीं मधुरस्वराम्॥४२॥
अवेक्षमाणां बहुशो वैदेहीं धरणीतलम्।
स तामाकुलकेशान्तां विप्रमृष्टविशेषकाम्।
जहारात्मविनाशाय दशग्रीवो मनस्विनीम्॥४३॥
विदेहनन्दिनी मधुर स्वर में ‘हा राम, हा लक्ष्मण’ की पुकार करती हुई बारंबार भूतल की ओर देख रही थीं। उनके केश खुलकर सब ओर फैल गये थे और ललाट की बेंदी मिट गयी थी। वैसी अवस्था में दशग्रीव रावण अपने ही विनाश के लिये मनस्विनी सीता को लिये जा रहा था॥४२-४३॥
ततस्तु सा चारुदती शुचिस्मिता विनाकृता बन्धुजनेन मैथिली।
अपश्यती राघवलक्ष्मणावुभौ विवर्णवक्त्रा भयभारपीडिता॥४४॥
उस समय मनोहर दाँत और पवित्र मुसकानवाली मिथिलेशकुमारी सीता, जो अपने बन्धुजनों से बिछुड़ गयी थीं, दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को न देखकर भय के भार से व्यथित हो उठीं। उनके मुखमण्डल की कान्ति फीकी पड़ गयी॥४४॥
सर्ग ५३
खमुत्पतन्तं तं दृष्ट्वा मैथिली जनकात्मजा।
दुःखिता परमोद्विग्ना भये महति वर्तिनी॥१॥
रावण को आकाश में उड़ते देख मिथिलेशकुमारी जानकी दुःखमग्न हो अत्यन्त उद्विग्न हो रही थीं। वे बहुत बड़े भय में पड़ गयी थीं॥१॥
रोषरोदनताम्राक्षी भीमाक्षं राक्षसाधिपम्।
रुदती करुणं सीता ह्रियमाणा तमब्रवीत्॥२॥
रोष और रोदन के कारण उनकी आँखें लाल हो गयी थीं। हरी जाती हुई सीता करुणाजनक स्वर में रोती हुई उस भयंकर नेत्रवाले राक्षसराज से इस प्रकार बोलीं-॥२॥
न व्यपत्रपसे नीच कर्मणानेन रावण।
ज्ञात्वा विरहितां यो मां चोरयित्वा पलायसे॥३॥
‘ओ नीच रावण! क्या तुझे अपने इस कुकर्म से लज्जा नहीं आती है, जो मुझे स्वामी से रहित अकेली और असहाय जानकर चुराये लिये भागा जाता है?॥३॥
त्वयैव नूनं दुष्टात्मन् भीरुणा हर्तुमिच्छता।
ममापवाहितो भर्ता मृगरूपेण मायया॥४॥
‘दुष्टात्मन्! तू बड़ा कायर और डरपोक है। निश्चय ही मुझे हर ले जाने की इच्छा से तूने ही माया द्वारा मृगरूप में उपस्थित हो मेरे स्वामी को आश्रम से दूर हटा दिया था॥४॥
यो हि मामुद्यतस्त्रातुं सोऽप्ययं विनिपातितः।
गृध्रराजः पुराणोऽसौ श्वशुरस्य सखा मम॥५॥
‘मेरे श्वशुर के सखा वे जो बूढ़े जटायु मेरी रक्षा करने के लिये उद्यत हुए थे, उनको भी तूने मार गिराया॥५॥
परमं खलु ते वीर्यं दृश्यते राक्षसाधम।
विश्राव्य नामधेयं हि युद्धे नास्मि जिता त्वया॥६॥
ईदृशं गर्हितं कर्म कथं कृत्वा न लज्जसे।
स्त्रियाश्चाहरणं नीच रहिते च परस्य च॥७॥
‘नीच राक्षस! अवश्य तुझमें बड़ा भारी बल दिखायी देता है (क्योंकि-तू बूढ़े पक्षी को भी मार गिराता है!), तूने अपना नाम बताकर श्रीरामलक्ष्मण के साथ युद्ध करके मुझे नहीं जीता है। ओ नीच! जहाँ कोई रक्षक न हो—ऐसे स्थान पर जाकर परायी स्त्री के अपहरण-जैसा निन्दित कर्म करके तू लज्जित कैसे नहीं होता है ?॥६-७॥
कथयिष्यन्ति लोकेषु पुरुषाः कर्म कुत्सितम्।
सुनृशंसमधर्मिष्ठं तव शौटीर्यमानिनः॥८॥
‘तू तो अपने को बड़ा शूर-वीर मानता है, परंतु संसार के सभी वीर पुरुष तेरे इस कर्म को घृणित, क्रूरतापूर्ण और पापरूप ही बतायेंगे॥८॥
धिक् ते शौर्यं च सत्त्वं च यत्त्वया कथितं तदा।
कुलाक्रोशकरं लोके धिक ते चारित्रमीदृशम्॥९॥
‘तूने पहले स्वयं ही जिसका बड़े ताव से वर्णन किया था, तेरे उस शौर्य और बल को धिक्कार है! कुल में कलङ्क लगाने वाले तेरे ऐसे चरित्र को संसार में सदा धिक्कार ही प्राप्त होगा॥९॥
किं शक्यं कर्तुमेवं हि यज्जवेनैव धावसि।
मुहूर्तमपि तिष्ठ त्वं न जीवन् प्रतियास्यसि॥१०॥
‘किंतु इस समय क्या किया जा सकता है? क्योंकि तू बड़े वेग से भागा जा रहा है। अरे! दो घड़ी भी तो ठहर जा, फिर यहाँ से जीवित नहीं लौट सकेगा॥१०॥
नहि चक्षुःपथं प्राप्य तयोः पार्थिवपुत्रयोः।
ससैन्योऽपि समर्थस्त्वं मुहूर्तमपि जीवितुम्॥११॥
“उन दोनों राजकुमारों के दृष्टिपथ में आ जाने पर तू सेना के साथ हो तो भी दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता॥११॥
न त्वं तयोः शरस्पर्श सोढुं शक्तः कथंचन।
वने प्रज्वलितस्येव स्पर्शमग्नेर्विहंगमः॥१२॥
‘जैसे कोई आकाशचारी पक्षी वन में प्रज्वलित हुए दावानल का स्पर्श सहन करने में समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार तू मेरे पति और उनके भाई दोनों के बाणों का स्पर्श किसी तरह सह नहीं सकता॥१२॥
साधु कृत्वाऽऽत्मनः पथ्यं साधु मां मुञ्च रावण।
मत्प्रधर्षणसंक्रुद्धो भ्रात्रा सह पतिर्मम॥१३॥
विधास्यति विनाशाय त्वं मां यदि न मुञ्चसि।
‘रावण! यदि तू मुझे छोड़ नहीं देता है तो मेरे तिरस्कार से कुपित हुए मेरे पतिदेव अपने भाई के साथ चढ़ आयेंगे और तेरे विनाश का उपाय करेंगे, अतः तू अच्छी तरह अपनी भलाई सोच ले और मुझे छोड़ दे। यही तेरे लिये अच्छा होगा॥१३ १/२॥
येन त्वं व्यवसायेन बलान्मां हर्तुमिच्छसि॥१४॥
व्यवसायस्तु ते नीच भविष्यति निरर्थकः।
‘नीच! तू जिस संकल्प या अभिप्राय से बलपूर्वक मेरा हरण करना चाहता है, तेरा वह अभिप्राय व्यर्थ होगा। १४ १/२॥
नह्यहं तमपश्यन्ती भर्तारं विबुधोपमम्॥१५॥
उत्सहे शत्रुवशगा प्राणान् धारयितुं चिरम्।
‘मैं अपने देवोपम पति का दर्शन न पाने पर शत्रु के अधीनता में अधिक कालतक अपने प्राणों को नहीं धारण कर सकूँगी॥१५ १/२॥
न नूनं चात्मनः श्रेयः पथ्यं वा समवेक्षसे॥१६॥
मृत्युकाले यथा मर्यो विपरीतानि सेवते।
मुमूर्पूणां तु सर्वेषां यत् पथ्यं तन्न रोचते॥१७॥
‘निश्चय ही तू अपने कल्याण और हित का विचार नहीं करता है। जैसे मरने के समय मनुष्य स्वास्थ्य के विरोधी पदार्थों का सेवन करने लगता है, वही दशा तेरी है। प्रायः सभी मरणासन्न मनुष्यों को पथ्य (हितकारक सलाह या भोजन) नहीं रुचता है॥१६-१७॥
पश्यामीह हि कण्ठे त्वां कालपाशावपाशितम्।
यथा चास्मिन् भयस्थाने न बिभेषि निशाचर॥१८॥
‘निशाचर! मैं देखती हूँ, तेरे गले में काल की फाँसी पड़ चुकी है, इसी से इस भय के स्थान पर भी तू निर्भय बना हुआ है।॥१८॥
व्यक्तं हिरण्मयांस्त्वं हि सम्पश्यसि महीरुहान्।
नदीं वैतरणी घोरां रुधिरौघविवाहिनीम्॥१९॥
खड्गपत्रवनं चैव भीमं पश्यसि रावण।
तप्तकाञ्चनपुष्पां च वैदूर्यप्रवरच्छदाम्॥२०॥
द्रक्ष्यसे शाल्मलीं तीक्ष्णामायसैः कण्टकैश्चिताम्।
‘रावण! अवश्य ही तू सुवर्णमय वृक्षों को देख रहा है, रक्त का स्रोत बहाने वाली भयंकर वैतरणी नदी का दर्शन कर रहा है, भयानक असिपत्र-वन को भी देखना चाहता है तथा जिसमें तपाये हुए सुवर्ण के समान फूल तथा श्रेष्ठ वैदूर्यमणि (नीलम) के समान पत्ते हैं और जिसमें लोहे के काँटे चिने गये हैं, उस तीखी शाल्मलिका भी अब तू शीघ्र ही दर्शन करेगा। १९-२० १/२॥
नहि त्वमीदृशं कृत्वा तस्यालीकं महात्मनः॥२१॥
धारितुं शक्ष्यसि चिरं विषं पीत्वेव निघृण।
बद्धस्त्वं कालपाशेन दुर्निवारेण रावण॥२२॥
‘निर्दयी निशाचर! तू महात्मा श्रीराम का ऐसा महान् अपराध करके विषपान किये हुए मनुष्य की भाँति अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेगा। रावण! तू अटल कालपाश से बँध गया है॥२१-२२॥
क्व गतो लप्स्यसे शर्म मम भर्तुर्महात्मनः।
निमेषान्तरमात्रेण विना भ्रातरमाहवे॥२३॥
राक्षसा निहता येन सहस्राणि चतुर्दश।
कथं स राघवो वीरः सर्वास्त्रकुशलो बली॥२४॥
न त्वां हन्याच्छरैस्तीक्ष्णैरिष्टभार्यापहारिणम्।
‘मेरे महात्मा पति से बचकर तू कहाँ जाकर शान्ति पा सकेगा। जिन्होंने अपने भाई लक्ष्मण की सहायता लिये बिना ही युद्ध में पलक मारते-मारते चौदह हजार राक्षसों का विनाश कर डाला, वे सम्पूर्ण अस्त्रों का प्रयोग करने में कुशल बलवान् वीर रघुनाथजी अपनी प्यारी पत्नी का अपहरण करने वाले तुझ-जैसे पापी को तीखे बाणों द्वारा क्यों नहीं कालके गाल में भेज देंगे’॥२३-२४ १/२॥
एतच्चान्यच्च परुषं वैदेही रावणाङ्कगा।
भयशोकसमाविष्टा करुणं विललाप ह॥२५॥
रावण के चंगुल में फँसी हुई विदेहराजकुमारी सीता भय और शोक से व्याकुल हो ये तथा और भी बहुत से कठोर वचन सुनाकर करुण-स्वर में विलाप करने लगीं॥२५॥
तदा भृशात् बहु चैव भाषिणीं विलापपूर्वं करुणं च भामिनीम्।
जहार पापस्तरुणीं विचेष्टतीं नृपात्मजामागतगात्रवेपथुः॥२६॥
अत्यन्त दुःख से आतुर हो विलापपूर्वक बहुत-सी करुणाजनक बातें कहती और छूटने के लिये नाना प्रकार की चेष्टा करती हुई तरुणी भामिनी राजकुमारी सीता को वह पापी निशाचर हर ले गया। उस समय अधिक बोझ के कारण उसका शरीर काँप रहा था॥२६॥
सर्ग ५४
ह्रियमाणा तु वैदेही कंचिन्नाथमपश्यती।
ददर्श गिरिशृङ्गस्थान् पञ्च वानरपुङ्गवान्॥१॥
रावण के द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीता को उस समय कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी देता था। मार्ग में उन्होंने एक पर्वत के शिखर पर पाँच श्रेष्ठ वानरों को बैठे देखा॥१॥
तेषां मध्ये विशालाक्षी कौशेयं कनकप्रभम्।
उत्तरीयं वरारोहा शुभान्याभरणानि च॥२॥
मुमोच यदि रामाय शंसेयुरिति भामिनी।
वस्त्रमुत्सृज्य तन्मध्ये निक्षिप्तं सहभूषणम्॥३॥
तब सुन्दर अङ्गोंवाली विशाललोचना भामिनी सीता ने यह सोचकर कि शायद ये भगवान् श्रीराम को कुछ समाचार कह सकें, अपने सुनहरे रंग की रेशमी चादर उतारी और उसमें वस्त्र और आभूषण रखकर उसे उनके बीच में फेंक दिया॥२-३॥
सम्भ्रमात् तु दशग्रीवस्तत्कर्म च न बुद्धवान्।
पिङ्गाक्षास्तां विशालाक्षी नेत्रैरनिमिषैरिव॥४॥
विक्रोशन्तीं तदा सीतां ददृशुर्वानरोत्तमाः।
रावण बड़ी घबराहट में था, इसलिये सीता के इस कार्य को वह न जान सका। वे भूरी आँखों वाले श्रेष्ठ वानर उस समय उच्च स्वर से विलाप करती हुई विशाल-लोचना सीता की ओर एकटक नेत्रों से देखने लगे॥४ १/२॥
स च पम्पामतिक्रम्य लङ्कामभिमुखः पुरीम्॥५॥
जगाम मैथिलीं गृह्य रुदतीं राक्षसेश्वरः।
राक्षसराज रावण पम्पासरोवर को लाँघकर रोती हुई मैथिली सीता को साथ लिये लङ्कापुरी की ओर चल दिया॥५ १/२॥
तां जहार सुसंहृष्टो रावणो मृत्युमात्मनः॥६॥
उत्सङ्गेनैव भुजगीं तीक्ष्णदंष्ट्रां महाविषाम्।
निशाचर रावण बड़े हर्ष में भरकर सीता के रूप में अपनी मौत को ही हरकर लिये जा रहा था। उसने वैदेही के रूप में तीखे दाढ़वाली महाविषैली नागिन को ही अपनी गोद में उठा रखा था॥६ १/२॥
वनानि सरितः शैलान् सरांसि च विहायसा॥७॥
स क्षिप्रं समतीयाय शरश्चापादिव च्युतः।
वह धनुष से छूटे हुए बाण की तरह तीव्र गति से चलकर आकाशमार्ग से अनेकानेक वनों, नदियों, पर्वतों और सरोवरों को तुरंत लाँघ गया॥७ १/२॥
तिमिनक्रनिकेतं तु वरुणालयमक्षयम्॥८॥
सरितां शरणं गत्वा समतीयाय सागरम्।
उसने तिमि नामक मत्स्यों और नाकों के निवासस्थान एवं वरुण के अक्षय गृह समुद्र को भी, जो समस्त नदियों का आश्रय है, पार कर लिया॥८ १/२॥
सम्भ्रमात् परिवृत्तोर्मी रुद्धमीनमहोरगः॥९॥
वैदेह्यां ह्रियमाणायां बभूव वरुणालयः।
विदेहनन्दिनी जगन्माता जानकी का अपहरण होते समय वरुणालय समुद्र को बड़ी घबराहट हुई। उससे उसकी उठती हुई लहरें शान्त हो गयीं। उसके भीतररहने वाली मछलियों और बड़े-बड़े सर्पो की गति रुकगयी॥९ १/२॥
अन्तरिक्षगता वाचः ससृजुश्चारणास्तदा॥१०॥
एतदन्तो दशग्रीव इति सिद्धास्तथाब्रुवन्।
उस समय आकाश में विचरने वाले चारण यों बोले-’अब दशग्रीव रावण का यह अन्तकाल निकट आ पहुँचा है’ तथा सिद्धों ने भी यही बात दुहरायी॥१० १/२॥
स तु सीतां विचेष्टन्तीमतेनादाय रावणः॥११॥
प्रविवेश पुरीं लङ्कां रूपिणीं मृत्युमात्मनः।
सीता छटपटा रही थीं। रावण ने अपनी साकारमृत्यु की भाँति उन्हें अङ्क में लेकर लङ्कापुरी में प्रवेश किया॥११ १/२॥
सोऽभिगम्य पुरीं लङ्कां सुविभक्तमहापथाम्॥१२॥
संरूढकक्ष्यां बहुलां स्वमन्तःपुरमाविशत्।
वहाँ पृथक्-पृथक् विशाल राजमार्ग बने हुए थे। पुरी के द्वारपर बहुत-से राक्षस इधर-उधर फैले हुए थे तथा उस नगरी का विस्तार बहुत बड़ा था। उसमें जाकर रावण ने अपने अन्तःपुर में प्रवेश किया॥१२ १/२॥
तत्र तामसितापाङ्गीं शोकमोहसमन्विताम्॥१३॥
निदधे रावणः सीतां मयो मायामिवासुरीम्।
कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सीता शोक और मोह में डूबी हुई थीं। रावण ने उन्हें अन्तःपुर में रख दिया, मानो मयासुर ने मूर्तिमती आसुरी माया को वहाँ स्थापित कर दिया हो॥१३ १/२॥
अब्रवीच्च दशग्रीवः पिशाची?रदर्शनाः॥१४॥
यथा नैनां पुमान् स्त्री वा सीतां पश्यत्यसम्मतः।
इसके बाद दशग्रीव ने भयंकर आकारवाली पिशाचिनों को बुलाकर कहा-'(तुम सब सावधानी के साथ सीता की रक्षा करो।) कोई भी स्त्री या पुरुष मेरी आज्ञा के बिना सीता को देखने या इनसे मिलने न पाये॥१४ १/२॥
मुक्तामणिसुवर्णानि वस्त्राण्याभरणानि च॥१५॥
यद् यदिच्छेत् तदैवास्या देयं मच्छन्दतो यथा।
‘उन्हें मोती, मणि, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदि जिस-जिस वस्तु की इच्छा हो, वह तुरंत दी जाय इसके लिये मेरी खुली आज्ञा है॥१५ १/२॥
या च वक्ष्यति वैदेहीं वचनं किंचिदप्रियम्॥१६॥
अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानान्न तस्या जीवितं प्रियम्।
‘तुमलोगों में से जो कोई भी जानकर या बिना जाने विदेहकुमारी सीता से कोई अप्रिय बात कहेगी, मैं समशृंगा, उसे अपनी जिंदगी प्यारी नहीं है’॥१६ १/२॥
तथोक्त्वा राक्षसीस्तास्तु राक्षसेन्द्रः प्रतापवान्॥१७॥
निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्मात् किं कृत्यमिति चिन्तयन्।
ददर्शाष्टौ महावीर्यान् राक्षसान् पिशिताशनान्॥१८॥
राक्षसियों को वैसी आज्ञा देकर प्रतापी राक्षसराज ‘अब आगे क्या करना चाहिये’ यह सोचता हुआ अन्तःपुर से बाहर निकला और कच्चे मांस का आहार करने वाले आठ महापराक्रमी राक्षसों से तत्काल मिला॥१७-१८॥
स तान् दृष्ट्वा महावीर्यो वरदानेन मोहितः।
उवाच तानिदं वाक्यं प्रशस्य बलवीर्यतः॥१९॥
उनसे मिलकर ब्रह्माजी के वरदान से मोहित हुए महापराक्रमी रावण ने उसके बल और वीर्य की प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा-॥१९॥
नानाप्रहरणाः क्षिप्रमितो गच्छत सत्वराः।
जनस्थानं हतस्थानं भूतपूर्वं खरालयम्॥२०॥
‘वीरो! तुमलोग नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र साथ लेकर शीघ्र ही जनस्थान को, जहाँ पहले खर रहता था, जाओ। वह स्थान इस समय उजाड़ पड़ा है॥२०॥
तत्रास्यतां जनस्थाने शून्ये निहतराक्षसे।
पौरुषं बलमाश्रित्य त्रासमुत्सृज्य दूरतः॥२१॥
‘वहाँ के सभी राक्षस मार डाले गये हैं। उस सूने जनस्थान में तुमलोग अपने ही बल-पौरुष का भरोसा करके भय को दूर हटाकर रहो॥२१॥
बहुसैन्यं महावीर्यं जनस्थाने निवेशितम्।
सदूषणखरं युद्धे निहतं रामसायकैः॥२२॥
‘मैंने वहाँ बहुत बड़ी सेना के साथ महापराक्रमी खर और दूषण को बसा रखा था, किंतु वे सब-के सब युद्ध में राम के बाणों से मारे गये॥२२॥
ततः क्रोधो ममापूर्वो धैर्यस्योपरि वर्धते।
वैरं च सुमहज्जातं रामं प्रति सुदारुणम्॥२३॥
‘इससे मेरे मन में अपूर्व क्रोध जाग उठा है और वह धैर्य की सीमा से ऊपर उठकर बढ़ने लगा है; इसीलिये राम के साथ मेरा बड़ा भारी और भयंकर वैर ठन गया है॥२३॥
निर्यातयितुमिच्छामि तच्च वैरं महारिपोः।
नहि लप्स्याम्यहं निद्रामहत्वा संयुगे रिपुम्॥२४॥
‘मैं अपने महान् शत्रु से उस वैर का बदला लेना चाहता हूँ। उस शत्रु को संग्राम में मारे बिना मैं चैन से सो नहीं सकूँगा॥२४॥
तं त्विदानीमहं हत्वा खरदूषणघातिनम्।
रामं शर्मोपलप्स्यामि धनं लब्ध्वेव निर्धनः॥२५॥
‘राम ने खर और दूषण का वध किया है, अतः मैं भी इस समय उन्हें मारकर जब बदला चुका लूँगा, तभी मुझे शान्ति मिलेगी। जैसे निर्धन मनुष्य धन पाकर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मैं राम का वध करके शान्ति पा सकूँगा॥२५॥
जनस्थाने वसद्भिस्तु भवद्भी राममाश्रिता।
प्रवृत्तिरुपनेतव्या किं करोतीति तत्त्वतः॥२६॥
‘जनस्थान में रहकर तुमलोग रामचन्द्र का समाचार जानो और वे कब क्या कर रहे हैं, इसका ठीक-ठीक पता लगाते रहो और जो कुछ मालूम हो, उसकी सूचना मेरे पास भेज दिया करो॥२६॥
अप्रमादाच्च गन्तव्यं सर्वैरेव निशाचरैः।
कर्तव्यश्च सदा यत्नो राघवस्य वधं प्रति॥२७॥
‘तुम सभी निशाचर सावधानी के साथ वहाँ जाना और राम के वध के लिये सदा प्रयत्न करते रहना॥२७॥
युष्माकं तु बलं ज्ञातं बहुशो रणमूर्धनि।
अतश्चास्मिञ्जनस्थाने मया यूयं निवेशिताः॥२८॥
‘मुझे अनेक बार युद्धके मुहाने पर तुमलोगों के बल का परिचय मिल चुका है। इसीलिये इस जनस्थान में मैंने तुम्हीं लोगों को रखने का निश्चय किया है’॥२८॥
ततः प्रियं वाक्यमुपेत्य राक्षसा महार्थमष्टावभिवाद्य रावणम्।
विहाय लङ्कां सहिताः प्रतस्थिरे यतो जनस्थानमलक्ष्यदर्शनाः॥२९॥
रावण की यह महान् प्रयोजन से भरी हुई प्रिय बातें सुनकर वे आठों राक्षस उसे प्रणाम करके अदृश्य हो एक साथ ही लङ्का को छोड़कर जनस्थान की ओर प्रस्थित हो गये॥२९॥
ततस्तु सीतामुपलभ्य रावणः सुसम्प्रहृष्टः परिगृह्य मैथिलीम्।
प्रसज्य रामेण च वैरमुत्तमं बभूव मोहान्मुदितः स रावणः॥३०॥
तदनन्तर मिथिलेशकुमारी सीताको पाकर उन्हें राक्षसियों की देख-रेख में सौंपकर रावण को बड़ा हर्ष हुआ। श्रीराम के साथ भारी वैर ठानकर वह राक्षस मोहवश आनन्द मानने लगा॥३०॥
सर्ग ५५
संदिश्य राक्षसान् घोरान् रावणोऽष्टौ महाबलान्।
आत्मानं बुद्धिवैक्लव्यात् कृत्कृत्यममन्यत॥१॥
इस प्रकार आठ महाबली भयंकर राक्षसों को जनस्थान में जाने की आज्ञा दे रावण ने विपरीत बुद्धि के कारण अपने को कृतकृत्य माना॥१॥
स चिन्तयानो वैदेहीं कामबाणैः प्रपीडितः।
प्रविवेश गृहं रम्यं सीतां द्रष्टमभित्वरन्॥२॥
वह विदेहकुमारी सीता का स्मरण करके कामबाणों से अत्यन्त पीड़ित हो रहा था; अतः उन्हें देखने के लिये उसने बड़ी उतावली के साथ अपने रमणीय अन्तःपुर में प्रवेश किया॥२॥
स प्रविश्य तु तद्देश्म रावणो राक्षसाधिपः।
अपश्यद् राक्षसीमध्ये सीतां दुःखपरायणाम्॥३॥
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां शोकभारावपीडिताम्।
वायुवेगैरिवाक्रान्तां मज्जन्तीं नावमर्णवे॥४॥
मृगयूथपरिभ्रष्टां मृगी श्वभिरिवावृताम्।
उस भवन में प्रवेश करके राक्षसों के राजा रावण ने देखा कि सीता राक्षसियों के बीच में बैठकर दुःख में डूबी हुई हैं। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और वे शोक के दुस्सह भार से अत्यन्त पीड़ित एवं दीन हो वायु के वेग से आक्रान्त हो समुद्र में डूबती हुई नौका के समान जान पड़ती हैं। मृगों के यूथ से बिछुड़कर कुत्तों से घिरी हुई अकेली हरिणी के समान दिखायी देती हैं॥३-४ १/२॥
अधोगतमुखीं सीतां तामभ्येत्य निशाचरः॥५॥
तां तु शोकवशाद् दीनामवशां राक्षसाधिपः।
सबलाद् दर्शयामास गृहं देवगृहोपमम्॥६॥
शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीता के पास पहुँचकर राक्षसों के राजा निशाचर रावण ने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृह के समान सुन्दर भवन का दर्शन कराया॥५-६॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधं स्त्रीसहस्रनिषेवितम्।
नानापक्षिगणैर्जुष्टं नानारत्नसमन्वितम्॥७॥
वह ऊँचे-ऊँचे महलों और सातमंजिले मकानों से भरा हुआ था। उसमें सहस्रों स्त्रियाँ निवास करती थीं। झुंड-के-झुंड नाना जाति के पक्षी वहाँ कलरव करते थे। नाना प्रकार के रत्न उस अन्तःपुर की शोभा बढ़ाते थे॥७॥
दान्तकैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैस्तथा।
वज्रवैदूर्यचित्रैश्च स्तम्भैदृष्टिमनोरमैः॥८॥
उसमें बहुत-से मनोहर खंभे लगे थे, जो हाथीदाँत, पक्के सोने, स्फटिकमणि, चाँदी, हीरा और वैदूर्यमणि (नीलम) से जटित होने के कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे॥८॥
दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषं तप्तकाञ्चनभूषणम्।
सोपानं काञ्चनं चित्रमारुरोह तया सह॥९॥
उस महल में दिव्य दुन्दुभियों का मधुर घोष होता रहता था। उस अन्तःपुर को तपाये हुए सुवर्ण के आभूषणों से सजाया गया था। रावण सीता को साथ लेकर सोने की बनी हुई विचित्र सीढ़ीपर चढ़ा॥९॥
दान्तका राजताश्चैव गवाक्षाः प्रियदर्शनाः।
हेमजालावृताश्चासंस्तत्र प्रासादपङ्क्तयः॥१०॥
वहाँ हाथीदाँत और चाँदी की बनी हुई खिड़कियाँ थीं, जो बड़ी सुहावनी दिखायी देती थीं। सोने की जालियों से ढकी हुई प्रासादमालाएँ भी दृष्टिगोचर होती थीं॥१०॥
सुधामणिविचित्राणि भूमिभागानि सर्वशः।
दशग्रीवः स्वभवने प्रादर्शयत मैथिलीम्॥११॥
उस महल में जो भूभाग (फर्श) थे, वे सुर्थी चूना के पक्के बनाये गये थे और उनमें मणियाँ जड़ी गयी थीं, जिनसे वे सब-के-सब विचित्र दिखायी देते थे। दशग्रीव ने अपने महल की वे सारी वस्तुएँ मैथिलीको दिखायीं॥११॥
दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च नानापुष्पसमावृताः।
रावणो दर्शयामास सीतां शोकपरायणाम्॥१२॥
रावण ने बहुत-सी बावड़ियाँ और भाँति-भाँति के फूलों से आच्छादित बहुत-सी पोखरियाँ भी सीता को दिखायीं। सीता वह सब देखकर शोक में डूब गयीं॥१२॥
दर्शयित्वा तु वैदेहीं कृत्स्नं तद्भवनोत्तमम्।
उवाच वाक्यं पापात्मा सीतां लोभितुमिच्छया॥१३॥
वह पापात्मा निशाचर विदेहनन्दिनी सीता को अपना सारा सुन्दर भवन दिखाकर उन्हें लुभाने की इच्छा से इस प्रकार बोला-॥१३॥
दश राक्षसकोट्यश्च द्वाविंशतिरथापराः।
वर्जयित्वा जरावृद्धान् बालांश्च रजनीचरान्॥१४॥
तेषां प्रभुरहं सीते सर्वेषां भीमकर्मणाम्।
सहस्रमेकमेकस्य मम कार्यपुरःसरम्॥१५॥
‘सीते! मेरे अधीन बत्तीस करोड़ राक्षस हैं। यह संख्या बूढ़े और बालक निशाचरों को छोड़कर बतायी गयी है। भयंकर कर्म करने वाले इन सभी राक्षसों का मैं ही स्वामी हूँ। अकेले मेरी सेवा में एक हजार राक्षस रहते हैं॥१४-१५॥
यदिदं राज्यतन्त्रं मे त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
जीवितं च विशालाक्षि त्वं मे प्राणैर्गरीयसी॥१६॥
‘विशाललोचने! मेरा यह सारा राज्य और जीवन तुम पर ही अवलम्बित है (अथवा यह सब कुछ तुम्हारे चरणों में समर्पित है)। तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो॥१६॥
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां मम योऽसौ परिग्रहः।
तासां त्वमीश्वरी सीते मम भार्या भव प्रिये॥१७॥
‘सीते! मेरा अन्तःपुर मेरी बहुत-सी सुन्दरी भार्याओं से भरा हुआ है, तुम उन सबकी स्वामिनी बनो—प्रिये! मेरी भार्या बन जाओ॥१७॥
साधु किं तेऽन्यथाबुद्ध्या रोचयस्व वचो मम।
भजस्व माभितप्तस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि॥१८॥
‘मेरे इस हितकर वचन को मान लो-इसे पसंद करो; इससे विपरीत विचार को मन में लाने से तुम्हें क्या लाभ होगा? मुझे अङ्गीकार करो। मैं पीड़ित हूँ, मुझपर कृपा करो॥१८॥
परिक्षिप्ता समुद्रेण लङ्केयं शतयोजना।
नेयं धर्षयितुं शक्या सेन्ट्रैरपि सुरासुरैः॥१९॥
‘समुद्र से घिरी हुई इस लङ्का के राज्य का विस्तार सौ योजन है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकते॥१९॥
न देवेषु न यक्षेषु न गन्धर्वेषु नर्षिषु।
अहं पश्यामि लोकेषु यो मे वीर्यसमो भवेत्॥२०॥
‘देवताओं, यक्षों, गन्धर्वो तथा ऋषियों में भी मैं किसी को ऐसा नहीं देखता, जो पराक्रम में मेरी समानता कर सके॥२०॥
राज्यभ्रष्टेन दीनेन तापसेन पदातिना।
किं करिष्यसि रामेण मानुषेणाल्पतेजसा॥२१॥
‘राम तो राज्य से भ्रष्ट, दीन, तपस्वी, पैदल चलने वाले और मनुष्य होने के कारण अल्प तेजवाले हैं, उन्हें लेकर क्या करोगी?॥२१॥
भजस्व सीते मामेव भर्ताहं सदृशस्तव।
यौवनं त्वध्रुवं भीरु रमस्वेह मया सह॥२२॥
‘सीते! मुझको ही अपनाओ ! मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ। भीरु ! जवानी सदा रहने वाली नहीं है, अतः यहाँ रहकर मेरे साथ रमण करो॥२२॥
दर्शने मा कृथा बुद्धिं राघवस्य वरानने।
कास्य शक्तिरिहागन्तुमपि सीते मनोरथैः॥२३॥
‘वरानने! सीते! अब तुम राम के दर्शन का विचार छोड़ दो। इस राम में इतनी शक्ति कहाँ है कि यहाँ तक आने का मनोरथ भी कर सके॥२३॥
न शक्यो वायुराकाशे पाशैर्बद्धु महाजवः।
दीप्यमानस्य वाप्यग्नेर्ग्रहीतुं विमलाः शिखाः॥२४॥
‘आकाश में महान् वेग से बहने वाली वायु को रस्सियों में नहीं बाँधा जा सकता अथवा प्रज्वलित अग्नि की निर्मल ज्वालाओं को हाथों से नहीं पकड़ा जा सकता॥२४॥
त्रयाणामपि लोकानां न तं पश्यामि शोभने।
विक्रमेण नयेद् यस्त्वां मद्बाहुपरिपालिताम्॥२५॥
‘शोभने ! मैं तीनों लोकों में किसी ऐसे वीर को नहीं देखता, जो मेरी भुजाओं से सुरक्षित तुमको पराक्रम करके यहाँ से ले जा सके॥२५॥
लङ्कायाः सुमहद्राज्यमिदं त्वमनुपालय।
त्वत्प्रेष्या मद्विधाश्चैव देवाश्चापि चराचरम्॥२६॥
‘लङ्का के इस विशाल राज्य का तुम्ही पालन करो। मुझ-जैसे राक्षस, देवता तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारे सेवक बनकर रहेंगे॥२६॥
अभिषेकजलक्लिन्ना तुष्टा च रमयस्व च।
दुष्कृतं यत्पुरा कर्म वनवासेन तद्गतम्॥२७॥
यच्च ते सुकृतं कर्म तस्येह फलमाप्नहि।
‘स्नान के जल से आर्द्र (अथवा लङ्का के राज्यपर अपना अभिषेक कराकर उसके जल से आर्द्र) होकर संतुष्ट हो तुम अपने-आपको क्रीड़ाविनोद में लगाओ। तुम्हारा पहले का जो दुष्कर्म था, वह वनवास का कष्ट देकर समाप्त हो गया। अब जो तुम्हारा पुण्यकर्म शेष है, उसका फल यहाँ भोगो॥२७॥
इह सर्वाणि माल्यानि दिव्यगन्धानि मैथिलि। २८॥
भूषणानि च मुख्यानि तानि सेव मया सह।
‘मिथिलेशकुमारी! तुम मेरे साथ यहाँ रहकर सब प्रकार के पुष्पहार, दिव्य गन्ध और श्रेष्ठ आभूषण आदि का सेवन करो॥२८ १/२॥
पुष्पकं नाम सुश्रोणि भ्रातुर्वैश्रवणस्य मे॥२९॥
विमानं सूर्यसंकाशं तरसा निर्जितं रणे।
विशालं रमणीयं च तद्विमानं मनोजवम्॥३०॥
तत्र सीते मया सार्धं विहरस्व यथासुखम्।
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरि! वह सूर्य के समान प्रकाशित होने वाला पुष्पकविमान मेरे भाई कुबेर का था। उसे मैंने बलपूर्वक जीता है। यह अत्यन्त रमणीय, विशाल तथा मन के समान वेग से चलने वाला है। सीते! तुम उसके ऊपर मेरे साथ बैठकर सुखपूर्वक विहार करो॥२९-३० १/२॥
वदनं पद्मसंकाशं विमलं चारुदर्शनम्॥३१॥
शोकार्तं तु वरारोहे न भ्राजति वरानने।
‘वरारोहे सुमुखि! तुम्हारा यह कमल के समान सुन्दर निर्मल और मनोहर दिखायी देने वाला मुख शोक से पीड़ित होने के कारण शोभा नहीं पा रहा है’॥३१ १/२॥
एवं वदति तस्मिन् सा वस्त्रान्तेन वराङ्गना॥३२॥
पिधायेन्दुनिभं सीता मन्दमश्रूण्यवर्तयत्।
जब रावण ऐसी बातें कहने लगा, तब परमसुन्दरी सीता देवी चन्द्रमा के समान मनोहर अपने मुख को आँचल से ढककर धीरे-धीरे आँसू बहाने लगीं॥३२ १/२॥
ध्यायन्ती तामिवास्वस्थां सीतां चिन्ताहतप्रभाम्॥३३॥
उवाच वचनं वीरो रावणो रजनीचरः।
सीता शोक से अस्वस्थ-सी हो रही थीं, चिन्ता से उनकी कान्ति नष्ट-सी हो गयी थी और वे भगवान राम का ध्यान करने लगी थीं। उस अवस्था में उनसे वह वीर निशाचर रावण इस प्रकार बोला-॥३३ १/२॥
अलं व्रीडेन वैदेहि धर्मलोपकृतेन ते॥३४॥
आर्षोऽयं देवि निष्पन्दो यस्त्वामभिभविष्यति।
‘विदेहनन्दिनि ! अपने पति के त्याग और परपुरुष के अङ्गीकार से जो धर्मलोप की आशङ्का होती है, उसके कारण तुम्हें यहाँ लज्जा नहीं होनी चाहिये, इस तरहकी लाज व्यर्थ है। देवि! तुम्हारे साथ जो मेरा स्नेह सम्बन्ध होगा, यह आर्ष धर्मशास्त्रोंद् वारा समर्थित है॥३४ १/२॥
एतौ पादौ मया स्निग्धौ शिरोभिः परिपीडितौ॥३५॥
प्रसादं कुरु मे क्षिप्रं वश्यो दासोऽहमस्मि ते।
‘तुम्हारे इन कोमल एवं चिकने चरणों पर मैं अपने ये दसों मस्तक रख रहा हूँ। अब शीघ्र मुझपर कृपा करो। मैं सदा तुम्हारे अधीन रहनेवाला दास हूँ॥३५ १/२॥
इमाः शून्या मया वाचः शुष्यमाणेन भाषिताः॥
न चापि रावणः कांचिन्मूर्ना स्त्री प्रणमेत ह।
‘मैंने कामाग्नि से संतप्त होकर ये बातें कही हैं। ये शून्य (निष्फल) न हों, ऐसी कृपा करो; क्योंकि रावण किसी स्त्री को सिर झुकाकर प्रणाम नहीं करता, (केवल) तुम्हारे सामने इसका मस्तक झुका है’॥३६ १/२॥
एवमुक्त्वा दशग्रीवो मैथिली जनकात्मजाम्।
कृतान्तवशमापन्नो ममेयमिति मन्यते॥३७॥
मिथिलेशकुमारी जानकी से ऐसा कहकर काल के वशीभूत हुआ रावण मन-ही-मन मानने लगा कि ‘यह अब मेरे अधीन हो गयी’॥३७॥
सर्ग ५६
सा तथोक्ता तु वैदेही निर्भया शोककर्शिता।
तृणमन्तरतः कृत्वा रावणं प्रत्यभाषत॥१॥
रावण के ऐसा कहने पर शोक से कष्ट पाती हुई विदेह-राजकुमारी सीता बीच में तिनके की ओट करके उस निशाचर से निर्भय होकर बोलीं-॥१॥
राजा दशरथो नाम धर्मसेतुरिवाचलः।
सत्यसंधः परिज्ञातो यस्य पुत्रः स राघवः॥२॥
रामो नाम स धर्मात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः।
दीर्घबाहुर्विशालाक्षो दैवतं स पतिर्मम॥३॥
‘महाराज दशरथ धर्म के अचल सेतु के समान थे। वे अपनी सत्यप्रतिज्ञता के लिये सर्वत्र विख्यात थे। । उनके पुत्र जो रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे भी अपने धर्मात्मापन के लिये तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं, उनकी भुजाएँ लंबी और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे ही मेरे आराध्य देवता और पति हैं॥२-३॥
इक्ष्वाकूणां कुले जातः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा यस्ते प्राणान् वधिष्यति॥४॥
‘उनका जन्म इक्ष्वाकुकुल में हुआ है। उनके कंधे सिंह के समान और तेज महान् है। वे अपने भाई लक्ष्मण के साथ आकर तेरे प्राणों का विनाश कर डालेंगे॥४॥
प्रत्यक्षं यद्यहं तस्य त्वया वै धर्षिता बलात्।
शयिता त्वं हतः संख्ये जनस्थाने यथा खरः॥५॥
‘यदि तू उनके सामने बलपूर्वक मेरा अपहरण करता तो अपने भाई खर की तरह जनस्थान के युद्धस्थल में ही मारा जाकर सदा के लिये सो जाता॥५॥
य एते राक्षसाः प्रोक्ता घोररूपा महाबलाः।
राघवे निर्विषाः सर्वे सुपर्णे पन्नगा यथा॥६॥
‘तूने जो इन घोर रूपधारी महाबली राक्षसों की चर्चा की है, श्रीराम के पास जाते ही इन सबका विष उतर जायगा; ठीक उसी तरह जैसे गरुड़ के पास सारे सर्प विष के प्रभाव से रहित हो जाते हैं॥६॥
तस्य ज्याविप्रमुक्तास्ते शराः काञ्चनभूषणाः।
शरीरं विधमिष्यन्ति गङ्गाकूलमिवोर्मयः॥७॥
‘जैसे बढ़ी हुई गङ्गा की लहरें अपने कगारों को काट गिराती हैं, उसी प्रकार श्रीराम के धनुष की डोरी से छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण तेरे शरीर को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे॥७॥
असुरैर्वा सुरैर्वा त्वं यद्यवध्योऽसि रावण।
उत्पाद्य सुमहद् वैरं जीवंस्तस्य न मोक्ष्यसे॥८॥
‘रावण! तू असुरों अथवा देवताओं से यदि अवध्य है तो सम्भव है वे तुझे न मार सकें; किंतु भगवान् श्रीराम के साथ यह महान् वैर ठानकर तू किसी तरह जीवित नहीं छूट सकेगा॥८॥
स ते जीवितशेषस्य राघवोऽन्तकरो बली।
पशो!पगतस्येव जीवितं तव दुर्लभम्॥९॥
‘श्रीरघुनाथजी बड़े बलवान् हैं। वे तेरे शेष जीवन का अन्त कर डालेंगे। यूप में बँधे हुए पशु की भाँति तेरा जीवन दुर्लभ हो जायगा॥९॥
यदि पश्येत् स रामस्त्वां रोषदीप्तेन चक्षुषा।
रक्षस्त्वमद्य निर्दग्धो यथा रुद्रेण मन्मथः॥१०॥
‘राक्षस! यदि श्रीरामचन्द्रजी अपनी रोषभरी दृष्टि से तुझे देख लें तो तू अभी उसी तरह जलकर खाक हो जायगा जैसे भगवान् शङ्कर ने कामदेव को भस्म किया था॥१०॥
यश्चन्द्र नभसो भूमौ पातयेन्नाशयेत वा।
सागरं शोषयेद वापि स सीतां मोचयेदिह॥११॥
‘जो चन्द्रमा को आकाश से पृथ्वी पर गिराने या नष्ट करने की शक्ति रखते हैं अथवा जो समुद्र को भी सुखा सकते हैं, वे भगवान् श्रीराम यहाँ पहुँचकर सीता को भी छुड़ा सकते हैं॥११॥
गतासुस्त्वं गतश्रीको गतसत्त्वो गतेन्द्रियः।
लङ्का वैधव्यसंयुक्ता त्वत्कृतेन भविष्यति॥१२॥
‘तू समझ ले कि तेरे प्राण अब चले गये। तेरी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी। तेरे बल और इन्द्रियों का भी नाश हो गया तथा तेरे ही पाप के कारण तेरी यह लङ्का भी अब विधवा हो जायगी॥१२॥
न ते पापमिदं कर्म सुखोदकं भविष्यति।
याहं नीता विनाभावं पतिपार्वात् त्वया बलात्॥१३॥
‘तेरा यह पापकर्म तुझे भविष्य में सुख नहीं भोगने देगा; क्योंकि तूने मुझे बलपूर्वक पति के पास से दूर हटाया है॥१३॥
स हि देवरसंयुक्तो मम भर्ता महाद्युतिः।
निर्भयो वीर्यमाश्रित्य शून्ये वसति दण्डके॥१४॥
‘मेरे स्वामी महान् तेजस्वी हैं और मेरे देवर के साथ अपने ही पराक्रमका भरोसा करके सूने दण्डकारण्य में निर्भयतापूर्वक निवास करते हैं॥१४॥
स ते वीर्यं बलं दर्पमुत्सेकं च तथाविधम्।
अपनेष्यति गात्रेभ्यः शरवर्षेण संयुगे॥१५॥
‘वे युद्ध में बाणों की वर्षा करके तेरे शरीर से बल, पराक्रम, घमंड तथा ऐसे उच्छृङ्खल आचरण को भी निकाल बाहर करेंगे॥१५॥
यदा विनाशो भूतानां दृश्यते कालचोदितः।
तदा कार्ये प्रमाद्यन्ति नराः कालवशं गताः॥१६॥
जब काल की प्रेरणा से प्राणियों का विनाश निकट आता है, उस समय मृत्यु के अधीन हुए जीव प्रत्येक कार्य में प्रमाद करने लगते हैं॥१६॥
मां प्रधृष्य स ते कालः प्राप्तोऽयं राक्षसाधम।
आत्मनो राक्षसानां च वधायान्तःपुरस्य च॥१७॥
‘अधम निशाचर ! मेरा अपहरण करने के कारण तेरे लिये भी वही काल आ पहुँचा है। तेरे अपने लिये, सारे राक्षसों के लिये तथा इस अन्तःपुर के लिये भी विनाश की घडी निकट आ गयी है॥१७॥
न शक्या यज्ञमध्यस्था वेदिः मुग्भाण्डमण्डिता।
द्विजातिमन्त्रसम्पूता चण्डालेनावमर्दितुम्॥१८॥
‘यज्ञशाला के बीच की वेदी पर, जो द्विजातियों के मन्त्रद्वारा पवित्र की गयी होती है तथा जिसे सुक्, सुवा आदि यज्ञपात्र सुशोभित करते हैं, चाण्डाल अपना पैर नहीं रख सकता॥१८॥
तथा धर्मनित्यस्य धर्मपत्नी दृढव्रता।
त्वया स्प्रष्टं न शक्याहं राक्षसाधम पापिना॥१९॥
‘उसी प्रकार मैं नित्य धर्मपरायण भगवान् श्रीराम की धर्मपत्नी हूँ तथा दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्यधर्म का पालन करती हूँ (अतः यज्ञवेदी के समान हूँ) और राक्षसाधम! तू महापापी है (अतः चाण्डाल के तुल्य है); इसलिये मेरा स्पर्श नहीं कर सकता॥१९॥
क्रीडन्ती राजहंसेन पद्मषण्डेषु नित्यशः।
हंसी सा तृणमध्यस्थं कथं द्रक्ष्येत मद्गुकम्॥२०॥
‘जो सदा कमल के समूहों में राजहंस के साथ क्रीड़ा करती है, वह हंसी तृणों में रहने वाले जलकाक की ओर कैसे दृष्टिपात करेगी॥२०॥
इदं शरीरं निःसंज्ञं बन्ध वा घातयस्व वा।
नेदं शरीरं रक्ष्यं मे जीवितं वापि राक्षस॥२१॥
‘राक्षस! तू इस संज्ञाशून्य जड शरीर को बाँधकर रख ले या काट डाल। मैं स्वयं ही इस शरीर और जीवन को नहीं रखना चाहती॥२१॥
न तु शक्यमपक्रोशं पृथिव्यां दातुमात्मनः।
एवमुक्त्वा तु वैदेही क्रोधात् सुपरुषं वचः॥२२॥
रावणं जानकी तत्र पुनर्नोवाच किंचन।
‘मैं इस भूतल पर अपने लिये निन्दा या कलङ्क देने वाला कोई कार्य नहीं कर सकती।’ रावण से क्रोधपूर्वक यह अत्यन्त कठोर वचन कहकर विदेहकुमारी जानकी चुप हो गयीं; वे वहाँ फिर कुछ नहीं बोलीं॥२२ १/२॥
सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं रोमहर्षणम्॥२३॥
प्रत्युवाच ततः सीतां भयसंदर्शनं वचः।
सीता का वह कठोर वचन रोंगटे खड़े कर देने वाला था। उसे सुनकर रावण ने उनसे भय दिखाने वाली बात कही-॥२३ १/२॥
शृणु मैथिलि मद्वाक्यं मासान् द्वादश भामिनि॥२४॥
कालेनानेन नाभ्येषि यदि मां चारुहासिनि।
ततस्त्वां प्रातराशार्थं सूदाश्छेत्स्यन्ति लेशशः॥२५॥
‘मनोहर हास्यवाली भामिनि! मिथिलेशकुमारी! मेरी बात सुन लो। मैं तुम्हें बारह महीने का समय देता हूँ। इतने समय में यदि तुम स्वेच्छापूर्वक मेरे पास नहीं आओगी तो मेरे रसोइये सबेरे का कलेवा तैयार करने के लिये तुम्हारे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे’॥२४-२५॥
इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणः शत्रुरावणः।
राक्षसीश्च ततः क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्॥२६॥
सीता से ऐसी कठोर बात कहकर शत्रुओं को रुलाने वाला रावण कुपित हो राक्षसियों से इस प्रकार बोला-॥२६॥
शीघ्रमेव हि राक्षस्यो विरूपा घोरदर्शनाः।
दर्पमस्यापनेष्यन्तु मांसशोणितभोजनाः॥२७॥
‘अपने विकराल रूप के कारण भयङ्कर दिखायी देने वाली तथा रक्त-मांस का आहार करने वाली राक्षसियो! तुम लोग शीघ्र ही इस सीता का अहंकार दूर करो’॥२७॥
वचनादेव तास्तस्य सुघोरा घोरदर्शनाः।
कृतप्राञ्जलयो भूत्वा मैथिली पर्यवारयन्॥२८॥
रावण के इतना कहते ही वे भयंकर दिखायी देने वाली अत्यन्त घोर राक्षसियाँ हाथ जोड़े मैथिली को चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गयीं॥२८॥
स ताः प्रोवाच राजासौ रावणो घोरदर्शनाः।
प्रचल्य चरणोत्कर्दारयन्निव मेदिनीम्॥२९॥
तब राजा रावण अपने पैरों के धमाके से पृथ्वी को विदीर्ण करता हुआ-सा दो-चार पग चलकर उन भयानक राक्षसियों से बोला-॥२९॥
अशोकवनिकामध्ये मैथिली नीयतामिति।
तत्रेयं रक्ष्यतां गूढं युष्माभिः परिवारिता॥३०॥
‘निशाचरियो! तुमलोग मिथिलेशकुमारी सीता को अशोकवाटिका में ले जाओ और चारों ओर से घेरकर वहाँ गूढ़ भाव से इसकी रक्षा करती रहो॥३०॥
तत्रैनां तर्जनैोरैः पुनः सान्त्वैश्च मैथिलीम्।
आनयध्वं वशं सर्वा वन्यां गजवधूमिव॥३१॥
‘वहाँ पहले तो भयंकर गर्जन-तर्जन करके इसे डराना; फिर मीठे-मीठे वचनों से समझा-बुझाकर जंगल की हथिनी की भाँति इस मिथिलेशकुमारी को तुम सब लोग वश में लाने की चेष्टा करना’॥३१॥
इति प्रतिसमादिष्टा राक्षस्यो रावणेन ताः।
अशोकवनिकां जग्मुर्मैथिली परिगृह्य तु॥३२॥
रावण के इस प्रकार आदेश देने पर वे राक्षसियाँ मैथिली को साथ लेकर अशोकवाटिका में चली गयीं॥३२॥
सर्वकामफलैर्वृक्षैर्नानापुष्पफलैर्वृताम्।
सर्वकालमदैश्चापि द्विजैः समुपसेविताम्॥३३॥
वह वाटिका समस्त कामनाओं को फलरूप में प्रदान करने वाले कल्पवृक्षों तथा भाँति-भाँति के फल फूलवाले दूसरे-दूसरे वृक्षों से भी भरी थी तथा हर समय मदमत्त रहने वाले पक्षी उसमें निवास करते थे॥३३॥
सा तु शोकपरीताङ्गी मैथिली जनकात्मजा।
राक्षसीवशमापन्ना व्याघ्रीणां हरिणी यथा॥३४॥
परंतु वहाँ जाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी के अङ्ग-अङ्ग में शोक व्याप्त हो गया। राक्षसियों के वश में पड़कर उनकी दशा बाघिनों के बीच में घिरी हुई हरिणी के समान हो गयी थी॥३४॥
शोकेन महता ग्रस्ता मैथिली जनकात्मजा।
न शर्म लभते भीरुः पाशबद्धा मृगी यथा॥३५॥
महान् शोक से ग्रस्त हुई मिथिलेशनन्दिनी जानकी जाल में फँसी हुई मृगी के समान भयभीत हो क्षणभर के लिये भी चैन नहीं पाती थीं॥३५॥
न विन्दते तत्र तु शर्म मैथिली विरूपनेत्राभिरतीव तर्जिता।
पतिं स्मरन्ती दयितं च देवरं विचेतनाभूद् भयशोकपीडिता॥३६॥
विकराल रूप और नेत्रोंवाली राक्षसियों की अत्यन्त डाँट-फटकार सुनने के कारण मिथिलेशकुमारीसीता को वहाँ शान्ति नहीं मिली। वे भय और शोक से पीड़ित हो प्रियतम पति और देवर का स्मरण करती हुई अचेत-सी हो गयीं॥३६॥
प्रक्षिप्त खंड
प्रवेशितायां सीतायां लङ्कां प्रति पितामहः।
तदा प्रोवाच देवेन्द्र परितुष्टं शतक्रतुम्॥१॥
जब सीता का लङ्का में प्रवेश हो गया, तब पितामह ब्रह्माजी ने संतुष्ट हुए देवराज इन्द्र से इस प्रकार कहा –॥१॥
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय रक्षसामहिताय च।
लङ्कां प्रवेशिता सीता रावणेन दुरात्मना॥२॥
‘देवराज! तीनों लोकों के हित और राक्षसों के विनाश के लिये दुरात्मा रावण ने सीता को लङ्का में पहुँचा दिया॥२॥
पतिव्रता महाभागा नित्यं चैव सुखैधिता।
अपश्यन्ती च भर्तारं पश्यन्ती राक्षसीजनम्॥३॥
राक्षसीभिः परिवृता भर्तृदर्शनलालसा।
‘पतिव्रता महाभागा जानकी सदा सुख में ही पली हैं। इस समय वे अपने पति के दर्शन से वंचित हो गयी हैं और राक्षसियों से घिरी रहने के कारण सदा उन्हीं को अपने सामने देखती हैं। उनके हृदय में अपने पति के दर्शन की तीव्र लालसा बनी हुई है॥३ १/२॥
निविष्टा हि पुरी लङ्का तीरे नदनदीपतेः॥४॥
कथं ज्ञास्यति तां रामस्तत्रस्थां तामनिन्दिताम्।
‘लङ्कापुरी समुद्र के तट पर बसी हुई है। वहाँ रहती हुई सती-साध्वी सीता का पता श्रीरामचन्द्रजी को कैसे लगेगा॥४ १/२॥
दुःखं संचिन्तयन्ती सा बहुशः परिदुर्लभा॥५॥
प्राणयात्रामकुर्वाणा प्राणांस्त्यक्ष्यत्यसंशयम्।
स भूयः संशयो जातः सीतायाः प्राणसंक्षये॥६॥
‘सीता दुःख के साथ नाना प्रकार की चिन्ताओं में डूबी रहती हैं। पति के लिये इस समय वे अत्यन्त दुर्लभ हो गयी हैं। प्राणयात्रा (भोजन) नहीं करती हैं; अतः ऐसी दशा में निःसंदेह वे अपने प्राणों का परित्याग कर देंगी। सीता के प्राणों का क्षय हो जाने पर हमारे उद्देश्य की सिद्धि में पुनः पूर्ववत् संदेह उपस्थित हो जायगा॥५-६॥
स त्वं शीघ्रमितो गत्वा सीतां पश्य शुभाननाम्।
प्रविश्य नगरी लङ्कां प्रयच्छ हविरुत्तमम्॥७॥
‘अतः तुम शीघ्र ही यहाँसे जाकर लङ्कापुरी में प्रवेश करके सुमुखी सीता से मिलो और उन्हें उत्तम हविष्य प्रदान करो’॥७॥
एवमुक्तोऽथ देवेन्द्रः पुरीं रावणपालिताम्।
आगच्छन्निद्रया सार्धं भगवान् पाकशासनः॥८॥
ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर पाकशासन भगवान् इन्द्र निद्रा को साथ लेकर रावण द्वारा पालित लङ्कापुरी में आये॥८॥
निद्रां चोवाच गच्छ त्वं राक्षसान् सम्प्रमोहय।
सा तथोक्ता मघवता देवी परमहर्षिता॥९॥
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं प्रामोहयत राक्षसान्।
वहाँ आकर इन्द्र ने निद्रा से कहा-’तुम राक्षसों को मोहित करो।’ इन्द्र से ऐसी आज्ञा पाकर देवी निद्रा बहुत प्रसन्न हुईं। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये उन्होंने राक्षसों को मोह (निद्रा) में डाल दिया॥९ १/२॥
एतस्मिन्नन्तरे देवः सहस्राक्षः शचीपतिः॥१०॥
आससाद वनस्थां तां वचनं चेदमब्रवीत्।
इसी बीच में सहस्र नेत्रधारी शचीपति देवराज इन्द्र अशोकवाटिका में बैठी हुई सीता के पास गये और इस प्रकार बोले-॥१० १/२॥
देवराजोऽस्मि भद्रं ते इह चास्मि शुचिस्मिते॥११॥
अहं त्वां कार्यसिद्ध्यर्थं राघवस्य महात्मनः।
साहाय्यं कल्पयिष्यामि मा शुचो जनकात्मजे॥१२॥
‘पवित्र मुसकानवाली देवि! आपका भला हो। मैं देवराज इन्द्र यहाँ आपके पास आया हूँ। जनककिशोरी! मैं आपके उद्धारकार्य की सिद्धि के लिये महात्मा श्रीरघुनाथजी की सहायता करूँगा, अतः आप शोक न करें॥११-१२॥
मत्प्रसादात् समुद्रं स तरिष्यति बलैः सह।
मयैवेह च राक्षस्यो मायया मोहिताः शुभे॥१३॥
‘वे मेरे प्रसाद से बड़ी भारी सेना के साथ समुद्र को पार करेंगे। शुभे! मैंने ही यहाँ इन राक्षसियों को अपनी माया से मोहित किया है॥१३॥
तस्मादन्नमिदं सीते हविष्यान्नमहं स्वयम्।
स त्वां संगृह्य वैदेहि आगतः सह निद्रया॥१४॥
‘विदेहनन्दिनी सीते! इसलिये मैं स्वयं ही यह भोजन-यह हविष्यान्न लेकर निद्रा के साथ तुम्हारे पास आया हूँ॥१४॥
एतदत्स्यसि मद्धस्तान्न त्वां बाधिष्यते शुभे।
क्षुधा तृषा च रम्भोरु वर्षाणामयुतैरपि॥१५॥
‘शुभे! रम्भोरु ! यदि मेरे हाथ से इस हविष्य को लेकर खा लोगी तो तुम्हें हजारों वर्षों तक भूख और प्यास नहीं सतायेगी’॥१५॥
एवमुक्ता तु देवेन्द्रमुवाच परिशङ्किता।
कथं जानामि देवेन्द्रं त्वामिहस्थं शचीपतिम्॥
देवराज के ऐसा कहने पर शङ्कित हुई सीता ने उनसे कहा-’मुझे कैसे विश्वास हो कि आप शचीपति देवराज इन्द्र ही यहाँ पधारे हैं ?॥१६॥
देवलिङ्गानि दृष्टानि रामलक्ष्मणसंनिधौ।
तानि दर्शय देवेन्द्र यदि त्वं देवराट् स्वयम्॥१७॥
‘देवेन्द्र! मैंने श्रीराम और लक्ष्मण के समीप देवताओं के लक्षण अपनी आँखों देखे हैं। यदि आप साक्षात् देवराज हैं तो उन लक्षणों को दिखाइये’। १७॥
सीताया वचनं श्रुत्वा तथा चक्रे शचीपतिः।
पृथिवीं नास्पृशत् पद्भ्यामनिमेषेक्षणानि च॥१८॥
अरजोऽम्बरधारी च न म्लानकुसुमस्तथा।
तं ज्ञात्वा लक्षणैः सीता वासवं परिहर्षिता॥१९॥
सीता की यह बात सुनकर शचीपति इन्द्र ने वैसा ही किया। उन्होंने अपने पैरों से पृथ्वी का स्पर्श नहीं किया आकाश में निराधार खड़े रहे। उनकी आँखों की पलकें नहीं गिरती थीं। उन्होंने जो वस्त्र धारण किया था, उस पर धूल का स्पर्श नहीं होता था। उनके कण्ठ में जो पुष्पमाला थी, उसके पुष्प कुम्हलाते नहीं थे। देवोचित लक्षणों से इन्द्र को पहचानकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं॥१८-१९॥
उवाच वाक्यं रुदती भगवन् राघवं प्रति।
सह भ्रात्रा महाबाहुर्दिष्ट्या मे श्रुतिमागतः॥२०॥
वे भगवान् श्रीराम के लिये रोती हुई बोलीं-’भगवन्! सौभाग्य की बात है कि आज भाईसहित महाबाहु श्रीराम का नाम मेरे कानों में पड़ा है॥२०॥
यथा मे श्वशुरो राजा यथा च मिथिलाधिपः।
तथा त्वामद्य पश्यामि सनाथो मे पतिस्त्वया॥२१॥
‘मेरे लिये जैसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथ तथा पिता मिथिलानरेश जनक हैं, उसी रूप में मैं आज आपको देखती हूँ। मेरे पति आपके द्वारा सनाथ हैं॥२१॥
तवाज्ञया च देवेन्द्र पयोभूतमिदं हविः।
अशिष्यामि त्वया दत्तं रघूणां कुलवर्धनम्॥२२॥
‘देवेन्द्र ! आपकी आज्ञा से मैं यह पायसरूप हविष्य (दूध की बनी हुई खीर), जिसे आपने दिया है, खाऊँगी। यह रघुकुल की वृद्धि करने वाला हो’॥२२॥
इन्द्रहस्ताद् गृहीत्वा तत् पायसं सा शुचिस्मिता।
न्यवेदयत भत्रै सा लक्ष्मणाय च मैथिली॥२३॥
इन्द्र के हाथ से उस खीर को लेकर उन पवित्र मुसकान वाली मैथिली ने मन-ही-मन पहले उसे अपने स्वामी श्रीराम और देवर लक्ष्मण को निवेदन किया और इस प्रकार कहा-॥२३॥
यदि जीवति मे भर्ता सह भ्रात्रा महाबलः।
इदमस्तु तयोर्भक्त्या तदाश्नात् पायसं स्वयम्॥२४॥
‘यदि मेरे महाबली स्वामी अपने भाई के साथ जीवित हैं तो यह भक्तिभाव से उन दोनों के लिये समर्पित है।’ इतना कहने के पश्चात् उन्होंने स्वयं उस खीर को खाया॥२४॥
इतीव तत् प्राश्य हविर्वरानना ङ्केजही क्षधातुःखसमुन्नवं च त ।
इन्द्रात् प्रवृत्तिम् उपलभ्य जानकी काकुत्स्थयोः प्रीतमना बभूव॥२५॥
इस प्रकार उस हविष्य को खाकर सुन्दर मुखवाली जानकी ने भूख-प्यास के कष्ट को त्याग दिया और इन्द्र के मुख से श्रीराम तथा लक्ष्मण का समाचार पाकर वे जनकनन्दिनी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं॥२५॥
स चापि शक्रस्त्रिदिवालयं तदा प्रीतो ययौ राघवकार्यसिद्धये।
आमन्त्र्य सीतां स ततो महात्मा जगाम निद्रासहितः स्वमालयम्॥२६॥
तब निद्रासहित महात्मा देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हो सीता से विदा लेकर श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये अपने निवासस्थान देवलोक को चले गये॥२६॥
सर्ग ५७
राक्षसं मृगरूपेण चरन्तं कामरूपिणम्।
निहत्य रामो मारीचं तूर्णं पथि न्यवर्तत॥१॥
इधर मृगरूप से विचरते हुए उस इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षस मारीच का वध करके श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही आश्रम के मार्ग पर लौटे॥१॥
तस्य संत्वरमाणस्य द्रष्टकामस्य मैथिलीम्।
क्रूरस्वनोऽथ गोमायुर्विननादास्य पृष्ठतः॥२॥
वे सीता को देखने के लिये जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए आ रहे थे। इतने ही में पीछे की ओर से एक सियारिन बड़े कठोर स्वर में चीत्कार करने लगी॥२॥
स तस्य स्वरमाज्ञाय दारुणं रोमहर्षणम्।
चिन्तयामास गोमायोः स्वरेण परिशङ्कितः॥३॥
गीदड़ी के उस स्वर से श्रीरामचन्द्रजी के मन में कुछ शङ्का हुई। उसका स्वर बड़ा ही भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देने वाला था। उसका अनुभव करके वे बड़ी चिन्ता में पड़ गये॥३॥
अशुभं बत मन्येऽहं गोमायुर्वाश्यते यथा।
स्वस्ति स्यादपि वैदेह्या राक्षसैर्भक्षणं विना॥४॥
वे मन-ही-मन कहने लगे-’यह सियारिन जैसी बोली बोल रही है, इससे तो मुझे मालूम हो रहा है कि कोई अशुभ घटना घटित हो गयी। क्या विदेहनन्दिनी सीता कुशल से होंगी? उन्हें राक्षस तो नहीं खा गये?॥
मारीचेन तु विज्ञाय स्वरमालक्ष्य मामकम्।
विक्रुष्टं मृगरूपेण लक्ष्मणः शृणुयाद् यदि॥५॥
‘मृगरूपधारी मारीच ने जान-बूझकर मेरे स्वर का अनुसरण करते हुए जो आर्त-पुकार की थी, वह इसलिये कि शायद इसे लक्ष्मण सुन सकें॥५॥
स सौमित्रिः स्वरं श्रुत्वा तां च हित्वाथ मैथिलीम्।
तयैव प्रहितः क्षिप्रं मत्सकाशमिहैष्यति॥६॥
‘सुमित्रानन्दन लक्ष्मण वह स्वर सुनते ही सीता के ही भेजने पर उसे अकेली छोड़कर तुरंत मेरे पास यहाँ पहुँचने के लिये चल देंगे॥६॥
राक्षसैः सहितैनूनं सीताया ईप्सितो वधः।
काञ्चनश्च मृगो भूत्वा व्यपनीयाश्रमात्तु माम्॥७॥
दूरं नीत्वाथ मारीचो राक्षसोऽभूच्छराहतः।
हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति यदाक्यं व्याजहार ह॥८॥
‘राक्षस लोग तो सब-के-सब मिलकर सीता का वध अवश्य कर देना चाहते हैं। इसी उद्देश्य से यह मारीच राक्षस सोने का मृग बनकर मुझे आश्रम से दूर हटा ले आया था और मेरे बाणों से आहत होने पर जो उसने आर्तनाद करते हुए कहा था कि ‘हा लक्ष्मण! मैं मारा गया’ इसमें भी उसका वही उद्देश्य छिपा था॥७-८॥
अपि स्वस्ति भवेद् द्वाभ्यां रहिताभ्यां मया वने।
जनस्थाननिमित्तं हि कृतवैरोऽस्मि राक्षसैः॥९॥
‘वन में हम दोनों भाइयों के आश्रम से अलग हो जाने पर क्या सीता सकुशल वहाँ रह सकेंगी? जनस्थान में जो राक्षसों का संहार हुआ है, उसके कारण सारे राक्षस मुझसे वैर बाँधे ही हुए हैं॥९॥
निमित्तानि च घोराणि दृश्यन्तेऽद्य बहूनि च।
इत्येवं चिन्तयन् रामः श्रुत्वा गोमायुनिःस्वनम्॥१०॥
निवर्तमानस्त्वरितो जगामाश्रममात्मवान्।
‘आज बहुत-से भयङ्कर अपशकुन भी दिखायी देते हैं।’ सियारिन की बोली सुनकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए मन को वश में रखने वाले श्रीराम तुरंत लौटकर आश्रम की ओर चले॥१० १/२॥
आत्मनश्चापनयनं मृगरूपेण रक्षसा॥११॥
आजगाम जनस्थानं राघवः परिशङ्कितः।
मृगरूपधारी राक्षस के द्वारा अपने को आश्रम से दूर हटाने की घटना पर विचार करके श्रीरघुनाथजी शङ्कित हृदय से जनस्थान को आये॥११ १/२॥
तं दीनमानसं दीनमासेदुर्मृगपक्षिणः॥१२॥
सव्यं कृत्वा महात्मानं घोरांश्च ससृजुः स्वरान्।
उनका मन बहुत दुःखी था। वे दीन हो रहे थे। उसी अवस्था में वन के मृग और पक्षी उन्हें बाँयें रखते हुए वहाँ आये और भयङ्कर स्वर में अपनी बोली बोलने लगे॥१२ १/२॥
तानि दृष्ट्वा निमित्तानि महाघोराणि राघवः।
न्यवर्तताथ त्वरितो जवेनाश्रममात्मनः॥१३॥
उन महाभयङ्कर अपशकुनों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही बड़े वेग से अपने आश्रम की ओर लौटे॥१३॥
ततो लक्ष्मणमायान्तं ददर्श विगतप्रभम्।
ततोऽविदूरे रामेण समीयाय स लक्ष्मणः॥१४॥
इतने ही में उन्हें लक्ष्मण आते दिखायी दिये। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। थोड़ी ही देर में निकट आकर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजी से मिले॥१४॥
विषण्णः सन् विषण्णेन दुःखितो दुःखभागिना।
स जगहेऽथ तं भ्राता दृष्ट्वा लक्ष्मणमागतम्॥१५॥
विहाय सीतां विजने वने राक्षससेविते।
दुःख और विषाद में डूबे हुए लक्ष्मण ने दुःखी और विषादग्रस्त श्रीरामचन्द्रजी से भेंट की। उस समय राक्षसों से सेवित निर्जन वन में सीता को अकेली छोड़कर आये हुए लक्ष्मण को देख भाई श्रीराम ने उनकी निन्दा की॥१५ १/२॥
गृहीत्वा च करं सव्यं लक्ष्मणं रघुनन्दनः॥१६॥
उवाच मधुरोदर्कमिदं परुषमार्तवत्।
लक्ष्मण का बायाँ हाथ पकड़कर रघुनन्दन आर्त से हो गये और पहले कठोर तथा अन्त में मधुर वाणी द्वारा इस प्रकार बोले-॥१६ १/२॥
अहो लक्ष्मण गडं ते कृतं यत् त्वं विहाय ताम्॥१७॥
सीतामिहागतः सौम्य कच्चित् स्वस्ति भवेदिति।
‘अहो सौम्य लक्ष्मण! यह तुमने बहुत बुरा किया, जो सीता को अकेली छोड़कर यहाँ चले आये। क्या वहाँ सीता सकुशल होगी?॥१७ १/२॥
न मेऽस्ति संशयो वीर सर्वथा जनकात्मजा॥१८॥
विनष्टा भक्षिता वापि राक्षसैर्वनचारिभिः।
‘वीर! मुझे इस बात में संदेह नहीं है कि वन में विचरने वाले राक्षसों ने जनककुमारी सीता को या तो सर्वथा नष्ट कर दिया होगा या वे उन्हें खा गये होंगे॥१८ १॥२
अशुभान्येव भूयिष्ठं यथा प्रादुर्भवन्ति मे॥१९॥
अपि लक्ष्मण सीतायाः सामग्रयं प्राप्नुयामहे।
जीवन्त्याः पुरुषव्याघ्र सुताया जनकस्य वै॥२०॥
‘क्योंकि मेरे आस-पास बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। पुरुषसिंह लक्ष्मण ! क्या हमलोग जीती-जागती हुई जनकदुलारी सीता को पूर्णतः स्वस्थ एवं सकुशल पा सकेंगे?॥१९-२०॥
यथा वै मृगसंघाश्च गोमायुश्चैव भैरवम्।
वाश्यन्ते शकुनाश्चापि प्रदीप्तामभितो दिशम्।
अपि स्वस्ति भवेत् तस्या राजपुत्र्या महाबल॥२१॥
‘महाबली लक्ष्मण ! ये मृगों के झुंड (दाहिनी ओर से आकर) जैसा अमङ्गल सूचित कर रहे हैं, ये गीदड़ जिस तरह भैरवनाद कर रहे हैं तथा जलती-सी प्रतीत होने वाली सम्पूर्ण दिशाओं में पक्षी जिस तरह की बोली बोल रहे हैं—इन सबसे यही अनुमान होता है कि राजकुमारी सीता शायद ही कुशल से हों॥२१॥
इदं हि रक्षो मृगसंनिकाशं प्रलोभ्य मां दूरमनुप्रयातम्।
हतं कथंचिन्महता श्रमेण स राक्षसोऽभून्नियमाण एव॥२२॥
‘यह राक्षस मृग के समान रूप धारण करके मुझे लुभाकर दूर चला आया था। महान् परिश्रम करके जब मैंने इसे किसी तरह मारा, तब यह मरते ही राक्षस हो गया॥२२॥
मनश्च मे दीनमिहाप्रहृष्टं चक्षुश्च सव्यं कुरुते विकारम्।
असंशयं लक्ष्मण नास्ति सीता हृता मृता वा पथि वर्तते वा॥२३॥
‘लक्ष्मण! अतः मेरा मन अत्यन्त दीन और अप्रसन्न हो रहा है। मेरी बायीं आँख फड़क रही है, इससे जान पड़ता है, निःसंदेह आश्रम पर सीता नहीं है। उसे कोई हर ले गया, वह मारी गयी अथवा (किसी राक्षस के साथ) मार्ग में होगी’॥२३॥
सर्ग ५८
स दृष्ट्वा लक्ष्मणं दीनं शून्यं दशरथात्मजः।
पर्यपृच्छत धर्मात्मा वैदेहीमागतं विना॥१॥
लक्ष्मण को दीन, संतोषशून्य तथा सीता को साथ लिये बिना आया देख धर्मात्मा दशरथनन्दन श्रीराम ने पूछा-॥१॥
प्रस्थितं दण्डकारण्यं या मामनुजगाम ह।
क्व सा लक्ष्मण वैदेही यां हित्वा त्वमिहागतः॥२॥
‘लक्ष्मण! जो दण्डकारण्य की ओर प्रस्थित होने पर अयोध्या से मेरे पीछे-पीछे चली आयी तथा जिसे तुम अकेली छोड़कर यहाँ आ गये, वह विदेहराजकुमारी सीता इस समय कहाँ है?॥२॥
राज्यभ्रष्टस्य दीनस्य दण्डकान् परिधावतः।
क्व सा दुःखसहाया मे वैदेही तनुमध्यमा॥३॥
‘मैं राज्य से भ्रष्ट और दीन होकर दण्डकारण्य में चक्कर लगा रहा हूँ। इस दुःख में जो मेरी सहायिका हुई, वह तनुमध्यमा (सूक्ष्म कटिप्रदेश वाली) विदेहराजकुमारी कहाँ है ?॥३॥
यां विना नोत्सहे वीर मुहूर्तमपि जीवितुम्।
क्व सा प्राणसहाया मे सीता सुरसुतोपमा॥४॥
‘वीर ! जिसके बिना मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता तथा जो मेरे प्राणों की सहचरी है, वह देवकन्या के समान सुन्दरी सीता इस समय कहाँ है?॥४॥
पतित्वममराणां हि पृथिव्याश्चापि लक्ष्मण।
विना तां तपनीयाभां नेच्छेयं जनकात्मजाम्॥५॥
‘लक्ष्मण! तपाये हुए सोने के समान कान्तिवाली जनकनन्दिनी सीता के बिना मैं पृथ्वी का राज्य और देवताओं का आधिपत्य भी नहीं चाहता॥५॥
कच्चिज्जीवति वैदेही प्राणैः प्रियतरा मम।
कच्चित् प्रव्राजनं वीर न मे मिथ्या भविष्यति॥६॥
‘वीर! जो मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय है, वह विदेहराजकुमारी सीता क्या अब जीवित होगी? मेरा वन में आना सीता को खो देने के कारण व्यर्थ तो नहीं हो जायगा?॥६॥
सीतानिमित्तं सौमित्रे मृते मयि गते त्वयि।
कच्चित् सकामा कैकेयी सुखिता सा भविष्यति॥७॥
‘सुमित्रानन्दन ! सीता के नष्ट हो जाने के कारण जब मैं मर जाऊँगा और तुम अकेले ही अयोध्या को लौटोगे, उस समय क्या माता कैकेयी सफलमनोरथ एवं सुखी होगी?॥७॥
सपुत्रराज्यां सिद्धार्थां मृतपुत्रा तपस्विनी।
उपस्थास्यति कौसल्या कच्चित् सौम्येन कैकयीम्॥८॥
‘जिसका इकलौता पुत्र मैं मर जाऊँगा, वह तपस्विनी माता कौसल्या क्या पुत्र और राज्य से सम्पन्न तथा कृतकृत्य हुई कैकेयी की सेवा में विनीतभाव से उपस्थित होगी?॥८॥
यदि जीवति वैदेही गमिष्याम्याश्रमं पुनः।
संवृत्ता यदि वृत्ता सा प्राणांस्त्यक्ष्यामि लक्ष्मण॥९॥
‘लक्ष्मण! यदि विदेहनन्दिनी सीता जीवित होगी, तभी मैं फिर आश्रम में पैर रखंगा। यदि सदाचारपरायणा मैथिली मर गयी होगी तो मैं भी प्राणों का परित्याग कर दूंगा॥९॥
यदि मामाश्रमगतं वैदेही नाभिभाषते।
पुरः प्रहसिता सीता विनशिष्यामि लक्ष्मण॥१०॥
‘लक्ष्मण! यदि आश्रम में जाने पर विदेहराजकुमारी सीता हँसते हुए मुख से सामने आकर मुझसे बात नहीं करेगी तो मैं जीवित नहीं रहूँगा॥१०॥
ब्रूहि लक्ष्मण वैदेही यदि जीवति वा न वा।
त्वयि प्रमत्ते रक्षोभिर्भक्षिता वा तपस्विनी॥११॥
‘लक्ष्मण! बोलो तो सही! वैदेही जीवित है या नहीं? तुम्हारे असावधान होने के कारण राक्षस उस तपस्विनी को खा तो नहीं गये?॥११॥
सुकुमारी च बाला च नित्यं चादुःखभागिनी।
मद्वियोगेन वैदेही व्यक्तं शोचति दुर्मनाः॥१२॥
‘जो सुकुमारी है, बाला (भोली-भाली) है तथा जिसने वनवास के पहले दुःख का अनुभव नहीं किया था, वह वैदेही आज मेरे वियोग से व्यथित-चित्त होकर अवश्य ही शोक कर रही होगी॥१२॥
सर्वथा रक्षसा तेन जिह्मेन सुदुरात्मना।
वदता लक्ष्मणेत्युच्चैस्तवापि जनितं भयम्॥१३॥
उस कुटिल एवं दुरात्मा राक्षस ने उच्च स्वर से ‘हा लक्ष्मण!’ ऐसा पुकारकर तुम्हारे मन में भी सर्वथा भय उत्पन्न कर दिया॥१३॥
श्रुतश्च मन्ये वैदेह्या स स्वरः सदृशो मम।
त्रस्तया प्रेषितस्त्वं च द्रष्टुं मां शीघ्रमागतः॥१४॥
‘जान पड़ता है, वैदेही ने भी मेरे स्वर से मिलताजुलता उस राक्षस का स्वर सुन लिया और भयभीत होकर तुम्हें भेज दिया और तुम भी शीघ्र ही मुझे देखने के लिये चले आये॥१४॥
सर्वथा तु कृतं कष्टं सीतामुत्सृजता वने।
प्रतिकर्तुं नृशंसानां रक्षसां दत्तमन्तरम्॥१५॥
‘जो भी हो तुमने वन में सीता को अकेली छोड़कर सर्वथा दुःखद कार्य कर डाला। क्रूर कर्म करने वाले राक्षसों को बदला लेने का अवसर दे दिया॥१५॥
दुःखिताः खरघातेन राक्षसाः पिशिताशनाः।
तैः सीता निहता घोरैर्भविष्यति न संशयः॥१६॥
‘मांसभक्षी निशाचर मेरे हाथों खर के मारे जाने से बहुत दुःखी थे। उन घोर राक्षसों ने सीता को मार डाला होगा, इसमें संशय नहीं है॥१६॥
अहोऽस्मि व्यसने मग्नः सर्वथा रिपुनाशन।
किं त्विदानीं करिष्यामि शङ्के प्राप्तव्यमीदृशम्॥१७॥
‘शत्रुनाशन ! मैं सर्वथा संकट के समुद्र में डूब गया हूँ। ऐसे दुःख का अवश्य ही अनुभव करना पड़ेगा ऐसी शङ्का हो रही है। अतः अब मैं क्या करूँ?’॥१७॥
इति सीतां वरारोहां चिन्तयन्नेव राघवः।
आजगाम जनस्थानं त्वरया सहलक्ष्मणः॥१८॥
इस प्रकार सुन्दरी सीता के विषय में चिन्ता करते हुए ही लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी तुरंत जनस्थान में आये॥१८॥
विगर्हमाणोऽनुजमार्तरूपं क्षुधाश्रमेणैव पिपासया च।
विनिःश्वसन् शुष्कमुखो विषण्णः प्रतिश्रयं प्राप्य समीक्ष्य शून्यम्॥१९॥
अपने दुःखी अनुज लक्ष्मण को कोसते एवं भूखप्यास तथा परिश्रम से लंबी साँस खींचते हुए सूखे मुँहवाले श्रीरामचन्द्रजी आश्रम के निकटवर्ती स्थान पर आकर उसे सूना देख विषाद में डूब गये॥१९॥
स्वमाश्रमं स प्रविगाह्य वीरो विहारदेशाननुसृत्य कांश्चित्।
एतत्तदित्येव निवासभूमौ प्रहृष्टरोमा व्यथितो बभूव॥२०॥
वीर श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश करके उसे भी सूना देख कुछ ऐसे स्थलों में अनुसंधान किया, जो सीता के विहारस्थान थे। उन्हें भी सूना पाकर उस क्रीड़ाभूमि में यही वह स्थान है, जहाँ मैंने अमुक प्रकार की क्रीड़ा की थी, ऐसा स्मरण करके उनके शरीर में रोमाञ्च हो आया और वे व्यथा से पीड़ित हो गये॥२०॥
सर्ग ५९
अथाश्रमादुपावृत्तमन्तरा रघुनन्दनः।
परिपप्रच्छ सौमित्रिं रामो दुःखादिदं वचः॥१॥
(आश्रम में आने से पहले मार्ग में श्रीराम और लक्ष्मण ने परस्पर जो बातें की थीं, उन्हें पुनः विस्तार के साथ बता रहे हैं-) सीता के कथनानुसार आश्रम से अपने पास आये हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मण से मार्ग में भी रघुकुलनन्दन श्रीराम ने बड़े दुःख से यह बात पूछी-॥१॥
तमुवाच किमर्थं त्वमागतोऽपास्य मैथिलीम्।
यदा सा तव विश्वासाद् वने विरहिता मया॥२॥
‘लक्ष्मण! जब मैंने तुम्हारे विश्वास पर ही वन में सीताको छोड़ा था, तब तुम उसे अकेली छोड़कर क्यों चले आये?॥२॥
दृष्ट्वैवाभ्यागतं त्वां मे मैथिलीं त्यज्य लक्ष्मण।
शङ्कमानं महत् पापं यत्सत्यं व्यथितं मनः॥३॥
‘लक्ष्मण ! मिथिलेशकुमारी को छोड़कर तुम जो मेरे पास आये हो, तुम्हें देखते ही जिस महान् अनिष्ट की आशङ्का करके मेरा मन व्यथित हो रहा था, वह सत्य जान पड़ने लगा है॥३॥
ङ्के स्फुरते नयन सव्यं बाहाचा हदयं च मे।
दृष्ट्वा लक्ष्मण दूरे त्वां सीताविरहितं पथि॥४॥
‘लक्ष्मण ! मेरी बायीं आँख और बायीं भुजा फड़क रही है। तुम्हें आश्रम से दूर सीता के बिना ही मार्ग पर आते देख मेरा हृदय भी धक-धक कर रहा है’॥४॥
एवमुक्तस्तु सौमित्रिर्लक्ष्मणः शुभलक्षणः।
भूयो दुःखसमाविष्टो दुःखितं राममब्रवीत्॥५॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उत्तम लक्षणों से सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण अत्यन्त दुःखी होकर अपने शोकग्रस्त भाई श्रीराम से बोले-॥५॥
न स्वयं कामकारेण तां त्यक्त्वाहमिहागतः।
प्रचोदितस्तयैवोग्रैस्त्वत्सकाशमिहागतः॥६॥
‘भैया! मैं स्वयं अपनी इच्छा से उन्हें छोड़कर नहीं आया हूँ। उन्हीं के कठोर वचनों से प्रेरित होकर मुझे आपके पास आना पड़ा है॥६॥
आर्येणेव परिक्रुष्टं लक्ष्मणेति सुविस्वरम्।
परित्राहीति यद्वाक्यं मैथिल्यास्तच्छ्रुतिं गतम्॥७॥
‘आपके ही समान स्वर में किसी ने जोर से पुकारा, ‘लक्ष्मण! मुझे बचाओ।’ यह वाक्य मिथिलेशकुमारी के कानों में भी पड़ा॥७॥
सा तमार्तस्वरं श्रुत्वा तव स्नेहेन मैथिली।
गच्छ गच्छेति मामाशु रुदती भयविक्लवा॥८॥
‘उस आर्तनाद को सुनकर मैथिली आपके प्रति स्नेह के कारण भय से व्याकुल हो गयीं और रोती हुई मुझसे तुरंत बोलीं-’जाओ, जाओ’॥८॥
प्रचोद्यमानेन मया गच्छेति बहुशस्तया।
प्रत्युक्ता मैथिली वाक्यमिदं तत् प्रत्ययान्वितम्॥९॥
‘जब बारंबार उन्होंने ‘जाओ’ कहकर मुझे प्रेरित किया, तब उन्हें विश्वास दिलाते हुए मैंने मैथिली से यह बात कही-॥९॥
न तत् पश्याम्यहं रक्षो यदस्य भयमावहेत्।
निर्वृता भव नास्त्येतत् केनाप्येतदुदाहृतम्॥१०॥
‘देवि! मैं ऐसे किसी राक्षस को नहीं देखता, जो भगवान् श्रीराम को भी भय में डाल सके। आप शान्त रहें, यह भैया की आवाज नहीं है। किसी दूसरे ने इस तरह की पुकार की है॥१०॥
विगर्हितं च नीचं च कथमार्योऽभिधास्यति।
त्राहीति वचनं सीते यस्त्रायेत् त्रिदशानपि॥११॥
‘सीते! जो देवताओं की भी रक्षा कर सकते हैं, वे मेरे बड़े भाई ‘मुझे बचाओ’ ऐसा निन्दित (कायरतापूर्ण) वचन कैसे कहेंगे?॥११॥
किंनिमित्तं तु केनापि भ्रातुरालम्ब्य मे स्वरम्।
विस्वरं व्याहृतं वाक्यं लक्ष्मण त्राहि मामिति॥१२॥
‘किसी दूसरे ने किसी बुरे उद्देश्य से मेरे भैया के स्वर की नकल करके ‘लक्ष्मण! मुझे बचाओ’ यह बात जोर से कही है॥१२॥
राक्षसेनेरितं वाक्यं त्रासात् त्राहीति शोभने।
न भवत्या व्यथा कार्या कुनारीजनसेविता॥१३॥
‘शोभने! उस राक्षस ने ही भय के कारण (मुझे बचाओ) यह बात मुँह से निकाली है। आपको व्यथित नहीं होना चाहिये। ऐसी व्यथा को नीच श्रेणी की स्त्रियाँ ही अपने मन में स्थान देती हैं॥१३॥
अलं विक्लवतां गन्तुं स्वस्था भव निरुत्सुका।
न चास्ति त्रिषु लोकेषु पुमान् यो राघवं रणे॥१४॥
जातो वा जायमानो वा संयुगे यः पराजयेत्।
अजेयो राघवो युद्धे देवैः शक्रपुरोगमैः॥१५॥
‘तुम व्याकुल मत होओ, स्वस्थ हो जाओ, चिन्ता छोड़ो। तीनों लोकों में ऐसा कोई पुरुष न तो उत्पन्न हुआ है, न हो रहा है और न होगा ही, जो युद्ध में श्रीरघुनाथजी को परास्त कर सके। संग्राम में इन्द्र आदि देवता भी श्रीराम को नहीं जीत सकते’॥१४-१५॥
एवमुक्ता तु वैदेही परिमोहितचेतना।
उवाचाश्रूणि मुञ्चन्ती दारुणं मामिदं वचः॥१६॥
मेरे ऐसा कहने पर विदेहराजकुमारी की चेतना मोह से आच्छन्न हो गयी। वे आँसू बहाती हुई मुझसे अत्यन्त कठोर वचन बोलीं-॥१६॥
भावो मयि तवात्यर्थं पाप एव निवेशितः।
विनष्टे भ्रातरि प्राप्तुं न च त्वं मामवाप्स्यसे॥१७॥
‘लक्ष्मण ! तेरे मन में मेरे लिये अत्यन्त पापपूर्ण भाव भरा है। तू अपने भाई के मरने पर मुझे प्राप्त करना चाहता है, परंतु मुझे पा नहीं सकेगा॥१७॥
संकेताद् भरतेन त्वं रामं समनुगच्छसि।
क्रोशन्तं हि यथात्यर्थं नैनमभ्यवपद्यसे॥१८॥
‘तू भरत के इशारे से अपने स्वार्थ के लिये श्रीरामचन्द्रजी के पीछे-पीछे आया है। तभी तो वे जोर जोर से चिल्ला रहे हैं और तू उनके पास जाता तक नहीं है॥१८॥
रिपुः प्रच्छन्नचारी त्वं मदर्थमनुगच्छसि।
राघवस्यान्तरं प्रेप्सुस्तथैनं नाभिपद्यसे॥१९॥
‘तू अपने भाई का छिपा हुआ शत्रु है। मेरे लिये ही श्रीराम का अनुसरण करता है और श्रीराम के छिद्र ढूँढ़ रहा है तभी तो संकट के समय उनके पास जाने का नाम नहीं लेता है’॥१९॥
एवमुक्तस्तु वैदेह्या संरब्धो रक्तलोचनः।
क्रोधात् प्रस्फुरमाणोष्ठ आश्रमादभिनिर्गतः॥२०॥
‘विदेहकुमारी के ऐसा कहने पर मैं रोष से भर गया। । मेरी आँखें लाल हो गयीं और क्रोध से मेरे होंठ फड़कने लगे। इस अवस्था में मैं आश्रम से निकल आया’॥२०॥
एवं ब्रुवाणं सौमित्रिं रामः संतापमोहितः।
अब्रवीद् दुष्कृतं सौम्य तां विना त्वमिहागतः॥२१॥
लक्ष्मण की ऐसी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी संताप से मोहित हो गये और उनसे बोले-’सौम्य! तुमने बड़ा बुरा किया, जो तुम सीता को छोड़कर यहाँ चले आये॥२१॥
जानन्नपि समर्थं मां रक्षसामपवारणे।
अनेन क्रोधवाक्येन मैथिल्या निर्गतो भवान्॥२२॥
‘मैं राक्षसों का निवारण करने में समर्थ हूँ, यह जानते हए भी तुम मैथिली के क्रोधयुक्त वचन से उत्तेजित होकर निकल पड़े॥२२॥
नहि ते परितुष्यामि त्यक्त्वा यदसि मैथिलीम्।
क्रुद्धायाः परुषं श्रुत्वा स्त्रिया यत् त्वमिहागतः॥२३॥
‘क्रोध में भरी हुई नारी के कठोर वचन को सुनकर जो तुम मिथिलेशकुमारीको छोड़कर यहाँ चले आये, इससे मैं तुम्हारे ऊपर संतुष्ट नहीं हूँ॥२३॥
सर्वथा त्वपनीतं ते सीतया यत् प्रचोदितः।
क्रोधस्य वशमागम्य नाकरोः शासनं मम॥२४॥
‘सीता से प्रेरित होकर क्रोध के वशीभूत हो तुमने मेरे आदेश का पालन नहीं किया; यह सर्वथा तुम्हारा अन्याय है॥२४॥
असौ हि राक्षसः शेते शरेणाभिहतो मया।
मृगरूपेण येनाहमाश्रमादपवाहितः॥२५॥
‘जिसने मृगरूप धारण करके मुझे आश्रम से दूर हटा दिया, वह राक्षस मेरे बाणों से घायल होकर सदा के लिये सो रहा है।॥२५॥
विकृष्य चापं परिधाय सायकं सलीलबाणेन च ताडितो मया।
मार्गी तनुं त्यज्य च विक्लवस्वरो बभूव केयूरधरः स राक्षसः॥२६॥
‘धनुष खींचकर उस बाण का संधान करके मैंने लीलापूर्वक चलाये हुए बाणों से ज्यों ही उस मृग को मारा, त्यों ही वह मृग के शरीर का परित्याग करके बाँहों में बाजूबंद धारण करने वाला राक्षस बन गया। उसके स्वर में बड़ी व्याकुलता आ गयी थी॥२६॥
शराहतेनैव तदार्तया गिरा स्वरं ममालम्ब्य सुदूरसुश्रवम्।
उदाहृतं तद् वचनं सुदारुणं त्वमागतो येन विहाय मैथिलीम्॥२७॥
‘बाण से आहत होने पर ही उसने आर्तवाणी में मेरे स्वर की नकल करके बहुत दूरतक सुनायी देने वाला वह अत्यन्त दारुण वचन कहा था, जिससे तुम मिथिलेशकुमारी सीता को छोड़कर यहाँ चले आये हो’॥२७॥
सर्ग ६०
भृशमाव्रजमानस्य तस्याधो वामलोचनम्।
प्रास्फुरच्चास्खलद् रामो वेपथुश्चास्य जायते॥१॥
आश्रम की ओर आते समय श्रीराम की बायीं आँख की नीचे वाली पलक जोर-जोर से फड़कने लगी। श्रीराम चलते-चलते लड़खड़ा गये और उनके शरीर में कम्प होने लगा॥१॥
उपालक्ष्य निमित्तानि सोऽशुभानि मुहुर्मुहुः।
अपि क्षेमं तु सीताया इति वै व्याजहार ह॥२॥
बारंबार इन अपशकुनों को देखकर वे कहने लगे-क्या सीता सकुशल होगी?॥२॥
त्वरमाणो जगामाथ सीतादर्शनलालसः।
शून्यमावसथं दृष्ट्वा बभूवोद्विग्नमानसः॥३॥
सीता को देखने के लिये उत्कण्ठित हो वे बड़ी उतावली के साथ आश्रम पर गये। वहाँ कुटिया सूनी देख उनका मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा॥३॥
उद्भ्रमन्निव वेगेन विक्षिपन् रघुनन्दनः।
तत्र तत्रोटजस्थानमभिवीक्ष्य समन्ततः॥४॥
ददर्श पर्णशालां च सीतया रहितां तदा।
श्रिया विरहितां ध्वस्तां हेमन्ते पद्मिनीमिव॥५॥
रघुनन्दन बड़े वेग से इधर-उधर चक्कर लगाने और हाथ-पैर चलाने लगे। उन्होंने वहाँ जहाँ-तहाँ बनी हुई एक-एक पर्णशाला को चारों ओर से देख डाला, किंतु उस समय उसे सीता से सूनी ही पाया। जैसे हेमन्तऋतु में कमलिनी हिम से ध्वस्त हो श्रीहीन हो जाती है, । उसी प्रकार प्रत्येक पर्णशाला शोभाशून्य हो गयी थी॥४-५॥
रुदन्तमिव वृक्षैश्च ग्लानपुष्पमृगद्विजम्।
श्रिया विहीनं विध्वस्तं संत्यक्तं वनदैवतैः॥६॥
वह स्थान वृक्षों (की सनसनाहट) के द्वारा मानो रो रहा था, फूल मुरझा गये थे, मृग और पक्षी मन मारे बैठे थे। वहाँ की सम्पूर्ण शोभा नष्ट हो गयी थी। सारी कुटी उजाड़ दिखायी देती थी। वन के देवता भी उस स्थान को छोड़कर चले गये थे॥६॥
विप्रकीर्णाजिनकुशं विप्रविद्धबृसीकटम्।
दृष्ट्वा शून्योटजस्थानं विललाप पुनः पुनः॥७॥
सब ओर मृगचर्म और कुश बिखरे हुए थे। चटाइयाँ अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। पर्णशाला को सूनी देख भगवान् श्रीराम बारंबार विलाप करने लगे-॥७॥
हृता मृता वा नष्टा वा भक्षिता वा भविष्यति।
निलीनाप्यथवा भीरुरथवा वनमाश्रिता॥८॥
‘हाय ! सीता को किसी ने हर तो नहीं लिया। उसकी मृत्यु तो नहीं हो गयी अथवा वह खो तो नहीं गयी या किसी राक्षस ने उसे खा तो नहीं लिया। वह भीरु कहीं छिप तो नहीं गयी है अथवा फल-फूल लाने के लिये वन के भीतर तो नहीं चली गयी॥८॥
गता विचेतुं पुष्पाणि फलान्यपि च वा पुनः।
अथवा पद्मिनी याता जलार्थं वा नदीं गता॥९॥
‘सम्भव है, फल-फूल लाने के लिये ही गयी हो या जल लाने के लिये किसी पुष्करिणी अथवा नदी के तट पर गयी हो’॥९॥
यत्नान्मृगयमाणस्तु नाससाद वने प्रियाम्।
शोकरक्तेक्षणः श्रीमानुन्मत्त इव लक्ष्यते॥१०॥
श्रीरामचन्द्रजी ने प्रयत्नपूर्वक अपनी प्रिय पत्नी सीता को वन में चारों ओर ढूँढा, किंतु कहीं भी उनका पता न लगा। शोक के कारण श्रीमान् राम की आँखें लाल हो गयीं। वे उन्मत्त के समान दिखायी देने लगे॥१०॥
वृक्षाद् वृक्षं प्रधावन् स गिरीश्चापि नदीनदम्।
बभ्राम विलपन् रामः शोकपङ्कार्णवप्लुतः॥११॥
एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष के पास दौड़ते हुए वे पर्वतों, नदियों और नदों के किनारे घूमने लगे। शोक से समुद्र में डूबे हुए श्रीरामचन्द्रजी विलाप करते-करते वृक्षों से पूछने लगे-॥११॥
अस्ति कच्चित्त्वया दृष्टा सा कदम्बप्रिया प्रिया।
कदम्ब यदि जानीषे शंस सीतां शुभाननाम्॥१२॥
स्निग्धपल्लवसंकाशां पीतकौशेयवासिनीम्।
शंसस्व यदि सा दृष्टा बिल्व बिल्वोपमस्तनी॥१३॥
‘कदम्ब! मेरी प्रिया सीता तुम्हारे पुष्प से बहुत प्रेम करती थी, क्या वह यहाँ है? क्या तुमने उसे देखा है? यदि जानते हो तो उस शुभानना सीता का पता बताओ। उसके अङ्ग सुस्निग्ध पल्लवों के समान कोमल हैं तथा शरीर पर पीले रंग की रेशमी साड़ी शोभा पाती है। बिल्व! मेरी प्रिया के स्तन तुम्हारे ही समान हैं। यदि तुमने उसे देखा हो तो बताओ॥१२-१३॥
अथवार्जुन शंस त्वं प्रियां तामनिप्रियाम्।
जनकस्य सुता तन्वी यदि जीवति वा न वा॥१४॥
‘अथवा अर्जुन! तुम्हारे फूलों पर मेरी प्रिया का विशेष अनुराग था, अतः तुम्हीं उसका कुछ समाचार बताओ। कृशाङ्गी जनककिशोरी जीवित है या नहीं॥१४॥
ककुभः ककुभोरुं तां व्यक्तं जानाति मैथिलीम्।
लतापल्लवपुष्पाढ्यो भाति ह्येष वनस्पतिः॥१५॥
भ्रमरैरुपगीतश्च यथा द्रुमवरो ह्यसि।
एष व्यक्तं विजानाति तिलकस्तिलकप्रियाम्॥१६॥
यह ककुभ अपने ही समान ऊरुवाली मिथिलेशकुमारी को अवश्य जानता होगा; क्योंकि यह वनस्पति लता, पल्लव तथा फूलों से सम्पन्न हो बड़ी शोभा पा रहा है। ककुभ! तुम सब वृक्षों में श्रेष्ठ हो, क्योंकि ये भ्रमर तुम्हारे समीप आकर अपने झंकारों द्वारा तुम्हारा यशोगान करते हैं। (तुम्हीं सीता का पता बताओ, अहो! यह भी कोई उत्तर नहीं दे रहा है।) यह तिलक वृक्ष अवश्य सीता के विषय में जानता होगा; क्योंकि मेरी प्रिया सीता को भी तिलक से प्रेम था॥१५-१६॥
अशोक शोकापनुद शोकोपहतचेतनम्।
त्वन्नामानं कुरु क्षिप्रं प्रियासंदर्शनेन माम्॥१७॥
‘अशोक! तुम शोक दूर करने वाले हो। इधर मैं शोक से अपनी चेतना खो बैठा हूँ। मुझे मेरी प्रियतमा का दर्शन कराकर शीघ्र ही अपने-जैसे नामवाला बना दो-मुझे अशोक (शोकहीन) कर दो॥१७॥
यदि ताल त्वया दृष्टा पक्वतालोपमस्तनी।
कथयस्व वरारोहां कारुण्यं यदि ते मयि॥१८॥
‘ताल वृक्ष! तुम्हारे पके हुए फल के समान स्तनवाली सीता को यदि तुमने देखा हो तो बताओ। यदि मुझ पर तुम्हें दया आती हो तो उस सुन्दरी के विषय में अवश्य कुछ कहो॥१८॥
यदि दृष्टा त्वया जम्बो जाम्बूनदसमप्रभा।
प्रियां यदि विजानासि निःशङ्क कथयस्व मे॥१९॥
‘जामुन ! जाम्बूनद (सुवर्ण) के समान कान्तिवाली मेरी प्रिया यदि तुम्हारी दृष्टि में पड़ी हो, यदि तुम उसके विषय में कुछ जानते हो तो निःशङ्क होकर मुझे बताओ॥१९॥
अहो त्वं कर्णिकाराद्य पुष्पितः शोभसे भृशम्।
कर्णिकारप्रियां साध्वीं शंस दृष्टा यदि प्रिया॥२०॥
‘कनेर! आज तो फूलों के लगने से तुम्हारी बड़ी शोभा हो रही है। अहो! मेरी प्रिया साध्वी सीता को तुम्हारे ये पुष्प बहुत पसंद थे। यदि तुमने उसे कहीं देखा हो तो मुझसे कहो’॥२०॥
चूतनीपमहासालान् पनसान् कुरवान् धवान्।
दाडिमानपि तान् गत्वा दृष्ट्वा रामो महायशाः॥२१॥
बकुलानथ पुन्नागांश्चन्दनान् केतकांस्तथा।
पृच्छन् रामो वने भ्रान्त उन्मत्त इव लक्ष्यते॥२२॥
इसी प्रकार आम, कदम्ब, विशाल शाल, कटहल, कुरव, धव और अनार आदि वृक्षों को भी देखकर महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी उनके पास गये और वकुल, पुन्नाग, चन्दन तथा केवड़े आदि के वृक्षों से भी पूछते फिरे। उस समय वे वन में पागल की तरह इधर-उधर भटकते दिखायी देते थे॥२१-२२॥
अथवा मृगशावाक्षीं मृग जानासि मैथिलीम।
मृगविप्रेक्षणी कान्ता मृगीभिः सहिता भवेत्॥२३॥
अपने सामने हरिणको देखकर वे बोले-’मृग! अथवा तुम्ही बताओ! मृगनयनी मैथिली को जानते हो। मेरी प्रिया की दृष्टि भी तुम हरिणों की-सी है, अतः सम्भव है, वह हरिणियों के ही साथ हो॥२३॥
गज सा गजनासोरुर्यदि दृष्टा त्वया भवेत्।
तां मन्ये विदितां तुभ्यमाख्याहि वरवारण॥२४॥
‘श्रेष्ठ गजराज! तुम्हारी सँड़ के समान ही जिसके दोनों ऊरु हैं, उस सीता को सम्भवतः तुमने देखा होगा। मालूम होता है, तुम्हें उसका पता विदित है, अतः बताओ! वह कहाँ है?॥२४॥
शार्दूल यदि सा दृष्टा प्रिया चन्द्रनिभानना।
मैथिली मम विस्रब्धः कथयस्व न ते भयम्॥२५॥
‘व्याघ्र ! यदि तुमने मेरी प्रिया चन्द्रमुखी मैथिली को देखा हो तो निःशङ्क होकर बता दो, मुझसे तुम्हें कोई भय नहीं होगा’॥२५॥
किं धावसि प्रिये नूनं दृष्टासि कमलेक्षणे।
वृक्षराच्छाद्य चात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे॥२६॥
(इतने ही में उनको भ्रम हुआ कि सीता उधर भागकर छिप रही है, तब वे बोले-) ‘प्रिये! क्यों भागी जा रही हो। कमललोचने! निश्चय ही मैंने तुम्हें देख लिया है। तुम वृक्षों की ओट में अपने-आपको छिपाकर मुझसे बात क्यों नहीं करती हो?॥२६॥
तिष्ठ तिष्ठ वरारोहे न तेऽस्ति करुणा मयि।
नात्यर्थं हास्यशीलासि किमर्थं मामपेक्षसे॥२७॥
‘वरारोहे ! ठहरो, ठहरो। क्या तुम्हें मुझपर दया नहीं आती है। अधिक हास-परिहास करने का तुम्हारा स्वभाव तो नहीं था, फिर किसलिये मेरी उपेक्षा करती हो?॥२७॥
पीतकौशेयकेनासि सूचिता वरवर्णिनि।
धावन्त्यपि मया दृष्टा तिष्ठ यद्यस्ति सौहृदम्॥२८॥
‘सुन्दरि! पीली रेशमी साड़ीसे ही, तुम कहाँ हो– यह सूचना मिल जाती है। भागी जाती हो तो भी मैंने तुम्हें देख लिया है। यदि मेरे प्रति स्नेह एवं सौहार्द हो तो खड़ी हो जाओ’॥२८॥
नैव सा नूनमथवा हिंसिता चारुहासिनी।
कृच्छं प्राप्तं न मां नूनं यथोपेक्षितुमर्हति॥२९॥
(फिर भ्रम दूर होने पर बोले-) ‘अथवा निश्चय ही वह नहीं है। उस मनोहर मुसकानवाली सीता को राक्षसों ने मार डाला, अन्यथा इस तरह संकटमें पड़े हुए की (मेरी) वह कदापि उपेक्षा नहीं कर सकती थी॥२९॥
व्यक्तं सा भक्षिता बाला राक्षसैः पिशिताशनैः।
विभज्याङ्गानि सर्वाणि मया विरहिता प्रिया॥३०॥
‘स्पष्ट जान पड़ता है कि मांसभक्षी राक्षसों ने मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी भोली-भाली प्रिया मैथिली को उसके सारे अङ्ग बाँटकर खा लिया॥३०॥
नूनं तच्छुभदन्तोष्ठं सुनासं शुभकुण्डलम्।
पूर्णचन्द्रनिभं ग्रस्तं मुखं निष्प्रभतां गतम्॥३१॥
‘सुन्दर दाँत, मनोहर ओष्ठ, सुघड़ नासिका से युक्त तथा रुचिर कुण्डलों से अलंकृत वह पूर्ण चन्द्रमा के समान अभिराम मुख राक्षसों का ग्रास बनकर निश्चय ही अपनी प्रभा खो बैठा होगा॥३१॥
सा हि चम्पकवर्णाभा ग्रीवा ग्रैवेयकोचिता।
कोमला विलपन्त्यास्तु कान्ताया भक्षिता शुभा॥३२॥
‘रोती-विलखती हुई प्रियतमा सीता की वह चम्पा के समान वर्णवाली कोमल एवं सुन्दर ग्रीवा, जो हार और हँसली आदि आभूषण पहनने के योग्य थी, निशाचरों का आहार बन गयी॥३२॥
नूनं विक्षिप्यमाणौ तौ बाहू पल्लवकोमलौ।
भक्षितौ वेपमानाग्रौ सहस्ताभरणाङ्गदौ॥३३॥
‘वे नूतन पल्लवों के समान कोमल भुजाएँ, जो इधर-उधर पटकी जा रही होंगी और जिनके अग्रभाग काँप रहे होंगे, हाथों के आभूषण तथा बाजूबंदसहित निश्चय ही राक्षसों के पेट में चली गयीं॥३३॥
मया विरहिता बाला रक्षसां भक्षणाय वै।
सार्थेनेव परित्यक्ता भक्षिता बहुबान्धवा॥३४॥
‘मैंने राक्षसों का भक्ष्य बनने के लिये ही उस बाला को अकेली छोड़ दिया। यद्यपि उसके बन्धुबान्धव बहुत हैं, तथापि वह यात्रियों के समुदाय से विलग हुई किसी अकेली स्त्री की भाँति निशाचरों का ग्रास बन गयी॥३४॥
हा लक्ष्मण महाबाहो पश्यसे त्वं प्रियां क्वचित्।
हा प्रिये क्व गता भद्रे हा सीतेति पुनः पुनः॥३५॥
इत्येवं विलपन् रामः परिधावन् वनाद् वनम्।
क्वचिदुद्भ्रमते वेगात् क्वचिद् विभ्रमते बलात्॥३६॥
‘हा महाबाहु लक्ष्मण! क्या तुम कहीं मेरी प्रियतमा को देखते हो! हा प्रिये! हा भद्रे! हा सीते! तुम कहाँ चली गयी?’ इस तरह बारंबार विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी एक वन से दूसरे वन में दौड़ने लगे। वे कहीं सीता की समानता पाकर उद्भ्रान्त हो उठते (उछल पड़ते थे) और कहीं शोक की प्रबलता के कारण विभ्रान्त हो जाते (बवंडर की भाँति चक्कर काटने लगते) थे॥३५-३६॥
क्वचिन्मत्त इवाभाति कान्तान्वेषणतत्परः।
स वनानि नदीः शैलान् गिरिप्रस्रवणानि च।
काननानि च वेगेन भ्रमत्यपरिसंस्थितः॥३७॥
अपनी प्रियतमा की खोज करते हए वे कभी-कभी पागलों की-सी चेष्टा करने लगते थे। उन्होंने बड़ी दौड़-धूप करके कहीं भी विश्राम न करते हुए वनों, नदियों, पर्वतों, पहाड़ी झरनों और विभिन्न काननों में घूम-घूमकर अन्वेषण किया॥३७॥
तदा स गत्वा विपुलं महद् वनं परीत्य सर्वं त्वथ मैथिली प्रति।
अनिष्ठिताशः स चकार मार्गणे पुनः प्रियायाः परमं परिश्रमम्॥३८॥
उस समय मिथिलेशकुमारी को ढूँढ़ने के लिये वे उस विशाल एवं विस्तृत वन में गये और सब में चक्कर लगाकर थक गये तो भी निराश नहीं हुए। उन्होंने पुनः अपनी प्रियतमा के अनुसंधान के लिये बड़ा भारी परिश्रम किया॥३८॥
सर्ग ६१
दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं शून्यं रामो दशरथात्मजः।
रहितां पर्णशालां च प्रविद्धान्यासनानि च॥१॥
अदृष्ट्वा तत्र वैदेहीं संनिरीक्ष्य च सर्वशः।
उवाच रामः प्राक्रुश्य प्रगृह्य रुचिरौ भुजौ॥२॥
दशरथनन्दन श्रीराम ने देखा कि आश्रम के सभी स्थान सीता से सूने हैं तथा पर्णशाला में भी सीता नहीं हैं और बैठनेके आसन इधर-उधर फेंके पड़े हैं। तब उन्होंने पुनः वहाँ के सभी स्थानों का निरीक्षण किया और चारों ओर ढूँढ़ने पर भी जब विदेहकुमारी का कहीं पता नहीं लगा, तब श्रीरामचन्द्रजी अपनी दोनों सुन्दर भुजाएँ ऊपर उठाकर सीता का नाम ले जोर जोर से पुकार करके लक्ष्मण से बोले-॥१-२॥
क्व नु लक्ष्मण वैदेही कं वा देशमितो गता।
केनाहृता वा सौमित्रे भक्षिता केन वा प्रिया॥३॥
‘भैया लक्ष्मण! विदेहराजकुमारी कहाँ हैं ? यहाँ से किस देश में चली गयीं? सुमित्रानन्दन! मेरी प्रिया सीता को कौन हर ले गया? अथवा किस राक्षस ने खा डाला?॥३॥
वृक्षणावार्य यदि मां सीते हसितुमिच्छसि।
अलं ते हसितेनाद्य मां भजस्व सुदुःखितम्॥४॥
(फिर वे सीता को सम्बोधित करके बोले-) ‘सीते! यदि तुम वृक्षों की आड़ में अपने को छिपाकर मुझसे हँसी करना चाहती हो तो इस समय यह हँसी ठीक नहीं है। मैं बहुत दुःखी हो रहा हूँ, तुम मेरे पास आ जाओ॥४॥
यैः परिक्रीडसे सीते विश्वस्तैमूंगपोतकैः।
एते हीनास्त्वया सौम्ये ध्यायन्त्यस्राविलेक्षणाः॥५॥
‘सौम्य स्वभाववाली सीते! जिन विश्वस्त मृगछौनों के साथ तुम खेला करती थी, वे आज तुम्हारे बिना दुःखी हो आँखों में आँसू भरकर चिन्तामग्न हो गये हैं’॥५॥
सीतया रहितोऽहं वै नहि जीवामि लक्ष्मण।
वृतं शोकेन महता सीताहरणजेन माम्॥६॥
परलोके महाराजो नूनं द्रक्ष्यति मे पिता।
‘लक्ष्मण! सीता से रहित होकर मैं जीवित नहीं रह सकता। सीताहरणजनित महान् शोक ने मुझे चारों ओर से घेर लिया है। निश्चय ही अब परलोक में मेरे पिता महाराज दशरथ मुझे देखेंगे॥६ १/२॥
कथं प्रतिज्ञां संश्रुत्य मया त्वमभियोजितः॥७॥
अपूरयित्वा तं कालं मत्सकाशमिहागतः।
वे मुझे उपालम्भ देते हुए कहेंगे-’मैंने तो तुम्हें वनवास के लिये आज्ञा दी थी और तुमने भी वहाँ रहने की प्रतिज्ञा कर ली थी। फिर उतने समय तक वहाँ रहकर उस प्रतिज्ञा को पूर्ण किये बिना ही तुम यहाँ मेरे पास कैसे चले आये?॥७ १/२॥
कामवृत्तमनार्यं वा मृषावादिनमेव च॥८॥
धिक् त्वामिति परे लोके व्यक्तं वक्ष्यति मे पिता।
‘तुम-जैसे स्वेच्छाचारी, अनार्य और मिथ्यावादी को धिक्कार है। यह बात परलोक में पिताजी मुझसे अवश्य कहेंगे’॥८ १/२॥
विवशं शोकसंतप्तं दीनं भग्नमनोरथम्॥९॥
मामिहोत्सृज्य करुणं कीर्तिनरमिवानृजुम्।
क्व गच्छसि वरारोहे मा मोत्सृज सुमध्यमे॥१०॥
‘वरारोहे ! सुमध्यमे! सीते! मैं विवश, शोकसंतप्त, दीन, भग्नमनोरथ हो करुणाजनक अवस्था में पड़ गया हूँ। जैसे कुटिल मनुष्य को कीर्ति त्याग देती है, उसी प्रकार तुम मुझे यहाँ छोड़कर कहाँ चली जा रही हो? मुझे न छोड़ो, न छोड़ो॥९-१०॥
त्वया विरहितश्चाहं त्यक्ष्ये जीवितमात्मनः।
इतीव विलपन् रामः सीतादर्शनलालसः॥११॥
न ददर्श सुदुःखार्तो राघवो जनकात्मजाम्।
‘तुम्हारे वियोग में मैं अपने प्राण त्याग दूंगा।’ इस प्रकार अत्यन्त दुःख से आतुर हो विलाप करते हुए रघुकुल-नन्दन श्रीराम सीता के दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये, किंतु वे जनकनन्दिनी उन्हें दिखायी न पड़ीं॥११ १/२॥
अनासादयमानं तं सीतां शोकपरायणम्॥१२॥
पङ्कमासाद्य विपुलं सीदन्तमिव कुञ्जरम्।
लक्ष्मणो राममत्यर्थमुवाच हितकाम्यया॥१३॥
जैसे कोई हाथी किसी बड़ी भारी दलदल में फँसकर कष्ट पा रहा हो, उसी प्रकार सीता को नपाकर अत्यन्त शोक में डूबे हुए श्रीराम से उनके हित की कामना रखकर लक्ष्मण यों बोले-॥१२-१३॥
मा विषादं महाबुद्धे कुरु यत्नं मया सह।
इदं गिरिवरं वीर बहुकन्दरशोभितम्॥१४॥
प्रियकाननसंचारा वनोन्मत्ता च मैथिली।
सा वनं वा प्रविष्टा स्यान्नलिनी वा सुपुष्पिताम्॥१५॥
सरितं वापि सम्प्राप्ता मीनवञ्जलसेविताम्।
वित्रासयितुकामा वा लीना स्यात् कानने क्वचित्॥१६॥
जिज्ञासमाना वैदेही त्वां मां च पुरुषर्षभ।
‘महामते! आप विषाद न करें; मेरे साथ जानकी को ढूँढ़ने का प्रयत्न करें। वीरवर! यह सामने जो ऊँचा पहाड़ दिखायी देता है, अनेक कन्दराओं से सुशोभित है। मिथिलेशकुमारी को वन में घूमना प्रिय लगता है, वे वन की शोभा देखकर हर्ष से उन्मत्त हो उठती हैं; अतः वन में गयी होंगी, अथवा सुन्दर कमल के फूलों से भरे हुए इस सरोवर के या मत्स्य तथा वेतसलतासे सुशोभित सरिता के तट पर जा पहुँची होंगी। अथवा पुरुषप्रवर! हमलोगों को डराने की इच्छा से हम दोनों उन्हें खोज पाते हैं कि नहीं, इस जिज्ञासा से कहीं वन में ही छिप गयी होंगी॥१४–१६ १/२॥
तस्या ह्यन्वेषणे श्रीमन् क्षिप्रमेव यतावहे॥१७॥
वनं सर्वं विचिनुवो यत्र सा जनकात्मजा।
‘अतः श्रीमन् ! वनमें जहाँ-जहाँ जानकीके होनेकी सम्भावना हो, उन सभी स्थानोंपर हम दोनों शीघ्र ही उनकी खोजके लिये प्रयत्न करें॥१७ १/२॥
मन्यसे यदि काकुत्स्थ मा स्म शोके मनः कृथाः॥१८॥
एवमुक्तः स सौहार्दाल्लक्ष्मणेन समाहितः।
सह सौमित्रिणा रामो विचेतुमुपचक्रमे॥१९॥
‘रघुनन्दन! यदि आपको मेरी यह बात ठीक लगे तो आप शोक छोड़ दें।’ लक्ष्मण के द्वारा इस प्रकार सौहार्दपूर्वक समझाये जाने पर श्रीरामचन्द्रजी सावधान हो गये और उन्होंने सुमित्राकुमार के साथ सीता को खोजना आरम्भ किया॥१८-१९॥
तौ वनानि गिरीश्चैव सरितश्च सरांसि च।
निखिलेन विचिन्वन्तौ सीतां दशरथात्मजौ॥२०॥
तस्य शैलस्य सानूनि शिलाश्च शिखराणि च।
निखिलेन विचिन्वन्तौ नैव तामभिजग्मतुः॥२१॥
दशरथ के वे दोनों पुत्र सीता की खोज करते हुए वनों में, पर्वतो पर, सरिताओं और सरोवरों के किनारे घूम-घूमकर पूरी चेष्टा के साथ अनुसंधान में लगे रहे। उस पर्वत की चोटियों, शिलाओं और शिखरों पर उन्होंने अच्छी तरह जानकी को ढूँढ़ा; किंतु कहीं भी उनका पता नहीं लगा॥२०-२१॥
विचित्य सर्वतः शैलं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।
नेह पश्यामि सौमित्रे वैदेही पर्वते शुभाम्॥२२॥
पर्वत के चारों ओर खोजकर श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण से कहा-’सुमित्रानन्दन! इस पर्वतपर तो मैं सुन्दरी वैदेही को नहीं देख पाता हूँ’॥२२॥
ततो दुःखाभिसंतप्तो लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।
विचरन् दण्डकारण्यं भ्रातरं दीप्ततेजसम्॥२३॥
तब दुःख से संतप्त हुए लक्ष्मण ने दण्डकारण्य में घूमते-घूमते अपने उद्दीप्त तेजस्वी भाई से इस प्रकार कहा-
कहाप्राप्स्यसे त्वं महाप्राज्ञ मैथिली जनकात्मजाम्।
यथा विष्णुर्महाबाहुर्बलिं बद्ध्वा महीमिमाम्॥२४॥
‘महामते! जैसे महाबाहु भगवान् विष्णु ने राजा बलि को बाँधकर यह पृथ्वी प्राप्त कर ली थी, उसी प्रकार आप भी मिथिलेशकुमारी जानकी को पा जायँगे’॥२४॥
एवमुक्तस्तु वीरेण लक्ष्मणेन स राघवः।
उवाच दीनया वाचा दुःखाभिहतचेतनः॥२५॥
वीर लक्ष्मण के ऐसा कहने पर दुःख से व्याकुलचित्त हुए श्रीरघुनाथजी ने दीन वाणी में कहा-॥२५॥
वनं सुविचितं सर्वं पद्मिन्यः फुल्लपङ्कजाः।
गिरिश्चायं महाप्राज्ञ बहकन्दरनिर्झरः।
नहि पश्यामि वैदेहीं प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्॥२६॥
‘महाप्राज्ञ लक्ष्मण! मैंने सारा वन खोज डाला। विकसित कमलों से भरे हुए सरोवर भी देख लिये तथा अनेक कन्दराओं और झरनों से सुशोभित इस पर्वत को भी सब ओर से छान डाला; परंतु मुझे अपने प्राणों से भी प्यारी वैदेही कहीं दिखायी नहीं पड़ी’॥२६॥
एवं स विलपन् रामः सीताहरणकर्षितः।
दीनः शोकसमाविष्टो मुहूर्तं विह्वलोऽभवत्॥२७॥
इस प्रकार सीता-हरण के कष्ट से पीडित हो विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी दीन और शोकमग्न हो दो घड़ी तक अत्यन्त व्याकुलता में पड़े रहे॥२७॥
स विह्वलितसर्वाङ्गो गतबुद्धिर्विचेतनः ।
निषसादातुरो दीनो निःश्वस्याशीतमायतम्॥२८॥
उनका सारा अङ्ग विह्वल (शिथिल) हो गया, बुद्धि काम नहीं दे रही थी, चेतना लुप्त-सी होती जा रही थी। वे गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए दीन और आतुर होकर विषाद में डूब गये॥२८॥
बहुशः स तु निःश्वस्य रामो राजीवलोचनः।
हा प्रियेति विचुक्रोश बहुशो बाष्पगद्गदः॥२९॥
बारंबार उच्छ्वास लेकर कमलनयन श्रीराम आँसुओं से गद्गद वाणी में ‘हा प्रिये!’ कहकर बहुत रोने-विलखने लगे॥२९॥
तं सान्त्वयामास ततो लक्ष्मणः प्रियबान्धवम्।
बहुप्रकारं शोकार्तः प्रश्रितः प्रश्रिताञ्जलिः॥३०॥
तब शोक से पीड़ित हुए लक्ष्मण ने विनीतभाव से हाथ जोड़कर अपने प्रिय भाई को अनेक प्रकार से सान्त्वना दी।
अनादृत्य तु तद् वाक्यं लक्ष्मणोष्ठपुटच्युतम्।
अपश्यंस्तां प्रियां सीतां प्राक्रोशत् स पुनः पुनः॥३१॥
लक्ष्मण के ओष्ठपुटों से निकली हुई इस बात का आदर न करके श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्यारी पत्नी सीता को न देखने के कारण उन्हें बारंबार पुकारने और रोने लगे॥३१॥
सर्ग ६२
सीतामपश्यन् धर्मात्मा शोकोपहतचेतनः।
विललाप महाबाहू रामः कमललोचनः॥१॥
सीता को न देखकर शोक से व्याकुलचित्त हुए धर्मात्मा महाबाहु कमलनयन श्रीराम विलाप करने लगे॥१॥
पश्यन्निव च तां सीतामपश्यन्मन्मथार्दितः।
उवाच राघवो वाक्यं विलापाश्रयदुर्वचम्॥२॥
रघुनाथजी सीता के प्रति अधिक प्रेम के कारण उनके वियोग में कष्ट पा रहे थे। वे उन्हें न देखकर भी देखते हुए के समान ऐसी बात कहने लगे, जो विलाप का आश्रय होने से गद्गदकण्ठ के कारण कठिनता से बोली जा रही थी-॥२॥
त्वमशोकस्य शाखाभिः पुष्पप्रियतरा प्रिये।
आवृणोषि शरीरं ते मम शोकविवर्धनी॥३॥
‘प्रिये! तुम्हें फूल अधिक प्रिय हैं, इसलिये खिली हुई अशोक की शाखाओं से अपने शरीर को छिपाती हो और मेरा शोक बढ़ा रही हो॥३॥
कदलीकाण्डसदृशौ कदल्या संवृतावुभौ।
ऊरू पश्यामि ते देवि नासि शक्ता निगुहितुम्॥४॥
‘देवि! मैं केले के तनों के तुल्य और कदलीदल से ही छिपे हुए तुम्हारे दोनों ऊरुओं (जाँघों) को देख रहा हूँ। तुम उन्हें छिपा नहीं सकती॥४॥
कर्णिकारवनं भद्रे हसन्ती देवि सेवसे।
अलं ते परिहासेन मम बाधावहेन वै॥५॥
‘भद्रे! देवि! तुम हँसती हुई कनेर-पुष्पों की वाटिका का सेवन करती हो। बंद करो इस परिहास को, इससे मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है॥५॥
विशेषेणाश्रमस्थाने हासोऽयं न प्रशस्यते।
अवगच्छामि ते शीलं परिहासप्रियं प्रिये॥६॥
आगच्छ त्वं विशालाक्षि शून्योऽयमुटजस्तव।
‘विशेषतः आश्रम के स्थान में यह हास-परिहास अच्छा नहीं बताया जाता है। प्रिये! मैं जानता हूँ, तुम्हारा स्वभाव परिहासप्रिय है। विशाललोचने! आओ तुम्हारी यह पर्णशाला सूनी है’॥६ १/२॥
सुव्यक्तं राक्षसैः सीता भक्षिता वा हृतापि वा। ७॥
न हि सा विलपन्तं मामुपसम्प्रेति लक्ष्मण।
(फिर भ्रम दूर होने पर वे सुमित्राकुमार से बोले-) ‘लक्ष्मण! अब तो भलीभाँति स्पष्ट हो गया कि राक्षसों ने सीता को खा लिया अथवा हर लिया; क्योंकि मैं विलाप कर रहा हूँ और वह मेरे पास नहीं आ रही है॥७ १/२॥
एतानि मृगयथानि साश्रुनेत्राणि लक्ष्मण॥८॥
शंसन्तीव हि मे देवीं भक्षितां रजनीचरैः।
‘लक्ष्मण! ये जो मृगसमूह हैं, ये भी अपने नेत्रों में आँसू भरकर मानो मुझसे यही कह रहे हैं कि देवी सीता को निशाचर खा गये॥८ १/२॥
हा ममार्ये क्व यातासि हा साध्वि वरवर्णिनि॥९॥
हा सकामाद्य कैकेयी देवि मेऽद्य भविष्यति।
‘हा मेरी आर्ये! (आदरणीये!) तुम कहाँ चली गयी? हा साध्वि! हा वरवर्णिनि! तुम कहाँ गयी? हा देवि! आज कैकेयी सफलमनोरथ हो जायगी॥९ १/२॥
सीतया सह निर्यातो विना सीतामुपागतः॥१०॥
कथं नाम प्रवेक्ष्यामि शून्यमन्तःपुरं मम।
‘सीता के साथ अयोध्या से निकला था। यदि सीता के बिना ही वहाँ लौटा तो अपने सूने अन्तःपुर में कैसे प्रवेश करूँगा॥१० १/२॥
निर्वीर्य इति लोको मां निर्दयश्चेति वक्ष्यति॥११॥
कातरत्वं प्रकाशं हि सीतापनयनेन मे।
‘सारा संसार मुझे पराक्रमहीन और निर्दय कहेगा। सीता के अपहरण से मेरी कायरता ही प्रकाश में आयेगी॥११ १/२॥
निवृत्तवनवासश्च जनकं मिथिलाधिपम्॥१२॥
कुशलं परिपृच्छन्तं कथं शक्ष्ये निरीक्षितुम्।
‘जब वनवास से लौटने पर मिथिलानरेश जनक मुझसे कुशल पूछने आयेंगे, उस समय मैं कैसे उनकी ओर देख सकूँगा?॥१२ १/२॥
विदेहराजो नूनं मां दृष्ट्वा विरहितं तया॥१३॥
सुताविनाशसंतप्तो मोहस्य वशमेष्यति।
‘मुझे सीता से रहित देख विदेहराज जनक अपनी पुत्री के विनाश से संतप्त हो निश्चय ही मूर्च्छित हो जायँगे॥१३ १/२॥
अथवा न गमिष्यामि पुरीं भरतपालिताम्॥१४॥
स्वर्गोऽपि हि तया हीनः शून्य एव मतो मम।
‘अथवा अब मैं भरत द्वारा पालित अयोध्यापुरी को नहीं जाऊँगा। जानकी के बिना मुझे स्वर्ग भी सूना ही जान पड़ेगा॥१४ १/२॥
तन्मामुत्सृज्य हि वने गच्छायोध्यापुरीं शुभाम्॥१५॥
न त्वहं तां विना सीतां जीवेयं हि कथंचन।
‘इसलिये अब तुम मुझे वन में ही छोड़कर सुन्दर अयोध्यापुरी को लौट जाओ। मैं तो अब सीता के बिना किसी तरह जीवित नहीं रह सकता॥१५ १/२॥
गाढमाश्लिष्य भरतो वाच्यो मद्रचनात् त्वया॥१६॥
अनुज्ञातोऽसि रामेण पालयेति वसुंधराम्।
‘भरत का गाढ़ आलिङ्गन करके तुम उनसे मेरा संदेश कह देना, ‘कैकेयीनन्दन! तुम सारी पृथ्वी का पालन करो, इसके लिये राम ने तुम्हें आज्ञा दे दी है’। १६ १/२॥
अम्बा च मम कैकेयी सुमित्रा च त्वया विभो॥१७॥
कौसल्या च यथान्यायमभिवाद्या ममाज्ञया।
रक्षणीया प्रयत्नेन भवता सूक्तचारिणा॥१८॥
‘विभो! मेरी माता कौसल्या, कैकेयी तथा सुमित्रा को प्रतिदिन यथोचित रीति से प्रणाम करते हुए उन सबकी रक्षा करना और सदा उनकी आज्ञा के अनुसार चलना,’ यह तुम्हारे लिये मेरी आज्ञा है॥१७-१८॥
सीतायाश्च विनाशोऽयं मम चामित्रसूदन।
विस्तरेण जनन्या मे विनिवेद्यस्त्वया भवेत्॥१९॥
‘शत्रुसूदन ! मेरी माता के समक्ष सीता के विनाश का यह समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाना’॥१९॥
इति विलपति राघवे तु दीने वनमुपगम्य तया विना सुकेश्या।
भयविकलमुखस्तु लक्ष्मणोऽपि व्यथितमना भृशमातुरो बभूव॥२०॥
सुन्दर केशवाली सीता के विरह में भगवान् श्रीराम वन के भीतर जाकर जब इस तरह दीनभाव से विलाप करने लगे, तब लक्ष्मण के भी मुखपर भयजनित व्याकुलता के चिह्न दिखायी देने लगे। उनका मन व्यथित हो उठा और वे अत्यन्त घबरा गये॥२०॥
सर्ग ६३
स राजपुत्रः प्रियया विहीनः शोकेन मोहेन च पीड्यमानः।
विषादयन् भ्रातरमार्तरूपो भूयो विषादं प्रविवेश तीव्रम्॥१॥
अपनी प्रिया सीता से रहित हो राजकुमार श्रीराम शोक और मोह से पीड़ित होने लगे। वे स्वयं तो पीड़ित थे ही, अपने भाई लक्ष्मण को भी विषाद में डालते हुए पुनः तीव्र शोक में मग्न हो गये॥१॥
स लक्ष्मणं शोकवशाभिपन्नं शोके निमग्नो विपुले तु रामः।
उवाच वाक्यं व्यसनानुरूपमुष्णं विनिःश्वस्य रुदन् सशोकम्॥२॥
लक्ष्मण शोक के अधीन हो रहे थे, उनसे महान् शोक में डूबे हुए श्रीराम दुःख के साथ रोते हुए गरम उच्छ्वास लेकर अपने ऊपर पड़े हुए संकट के अनुरूप वचन बोले-॥२॥
न मद्विधो दुष्कृतकर्मकारी मन्ये द्वितीयोऽस्ति वसुंधरायाम्।
शोकानुशोको हि परम्पराया मामेति भिन्दन् हृदयं मनश्च॥३॥
‘सुमित्रानन्दन! मालूम होता है, मेरे-जैसा पापकर्म करने वाला मनुष्य इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि एक के बाद दूसरा शोक मेरे हृदय (प्राण) और मन को विदीर्ण करता हुआ लगातार मुझपर आता जा रहा है॥३॥
पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि।
तत्रायमद्यापतितो विपाको दुःखेन दुःखं यदहं विशामि॥४॥
‘निश्चय ही पूर्वजन्म में मैंने अपनी इच्छा के अनुसार बारंबार बहुत-से पापकर्म किये हैं; उन्हीं में से कुछ कर्मों का यह परिणाम आज प्राप्त हुआ है, जिससे मैं एक दुःख से दूसरे दुःख में पड़ता जा रहा हूँ॥४॥
राज्यप्रणाशः स्वजनैर्वियोगः पितुर्विनाशो जननीवियोगः।
सर्वाणि मे लक्ष्मण शोकवेग मापूरयन्ति प्रविचिन्तितानि॥५॥
‘पहले तो मैं राज्य से वञ्चित हुआ; फिर मेरा स्वजनों से वियोग हुआ। तत्पश्चात् पिताजी का परलोकवास हुआ, फिर माता से भी मुझे बिछुड़ जाना पड़ा। लक्ष्मण! ये सारी बातें जब मुझे याद आती हैं, तब मेरे शोक के वेग को बढ़ा देती हैं।॥५॥
सर्वं तु दुःखं मम लक्ष्मणेदं शान्तं शरीरे वनमेत्य क्लेशम्।
सीतावियोगात् पुनरप्युदीर्णं काष्ठरिवाग्निः सहसोपदीप्तः॥६॥
‘लक्ष्मण! वन में आकर क्लेश का अनुभव करके भी यह सारा दुःख सीता के समीप रहने से मेरे शरीर में ही शान्त हो गया था, परंतु सीता के वियोग से वह फिर उद्दीप्त हो उठा है, जैसे सूखे काठ का संयोग पाकर आग सहसा प्रज्वलित हो उठती है॥६॥
सा नूनमार्या मम राक्षसेन ह्यभ्याहृता खं समुपेत्य भीरुः।
अपस्वरं सुस्वरविप्रलापा भयेन विक्रन्दितवत्यभीक्ष्णम्॥७॥
‘हाय! मेरी श्रेष्ठ स्वभाववाली भीरु पत्नी को अवश्य ही राक्षस ने आकाशमार्ग से हर लिया। उस समय सुमधुर स्वर में विलाप करने वाली सीता भय के मारे बारंबार विकृत स्वर में क्रन्दन करने लगी होगी॥७॥
तौ लोहितस्य प्रियदर्शनस्य सदोचितावुत्तमचन्दनस्य।
वृत्तौ स्तनौ शोणितपङ्कदिग्धौ नूनं प्रियाया मम नाभिपातः॥८॥
‘मेरी प्रिया के वे दोनों गोल-गोल स्तन, जो सदा लाल चन्दन से चर्चित होने योग्य थे, निश्चय ही रक्त की कीच में सन गये होंगे। हाय! इतने पर भी मेरे शरीर का पतन नहीं होता॥८॥
तच्छ्लक्ष्णसुव्यक्तमृदुप्रलापं तस्या मुखं कुञ्चितकेशभारम्।
रक्षोवशं नूनमुपागताया न भ्राजते राहुमुखे यथेन्दुः॥९॥
‘राक्षस के वश में पड़ी हुई मेरी प्रिया का वह मुख जो स्निग्ध एवं सुस्पष्ट मधुर वार्तालाप करने वाला तथा काले-काले घुघराले केशों के भार से सुशोभित था, वैसे ही श्रीहीन हो गया होगा, जैसे राहु के मुख में पड़ा हुआ चन्द्रमा शोभा नहीं पाता है॥९॥
तां हारपाशस्य सदोचितान्तां ग्रीवां प्रियाया मम सुव्रतायाः।
रक्षांसि नूनं परिपीतवन्ति शून्ये हि भित्त्वा रुधिराशनानि॥१०॥
‘हाय! उत्तम व्रत का पालन करने वाली मेरी प्रियतमा का कण्ठ हर समय हार से सुशोभित होनेयोग्य था, किंतु रक्तभोजी राक्षसों ने सूने वन में अवश्य उसे फाड़कर उसका रक्त पिया होगा॥१०॥
मया विहीना विजने वने सा रक्षोभिराहृत्य विकृष्यमाणा।
नूनं विनादं कुररीव दीना सा मुक्तवत्यायतकान्तनेत्रा॥११॥
‘मेरे न रहने के कारण निर्जन वन में राक्षसों ने उसे ले-लेकर घसीटा होगा और विशाल एवं मनोहर नेत्रोंवाली वह जानकी अत्यन्त दीनभाव से कुररीकी भाँति विलाप करती रही होगी॥११॥
अस्मिन् मया सार्धमुदारशीला शिलातले पूर्वमुपोपविष्टा।
कान्तस्मिता लक्ष्मण जातहासा त्वामाह सीता बहुवाक्यजातम्॥१२॥
‘लक्ष्मण! यह वही शिलातल है, जिस पर उदार स्वभाववाली सीता पहले एक दिन मेरे साथ बैठी हुई थी। उसकी मुसकान कितनी मनोहर थी, उस समय उसने हँस-हँसकर तुमसे भी बहुत-सी बातें कही थीं।
गोदावरीयं सरितां वरिष्ठा प्रिया प्रियाया मम नित्यकालम्।
अप्यत्र गच्छेदिति चिन्तयामि नैकाकिनी याति हि सा कदाचित्॥१३॥
‘सरिताओं में श्रेष्ठ यह गोदावरी मेरी प्रियतमा को सदा ही प्रिय रही है। सोचता हूँ, शायद वह इसी के तटपर गयी हो, किंतु अकेली तो वह कभी वहाँ नहीं जाती थी॥
पद्मानना पद्मपलाशनेत्रा पद्मानि वानेतुमभिप्रयाता।
तदप्ययुक्तं नहि सा कदाचिन्मया विना गच्छति पङ्कजानि॥१४॥
‘उसका मुख और विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलों के समान सुन्दर हैं, सम्भव है, वह कमलपुष्प लाने के लिये ही गोदावरी तट पर गयी हो, परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वह मुझे साथ लिये बिना कभी कमलों के पास नहीं जाती थी॥१४॥
कामं त्विदं पुष्पितवृक्षषण्डं नानाविधैः पक्षिगणैरुपेतम्।
वनं प्रयाता नु तदप्ययुक्तमेकाकिनी सातिबिभेति भीरुः॥१५॥
‘हो सकता है कि वह इन पुष्पित वृक्षसमूहों से युक्त और नाना प्रकार के पक्षियों से सेवित वन में भ्रमण के लिये गयी हो; परंतु यह भी ठीक नहीं लगता; क्योंकि वह भीरु तो अकेली वन में जाने से बहुत डरती थी॥१५॥
आदित्य भो लोककृताकृतज्ञ लोकस्य सत्यानृतकर्मसाक्षिन्।
मम प्रिया सा क्व गता हृता वा शंसस्व मे शोकहतस्य सर्वम्॥१६॥
‘सूर्यदेव! संसार में किसने क्या किया और क्या नहीं किया—इसे तुम जानते हो; लोगों के सत्य-असत्य (पुण्य और पाप) कर्मो के तुम्ही साक्षी हो। मेरी प्रिया सीता कहाँ गयी अथवा उसे किसने हर लिया, यह सब मुझे बताओ; क्योंकि मैं उसके शोक से पीड़ित हूँ॥१६॥
लोकेषु सर्वेषु न नास्ति किंचिद् यत् ते न नित्यं विदितं भवेत् तत्।
शंसस्व वायो कुलपालिनीं तां मृता हृता वा पथि वर्तते वा॥१७॥
“वायुदेव! समस्त विश्व में ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें सदा ज्ञात न रहती हो। मेरी कुलपालिका सीता कहाँ है, यह बता दो वह मर गयी, हर ली गयी अथवा मार्ग में ही है’॥१७॥
इतीव तं शोकविधेयदेहं रामं विसंज्ञं विलपन्तमेव।
उवाच सौमित्रिरदीनसत्त्वो न्याय्ये स्थितः कालयुतं च वाक्यम्॥१८॥
इस प्रकार शोक के अधीन होकर जब श्रीरामचन्द्रजी संज्ञाशून्य हो विलाप करने लगे, तब उनकी ऐसी अवस्था देख न्यायोचित मार्ग पर स्थित रहने वाले उदारचित्त सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उनसे यह समयोचित बात कही-॥१८॥
शोकं विसृज्याद्य धृतिं भजस्व सोत्साहता चास्तु विमार्गणेऽस्याः।
उत्साहवन्तो हि नरा न लोके सीदन्ति कर्मस्वतिदुष्करेषु॥१९॥
‘आर्य! आप शोक छोड़कर धैर्य धारण करें; सीता की खोज के लिये मन में उत्साह रखें; क्योंकि उत्साही मनुष्य जगत् में अत्यन्त दुष्कर कार्य आ पड़ने पर भी कभी दुःखी नहीं होते हैं॥१९॥
इतीव सौमित्रिमुदग्रपौरुषं ब्रुवन्तमार्तो रघुवंशवर्धनः।
न चिन्तयामास धृतिं विमुक्तवान् पुनश्च दुःखं महदभ्युपागमत्॥२०॥
बढ़े हुए पुरुषार्थवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकार की बातें कह रहे थे, उस समय रघुकुल की वृद्धि करने वाले श्रीराम ने आर्त होकर उनके कथन के औचित्य पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने धैर्य छोड़ दिया और वे पुनः महान् दुःख में पड़ गये॥२०॥
सर्ग ६४
स दीनो दीनया वाचा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत्।
शीघ्रं लक्ष्मण जानीहि गत्वा गोदावरी नदीम्॥१॥
अपि गोदावरी सीता पद्मान्यानयितुं गता।
तदनन्तर दीन हुए श्रीरामचन्द्रजी ने दीन वाणी में लक्ष्मण से कहा-’लक्ष्मण! तुम शीघ्र ही गोदावरी नदी के तट पर जाकर पता लगाओ। सीता कमल लाने के लिये तो नहीं चली गयीं॥१ १/२॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः पुनरेव हि॥२॥
नदी गोदावरी रम्यां जगाम लघुविक्रमः।
श्रीराम की ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मण शीघ्र गति से पुनः रमणीय गोदावरी नदी के तट पर गये॥२ १/२॥
तां लक्ष्मणस्तीर्थवती विचित्वा राममब्रवीत्॥३॥
नैनां पश्यामि तीर्थेषु क्रोशतो न शृणोति मे।
अनेक तीर्थों (घाटों)-से युक्त गोदावरी के तट पर खोजकर लक्ष्मण पुनः लौट आये और श्रीराम से बोले -‘भैया! मैं गोदावरी के घाटों पर सीता को नहीं देख पाता हूँ; जोर-जोर से पुकारने पर भी वे मेरी बात नहीं सुनती हैं॥३ १/२॥
कं नु सा देशमापन्ना वैदेही क्लेशनाशिनी॥४॥
नहि तं वेद्मि वै राम यत्र सा तनुमध्यमा।
‘श्रीराम! क्लेशों का नाश करने वाली विदेहराजकुमारी न जाने किस देश में चली गयीं। भैया श्रीराम! जहाँ कृश कटिप्रदेशवाली सीता गयी हैं, उस स्थान को मैं नहीं जानता’॥४ १/२॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा दीनः संतापमोहितः॥
रामः समभिचक्राम स्वयं गोदावरी नदीम्।
लक्ष्मण की यह बात सुनकर दीन एवं संताप से मोहित हुए श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही गोदावरी नदी के तट पर गये॥५ १/२॥
स तामुपस्थितो रामः क्व सीतेत्येवमब्रवीत्॥६॥
भूतानि राक्षसेन्द्रेण वधार्हेण हृतामपि।
न तां शशंसू रामाय तथा गोदावरी नदी॥७॥
वहाँ पहुँचकर श्रीराम ने पूछा-‘सीता कहाँ है?’ परंतु वध के योग्य राक्षसराज रावण द्वारा हरी गयी सीता के विषय में समस्त भूतों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। गोदावरी नदी ने भी श्रीरामको कोई उत्तर नहीं दिया॥६-७॥
ततः प्रचोदिता भूतैः शंस चास्मै प्रियामिति।
न च सा ह्यवदत् सीतां पृष्टा रामेण शोचता॥८॥
तदनन्तर वन के समस्त प्राणियों ने उन्हें प्रेरित किया कि ‘तुम श्रीराम को उनकी प्रिया का पता बता दो!’ किंतु शोकमग्न श्रीराम के पूछने पर भी गोदावरी ने सीता का पता नहीं बताया॥८॥
रावणस्य च तद्रूपं कर्मापि च दुरात्मनः।
ध्यात्वा भयात् तु वैदेहीं सा नदी न शशंस ह॥९॥
दुरात्मा रावण के उस रूप और कर्म को याद करके भय के मारे गोदावरी नदी ने वैदेही के विषय में श्रीराम से कुछ नहीं कहा॥९॥
निराशस्तु तया नद्या सीताया दर्शने कृतः।
उवाच रामः सौमित्रिं सीतादर्शनकर्शितः॥१०॥
सीता के दर्शन के विषय में जब नदी ने उन्हें पूर्ण निराश कर दिया, तब सीता को न देखने से कष्ट में पड़े हुए श्रीराम सुमित्राकुमार से इस प्रकार बोले-॥१०॥
एषा गोदावरी सौम्य किंचिन्न प्रतिभाषते।
किं नु लक्ष्मण वक्ष्यामि समेत्य जनकं वचः॥११॥
मातरं चैव वैदेह्या विना तामहमप्रियम्।
‘सौम्य लक्ष्मण ! यह गोदावरी नदी तो मुझे कोई उत्तर ही नहीं देती है। अब मैं राजा जनक से मिलने पर उन्हें क्या जवाब दूंगा? जानकी के बिना उसकी माता से मिलकर भी मैं उनसे यह अप्रिय बात कैसे सुनाऊँगा?॥११ १/२॥
या मे राज्यविहीनस्य वने वन्येन जीवतः॥१२॥
सर्वं व्यपानयच्छोकं वैदेही क्व नु सा गता।
‘राज्यहीन होकर वन में जंगली फल-मूलों से निर्वाह करते समय भी जो मेरे साथ रहकर मेरे सभी दुःखों को दूर किया करती थी, वह विदेहराजकुमारी कहाँ चली गयी?॥१२ १/२॥
ज्ञातिवर्गविहीनस्य वैदेहीमप्यपश्यतः॥१३॥
मन्ये दीर्घा भविष्यन्ति रात्रयो मम जाग्रतः।
‘बन्धु-बान्धवों से तो मेरा बिछोह हो ही गया था, अब सीता के दर्शन से भी मुझे वञ्चित होना पड़ा; उसकी चिन्ता में निरन्तर जागते रहने के कारण अब मेरी सभी रातें बहुत बड़ी हो जायँगी॥१३ १/२॥
मन्दाकिनी जनस्थानमिमं प्रस्रवणं गिरिम्॥१४॥
सर्वाण्यनुचरिष्यामि यदि सीता हि लभ्यते।
‘मन्दाकिनी नदी, जनस्थान तथा प्रस्रवण पर्वतइन सभी स्थानों पर मैं बारंबार भ्रमण करूँगा शायद वहाँ सीता का पता चल जाय॥१४ १/२॥
एते महामृगा वीर मामीक्षन्ते पुनः पुनः॥१५॥
वक्तुकामा इह हि मे इङ्गितान्युपलक्षये।
‘वीर लक्ष्मण! ये विशाल मृग मेरी ओर बारंबार देख रहे हैं, मानो यहाँ ये मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। मैं इनकी चेष्टाओं को समझ रहा हूँ’॥१५ १/२॥
तांस्तु दृष्ट्वा नरव्याघ्रो राघवः प्रत्युवाच ह॥१६॥
क्व सीतेति निरीक्षन् वै बाष्पसंरुद्धया गिरा।
एवमुक्ता नरेन्द्रेण ते मृगाः सहसोत्थिताः॥१७॥
दक्षिणाभिमुखाः सर्वे दर्शयन्तो नभःस्थलम्।
तदनन्तर उन सबकी ओर देखकर पुरुषसिंह श्रीरामचन्द्रजी ने उनसे कहा-’बताओ, सीता कहाँ हैं?’ उन मृगों की ओर देखते हुए राजा श्रीराम ने जब अश्रुगद्गद वाणी से इस प्रकार पूछा, तब वे मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और ऊपर की ओर देखकर आकाशमार्ग की ओर लक्ष्य कराते हुए सब-के-सब दक्षिण दिशा की ओर मुँह किये दौड़े॥१६-१७ १/२॥
मैथिली ह्रियमाणा सा दिशं यामभ्यपद्यत॥१८॥
तेन मार्गेण गच्छन्तो निरीक्षन्ते नराधिपम्।
मिथिलेशकुमारी सीता हरी जाकर जिस दिशा की ओर गयी थीं, उसी ओर के मार्ग से जाते हुए वे मृग राजा श्रीरामचन्द्रजी की ओर मुड़-मुड़कर देखते रहते थे॥१८ १/२॥
येन मार्गं च भूमिं च निरीक्षन्ते स्म ते मृगाः॥१९॥
पुनर्नदन्तो गच्छन्ति लक्ष्मणेनोपलक्षिताः।
तेषां वचनसर्वस्वं लक्षयामास चेङ्गितम्॥२०॥
वे मृग आकाश मार्ग और भूमि दोनों की ओर देखते और गर्जना करते हुए पुनः आगे बढ़ते थे। लक्ष्मण ने उनकी इस चेष्टा को लक्ष्य किया। वे जो कुछ कहना चाहते थे, उसका सारसर्वस्वरूप जो उनकी चेष्टा थी, उसे उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया॥१९-२०॥
उवाच लक्ष्मणो धीमान् ज्येष्ठं भ्रातरमार्तवत्।
क्व सीतेति त्वया पृष्टा यथेमे सहसोत्थिताः॥२१॥
दर्शयन्ति क्षितिं चैव दक्षिणां च दिशं मृगाः।
साधु गच्छावहे देव दिशमेतां च नैर्ऋतीम्॥२२॥
यदि तस्यागमः कश्चिदार्या वा साथ लक्ष्यते।
तदनन्तर बुद्धिमान् लक्ष्मण ने आर्त-से होकर अपने बड़े भाई से इस प्रकार कहा-’आर्य! जब आपने पूछा कि सीता कहाँ हैं, तब ये मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और पृथ्वी तथा दक्षिण की ओर हमारा लक्ष्य कराने लगे हैं; अतः देव! यही अच्छा होगा कि हमलोग इस नैर्ऋत्य दिशा की ओर चलें। सम्भव है, इधर जाने से सीता का कोई समाचार मिल जाय अथवा आर्या सीता स्वयं ही दृष्टिगोचर हो जायँ’॥२१-२२ १/२॥
बाढमित्येव काकुत्स्थः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्॥२३॥
लक्ष्मणानुगतः श्रीमान् वीक्षमाणो वसुंधराम्।
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीमान् रामचन्द्रजी लक्ष्मण को साथ ले पृथ्वी की ओर ध्यान से देखते हुए दक्षिण दिशा की ओर चल दिये॥२३ १/२॥
एवं सम्भाषमाणौ तावन्योन्यं भ्रातरावुभौ॥२४॥
वसुंधरायां पतितपुष्पमार्गमपश्यताम्।
वे दोनों भाई आपस में इसी प्रकार की बातें करते हुए ऐसे मार्ग पर जा पहुँचे, जहाँ भूमि पर कुछ फूल गिरे दिखायी देते थे॥२४ १/२॥
पुष्पवृष्टिं निपतितां दृष्ट्वा रामो महीतले॥२५॥
उवाच लक्ष्मणं वीरो दुःखितो दुःखितं वचः।
पृथ्वी पर फूलों की उस वर्षा को देखकर वीर श्रीराम ने दुःखी हो लक्ष्मण से यह दुःखभरा वचन कहा-॥२५ १/२॥
अभिजानामि पुष्पाणि तानीमानीह लक्ष्मण॥२६॥
अपिनद्धानि वैदेह्या मया दत्तानि कानने।
‘लक्ष्मण ! मैं इन फूलों को पहचानता हूँ। ये वे ही फूल यहाँ गिरे हैं, जिन्हें वन में मैंने विदेहनन्दिनी को दिया था और उन्होंने अपने केशों में लगा लिया था॥२६ १/२॥
मन्ये सूर्यश्च वायुश्च मेदिनी च यशस्विनी॥२७॥
अभिरक्षन्ति पुष्पाणि प्रकुर्वन्तो मम प्रियम्।
‘मैं समझता हूँ, सूर्य, वायु और यशस्विनी पृथ्वी ने मेरा प्रिय करने के लिये ही इन फूलों को सुरक्षित रखा है’॥२७ १/२॥
एवमुक्त्वा महाबाहुर्लक्ष्मणं पुरुषर्षभम्॥२८॥
उवाच रामो धर्मात्मा गिरिं प्रस्रवणाकुलम्।
पुरुषप्रवर लक्ष्मण से ऐसा कहकर धर्मात्मा महाबाहु श्रीराम ने झरनों से भरे हुए प्रस्रवण गिरि से कहा-॥२८ १/२॥
कच्चित् क्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी॥२९॥
रामा रम्ये वनोद्देशे मया विरहिता त्वया।
‘पर्वतराज! क्या तुमने इस वन के रमणीय प्रदेश में मुझसे बिछुड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी सीता को देखा है?’॥२९ १/२॥
क्रुद्धोऽब्रवीद् गिरिं तत्र सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥३०॥
तां हेमवर्णां हेमाङ्गी सीतां दर्शय पर्वत।
यावत् सानूनि सर्वाणि न ते विध्वंसयाम्यहम्॥३१॥
तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृग को देखकर दहाड़ता है, उसी प्रकार वे कुपित हो वहाँ उस पर्वत से बोले —’पर्वत ! जबतक मैं तुम्हारे सारे शिखरों का विध्वंस नहीं कर डालता हूँ, इसके पहले ही तुम उस काञ्चन की-सी काया-कान्तिवाली सीता का मुझे दर्शन करा दो’॥३०-३१॥
एवमुक्तस्तु रामेण पर्वतो मैथिली प्रति।
दर्शयन्निव तां सीतां नादर्शयत राघवे॥३२॥
श्रीराम के द्वारा मैथिली के लिये ऐसा कहे जाने पर उस पर्वत ने सीता को दिखाता हुआ-सा कुछ चिह्न प्रकट कर दिया। श्रीरघुनाथजी के समीप वह सीता को साक्षात् उपस्थित न कर सका॥३२॥
ततो दाशरथी राम उवाच च शिलोच्चयम्।
मम बाणाग्निनिर्दग्धो भस्मीभूतो भविष्यसि॥३३॥
असेव्यः सर्वतश्चैव निस्तृणद्रुमपल्लवः।
तब दशरथनन्दन श्रीराम ने उस पर्वत से कहा-’अरे! तू मेरे बाणों की आग से जलकर भस्मीभूत हो जायगा। किसी भी ओर से तू सेवन के योग्य नहीं रह जायगा। तेरे तृण, वृक्ष और पल्लव नष्ट हो जायँगे’॥३३ १/२॥
इमां वा सरितं चाद्य शोषयिष्यामि लक्ष्मण॥३४॥
यदि नाख्याति मे सीतामद्य चन्द्रनिभाननाम्।
(इसके बाद वे सुमित्राकुमार से बोले-) ‘लक्ष्मण! यदि यह नदी आज मुझे चन्द्रमुखी सीता का पता नहीं बताती है तो मैं अब इसे भी सुखा डालूँगा’॥३४ १/२॥
एवं प्ररुषितो रामो दिधक्षन्निव चक्षुषा॥३५॥
ददर्श भूमौ निष्क्रान्तं राक्षसस्य पदं महत्।
ऐसा कहकर रोष में भरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उसकी ओर इस तरह देखने लगे, मानो अपनी दृष्टि द्वारा उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। इतने ही में उस ङ्केपर्वत और गोदावरी के समीप की भूमि पर राक्षस का विशाल पदचिह्न उभरा हुआ दिखायी दिया॥३५ १/२॥
त्रस्ताया रामकांक्षिण्याः प्रधावन्त्या इतस्ततः॥३६॥
राक्षसेनानुसृप्ताया वैदेह्याश्च पदानि तु।
साथ ही राक्षस ने जिनका पीछा किया था और जो श्रीराम की अभिलाषा रखकर रावण के भय से संत्रस्त हो इधर-उधर भागती फिरी थीं, उन विदेहराजकुमारी सीता के चरणचिह्न भी वहाँ दिखायी दिये॥३६ १/२॥
स समीक्ष्य परिक्रान्तं सीताया राक्षसस्य च॥३७॥
भग्नं धनुश्च तूणी च विकीर्णं बहुधा रथम्।
सम्भ्रान्तहृदयो रामः शशंस भ्रातरं प्रियम्॥३८॥
सीता और राक्षस के पैरों के निशान, टूटे धनुष, तरकस और छिन्न-भिन्न होकर अनेक टुकड़ों में बिखरे हुए रथ को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का हृदय घबरा उठा। वे अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमार से बोले –॥३७-३८॥
पश्य लक्ष्मण वैदेह्या कीर्णाः कनकबिन्दवः।
भूषणानां हि सौमित्रे माल्यानि विविधानि च॥३९॥
‘लक्ष्मण! देखो, ये सीता के आभूषणों में लगे हुए सोने के घुघुरू बिखरे पड़े हैं। सुमित्रानन्दन! उसके नाना प्रकार के हार भी टूटे पड़े हैं॥३९॥
तप्तबिन्दुनिकाशैश्च चित्रैः क्षतजबिन्दुभिः।
आवृतं पश्य सौमित्रे सर्वतो धरणीतलम्॥४०॥
‘सुमित्राकुमार! देखो, यहाँ की भूमि सब ओर से सुवर्ण की बूंदों के समान ही विचित्र रक्तबिन्दुओं से रँगी दिखायी देती है॥४०॥
मन्ये लक्ष्मण वैदेही राक्षसैः कामरूपिभिः।
भित्त्वा भित्त्वा विभक्ता वा भक्षिता वा भविष्यति॥४१॥
‘लक्ष्मण! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसों ने यहाँ सीता के टुकड़े-टुकड़े करके उसे आपस में बाँटा और खाया होगा॥४१॥
तस्या निमित्तं सीताया द्वयोर्विवदमानयोः।
बभूव युद्धं सौमित्रे घोरं राक्षसयोरिह॥४२॥
‘सुमित्रानन्दन! सीता के लिये परस्पर विवाद करने वाले दो राक्षसों में यहाँ घोर युद्ध भी हुआ है॥४२॥
मुक्तामणिचितं चेदं रमणीयं विभूषितम्।
धरण्यां पतितं सौम्य कस्य भग्नं महद् धनुः॥४३॥
‘सौम्य! तभी तो यहाँ यह मोती और मणियों से जटित एवं विभूषित किसी का अत्यन्त सुन्दर और विशाल धनुष खण्डित होकर पृथ्वी पर पड़ा है। यह किसका धनुष हो सकता है ?॥४३॥
राक्षसानामिदं वत्स सुराणामथवापि वा।
तरुणादित्यसंकाशं वैदूर्यगलिकाचितम्॥४४॥
‘वत्स! पता नहीं, यह राक्षसों का है या देवताओं का यह प्रातःकाल के सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहा है तथा इसमें वैदूर्यमणि (नीलम) के टुकड़े जड़े हुए हैं॥४४॥
विशीर्णं पतितं भूमौ कवचं कस्य काञ्चनम्।
छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम्॥४५॥
भग्नदण्डमिदं सौम्य भूमौ कस्य निपातितम्।
‘सौम्य! उधर पृथ्वी पर टूटा हुआ एक सोने का कवच पड़ा है, न जाने वह किसका है? दिव्य मालाओं से सुशोभित यह सौ कमानियों वाला छत्र किसका है? इसका डंडा टूट गया है और यह धरती पर गिरा दिया गया है॥४५ १/२॥
काञ्चनोरश्छदाश्चेमे पिशाचवदनाः खराः॥४६॥
भीमरूपा महाकायाः कस्य वा निहता रणे।
‘इधर ये पिशाचों के समान मुखवाले भयंकर रूपधारी गधे मरे पड़े हैं। इनका शरीर बहुत ही विशाल रहा है। इन सबकी छाती में सोने के कवच बँधे हैं। ये युद्ध में मारे गये जान पड़ते हैं। पता नहीं ये किसके थे॥४६ १/२॥
दीप्तपावकसंकाशो द्युतिमान् समरध्वजः॥४७॥
अपविद्धश्च भग्नश्च कस्य साङ्गामिको रथः।
‘तथा संग्राम में काम देने वाला यह किसका रथ पड़ा है ? इसे किसी ने उलटा गिराकर तोड़ डाला है। समराङ्गण में स्वामी को सूचित करने वाली ध्वजा भी इसमें लगी थी। यह तेजस्वी रथ प्रज्वलित अग्नि के समान दमक रहा है॥४७ १/२॥
रथाक्षमात्रा विशिखास्तपनीयविभूषणाः॥४८॥
कस्येमे निहता बाणाः प्रकीर्णा घोरदर्शनाः।
‘ये भयंकर बाण, जो यहाँ टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरे पड़े हैं, किसके हैं? इनकी लंबाई और मोटाई रथ के धुरे के समान प्रतीत होती है। इनके फल-भाग टूट गये हैं तथा ये सुवर्ण से विभूषित हैं॥४८ १/२॥
शरावरौ शरैः पूर्णौ विध्वस्तौ पश्य लक्ष्मण॥४९॥
प्रतोदाभीषहस्तोऽयं कस्य वा सारथिर्हतः।
‘लक्ष्मण! उधर देखो, ये बाणों से भरे हुए दो तरकस पड़े हैं, जो नष्ट कर दिये गये हैं। यह किसका सारथि मरा पड़ा है, जिसके हाथ में चाबुक और लगाम अभी तक मौजूद हैं॥४९ १/२॥
पदवी पुरुषस्यैषा व्यक्तं कस्यापि रक्षसः॥५०॥
वैरं शतगुणं पश्य मम तैर्जीवितान्तकम्।
सुघोरहृदयैः सौम्य राक्षसैः कामरूपिभिः॥५१॥
‘सौम्य! यह अवश्य ही किसी राक्षस का पदचिह्न दिखायी देता है। इन अत्यन्त क्रूर हृदय वाले कामरूपी राक्षसों के साथ मेरा वैर सौगुना बढ़ गया है। देखो, यह वैर उनके प्राण लेकर ही शान्त होगा॥५०-५१॥
हृता मृता वा वैदेही भक्षिता वा तपस्विनी।
न धर्मस्त्रायते सीतां ह्रियमाणां महावने॥५२॥
‘अवश्य ही तपस्विनी विदेहराजकुमारी हर ली गयी, मृत्यु को प्राप्त हो गयी अथवा राक्षसों ने उसे खा लिया। इस विशाल वन में हरी जाती हुई सीता की रक्षा धर्म भी नहीं कर रहा है॥५२॥
भक्षितायां हि वैदेह्यां हृतायामपि लक्ष्मण।
के हि लोके प्रियं कर्तुं शक्ताः सौम्य ममेश्वराः॥५३॥
‘सौम्य लक्ष्मण! जब विदेहनन्दिनी राक्षसों का ग्रास बन गयी अथवा उनके द्वारा हर ली गयी और कोई सहायक नहीं हुआ, तब इस जगत् में कौन ऐसे पुरुष हैं, जो मेरा प्रिय करने में समर्थ हों॥५३॥
कर्तारमपि लोकानां शूरं करुणवेदिनम्।
अज्ञानादवमन्येरन् सर्वभूतानि लक्ष्मण॥५४॥
‘लक्ष्मण! जो समस्त लोकों की सृष्टि, पालन और संहार करने वाले ‘त्रिपुर-विजय’ आदि शौर्य से सम्पन्न महेश्वर हैं, वे भी जब अपने करुणामय स्वभाव के कारण चुप बैठे रहते हैं, तब सारे प्राणी उनके ऐश्वर्य को न जानने से उनका तिरस्कार करने लग जाते हैं॥५४॥
मृदुं लोकहिते युक्तं दान्तं करुणवेदिनम्।
निर्वीर्य इति मन्यन्ते नूनं मां त्रिदशेश्वराः॥५५॥
‘मैं लोकहित में तत्पर, युक्तचित्त, जितेन्द्रिय तथा जीवों पर करुणा करने वाला हूँ, इसीलिये ये इन्द्र आदि देवेश्वर निश्चय ही मुझे निर्बल मान रहे हैं (तभी तो इन्होंने सीता की रक्षा नहीं की है)॥५५॥
मां प्राप्य हि गुणो दोषः संवृत्तः पश्य लक्ष्मण।
अद्यैव सर्वभूतानां रक्षसामभवाय च॥५६॥
संहृत्यैव शशिज्योत्स्नां महान् सूर्य इवोदितः।
संहृत्यैव गुणान् सर्वान् मम तेजः प्रकाशते॥५७॥
‘लक्ष्मण! देखो तो सही, यह दयालुता आदि गुण मेरे पास आकर दोष बन गया (तभी तो मुझे निर्बल मानकर मेरी स्त्री का अपहरण किया गया है। अतः अब मुझे पुरुषार्थ ही प्रकट करना होगा)। जैसे प्रलयकाल में उदित हुआ महान् सूर्य चन्द्रमा की ज्योत्स्ना (चाँदनी) का संहार करके प्रचण्ड तेज से प्रकाशित हो उठता है, उसी प्रकार अब मेरा तेज आज ही समस्त प्राणियों तथा राक्षसों का अन्त करने के लिये मेरे उन कोमल स्वभाव आदि गुणों को समेटकर प्रचण्डरूप में प्रकाशित होगा, यह भी तुम देखो॥५६-५७॥
नैव यक्षा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः।
किंनरा वा मनुष्या वा सुखं प्राप्स्यन्ति लक्ष्मण॥५८॥
‘लक्ष्मण! अब न तो यक्ष, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस, न किन्नर और न मनुष्य ही चैन से रहने पायेंगे॥५८॥
ममास्त्रबाणसम्पूर्णमाकाशं पश्य लक्ष्मण।
असम्पातं करिष्यामि ह्यद्य त्रैलोक्यचारिणाम॥५९॥
‘सुमित्रानन्दन! देखना, थोड़ी ही देर में आकाश को मैं अपने चलाये हुए बाणों से भर दूंगा और तीनलोकों में विचरने वाले प्राणियों को हिलने-डुलने भी न दूंगा॥५९॥
संनिरुद्धग्रहगणमावारितनिशाकरम्।
विप्रणष्टानलमरुद्भास्करद्युतिसंवृतम्॥६०॥
विनिर्मथितशैलाग्रं शुष्यमाणजलाशयम्।
ध्वस्तद्रुमलतागुल्मं विप्रणाशितसागरम्॥६१॥
त्रैलोक्यं त करिष्यामि संयक्तं कालकर्मणा।
‘ग्रहों की गति रुक जायगी, चन्द्रमा छिप जायगा, अग्नि, मरुद्गण तथा सूर्य का तेज नष्ट हो जायगा, सब कुछ अन्धकार से आच्छन्न हो जायगा, पर्वतों के शिखर मथ डाले जायँगे, सारे जलाशय (नदी-सरोवर आदि) सूख जायेंगे, वृक्ष, लता और गुल्म नष्ट हो जायँगे और समुद्रों का भी नाश कर दिया जायगा। इस तरह मैं सारी त्रिलोकी में ही काल की विनाशलीला आरम्भ कर दूंगा॥६०-६१॥
न ते कुशलिनी सीतां प्रदास्यन्ति ममेश्वराः॥६२॥
अस्मिन् मुहूर्ते सौमित्रे मम द्रक्ष्यन्ति विक्रमम्।
‘सुमित्रानन्दन! यदि देवेश्वरगण इसी मुहूर्त में मुझे सीता देवी को सकुशल नहीं लौटा देंगे तो वे मेरा पराक्रम देखेंगे॥६२ १/२॥
नाकाशमुत्पतिष्यन्ति सर्वभूतानि लक्ष्मण॥६३॥
मम चापगुणोन्मुक्तैर्बाणजालैर्निरन्तरम्।
‘लक्ष्मण! मेरे धनुष की प्रत्यञ्चा से छूटे हुए बाणसमूहों द्वारा आकाश के ठसाठस भर जाने के कारण उसमें कोई प्राणी उड़ नहीं सकेंगे॥६३ १/२॥
मर्दितं मम नाराचैर्ध्वस्तभ्रान्तमृगद्विजम्॥६४॥
समाकुलममर्यादं जगत् पश्याद्य लक्ष्मण।
‘सुमित्रानन्दन! देखो, आज मेरे नाराचों से रौंदा जाकर यह सारा जगत् व्याकुल और मर्यादारहित हो जायगा। यहाँ के मृग और पक्षी आदि प्राणी नष्ट एवं उद्भ्रान्त हो जायेंगे॥६४ १/२॥
आकर्णपूणैरिषुभिर्जीवलोकदुरावरैः॥६५॥
करिष्ये मैथिलीहेतोरपिशाचमराक्षसम्।
‘धनुष को कान तक खींचकर छोड़े गये मेरे बाणों को रोकना जीवजगत् के लिये बहुत कठिन होगा। मैं सीता के लिये उन बाणों द्वारा इस जगत् के समस्त पिशाचों और राक्षसों का संहार कर डालूँगा॥६५ १/२॥
मम रोषप्रयुक्तानां विशिखानां बलं सुराः॥६६॥
द्रक्ष्यन्त्यद्य विमुक्तानाममर्षाद् दूरगामिनाम्।
‘रोष और अमर्षपूर्वक छोड़े गये मेरे फलरहित दूरगामी बाणों का बल आज देवतालोग देखेंगे॥६६ १/२॥
नैव देवा न दैतेया न पिशाचा न राक्षसाः॥६७॥
भविष्यन्ति मम क्रोधात् त्रैलोक्ये विप्रणाशिते।
‘मेरे क्रोध से त्रिलोकी का विनाश हो जाने पर न देवता रह जायँगे न दैत्य, न पिशाच रहने पायेंगे न राक्षस॥६७ १/२॥
देवदानवयक्षाणां लोका ये रक्षसामपि॥६८॥
बहुधा निपतिष्यन्ति बाणौघैः शकलीकृताः।
‘देवताओं, दानवों, यक्षों और राक्षसों के जो लोक हैं, वे मेरे बाणसमूहों से टुकड़े-टुकड़े होकर बारंबार नीचे गिरेंगे॥६८ १/२॥
निर्मर्यादानिमाल्लोकान् करिष्याम्यद्य सायकैः॥६९॥
हृतां मृतां वा सौमित्रे न दास्यन्ति ममेश्वराः।
‘सुमित्रानन्दन! यदि देवेश्वरगण मेरी हरी या मरी हुई सीता को लाकर मुझे नहीं देंगे तो आज मैं अपने सायकों की मार से इन तीनों लोकों को मर्यादा से भ्रष्ट कर दूंगा॥६९ १/२॥
तथारूपां हि वैदेहीं न दास्यन्ति यदि प्रियाम्॥७०॥
नाशयामि जगत् सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्।
यावद् दर्शनमस्या वै तापयामि च सायकैः॥७१॥
‘यदि वे मेरी प्रिया विदेहराजकुमारी को मुझे उसी रूप में वापस नहीं लौटायेंगे तो मैं चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी का नाश कर डालूँगा। जबतक सीता का दर्शन न होगा, तब तक मैं अपने सायकों से समस्त संसार को संतप्त करता रहूँगा’॥७०-७१॥
इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षः स्फुरमाणोष्ठसम्पुटः।
वल्कलाजिनमाबद्धय जटाभारमबन्धयत्॥७२॥
ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी के नेत्र क्रोध से लाल हो गये, होठ फड़कने लगे। उन्होंने वल्कल और मृगचर्म को अच्छी तरह कसकर अपने जटाभार को भी बाँध लिया॥७२॥
तस्य क्रुद्धस्य रामस्य तथाभूतस्य धीमतः।
त्रिपुरं जनुषः पूर्वं रुद्रस्येव बभौ तनुः॥७३॥
उस समय क्रोध में भरकर उस तरह संहार के लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीराम का शरीर पूर्वकाल में त्रिपुर का संहार करने वाले रुद्र के समान प्रतीत होता था॥७३॥
लक्ष्मणादथ चादाय रामो निष्पीड्य कार्मुकम्।
शरमादाय संदीप्तं घोरमाशीविषोपमम्॥७४॥
संदधे धनुषि श्रीमान् रामः परपुरञ्जयः।
युगान्ताग्निरिव क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्॥७५॥
उस समय लक्ष्मण के हाथ से धनुष लेकर श्रीरामचन्द्रजी ने उसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और एक विषधर सर्प के समान भयंकर और प्रज्वलित बाण लेकर उसे उस धनुषपर रखा। तत्पश्चात् शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले श्रीराम प्रलयाग्नि के समान कुपित हो इस प्रकार बोले-॥७४-७५॥
यथा जरा यथा मृत्युर्यथा कालो यथा विधिः।
नित्यं न प्रतिहन्यन्ते सर्वभूतेषु लक्ष्मण।
तथाहं क्रोधसंयुक्तो न निवार्योऽस्म्यसंशयम्॥७६॥
‘लक्ष्मण ! जैसे बुढ़ापा, जैसे मृत्यु, जैसे काल और जैसे विधाता सदा समस्त प्राणियों पर प्रहार करते हैं, किंतु उन्हें कोई रोक नहीं पाता है, उसी प्रकार निस्संदेह क्रोध में भर जाने पर मेरा भी कोई निवारण नहीं कर सकता॥७६॥
पुरेव मे चारुदतीमनिन्दितां दिशन्ति सीतां यदि नाद्य मैथिलीम्।
सदेवगन्धर्वमनुष्यपन्नगं जगत् सशैलं परिवर्तयाम्यहम्॥७७॥
‘यदि देवता आदि आज पहले की ही भाँति मनोहर दाँतोंवाली अनिन्द्यसुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीता को मुझे लौटा नहीं देंगे तो मैं देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग और पर्वतोंसहित सारे संसार को उलट दूंगा’॥७७॥
सर्ग ६५
तप्यमानं तदा रामं सीताहरणकर्शितम्।
लोकानामभवे युक्तं सांवर्तकमिवानलम्॥१॥
वीक्षमाणं धनुः सज्यं निःश्वसन्तं पुनः पुनः।
दग्धुकामं जगत् सर्वं युगान्ते च यथा हरम्॥२॥
अदृष्टपूर्वं संक्रुद्धं दृष्ट्वा रामं स लक्ष्मणः।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं मुखेन परिशुष्यता॥३॥
सीताहरण के शोक से पीड़ित हुए श्रीराम जब उस समय संतप्त हो प्रलयकालिक अग्नि के समान समस्त लोकों का संहार करने को उद्यत हो गये और धनुष की डोरी चढ़ाकर बारंबार उसकी ओर देखने लगे तथा लंबी साँस खींचने लगे, साथ ही कल्पान्तकाल में रुद्रदेव की भाँति समस्त संसार को दग्ध कर देने की इच्छा करने लगे, तब जिन्हें इस रूप में पहले कभी देखा नहीं गया था, उन अत्यन्त कुपित हुए श्रीराम की ओर देखकर लक्ष्मण हाथ जोड़ सूखे हुए मुँह से इस प्रकार बोले-॥१-३॥
पुरा भूत्वा मृदुर्दान्तः सर्वभूतहिते रतः।
न क्रोधवशमापन्नः प्रकृतिं हातुमर्हसि॥४॥
‘आर्य! आप पहले कोमल स्वभाव से युक्त, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहे हैं।अब क्रोध के वशीभूत होकर अपनी प्रकृति (स्वभाव) का परित्याग न करें॥४॥
चन्द्रे लक्ष्मीः प्रभा सूर्ये गतिर्वायौ भुवि क्षमा।
एतच्च नियतं नित्यं त्वयि चानुत्तमं यशः॥५॥
‘चन्द्रमा में शोभा, सूर्य में प्रभा, वायु में गति और पृथ्वी में क्षमा जैसे नित्य विराजमान रहती है, उसी प्रकार आप में सर्वोत्तम यश सदा प्रकाशित होता है॥५॥
एकस्य नापराधेन लोकान् हन्तुं त्वमर्हसि।
ननु जानामि कस्यायं भग्नः सांग्रामिको रथः॥६॥
‘आप किसी एक के अपराध से समस्त लोकों का संहार न करें। मैं यह जानने की चेष्टा करता हूँ कि यह टूटा हुआ युद्धोपयोगी रथ किसका है॥६॥
केन वा कस्य वा हेतोः सयुगः सपरिच्छदः।
खरनेमिक्षतश्चायं सिक्तो रुधिरबिन्दुभिः॥७॥
देशो निर्वृत्तसंग्रामः सुघोरः पार्थिवात्मज।
एकस्य तु विमर्दोऽयं न द्वयोर्वदतां वर॥८॥
नहि वृत्तं हि पश्यामि बलस्य महतः पदम्।
नैकस्य तु कृते लोकान् विनाशयितुमर्हसि॥९॥
‘अथवा किसने किस उद्देश्य से जूए तथा अन्य उपकरणों सहित इस रथ को तोड़ा है? इसका भी पता लगाना है। राजकुमार ! यह स्थान घोड़ों की खुरों और थके पहियों से खुदा हुआ है। साथ ही खून की बूदों से सिंच उठा है। इससे सिद्ध होता है कि यहाँ बड़ा भयंकर संग्राम हुआ था, परंतु यह संग्राम-चिह्न किसी एक ही रथी का है, दो का नहीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीराम! मैं यहाँ किसी विशाल सेना का पदचिह्न नहीं देख रहा हूँ; अतः किसी एक ही के अपराध के कारण आपको समस्त लोकों का विनाश नहीं करना चाहिये॥७–९॥
युक्तदण्डा हि मृदवः प्रशान्ता वसुधाधिपाः।
सदा त्वं सर्वभूतानां शरण्यः परमा गतिः॥१०॥
‘क्योंकि राजालोग अपराध के अनुसार ही उचित दण्ड देने वाले, कोमल स्वभाव वाले और शान्त होते हैं। आप तो सदा ही समस्त प्राणियों को शरण देने वाले तथा उनकी परम गति हैं॥१०॥
को नु दारप्रणाशं ते साधु मन्येत राघव।
सरितः सागराः शैला देवगन्धर्वदानवाः॥११॥
नालं ते विप्रियं कर्तुं दीक्षितस्येव साधवः।
‘रघुनन्दन! आपकी स्त्री का विनाश या अपहरण कौन अच्छा समझेगा? जैसे यज्ञ में दीक्षित हुए पुरुष का साधु स्वभाववाले ऋत्विज् कभी अप्रिय नहीं कर सकते, उसी प्रकार सरिताएँ, समुद्र, पर्वत, देवता, गन्धर्व और दानव-ये कोई भी आपके प्रतिकूल आचरण नहीं कर सकते॥११ १/२॥
येन राजन् हृता सीता तमन्वेषितुमर्हसि॥१२॥
मदः द्वितीयो धनुष्पाणिः सहायैः परमर्षिभिः।
‘राजन्! जिसने सीता का अपहरण किया है, उसी का अन्वेषण करना चाहिये। आप मेरे साथ धनुष हाथ में लेकर बड़े-बड़े ऋषियों की सहायता से उसका पता लगावें॥१२ १/२॥
समुद्रं वा विचेष्यामः पर्वतांश्च वनानि च॥१३॥
गुहाश्च विविधा घोराः पद्मिन्यो विविधास्तथा।
देवगन्धर्वलोकांश्च विचेष्यामः समाहिताः॥१४॥
यावन्नाधिगमिष्यामस्तव भार्यापहारिणम्।
न चेत् साम्ना प्रदास्यन्ति पत्नी ते त्रिदशेश्वराः।
कोसलेन्द्र ततः पश्चात् प्राप्तकालं करिष्यसि॥१५॥
‘हम सब लोग एकाग्रचित्त हो समुद्र में खोजेंगे, पर्वतों और वनों में ढूँढेंगे, नाना प्रकार की भयंकर गुफाओं और भाँति-भाँति के सरोवरों को छान डालेंगे तथा देवताओं और गन्धर्वो के लोकों में भी तलाश करेंगे। जबतक आपकी पत्नी का अपहरण करने वाले दुरात्मा का पता नहीं लगा लेंगे, तब तक हम अपना यह प्रयत्न जारी रखेंगे। कोसलनरेश! यदि हमारे शान्तिपूर्ण बर्ताव से देवेश्वरगण आपकी पत्नी का पता नहीं देंगे तो उस अवसर के अनुरूप कार्य आप कीजियेगा॥१३-१५॥
शीलेन साम्ना विनयेन सीतां नयेन न प्राप्स्यसि चेन्नरेन्द्र।
ततः समुत्सादय हेमपुखैमहेन्द्रवज्रप्रतिमैः शरौघैः॥१६॥
‘नरेन्द्र! यदि अच्छे शील-स्वभाव, सामनीति, विनय और न्याय के अनुसार प्रयत्न करने पर भी आपको सीता का पता न मिले, तब आप सुवर्णमय पंखवाले महेन्द्र के वज्रतुल्य बाणसमूहों से समस्त लोकों का संहार कर डालें’॥१६॥
सर्ग ६६
तं तथा शोकसंतप्तं विलपन्तमनाथवत्।
मोहेन महता युक्तं परिधूनमचेतसम्॥१॥
ततः सौमित्रिराश्वस्य मुहूर्तादिव लक्ष्मणः।
रामं सम्बोधयामास चरणौ चाभिपीडयन्॥२॥
श्रीरामचन्द्रजी शोक से संतप्त हो अनाथ की तरह विलाप करने लगे। वे महान् मोह से युक्त और अत्यन्त दुर्बल हो गये। उनका चित्त स्वस्थ नहीं था। उन्हें इस अवस्था में देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने दो घड़ी तक आश्वासन दिया फिर वे उनका पैर दबाते हुए उन्हें समझाने लगे-॥१-२॥
महता तपसा चापि महता चापि कर्मणा।
राजा दशरथेनासील्लब्धोऽमृतमिवामरैः॥३॥
‘भैया! हमारे पिता महाराज दशरथ ने बड़ी तपस्या और महान् कर्म का अनुष्ठान करके आपको पुत्ररूप में प्राप्त किया, जैसे देवताओं ने महान् प्रयास से अमृत पा लिया था॥३॥
तव चैव गुणैर्बद्धस्त्वद्वियोगान्महीपतिः।
राजा देवत्वमापन्नो भरतस्य यथा श्रुतम्॥४॥
‘आपने भरत के मुँह से जैसा सुना था, उसके अनुसार भूपाल महाराज दशरथ आपके ही गुणों से बँधे हुए थे और आपका ही वियोग होने से देवलोक को प्राप्त हुए॥४॥
यदि दुःखमिदं प्राप्तं काकुत्स्थ न सहिष्यसे।
प्राकृतश्चाल्पसत्त्वश्च इतरः कः सहिष्यति॥५॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण ! यदि अपने ऊपर आये हुए इस दुःख को आप ही धैर्यपूर्वक नहीं सहेंगे तो दूसरा कौन साधारण पुरुष, जिसकी शक्ति बहुत थोड़ी है, सह सकेगा?॥५॥
आश्वसिहि नरश्रेष्ठ प्राणिनः कस्य नापदः।
संस्पृशन्त्यग्निवद् राजन् क्षणेन व्यपयान्ति च॥६॥
‘नरश्रेष्ठ! आप धैर्य धारण करें। संसार में किस प्राणी पर आपत्तियाँ नहीं आतीं। राजन्! आपत्तियाँ अग्नि की भाँति एक क्षण में स्पर्श करतीं और दूसरे ही क्षण में दूर हो जाती हैं॥६॥
दुःखितो हि भवाँल्लोकांस्तेजसा यदि धक्ष्यते।
आर्ताः प्रजा नरव्याघ्र क्व नु यास्यन्ति निर्वृतिम्॥७॥
‘पुरुषसिंह! यदि आप दुःखी होकर अपने तेज से समस्त लोकों को दग्ध कर डालेंगे तो पीड़ित हुई प्रजा किसकी शरण में जाकर सुख और शान्ति पायेगी॥७॥
लोकस्वभाव एवैष ययातिनहषात्मजः।
गतः शक्रेण सालोक्यमनयस्तं समस्पृशत्॥८॥
‘यह लोक का स्वभाव ही है कि यहाँ सब पर दुःख-शोक आता-जाता रहता है। नहुषपुत्र ययाति इन्द्र के समान लोक (देवेन्द्रपद) को प्राप्त हुए थे; किंतु वहाँ भी अन्यायमूलक दुःख उनका स्पर्श किये बिना न रहा॥८॥
महर्षिर्यो वसिष्ठस्तु यः पितुर्नः पुरोहितः।
अह्ना पुत्रशतं जज्ञे तथैवास्य पुनर्हतम्॥९॥
‘हमारे पिता के पुरोहित जो महर्षि वसिष्ठजी हैं, उन्हें एक ही दिन में सौ पुत्र प्राप्त हुए और फिर एक ही दिन वे सब-के-सब विश्वामित्र के हाथ से मारे गये॥९॥
या चेयं जगतो माता सर्वलोकनमस्कृता।
अस्याश्च चलनं भूमेर्दृश्यते कोसलेश्वर॥१०॥
‘कोसलेश्वर! यह जो विश्ववन्दिता जगन्माता पृथ्वी है, इसका भी हिलना-डुलना देखा जाता है॥१०॥
यौ धर्मी जगतो नेत्रौ यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।
आदित्यचन्द्रौ ग्रहणमभ्युपेतौ महाबलौ॥११॥
‘जो धर्म के प्रवर्तक और संसार के नेत्र हैं, जिनके आधार पर ही सारा जगत् टिका हुआ है, वे महाबली सूर्य और चन्द्रमा भी राहु के द्वारा ग्रहण को प्राप्त होते हैं॥११॥
सुमहान्त्यपि भूतानि देवाश्च पुरुषर्षभ।
न दैवस्य प्रमुञ्चन्ति सर्वभूतानि देहिनः॥१२॥
‘पुरुषप्रवर! बड़े-बड़े भूत और देवता भी दैव (प्रारब्ध-कर्म) की अधीनता से मुक्त नहीं हो पाते हैं; फिर समस्त देहधारी प्राणियों के लिये तो कहना ही क्या है॥१२॥
शक्रादिष्वपि देवेषु वर्तमानौ नयानयौ।
श्रूयेते नरशार्दूल न त्वं शोचितुमर्हसि॥१३॥
‘नरश्रेष्ठ! इन्द्र आदि देवताओं को भी नीति और अनीति के कारण सुख और दुःख की प्राप्ति होती सुनी जाती है; इसलिये आपको शोक नहीं करना चाहिये॥१३॥
मृतायामपि वैदेह्यां नष्टायामपि राघव।
शोचितुं नार्हसे वीर यथान्यः प्राकृतस्तथा॥१४॥
‘वीर रघुनन्दन! विदेहराजकुमारी सीता यदि मर जायँ या नष्ट हो जायँ तो भी आपको दूसरे गँवार मनुष्यों की तरह शोक-चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥१४॥
त्वद्विधा नहि शोचन्ति सततं सर्वदर्शनाः।
सुमहत्स्वपि कृच्छ्रेषु रामानिर्विण्णदर्शनाः॥१५॥
‘श्रीराम! आप-जैसे सर्वज्ञ पुरुष बड़ी-से-बड़ी विपत्ति आने पर भी कभी शोक नहीं करते हैं। वे निर्वेद (खेद) रहित हो अपनी विचारशक्ति को नष्ट नहीं होने देते॥१५॥
तत्त्वतो हि नरश्रेष्ठ बुद्ध्या समनुचिन्तय।
बुद्धया युक्ता महाप्राज्ञा विजानन्ति शुभाशुभे॥१६॥
‘नरश्रेष्ठ! आप बुद्धि के द्वारा तात्त्विक विचार कीजिये क्या करना चाहिये और क्या नहीं; क्या उचित है और क्या अनुचित-इसका निश्चय कीजिये; क्योंकि बुद्धियुक्त महाज्ञानी पुरुष ही शुभ और अशुभ (कर्तव्य-अकर्तव्य एवं उचित-अनुचित) को अच्छी तरह जानते हैं॥१६॥
अदृष्टगुणदोषाणामध्रुवाणां तु कर्मणाम्।
नान्तरेण क्रियां तेषां फलमिष्टं च वर्तते॥१७॥
‘जिनके गुण-दोष देखे या जाने नहीं गये हैं तथा जो अध्रुव हैं-फल देकर नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसे कर्मों का शुभाशुभ फल उन्हें आचरण में लाये बिना नहीं प्राप्त होता है॥१७॥
मामेवं हि पुरा वीर त्वमेव बहुशोक्तवान्।
अनुशिष्याद्धि को नु त्वामपि साक्षाद् बृहस्पतिः॥१८॥
‘वीर ! पहले आप ही अनेक बार इस तरह की बातें कहकर मुझे समझा चुके हैं, आपको कौन सिखा सकता है। साक्षात् बृहस्पति भी आपको उपदेश देने की शक्ति नहीं रखते हैं॥१८॥
बुद्धिश्च ते महाप्राज्ञ देवैरपि दुरन्वया।
शोकेनाभिप्रसुप्तं ते ज्ञानं सम्बोधयाम्यहम्॥१९॥
‘महाप्राज्ञ ! देवताओं के लिये भी आपकी बुद्धि का पता पाना कठिन है। इस समय शोक के कारण आपका ज्ञान सोया खोया-सा जान पड़ता है। इसलिये मैं उसे जगा रहा हूँ॥१९॥
दिव्यं च मानुषं चैवमात्मनश्च पराक्रमम्।
इक्ष्वाकुवृषभावेक्ष्य यतस्व द्विषतां वधे॥२०॥
‘इक्ष्वाकुकुलशिरोमणे! अपने देवोचित तथा मानवोचित पराक्रम को देखकर उसका अवसर के अनुरूप उपयोग करते हुए आप शत्रुओं के वध का प्रयत्न कीजिये॥२०॥
किं ते सर्वविनाशेन कृतेन पुरुषर्षभ।
तमेव तु रिपुं पापं विज्ञायोद्धर्तुमर्हसि॥२१॥
‘पुरुषप्रवर! समस्त संसार का विनाश करने से आपको क्या लाभ होगा? उस पापी शत्रु का पता लगाकर उसी को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न करना चाहिये’॥२१॥
सर्ग ६७
पूर्वजोऽप्युक्तमात्रस्तु लक्ष्मणेन सुभाषितम्।
सारग्राही महासारं प्रतिजग्राह राघवः॥१॥
भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सब वस्तुओं का सार ग्रहण करने वाले हैं। अवस्था में बड़े होने पर भी उन्होंने लक्ष्मण के कहे हुए अत्यन्त सारगर्भित उत्तम वचनों को सुनकर उन्हें स्वीकार किया॥१॥
स निगृह्य महाबाहुः प्रवृद्धं रोषमात्मनः।
अवष्टभ्य धनुश्चित्रं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥२॥
तदनन्तर महाबाहु श्रीराम ने अपने बढ़े हुए रोष को रोका और उस विचित्र धनुष को उतारकर लक्ष्मण से कहा-॥२॥
किं करिष्यावहे वत्स क्व वा गच्छाव लक्ष्मण।
केनोपायेन पश्यावः सीतामिह विचिन्तय॥३॥
‘वत्स! अब हमलोग क्या करें? कहाँ जायँ? लक्ष्मण ! किस उपाय से हमें सीता का पता लगे? यहाँ इसका विचार करो’॥३॥
तं तथा परितापार्तं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।
इदमेव जनस्थानं त्वमन्वेषितुमर्हसि॥४॥
तब लक्ष्मण ने इस प्रकार संतापपीड़ित हुए श्रीराम से कहा-’भैया! आपको इस जनस्थान में ही सीता की खोज करनी चाहिये॥४॥
राक्षसैर्बहुभिः कीर्णं नानाद्रुमलतायुतम्।
सन्तीह गिरिदुर्गाणि निर्दराः कन्दराणि च॥५॥
‘नाना प्रकार के वृक्ष और लताओं से युक्त यह सघन वन अनेक राक्षसों से भरा हुआ है। इसमें पर्वत के ऊपर बहुत-से दुर्गम स्थान, फटे हुए पत्थर और कन्दराएँ हैं।॥५॥
गुहाश्च विविधा घोरा नानामृगगणाकुलाः।
आवासाः किंनराणां च गन्धर्वभवनानि च॥६॥
‘वहाँ भाँति-भाँति की भयंकर गुफाएँ हैं, जो नाना प्रकार के मृगगणों से भरी रहती हैं। यहाँ के पर्वतपर किन्नरों के आवास स्थान और गन्धर्वो के भवन भी हैं।
तानि युक्तो मया सार्धं समन्वेषितुमर्हसि।
त्वद्विधा बुद्धिसम्पन्ना महात्मानो नरर्षभाः॥७॥
आपत्सु न प्रकम्पन्ते वायुवेगैरिवाचलाः।
‘मेरे साथ चलकर आप उन सभी स्थानों में एकाग्रचित्त हो सीता की खोज करें। जैसे पर्वत वायु के वेग से कम्पित नहीं होते हैं, उसी प्रकार आप-जैसे बुद्धिमान् महात्मा नरश्रेष्ठ आपत्तियों में विचलित नहीं होते हैं’॥७ १/२॥
इत्युक्तस्तद् वनं सर्वं विचचार सलक्ष्मणः॥८॥
क्रुद्धो रामः शरं घोरं संधाय धनुषि क्षुरम्।
उनके ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी रोषपूर्वक अपने धनुषपर क्षुर नामक भयंकर बाण चढ़ाये वहाँ सारे वन में विचरण करने लगे॥८ १/२॥
ततः पर्वतकूटाभं महाभागं द्विजोत्तमम्॥९॥
ददर्श पतितं भूमौ क्षतजार्दै जटायुषम्।
तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥१०॥
थोड़ी ही दूर आगे जाने पर उन्हें पर्वतशिखर के समान विशाल शरीर वाले पक्षिराज महाभाग जटायु दिखायी पड़े जो खून से लथपथ हो पृथ्वी पर पड़े थे। पर्वत-शिखर के समान प्रतीत होने वाले उन गृध्रराज को देखकर श्रीराम लक्ष्मण से बोले-॥९-१०॥
अनेन सीता वैदेही भक्षिता नात्र संशयः।
गृध्ररूपमिदं व्यक्तं रक्षो भ्रमति काननम्॥११॥
लक्ष्मण! यह गृध्र के रूप में अवश्य ही कोई राक्षस जान पड़ता है, जो इस वन में घूमता रहता है। निःसंदेह इसी ने विदेहराजकुमारी सीता को खा लिया होगा॥११॥
भक्षयित्वा विशालाक्षीमास्ते सीतां यथासुखम्।
एनं वधिष्ये दीप्ताग्रैः शरैोरैरजिह्मगैः॥१२॥
‘विशाललोचना सीता को खाकर यह यहाँ सुखपूर्वक बैठा हुआ है। मैं प्रज्वलित अग्र भाग वाले तथा सीधे जाने वाले अपने भयंकर बाणों से इसका वध करूँगा’॥१२॥
इत्युक्त्वाभ्यपतद् द्रष्टुं संधाय धनुषि क्षुरम्।
क्रुद्धो रामः समुद्रान्तां चालयन्निव मेदिनीम्॥१३॥
ऐसा कहकर क्रोध में भरे हुए श्रीराम धनुष पर बाण चढ़ाये समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को कम्पित करते हुए उसे देखने के लिये आगे बढ़े॥१३॥
तं दीनदीनया वाचा सफेनं रुधिरं वमन्।
अभ्यभाषत पक्षी स रामं दशरथात्मजम्॥१४॥
इसी समय पक्षी जटायु अपने मुँह से फेनयुक्त रक्त वमन करते हुए अत्यन्त दीन-वाणी में दशरथनन्दन श्रीराम से बोले-॥१४॥
यामोषधीमिवायुष्मन्नन्वेषसि महावने।
सा देवी मम च प्राणा रावणेनोभयं हृतम्॥१५॥
‘आयुष्मन् ! इस महान् वन में तुम जिसे ओषधि के समान ढूँढ़ रहे हो, उस देवी सीता को तथा मेरे इन प्राणों को भी रावण ने हर लिया॥१५॥
त्वया विरहिता देवी लक्ष्मणेन च राघव।
ह्रियमाणा मया दृष्टा रावणेन बलीयसा॥१६॥
‘रघुनन्दन! तुम्हारे और लक्ष्मण के न रहने पर महाबली रावण आया और देवी सीता को हरकर ले जाने लगा। उस समय मेरी दृष्टि सीता पर पड़ी॥१६॥
सीतामभ्यवपन्नोऽहं रावणश्च रणे प्रभो।
विध्वंसितरथच्छत्रः पतितो धरणीतले॥१७॥
‘प्रभो! ज्यों ही मेरी दृष्टि पड़ी, मैं सीता की सहायता के लिये दौड़ पड़ा। रावण के साथ मेरा युद्ध हुआ। मैंने उस युद्ध में रावण के रथ और छत्र आदि सभी साधन नष्ट कर दिये और वह भी घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा॥१७॥
एतदस्य धनुर्भग्नमेते चास्य शरास्तथा।
अयमस्य रणे राम भग्नः सांग्रामिको रथः॥१८॥
‘श्रीराम! यह रहा उसका टूटा हुआ धनुष, ये हैं उसके खण्डित हुए बाण और यह है उसका युद्धोपयोगी रथ, जो युद्ध में मेरे द्वारा तोड़ डाला गया है।॥१८॥
अयं तु सारथिस्तस्य मत्पक्षनिहतो भुवि।
परिश्रान्तस्य मे पक्षौ छित्त्वा खड्गेन रावणः॥१९॥
सीतामादाय वैदेहीमुत्पपात विहायसम्।
रक्षसा निहतं पूर्वं मां न हन्तुं त्वमर्हसि॥२०॥
‘यह रावण का सारथि है, जिसे मैंने अपने पंखों से मार डाला था। जब मैं युद्ध करते-करते थक गया, तब रावण ने तलवार से मेरे दोनों पंख काट डाले और वह विदेहकुमारी सीता को लेकर आकाश में उड़ गया। मैं उस राक्षस के हाथ से पहले ही मार डाला गया हूँ, अब तुम मुझे न मारो’॥१९-२०॥
रामस्तस्य तु विज्ञाय सीतासक्तां प्रियां कथाम्।
गृध्रराजं परिष्वज्य परित्यज्य महद् धनुः॥२१॥
निपपातावशो भूमौ रुरोद सहलक्ष्मणः।
द्विगुणीकृततापा रामो धीरतरोऽपि सन्॥२२॥
सीता से सम्बन्ध रखने वाली यह प्रिय वार्ता सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने अपना महान् धनुष फेंक दिया और गृध्रराज जटायु को गले से लगाकर वे शोक से विवश हो पृथ्वी पर गिर पड़े और लक्ष्मण के साथ ही रोने लगे। अत्यन्त धीर होने पर भी श्रीराम ने उस समय दूने दुःख का अनुभव किया॥२१-२२॥
एकमेकायने कृच्छ्रे निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः।
समीक्ष्य दुःखितो रामः सौमित्रिमिदमब्रवीत्॥२३॥
असहाय हो एकमात्र ऊर्ध्वश्वास की संकटपूर्ण अवस्था में पड़कर बारंबार लंबी साँस खींचते हुए जटायु की ओर देखकर श्रीराम को बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने सुमित्राकुमार से कहा-॥२३॥
राज्यं भ्रष्टं वने वासः सीता नष्टा मृतो द्विजः।
ईदृशीयं ममालक्ष्मीदहेदपि हि पावकम्॥२४॥
‘लक्ष्मण! मेरा राज्य छिन गया, मुझे वनवास मिला (पिताजी की मृत्यु हुई), सीता का अपहरण हुआ और ये मेरे परम सहायक पक्षिराज भी मर गये। ऐसा जो मेरा यह दुर्भाग्य है, यह तो अग्नि को भी जलाकर भस्म कर सकता है॥२४॥
सम्पूर्णमपि चेदद्य प्रतरेयं महोदधिम्।
सोऽपि नूनं ममालक्ष्म्या विशुष्येत् सरितां पतिः॥२५॥
‘यदि आज मैं भरे हुए महासागर को तैरने लगूं तो मेरे दुर्भाग्य की आँच से वह सरिताओं का स्वामी समुद्र भी निश्चय ही सूख जायगा॥२५॥
नास्त्यभाग्यतरो लोके मत्तोऽस्मिन् स चराचरे।
येनेयं महती प्राप्ता मया व्यसनवागुरा॥२६॥
‘इस चराचर जगत् में मुझसे बढ़कर भाग्यहीन दूसरा कोई नहीं है, जिस अभाग्य के कारण मुझे इस विपत्ति के बड़े भारी जाल में फँसना पड़ा है॥२६॥
अयं पितुर्वयस्यो मे गृध्रराजो महाबलः।
शेते विनिहतो भूमौ मम भाग्यविपर्ययात्॥२७॥
‘ये महाबली गृध्रराज जटायु मेरे पिताजी के मित्र थे, किंतु आज मेरे दुर्भाग्यवश मारे जाकर इस समय पृथ्वी पर पड़े हैं’॥२७॥
इत्येवमुक्त्वा बहुशो राघवः सहलक्ष्मणः।
जटायुषं च पस्पर्श पितृस्नेहं निदर्शयन्॥२८॥
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी ने जटायु के शरीर पर हाथ फेरा और पिता के प्रति जैसा स्नेह होना चाहिये, वैसा ही उनके प्रति प्रदर्शित किया॥२८॥
निकृत्तपक्षं रुधिरावसिक्तं तं गृध्रराजं परिगृह्य राघवः।
क्व मैथिली प्राणसमा गतेति विमुच्य वाचं निपपात भूमौ॥२९॥
पङ्ख कट जाने के कारण गृध्रराज जटायु लहू-लुहान हो रहे थे। उसी अवस्था में उन्हें गले से लगाकर श्रीरघुनाथजी ने पूछा-’तात! मेरी प्राणों के समान प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता कहाँ चली गयी?’ इतनी ही बात मुँह से निकालकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े॥२९॥
सर्ग ६८
रामः प्रेक्ष्य तु तं गृधं भुवि रौद्रेण पातितम्।
सौमित्रिं मित्रसम्पन्नमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥
भयंकर राक्षस रावण ने जिसे पृथ्वी पर मार गिराया था, उस गृध्रराज जटायु की ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीराम मित्रोचित गुण से सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण से बोले-॥१॥
ममायं नूनमर्थेषु यतमानो विहंगमः।
राक्षसेन हतः संख्ये प्राणांस्त्यजति मत्कृते॥२॥
‘भाई! यह पक्षी अवश्य मेरा ही कार्य सिद्ध करने के लिये प्रयत्नशील था, किंतु उस राक्षस के द्वारा युद्ध में मारा गया। यह मेरे ही लिये अपने प्राणों का परित्याग कर रहा है॥२॥
अतिखिन्नः शरीरेऽस्मिन् प्राणो लक्ष्मण विद्यते।
तथा स्वरविहीनोऽयं विक्लवं समुदीक्षते॥३॥
‘लक्ष्मण! इस शरीर के भीतर इसके प्राणों को बड़ी वेदना हो रही है, इसीलिये इसकी आवाज बंद होती जा रही है तथा यह अत्यन्त व्याकुल होकर देख रहा है॥३॥
जटायो यदि शक्नोषि वाक्यं व्याहरितुं पुनः।
सीतामाख्याहि भद्रं ते वधमाख्याहि चात्मनः॥४॥
(लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्रीराम उस पक्षी से बोले -) ‘जटायो! यदि आप पुनः बोल सकते हों तो आपका भला हो, बताइये, सीता की क्या अवस्था है ? और आपका वध किस प्रकार हुआ?॥४॥
किंनिमित्तो जहारार्यां रावणस्तस्य किं मया।
अपराधं तु यं दृष्ट्वा रावणेन हृता प्रिया॥५॥
‘जिस अपराध को देखकर रावण ने मेरी प्रिय भार्या का अपहरण किया है, वह अपराध क्या है? और मैंने उसे कब किया? किस निमित्त को लेकर रावण ने आर्या सीता का हरण किया है ?॥५॥
कथं तच्चन्द्रसंकाशं मुखमासीन्मनोहरम्।
सीतया कानि चोक्तानि तस्मिन् काले द्विजोत्तम॥६॥
‘पक्षिप्रवर! सीता का चन्द्रमा के समान मनोहर मुख कैसा हो गया था? तथा उस समय सीता ने क्या-क्या बातें कही थीं?॥६॥
कथंवीर्यः कथंरूपः किंकर्मा स च राक्षसः।
क्व चास्य भवनं तात ब्रूहि मे परिपृच्छतः॥७॥
‘तात! उस राक्षस का बल-पराक्रम तथा रूप कैसा है? वह क्या काम करता है? और उसका घर कहाँ है? मैं जो कुछ पूछ रहा हूँ, वह सब बताइये’॥७॥
तमुद्रीक्ष्य स धर्मात्मा विलपन्तमनाथवत्।
वाचा विक्लवया राममिदं वचनमब्रवीत्॥८॥
इस तरह अनाथ की भाँति विलाप करते हुए श्रीराम की ओर देखकर धर्मात्मा जटायु ने लड़खड़ाती जबान से यों कहना आरम्भ किया-॥८॥
सा हृता राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना।
मायामास्थाय विपुलां वातदुर्दिनसंकुलाम्॥९॥
‘रघुनन्दन! दुरात्मा राक्षसराज रावण ने विपुल माया का आश्रय ले आँधी-पानी की सृष्टि करके (घबराहट की अवस्था में) सीता का हरण किया था॥९॥
परिक्लान्तस्य मे तात पक्षौ छित्त्वा निशाचरः।
सीतामादाय वैदेही प्रयातो दक्षिणामुखः॥१०॥
‘तात ! जब मैं उससे लड़ता-लड़ता थक गया, उस अवस्था में मेरे दोनों पंख काटकर वह निशाचर विदेहनन्दिनी सीता को साथ लिये यहाँ से दक्षिण दिशा की ओर गया था॥१०॥
उपरुध्यन्ति मे प्राणा दृष्टिभ्रमति राघव।
पश्यामि वृक्षान् सौवर्णानुशीरकृतमूर्धजान्॥११॥
‘रघुनन्दन! अब मेरे प्राणों की गति बंद हो रही है, दृष्टि घूम रही है और समस्त वृक्ष मुझे सुनहरे रंग के दिखायी देते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि उन वृक्षों पर खश के केश जमे हुए हैं॥११॥
येन याति मुहूर्तेन सीतामादाय रावणः।
विप्रणष्टं धनं क्षिप्रं तत्स्वामी प्रतिपद्यते॥१२॥
विन्दो नाम मुहूर्तोऽसौ न च काकुत्स्थ सोऽबुधत्
त्वत्प्रियां जानकी हृत्वा रावणो राक्षसेश्वरः।
झषवद बडिशं गृह्य क्षिप्रमेव विनश्यति॥१३॥
‘रावण सीता को जिस मुहूर्त में ले गया है, उसमें खोया हुआ धन शीघ्र ही उसके स्वामी को मिल जाता है। काकुत्स्थ! वह ‘विन्द’ नामक मुहूर्त था, किंतु उस राक्षस को इसका पता नहीं था। जैसे मछली मौत के लिये ही बंसी पकड़ लेती है, उसी प्रकार वह भी सीता को ले जाकर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा॥१२-१३॥
न च त्वया व्यथा कार्या जनकस्य सुतां प्रति।
वैदेह्या रंस्यसे क्षिप्रं हत्वा तं रणमूर्धनि॥१४॥
‘अतः अब तुम जनकनन्दिनी के लिये अपने मन में खेद न करो। संग्राम के मुहाने पर उस निशाचर का वध करके तुम शीघ्र ही पुनः विदेहराजकुमारी के साथ विहार करोगे’॥१४॥
असम्मूढस्य गृध्रस्य रामं प्रत्यनुभाषतः।
आस्यात् सुस्राव रुधिरं म्रियमाणस्य सामिषम्॥
गृध्रराज जटायु यद्यपि मर रहे थे तो भी उनके मन पर मोह या भ्रम नहीं छाया था (उनके होशहवास ठीक थे)। वे श्रीरामचन्द्रजी को उनकी बात का उत्तर दे ही रहे थे कि उनके मुख से मांसयुक्त रुधिर निकलने लगा॥१५॥
पुत्रो विश्रवसः साक्षाद् भ्राता वैश्रवणस्य च।
इत्युक्त्वा दुर्लभान् प्राणान् मुमोच पतगेश्वरः॥१६॥
वे बोले-’रावण विश्रवा का पुत्र और कुबेर का सगा भाई है’ इतना कहकर उन पक्षिराज ने दुर्लभ प्राणों का परित्याग कर दिया॥१६॥
ब्रूहि ब्रूहीति रामस्य ब्रुवाणस्य कृताञ्जलेः।
त्यक्त्वा शरीरं गृध्रस्य प्राणा जग्मुर्विहायसम्॥१७॥
श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़े कह रहे थे, ‘कहिये, कहिये, कुछ और कहिये!’ किंतु उस समय गृध्रराज के प्राण उनका शरीर छोड़कर आकाश में चले गये॥१७॥
स निक्षिप्य शिरो भूमौ प्रसार्य चरणौ तथा।
विक्षिप्य च शरीरं स्वं पपात धरणीतले॥१८॥
उन्होंने अपना मस्तक भूमि पर डाल दिया, दोनों पैर फैला दिये और अपने शरीर को भी पृथ्वी पर ही डालते हुए वे धराशायी हो गये॥१८॥
तं गृधं प्रेक्ष्य ताम्राक्षं गतासुमचलोपमम्।
रामः सुबहुभिर्दुःखैर्दीनः सौमित्रिमब्रवीत्॥१९॥
गृध्रराज जटायु की आँखें लाल दिखायी देती थीं। प्राण निकल जाने से वे पर्वत के समान अविचल हो गये। उन्हें इस अवस्था में देखकर बहुत-से दुःखों से दुःखी हुए श्रीरामचन्द्रजी ने सुमित्राकुमार से कहा-॥१९॥
बहनि रक्षसां वासे वर्षाणि वसता सुखम्।
अनेन दण्डकारण्ये विशीर्णमिह पक्षिणा॥२०॥
‘लक्ष्मण! राक्षसों के निवास स्थान इस दण्डकारण्य में बहुत वर्षों तक सुखपूर्वक रहकर इन पक्षिराज ने यहीं अपने शरीर का त्याग किया है॥२०॥
अनेकवार्षिको यस्तु चिरकालसमुत्थितः।
सोऽयमद्य हतः शेते कालो हि दुरतिक्रमः॥२१॥
‘इनकी अवस्था बहुत वर्षों की थी। इन्होंने सुदीर्घ काल तक अपना अभ्युदय देखा है; किंतु आज इस वृद्धावस्था में उस राक्षस के द्वारा मारे जाकर ये पृथ्वी पर सो रहे हैं; क्योंकि काल का उल्लङ्घन करना सबके ही लिये कठिन है॥२१॥
पश्य लक्ष्मण गृध्रोऽयमुपकारी हतश्च मे।
सीतामभ्यवपन्नो हि रावणेन बलीयसा॥२२॥
‘लक्ष्मण! देखो, ये जटायु मेरे बड़े उपकारी थे, किंतु आज मारे गये। सीता की रक्षा के लिये युद्ध में प्रवृत्त होने पर अत्यन्त बलवान् रावण के हाथ से इनका वध हुआ है॥२२॥
गृध्रराज्यं परित्यज्य पितृपैतामहं महत्।
मम हेतोरयं प्राणान् मुमोच पतगेश्वरः॥२३॥
“बाप-दादों के द्वारा प्राप्त हुए गीधों के विशाल राज्य का त्याग करके इन पक्षिराज ने मेरे ही लिये अपने प्राणों की आहुति दी है॥२३॥
सर्वत्र खलु दृश्यन्ते साधवो धर्मचारिणः।
शूराः शरण्याः सौमित्रे तिर्यग्योनिगतेष्वपि॥२४॥
‘शूर, शरणागतरक्षक, धर्मपरायण श्रेष्ठ पुरुष सभी जगह देखे जाते हैं। पशु-पक्षी की योनियों में भी उनका अभाव नहीं है॥२४॥
सीताहरणजं दुःखं न मे सौम्य तथागतम्।
यथा विनाशो गृध्रस्य मत्कृते च परंतप॥२५॥
‘सौम्य! शत्रुओं को संताप देने वाले लक्ष्मण! इस समय मुझे सीता के हरण का उतना दुःख नहीं है, जितना कि मेरे लिये प्राणत्याग करने वाले जटायु की मृत्यु से हो रहा है॥२५॥
राजा दशरथः श्रीमान् यथा मम महायशाः।
पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वरः॥२६॥
‘महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथ जैसे मेरे माननीय और पूज्य थे, वैसे ही ये पक्षिराज जटायु भी हैं।॥२६॥
सौमित्रे हर काष्ठानि निर्मथिष्यामि पावकम्।
गृध्रराजं दिधक्ष्यामि मत्कृते निधनं गतम्॥२७॥
‘सुमित्रानन्दन! तुम सूखे काष्ठ ले आओ, मैं मथकर आग निकालूँगा और मेरे लिये मृत्यु को प्राप्त हुए इन गृध्रराज का दाह-संस्कार करूँगा॥२७॥
नाथं पतगलोकस्य चितिमारोपयाम्यहम्।
इमं धक्ष्यामि सौमित्रे हतं रौद्रेण रक्षसा॥२८॥
‘सुमित्राकुमार! उस भयंकर राक्षस के द्वारा मारे गये इन पक्षिराज को मैं चिता पर चढ़ाऊँगा और इनका दाह-संस्कार करूँगा’॥२८॥
या गतिर्यज्ञशीलानामाहिताग्नेश्च या गतिः।
अपरावर्तिनां या च या च भूमिप्रदायिनाम्॥२९॥
मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान्।
गृध्रराज महासत्त्व संस्कृतश्च मया व्रज॥३०॥
(फिर वे जटायु को सम्बोधित करके बोले-) ‘महान् बलशाली गृध्रराज! यज्ञ करने वाले, अग्निहोत्री, युद्ध में पीठ न दिखाने वाले और भूमिदान करने वाले पुरुषों को जिस गति की-जिन उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है, मेरी आज्ञा से उन्हीं सर्वोत्तम लोकों में तुम भी जाओ। मेरे द्वारा दाह-संस्कार किये जाने पर तुम्हारी सद्गति हो’॥२९-३०॥
एवमुक्त्वा चितां दीप्तामारोप्य पतगेश्वरम्।
ददाह रामो धर्मात्मा स्वबन्धुमिव दुःखितः॥३१॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने दुःखित हो पक्षिराज के शरीर को चिता पर रखा और उसमें आग लगाकर अपने बन्धु की भाँति उनका दाह-संस्कार किया॥३१॥
रामोऽथ सहसौमित्रिर्वनं गत्वा स वीर्यवान्।
स्थूलान् हत्वा महारोहीननुतस्तार तं द्विजम्॥३२॥
रोहिमांसानि चोद्धृत्य पेशीकृत्वा महायशाः।
शकुनाय ददौ रामो रम्ये हरितशादले॥३३॥
तदनन्तर लक्ष्मणसहित पराक्रमी श्रीराम वन में जाकर मोटे-मोटे महारोही (कन्दमूल विशेष) काट लाये और उन्हें जटायु के लिये अर्पित करने के उद्देश्य से उन्होंने पृथ्वी पर कुश बिछाये। महायशस्वी श्रीराम ने रोही के गूदे निकालकर उनका पिण्ड बनाया और उन सुन्दर हरित कुशाओं पर जटायु को पिण्डदान किया॥३२-३३॥
यत् तत् प्रेतस्य मर्त्यस्य कथयन्ति द्विजातयः।
तत् स्वर्गगमनं पित्र्यं तस्य रामो जजाप ह॥३४॥
ब्राह्मणलोग परलोकवासी मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति कराने के उद्देश्यसे जिन पितृसम्बन्धी मन्त्रों का जप आवश्यक बतलाते हैं, उन सबका भगवान् श्रीराम ने जप किया॥३४॥
ततो गोदावरी गत्वा नदी नरवरात्मजौ।
उदकं चक्रतुस्तस्मै गृध्रराजाय तावुभौ॥३५॥
तदनन्तर उन दोनों राजकुमारों ने गोदावरी नदी के तट पर जाकर उन गृध्रराज के लिये जलाञ्जलि दी॥३५॥
शास्त्रदृष्टेन विधिना जलं गृध्राय राघवौ।
स्नात्वा तौ गृध्रराजाय उदकं चक्रतुस्तदा॥३६॥
रघुकुल के उन दोनों महापुरुषों ने गोदावरी में नहाकर शास्त्रीय विधि से उन गृध्रराज के लिये उस समय जलाञ्जलि का दान किया॥३६॥
स गृध्रराजः कृतवान् यशस्करं सुदुष्करं कर्म रणे निपातितः।
महर्षिकल्पेन च संस्कृतस्तदा जगाम पुण्यां गतिमात्मनः शुभाम्॥३७॥
महर्षितुल्य श्रीराम के द्वारा दाहसंस्कार होने के कारण गृध्रराज जटायु को आत्मा का कल्याण करने वाली परम पवित्र गति प्राप्त हुई। उन्होंने रणभूमि में अत्यन्त दुष्कर और यशोवर्धक पराक्रम प्रकट किया था। परंतु अन्त में रावण ने उन्हें मार गिराया॥३७॥
कृतोदकौ तावपि पक्षिसत्तमे स्थिरां च बुद्धिं प्रणिधाय जग्मतुः।
प्रवेश्य सीताधिगमे ततो मनो वनं सुरेन्द्राविव विष्णुवासवौ॥३८॥
तर्पण करने के पश्चात् वे दोनों भाई पक्षिराज जटायु में पितृतुल्य सुस्थिरभाव रखकर सीता की खोज के कार्य में मन लगा देवेश्वर विष्णु और इन्द्र की भाँति वन में आगे बढ़े॥३८॥
सर्ग ६९
कृत्वैवमुदकं तस्मै प्रस्थितौ राघवौ तदा।
अवेक्षन्तौ वने सीतां जग्मतुः पश्चिमां दिशम्॥१॥
इस प्रकार जटायु के लिये जलाञ्जलि दान करके वे दोनों रघुवंशी बन्धु उस समय वहाँ से प्रस्थित हुए और वन में सीता की खोज करते हुए पश्चिम दिशा (नैर्ऋत्य कोण) की ओर गये॥१॥
तां दिशं दक्षिणां गत्वा शरचापासिधारिणौ।
अविप्रहतमैक्ष्वाकौ पन्थानं प्रतिपेदतुः॥२॥
धनुष, बाण और खड्ग धारण किये वे दोनों इक्ष्वाकुवंशी वीर उस दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर आगे बढ़ते हुए एक ऐसे मार्ग पर जा पहुँचे, जिसपर लोगों का आना-जाना नहीं होता था॥२॥
गुल्मैर्वृक्षैश्च बहुभिर्लताभिश्च प्रवेष्टितम्।
आवृतं सर्वतो दुर्गं गहनं घोरदर्शनम्॥३॥
वह मार्ग बहुत-से वृक्षों, झाड़ियों और लता बेलों द्वारा सब ओर से घिरा हुआ था। वह बहुत ही दुर्गम, गहन और देखने में भयंकर था॥३॥
व्यतिक्रम्य तु वेगेन गृहीत्वा दक्षिणां दिशम्।
सुभीमं तन्महारण्यं व्यतियातौ महाबलौ॥४॥
उसे वेगपूर्वक लाँघकर वे दोनों महाबली राजकुमार दक्षिण दिशा का आश्रय ले उस अत्यन्त भयानक और विशाल वन से आगे निकल गये॥४॥
ततः परं जनस्थानात् त्रिकोशं गम्य राघवौ।
क्रौञ्चारण्यं विविशतुर्गहनं तौ महौजसौ॥५॥
तदनन्तर जनस्थान से तीन कोस दूर जाकर वे महाबली श्रीराम और लक्ष्मण क्रौञ्चारण्य नाम से प्रसिद्ध गहन वन के भीतर गये॥५॥
नानामेघघनप्रख्यं प्रहृष्टमिव सर्वतः।
नानावणैः शुभैः पुष्पैगपक्षिगणैर्युतम्॥६॥
वह वन अनेक मेघों के समूह की भाँति श्याम प्रतीत होता था। विविध रंग के सुन्दर फूलों से सुशोभित होने के कारण वह सब ओर से हर्षोत्फुल्ल-सा जान पड़ता था। उसके भीतर बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते थे॥६॥
दिदृक्षमाणौ वैदेहीं तद् वनं तौ विचिक्यतुः।
तत्र तत्रावतिष्ठन्तौ सीताहरणदुःखितौ॥७॥
सीता का पता लगाने की इच्छा से वे दोनों उस वन में उनकी खोज करने लगे। जहाँ-तहाँ थक जाने पर वे विश्राम के लिये ठहर जाते थे। विदेहनन्दिनी के अपहरण से उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था।॥७॥
ततः पूर्वेण तो गत्वा त्रिक्रोशं भ्रातरौ तदा।
क्रौञ्चारण्यमतिक्रम्य मतङ्गाश्रममन्तरे॥८॥
तत्पश्चात् वे दोनों भाई तीन कोस पूर्व जाकर क्रौञ्चारण्य को पार करके मतङ्ग मुनि के आश्रम के पास गये॥८॥
दृष्ट्वा तु तद् वनं घोरं बहुभीममृगद्विजम्।
नानावृक्षसमाकीर्णं सर्वं गहनपादपम्॥९॥
वह वन बड़ा भयंकर था। उसमें बहुत-से भयानक पशु और पक्षी निवास करते थे। अनेक प्रकार के वृक्षों से व्याप्त वह सारा वन गहन वृक्षावलियों से भरा था॥९॥
ददृशाते गिरौ तत्र दरी दशरथात्मजौ।
पातालसमगम्भीरां तमसा नित्यसंवृताम्॥१०॥
वहाँ पहुँचकर उन दशरथराजकुमारों ने वहाँ के पर्वत पर एक गुफा देखी, जो पाताल के समान गहरी थी। वह सदा अन्धकार से आवृत रहती थी॥१०॥
आसाद्य च नरव्याघ्रौ दर्यास्तस्याविदूरतः।
ददर्शतुर्महारूपां राक्षसी विकृताननाम्॥११॥
उसके समीप जाकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों ने एक विशालकाय राक्षसी देखी, जिसका मुख बड़ा विकराल था॥११॥
भयदामल्पसत्त्वानां बीभत्सां रौद्रदर्शनाम्।
लम्बोदरी तीक्ष्णदंष्ट्रां कराली परुषत्वचम्॥१२॥
वह छोटे-छोटे जन्तुओं को भय देने वाली तथा देखने में बड़ी भयंकर थी। उसकी सूरत देखकर घृणा होती थी। उसके लंबे पेट, तीखी दाढ़ें और कठोर त्वचा थी। वह बड़ी विकराल दिखायी देती थी॥१२॥
भक्षयन्तीं मृगान् भीमान् विकटां मुक्तमूर्धजाम्।
अवैक्षतां तु तौ तत्र भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥१३॥
भयानक पशुओं को भी पकड़कर खा जाती थी। उसका आकार विकट था और बाल खुले हुए थे। उस कन्दरा के समीप दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण ने उसे देखा॥१३॥
सा समासाद्य तौ वीरौ व्रजन्तं भ्रातुरग्रतः।
एहि रस्यावहेत्युक्त्वा समालम्भत लक्ष्मणम्॥१४॥
वह राक्षसी उन दोनों वीरों के पास आयी और अपने भाई के आगे-आगे चलते हुए लक्ष्मण की ओर देखकर बोली-’आओ हम दोनों रमण करें।’ ऐसा कहकर उसने लक्ष्मण का हाथ पकड़ लिया॥१४॥
उवाच चैनं वचनं सौमित्रिमुपगुह्य च।
अहं त्वयोमुखी नाम लाभस्ते त्वमसि प्रियः॥१५॥
इतना ही नहीं, उसने सुमित्राकुमार को अपनी भुजाओं में कस लिया और इस प्रकार कहा-’मेरा नाम अयोमुखी है। मैं तुम्हें भार्यारूप से मिल गयी तो समझ लो, बहुत बड़ा लाभ हुआ और तुम मेरे प्यारे पति हो’॥१५॥
नाथ पर्वतदुर्गेषु नदीनां पुलिनेषु च।
आयुश्चिरमिदं वीर त्वं मया सह रंस्यसे॥१६॥
‘प्राणनाथ! वीर! यह दीर्घकाल तक स्थिर रहने वाली आयु पाकर तुम पर्वत की दुर्गम कन्दराओं में तथा नदियों के तटों पर मेरे साथ सदा रमण करोगे’॥१६॥
एवमुक्तस्तु कुपितः खड्गमुद्धृत्य लक्ष्मणः।
कर्णनासस्तनं तस्या निचकर्तारिसूदनः॥१७॥
राक्षसी के ऐसा कहने पर शत्रुसूदन लक्ष्मण क्रोध से जल उठे। उन्होंने तलवार निकालकर उसके कान, नाक और स्तन काट डाले॥१७॥
कर्णनासे निकृत्ते तु विस्वरं विननाद सा।
यथागतं प्रदुद्राव राक्षसी घोरदर्शना॥१८॥
नाक और कान के कट जानेपर वह भयंकर राक्षसी जोर-जोरसे चिल्लाने लगी और जहाँ से आयी थी, उधर ही भाग गयी॥१८॥
तस्यां गतायां गहनं व्रजन्तौ वनमोजसा।
आसेदतरमित्रघ्नौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥१९॥
उसके चले जाने पर वे दोनों भाई शक्तिशाली श्रीराम और लक्ष्मण बड़े वेग से चलकर एक गहन वन में जा पहुँचे॥१९॥
लक्ष्मणस्तु महातेजाः सत्त्ववाञ्छीलवाञ्छुचिः।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं भ्रातरं दीप्ततेजसम्॥२०॥
उस समय महातेजस्वी, धैर्यवान् , सुशील एवं पवित्र आचार-विचार वाले लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर अपने तेजस्वी भ्राता श्रीरामचन्द्रजी से कहा-॥२०॥
स्पन्दते मे दृढं बाहुरुद्भिग्नमिव मे मनः।
प्रायशश्चाप्यनिष्टानि निमित्तान्युपलक्षये॥२१॥
तस्मात् सज्जीभवार्य त्वं कुरुष्व वचनं मम।
ममैव हि निमित्तानि सद्यः शंसन्ति सम्भ्रमम्॥२२॥
‘आर्य! मेरी बायीं बाँह जोर-जोर से फड़क रही है और मन उद्विग्न-सा हो रहा है। मुझे बार-बार बुरे शकुन दिखायी देते हैं, इसलिये आप भय का सामना करने के लिये तैयार हो जाइये। मेरी बात मानिये ये जो बुरे शकुन हैं, वे केवल मुझे ही तत्काल प्राप्त होने वाले भय की सूचना देते हैं॥२१-२२॥
एष वञ्जुलको नाम पक्षी परमदारुणः।
आवयोर्विजयं यद्धे शंसन्निव विनर्दति॥२३॥
(इसके साथ एक शुभ शकुन भी हो रहा है) यह जो वञ्जुल नामक अत्यन्त दारुण पक्षी है, यह युद्ध में हम दोनों की विजय सूचित करता हुआ-सा जोर जोर से बोल रहा है’॥२३॥
तयोरन्वेषतोरेवं सर्वं तद् वनमोजसा।
संजज्ञे विपुलः शब्दः प्रभञ्जन्निव तद वनम्॥२४॥
इस प्रकार बलपूर्वक उस सारे वन में वे दोनों भाई जब सीता की खोज कर रहे थे, उसी समय वहाँ बड़े जोर का शब्द हुआ, जो उस वन का विध्वंस करता हुआ-सा प्रतीत होता था॥२४॥
संवेष्टितमिवात्यर्थं गहनं मातरिश्वना।
वनस्य तस्य शब्दोऽभूद् वनमापूरयन्निव॥२५॥
उस वन में जोर-जोर से आँधी चलने लगी। वह सारा वन उसकी लपेट में आ गया। वन में उस शब्द की जो प्रतिध्वनि उठी, उससे वह सारा वनप्रान्त गूंज उठा॥२५॥
तं शब्दं कांक्षमाणस्तु रामः खड्गी सहानुजः।
ददर्श सुमहाकायं राक्षसं विपुलोरसम्॥२६॥
भाई के साथ तलवार हाथ में लिये भगवान् श्रीराम उस शब्द का पता लगाना ही चाहते थे कि एक चौड़ी छाती वाले विशालकाय राक्षस पर उनकी दृष्टि पड़ी॥२६॥
आसेदतुश्च तद्रक्षस्तावुभौ प्रमुखे स्थितम्।
विवृद्धमशिरोग्रीवं कबन्धमुदरेमुखम्॥२७॥
उन दोनों भाइयों ने उस राक्षस को अपने सामने खड़ा पाया। वह देखने में बहुत बड़ा था; किंतु उसके न मस्तक था न गला। कबन्ध (धड़मात्र) ही उसका स्वरूप था और उसके पेट में ही मुँह बना हुआ था॥२७॥
रोमभिर्निशितैस्तीक्ष्णैर्महागिरिमिवोच्छ्रितम्।
नीलमेघनिभं रौद्रं मेघस्तनितनिःस्वनम्॥२८॥
उसके सारे शरीर में पैने और तीखे रोयें थे। वह महान् पर्वत के समान ऊँचा था। उसकी आकृति बड़ी भयंकर थी। वह नील मेघ के समान काला था और मेघ के समान ही गम्भीर स्वर में गर्जना करता था॥२८॥
अग्निज्वालानिकाशेन ललाटस्थेन दीप्यता।
महापक्षेण पिङ्गेन विपुलेनायतेन च॥२९॥
एकेनोरसि घोरेण नयनेन सुदर्शिना।
महादंष्ट्रोपपन्नं तं लेलिहानं महामुखम्॥३०॥
उसकी छाती में ही ललाट था और ललाट में एक ही लंबी-चौड़ी तथा आग की ज्वाला के समान दहकती हुई भयंकर आँख थी, जो अच्छी तरह देख सकती थी। उसकी पलक बहुत बड़ी थी और वह आँख भूरे रंग की थी। उस राक्षस की दाढ़ें बहुत बड़ी थीं तथा वह अपनी लपलपाती हुई जीभ से अपने विशाल मुख को बारंबार चाट रहा था॥२९-३०॥
भक्षयन्तं महाघोरानृक्षसिंहमृगद्विजान्।
घोरौ भुजौ विकुर्वाणमुभौ योजनमायतौ॥३१॥
कराभ्यां विविधान् गृह्य ऋक्षान् पक्षिगणान् मृगान्।
आकर्षन्तं विकर्षन्तमनेकान् मृगयूथपान्॥३२॥
अत्यन्त भयंकर रीछ, सिंह, हिंसक पशु और पक्षी -ये ही उसके भोजन थे। वह अपनी एक-एक योजन लंबी दोनों भयानक भुजाओं को दूर तक फैला देता और उन दोनों हाथों से नाना प्रकार के अनेकों भालू, पक्षी, पशु तथा मृगों के यूथपतियों को पकड़कर खींच लेता था। उनमें से जो उसे भोजन के लिये अभीष्ट नहीं होते, उन जन्तुओं को वह उन्हीं हाथों से पीछे ढकेल देता था॥३१-३२॥
स्थितमावृत्य पन्थानं तयोर्धात्रोः प्रपन्नयोः।
अथ तं समतिक्रम्य क्रोशमात्रं ददर्शतुः॥३३॥
महान्तं दारुणं भीमं कबन्धं भुजसंवृतम्।
कबन्धमिव संस्थानादतिघोरप्रदर्शनम्॥३४॥
दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब उसके निकट पहुँचे, तब वह उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया। तब वे दोनों भाई उससे दूर हट गये और बड़े गौर से उसे देखने लगे। उस समय वह एक कोस लंबा जान पड़ा। उस राक्षस की आकृति केवल कबन्ध (धड़) के ही रूप में थी, इसलिये वह कबन्ध कहलाता था। वह विशाल, हिंसापरायण, भयंकर तथा दो बड़ी-बड़ी भुजाओं से युक्त था और देखने में अत्यन्त घोर प्रतीत होता था॥३३-३४॥
स महाबाहुरत्यर्थं प्रसार्य विपुलौ भुजौ।
जग्राह सहितावेव राघवौ पीडयन् बलात्॥३५॥
उस महाबाहु राक्षस ने अपनी दोनों विशाल भुजाओं को फैलाकर उन दोनों रघुवंशी राजकुमारों को बलपूर्वक पीड़ा देते हुए एक साथ ही पकड़ लिया॥३५॥
खड्गिनौ दृढधन्वानौ तिग्मतेजो महाभुजौ।
भ्रातरौ विवशं प्राप्तौ कृष्यमाणौ महाबलौ॥३६॥
दोनों के हाथों में तलवारें थीं, दोनों के पास मजबूत धनुष थे और वे दोनों भाई प्रचण्ड तेजस्वी, विशाल भुजाओं से युक्त तथा महान् बलवान् थे तो भी उस राक्षस के द्वारा खींचे जाने पर विवशता का अनुभव करने लगे॥३६॥
तत्र धैर्याच्च शूरस्तु राघवो नैव विव्यथे।
बाल्यादनाश्रयाच्चैव लक्ष्मणस्त्वभिविव्यथे॥३७॥
उस समय वहाँ शूरवीर रघुनन्दन श्रीराम तो धैर्य के कारण व्यथित नहीं हुए, परंतु बालबुद्धि होने तथा धैर्य का आश्रय न लेने के कारण लक्ष्मण के मन में बड़ी व्यथा हुई॥३७॥
उवाच च विषण्णः सन् राघवं राघवानुजः।
पश्य मां विवशं वीर राक्षसस्य वशंगतम्॥३८॥
तब श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण विषादग्रस्त हो श्रीरघुनाथजी से बोले-’वीरवर! देखिये, मैं राक्षस के वश में पड़कर विवश हो गया हूँ॥३८॥
मयैकेन तु निर्युक्तः परिमुच्यस्व राघव।
मां हि भूतबलिं दत्त्वा पलायस्व यथासुखम्॥३९॥
‘रघुनन्दन! एकमात्र मुझे ही इस राक्षस को भेंट देकर आप स्वयं इसके बाहुबन्धन से मुक्त हो जाइये। इस भूत को मेरी ही बलि देकर आप सुखपूर्वक यहाँ से निकल भागिये॥३९॥
अधिगन्तासि वैदेहीमचिरेणेति मे मतिः।
प्रतिलभ्य च काकुत्स्थ पितृपैतामहीं महीम्॥४०॥
तत्र मां राम राज्यस्थः स्मर्तुमर्हसि सर्वदा।
‘मेरा विश्वास है कि आप शीघ्र ही विदेहराजकुमारी को प्राप्त कर लेंगे। ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! वनवास से लौटने पर पिता-पितामहों की भूमिको अपने अधिकार में लेकर जब आप राजसिंहासन पर विराजमान होइयेगा, तब वहाँ सदा मेरा भी स्मरण करते रहियेगा’॥४० १/२॥
लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु रामः सौमित्रिमब्रवीत्॥४१॥
मा स्म त्रासं वृथा वीर नहि त्वादृग् विषीदति।
लक्ष्मण के ऐसा कहने पर श्रीराम ने उन सुमित्राकुमार से कहा-’वीर! तुम भयभीत न होओ तुम्हारे-जैसे शूरवीर इस तरह विषाद नहीं करते हैं’॥४१ १/२॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रूरो भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥४२॥
तावुवाच महाबाहुः कबन्धो दानवोत्तमः।
इसी बीच में क्रूर हृदय वाले दानवशिरोमणि महाबाहु कबन्ध ने उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण से कहा –॥४२ १/२॥
कौ युवां वृषभस्कन्धौ महाखड्गधनुर्धरौ॥४३॥
घोरं देशमिमं प्राप्तौ दैवेन मम चाक्षुषौ।
वदतं कार्यमिह वां किमर्थं चागतौ युवाम्॥४४॥
‘तुम दोनों कौन हो? तुम्हारे कंधे बैल के समान ऊँचे हैं। तुमने बड़ी-बड़ी तलवारें और धनुष धारण कर रखे हैं। इस भयंकर देश में तुम दोनों किसलिये आये हो? यहाँ तुम्हारा क्या कार्य है? बताओ भाग्य से ही तुम दोनों मेरी आँखों के सामने पड़ गये॥४३-४४॥
इमं देशमनुप्राप्तौ क्षुधार्तस्येह तिष्ठतः।
सबाणचापखड्गौ च तीक्ष्णशृङ्गाविवर्षभौ॥४५॥
मां तूर्णमनुसम्प्राप्तौ दुर्लभं जीवितं हि वाम्।
‘मैं यहाँ भूख से पीड़ित होकर खड़ा था और तुम स्वयं धनुष-बाण और खड्ग लिये तीखे सींगवाले दो बैलों के समान तुरंत ही इस स्थान पर मेरे निकट आ पहुँचे। अतः अब तुम दोनों का जीवित रहना कठिन है’॥४५ १/२॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कबन्धस्य दुरात्मनः॥४६॥
उवाच लक्ष्मणं रामो मुखेन परिशुष्यता।
कृच्छ्रात् कृच्छ्रतरं प्राप्य दारुणं सत्यविक्रम॥४७॥
व्यसनं जीवितान्ताय प्राप्तमप्राप्य तां प्रियाम्।
दुरात्मा कबन्ध की ये बातें सुनकर श्रीराम ने सूखे मुखवाले लक्ष्मण से कहा—’सत्यपराक्रमी वीर! कठिन-से-कठिन असह्य दुःख को पाकर हम दुःखी थे ही, तबतक पुनः प्रियतमा सीता के प्राप्त होने से पहले ही हम दोनों पर यह महान् संकट आ गया, जो जीवन का अन्त कर देने वाला है॥४६-४७ १/२॥
कालस्य सुमहद् वीर्यं सर्वभूतेषु लक्ष्मण॥४८॥
त्वां च मां च नरव्याघ्र व्यसनैः पश्य मोहितौ।
नहि भारोऽस्ति दैवस्य सर्वभूतेषु लक्ष्मण॥४९॥
‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! काल का महान् बल सभी प्राणियों पर अपना प्रभाव डालता है। देखो न, तुम और मैं दोनों ही काल के दिये हुए अनेकानेक संकटों से मोहित हो रहे हैं। सुमित्रानन्दन! दैव अथवा काल के लिये सम्पूर्ण प्राणियों पर शासन करना भाररूप (कठिन) नहीं है॥४८-४९॥
शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्राश्च रणाजिरे।
कालाभिपन्नाः सीदन्ति यथा वालुकसेतवः॥५०॥
‘जैसे बालू के बने हुए पुल पानी के आघात से ढह जाते हैं, उसी प्रकार बड़े-बड़े शूरवीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता पुरुष भी समराङ्गण में काल के वशीभूत हो कष्ट में पड़ जाते हैं’॥५०॥
इति ब्रुवाणो दृढसत्यविक्रमो महायशा दाशरथिः प्रतापवान्।
अवेक्ष्य सौमित्रिमुदग्रविक्रमः स्थिरां तदा स्वां मतिमात्मनाकरोत्॥५१॥
ऐसा कहकर सुदृढ़ एवं सत्यपराक्रम वाले महान् बल-विक्रम से सम्पन्न महायशस्वी प्रतापशाली दशरथनन्दन श्रीराम ने सुमित्राकुमार की ओर देखकर उस समय स्वयं ही अपनी बुद्धि को सुस्थिर कर लिया॥५१॥
सर्ग ७०
तौ तु तत्र स्थितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
बाहुपाशपरिक्षिप्तौ कबन्धो वाक्यमब्रवीत्॥१॥
अपने बाहुपाश से घिरकर वहाँ खड़े हुए उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण की ओर देखकर कबन्ध ने कहा-॥१॥
तिष्ठतः किं नु मां दृष्ट्वा क्षुधार्तं क्षत्रियर्षभौ।
आहारार्थं तु संदिष्टौ दैवेन हतचेतनौ॥२॥
‘क्षत्रियशिरोमणि राजकुमारो! मुझे भूख से पीड़ित देखकर भी खड़े क्यों हो? (मेरे मुँह में चले आओ) क्योंकि दैव ने मेरे भोजन के लिये ही तुम्हें यहाँ भेजा है। इसीलिये तुम दोनों की बुद्धि मारी गयी है’॥२॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं प्राप्तकालं हितं तदा।
उवाचार्तिसमापन्नो विक्रमे कृतनिश्चयः॥३॥
यह सुनकर पीड़ित हुए लक्ष्मण ने उस समय पराक्रम का ही निश्चय करके यह समयोचित एवं हितकर बात कही-॥३॥
त्वां च मां च पुरा तूर्णमादत्ते राक्षसाधमः।
तस्मादसिभ्यामस्याशु बाहू छिन्दावहे गुरू॥४॥
‘भैया! यह नीच राक्षस मुझको और आपको तुरंत मुँह में ले ले, इसके पहले ही हमलोग अपनी तलवारों से इसकी बड़ी-बड़ी बाँहें शीघ्र ही काट डालें॥४॥
भीषणोऽयं महाकायो राक्षसा भुजविक्रमः।
लोकं ह्यतिजितं कृत्वा ह्यावां हन्तुमिहेच्छति॥५॥
‘यह महाकाय राक्षस बड़ा भीषण है। इसकी भुजाओं में ही इसका सारा बल और पराक्रम निहित है। यह समस्त संसार को सर्वथा पराजित-सा करके अब हमलोगों को भी यहाँ मार डालना चाहता है॥५॥
निश्चेष्टानां वधो राजन् कुत्सितो जगतीपतेः।
क्रतुमध्योपनीतानां पशूनामिव राघव॥६॥
‘राजन्! रघुनन्दन! यज्ञ में लाये गये पशुओं के समान निश्चेष्ट प्राणियों का वध राजा के लिये निन्दित बताया गया है (इसलिये हमें इसके प्राण नहीं लेने चाहिये, केवल भुजाओं का ही उच्छेद कर देना चाहिये)’॥६॥
एतत् संजल्पितं श्रुत्वा तयोः क्रुद्धस्तु राक्षसः।
विदार्यास्यं ततो रौद्रं तौ भक्षयितुमारभत्॥७॥
उन दोनों की यह बातचीत सुनकर उस राक्षस को बड़ा क्रोध हुआ और वह अपना भयंकर मुख फैलाकर उन्हें खा जाने को उद्यत हो गया॥७॥
ततस्तौ देशकालज्ञौ खड्गाभ्यामेव राघवौ।
अच्छिन्दन्तां सुसंहृष्टौ बाहू तस्यांसदेशतः॥८॥
इतने में ही देश-काल (अवसर) का ज्ञान रखने वाले उन दोनों रघुवंशी राजकुमारों ने अत्यन्त हर्ष में भरकर तलवारों से ही उसकी दोनों भुजाएँ कंधों से काट गिरायीं॥८॥
दक्षिणो दक्षिणं बाहुमसक्तमसिना ततः।
चिच्छेद रामो वेगेन सव्यं वीरस्तु लक्ष्मणः॥९॥
भगवान् श्रीराम उसके दाहिने भाग में खड़े थे। उन्होंने अपनी तलवार से उसकी दाहिनी बाँह बिना किसी रुकावट के वेगपूर्वक काट डाली तथा वाम भाग में खड़े वीर लक्ष्मण ने उसकी बायीं भुजा को तलवार से उड़ा दिया॥९॥
स पपात महाबाहुश्छिन्नबाहुर्महास्वनः।
खं च गां च दिशश्चैव नादयञ्जलदो यथा॥१०॥
भुजाएँ कट जाने पर वह महाबाहु राक्षस मेघ के समान गम्भीर गर्जना करके पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओं को जाता हुआ धरती पर गिर पड़ा॥१०॥
स निकृत्तौ भुजौ दृष्ट्वा शोणितौघपरिप्लुतः।
दीनः पप्रच्छ तौ वीरौ कौ युवामिति दानवः॥११॥
अपनी भुजाओं को कटी हुई देख खून से लथपथ हुए उस दानव ने दीन वाणी में पूछा-’वीरो! तुम दोनों कौन हो?’॥११॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य लक्ष्मणः शुभलक्षणः।
शशंस तस्य काकुस्त्थं कबन्धस्य महाबलः॥१२॥
कबन्ध के इस प्रकार पूछने पर शुभ लक्षणों वाले महाबली लक्ष्मण ने उसे श्रीरामचन्द्रजी का परिचय देना आरम्भ किया-॥१२॥
अयमिक्ष्वाकुदायादो रामो नाम जनैः श्रुतः।
तस्यैवावरजं विद्धि भ्रातरं मां च लक्ष्मणम्॥१३॥
‘ये इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के पुत्र हैं और लोगों में श्रीराम नाम से विख्यात हैं। मुझे इन्हीं का छोटा भाई समझो मेरा नाम लक्ष्मण है॥१३॥
मात्रा प्रतिहते राज्ये रामः प्रताजितो वनम्।
मया सह चरत्येष भार्यया च महद् वनम्॥१४॥
अस्य देवप्रभावस्य वसतो विजने वने।
रक्षसापहृता भार्या यामिच्छन्ताविहागतौ॥१५॥
‘माता कैकेयी के द्वारा जब इनका राज्याभिषेक रोक दिया गया, तब ये पिता की आज्ञा से वन में चले आये और मेरे तथा अपनी पत्नी के साथ इस विशाल वन में विचरण करने लगे। इस निर्जन वन में रहते हुए इन देवतुल्य प्रभावशाली श्रीरघुनाथजी की पत्नी को किसी राक्षस ने हर लिया है। उन्हीं का पता लगाने की इच्छा से हमलोग यहाँ आये हैं॥१४-१५॥
त्वं तु को वा किमर्थं वा कबन्धसदृशो वने।
आस्येनोरसि दीप्तेन भग्नजङ्घो विचेष्टसे॥१६॥
‘तुम कौन हो? और कबन्ध के समान रूप धारण करके क्यों इस वन में पड़े हो? छाती के नीचे चमकता हुआ मुँह और टूटी हुई जंघा (पिण्डली) लिये तुम किस कारण इधर-उधर लुढ़कते फिरते हो?’॥१६॥
एवमुक्तः कबन्धस्तु लक्ष्मणेनोत्तरं वचः।
उवाच वचनं प्रीतस्तदिन्द्रवचनं स्मरन्॥१७॥
लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर कबन्धको इन्द्रकी कही हुई बातका स्मरण हो आया। अतः उसने बड़ी प्रसन्नताके साथ लक्ष्मणको उनकी बातका उत्तर दिया-॥१७॥
स्वागतं वां नरव्याघ्रौ दिष्ट्या पश्यामि वामहम्।
दिष्ट्या चेमौ निकृत्तौ मे युवाभ्यां बाहुबन्धनौ॥१८॥
‘पुरुषसिंह वीरो! आप दोनों का स्वागत है। बड़े भाग्य से मुझे आपलोगों का दर्शन मिला है। ये मेरी दोनों भुजाएँ मेरे लिये भारी बन्धन थीं। सौभाग्य की बात है कि आपलोगों ने इन्हें काट डाला॥१८॥
विरूपं यच्च मे रूपं प्राप्तं ह्यविनयाद् यथा।
तन्मे शृणु नरव्याघ्र तत्त्वतः शंसतस्तव॥१९॥
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम ! मुझे जो ऐसा कुरूप रूप प्राप्त हुआ है, यह मेरी ही उद्दण्डता का फल है। यह सब कैसे हुआ, वह प्रसङ्ग आपको मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ। आप मुझसे सुनें’॥१९॥
सर्ग ७१
पुरा राम महाबाहो महाबलपराक्रमम्।
रूपमासीन्ममाचिन्त्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥१॥
‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकाल में मेरा रूप महान् बलपराक्रम से सम्पन्न, अचिन्त्य तथा तीनों लोकों में विख्यात था॥१॥
यथा सूर्यस्य सोमस्य शक्रस्य च यथा वपुः।
सोऽहं रूपमिदं कृत्वा लोकवित्रासनं महत्॥२॥
ऋषीन् वनगतान् राम त्रासयामि ततस्ततः।
‘सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्र का शरीर जैसा तेजस्वी है, वैसा ही मेरा भी था। ऐसा होने पर भी मैं लोगों को भयभीत करने वाले इस अत्यन्त भयंकर राक्षसरूप को धारण करके इधर-उधर घूमता और वन में रहने वाले ऋषियों को डराया करता था॥२ १/२॥
ततः स्थूलशिरा नाम महर्षिः कोपितो मया॥३॥
स चिन्वन् विविधं वन्यं रूपेणानेन धर्षितः।
तेनाहमुक्तः प्रेक्ष्यैवं घोरशापाभिधायिना॥४॥
अपने इस बर्ताव से एक दिन मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षि को कुपित कर दिया। वे नाना प्रकार के जंगली फल-मूल आदि का संचय कर रहे थे, उसी समय मैंने उन्हें इस राक्षसरूप से डरा दिया। मुझे ऐसे विकट रूप में देखकर उन्होंने घोर शाप देते हुए कहा-॥३-४॥
एतदेवं नृशंसं ते रूपमस्तु विगर्हितम्।
स मया याचितः क्रुद्धः शापस्यान्तो भवेदिति॥
अभिशापकृतस्येति तेनेदं भाषितं वचः।
‘दुरात्मन् ! आज से सदा के लिये तुम्हारा यही क्रूर और निन्दित रूप रह जाय।’ यह सुनकर मैंने उन कुपित महर्षि से प्रार्थना की-’भगवन् ! इस अभिशाप (तिरस्कार) जनित शाप का अन्त होना चाहिये।’ तब उन्होंने इस प्रकार कहा-॥५२॥
यदा छित्त्वा भुजौ रामस्त्वां दहेद् विजने वने॥६॥
तदा त्वं प्राप्स्यसे रूपं स्वमेव विपुलं शुभम्।
श्रिया विराजितं पुत्रं दनोस्त्वं विद्धि लक्ष्मण॥७॥
‘जब श्रीराम (और लक्ष्मण) तुम्हारी दोनों भुजाएँ काटकर तुम्हें निर्जन वन में जलायेंगे, तब तुम पुनः अपने उसी परम उत्तम, सुन्दर और शोभासम्पन्न रूप को प्राप्त कर लोगे।’ लक्ष्मण! इस प्रकार तुम मुझे एक दुराचारी दानव समझो। ६-७॥
इन्द्रकोपादिदं रूपं प्राप्तमेवं रणाजिरे।
अहं हि तपसोग्रेण पितामहमतोषयम्॥८॥
दीर्घमायुः स मे प्रादात् ततो मां विभ्रमोऽस्पृशत् ।
दीर्घमायुर्मया प्राप्तं किं मां शक्रः करिष्यति॥९॥
‘मेरा जो यह ऐसा रूप है, यह समराङ्गण में इन्द्र के क्रोध से प्राप्त हुआ है। मैंने पूर्वकाल में राक्षस होने के पश्चात् घोर तपस्या करके पितामह ब्रह्माजी को संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे दीर्घजीवी होने का वर दिया। इससे मेरी बुद्धि में यह भ्रम या अहंकार उत्पन्न हो गया कि मुझे तो दीर्घकालतक बनी रहनेवाली आयु प्राप्त हुई है; फिर इन्द्र मेरा क्या कर लेंगे?॥८-९॥
इत्येवं बुद्धिमास्थाय रणे शक्रमधर्षयम्।
तस्य बाहुप्रमुक्तेन वज्रेण शतपर्वणा॥१०॥
सक्थिनी च शिरश्चैव शरीरे सम्प्रवेशितम्।
‘ऐसे विचार का आश्रय लेकर एक दिन मैंने युद्ध में देवराजपर आक्रमण किया। उस समय इन्द्र ने मुझपर सौ धारोंवाले वज्र का प्रहार किया। उनके छोड़े हुए उस वज्र से मेरी जाँघे और मस्तक मेरे ही शरीर में घुस गये॥१० १/२॥
स मया याच्यमानः सन् नानयद् यमसादनम्॥११॥
पितामहवचः सत्यं तदस्त्विति ममाब्रवीत्।
‘मैंने बहुत प्रार्थना की, इसलिये उन्होंने मुझे यमलोक नहीं पठाया और कहा-’पितामह ब्रह्माजी ने जो तुम्हें दीर्घजीवी होने के लिये वरदान दिया है, वह सत्य हो’॥११ १/२॥
अनाहारः कथं शक्तो भग्नसक्थिशिरोमुखः॥१२॥
वज्रेणाभिहतः कालं सुदीर्घमपि जीवितुम्।
‘तब मैंने कहा-देवराज! आपने अपने वज्र की मार से मेरी जाँघे, मस्तक और मुँह सभी तोड़ डाले। अब मैं कैसे आहार ग्रहण करूँगा और निराहार रहकर किस प्रकार सुदीर्घकालतक जीवित रह सकूँगा?॥१२ १/२॥
स एवमुक्तः शक्रो मे बाहू योजनमायतौ॥१३॥
तदा चास्यं च मे कुक्षौ तीक्ष्णदंष्ट्रमकल्पयत्।
‘मेरे ऐसा कहने पर इन्द्र ने मेरी भुजाएँ एक-एक योजन लंबी कर दी एवं तत्काल ही मेरे पेट में तीखे दाढ़ों वाला एक मुख बना दिया॥१३ १/२॥
सोऽहं भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां संक्षिप्यास्मिन् वनेचरान्॥१४॥
सिंहदीपिमृगव्याघ्रान् भक्षयामि समन्ततः।
‘इस प्रकार मैं विशाल भुजाओं द्वारा वन में रहने वाले सिंह, चीते, हरिन और बाघ आदि जन्तुओं को सब ओर से समेटकर खाया करता था॥१४ १/२॥
स तु मामब्रवीदिन्द्रो यदा रामः सलक्ष्मणः॥१५॥
छेत्स्यते समरे बाहू तदा स्वर्गं गमिष्यसि।
‘इन्द्र ने मुझे यह भी बतला दिया था कि जब लक्ष्मणसहित श्रीराम तुम्हारी भुजाएँ काट देंगे, उस समय तुम स्वर्ग में जाओगे॥१५ १/२॥
अनेन वपुषा तात वनेऽस्मिन् राजसत्तम॥१६॥
यद् यत् पश्यामि सर्वस्य ग्रहणं साधु रोचये।
‘तात! राजशिरोमणे! इस शरीर से इस वन के भीतर मैं जो-जो वस्तु देखता हूँ, वह सब ग्रहण कर लेना मुझे ठीक लगता है॥१६ १/२॥
अवश्यं ग्रहणं रामो मन्येऽहं समुपैष्यति॥१७॥
इमां बुद्धिं पुरस्कृत्य देहन्यासकृतश्रमः।
‘इन्द्र तथा मुनि के कथनानुसार मुझे यह विश्वास था कि एक दिन श्रीराम अवश्य मेरी पकड़ में आ जायेंगे। इसी विचार को सामने रखकर मैं इस शरीर को त्याग देने के लिये प्रयत्नशील था॥१७ १/२॥
स त्वं रामोऽसि भद्रं ते नाहमन्येन राघव॥१८॥
शक्यो हन्तुं यथा तत्त्वमेवमुक्तं महर्षिणा।
‘रघुनन्दन! अवश्य ही आप श्रीराम हैं। आपका कल्याण हो मैं आपके सिवा दूसरे किसी से नहीं मारा जा सकता था। यह बात महर्षि ने ठीक ही कही थी॥१८ १/२॥
अहं हि मतिसाचिव्यं करिष्यामि नरर्षभ॥१९॥
मित्रं चैवोपदेक्ष्यामि युवाभ्यां संस्कृतोऽग्निना।
‘नरश्रेष्ठ! आप दोनों जब अग्नि के द्वारा मेरा दाहसंस्कार कर देंगे, उस समय मैं आपकी बौद्धिक सहायता करूँगा। आप दोनों के लिये एक अच्छे मित्र का पता बताऊँगा’॥१९ १/२॥
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दनुना तेन राघवः॥२०॥
इदं जगाद वचनं लक्ष्मणस्य च पश्यतः।
उस दानव के ऐसा कहने पर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण के सामने उससे यह बात कही-॥२० १/२॥
रावणेन हृता भार्या सीता मम यशस्विनी॥२१॥
निष्क्रान्तस्य जनस्थानात् सह भ्रात्रा यथासुखम्।
नाममात्रं तु जानामि न रूपं तस्य रक्षसः॥२२॥
‘कबन्ध! मेरी यशस्विनी भार्या सीता को रावण हर ले गया है। उस समय मैं अपने भाई लक्ष्मण के साथ सुखपूर्वक जनस्थान के बाहर चला गया था। मैं उस राक्षस का नाम मात्र जानता हूँ। उसकी शकल-सूरत से परिचित नहीं हूँ॥२१-२२॥
निवासं वा प्रभावं वा वयं तस्य न विद्महे।
शोकार्तानामनाथानामेवं विपरिधावताम्॥२३॥
कारुण्यं सदृशं कर्तुमुपकारेण वर्तताम्।
‘वह कहाँ रहता है और कैसा उसका प्रभाव है, इस बात से हमलोग सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इस समय सीता का शोक हमें बड़ी पीड़ा दे रहा है। हम असहाय होकर इसी तरह सब ओर दौड़ रहे हैं। तुम हमारे ऊपर समुचित करुणा करने के लिये इस विषय में हमारा कुछ उपकार करो॥२३ १/२॥
काष्ठान्यानीय भग्नानि काले शुष्काणि कुञ्जरैः॥२४॥
धक्ष्यामस्त्वां वयं वीर श्वभ्रे महति कल्पिते।
‘वीर! फिर हमलोग हाथियों द्वारा तोड़े गये सूखे काठ लाकर स्वयं खोदे हुए एक बहुत बड़े गड्डे में तुम्हारे शरीर को रखकर जला देंगे॥२४ १/२॥
स त्वं सीतां समाचक्ष्व येन वा यत्र वा हृता॥२५॥
कुरु कल्याणमत्यर्थं यदि जानासि तत्त्वतः।
‘अतः अब तुम हमें सीता का पता बताओ। इस समय वह कहाँ है? तथा उसे कौन कहाँ ले गया है? यदि ठीक-ठीक जानते हो तो सीता का समाचार बताकर हमारा अत्यन्त कल्याण करो’॥२५ १/२॥
एवमुक्तस्तु रामेण वाक्यं दनुरनुत्तमम्॥२६॥
प्रोवाच कुशलो वक्ता वक्तारमपि राघवम्।
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर बातचीत में कुशल उस दानव ने उन प्रवचनपटु रघुनाथजी से यह परम उत्तम बात कही-॥२६ १/२॥
दिव्यमस्ति न मे ज्ञानं नाभिजानामि मैथिलीम्॥२७॥
यस्तां वक्ष्यति तं वक्ष्ये दग्धः स्वं रूपमास्थितः।
योऽभिजानाति तद्रक्षस्तद् वक्ष्ये राम तत्परम्॥२८॥
‘श्रीराम! इस समय मुझे दिव्य ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं मिथिलेशकुमारी के विषय में कुछ भी नहीं जानता। जब मेरे इस शरीर का दाह हो जायगा, तब मैं अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त होकर किसी ऐसे व्यक्ति का पता बता सकूँगा, जो सीता के विषय में आपको कुछ बतायेगा तथा जो उस उत्कृष्ट राक्षस को भी जानता होगा, ऐसे पुरुष का आपको परिचय दूंगा॥२७-२८॥
अदग्धस्य हि विज्ञातुं शक्तिरस्ति न मे प्रभो।
राक्षसं तु महावीर्यं सीता येन हृता तव॥२९॥
‘प्रभो! जब तक मेरे इस शरीर का दाह नहीं होगा तबतक मुझमें यह जानने की शक्ति नहीं आ सकती कि वह महापराक्रमी राक्षस कौन है, जिसने आपकी सीता का अपहरण किया है॥२९॥
विज्ञानं हि महद् भ्रष्टं शापदोषेण राघव।
स्वकृतेन मया प्राप्तं रूपं लोकविगर्हितम्॥३०॥
‘रघुनन्दन! शाप-दोष के कारण मेरा महान् विज्ञान नष्ट हो गया है। अपनी ही करतूत से मुझे यह लोकनिन्दित रूप प्राप्त हुआ है॥३०॥
किं तु यावन्न यात्यस्तं सविता श्रान्तवाहनः।
तावन्मामवटे क्षिप्त्वा दह राम यथाविधि॥३१॥
‘किंतु श्रीराम! जबतक सूर्यदेव अपने वाहनों के थक जाने पर अस्त नहीं हो जाते, तभी तक मुझे गड्डे में डालकर शास्त्रीय विधि के अनुसार मेरा दाह-संस्कार कर दीजिये॥३१॥
दग्धस्त्वयाहमवटे न्यायेन रघुनन्दन।
वक्ष्यामि तं महावीर यस्तं वेत्स्यति राक्षसम्॥३२॥
‘महावीर रघुनन्दन! आपके द्वारा विधिपूर्वक गड्ढे में मेरे शरीर का दाह हो जाने पर मैं ऐसे महापुरुष का परिचय दूंगा, जो उस राक्षस को जानते होंगे॥३२॥
तेन सख्यं च कर्तव्यं न्याय्यवृत्तेन राघव।
कल्पयिष्यति ते वीर साहाय्यं लघुविक्रम॥३३॥
‘शीघ्र पराक्रम प्रकट करने वाले वीर रघुनाथजी! न्यायोचित आचार वाले उन महापुरुष के साथ आपको मित्रता कर लेनी चाहिये। वे आपकी सहायता करेंगे॥३३॥
नहि तस्यास्त्यविज्ञातं त्रिषु लोकेषु राघव।
सर्वान् परिवृतो लोकान् पुरा वै कारणान्तरे॥३४॥
‘रघुनन्दन! उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी अज्ञात नहीं है; क्योंकि किसी कारणवश वे पहले समस्त लोकोंमें चक्कर लगा चुके हैं॥३४॥
सर्ग ७२
एवमुक्तौ तु तौ वीरौ कबन्धेन नरेश्वरौ।
गिरिप्रदरमासाद्य पावकं विससर्जतुः॥१॥
कबन्ध के ऐसा कहने पर उन दोनों वीर नरेश्वर श्रीराम और लक्ष्मण ने उसके शरीर को एक पर्वत के गड्ढे में डालकर उसमें आग लगा दी॥१॥
लक्ष्मणस्तु महोल्काभिर्खलिताभिः समन्ततः।
चितामादीपयामास सा प्रजज्वाल सर्वतः॥२॥
लक्ष्मण ने जलती हुई बड़ी-बड़ी लुकारियों के द्वारा चारों ओर से उसकी चिता में आग लगायी; फिर तो वह सब ओर से प्रज्वलित हो उठी॥२॥
तच्छरीरं कबन्धस्य घृतपिण्डोपमं महत्।
मेदसा पच्यमानस्य मन्दं दहत पावकः॥३॥
चिता में जलते हुए कबन्ध का विशाल शरीर चर्बियों से भरा होने के कारण घी के लोदे के समान प्रतीत होता था। चिता की आग उसे धीरे-धीरे जलाने लगी॥३॥
सविधूय चितामाशु विधूमोऽग्निरिवोत्थितः।
अरजे वाससी बिभ्रन्माल्यं दिव्यं महाबलः॥४॥
तदनन्तर वह महाबली कबन्ध तुरंत ही चिता को हिलाकर दो निर्मल वस्त्र और दिव्य पुष्पों का हार धारण किये धूमरहित अग्नि के समान उठ खड़ा हुआ॥४॥
ततश्चिताया वेगेन भास्वरो विरजाम्बरः।
उत्पपाताशु संहृष्टः सर्वप्रत्यङ्गभूषणः॥५॥
विमाने भास्वरे तिष्ठन् हंसयुक्ते यशस्करे।
प्रभया च महातेजा दिशो दश विराजयन्॥६॥
सोऽन्तरिक्षगतो वाक्यं कबन्धो राममब्रवीत्।
फिर वेगपूर्वक चिता से ऊपर को उठा और शीघ्र ही एक तेजस्वी विमान पर जा बैठा। निर्मल वस्त्रों से विभूषित हो वह बड़ा तेजस्वी दिखायी देता था। उसके मन में हर्ष भरा हुआ था तथा समस्त अङ्गप्रत्यङ्ग में दिव्य आभूषण शोभा दे रहे थे। हंसों से जुते हुए उस यशस्वी विमान पर बैठा हुआ महान् तेजस्वी कबन्ध अपनी प्रभा से दसों दिशाओं को प्रकाशित करने लगा और अन्तरिक्ष में स्थित हो श्रीराम से इस प्रकार बोला-॥५-६ १/२॥
शृणु राघव तत्त्वेन यथा सीतामवाप्स्यसि॥७॥
राम षड् युक्तयो लोके याभिः सर्वं विमृश्यते।
परिमृष्टो दशान्तेन दशाभागेन सेव्यते॥८॥
‘रघुनन्दन! आप जिस प्रकार सीता को पा सकेंगे, वह ठीक-ठीक बता रहा हूँ, सुनिये। श्रीराम! लोक में छः युक्तियाँ हैं, जिनसे राजाओं द्वारा सब कुछ प्राप्त किया जाता है (उन युक्तियों तथा उपायों के नाम हैं -संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय*)। जो मनुष्य दुर्दशा से ग्रस्त होता है, वह दूसरे किसी दुर्दशाग्रस्त पुरुष से ही सेवा या सहायता प्राप्त करता है (यह नीति है)॥७-८॥
दशाभागगतो हीनस्त्वं हि राम सलक्ष्मणः।
यत्कृते व्यसनं प्राप्तं त्वया दारप्रधर्षणम्॥९॥
‘श्रीराम! लक्ष्मणसहित आप बुरी दशा के शिकार हो रहे हैं; इसीलिये आपलोग राज्य से वञ्चित हैं तथा उस बुरी दशा के कारण ही आपको अपनी भार्या के अपहरण का महान् दुःख प्राप्त हुआ है॥९॥
तदवश्यं त्वया कार्यः स सुहृत् सुहृदां वर।
अकृत्वा नहि ते सिद्धिमहं पश्यामि चिन्तयन्॥१०॥
‘अतः सुहृदों में श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप अवश्य ही उस पुरुष को अपना सुहृद् बनाइये, जो आपकी ही भाँति दुर्दशा में पड़ा हुआ हो (इस प्रकार आप सुहृद् का आश्रय लेकर समाश्रय नीति को अपनाइये)। मैं बहुत सोचने पर भी ऐसा किये बिना आपकी सफलता नहीं देखता हूँ॥१०॥
श्रूयतां राम वक्ष्यामि सुग्रीवो नाम वानरः।
भ्रात्रा निरस्तः क्रुद्धेन वालिना शक्रसूनुना॥११॥
‘श्रीराम! सुनिये, मैं ऐसे पुरुष का परिचय दे रहा हूँ, उनका नाम है सुग्रीव वे जाति के वानर हैं। उन्हें उनके भाई इन्द्रकुमार वाली ने कुपित होकर घर से निकाल दिया है॥११॥
ऋष्यमूके गिरिवरे पम्पापर्यन्तशोभिते।
निवसत्यात्मवान् वीरश्चतुर्भिः सह वानरैः॥१२॥
‘वे मनस्वी वीर सुग्रीव इस समय चार वानरों के साथ उस गिरिवर ऋष्यमूक पर निवास करते हैं, जो पम्पासरोवर तक फैला हुआ है॥१२॥
वानरेन्द्रो महावीर्यस्तेजोवानमितप्रभः।
सत्यसंधो विनीतश्च धृतिमान् मतिमान् महान्॥१३॥
दक्षः प्रगल्भो द्युतिमान् महाबलपराक्रमः।
‘वे वानरों के राजा महापराक्रमी सुग्रीव तेजस्वी, अत्यन्त कान्तिमान्, सत्यप्रतिज्ञ, विनयशील, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, महापुरुष, कार्यदक्ष, निर्भीक, दीप्तिमान् तथा महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हैं॥१३ १/२॥
भ्रात्रा विवासितो वीर राज्यहेतोर्महात्मना॥१४॥
स ते सहायो मित्रं च सीतायाः परिमार्गणे।
भविष्यति हि ते राम मा च शोके मनः कृथाः॥
‘वीर श्रीराम! उनके महामना भाई वाली ने सारे राज्य को अपने अधिकार में कर लेने के लिये उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया है; अतः वे सीता की खोज के लिये आपके सहायक और मित्र होंगे। इसलिये आप अपने मन को शोक में न डालिये॥१४-१५॥
भवितव्यं हि तच्चापि न तच्छक्यमिहान्यथा।
कर्तुमिक्ष्वाकुशार्दूल कालो हि दुरतिक्रमः॥१६॥
‘इक्ष्वाकुवंशी वीरों में श्रेष्ठ श्रीराम! जो होनहार है, उसे कोई भी पलट नहीं सकता। काल का विधान सभी के लिये दुर्लङ्घ्य होता है (अतः आप पर जो कुछ भी बीत रहा है, इसे काल या प्रारब्ध का विधान समझकर आपको धैर्य धारण करना चाहिये)॥१६॥
गच्छ शीघ्रमितो वीर सुग्रीवं तं महाबलम्।
वयस्यं तं कुरु क्षिप्रमितो गत्वाद्य राघव॥१७॥
‘वीर रघुनाथजी! आप यहाँ से शीघ्र ही महाबली सुग्रीव के पास जाइये और जाकर तुरंत उन्हें अपना मित्र बना लीजिये॥१७॥
अद्रोहाय समागम्य दीप्यमाने विभावसौ।
न च ते सोऽवमन्तव्यः सुग्रीवो वानराधिपः॥१८॥
‘प्रज्वलित अग्नि को साक्षी बनाकर परस्पर द्रोह न करने के लिये मैत्री स्थापित कीजिये और ऐसा करने के बाद आपको कभी उन वानरराज सुग्रीव का अपमान नहीं करना चाहिये॥१८॥
कृतज्ञः कामरूपी च सहायार्थी च वीर्यवान्।
शक्तौ ह्यद्य युवां कर्तुं कार्यं तस्य चिकीर्षितम्॥१९॥
‘वे इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, पराक्रमी और कृतज्ञ हैं तथा इस समय स्वयं ही अपने लिये एक सहायक ढूँढ़ रहे हैं। उनका जो अभीष्ट कार्य है उसे सिद्ध करने में आप दोनों भाई समर्थ हैं॥१९॥
कृतार्थो वाकृतार्थो वा तव कृत्यं करिष्यति।
स ऋक्षरजसः पुत्रः पम्पामटति शङ्कितः॥२०॥
‘सुग्रीव का मनोरथ पूर्ण हो या न हो, वे आपका कार्य अवश्य सिद्ध करेंगे। वे ऋक्षरजा के क्षेत्रज पुत्र हैं और वाली से शङ्कित रहकर पम्पासरोवर के तट पर भ्रमण करते हैं॥२०॥
भास्करस्यौरसः पुत्रो वालिना कृतकिल्बिषः।
संनिधायायुधं क्षिप्रमृष्यमूकालयं कपिम्॥२१॥
कुरु राघव सत्येन वयस्यं वनचारिणम्।
‘उन्हें सूर्यदेव का औरस पुत्र कहा गया है। उन्होंने वाली का अपराध किया है (इसीलिये वे उससे डरते हैं)। रघुनन्दन! अग्नि के समीप हथियार रखकर शीघ्र ही सत्य की शपथ खाकर ऋष्यमूकनिवासी वनचारी वानर सुग्रीव को आप अपना मित्र बना लीजिये॥२१ १/२॥
स हि स्थानानि कात्स्न्येन सर्वाणि कपिकुञ्जरः॥२२॥
नरमांसाशिनां लोके नैपुण्यादधिगच्छति।
‘कपिश्रेष्ठ सुग्रीव संसार में नरमांसभक्षी राक्षसों के जितने स्थान हैं, उन सबको पूर्णरूप से निपुणतापूर्वक जानते हैं॥२२ १/२॥
न तस्याविदितं लोके किंचिदस्ति हि राघव॥२३॥
यावत् सूर्यः प्रतपति सहस्रांशुः परंतप।
‘रघुनन्दन! शत्रुदमन! सहस्रों किरणों वाले सूर्यदेव जहाँ तक तपते हैं, वहाँ तक संसार में कोई ऐसा स्थान या वस्तु नहीं है, जो सुग्रीव के लिये अज्ञात हो॥२३ १/२॥
स नदीर्विपुलान् शैलान् गिरिदुर्गाणि कन्दरान्॥२४॥
अन्विष्य वानरैः सार्धं पत्नीं तेऽधिगमिष्यति।
‘वे वानरों के साथ रहकर समस्त नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों, पहाड़ी दुर्गम स्थानों और कन्दराओं में भी खोज कराकर आपकी पत्नी का पता लगा लेंगे॥२४ १/२॥
वानरांश्च महाकायान् प्रेषयिष्यति राघव॥२५॥
दिशो विचेतुं तां सीतां त्वद्वियोगेन शोचतीम्।
अन्वेष्यति वरारोहां मैथिली रावणालये॥२६॥
‘राघव! वे आपके वियोग में शोक करती हुई सीता की खोज के लिये सम्पूर्ण दिशाओं में विशालकाय वानरों को भेजेंगे, तथा रावण के घर से भी सुन्दर अङ्गोंवाली मिथिलेशकुमारी को ढूँढ़ निकालेंगे। २५-२६॥
स मेरुशृङ्गाग्रगतामनिन्दितां प्रविश्य पातालतलेऽपि वाश्रिताम्।
प्लवङ्गमानामृषभस्तव प्रियां निहत्य रक्षांसि पुनः प्रदास्यति॥२७॥
‘आपकी प्रिया सती-साध्वी सीता मेरुशिखर के अग्रभाग पर पहुँचायी गयी हों या पाताल में प्रवेश करके रखी गयी हों, वानरशिरोमणि सुग्रीव समस्त राक्षसों का वध करके उन्हें पुनः आपके पास ला देंगे’॥२७॥
सर्ग ७३
दर्शयित्वा तु रामाय सीतायाः परिमार्गणे।
वाक्यमन्वर्थमर्थज्ञः कबन्धः पुनरब्रवीत्॥१॥
श्रीराम को सीता की खोज का उपाय दिखाकर अर्थवेत्ता कबन्ध ने उनसे पुनः यह प्रयोजनयुक्त बात कही-॥१॥
एष राम शिवः पन्था यत्रैते पुष्पिता द्रुमाः।
प्रतीची दिशमाश्रित्य प्रकाशन्ते मनोरमाः॥२॥
‘श्रीराम! यहाँ से पश्चिम दिशा का आश्रय लेकर जहाँ ये फूलों से भरे हुए मनोरम वृक्ष शोभा पा रहे हैं, यही आपके जाने लायक सुखद मार्ग है॥२॥
जम्बूप्रियालपनसा न्यग्रोधप्लक्षतिन्दुकाः।
अश्वत्थाः कर्णिकाराश्च चूताश्चान्ये च पादपाः॥३॥
धन्वना नागवृक्षाश्च तिलका नक्तमालकाः।
नीलाशोकाः कदम्बाश्च करवीराश्च पुष्पिताः॥४॥
अग्निमुख्या अशोकाश्च सुरक्ताः पारिभद्रकाः।
तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वा च तान् बलात्॥५॥
फलान्यमृतकल्पानि भक्षयित्वा गमिष्यथः।
‘जामुन, प्रियाल (चिरौंजी), कटहल, बड़, पाकड़, तेंदू, पीपल, कनेर, आम तथा अन्य वृक्ष, धव, नागकेसर, तिलक, नक्तमाल, नील, अशोक, कदम्ब, खिले हुए करवीर, भिलावा, अशोक, लाल चन्दन तथा मन्दार—ये वृक्ष मार्ग में पड़ेंगे। आप दोनों भाई इनकी डालियों को बलपूर्वक भूमिपर झुकाकर अथवा इन वृक्षों पर चढ़कर इनके अमृततुल्य मधुर फलों का आहार करते हुए यात्रा कीजियेगा॥३–५ १/२॥
तदतिक्रम्य काकुत्स्थ वनं पुष्पितपादपम्॥६॥
नन्दनप्रतिमं चान्यत् कुरवस्तूत्तरा इव।
सर्वकालफला यत्र पादपा मधुरस्रवाः॥७॥
‘काकुत्स्थ! खिले हुए वृक्षों से सुशोभित उस वन को लाँघकर आपलोग एक दूसरे वन में प्रवेश कीजियेगा, जो नन्दनवन के समान मनोहर है। उस वन के वृक्ष उत्तर कुरुवर्ष के वृक्षों की भाँति मधु की धारा बहाने वाले हैं तथा उनमें सभी ऋतुओं में सदा फल लगे रहते हैं॥६-७॥
सर्वे च ऋतवस्तत्र वने चैत्ररथे यथा।
फलभारनतास्तत्र महाविटपधारिणः॥८॥
‘चैत्ररथ वन की भाँति उस मनोहर कानन में सभी ऋतुएँ निवास करती हैं। वहाँ के वृक्ष बड़ी-बड़ी शाखा धारण करने वाले तथा फलों के भार से झुके हुए हैं॥८॥
शोभन्ते सर्वतस्तत्र मेघपर्वतसंनिभाः।
तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वाथवा सुखम्॥९॥
फलान्यमृतकल्पानि लक्ष्मणस्ते प्रदास्यति।
‘वे वहाँ सब ओर मेघों और पर्वतों के समान शोभा पाते हैं। लक्ष्मण उन वृक्षों पर चढ़कर अथवा सुखपूर्वक उन्हें पृथ्वी पर झुकाकर उनके अमृततुल्य मधुर फल आपको देंगे॥९ १/२॥
चङ्कमन्तौ वरान् शैलान् शैलाच्छैलं वनाद् वनम्॥१०॥
ततः पुष्करिणीं वीरौ पम्पां नाम गमिष्यथः।
‘इस प्रकार सुन्दर पर्वतों पर भ्रमण करते हुए आप दोनों भाई एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर तथा एक वन से दूसरे वन में पहुँचेंगे और इस तरह अनेक पर्वतों तथा वनों को लाँघते हुए आप दोनों वीर पम्पा नामक पुष्करिणी के तटपर पहुँच जायेंगे॥१० १/२॥
अशर्करामविभ्रंशां समतीर्थामशैवलाम्॥११॥
राम संजातवालूकां कमलोत्पलशोभिताम्।
‘श्रीराम! वहाँ कंकड़ का नाम नहीं है। उसके तट पर पैर फिसलने लायक कीचड़ आदि नहीं है। उसके घाट की भूमि सब ओर से बराबर है-ऊँची नीची या ऊबड़-खाबड़ नहीं है। उस पुष्करिणी में सेवार का सर्वथा अभाव है। उसके भीतर की भूमि वालुकापूर्ण है। कमल और उत्पल उस सरोवर की शोभा बढ़ाते हैं॥११ १/२॥
तत्र हंसाः प्लवाः क्रौञ्चाः कुरराश्चैव राघव॥१२॥
वल्गुस्वरा निकूजन्ति पम्पासलिलगोचराः।
नोद्विजन्ते नरान् दृष्ट्वा वधस्याकोविदाः शुभाः॥१३॥
‘रघुनन्दन! वहाँ पम्पा के जल में विचरने वाले हंस, कारण्डव, क्रौञ्च और कुरर सदा मधुर स्वर में कूजते रहते हैं। वे मनुष्यों को देखकर उद्विग्न नहीं होते हैं। क्योंकि किसी मनुष्य के द्वारा किसी पक्षी का वध भी हो सकता है, ऐसे भय का उन्हें अनुभव नहीं है। ये सभी पक्षी बड़े सुन्दर हैं॥१२-१३॥
घृतपिण्डोपमान् स्थूलांस्तान् द्विजान् भक्षयिष्यथः।
रोहितान् वक्रतुण्डांश्च नलमीनांश्च राघव॥१४॥
पम्पायामिषुभिर्मत्स्यास्तत्र राम वरान् हतान्।
निस्त्वक्पक्षानयस्तप्तानकृशानैककण्टकान्॥१५॥
तव भक्त्या समायुक्तो लक्ष्मणः सम्प्रदास्यति।
‘बाणों के अग्रभाग से जिनके छिलके छुड़ा दिये गये हैं, अतएव जिनमें एक भी काँटा नहीं रह गया है, जो घी के लोदे के समान चिकने तथा आर्द्र हैं सूखे नहीं हैं, जिन्हें लोहमय बाणों के अग्रभाग में गूंथकर आग में सेका और पकाया गया है, ऐसे फल-मूल के ढेर वहाँ भक्ष्य पदार्थ के रूप में उपलब्ध होंगे। आपके प्रति भक्तिभाव से सम्पन्न लक्ष्मण आपको वे भक्ष्य पदार्थ अर्पित करेंगे। आप दोनों भाई उन पदार्थों को लेकर उस सरोवर के मोटे-मोटे सुप्रसिद्ध जलचर पक्षियों तथा श्रेष्ठ रोहित (रोहू), वक्रतुण्ड और नलमीन आदि मत्स्यों को थोड़ा-थोड़ा करके खिलाइयेगा (इससे आपका मनोरञ्जन होगा)॥१४-१५ १/२॥
भृशं तान् खादतो मत्स्यान् पम्पायाः पुष्पसंचये॥१६॥
पद्मगन्धि शिवं वारि सुखशीतमनामयम्।
उद्धृत्य स तदाक्लिष्टं रूप्यस्फटिकसंनिभम्॥१७॥
अथ पुष्करपर्णेन लक्ष्मणः पाययिष्यति।
‘जिस समय आप पम्पासरोवर की पुष्पराशि के समीप मछलियों को भोजन कराने की क्रीड़ा में अत्यन्त संलग्न होंगे, उस समय लक्ष्मण उस सरोवर का कमल की गन्ध से सुवासित, कल्याणकारी, सुखद, शीतल, रोगनाशक, क्लेशहारी तथा चाँदी और स्फटिकमणि के समान स्वच्छ जल कमल के पत्ते में निकालकर लायेंगे और आपको पिलायेंगे॥१६-१७ १/२॥
स्थूलान् गिरिगुहाशय्यान् वानरान् वनचारिणः॥१८॥
सायाले विचरन् राम दर्शयिष्यति लक्ष्मणः।
‘श्रीराम! सायंकाल में आपके साथ विचरते हुए लक्ष्मण आपको उन मोटे-मोटे वनचारी वानरों का दर्शन करायेंगे, जो पर्वतों की गुफाओं में सोते और रहते हैं॥१८ १/२॥
अपां लोभादुपावृत्तान् वृषभानिव नर्दतः॥१९॥
स्थूलान् पीतांश्च पम्पायां द्रक्ष्यसि त्वं नरोत्तम।
‘नरश्रेष्ठ! वे वानर पानी पीने के लोभ से पम्पा के तट पर आकर साँड़ों के समान गर्जते हैं। उनके शरीर मोटे और रंग पीले होते हैं। आप उन सबको वहाँ देखेंगे॥१९ १/२॥
सायाह्ने विचरन् राम विटपी माल्यधारिणः॥२०॥
शिवोदकं च पम्पायां दृष्ट्वा शोकं विहास्यसि।
‘श्रीराम! सायंकाल में चलते समय आप बड़ी-बड़ी शाखावाले, पुष्पधारी वृक्षों तथा पम्पा के शीतल जल का दर्शन करके अपना शोक त्याग देंगे॥२० १/२॥
सुमनोभिश्चितास्तत्र तिलका नक्तमालकाः॥२१॥
उत्पलानि च फुल्लानि पङ्कजानि च राघव।
‘रघुनन्दन! वहाँ फूलों से भरे हुए तिलक और नक्तमाल के वृक्ष शोभा पाते हैं तथा जल के भीतर उत्पल और कमल फूले हुए दिखायी देते हैं॥२१ १/२॥
न तानि कश्चिन्माल्यानि तत्रारोपयिता नरः॥२२॥
न च वै म्लानतां यान्ति न च शीर्यन्ति राघव।
‘रघुनन्दन! कोई भी मनुष्य वहाँ उन फूलों को उतारकर धारण नहीं करता है। (क्योंकि वहाँ तक किसी की पहुँच ही नहीं हो पाती है) पम्पासरोवर के फूल न तो मुरझाते हैं और न झरते ही हैं॥२२ १/२॥
मतङ्गशिष्यास्तत्रासन्नृषयः सुसमाहिताः॥२३॥
तेषां भाराभितप्तानां वन्यमाहरतां गुरोः।
ये प्रपेतुर्महीं तूर्णं शरीरात् स्वेदबिन्दवः॥२४॥
तानि माल्यानि जातानि मुनीनां तपसा तदा।
स्वेदबिन्दुसमुत्थानि न विनश्यन्ति राघव॥२५॥
‘कहते हैं, वहाँ पहले मतंग मुनि के शिष्य ऋषिगण निवास करते थे, जिनका चित्त सदा एकाग्र एवं शान्त रहता था। वे अपने गुरु मतंग मुनि के लिये जब जंगली फल-मूल ले आते और उनके भार से थक जाते, तब उनके शरीर से पृथ्वी पर पसीनों की जो बूंदें गिरती थीं, वे ही उन मुनियों की तपस्या के प्रभाव से तत्काल फूल के रूप में परिणत हो जाती थीं। राघव! पसीनों की बूंदों से उत्पन्न होने के कारण वे फूल नष्ट नहीं होते हैं॥२३–२५॥
तेषां गतानामद्यापि दृश्यते परिचारिणी।
श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी॥२६॥
त्वां तु धर्मे स्थिता नित्यं सर्वभूतनमस्कृतम्।
दृष्ट्वा देवोपमं राम स्वर्गलोकं गमिष्यति॥२७॥
‘वे सब-के-सब ऋषि तो अब चले गये; किंतु उनकी सेवा में रहने वाली तपस्विनी शबरी आज भी वहाँ दिखायी देती है। काकुत्स्थ! शबरी चिरजीवनी होकर सदा धर्म के अनुष्ठान में लगी रहती है। श्रीराम! आप समस्त प्राणियों के लिये नित्य वन्दनीय और देवता के तुल्य हैं। आपका दर्शन करके शबरी स्वर्गलोक (साकेतधाम) को चली जायगी॥२६-२७॥
ततस्तद्राम पम्पायास्तीरमाश्रित्य पश्चिमम्।
आश्रमस्थानमतुलं गुह्यं काकुत्स्थ पश्यसि॥२८॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तदनन्तर आप पम्पा के पश्चिम तट पर जाकर एक अनुपम आश्रम देखेंगे, जो (सर्वसाधारणकी पहुँच के बाहर होने के कारण) गुप्त है॥२८॥
न तत्राक्रमितुं नागाः शक्नुवन्ति तदाश्रमे।
ऋषेस्तस्य मतङ्गस्य विधानात् तच्च काननम्॥२९॥
‘उस आश्रम पर तथा उस वन में मतंग मुनि के प्रभाव से हाथी कभी आक्रमण नहीं कर सकते॥२९॥
मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन।
तस्मिन् नन्दनसंकाशे देवारण्योपमे वने॥३०॥
नानाविहगसंकीर्णे रंस्यसे राम निर्वृतः।
‘रघुनन्दन! वहाँ का जंगल मतंगवन के नाम से प्रसिद्ध है। उस नन्दनतुल्य मनोहर और देववन के समान सुन्दर वन में नाना प्रकार के पक्षी भरे रहते हैं। श्रीराम! आप वहाँ बड़ी प्रसन्नता के साथ सानन्द विचरण करेंगे।
ऋष्यमूकस्तु पम्पायाः पुरस्तात् पुष्पितद्रुमः॥३१॥
सुदुःखारोहणश्चैव शिशुनागाभिरक्षितः।
उदारो ब्रह्मणा चैव पूर्वकालेऽभिनिर्मितः॥३२॥
‘पम्पासरोवर के पूर्वभाग में ऋष्यमूक पर्वत है, जहाँ के वृक्ष फूलों से सुशोभित दिखायी देते हैं। उसके ऊपर चढ़ने में बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि वह छोटे-छोटे सो अथवा हाथियों के बच्चों द्वारा सब ओर से सुरक्षित है। ऋष्यमूक पर्वत उदार (अभीष्ट फल को देने वाला) है। पूर्वकाल में साक्षात् ब्रह्माजी ने उसका निर्माण किया और उसे औदार्य आदि गुणों से सम्पन्न बनाया॥३१-३२॥
शयानः पुरुषो राम तस्य शैलस्य मूर्धनि।
यत् स्वप्नं लभते वित्तं तत् प्रबुद्धोऽधिगच्छति॥३३॥
यस्त्वेनं विषमाचारः पापकर्माधिरोहति।
तत्रैव प्रहरन्त्येनं सुप्तमादाय राक्षसाः॥३४॥
‘श्रीराम! उस पर्वत के शिखर पर सोया हुआ पुरुष सपने में जिस सम्पत्ति को पाता है उसे जागने पर भी प्राप्त कर लेता है। जो पापकर्मी तथा विषम बर्ताव करने वाला पुरुष उस पर्वत पर चढ़ता है, उसे इस पर्वतशिखरपर ही सो जाने पर राक्षस लोग उठाकर उसके ऊपर प्रहार करते हैं॥३३-३४॥
तत्रापि शिशुनागानामाक्रन्दः श्रूयते महान्।
क्रीडतां राम पम्पायां मतङ्गाश्रमवासिनाम्॥३५॥
श्रीराम! मतंग मुनि के आश्रम के आस-पास के वन में रहने और पम्पासरोवर में क्रीडा करने वाले छोटे-छोटे हाथियों के चिग्घाड़ने का महान् शब्द उस पर्वत पर भी सुनायी देता है॥३५॥
सक्ता रुधिरधाराभिः संहत्य परमद्विपाः।
प्रचरन्ति पृथक्कीर्णा मेघवर्णास्तरस्विनः॥३६॥
ते तत्र पीत्वा पानीयं विमलं चारु शोभनम्।
अत्यन्तसुखसंस्पर्श सर्वगन्धसमन्वितम्॥३७॥
निर्वृत्ताः संविगाहन्ते वनानि वनगोचराः।
‘जिनके गण्डस्थलों पर कुछ लाल रंग की मद की धाराएँ बहती हैं, वे वेगशाली और मेघ के समान काले बड़े-बड़े गजराज झुंड-के-झुंड एक साथ होकर दूसरी जातिवाले हाथियों से पृथक् हो वहाँ विचरते रहते हैं। वन में विचरने वाले वे हाथी जब पम्पासरोवर का निर्मल, मनोहर, सुन्दर, छूने में अत्यन्त सुखद तथा सब प्रकार की सुगन्ध से सुवासित जल पीकर लौटते हैं, तब उन वनों में प्रवेश करते हैं॥३६-३७ १/२॥
ऋक्षांश्च दीपिनश्चैव नीलकोमलकप्रभान्॥३८॥
रुरूनपेतानजयान् दृष्ट्वा शोकं प्रहास्यसि।
‘रघुनन्दन! वहाँ रीछों, बाघों और नील कोमल कान्तिवाले मनुष्यों को देखकर भागने वाले तथा दौड़ लगाने में किसी से पराजित न होने वाले मृगों को देखकर आप अपना सारा शोक भूल जायँगे॥३८ १/२॥
राम तस्य तु शैलस्य महती शोभते गुहा॥३९॥
शिलापिधाना काकुत्स्थ दुःखं चास्याः प्रवेशनम्।
‘श्रीराम! उस पर्वत के ऊपर एक बहुत बड़ी गुफा शोभा पाती है, जिसका द्वार पत्थर से ढका है। उसके भीतर प्रवेश करने में बड़ा कष्ट होता है॥३९ १/२॥
तस्या गुहायाः प्राग्द्वारे महान् शीतोदको ह्रदः॥४०॥
बहुमूलफलो रम्यो नानानगसमाकुलः।
‘उस गुफा के पूर्वद्वार पर शीतल जल से भरा हुआ एक बहुत बड़ा कुण्ड है। उसके आस-पास बहुत-से फल और मूल सुलभ हैं तथा वह रमणीय ह्रद नाना प्रकार के वृक्षों से व्याप्त है॥४० १/२॥
तस्यां वसति धर्मात्मा सुग्रीवः सह वानरैः॥४१॥
कदाचिच्छिखरे तस्य पर्वतस्यापि तिष्ठति।
‘धर्मात्मा सुग्रीव वानरों के साथ उसी गुफा में निवास करते हैं। वे कभी-कभी उस पर्वत के शिखर पर भी रहते हैं॥४१ १/२॥
कबन्धस्त्वनुशास्यैवं तावुभौ रामलक्ष्मणौ॥४२॥
स्रग्वी भास्करवर्णाभः खे व्यरोचत वीर्यवान्।
इस प्रकार श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयों को सब बातें बताकर सूर्य के समान तेजस्वी और पराक्रमी कबन्ध दिव्य पुष्पों की माला धारण किये आकाश में प्रकाशित होने लगा॥४२ १/२॥
तं तु खस्थं महाभागं तावुभौ रामलक्ष्मणौ॥४३॥
प्रस्थितौ त्वं व्रजस्वेति वाक्यमचतुरन्तिके।
उस समय वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ से प्रस्थान करने के लिये उद्यत हो आकाश में खड़े हुए महाभाग कबन्ध से उसके निकट खड़े होकर बोले-’अब तुम परम धाम को जाओ’॥४३ १/२॥
गम्यतां कार्यसिद्ध्यर्थमिति तावब्रवीत् स च॥४४॥
सुप्रीतौ तावनुज्ञाप्य कबन्धः प्रस्थितस्तदा॥४५॥
कबन्धने भी उन दोनों भाइयों से कहा-’आपलोग भी अपने कार्य की सिद्धि के लिये यात्रा करें।’ ऐसा कहकर परम प्रसन्न हुए उन दोनों बन्धुओं से आज्ञा ले कबन्ध ने तत्काल प्रस्थान किया॥४४-४५॥
स तत् कबन्धः प्रतिपद्य रूपं वृतः श्रिया भास्वरसर्वदेहः।
निदर्शयन् राममवेक्ष्य खस्थः सख्यं कुरुष्वेति तदाभ्युवाच॥४६॥
कबन्ध अपने पहले रूप को पाकर अद्भुत शोभा से सम्पन्न हो गया। उसका सारा शरीर सूर्य-तुल्य प्रभा से प्रकाशित हो उठा। वह राम की ओर देखकर उन्हें पम्पासरोवर का मार्ग दिखाता हुआ आकाश में ही स्थित होकर बोला-’आप सुग्रीव के साथ मित्रता अवश्य करें’॥६२॥
सर्ग ७४
तौ कबन्धेन तं मागं पम्पाया दर्शितं वने।
आतस्थतुर्दिशं गृह्य प्रतीची नृवरात्मजौ॥१॥
तदनन्तर राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण कबन्ध के बताये हुए पम्पासरोवर के मार्ग का आश्रय ले पश्चिम दिशा की ओर चल दिये॥१॥
तौ शैलेष्वाचितानेकान् क्षौद्रपुष्पफलद्रुमान्।
वीक्षन्तौ जग्मतुर्द्रष्टुं सुग्रीवं रामलक्ष्मणौ॥२॥
दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पर्वतों पर फैले हुए बहुत-से वृक्षों को, जो फूल, फल और मधु से सम्पन्न थे, देखते हुए सुग्रीव से मिलने के लिये आगे बढ़े॥२॥
कृत्वा तु शैलपृष्ठे तु तौ वासं रघुनन्दनौ।
पम्पायाः पश्चिमं तीरं राघवावुपतस्थतुः॥३॥
रात में एक पर्वत-शिखर पर निवास करके रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले वे दोनों रघुवंशी बन्धु पम्पासरोवर के पश्चिम तट पर जा पहुँचे॥३॥
तौ पुष्करिण्याः पम्पायास्तीरमासाद्य पश्चिमम्।
अपश्यतां ततस्तत्र शबर्या रम्यमाश्रमम्॥४॥
पम्पानामक पुष्करिणी के पश्चिम तट पर पहुँचकर उन दोनों भाइयों ने वहाँ शबरी का रमणीय आश्रम देखा॥४॥
तौ तमाश्रममासाद्य द्रुमैर्बहुभिरावृतम्।
सुरम्यमभिवीक्षन्तौ शबरीमभ्युपेयतुः॥५॥
उसकी शोभा निहारते हुए वे दोनों भाई बहुसंख्यक वृक्षों से घिरे हुए उस सुरम्य आश्रम पर जाकर शबरी से मिले॥५॥
तौ दृष्ट्वा तु तदा सिद्धा समुत्थाय कृताञ्जलिः।
पादौ जग्राह रामस्य लक्ष्मणस्य च धीमतः॥६॥
शबरी सिद्ध तपस्विनी थी। उन दोनों भाइयों को आश्रम पर आया देख वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी तथा उसने बुद्धिमान् श्रीराम और लक्ष्मण के चरणों में प्रणाम किया॥६॥
पाद्यमाचमनीयं च सर्वं प्रादाद यथाविधि।
तामुवाच ततो रामः श्रमणी धर्मसंस्थिताम्॥७॥
फिर पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय आदि सब सामग्री समर्पित की और विधिवत् उनका सत्कार किया। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी उस धर्मपरायणा तपस्विनी से बोले-॥७॥
कच्चित्ते निर्जिता विघ्नाः कच्चित्ते वर्धते तपः।
कच्चित्ते नियतः कोप आहारश्च तपोधने॥८॥
‘तपोधने ! क्या तुमने सारे विघ्नों पर विजय पा ली? क्या तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है? क्या तुमने क्रोध और आहार को काबू में कर लिया है ?॥८॥
कच्चित्ते नियमाः प्राप्ताः कच्चित्ते मनसः सुखम्।
कच्चित्ते गुरुशुश्रूषा सफला चारुभाषिणि॥९॥
‘तुमने जिन नियमों को स्वीकार किया है, वे निभ तो जाते हैं न? तुम्हारे मन में सुख और शान्ति है न? चारुभाषिणि! तुमने जो गुरुजनों की सेवा की है, वह पूर्णरूप से सफल हो गयी है न?’॥९॥
रामेण तापसी पृष्टा सा सिद्धा सिद्धसम्मता।
शशंस शबरी वृद्धा रामाय प्रत्यवस्थिता॥१०॥
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर वह सिद्ध तपस्विनी बूढ़ी शबरी, जो सिद्धों के द्वारा सम्मानित थी, उनके सामने खड़ी होकर बोली-॥१०॥
अद्य प्राप्ता तपःसिद्धिस्तव संदर्शनान्मया।
अद्य मे सफलं जन्म गुरवश्च सुपूजिताः॥११॥
‘रघुनन्दन! आज आपका दर्शन मिलने से ही मुझे अपनी तपस्या में सिद्धि प्राप्त हुई है। आज मेरा जन्म सफल हुआ और गुरुजनों की उत्तम पूजा भी सार्थक हो गयी॥११॥
अद्य मे सफलं तप्तं स्वर्गश्चैव भविष्यति।
त्वयि देववरे राम पूजिते पुरुषर्षभ॥१२॥
‘पुरुषप्रवर श्रीराम! आप देवेश्वर का यहाँ सत्कार हुआ, इससे मेरी तपस्या सफल हो गयी और अब मुझे आपके दिव्य धाम की प्राप्ति भी होगी ही॥१२॥
तवाहं चक्षुषा सौम्य पूता सौम्येन मानद।
गमिष्याम्यक्षयांल्लोकांस्त्वत्प्रसादादरिंदम॥१३॥
‘सौम्य! मानद! आपकी सौम्य दृष्टि पड़ने से मैं परम पवित्र हो गयी। शत्रुदमन! आपके प्रसाद से ही अब मैं अक्षय लोकों में जाऊँगी॥१३॥
चित्रकूटं त्वयि प्राप्ते विमानैरतुलप्रभैः।
इतस्ते दिवमारूढा यानहं पर्यचारिषम्॥१४॥
‘जब आप चित्रकूट पर्वत पर पधारे थे, उसी समय मेरे गुरुजन, जिनकी मैं सदा सेवा किया करती थी, अतुल कान्तिमान् विमान पर बैठकर यहाँ से दिव्य-लोक को चले गये॥१४॥
तैश्चाहमुक्ता धर्मज्ञैर्महाभागैर्महर्षिभिः।
आगमिष्यति ते रामः सुपुण्यमिममाश्रमम्॥१५॥
स ते प्रतिग्रहीतव्यः सौमित्रिसहितोऽतिथिः।
तं च दृष्ट्वा वरांल्लोकानक्षयांस्त्वं गमिष्यसि॥१६॥
‘उन धर्मज्ञ महाभाग महर्षियों ने जाते समय मुझसे कहा था कि तेरे इस परम पवित्र आश्रमपर श्रीरामचन्द्रजी पधारेंगे और लक्ष्मण के साथ तेरे अतिथि होंगे। तुम उनका यथावत् सत्कार करना। उनका दर्शन करके तू श्रेष्ठ एवं अक्षय लोकों में जायगी॥१५-१६॥
एवमुक्ता महाभागैस्तदाहं पुरुषर्षभ।
मया तु संचितं वन्यं विविधं पुरुषर्षभ॥१७॥
तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसम्भवम्।
‘पुरुषप्रवर! उन महाभाग महात्माओं ने मुझसे उस समय ऐसी बात कही थी। अतः पुरुषसिंह! मैंने आपके लिये पम्पातटपर उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के जंगली फल-मूलों का संचय किया है’॥१७ १/२॥
एवमुक्तः स धर्मात्मा शबर्या शबरीमिदम्॥१८॥
राघवः प्राह विज्ञाने तां नित्यमबहिष्कृताम्।
शबरी (जाति से वर्णबाह्य होने पर भी) विज्ञान में बहिष्कृत नहीं थी-उसे परमात्मा के तत्त्व का नित्य ज्ञान प्राप्त था। उसकी पूर्वोक्त बातें सुनकर धर्मात्मा श्रीराम ने उससे कहा-॥१८ १/२॥
दनोः सकाशात् तत्त्वेन प्रभावं ते महात्मनाम्॥१९॥
श्रुतं प्रत्यक्षमिच्छामि संद्रष्टुं यदि मन्यसे।
‘तपोधने! मैंने कबन्ध के मुख से तुम्हारे महात्मा गुरुजनों का यथार्थ प्रभाव सुना है। यदि तुम स्वीकार करो तो मैं उनके उस प्रभाव को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ’॥१९ १/२॥
एतत्तु वचनं श्रुत्वा रामवक्त्रविनिःसृतम्॥२०॥
शबरी दर्शयामास तावुभौ तदनं महत्।
श्रीराम के मुख से निकले हुए इस वचन को सुनकर शबरी ने उन दोनों भाइयों को उस महान् वन का दर्शन कराते हुए कहा-॥२० १/२॥
पश्य मेघघनप्रख्यं मृगपक्षिसमाकुलम्॥२१॥
मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन।
‘रघुनन्दन ! मेघों की घटा के समान श्याम और नाना प्रकार के पशु-पक्षियों से भरे हुए इस वन की ओर दृष्टिपात कीजिये। यह मतंगवन के नाम से ही विख्यात है॥२१ १/२॥
इह ते भावितात्मानो गुरवो मे महाद्युते।
जुहवांचक्रिरे नीडं मन्त्रवन्मन्त्रपूजितम्॥२२॥
‘महातेजस्वी श्रीराम ! यहीं वे मेरे भावितात्मा (शुद्ध अन्तःकरण वाले एवं परमात्मचिन्तनपरायण) गुरुजन निवास करते थे। इसी स्थान पर उन्होंने गायत्रीमन्त्र के जप से विशुद्ध हुए अपने देहरूपी पञ्जर को मन्त्रोच्चारणपूर्वक अग्नि में होम दिया था॥२२॥
इयं प्रत्यक्स्थली वेदी यत्र ते मे सुसत्कृताः।
पुष्पोपहारं कुर्वन्ति श्रमादुद्धेपिभिः करैः॥२३॥
‘यह प्रत्यक्स्थली नामवाली वेदी है, जहाँ मेरे द्वारा भलीभाँति पूजित हुए वे महर्षि वृद्धावस्था के कारण श्रम से काँपते हुए हाथों द्वारा देवताओं को फूलों की बलि चढ़ाया करते थे॥२३॥
तेषां तपःप्रभावेण पश्याद्यापि रघूत्तम।
द्योतयन्ती दिशः सर्वाः श्रिया वेद्यतुलप्रभा॥२४॥
‘रघुवंशशिरोमणे! देखिये, उनकी तपस्या के प्रभाव से आज भी यह वेदी अपने तेज के द्वारा सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित कर रही है। इस समय भी इसकी प्रभा अतुलनीय है॥२४॥
अशक्नुवद्भिस्तैर्गन्तुमुपवासश्रमालसैः।
चिन्तितेनागतान् पश्य समेतान् सप्त सागरान्॥२५॥
‘उपवास करने से दुर्बल होने के कारण जब वे चलने-फिरने में असमर्थ हो गये, तब उनके चिन्तनमात्र से वहाँ सात समुद्रों का जल प्रकट हो गया। वह सप्तसागर तीर्थ आज भी मौजूद है। उसमें सातों समुद्रों के जल मिले हुए हैं, उसे चलकर देखिये॥२५॥
कृताभिषेकैस्तैय॑स्ता वल्कलाः पादपेष्विह।
अद्यापि न विशुष्यन्ति प्रदेशे रघुनन्दन॥२६॥
‘रघुनन्दन! उसमें स्नान करके उन्होंने वृक्षों पर जो वल्कल वस्त्र फैला दिये थे, वे इस प्रदेश में अब तक सूखे नहीं हैं॥२६॥
देवकार्याणि कुर्वद्भिर्यानीमानि कृतानि वै।
पुष्पैः कुवलयैः सार्धं म्लानत्वं न तु यान्ति वै॥२७॥
‘देवताओं की पूजा करते हुए मेरे गुरुजनों ने कमलों के साथ अन्य फूलों की जो मालाएँ बनायी थीं, वे आज भी मुरझायी नहीं हैं॥२७॥
कृत्स्नं वनमिदं दृष्टं श्रोतव्यं च श्रुतं त्वया।
तदिच्छाम्यभ्यनुज्ञाता त्यक्ष्याम्येतत् कलेवरम्॥२८॥
‘भगवन् ! आपने सारा वन देख लिया और यहाँ के सम्बन्ध में जो बातें सुनने योग्य थीं, वे भी सुन लीं। अब मैं आपकी आज्ञा लेकर इस देह का परित्याग करना चाहती हूँ॥२८॥
तेषामिच्छाम्यहं गन्तुं समीपं भावितात्मनाम्।
मुनीनामाश्रमो येषामहं च परिचारिणी॥२९॥
‘जिनका यह आश्रम है और जिनके चरणों की मैं दासी रही हूँ, उन्हीं पवित्रात्मा महर्षियों के समीप अब मैं जाना चाहती हूँ’॥२९॥
धर्मिष्ठं तु वचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः।
प्रहर्षमतुलं लेभे आश्चर्यमिति चाब्रवीत्॥३०॥
शबरी के धर्मयुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीराम को अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई। उनके मुँह से निकल पड़ा, ‘आश्चर्य है !’॥३०॥
तामुवाच ततो रामः शबरी संशितव्रताम्।
अर्चितोऽहं त्वया भद्रे गच्छ कामं यथासुखम्॥३१॥
तदनन्तर श्रीराम ने कठोर व्रत का पालन करने वाली शबरी से कहा—’भद्रे! तुमने मेरा बड़ा सत्कार किया। अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार आनन्दपूर्वक अभीष्ट लोक की यात्रा करो’॥३१॥
इत्येवमुक्ता जटिला चीरकृष्णाजिनाम्बरा।
अनुज्ञाता तु रामेण हुत्वाऽऽत्मानं हुताशने॥३२॥
ज्वलत्पावकसंकाशा स्वर्गमेव जगाम ह।
दिव्याभरणसंयुक्ता दिव्यमाल्यानुलेपना॥३३॥
दिव्याम्बरधरा तत्र बभूव प्रियदर्शना।
विराजयन्ती तं देशं विद्युत्सौदामनी यथा॥३४॥
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार आज्ञा देने पर मस्तक पर जटा और शरीर पर चीर एवं काला मृगचर्म धारण करने वाली शबरी ने अपने को आग में होमकर प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी शरीर प्राप्त किया। वह दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण, दिव्य फूलों की माला और दिव्य अनुलेपन धारण किये बड़ी मनोहर दिखायी देने लगी तथा सुदाम पर्वत पर प्रकट होने वाली बिजली के समान उस प्रदेश को प्रकाशित करती हुई स्वर्ग (साकेत) लोक को ही चली गयी। ३२-३४॥
यत्र ते सुकृतात्मानो विहरन्ति महर्षयः।
तत् पुण्यं शबरी स्थानं जगामात्मसमाधिना॥३५॥
उसने अपने चित्त को एकाग्र करके उस पुण्यधाम की यात्रा की, जहाँ उसके वे गुरुजन पुण्यात्मा महर्षि विहार करते थे॥३५॥
सर्ग ७५
दिवं तु तस्यां यातायां शबर्यां स्वेन तेजसा।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा चिन्तयामास राघवः॥१॥
चिन्तयित्वा तु धर्मात्मा प्रभावं तं महात्मनाम्।
हितकारिणमेकाग्रं लक्ष्मणं राघवोऽब्रवीत्॥२॥
अपने तेज से प्रकाशित होने वाली शबरी के दिव्यलोक में चले जाने पर भाई लक्ष्मणसहित धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने उन महात्मा महर्षियों के प्रभाव का चिन्तन किया। चिन्तन करके अपने हित में संलग्न रहने वाले एकाग्रचित्त लक्ष्मण से श्रीराम ने इस प्रकार कहा-॥१-२॥
दृष्टो मयाऽऽश्रमः सौम्य बह्वाश्चर्यः कृतात्मनाम्।
विश्वस्तमृगशार्दूलो नानाविहगसेवितः॥३॥
‘सौम्य! मैंने उन पुण्यात्मा महर्षियों का यह पवित्र आश्रम देखा। यहाँ बहुत-सी आश्चर्यजनक बातें हैं। हरिण और बाघ एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं। नाना प्रकार के पक्षी इस आश्रम का सेवन करते हैं॥३॥
सप्तानां च समुद्राणां तेषां तीर्थेषु लक्ष्मण।
उपस्पृष्टं च विधिवत् पितरश्चापि तर्पिताः॥४॥
प्रणष्टमशुभं यन्नः कल्याणं समुपस्थितम्।
तेन त्वेतत् प्रहृष्टं मे मनो लक्ष्मण सम्प्रति॥५॥
‘लक्ष्मण! यहाँ जो सातों समुद्रों के जल से भरे हुए तीर्थ हैं, उनमें हमने विधिपूर्वक स्नान तथा पितरों का तर्पण किये हैं। इससे हमारा सारा अशुभ नष्ट हो गया और अब हमारे कल्याण का समय उपस्थित हुआ है। सुमित्राकुमार! इससे इस समय मेरे मन में अधिक प्रसन्नता हो रही है॥४-५॥
हृदये मे नरव्याघ्र शुभमाविर्भविष्यति।
तदागच्छ गमिष्यावः पम्पां तां प्रियदर्शनाम्॥६॥
‘नरश्रेष्ठ! अब मेरे हृदय में कोई शुभ संकल्प उठने वाला है इसलिये आओ, अब हम दोनों परम सुन्दर पम्पासरोवर के तट पर चलें॥६॥
ऋष्यमूको गिरिर्यत्र नातिदूरे प्रकाशते।
यस्मिन् वसति धर्मात्मा सुग्रीवोंऽशुमतः सुतः॥७॥
‘वहाँ से थोड़ी ही दूर पर वह ऋष्यमूक पर्वत शोभा पाता है, जिस पर सूर्यपुत्र धर्मात्मा सुग्रीव निवास करते हैं॥७॥
नित्यं वालिभयात् त्रस्तश्चतुर्भिः सह वानरैः।
अहं त्वरे च तं द्रष्टुं सुग्रीवं वानरर्षभम्॥८॥
तदधीनं हि मे कार्यं सीतायाः परिमार्गणम्।
‘वाली के भय से सदा डरे रहने के कारण वे चार वानरों के साथ उस पर्वत पर रहते हैं। मैं वानरश्रेष्ठ सुग्रीव से मिलने के लिये उतावला हो रहा हूँ; क्योंकि सीता के अन्वेषण का कार्य उन्हीं के अधीन है’॥८ १/२॥
इति ब्रुवाणं तं वीरं सौमित्रिरिदमब्रवीत्॥९॥
गच्छावस्त्वरितं तत्र ममापि त्वरते मनः।
इस प्रकार की बात कहते हुए वीर श्रीराम से सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने यों कहा-’भैया! हम दोनों को शीघ्र ही वहाँ चलना चाहिये। मेरा मन भी चलने के लिये उतावला हो रहा है’॥९ १/२॥
आश्रमात्तु ततस्तस्मान्निष्क्रम्य स विशाम्पतिः॥१०॥
आजगाम ततः पम्पां लक्ष्मणेन सह प्रभुः।
समीक्षमाणः पुष्पाढ्यं सर्वतो विपुलद्रुमम्॥११॥
तदनन्तर प्रजापालक भगवान् श्रीराम लक्ष्मण के साथ उस आश्रम से निकलकर सब ओर फूलों से लदे हुए नाना प्रकार के वृक्षों की शोभा निहारते हुए पम्पासरोवर के तट पर आये॥१०-११॥
कोयष्टिभिश्चार्जुनकैः शतपत्रैश्च कीरकैः।
एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नादितं तद् वनं महत्॥१२॥
वह विशाल वन टिट्टिभों, मोरों, कठफोड़वों, तोतों तथा अन्य बहुत-से पक्षियों के कलरवों से गूंज रहा था॥१२॥
स रामो विविधान् वृक्षान् सरांसि विविधानि च।
पश्यन् कामाभिसंतप्तो जगाम परमं ह्रदम्॥१३॥
श्रीराम के मन में सीताजी से मिलने की तीव्र लालसा जाग उठी थी, इससे संतप्त हो वे नाना प्रकार के वृक्षों और भाँति-भाँति के सरोवरों की शोभा देखते हुए उस उत्तम जलाशय के पास गये॥१३॥
स तामासाद्य वै रामो दूरात् पानीयवाहिनीम्।
मतङ्गसरसं नाम ह्रदं समवगाहत॥१४॥
पम्पा नाम से प्रसिद्ध वह सरोवर पीने योग्य स्वच्छ जल बहाने वाला था। श्रीराम दूर देश से चलकर उसके तट पर आये। आकर उन्होंने मतंगसरस नामक कुण्ड में स्नान किया॥१४॥
तत्र जग्मतुरव्यग्रौ राघवौ हि समाहितौ।
स तु शोकसमाविष्टो रामो दशरथात्मजः॥१५॥
विवेश नलिनी रम्यां पंकजैश्च समावृताम्।
वे दोनों रघुवंशी वीर वहाँ शान्त और एकाग्रचित्त होकर पहुँचे थे। सीता के शोक से व्याकुल हुए दशरथनन्दन श्रीराम ने उस रमणीय पुष्करिणी पम्पा में प्रवेश किया, जो कमलों से व्याप्त थी॥१५ १/२॥
तिलकाशोक’नागबकुलोद्दालकाशिनीम्॥१६॥
रम्योपवनसम्बाधां पद्मसम्पीडितोदकाम्।
स्फटिकोपमतोयां तां श्लक्ष्णवालुकसंतताम्॥१७॥
मत्स्यकच्छपसम्बाधां तीरस्थद्रुमशोभिताम्।
सखीभिरिव संयुक्तां लताभिरनुवेष्टिताम्॥१८॥
किंनरोरगगन्धर्वयक्षराक्षससेविताम्।
नानाद्रुमलताकीर्णां शीतवारिनिधिं शुभाम्॥१९॥
उसके तट पर तिलक, अशोक, नागकेसर, वकुल तथा लिसोड़े के वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। भाँतिभाँति के रमणीय उपवनों से वह घिरी हुई थी। उसका जल कमलपुष्पों से आच्छादित था और स्फटिक मणि के समान स्वच्छ दिखायी देता था। जल के नीचे स्वच्छ वालु का फैली हुई थी। मत्स्य और कच्छप उसमें भरे हुए थे। तटवर्ती वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे। सब ओर लताओं द्वारा आवेष्टित होने के कारण वह सखियों से संयुक्त-सी प्रतीत होती थी। किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और राक्षस उसका सेवन करते थे। भाँति-भाँति के वृक्ष और लताओं से व्याप्त हुई पम्पा शीतल जल की सुन्दर निधि प्रतीत होती थी॥१६–१९॥
पद्मसौगन्धिकैस्तानां शुक्लां कुमुदमण्डलैः।
नीलां कुवलयोद्घाटैर्बहुवर्णां कुथामिव॥२०॥
अरुण कमलों से वह ताम्रवर्ण की, कुमुद-कुसुमों के समूह से शुक्लवर्ण की तथा नील कमलों के समुदाय से नीलवर्ण की दिखायी देने के कारण बहुरंगे कालीन के समान शोभा पाती थी॥२०॥
अरविन्दोत्पलवतीं पद्मसौगन्धिकायुताम्।
पुष्पिताम्रवणोपेतां बर्हिणो ष्टनादिताम्॥२१॥
उस पुष्करिणी में अरविन्द और उत्पल खिले थे। पद्म और सौगन्धिक जाति के पुष्प शोभा पाते थे। मौर लगी हुई अमराइयों से वह घिरी हुई थी तथा मयूरों के केकानाद वहाँ गूंज रहे थे॥२१॥
स तां दृष्ट्वा ततः पम्पां रामः सौमित्रिणा सह।
विललाप च तेजस्वी रामो दशरथात्मजः॥२२॥
सुमित्राकुमार लक्ष्मणसहित श्रीराम ने जब उस मनोहर पम्पा को देखा, तब उनके हृदय में सीता की वियोग-व्यथा उद्दीप्त हो उठी; अतः वे तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम वहाँ विलाप करने लगे॥२२॥
तिलकैर्बीजपूरैश्च वटैः शुक्लद्रुमैस्तथा।
पुष्पितैः करवीरैश्च पुंनागैश्च सुपुष्पितैः॥२३॥
मालतीकुन्दगुल्मैश्च भण्डीरैर्निचुलैस्तथा।
अशोकैः सप्तपर्णैश्च कतकैरतिमुक्तकैः॥२४॥
अन्यैश्च विविधैर्वृक्षैः प्रमदामिव शोभिताम्।
अस्यास्तीरे तु पूर्वोक्तः पर्वतो धातुमण्डितः॥२५॥
ऋष्यमूक इति ख्यातश्चित्रपुष्पितपादपः।
तिलक, बिजौरा, वट, लोध, खिले हुए करवीर, पुष्पित नागकेसर, मालती, कुन्द, झाड़ी, भंडीर (बरगद), वञ्जुल, अशोक, छितवन, कतक, माधवी लता तथा अन्य नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित हुई पम्पा भाँति-भाँति की वस्त्रभूषाओं से सजी हुई युवती के समान जान पड़ती थी। उसी के तट पर विविध धातुओं से मण्डित पूर्वोक्त ऋष्यमूक नाम से विख्यात पर्वत सुशोभित था। उसके ऊपर फूलों से भरे हुए विचित्र वृक्ष शोभा दे रहे थे॥२३– २५ १/२॥
हरिर्चाक्षरजोनाम्नः पुत्रस्तस्य महात्मनः॥२६॥
अध्यास्ते तु महावीर्यः सुग्रीव इति विश्रुतः।
ऋक्षरजा नामक महात्मा वानर के पुत्र कपिश्रेष्ठ महापराक्रमी सुग्रीव वहीं निवास करते थे॥२६ १/२॥
सुग्रीवमभिगच्छ त्वं वानरेन्द्रं नरर्षभ॥२७॥
इत्युवाच पुनर्वाक्यं लक्ष्मणं सत्यविक्रमः।
कथं मया विना सीतां शक्यं लक्ष्मण जीवितुम्॥२८॥
उस समय सत्यपराक्रमी श्रीराम ने पुनः लक्ष्मण से कहा-’नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुम वानरराज सुग्रीव के पास चलो, मैं सीता के बिना कैसे जीवित रह सकता हूँ। २७-२८॥
इत्येवमुक्त्वा मदनाभिपीडितः स लक्ष्मणं वाक्यमनन्यचेतनः।
विवेश पम्पां नलिनीमनोरमां तमुत्तमं शोकमुदीरयाणः॥२९॥
ऐसा कहकर सीता के दर्शन की कामना से पीड़ित तथा उनके प्रति अनन्य अनुराग रखने वाले श्रीराम उस महान् शोक को प्रकट करते हुए उस मनोरम पुष्करिणी पम्पा में उतरे॥२९॥
क्रमेण गत्वा प्रविलोकयन् वनं ददर्श पम्पां शुभदर्शकाननाम्।
अनेकनानाविधपक्षिसंकुलां विवेश रामः सह लक्ष्मणेन॥३०॥
वन की शोभा देखते हुए क्रमशः वहाँ जाकर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने पम्पा को देखा। उसके समीपवर्ती कानन बड़े सुन्दर और दर्शनीय थे। अनेक प्रकार के झुंड-के-झुंड पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे। भाईसहित श्रीरघुनाथजी ने पम्पा के जल में प्रवेश किया॥३०॥

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