आप सभी ने मध्यप्रदेश के धार में स्थित भोजशाला विवाद के बारे में सुना होगा। आज इस लेख में हम इसके पूरे इतिहास के विषय में जानेंगे। इस भोजशाला का सीधा सम्बन्ध भारत के सबसे महान राजाओं में से एक राजा भोज से है जो आज से लगभग १००० वर्ष पूर्व मालवा साम्राज्य के राजा बने थे और धार ही उनके राज्य की राजधानी थी। उन्होंने अपने शासनकाल में धार में एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय की स्थापना की और वही बाद में उनके नाम पर 'भोजशाला' के नाम से जाना जाने लगा।
इसकी कहानी भी बहुत हद तक अयोध्या के राम मंदिर की तरह ही है जिसपर मुस्लिमों ने अधिकार किया, इसे तोडा और नष्ट किया और अब इस पर अपना अधिकार बताते हैं। मुस्लिम पक्ष इस मंदिर को कमाल मौला मस्जिद बताता है। हालाँकि इस मंदिर के स्तम्भों पर संस्कृत और प्राकृत भाषा के कई श्लोक, स्तुतियां और स्तोत्र उकेरे गए जो माता सरस्वती के अतिरिक्त और भी कई देवी-देवताओं से सम्बंधित है। इस मंदिर की वास्तुकला भी परमार साम्राज्य के समय की है, ऐसा आज भी साफ़-साफ़ देखा जा सकता है।
- इस भोजशाला की स्थापना राजा भोज ने सन १०३४ में की थी।
- चूँकि ये एक संस्कृत विश्वविद्यालय था इसीलिए सन १०३५ में ४० दिनों के यज्ञ के बाद देश भर के राजाओं के समक्ष ही राजा भोज ने माता वाग्देवी की एक भव्य प्रतिमा यहाँ स्थापित की।
- सन १०३५ से १३०६ तक कई महान विद्वानों ने यहाँ अध्ययन किया जिनमें कालिदास, भवभूति, भास्करभट्ट, धनपाल, मानतुंगाचार्य, बाणभट्ट आदि प्रसिद्ध हैं।
- सन १२६९ में एक सूफी मौलवी कमालुद्दीन चिश्ती धार आया। कहा जाता है कि वो अगले ३६ वर्षों तक धार में ही रहा और उसने कई तरीकों से हिंदुओं को इस्लाम धर्म कबूल करवाने का प्रयास करवाया। ३६ वर्षों में उसने धार, भोजशाला और आस-पास के इलाकों और मंदिरों के गहराई से समझा और सन १३०४ के अंत में उसने अलाउद्दीन खिलजी से धार पर आक्रमण करने के लिए सहायता मांगी। उसने अलाउद्दीन को धार और भोजशाला के विषय में सारी जानकारियां भी दी।
- कमालुद्दीन की सूचना पर अलाउद्दीन ने सन १३०५ में अपनी सेना के साथ धार पर आक्रमण किया। उसके आक्रमण से जनता की रक्षा के लिए उस समय के तत्कालीन राजा महाराज महाकाल देव ने अपनी छोटी से सेना लेकर अलाउद्दीन की सेना का सामना किया। उस युद्ध में मुस्लिम सेना की क्षति तो हुई लेकिन बहुत बड़ी सेना होने के कारण अंततः महाराज महाकाल देव अपनी सेना सहित वीरगति को प्राप्त हुए और धार पर मुस्लिमों का कब्ज़ा हो गया।
- इसके बाद अलाउद्दीन अपनी सेना लेकर भोजशाला में घुसा और वहां के छात्रों और शिक्षकों को जबरन इस्लाम कबूल करने के लिए कहा। ऐसा कहा जाता है कि उनके मना करने पर अलाउद्दीन ने करीब १२०० हिन्दू छात्रों और शिक्षकों की हत्या करवा दी। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी कमालुद्दीन चिस्ती को धार में धर्म परिवर्तन के काम को जारी रखने का निर्देश देकर वापस लौट गया।
- कमालुद्दीन चिस्ती धार में अलाउद्दीन की सेना की सहायता से अपने धर्म परिवर्तन के कार्य को अगले २६ वर्षों तक करता रहा। सन १३०६ में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति अयन-अल-मुल्क मुल्तानी ने वहाँ एक मस्जिद का निर्माण करवाना आरम्भ किया किन्तु हिन्दुओं के विरोध के कारण उसके निर्माण में बहुत विलम्ब हुआ। हजारों हिन्दुओं के बलिदान के बाद भी मुल्तानी केवल उस मस्जिद का ढांचा ही बना पाया।
- सन १३३० में मुल्तानी ने कमालुद्दीन को वहां का मौलाना बना दिया। सन १३३१ में कमालुद्दीन की भी मृत्यु हो गई और इसके बाद भोजशाला के निकट ही उसकी दरगाह बना दी गई। इसका वर्णन एक पुस्तक 'बुज़ुर्गानदीन-ए-मालवा' में भी किया गया है।
- भोजशाला के स्तम्भों और दीवारों पर कमल एवं अन्य धार्मिक चिह्नों के ऊपर १३९३ में मालवा के तत्कालीन गवर्नर दिलावर खान ने मुस्लिम चिह्न बनवा दिए पर फिर भी हिन्दू प्रतीकों को वो पूरी तरह छिपा नहीं पाया।
- फिर दिलावर खान ने ही सन १४०१ में धार के सूर्य मार्तण्ड मंदिर, जो वर्तमान भोजशाला से सिर्फ १ किलोमीटर दूर है, उसे भयंकर कत्लेआम के बाद तुड़वा दिया। इसके बाद उसने वहां पर एक मस्जिद बनवा दी जो आज 'लाट मस्जिद' के नाम से जाना जाता है।
- सन १५१४ में महमूदशाह खिलजी ने फिर से भोजशाला पर आक्रमण किया और उस अधूरी मस्जिद को पूरा करने का प्रयास किया। उसने भी हजारो हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया और सरस्वती मंदिर के बाहर की जमीन पर मस्जिद का काम पूरा करवाया जो आज कमाल मौला मस्जिद के नाम से जानी जाती है। इस तरह कमालुद्दीन की मृत्यु के लगभग २०० साल के बाद वो मस्जिद बन पाया। इसके बाद महमूदशाह खिलजी अगले ३८ वर्षों तक धार में रहा और हिन्दुओं पर अत्याचार करता रहा।
- सन १५५२ में एक राजपूत राजा मेदनी राय ने धार के हिन्दुओं को एकत्रित कर महमूदशाह खिलजी पर आक्रमण किया जिसमें वो पराजित हुआ और धार छोड़ कर भाग गया। ९०० से भी अधिक मुस्लिम सूबेदारों को हिन्दुओं ने धार किले में कैद कर लिया।
- उनकी निगरानी के लिए नियुक्त किए गए सैनिकों में से एक था सईद मसूद अब्दुल समरकंदी। उसने गद्दारी की और २५ मार्च १५५२ को उसने सभी सूबेदारों को कैद से भगा दिया। बाद में उसे मृत्युदंड दिया गया और आज तक उसे 'बंदी छोड़ दाता' के नाम से जाना जाता है।
- सन १७०३ में मराठाओं ने मुगलों पर आक्रमण किया और मालवा प्रदेश को जीत लिया। इसके बाद अगले १२३ वर्षों तक मराठाओं का राज्य इस प्रदेश पर रहा।
- फिर सन १८२६ में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मालवा पर कब्जा कर लिया। दुर्भाग्य से उन्होंने भी भोजशाला और आस-पास के प्रदेशों पर हमला किया और कई मूर्तियों को नष्ट कर दिया।
- सन १८७५ में अंग्रेज पुरातत्ववेत्ताओं ने भोजशाला में खुदाई करवाई जहाँ से माता वाग्देवी, जिसे उस समय अम्बिका यक्षिणी का नाम दिया गया, की मूर्ति निकली।
- १८९३ में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित माइकल विलिस के रिसर्च पेपर 'धार, भोज और सरस्वती' के अनुसार 'भोजशाला' शब्द का उपयोग पहली बार जर्मन भारतविद एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने में किया था।
- सन १९०२ में इस मंदिर में माता सरस्वती की जो प्राचीन मूर्ति थी, उसे लार्ड कर्जन ने अपने कब्जे में ले लिया और उसे लन्दन के संग्रहालय में रखवा दिया।
- सन १९३० में मुग़ल साम्राज्य ख़त्म होने के बाद पहली बार मुस्लिमों ने भोजशाला में नमाज पढ़ने का प्रयास किया। वे भोजशाला में घुसे अवश्य लेकिन आर्य समाज और हिन्दू महासभा के हिन्दू कार्यकर्ताओं ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
- १९३६ में मुस्लिमों ने फिर ऐसा करने का प्रयास किया जिसे हिन्दुओं ने पुनः रोक दिया। इससे दोनों धर्मों के बीच विवाद बढ़ा जो सन १९४२ तक चला।
- आजादी के बाद १९५२ में भारत सरकार ने भोजशाला को भारतीय पुरातत्व विभाग के अंतर्गत डाल दिया।
- इसी वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू महासभा के नेतृत्व में धार में हिन्दुओं ने श्री महाराजा भोज स्मृति वनोत्सव समिति का गठन किया।
- सन १९६० में प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर ने लन्दन का दौरा किया। वहां उन्होंने संग्रहालय में वाग्देवी की प्रतिमा देखी। उन्होंने वहां कई आलेख लिखे और ये सिद्ध किया कि ये प्रतिमा भोजशाला की ही है। अपने स्तर पर उन्होंने प्रतिमा को वापस भारत लाने का प्रयास किया पर विफल रहे।
- भारत लौटने के बाद सन १९६१ को वे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिले ताकि वो प्रतिमा वापस भारत लाई जा सके किन्तु उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता नहीं मिली।
- फिर सन १९७७ में डॉ वाकणकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से भी इसी विषय पर भेंट की पर उन्होंने भी उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया।
- सन १९९७ तक हिन्दू भोजशाला में पूजा करने के लिए स्वतंत्र थे किन्तु १२ मार्च १९९७ को मध्यप्रदेश के कांग्रेस सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सरकारी फरमान निकाल कर हिन्दुओं की पूजा पर रोक लगा दी। वहीं दूसरी ओर मुस्लिमों को हर शुक्रवार भोजशाला में नमाज पढ़ने की स्वतंत्रता दे दी गई। यही नहीं, सरकार ने भोजशाला में हिन्दुओं के प्रवेश पर भी रोक लगा दी। बाद में विवाद बढ़ने पर हिन्दुओं को साल में केवल एक दिन वसंत पंचमी के पर्व पर भोजशाला में प्रवेश करने की अनुमति मिली।
- सन २००२ में तत्कालीन दिग्विजय सरकार ने वसंत पंचमी के दिन ही कमाल मौलाना के जन्मदिन की घोषणा की और हिन्दुओं को १ बजे से पहले पूजा समाप्त करने का आदेश दिया ताकि उसके बाद कव्वाली का कार्यक्रम किया जा सके। इससे हिन्दू भड़क गए और भोजशाला के अंदर देर तक पूजा करते रहे। इससे क्रोधित होकर सरकार ने पुलिस को भीड़ पर लाठी चार्ज करने के आदेश दिया। पुलिस ने ऐसा ही किया जिसमें अनेक लोग घायल हुए। उन्होंने औरतों और बच्चों को भी नहीं छोड़ा। इतने अत्याचार के बाद भी हिन्दू वहां से नहीं निकले और शाम को माता सरस्वती की महा आरती की।
- सन २००२ में जो हुआ उससे क्रोधित होकर हिन्दुओं ने सन २००३ में भव्य रूप से वसंत पंचमी के त्यौहार को मनाने का निश्चय किया। पहली बार वसंत पंचमी पर अनेकों स्थानों पर भव्य रथ यात्रा निकाली गई। सरकार ने भीड़ को नियंत्रित करने का बहुत प्रयास किया लेकिन फिर भी १ लाख से अधिक हिन्दुओं ने ६ फरवरी २००३ को भोजशाला में सरस्वती पूजा की। उसी दिन विश्व हिन्दू परिषद् के प्रवीण तोगड़िया ने सरकार को १८ फरवरी तक भोजशाला को खाली करने की चेतावनी दी।
- इससे घबरा कर कांग्रेस सरकार ने १८ फ़रवरी २००३ को धार में धारा १४४ (कर्फ्यू) लगा दिया। हिन्दू भक्तों पर लाठियां चलाई गयी जिसमें सरकारी आकड़ों के अनुसार २३ हिन्दू गंभीर रूप से घायल हुए।
- अगले दिन १९ फरवरी २००३ को भी सरकार ने धारा १४४ लागू रखा। जब हिन्दू भीड़ भोजशाला की ओर जा रही थी तो सरकार ने उन पर लाठीचार्ज और गोलीबारी करवाई। इससे ३५ हिन्दू गंभीर रूप से घायल हुए और २ हिन्दुओं की मृत्यु भी हो गई।
- इस पर भी हिन्दुओं का विरोध कम नहीं हुआ और अंततः ८ अप्रैल २००३ को सरकार को हिन्दुओं को प्रतिदिन दर्शन करने और हर मंगलवार के दिन पूजा करने की अनुमति देनी पड़ी।
- इससे पहले ३१ मार्च २००३ को भाजपा के विपक्ष के नेता शिवराज चौहान ने तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय के नीतियों की आलोचना की और भोजशाला को मंदिर बताया। लेकिन २००६ में वसंत पंचमी के दिन जब वे स्वयं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने भी वसंत पंचमी पर जुम्मे की नमाज को प्राथमिकता दी। इस वर्ष दोनों शुक्रवार को ही पड़े और हिन्दुओं ने प्रार्थना की कि आज सारा दिन उन्हें भोजशाला में वसंत पंचमी का पर्व मानाने की अनुमति दी जाये और मुस्लिमों को कहीं और नमाज पढ़ने को कहा जाये, पर बीजेपी सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी। हिन्दू भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और सैकड़ों हिन्दू घायल हुए। ऐसा ही कुछ २०१३ और २०१६ में देखने मिला जब वसंत पंचमी का पर्व शुक्रवार को पड़ा।
- २०१२ में जब हिन्दुओं ने वसंत पंचमी के दिन माता वाग्देवी की एक मूर्ति की पालकी यात्रा निकालने और उस मूर्ति को भोजशाला में स्थापित करने का अनुरोध किया। लेकिन बीजेपी सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी। माता वाग्देवी की मूर्ति को अधिकार में लेकर सरकार द्वारा उसे ग्वालियर जेल में रख दिया गया। इसके विरुद्ध हिन्दू जागरण मंच के नवलकिशोर शर्मा ने आमरण अनशन किया किन्तु उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया।
- २०२२ में हिन्दू फ़्रंट फॉर जस्टिस की ओर से कोर्ट में एक याचिका डाली गयी जिसमें ये तय करने का अनुरोध किया गया कि वास्तव में भोजशाला मंदिर है या मस्जिद।
- इस याचिका को सुनते हुए ११ मार्च २०२४ को उच्च न्यायलय ने भारतीय पुरातत्व विभाग को इसकी जाँच करने की जिम्मेदारी सौंपी।
- उच्च न्यायलय के आदेश पर भारतीय पुरातत्व विभाग ने ९८ दिनों तक भोजशाला की जाँच की और १५ जुलाई २०२४ को अपनी २००० से अधिक पृष्ठों की रिपोर्ट उच्च न्यायलय को सौंपी। इस रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि भोजशाला के अंदर चांदी, तांबे, अल्युमिनियम और स्टील के करीब ३१ सिक्के पाए गए जो १०वीं से १६वीं शताब्दी के बीच के हैं और परमार वंश के राजाओं के समय के हैं। इसके अतिरिक्त भोजशाला में ९४ मूर्तियाँ और प्रतिमाओं के टुकड़े भी मिले हैं। इन पर भगवान गणेश, ब्रह्मा नरसिंह, भैरव और तमाम देवी-देवताओं की आकृतियाँ बनी हुई हैं। कुछ प्रतिमाओं पर शेर, बाघ जैसे जानवरों और पक्षियों की आकृतियाँ भी उकेरी हुई हैं। इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि यहाँ पर संस्कृत और प्राकृत भाषा के कई शिलालेख भी मिले।
- इन साक्ष्यों के आधार पर ६ अप्रैल २०२६ से १२ मई २०२६ तक लगातार उच्च न्यायालय की सुनवाई चली। इसके बाद न्यायालय ने माना कि भोजशाला वास्तव में एक मंदिर ही था जिसे बाद में मस्जिद में बदलने के प्रयास किये गए। इस पर मुस्लिम पक्ष ने न्यायालय पर पक्षपात का आरोप लगाया किन्तु न्यायालय ने कहा कि भारतीय पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट वैज्ञानिक तरीके से बनाई गयी है और इस टीम में कई पुरातत्ववेत्ता मुस्लिम भी थे।
- अंततः १५ मई २०२६ को उच्च न्यायालय ने ये निर्णय दिया कि भोजशाला कभी भी मस्जिद नहीं था और ये हमेशा से एक मंदिर ही था। इसके बाद हिन्दुओं को स्थायी रूप से इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने का अधिकार दिया गया।
- मुस्लिम पक्षकारों ने इस पर आपत्ति जताई है और कहा है कि वे इस फैसले को चुनौती देंगे। वे इसके लिए स्वतंत्र हैं लेकिन जितने अधिक साक्ष्य भोजशाला के मंदिर के पक्ष में है, उनका सुप्रीम कोर्ट में जीतना बहुत ही मुश्किल है।

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