क्या द्रौपदी ने कभी दुर्योधन का अपमान किया था?

क्या द्रौपदी ने कभी दुर्योधन का अपमान किया था?
महाभारत के सन्दर्भ में एक जो बहुत बड़ी भ्रान्ति द्रौपदी और दुर्योधन के बारे में है वो ये है कि इंद्रप्रस्थ में द्रौपदी ने दुर्योधन का अपमान किया था। लगभग सभी लोगों का ऐसा मानना है कि इंद्रप्रस्थ के मयाभावन में जब दुर्योधन मायानिर्मित सरोवर में गिर पड़ा, तब द्रौपदी ने हँसते हुए उसे "अंधे का पुत्र अँधा" कहकर अपमानित किया। हालाँकि द्रौपदी ने ऐसा परिहास में कहा लेकिन दुर्योधन उस बात को कभी भूला नहीं।

ये घटना लोगों के मन में ऐसी रच बस गयी है कि लोग इसे ही सही मानने लगे हैं। आज कल के टीवी सीरियल तो खैर हमारे धर्म ग्रंथों का बेडा गर्क करने में लगे ही हुए हैं लेकिन दुःख की बात है कि महाभारत पर बने सर्वश्रेष्ठ सीरियल, १९८८ में बी.आर. चोपड़ा की महाभारत में भी ऐसा ही दिखाया गया है। लेकिन ये बात बिल्कुल गलत है। द्रौपदी ने कभी भी दुर्योधन का अपमान नहीं किया था।

द्रौपदी महाभारत काल की सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित महिलाओं में से एक थी। इसके साथ ही वो कुरुकुल की कुलवधू भी थी। ऐसी सम्मानित महिला के मुख से ऐसी गलत बात निकलना संभव ही नहीं है। यदि आप महाभारत पढ़ेंगे तो आपको इस बात का पता चलेगा कि वास्तव में द्रौपदी ने कभी ऐसी बात नहीं की। वो तो उस मयाभावन में उपस्थित भी नहीं थी जब दुर्योधन माया सरोवर में गिरा था।

महाभारत के सभापर्व के अंतर्गत द्युत उप-पर्व के ४७वें अध्याय में हमें इसके बारे में पता चलता है। इसके अनुसार दुर्योधन ने शकुनि के साथ उस पूरी सभा का निरिक्षण किया। उसने वहां वो सारी चीजें देखी जो उसने हस्तिनापुर में कभी नहीं देखी थी। इसके बाद उसे एक जगह जल होने का आभास हुआ तो उसने अपने वस्त्र उठा लिए किन्तु वो जल नहीं बल्कि ठोस भूमि थी।

जब वो आगे गया तो एक जल से भरी हुई बावली को भूमि मानकर वो उसपर उतरा। इससे वो वस्त्र सहित उसी बावली के जल में गिर पड़ा। उसे इस प्रकार जल में गिरा देख कर भीमसेन हंसने लगे। साथ ही भीमसेन के सेवक भी दुर्योधन की वो दशा देख कर हंसने लगे। फिर भीमसेन की आज्ञा से उन्होंने दुर्योधन को नए वस्त्र दिए। दुर्योधन की ऐसी दशा देख कर भीम के साथ साथ अर्जुन, नकुल और सहदेव भी जोर जोर से हंसने लगे।

उनकी हंसी से दुर्योधन बहुत अपमानित हुआ और उनकी ओर ना देख कर वहां से चला गया। आगे जाकर उसे एक खुला दरवाजा दिखा जो वास्तव में बंद था। उससे निकलने के चक्कर में दुर्योधन का सर उस दरवाजे से टकरा गया। आगे चल कर उसे एक बंद दरवाजा दिखा जो वास्तव में खुला था। जब दुर्योधन ने उसे धक्का देना चाहा तो द्वार के उस पर गिर पड़ा। इसके आगे भी उसे एक बड़ा फाटक दिखा लेकिन उसके साथ और कोई दुर्घटना ना हो इसी भय से वो वही से वापस लौट गया। इस प्रकार खिन्न होकर दुर्योधन ने अंततः युधिष्ठिर से आज्ञा ली और फिर अप्रसन्न मन से वापस लौट गया।

तो यहाँ हम देख सकते हैं कि इस पूरे प्रसंग में द्रौपदी का कहीं वर्णन भी नहीं है। तो अब प्रश्न आता है कि ये "अंधे का पुत्र अँधा" वाली बात कहाँ से आ गयी? तो इसका बेडा गर्क भी श्री शिवजी सावंत ने अपने भ्रामक ग्रन्थ मृत्युंजय में किया है। मृत्युंजय में ही उन्होंने ऐसा लिख दिया है कि जब दुर्योधन उस सरोवर में गिरा तो द्रौपदी ने हँसते हुए उसे "अंधे का पुत्र अँधा" कहकर अपमानित किया।

वास्तव में आज महाभारत, विशेषकर कर्ण के विषय में जितनी भी गलत जानकारियां समाज में फैली हैं वो श्री शिवजी सावंत और मृत्युंजय उपन्यास के कारण ही फैली है। इस ग्रन्थ से उन्होंने महाभारत के विषय में गलत जानकारियों का एक ऐसा पिटारा खोल दिया जो पूरे समाज को भ्रमित कर रहा है।

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