शनिवार, नवंबर 30, 2019

गयासुर - १

पिछले लेख में आपने महर्षि मरीचि की सती पत्नी और धर्मराज की पुत्री धर्मव्रता के बारे में पढ़ा जो उनके श्राप के कारण एक शिला में परिणत हो गयी। बाद में ब्रह्मदेव की आज्ञा के अनुसार धर्मराज ने शिलरूपी अपनी पुत्री को धर्मपुरी में रख दिया। इसी कथा से सम्बद्ध एक और कथा आती है जो गयासुर की है। दैत्यकुल में एक से एक दुर्दांत दैत्य हुए किन्तु जिस प्रकार कीचड में ही कमल खिलता है, उसी प्रकार दैत्य कुल ने महान भगवत भक्त भी इस संसार को दिए। प्रह्लाद, बलि इत्यादि भक्तों के श्रेणी में ही गय नामक दैत्य भी था।

गुरुवार, नवंबर 28, 2019

धर्मव्रता - ३

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महर्षि मरीचि बिना जाने-बूझे अपनी पत्नी धर्मव्रता को शिला बनने का श्राप दे देते हैं। इससे क्रोधित होकर धर्मव्रता भी मरीचि को श्राप दे देती है कि उन्हें भी भगवान शंकर का श्राप झेलना होगा। ये सुनकर ब्रह्मदेव व्यथित होकर वहाँ से चले जाते हैं। अब आगे...

मंगलवार, नवंबर 26, 2019

धर्मव्रता - २

पिछले लेख में हमने धर्मराज की पुत्री ऊर्णा (धर्मव्रता) के बारे में पढ़ा जो वर प्राप्ति के लिए घोर तपस्या करती हैं। उनकी भेंट ब्रह्मदेव के मानस पुत्र और सप्तर्षियों में से एक महर्षि मरीचि से होती है। मरीचि धर्मव्रता से विवाह करने की इच्छा प्रकट करते हैं और फिर धर्मव्रता के अनुरोध पर वे उनके पिता धर्मराज के पास जाते हैं और उनसे उनकी सहमति प्राप्त करते हैं। इसके बाद दोनों का विधिवत विवाह हो जाता है। अब आगे... 

विवाह के पश्चात कुछ काल उन्होंने बड़े सुख से बिताया। कुछ दिन के पश्चात एक दिन महर्षि मरीचि कही बाहर से अपने आश्रम आये। वे बड़े श्रमित थे और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। वे आते ही शैय्या पर लेट गए और धर्मव्रता से कहा - "प्रिये! आज मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है और मैं बहुत थका हुआ भी हूँ। मैं विश्राम करता हूँ और तुम कृपया मेरी पाद-सेवा करो। जब तक मैं सोकर ना उठूं, तुम उसी प्रकार मेरी पाद-सेवा करती रहना।"

रविवार, नवंबर 24, 2019

धर्मव्रता - १

धर्मव्रता सप्तर्षियों में से प्रथम महर्षि मरीचि की धर्मपत्नी है। पुराणों में महर्षि मरीचि की तीन पत्नियों का वर्णन है। उनकी एक पत्नी प्रजापति दक्ष की कन्या सम्भूति थी। उनकी दूसरी पत्नी का नाम कला था और तीसरी पत्नी धर्मराज की कन्या ऊर्णा थी। ऊर्णा को ही धर्मव्रता कहा जाता है। इनकी माता का नाम विश्वरूप बताया गया है। जब धर्मव्रता बड़ी हुई तो उसके पिता धर्मराज ने उसके लिए योग्य वर ढूँढना चाहा किन्तु अपनी पुत्री के लिए उन्हें कोई योग्य वर नहीं मिला। तब धर्मराज ने अपनी पुत्री को वर प्राप्ति हेतु तपस्या करने को कहा।

अपने पिता की आज्ञा अनुसार धर्मव्रता वन में जाकर वर प्राप्ति हेतु तपस्या करने लगी। उसी समय भ्रमण करते हुए महर्षि मरीचि वहाँ आ पहुँचे। एक सुन्दर कन्या को इस प्रकार गहन वन में तपस्या करते देख उन्होंने उससे उसका परिचय पूछा। तब धर्मव्रता ने बताया कि वो धर्मराज की कन्या ऊर्णा है और वर प्राप्ति हेतु यहाँ इस जंगल में तपस्या कर रही है। 

शुक्रवार, नवंबर 22, 2019

प्रतिशोध गाथा - ४: देवराज की कृपा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि यवक्रीत परावसु की पत्नी से काम याचना करता है जिससे क्रोधित होकर रैभ्य ऋषि कृत्य का आह्वान करते हैं। यवक्रीत सोचता है कि वो कृत्य को परास्त कर देगा किन्तु ऐसा नहीं हो पता है और अंततः कृत्य के हाथों उसकी मृत्यु हो जाती है। जब भारद्वाज ऋषि को इस बात का पता चलता है तो वो क्रोधित होकर रैभ्य को श्राप दे देते हैं। अब आगे... 

बुधवार, नवंबर 20, 2019

प्रतिशोध गाथा - ३: कृत्य का आह्वान

कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के कारण पिछले कुछ दिनों से कोई लेख नहीं प्रकाशित पाया, इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार यवक्रीत ने अपने हठ से, जो उसके योग्य ना था, उस ज्ञान को देवराज इंद्र से प्राप्त कर लिया। देवराज ने हालाँकि उसके हठ के कारण उसे वरदान अवश्य दिया किन्तु वे जानते थे कि इस प्रकार प्राप्त वरदान से किसी का कल्याण नहीं होता और यवक्रीत को भी इसका मूल्य चुकाना पड़ेगा।

जब यवक्रीत लौट कर आया तब तक सभी जगह ये प्रसिद्ध हो चुका था कि उसने इंद्र को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त किया है। अब विद्वानों की सभाओं में उसकी भी पूछ होने लगी। जब कोई व्यक्ति लगन और कड़े परिश्रम से स्वयं को प्रशंसा के योग्य बनाता है तो उसे ये ज्ञात रहता है कि उसे कोई सम्मान क्यों दे रहा है। यही कारण है कि उनके व्यहवार में स्थिरता होती है। किन्तु यवक्रीत के साथ ऐसा नहीं था। उसे वरदान उसके हठ के कारण प्राप्त हुआ था। यही कारण था कि शीघ्र ही यवक्रीत के मन में घमंड ने अपना घर कर लिया। अब वो अपने समक्ष किसी को कुछ ना समझने लगा।

बुधवार, नवंबर 13, 2019

प्रतिशोध गाथा - २: यवक्रीत का हठ

पिछले लेख में आपने रैभ्य और भारद्वाज ऋषि के बीच की मित्रता के बारे में पढ़ा। जहाँ रैभ्य के पुत्र परावसु एवं अर्वावसु विद्वान थे वहीँ भारद्वाज का पुत्र यवक्रीत को शिक्षा प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं थी। परावसु को वहाँ के राजा ७ वर्षो के यज्ञ को करवाने हेतु अपने साथ ले गए। उधर दूसरों द्वारा सम्मान ना प्राप्त होने के कारण यवक्रीत भी तपस्या करने वन को चले गए।

सोमवार, नवंबर 11, 2019

प्रतिशोध गाथा - १: दो ऋषियों की मित्रता

कथा महाभारत के वन पर्व की है। युधिष्ठिर अपना सारा राज पाठ द्युत में हार कर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ १२ वर्षों के लिए वन चले गए। वहाँ सभी भाई, विशेषकर युधिष्ठिर ऋषियों-महर्षियों के सानिध्य में अपना दिन काट रहे थे। उनसे मिली शिक्षा उनके मनोबल को और दृढ करती थी। उसी समय लोमश ऋषि घुमते हुए उनके आश्रम में आये। सभी भाइयों ने उनकी बड़ी सेवा की। लोमश ऋषि ने उनसे उनका हाल समाचार पूछा।

शनिवार, नवंबर 09, 2019

भृंगी - २: जिसके कारण विश्व को अर्धनारीश्वर के दर्शन हुए

पिछले लेख में आपने भगवान शिव के गण भृंगी के विषय में पढ़ा। आपने ये भी जाना कि किस प्रकार भृंगी की भक्ति केवल और केवल महादेव के प्रति थी और उनके अतिरिक्त उसे कुछ और दिखाई नहीं देता था। महादेव के प्रति उसकी भक्ति इतनी अधिक थी कि वो स्वयं माता पार्वती की भी आराधना नहीं करते थे। वे माता को भगवान शिव से अलग मानते थे और उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं था कि दोनों वास्तव में एक ही हैं।

गुरुवार, नवंबर 07, 2019

भृंगी - १: तीन पैरों वाला महादेव का महान भक्त

जब भी भगवान शिव के गणों की बात होती है तो उनमें नंदी, भृंगी, श्रृंगी इत्यादि का वर्णन आता ही है। हिन्दू धर्म में नंदी एक बहुत ही प्रसिद्ध शिवगण हैं जिनके बारे में हमारे ग्रंथों में बहुत कुछ लिखा गया है। नंदी की भांति ही भृंगी भी शिव के महान गण और तपस्वी हैं किन्तु दुर्भाग्यवश उनके बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं मिलती है। भृंगी को तीन पैरों वाला गण कहा गया है। कवि तुलसीदास जी ने भगवान शिव का वर्णन करते हुए भृंगी के बारे में लिखा है -

"बिनुपद होए कोई। बहुपद बाहु।।" 

अर्थात: शिवगणों में कोई बिना पैरों के तो कोई कई पैरों वाले थे। यहाँ कई पैरों वाले से तुलसीदास जी का अर्थ भृंगी से ही है।

मंगलवार, नवंबर 05, 2019

सोमरस

आपने कई जगह सोमरस के विषय में पढ़ा या सुना होगा। अधिकतर लोग ये समझते हैं कि सोमरस का अर्थ मदिरा या शराब होता है जो कि बिलकुल गलत है। कई लोगों का ये भी मानना है कि अमृत का ही दूसरा नाम सोमरस है। ऐसा लोग इस लिए भी सोचते हैं क्यूंकि हमारे विभिन्न ग्रंथों में कई जगह देवताओं को सोमरस का पान करते हुए दर्शाया गया है। आम तौर पर देवता अमृत पान करते हैं और इसी कारण लोग सोमरस को अमृत समझ लेते हैं जो कि गलत है।

अब प्रश्न ये है कि सोमरस आखिरकार है क्या? सोमरस के विषय में ऋग्वेद में विस्तार से लिखा गया है। ऋग्वेद में वर्णित है कि "ये निचोड़ा हुआ दुग्ध मिश्रित सोमरस देवराज इंद्र को प्राप्त हो।" एक अन्य ऋचा में कहा गया है - "हे पवनदेव! ये सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिलकर तैयार किया गया है।" इस प्रकार हम यहाँ देख सकते हैं कि सोमरस के निर्माण में दुग्ध का उपयोग हुआ है इसी कारण ये मदिरा नहीं हो सकता क्यूंकि उसके निर्माण में दुग्ध का उपयोग नहीं होता। 

रविवार, नवंबर 03, 2019

पुरुष द्वारा की गयी सर्वप्रथम छठ पूजा

आप सभी को छठ के संध्या एवं प्रातः अर्ध्य की शुभकामनायें। पिछले लेख में आपने माता अदिति द्वारा किये जाने वाले सर्वप्रथम छठ पूजा के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम आपको बताएँगे कि वो कौन सा पहला पुरुष था जिसके द्वारा सर्वप्रथम छठ पूजा की गयी थी। ये तो हम सभी को पता है कि छठ पूजा कोई लिंग विशेष पूजा नहीं है और इसे स्त्री या पुरुष दोनों कर सकते हैं। पुराणों में भी देवी अदिति और प्रियव्रत द्वारा सर्वप्रथम इस पूजा को करने का प्रसंग आया है।

परमपिता ब्रह्मा के पुत्र हुए मनु, जिन्हे हम स्वम्भू मनु के नाम से भी जानते हैं। ब्रह्मदेव के ही वाम अंग से जन्मी शतरूपा के साथ मनु ने विवाह किया जिससे समस्त मानवों का जन्म हुआ। मनु के नाम से ही हम मानव कहलाते हैं। दोनों के दो पुत्र हुए - प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद के पुत्र ही महान भक्त ध्रुव हुए जिन्होंने भगवान विष्णु की कृपा से अनंत लोक को प्राप्त किया।

शुक्रवार, नवंबर 01, 2019

स्त्री द्वारा की गयी सर्वप्रथम छठ पूजा

आप सभी को खरना की शुभकामनायें। कल से छठ महापर्व का शुभारम्भ हो चुका है। नहाय खाय (कद्दू भात) से आरम्भ होने वाला ये महापर्व खरना, संध्या अर्ग एवं प्रातः अर्ग पर समाप्त होता है। छठ माई की कोई तस्वीर आपको नहीं मिलेगी क्यूंकि ये स्वयं सृष्टि देवी का अवतार मानी जाती है। साथ ही ये पर्व किसी लिंग विशेष के लिए नहीं है अपितु स्त्री और पुरुष दोनों इस व्रत को रख सकते हैं।

जब बात छठ पूजा के आरम्भ की आती है तो इस बारे में अलग अलग मत हैं। सबसे पहले छठ पूजा करने का वर्णन दो कथाओं में मिलता है। एक तो ब्रह्मपुत्र मनु के पुत्र प्रियव्रत द्वारा जिसके बारे में एक अलग लेख बाद में प्रकाशित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त छठ पूजा के व्रत को रखने का जो सबसे प्राचीन इतिहास मिलता है वो है दक्षपुत्री एवं देवमाता अदिति के द्वारा। इन दोनों को सबसे प्राचीन छठ व्रत के रूप में मान्यता प्राप्त है।