सोमवार, दिसंबर 30, 2019

नल

रामायण की कथा में नल और नील नामक दो वानरों की कथा आती है। दोनों महान योद्धा थे और लंका युद्ध में उन्होंने कई प्रमुख राक्षस योद्धाओं का वध किया। कई लोगों को ये लगता है कि नल और नील भाई थे। कई ये भी कहते हैं कि दोनों जुड़वाँ भाई थे, किन्तु ये सत्य नहीं है। रामायण में जो वानर सेना थी वे सभी किसी ना किसी देवता के अंश थे। उसी प्रकार नल भगवान विश्वकर्मा और नील अग्निदेव के अंशावतार थे।

वाल्मीकि रामायण में लंका सेतु की रचना का श्रेय केवल नल को ही दिया गया है और सेतु निर्माण में नील का कोई वर्णन नहीं। है यही कारण है कि इस सेतु को लंका सेतु एवं रामसेतु के अतिरिक्त नलसेतु के नाम से भी जाना जाता है। विश्वकर्मा के पुत्र होने के कारण नल में स्वाभाविक रूप से वास्तुशिल्प की कला थी। अपने पिता विश्वकर्मा की भांति वो भी एक उत्कृष्ट शिल्पी थे। यही कारण है कि समुद्र पर सेतु निर्माण का दायित्व नल को ही दिया गया था।

शनिवार, दिसंबर 28, 2019

माता अरुंधति - २

पिछले लेख में आपने महर्षि कर्दम की पुत्री और महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति के प्रारंभिक जीवन के बारे में पढ़ा। आप जाना कि किस प्रकार अरुंधति पूर्वजन्म में भगवान ब्रह्मा की पुत्री संध्या थी जिसने महर्षि वशिष्ठ के उपदेश से भगवान विष्णु की तपस्या  की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें तीन वरदान दिए कि जन्म लेते ही किसी भी जीव में काम भावना ना हो, उनका पतिव्रत अखंड रहे और कोई भी काम दृष्टि से उन्हें देखे तो वो नपुंसक हो जाये। अब आगे...

भगवान विष्णु की कृपा से अदृश्य होकर संध्या महर्षि मेघतिथि के यज्ञ में गयी और वहाँ महर्षि वशिष्ठ को पति रूप में पाने की कामना लेकर उन्होंने यञकुंड में अपना शरीर समर्पित कर दिया। उस अग्नि में भस्म होने के बाद उत्पन्न उनकी पवित्र ऊर्जा को स्वयं सूर्यदेव ने दो भाग कर सृष्टि के कल्याण हेतु अपने रथ पर स्थापित किया। यही दो भाग प्रातः काल और संध्या काल कहलाये।

गुरुवार, दिसंबर 26, 2019

माता अरुंधति - १

भगवान शिव और माता पार्वती के बाद अगर आदर्श गृहस्थ जीवन का कोई बेहतरीन उदाहरण है तो वो महर्षि वशिष्ठ और उनकी पत्नी माता अरुंधति का ही है। वास्तव में श्रीराम से बहुत काल पहले महर्षि वशिष्ठ ने ही एकपत्नीव्रत का उदाहरण स्थापित किया था और कदाचित यही कारण था कि उनकी शिक्षा के आधार पर श्रीराम ने भी इसी व्रत का पालन किया।

ब्रह्मा के दाहिने अंग से स्वयंभू मनु उत्पन्न हुए और उनके वाम भाग से शतरूपा। इन्ही दोनों से मनुष्यों की उत्पत्ति हुई। दोनों से दो पुत्र - प्रियव्रत एवं उत्तानपाद एवं तीन पुत्रियाँ - आकूति, देवहूति एवं प्रसूति हुई। आकूति रूचि प्रजापति एवं प्रसूति दक्ष प्रजापति से ब्याही गयी। देवहूति का विवाह महर्षि कर्दम से हुआ और इन दोनों की १० संतानें हुई जिनमे से अरुंधति एक थी। एक पुत्र - कपिल एवं नौ पुत्रियाँ - कला, अनुसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधति एवं शांति।

मंगलवार, दिसंबर 24, 2019

कीचक: ४ - अंत

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार कीचक की कुदृष्टि सैरन्ध्री बनी दौपदी पर पड़ती है और वो उसपर आसक्त हो जाता है। वो द्रौपदी को बलात प्राप्त करने का प्रयास करता है और दो बार द्रौपदी कीचक से अपने प्राण बचा कर भागती है किन्तु कीचक भरे सभा में ये चुनौती देकर जाता है कि वो सैरन्ध्री को प्राप्त कर के रहेगा। अब आगे... 

रविवार, दिसंबर 22, 2019

कीचक: ३ - कुचेष्टा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार कीचक ने विराट देश का सेनापति बनते ही सारे शत्रुओं को अपने बल से पीछे खदेड़ दिया। उसके शौर्य से विराट नरेश भी बड़े प्रसन्न हुए और उसे प्रधान सेनापति बना दिया। किन्तु उन्हें ये नहीं पता था कि कीचक को इतने अधिकार देने पर उस पर नियंत्रण पाना कठिन हो जाएगा। यही हुआ और और विराट नगर का शासन कीचक ने अप्रत्यक्ष रूप से अपने हाथों में ले लिया। अब आगे... 

शुक्रवार, दिसंबर 20, 2019

कीचक: २ - प्रभाव

पिछले लेख में आपने कीचक के वंश और परिवार के विषय में पढ़ा। आपने ये भी जाना कि किस प्रकार कीचक ने विराटराज को अपनी सहायता देने के लिए उन्हें अपनी बहन सुदेष्णा से विवाह करने को कहा। विवाह के पश्चात विराटराज ने कीचक को प्रधान सेनापति बनाया और एक बड़ा प्रदेश भी प्रदान किया जहाँ की राजधानी कीचक ने एकचक्रा नगरी को बनाया। अब आगे... 

प्रधान सेनापति का पद सँभालते ही कीचक ने सर्वप्रथम विराटदेश की सीमा पर आ पहुँची विभिन्न राज्य की सेनाओं से युद्ध किया। कीचक और उसके भाइयों की वीरता के आगे वो सेनाएं टिक नहीं पायी और पीछे हटने को विवश हो गयी। कीचक ने अप्रतिम वीरता दिखाते हुए मेखल, त्रिगर्त, दशार्ण, कशेरुक, मालव, यवन, पुलिन्द, काशी, कोसल, अंग, वंग, कलिंग, तंगण, परतंग, मलद, निषध, तुण्डिकेर, कोंकण, करद, निषिद्ध, शिव, दुश्छिल्लिक तथा अन्य छोटे-बड़े राज्यों की सेनाओं को खदेड़ दिया। 

बुधवार, दिसंबर 18, 2019

कीचक: १ - वंश

प्राचीन काल में दानवों की एक शक्तिशाली प्रजाति हुआ करती थी जिसे कालकेय कहा जाता था। दक्ष प्रजापति ने अपनी १७ पुत्रियों का विवाह महर्षि कश्यप से किया। उनमे से एक थी दनु जिनके पुत्र हुए विश्वनर। विश्वनर की चार पुत्रियां थी - कालका, पौलोमा, उपदानवी एवं हयशिरा। इनमे से कालका से ही सभी कालकेयों की उत्पत्ति हुई। कुल कालकेयों की संख्या १०६ बताई जाती है जिसमे से सबसे बड़ा था बाण।

सोमवार, दिसंबर 16, 2019

चिल्कुर बालाजी

इस देश में कई मंदिर अपनी अलग-अलग विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध हैं। किन्तु हैदराबाद में एक ऐसा मंदिर भी है जिसकी विशेषता जानकर आप हैरान रह जाएंगे। ये मंदिर युवाओं, विशेषकर आईटी इंजीनियर के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। आपने तिरुपति बालाजी का नाम तो अवश्य सुना होगा। ये मंदिर भी वेंकटेश बालाजी को ही समर्पित है और इसका नाम चिल्कुर बालाजी है।

शनिवार, दिसंबर 14, 2019

महाभारत में वर्णित प्रसिद्ध शंख

शंख का महत्त्व हम सभी जानते हैं। कहते हैं कि जहाँ तक शंख की ध्वनि जाती है वहाँ तक कोई नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर सकती। प्राचीन काल में शंख ना सिर्फ पवित्रता का प्रतीक था बल्कि इसे शौर्य का द्योतक भी माना जाता था। प्रत्येक योद्धा के पास अपना शंख होता था और किसी भी युद्ध अथवा पवित्र कार्य का आरम्भ शंखनाद से किया जाता था। महाभारत में भी हर योद्धा के पास अपना शंख था और कुछ के नाम भी महाभारत में वर्णित हैं। आइये कुछ प्रसिद्ध शंखों के बारे में जानें।

गुरुवार, दिसंबर 12, 2019

खर-दूषण - २

पिछले लेख में आपने रावण के सौतेले भाइयों खर और दूषण के वंश के बारे में पढ़ा। उनके नेतृत्व में रावण की सेना के १४००० योद्धा दण्डक वन में रहते थे। अपनी पति की मृत्यु के बाद शूर्पणखा भी रावण के आदेश पर वही दण्डक वन में अपने दोनों भाइयों के साथ रहती थी। खर और दूषण के विरोध का साहस कोई नहीं करता था और इसी कारण वे दोनों नरभक्षी भाई उन्मत्त होकर वहाँ रहने वाले ऋषि मुनियों पर अत्याचार करते थे।

मंगलवार, दिसंबर 10, 2019

खर-दूषण - १

खर और दूषण रावण के सौतेले भाई और राक्षसों के प्रमुख यूथपति थे जो दण्डक वन में रावण की ओर से शासन करते थे। राक्षसों के वंश के बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें। परमपिता ब्रह्मा से हेति और प्रहेति नामक दो राक्षसों की उत्पत्ति हुई। ये दोनों ही राक्षसों के आदिपुरुष माने जाते हैं। हेति से विद्युत्केश और विद्युत्केश से सुकेश का जन्म हुआ। इसी सुकेश को महादेव और देवी पार्वती ने गोद ले लिया और ये उनका पुत्र कहलाया।

सुकेश के तीन प्रतापी पुत्र हुए - माल्यवान, सुमाली एवं माली। सुमाली के १० पुत्र और ४ पुत्रियाँ हुई - राका, पुष्पोत्कटा, कुंभीनसी और कैकसी। सुमाली ने एक शक्तिशाली वंशज पाने के लिए अपनी पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि पुलत्स्य के पुत्र महर्षि विश्रवा से करवा दिया। इन्ही दोनों का पुत्र रावण हुआ जिसने आगे चलकर राक्षस वंश को अपने शिखर पर पहुँचाया और दिग्विजयी बना। कुम्भकर्ण और विभीषण भी इसी के पुत्र थे। 

रविवार, दिसंबर 08, 2019

रानी चोला देवी - २

पिछले लेख में आपने रानी चोला देवी और उनके पति मंगलसेन के विषय में पढ़ा। किस प्रकार रानी के उद्यान का विध्वंस करने वाले शूकर का वध मंगलसेन करते हैं जो वास्तव में चित्ररथ नामक गन्धर्व थे जो ब्रह्मदेव का श्राप भोग रहे थे। मंगलसेन के हांथों उन्हें अपने श्राप से मुक्ति मिल जाती है और वे उन्हें आशीर्वाद देकर अपने लोक लौट जाते हैं। अब आगे...

शुक्रवार, दिसंबर 06, 2019

रानी चोला देवी - १

महर्षि अंगिरस के लेख में रानी चोला देवी का वर्णन आया था। महाभारत में युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि "हे माधव! जिसे सुनने से मन प्रसन्न हो और पापों का अंत हो जाये ऐसी कोई कथा मुझे सुनाइए।" ये सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा - "भ्राताश्री! सतयुग में जब दैत्य वृत्रासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया तब देवराज इंद्र ने यही इच्छा देवर्षि नारद के सामने जताई थी। देवर्षि ने जो कथा देवराज को सुनाई वही मैं आपको सुनाता हूँ। इस कथा को सुनने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और मनुष्य की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है।"

पुरन्दरपुर नामक एक वैभवशाली राज्य था जहाँ राजा मंगलसेन राज्य करते थे। कहा जाता है कि उनके नगर को स्वयं विश्वकर्मा ने बनाया था और उसके समान और कोई दूसरा नगर विश्व में नहीं था। राजा मंगलसेन की दो रूपवती पत्नियाँ थी - चिल्ल देवी और चोला देवी। जहाँ चिल्ल देवी को धर्म-कर्म में पूर्ण विश्वास था वही चोला देवी नास्तिक तो नहीं थी किन्तु उन्हें धर्म-कर्म, पूजा-पाठ पर कुछ खास श्रद्धा नहीं थी।

बुधवार, दिसंबर 04, 2019

गयासुर - ३

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार गयासुर को भगवान विष्णु द्वारा मिले गए वरदान के कारण सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता है। इससे मुक्ति पाने के लिए समस्त देवता भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं और फिर श्रीहरि परमपिता ब्रह्मा को गयासुर का शरीर दान में मांगने का सुझाव देते हैं। तब ब्रह्मदेव गयासुर के पास जाकर यज्ञ हेतु उसके शरीर का दान मांगते हैं जो वो प्रसन्नतापूर्वक दे देता है। अब आगे... 

सोमवार, दिसंबर 02, 2019

गयासुर - २

पिछले लेख में आपने धर्म परायण और श्रीहरि के भक्त गयासुर के बारे में पढ़ा। आपने ये जाना कि किस प्रकार जीवमात्र की भलाई के लिए उसने भगवान विष्णु से ये वर मांग लिया कि उसे देखते ही कोई भी प्राणी मोक्ष को प्राप्त कर ले। किन्तु उसके इस वरदान के कारण सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया क्यूंकि हर प्राणी उसे देख कर बैकुंठ जाने लगा और यमपुरी खाली हो गयी। अब आगे...

शनिवार, नवंबर 30, 2019

गयासुर - १

पिछले लेख में आपने महर्षि मरीचि की सती पत्नी और धर्मराज की पुत्री धर्मव्रता के बारे में पढ़ा जो उनके श्राप के कारण एक शिला में परिणत हो गयी। बाद में ब्रह्मदेव की आज्ञा के अनुसार धर्मराज ने शिलरूपी अपनी पुत्री को धर्मपुरी में रख दिया। इसी कथा से सम्बद्ध एक और कथा आती है जो गयासुर की है। दैत्यकुल में एक से एक दुर्दांत दैत्य हुए किन्तु जिस प्रकार कीचड में ही कमल खिलता है, उसी प्रकार दैत्य कुल ने महान भगवत भक्त भी इस संसार को दिए। प्रह्लाद, बलि इत्यादि भक्तों के श्रेणी में ही गय नामक दैत्य भी था।

गुरुवार, नवंबर 28, 2019

धर्मव्रता - ३

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महर्षि मरीचि बिना जाने-बूझे अपनी पत्नी धर्मव्रता को शिला बनने का श्राप दे देते हैं। इससे क्रोधित होकर धर्मव्रता भी मरीचि को श्राप दे देती है कि उन्हें भी भगवान शंकर का श्राप झेलना होगा। ये सुनकर ब्रह्मदेव व्यथित होकर वहाँ से चले जाते हैं। अब आगे...

मंगलवार, नवंबर 26, 2019

धर्मव्रता - २

पिछले लेख में हमने धर्मराज की पुत्री ऊर्णा (धर्मव्रता) के बारे में पढ़ा जो वर प्राप्ति के लिए घोर तपस्या करती हैं। उनकी भेंट ब्रह्मदेव के मानस पुत्र और सप्तर्षियों में से एक महर्षि मरीचि से होती है। मरीचि धर्मव्रता से विवाह करने की इच्छा प्रकट करते हैं और फिर धर्मव्रता के अनुरोध पर वे उनके पिता धर्मराज के पास जाते हैं और उनसे उनकी सहमति प्राप्त करते हैं। इसके बाद दोनों का विधिवत विवाह हो जाता है। अब आगे... 

विवाह के पश्चात कुछ काल उन्होंने बड़े सुख से बिताया। कुछ दिन के पश्चात एक दिन महर्षि मरीचि कही बाहर से अपने आश्रम आये। वे बड़े श्रमित थे और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। वे आते ही शैय्या पर लेट गए और धर्मव्रता से कहा - "प्रिये! आज मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है और मैं बहुत थका हुआ भी हूँ। मैं विश्राम करता हूँ और तुम कृपया मेरी पाद-सेवा करो। जब तक मैं सोकर ना उठूं, तुम उसी प्रकार मेरी पाद-सेवा करती रहना।"

रविवार, नवंबर 24, 2019

धर्मव्रता - १

धर्मव्रता सप्तर्षियों में से प्रथम महर्षि मरीचि की धर्मपत्नी है। पुराणों में महर्षि मरीचि की तीन पत्नियों का वर्णन है। उनकी एक पत्नी प्रजापति दक्ष की कन्या सम्भूति थी। उनकी दूसरी पत्नी का नाम कला था और तीसरी पत्नी धर्मराज की कन्या ऊर्णा थी। ऊर्णा को ही धर्मव्रता कहा जाता है। इनकी माता का नाम विश्वरूप बताया गया है। जब धर्मव्रता बड़ी हुई तो उसके पिता धर्मराज ने उसके लिए योग्य वर ढूँढना चाहा किन्तु अपनी पुत्री के लिए उन्हें कोई योग्य वर नहीं मिला। तब धर्मराज ने अपनी पुत्री को वर प्राप्ति हेतु तपस्या करने को कहा।

शुक्रवार, नवंबर 22, 2019

प्रतिशोध गाथा - ४: देवराज की कृपा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि यवक्रीत परावसु की पत्नी से काम याचना करता है जिससे क्रोधित होकर रैभ्य ऋषि कृत्य का आह्वान करते हैं। यवक्रीत सोचता है कि वो कृत्य को परास्त कर देगा किन्तु ऐसा नहीं हो पता है और अंततः कृत्य के हाथों उसकी मृत्यु हो जाती है। जब भारद्वाज ऋषि को इस बात का पता चलता है तो वो क्रोधित होकर रैभ्य को श्राप दे देते हैं। अब आगे... 

बुधवार, नवंबर 20, 2019

प्रतिशोध गाथा - ३: कृत्य का आह्वान

कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के कारण पिछले कुछ दिनों से कोई लेख नहीं प्रकाशित पाया, इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार यवक्रीत ने अपने हठ से, जो उसके योग्य ना था, उस ज्ञान को देवराज इंद्र से प्राप्त कर लिया। देवराज ने हालाँकि उसके हठ के कारण उसे वरदान अवश्य दिया किन्तु वे जानते थे कि इस प्रकार प्राप्त वरदान से किसी का कल्याण नहीं होता और यवक्रीत को भी इसका मूल्य चुकाना पड़ेगा।

जब यवक्रीत लौट कर आया तब तक सभी जगह ये प्रसिद्ध हो चुका था कि उसने इंद्र को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त किया है। अब विद्वानों की सभाओं में उसकी भी पूछ होने लगी। जब कोई व्यक्ति लगन और कड़े परिश्रम से स्वयं को प्रशंसा के योग्य बनाता है तो उसे ये ज्ञात रहता है कि उसे कोई सम्मान क्यों दे रहा है। यही कारण है कि उनके व्यहवार में स्थिरता होती है। किन्तु यवक्रीत के साथ ऐसा नहीं था। उसे वरदान उसके हठ के कारण प्राप्त हुआ था। यही कारण था कि शीघ्र ही यवक्रीत के मन में घमंड ने अपना घर कर लिया। अब वो अपने समक्ष किसी को कुछ ना समझने लगा।

बुधवार, नवंबर 13, 2019

प्रतिशोध गाथा - २: यवक्रीत का हठ

पिछले लेख में आपने रैभ्य और भारद्वाज ऋषि के बीच की मित्रता के बारे में पढ़ा। जहाँ रैभ्य के पुत्र परावसु एवं अर्वावसु विद्वान थे वहीँ भारद्वाज का पुत्र यवक्रीत को शिक्षा प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं थी। परावसु को वहाँ के राजा ७ वर्षो के यज्ञ को करवाने हेतु अपने साथ ले गए। उधर दूसरों द्वारा सम्मान ना प्राप्त होने के कारण यवक्रीत भी तपस्या करने वन को चले गए।

सोमवार, नवंबर 11, 2019

प्रतिशोध गाथा - १: दो ऋषियों की मित्रता

कथा महाभारत के वन पर्व की है। युधिष्ठिर अपना सारा राज पाठ द्युत में हार कर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ १२ वर्षों के लिए वन चले गए। वहाँ सभी भाई, विशेषकर युधिष्ठिर ऋषियों-महर्षियों के सानिध्य में अपना दिन काट रहे थे। उनसे मिली शिक्षा उनके मनोबल को और दृढ करती थी। उसी समय लोमश ऋषि घुमते हुए उनके आश्रम में आये। सभी भाइयों ने उनकी बड़ी सेवा की। लोमश ऋषि ने उनसे उनका हाल समाचार पूछा।

शनिवार, नवंबर 09, 2019

भृंगी - २: जिसके कारण विश्व को अर्धनारीश्वर के दर्शन हुए

पिछले लेख में आपने भगवान शिव के गण भृंगी के विषय में पढ़ा। आपने ये भी जाना कि किस प्रकार भृंगी की भक्ति केवल और केवल महादेव के प्रति थी और उनके अतिरिक्त उसे कुछ और दिखाई नहीं देता था। महादेव के प्रति उसकी भक्ति इतनी अधिक थी कि वो स्वयं माता पार्वती की भी आराधना नहीं करते थे। वे माता को भगवान शिव से अलग मानते थे और उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं था कि दोनों वास्तव में एक ही हैं।

गुरुवार, नवंबर 07, 2019

भृंगी - १: तीन पैरों वाला महादेव का महान भक्त

जब भी भगवान शिव के गणों की बात होती है तो उनमें नंदी, भृंगी, श्रृंगी इत्यादि का वर्णन आता ही है। हिन्दू धर्म में नंदी एक बहुत ही प्रसिद्ध शिवगण हैं जिनके बारे में हमारे ग्रंथों में बहुत कुछ लिखा गया है। नंदी की भांति ही भृंगी भी शिव के महान गण और तपस्वी हैं किन्तु दुर्भाग्यवश उनके बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं मिलती है। भृंगी को तीन पैरों वाला गण कहा गया है। कवि तुलसीदास जी ने भगवान शिव का वर्णन करते हुए भृंगी के बारे में लिखा है -

"बिनुपद होए कोई। बहुपद बाहु।।" 

अर्थात: शिवगणों में कोई बिना पैरों के तो कोई कई पैरों वाले थे। यहाँ कई पैरों वाले से तुलसीदास जी का अर्थ भृंगी से ही है।

मंगलवार, नवंबर 05, 2019

सोमरस

आपने कई जगह सोमरस के विषय में पढ़ा या सुना होगा। अधिकतर लोग ये समझते हैं कि सोमरस का अर्थ मदिरा या शराब होता है जो कि बिलकुल गलत है। कई लोगों का ये भी मानना है कि अमृत का ही दूसरा नाम सोमरस है। ऐसा लोग इस लिए भी सोचते हैं क्यूंकि हमारे विभिन्न ग्रंथों में कई जगह देवताओं को सोमरस का पान करते हुए दर्शाया गया है। आम तौर पर देवता अमृत पान करते हैं और इसी कारण लोग सोमरस को अमृत समझ लेते हैं जो कि गलत है।

अब प्रश्न ये है कि सोमरस आखिरकार है क्या? सोमरस के विषय में ऋग्वेद में विस्तार से लिखा गया है। ऋग्वेद में वर्णित है कि "ये निचोड़ा हुआ दुग्ध मिश्रित सोमरस देवराज इंद्र को प्राप्त हो।" एक अन्य ऋचा में कहा गया है - "हे पवनदेव! ये सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिलकर तैयार किया गया है।" इस प्रकार हम यहाँ देख सकते हैं कि सोमरस के निर्माण में दुग्ध का उपयोग हुआ है इसी कारण ये मदिरा नहीं हो सकता क्यूंकि उसके निर्माण में दुग्ध का उपयोग नहीं होता। 

रविवार, नवंबर 03, 2019

पुरुष द्वारा की गयी सर्वप्रथम छठ पूजा

आप सभी को छठ के संध्या एवं प्रातः अर्ध्य की शुभकामनायें। पिछले लेख में आपने माता अदिति द्वारा किये जाने वाले सर्वप्रथम छठ पूजा के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम आपको बताएँगे कि वो कौन सा पहला पुरुष था जिसके द्वारा सर्वप्रथम छठ पूजा की गयी थी। ये तो हम सभी को पता है कि छठ पूजा कोई लिंग विशेष पूजा नहीं है और इसे स्त्री या पुरुष दोनों कर सकते हैं। पुराणों में भी देवी अदिति और प्रियव्रत द्वारा सर्वप्रथम इस पूजा को करने का प्रसंग आया है।

परमपिता ब्रह्मा के पुत्र हुए मनु, जिन्हे हम स्वम्भू मनु के नाम से भी जानते हैं। ब्रह्मदेव के ही वाम अंग से जन्मी शतरूपा के साथ मनु ने विवाह किया जिससे समस्त मानवों का जन्म हुआ। मनु के नाम से ही हम मानव कहलाते हैं। दोनों के दो पुत्र हुए - प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद के पुत्र ही महान भक्त ध्रुव हुए जिन्होंने भगवान विष्णु की कृपा से अनंत लोक को प्राप्त किया।

शुक्रवार, नवंबर 01, 2019

स्त्री द्वारा की गयी सर्वप्रथम छठ पूजा

आप सभी को खरना की शुभकामनायें। कल से छठ महापर्व का शुभारम्भ हो चुका है। नहाय खाय (कद्दू भात) से आरम्भ होने वाला ये महापर्व खरना, संध्या अर्ग एवं प्रातः अर्ग पर समाप्त होता है। छठ माई की कोई तस्वीर आपको नहीं मिलेगी क्यूंकि ये स्वयं सृष्टि देवी का अवतार मानी जाती है। साथ ही ये पर्व किसी लिंग विशेष के लिए नहीं है अपितु स्त्री और पुरुष दोनों इस व्रत को रख सकते हैं।

जब बात छठ पूजा के आरम्भ की आती है तो इस बारे में अलग अलग मत हैं। सबसे पहले छठ पूजा करने का वर्णन दो कथाओं में मिलता है। एक तो ब्रह्मपुत्र मनु के पुत्र प्रियव्रत द्वारा जिसके बारे में एक अलग लेख बाद में प्रकाशित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त छठ पूजा के व्रत को रखने का जो सबसे प्राचीन इतिहास मिलता है वो है दक्षपुत्री एवं देवमाता अदिति के द्वारा। इन दोनों को सबसे प्राचीन छठ व्रत के रूप में मान्यता प्राप्त है।

बुधवार, अक्तूबर 30, 2019

यम द्वितीया

कल आप सबने यम द्वितीया का पर्व मनाया। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को पड़ने के कारण ही इस पर्व का नाम यम द्वितीया पड़ा है। इस नाम का एक कारण ये भी है कि ये पर्व दीपावली के दो दिनों के बाद आता है। इसी को भाई दूज के नाम से भी जाना जाता है। भाई दूज का महत्त्व रक्षा बंधन के समान ही है जिसमे बहनें अपने भाइयों को रक्षा सूत्र बांधती हैं और उनके वज्र के समान शक्तिशाली होने की कामना करती हैं। बदले में भाई भी अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है।

इसके पीछे की कथा कुछ इस प्रकार है। भगवान सूर्यनारायण के उनकी पत्नी संध्या से दो संतानें थी - पुत्र यम एवं पुत्री यमुना। ब्रह्मदेव ने प्राणियों के जीवन मरण का भार यमराज को सौंपा। अब जन्म और मृत्यु तो सदा चलने वाली प्रक्रिया है अतः यमराज सदैव उसी में व्यस्त रहते थे। उनकी बहन यमुना प्रायः उनसे मिलने यमलोक जाया करती थी। वापस लौटते हुए वो सदैव अपने भाई से अपने यहाँ आने का अनुरोध करती रहती थी किन्तु यमराज अपनी व्यस्तताओं के कारण कभी यमुना का घर नहीं जा पाते थे।

सोमवार, अक्तूबर 28, 2019

गोवर्धन पूजा

गोवर्धन पूजा हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्यौहार है जो दीपावली के दो दिन के बाद मनाया जाता है। उत्तरप्रदेश के ब्रज, गोकुल और वृन्दावन में तो दीवाली के अगले दिन से ही गोवर्धन पूजा का आरम्भ हो जाता है। उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड और मध्यप्रदेश में इस पूजा को धूम धाम से मनाया जाता है। इसका एक नाम अनंतकूट भी है और बिहार में इस पर्व को भाई दूज और चित्रगुप्त पूजा के साथ ही मनाया जाता है। बिहार में इसे अपभ्रंश रूप से "गोधन पूजा" भी कहा जाता है।

शनिवार, अक्तूबर 26, 2019

नरक चौदस

आज नरक चौदस का त्यौहार है। हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को, दीवाली से एक दिन पहले ये त्यौहार आता है और इसी कारण इसे छोटी दीवाली भी कहते हैं। इसके कई और नाम हैं - काली चौदस, रूप चौदस, नर्क निवारण चतुर्दशी, भूत चतुर्दशी, नर्का पूजा इत्यादि। कहते हैं कि इस दिन प्रातः काल तेल की मालिश कर के स्नान करने पर नर्क की यातनाओं से मुक्ति मिल जाती है। इसी दिन शाम को दीप दान किया जाता है जिससे यमराज प्रसन्न होते हैं। 

गुरुवार, अक्तूबर 24, 2019

श्रीकृष्ण के तीन सबसे घनिष्ठ मित्र

श्रीकृष्ण की मित्रता जिसे प्राप्त हो जाये उसे और क्या चाहिए। महाभारत में ऐसे कई व्यक्ति हैं जिन्हे श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त थी। पांडवों पर तो वैसे ही उनकी कृपा थी पर इसके अतिरिक्त भी वे जिनसे मिलते थे उसे अपने स्वाभाव से अपना मित्र बना लेते थे। वैसे तो उनके मित्रों की संख्या बहुत अधिक है किन्तु इस लेख में हम श्रीकृष्ण के उन ३ मित्रों के बारे में बताएँगे जो उन्हें सबसे अधिक प्रिय थे।

सुदामा: जब भी मित्रता की बात होती है तो कृष्ण-सुदामा का नाम अवश्य आता है। सुदामा श्रीकृष्ण के बाल सखा और अनन्य भक्त थे। कंस के वध के बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने गए तो वहाँ उनकी भेंट सुदामा से हुई। सुदामा एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण कुमार थे जो पहले से ही सांदीपनि मुनि के यहाँ शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उनका एक स्वाभाव था कि वो किसी से कुछ मांगते नहीं थे। एक बार वर्षाकाल में कृष्ण और सुदामा जंगल में अलग-अलग वृक्षों पर फस गए। उनकी गुरुमाता ने उन्हें कुछ चावल दिए थे जो सुदामा के पास थे। भूख लगने पर सुदामा ने वो सारे चावल खा लिए। जब श्रीकृष्ण को ये पता चला तो उन्होंने हँसते हुए कहा कि अब उनपर श्रीकृष्ण का ऋण है।

मंगलवार, अक्तूबर 22, 2019

श्रीफल के जन्म की कथा

नारियल हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र वस्तुओं में से एक माना जाता है। इसे श्रीफल भी कहते हैं, अर्थात समृद्धि देने वाला फल। इसीलिए इसे माता लक्ष्मी से भी जोड कर देखा जाता है। दुनिया में केवल नारियल ही एक ऐसा फल है जो पूर्ण रूप से शुद्ध है और जिसमें किसी भी प्रकार की मिलावट नहीं की जा सकती। यही नहीं, केवल नारियल ही एक ऐसा वृक्ष है जिससे जुडी हर चीज मनुष्य के काम आती है। इसीलिए भारत, विशेषकर दक्षिण भारत में इसे "कल्पवृक्ष" भी कहा जाता है।

रविवार, अक्तूबर 20, 2019

अतिकाय - २

पिछले लेख में आपने रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के जन्म के बारे में पढ़ा। आपने ये भी पढ़ा कि किस प्रकार अतिकाय ने अपने पराक्रम से महारुद्र को प्रसन्न किया और उनसे कई वरदान और दिव्यास्त्र प्राप्त किये। अतिकाय को भगवान रूद्र से एक दिव्य त्रिशूल भी प्राप्त हुआ जो अचूक था। जब अतिकाय शक्ति संपन्न होकर वापस आया तब रावण की शक्ति और बढ़ गयी। अब आगे...

अतिकाय के जन्म के विषय में एक कथा और आती है कि वो और उसका भाई त्रिशिरा, जो रावण और धन्यमालिनी का पुत्र था दोनों दैत्य मधु और कैटभ के अवतार थे। पिछले जन्म में भगवान विष्णु के द्वारा दोनों का वध किये जाने के बाद दोनों ने उनसे प्रतिशोध के लिए पुनः त्रेतायुग में रावण के पुत्र के रूप में जन्म लिया।

शुक्रवार, अक्तूबर 18, 2019

अतिकाय - १

हम सबने रावण के ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद के विषय में जरूर पढ़ा होगा किन्तु रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में अधिक जानकारी नहीं दी गयी है। इस लेख में रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में बताया जाएगा। वो रावण के ७ पुत्रों में से एक था जो मंदोदरी से उत्पन्न हुआ था। हालाँकि कई ग्रंथों में रावण की दूसरी पत्नी धन्यमालिनी को अतिकाय की माता बताया जाता है। धन्यमालिनी मंदोदरी की छोटी बहन थी जो मय दानव और हेमा अप्सरा की पुत्री थी। 

बुधवार, अक्तूबर 16, 2019

भूरिश्रवा - २

पिछले लेख में आपने भूरिश्रवा के वंश के बारे में पढ़ा। वो भी कुरुवंशी थे और धृतराष्ट्र के भाई और भीष्म के भतीजे थे। उनके पिता सोमदत्त और सात्यिकी के पिता शिनि की प्रतिद्वंदिता के कारण कुरुओं और यादवों में वैमनस्व बढ़ गया। दोनों ने भगवान शंकर से पुत्र की कामना की जिससे भूरिश्रवा और सात्यिकी का जन्म हुआ। अब आगे...

सोमवार, अक्तूबर 14, 2019

भूरिश्रवा - १

भूरिश्रवा महाभारत के सबसे प्रसिद्ध योद्धाओं में से एक थे। इन्होने महाभारत युद्ध में कौरवों के पक्ष से युद्ध किया था। कौरव सेना के प्रधान सेनापति भीष्म ने अपनी ११ अक्षौहिणी सेना के लिए जिन ११ सेनापतियों का चयन किया था, भूरिश्रवा उन सेनापतियों में से एक थे। भूरिश्रवा का वध युद्ध के १४वें दिन सात्यिकी ने किया था। वास्तव में भूरिश्रवा कुरुवंशी ही थे और महाभारत युद्ध में उनके साथ उनके पिता और दादा ने भी युद्ध किया था। 

चक्रवर्ती सम्राट ययाति से समस्त राजवश चले। उनके सबसे बड़े पुत्र यदु से यदुवंश चला जिसमे आगे चलकर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। इसी कुल में एक योद्धा हुए शिनि, जो श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव के मित्र थे। शिनि के पुत्र हुए महारथी सात्यिकी जो श्रीकृष्ण के घनिष्ठ मित्र थे। शिनि ने वसुदेव के साथ कई युद्धों में भाग लिया था और उनके प्राणों की रक्षा की थी। दोनों तत्कालीन राजा उग्रसेन और उसके पश्चात कंस के विश्वासपात्र थे।

शनिवार, अक्तूबर 12, 2019

शरद पूर्णिमा

कल शरद पूर्णिमा का पर्व है। इस पर्व का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है। आश्विन महीने की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। शरद का एक अर्थ चन्द्रमा भी है और इस दिन चाँद की किरणों का अपना एक अलग ही महत्त्व होता है। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्र की किरणों में स्वयं अमृत समाहित होता है। यही कारण है कि आज के दिन गावों में लोग खुले आकाश एवं चांदनी के नीचे सोते हैं। कहते हैं कि शरद पूर्णिमा की रौशनी में रहने से कई प्रकार के रोग समाप्त हो जाते हैं। 

गुरुवार, अक्तूबर 10, 2019

रावण का मानमर्दन २: असुरराज शंभर

ये रावण के मानमर्दन श्रृंखला का दूसरा लेख है। इससे पहले के लेख में हमने ये बताया था कि किस प्रकार रावण दैत्यराज बलि के हाथों परास्त होने के बाद अपमानित होता है। इस लेख के बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें। इस लेख में हम असुरराज शंभर के हाथों रावण के पराजय की कथा बताएंगे। शंभर वैजंतपुर के सम्राट थे। उनकी पत्नी माया मय दानव की पुत्री एवं रावण की पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन थी। इस प्रकार रावण शंभर का सम्बन्धी था।

मंगलवार, अक्तूबर 08, 2019

माद्री - २

पिछले लेख में अपने पढ़ा कि किस प्रकार दिग्विजय के दौरान हस्तिनापुर के नरेश पाण्डु को अपनी पहली पत्नी कुंती के रहते हुए भी माद्री से विवाह करना पड़ता है। हालाँकि उसके बाद भी कुंती और माद्री के बीच सम्बन्ध सौहार्दयपूर्ण ही रहता है। उसके बाद वे तीनों एकांतवास के लिए वन को जाते हैं और किंदम ऋषि के आश्रम में ठहरते हैं। अब आगे...

रविवार, अक्तूबर 06, 2019

माद्री - १

आज पंजाब में जिस स्थान पर रावी और चिनाब नदियों का मिलन होता है उसे ही पहले मद्रदेश कहा जाता था। वहाँ के एक राजा थे भगवान, जिन्होंने लम्बे समय तक मद्र पर शासन किया। मद्रदेश उस समय आर्यावर्त के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राज्यों में से एक माना जाता था। उनकी दो संतानें थी, एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्र का नाम शल्य और पुत्री का माद्री था। 

शुक्रवार, अक्तूबर 04, 2019

माँ गौरी और उनके वाहन की कथा

माता सती की मृत्यु के उपरांत भगवान शिव बैरागी हो गए। तब सती ने पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। उस जन्म में भी उनका महादेव के प्रति अनुराग था और इसी कारण उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की और अंततः उन्हें पति के रूप में प्राप्त किया। दोनों का विवाह बड़ी धूम धाम से हुआ और फिर वे दोनों अपने निवास कैलाश पर लौट आये और कुछ काल उन्होंने बड़े सुख से बिताये।

बुधवार, अक्तूबर 02, 2019

माँ दुर्गा के १०८ नाम

माता पार्वती ही संसार की समस्त शक्तियों का स्रोत हैं। उन्ही का एक रूप माँ दुर्गा को भी माना जाता है। उनपर आधारित ग्रन्थ "दुर्गा सप्तसती" में माँ के १०८ नामों का उल्लेख है। प्रातःकाल इन नामों का स्मरण करने से मनुष्य के सभी दुःख दूर होते हैं। आइये उन नामों और उनके अर्थों को जानें:
  1. सती: भगवान शंकर की पहली पत्नी। अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाली इन देवी का माहात्म्य इतना है कि उसके बाद पति परायण सभी स्त्रियों को सती की ही उपमा दी जाने लगी।
  2. साध्वी: ऐसी स्त्री जो आशावादी हो।
  3. भवप्रीता: जिनकी भगवान शिव पर अगाध प्रीति हो। 
  4. भवानी: समस्त ब्रह्माण्ड ही जिनका भवन हो।

सोमवार, सितंबर 30, 2019

महर्षि भृगु - २

पिछले लेख में आपने महर्षि भृगु के जन्म, वंश, पत्नियों और पुत्रों के विषय में पढ़ा। अब आगे... शिव पुराण एवं वायु पुराण में ऐसा वर्णन है कि जब दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव के अपमान हेतु महायज्ञ का आयोजन किया तो महर्षि भृगु उस यज्ञ में उपस्थित थे। जब सबने देखा कि दक्ष ने महादेव को आमंत्रित नहीं किया है तो महर्षि कश्यप के साथ भृगु ने भी दक्ष को चेतावनी दी कि महादेव के बिना ये यज्ञ सफल नहीं हो सकता। किन्तु अभिमान वश दक्ष ने उनकी बात अनसुनी कर दी। इसका परिणाम ये हुआ कि अपने पति का अपमान देख कर सती ने उसी यञकुंड में आत्मदाह कर लिया।

शनिवार, सितंबर 28, 2019

महर्षि भृगु - १

पुराणों में महर्षि भृगु के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। ये भारतवर्ष के सर्वाधिक प्रभावशाली, सिद्ध और प्रसिद्ध ऋषियों में से एक है। ये परमपिता ब्रह्मा और महर्षि अंगिरा के छोटे भाई थे और वर्तमान के बलिया (उत्तरप्रदेश) में जन्मे थे। ये एक प्रजापति भी हैं और स्वयंभू मनु के बाद के मन्वन्तरों में कई जगह इनकी गणना सप्तर्षियों में भी की जाती है। इनके वंशज आगे चल कर भार्गव कहलाये और उनसे भी भृगुवंशियों का प्रादुर्भाव हुआ। नारायण के छठे अवतार श्री परशुराम भी इन्ही के वंश में जन्मे और भृगुवंशी कहलाये।

गुरुवार, सितंबर 26, 2019

दस दिशाएं - २

पिछले लेख में आपने उर्ध्व, दक्षिण, पूर्व, ईशान एवं आग्नेय दिशाओं के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम अन्य ५ दिशाओं के बारे में जानेंगे।

६. नैऋत्य: दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य कहा गया है। यह दिशा सूर्यदेव के आधिपत्य में है और इस दिशा के स्वामी राहु हैं। शिवानी देवी इस दिशा की अधिष्ठात्री हैं। इस दिशा में पृथ्वी तत्व प्रमुख रूप से विद्यमान रहता है इसी कारण घर की भारी वस्तुएं इस दिशा में रखनी जाहिए। इस दिशा में जल तत्व को रखने की मनाही है। अर्थात इस दिशा में कुआँ, बोरिंग, गड्ढे इत्यादि नहीं होना चाहिए। सूर्यदेव के संरक्षण में होने के कारण इस दिशा को वास्तु के अनुसार सही रखने पर जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

मंगलवार, सितंबर 24, 2019

दस दिशाएं - १

पिछले लेख में आपने १० दिशों के दिक्पालों के बारे में विस्तार से पढ़ा। आज हम उन १० दिशाओं के महत्त्व के बारे में जानेंगे। 
  1. उर्ध्व: इस दिशा के देवता स्वयं परमपिता ब्रह्मा हैं। उर्ध्व का अर्थ आकाश है और जो कोई भी उर्ध्व की ओर मुख कर सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करता है, उसे उसका फल अवश्य प्राप्त होता है। वेदों में ऐसा लिखा है कि अगर कभी भी कुछ मांगना हो तो ब्रह्म और ब्रह्माण्ड से ही मांगना चाहिए। उनसे की हुई हर प्रार्थना स्वीकार होती है। हमारे घर की छत, छज्जे, रोशनदान एवं खिड़कियां इस दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। कहा जाता है कि कभी भी आकाश की ओर देख कर अपशब्द नहीं बोलना चाहिए, आकाश की ओर कुछ फेंकना, थूकना, चिल्लाना इत्यादि वर्जित है। जिस प्रकार आकाश की ओर फेंकी हुई कोई भी चीज वापस आपके पास ही आती है उसी प्रकार आकाश की ओर देखकर की गयी प्रार्थना आप पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और आपका जीवन खुशहाल हो जाता है। दूसरी ओर अगर आप आकाश की ओर देख कर अपशब्द कहते हैं अथवा बद्दुआ देते हैं तो वो वापस आपके ही जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालती है और उसे दुखों से भर देती है।

रविवार, सितंबर 22, 2019

दिक्पाल - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार ब्रह्मदेव के कर्णों से १० दिशाओं की उत्पत्ति होती है और फिर उनके अनुरोध पर ब्रह्मदेव उनके पतियों के रूप में ८ देवताओं की रचना करते हैं और उन्हें ८ दिशाओं के अधिपति बना कर दिक्पालों का पद प्रदान करते हैं। यहाँ पर एक बात ध्यान देने वाली है कि अधिकतर ग्रंथों में ईशान दिशा के स्वामी भगवान शिव और अधो दिशा के स्वामी भगवान विष्णु माने जाते है। इस लेख में हम १० दिशाओं के देवताओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।

शुक्रवार, सितंबर 20, 2019

दिक्पाल - १

दिशाओं के विषय में सबको पता है। हमें मुख्यतः ४ दिशाओं के बारे में पता होता है जो हैं पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण। वैज्ञानिक और वास्तु की दृष्टि से ४ और दिशाएं है जो इन चारों दिशाओं के मिलान बिंदु पर होती हैं। ये हैं - उत्तरपूर्व (ईशान), दक्षिणपूर्व (आग्नेय), उत्तरपश्चिम (वायव्य) एवं दक्षिणपश्चिम (नैऋत्य)। तो इस प्रकार ८ होती हैं जो सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।

बुधवार, सितंबर 18, 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - ४: सहस्तार्जुन के बाद का वंश

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार अर्जुन को अपने पिता कार्तवीर्य के बाद राजगद्दी मिलती है और वो महर्षि जमदग्नि के आश्रम से उनकी प्रिय गाय कामधेनु को बलात अपने साथ ले जाता है। जब परशुराम को इस बात की जानकारी मिलती है हो तो वे सहस्त्रार्जुन को युद्ध के लिए ललकारते हैं और दोनों में भीषण युद्ध होता है। उस युद्ध में अंततः सहस्त्रार्जुन की मृत्यु हो जाती है। अब आगे...