सोमवार, दिसंबर 30, 2019

नल

रामायण की कथा में नल और नील नामक दो वानरों की कथा आती है। दोनों महान योद्धा थे और लंका युद्ध में उन्होंने कई प्रमुख राक्षस योद्धाओं का वध किया। कई लोगों को ये लगता है कि नल और नील भाई थे। कई ये भी कहते हैं कि दोनों जुड़वाँ भाई थे, किन्तु ये सत्य नहीं है। रामायण में जो वानर सेना थी वे सभी किसी ना किसी देवता के अंश थे। उसी प्रकार नल भगवान विश्वकर्मा और नील अग्निदेव के अंशावतार थे।

गुरुवार, दिसंबर 26, 2019

माता अरुंधति

भगवान शिव और माता पार्वती के बाद अगर आदर्श गृहस्थ जीवन का कोई बेहतरीन उदाहरण है तो वो महर्षि वशिष्ठ और उनकी पत्नी माता अरुंधति का ही है। वास्तव में श्रीराम से बहुत काल पहले महर्षि वशिष्ठ ने ही एकपत्नीव्रत का उदाहरण स्थापित किया था और कदाचित यही कारण था कि उनकी शिक्षा के आधार पर श्रीराम ने भी इसी व्रत का पालन किया।

बुधवार, दिसंबर 18, 2019

कीचक

प्राचीन काल में दानवों की एक शक्तिशाली प्रजाति हुआ करती थी जिसे कालकेय कहा जाता था। दक्ष प्रजापति ने अपनी १७ पुत्रियों का विवाह महर्षि कश्यप से किया। उनमे से एक थी दनु जिनके पुत्र हुए विश्वनर। विश्वनर की चार पुत्रियां थी - कालका, पौलोमा, उपदानवी एवं हयशिरा। इनमे से कालका से ही सभी कालकेयों की उत्पत्ति हुई। कुल कालकेयों की संख्या १०६ बताई जाती है जिसमे से सबसे बड़ा था बाण

सोमवार, दिसंबर 16, 2019

चिल्कुर बालाजी

इस देश में कई मंदिर अपनी अलग-अलग विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध हैं। किन्तु हैदराबाद में एक ऐसा मंदिर भी है जिसकी विशेषता जानकर आप हैरान रह जाएंगे। ये मंदिर युवाओं, विशेषकर आईटी इंजीनियर के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। आपने तिरुपति बालाजी का नाम तो अवश्य सुना होगा। ये मंदिर भी वेंकटेश बालाजी को ही समर्पित है और इसका नाम चिल्कुर बालाजी है।

शनिवार, दिसंबर 14, 2019

महाभारत में वर्णित प्रसिद्ध शंख

शंख का महत्त्व हम सभी जानते हैं। कहते हैं कि जहाँ तक शंख की ध्वनि जाती है वहाँ तक कोई नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर सकती। प्राचीन काल में शंख ना सिर्फ पवित्रता का प्रतीक था बल्कि इसे शौर्य का द्योतक भी माना जाता था। प्रत्येक योद्धा के पास अपना शंख होता था और किसी भी युद्ध अथवा पवित्र कार्य का आरम्भ शंखनाद से किया जाता था। महाभारत में भी हर योद्धा के पास अपना शंख था और कुछ के नाम भी महाभारत में वर्णित हैं। आइये कुछ प्रसिद्ध शंखों के बारे में जानें।

मंगलवार, दिसंबर 10, 2019

खर-दूषण

खर और दूषण रावण के सौतेले भाई और राक्षसों के प्रमुख यूथपति थे जो दण्डक वन में रावण की ओर से शासन करते थे। परमपिता ब्रह्मा से हेति और प्रहेति नामक दो राक्षसों की उत्पत्ति हुई। ये दोनों ही राक्षसों के आदिपुरुष माने जाते हैं और इन्ही से राक्षस वंश चला। इसी वंश में आगे चल कर सुमाली, माली और माल्यवान नामक राक्षस हुए। सुमाली की पुत्री कैकसी ने विश्रवा से विवाह किया जिससे रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा का जन्म हुआ।

शुक्रवार, दिसंबर 06, 2019

रानी चोला देवी

महर्षि अंगिरस
के लेख में रानी चोला देवी का वर्णन आया था। महाभारत में युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि "हे माधव! जिसे सुनने से मन प्रसन्न हो और पापों का अंत हो जाये ऐसी कोई कथा मुझे सुनाइए।" ये सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा - "भ्राताश्री! सतयुग में जब दैत्य वृत्रासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया तब देवराज इंद्र ने यही इच्छा देवर्षि नारद के सामने जताई थी। देवर्षि ने जो कथा देवराज को सुनाई वही मैं आपको सुनाता हूँ। इस कथा को सुनने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और मनुष्य की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है।"

शनिवार, नवंबर 30, 2019

गयासुर

पिछले लेख
में आपने महर्षि मरीचि की सती पत्नी और धर्मराज की पुत्री धर्मव्रता के बारे में पढ़ा जो उनके श्राप के कारण एक शिला में परिणत हो गयी। बाद में ब्रह्मदेव की आज्ञा के अनुसार धर्मराज ने शिलरूपी अपनी पुत्री को धर्मपुरी में रख दिया। इसी कथा से सम्बद्ध एक और कथा आती है जो गयासुर की है। दैत्यकुल में एक से एक दुर्दांत दैत्य हुए किन्तु जिस प्रकार कीचड में ही कमल खिलता है, उसी प्रकार दैत्य कुल ने महान भगवत भक्त भी इस संसार को दिए। प्रह्लाद, बलि इत्यादि भक्तों के श्रेणी में ही गय नामक दैत्य भी था।

रविवार, नवंबर 24, 2019

धर्मव्रता

धर्मव्रता सप्तर्षियों में से प्रथम महर्षि मरीचि की धर्मपत्नी है। पुराणों में महर्षि मरीचि की तीन पत्नियों का वर्णन है। उनकी एक पत्नी प्रजापति दक्ष की कन्या सम्भूति थी। उनकी दूसरी पत्नी का नाम कला था और तीसरी पत्नी धर्मराज की कन्या ऊर्णा थी। ऊर्णा को ही धर्मव्रता कहा जाता है। इनकी माता का नाम विश्वरूप बताया गया है। जब धर्मव्रता बड़ी हुई तो उसके पिता धर्मराज ने उसके लिए योग्य वर ढूँढना चाहा किन्तु अपनी पुत्री के लिए उन्हें कोई योग्य वर नहीं मिला। तब धर्मराज ने अपनी पुत्री को वर प्राप्ति हेतु तपस्या करने को कहा।

सोमवार, नवंबर 11, 2019

परावसु, अर्वावसु और यवक्रीत की कथा

कथा महाभारत के वन पर्व की है। युधिष्ठिर अपना सारा राज पाठ द्युत में हार कर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ १२ वर्षों के लिए वन चले गए। वहाँ सभी भाई, विशेषकर युधिष्ठिर ऋषियों-महर्षियों के सानिध्य में अपना दिन काट रहे थे। उनसे मिली शिक्षा उनके मनोबल को और दृढ करती थी। उसी समय लोमश ऋषि घुमते हुए उनके आश्रम में आये। सभी भाइयों ने उनकी बड़ी सेवा की।

गुरुवार, नवंबर 07, 2019

भृंगी: तीन पैरों वाला महादेव का महान भक्त

जब भी भगवान शिव के गणों की बात होती है तो उनमें नंदी, भृंगी, श्रृंगी इत्यादि का वर्णन आता ही है। हिन्दू धर्म में नंदी एक बहुत ही प्रसिद्ध शिवगण हैं जिनके बारे में हमारे ग्रंथों में बहुत कुछ लिखा गया है। नंदी की भांति ही भृंगी भी शिव के महान गण और तपस्वी हैं किन्तु दुर्भाग्यवश उनके बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं मिलती है। भृंगी को तीन पैरों वाला गण कहा गया है। कवि तुलसीदास जी ने भगवान शिव का वर्णन करते हुए भृंगी के बारे में लिखा है -

"बिनुपद होए कोई। बहुपद बाहु।।"

मंगलवार, नवंबर 05, 2019

सोमरस

आपने कई जगह सोमरस के विषय में पढ़ा या सुना होगा। अधिकतर लोग ये समझते हैं कि सोमरस का अर्थ मदिरा या शराब होता है जो कि बिलकुल गलत है। कई लोगों का ये भी मानना है कि अमृत का ही दूसरा नाम सोमरस है। ऐसा लोग इस लिए भी सोचते हैं क्यूंकि हमारे विभिन्न ग्रंथों में कई जगह देवताओं को सोमरस का पान करते हुए दर्शाया गया है। आम तौर पर देवता अमृत पान करते हैं और इसी कारण लोग सोमरस को अमृत समझ लेते हैं जो कि गलत है।

शुक्रवार, नवंबर 01, 2019

सबसे पहली छठ पूजा

आप सभी को खरना की शुभकामनायें। कल से छठ महापर्व का शुभारम्भ हो चुका है। नहाय खाय (कद्दू भात) से आरम्भ होने वाला ये महापर्व खरना, संध्या अर्ग एवं प्रातः अर्ग पर समाप्त होता है। छठ माई की कोई तस्वीर आपको नहीं मिलेगी क्यूंकि ये स्वयं सृष्टि देवी का अवतार मानी जाती है। साथ ही ये पर्व किसी लिंग विशेष के लिए नहीं है अपितु स्त्री और पुरुष दोनों इस व्रत को रख सकते हैं।

बुधवार, अक्तूबर 30, 2019

यम द्वितीया

कल आप सबने यम द्वितीया का पर्व मनाया। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को पड़ने के कारण ही इस पर्व का नाम यम द्वितीया पड़ा है। इस नाम का एक कारण ये भी है कि ये पर्व दीपावली के दो दिनों के बाद आता है। इसी को भाई दूज के नाम से भी जाना जाता है। भाई दूज का महत्त्व रक्षा बंधन के समान ही है जिसमे बहनें अपने भाइयों को रक्षा सूत्र बांधती हैं और उनके वज्र के समान शक्तिशाली होने की कामना करती हैं। बदले में भाई भी अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है।

सोमवार, अक्तूबर 28, 2019

गोवर्धन पूजा

गोवर्धन पूजा हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्यौहार है जो दीपावली के दो दिन के बाद मनाया जाता है। उत्तरप्रदेश के ब्रज, गोकुल और वृन्दावन में तो दीवाली के अगले दिन से ही गोवर्धन पूजा का आरम्भ हो जाता है। उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड और मध्यप्रदेश में इस पूजा को धूम धाम से मनाया जाता है। इसका एक नाम अनंतकूट भी है और बिहार में इस पर्व को भाई दूज और चित्रगुप्त पूजा के साथ ही मनाया जाता है। बिहार में इसे अपभ्रंश रूप से "गोधन पूजा" भी कहा जाता है।

शनिवार, अक्तूबर 26, 2019

नरक चतुर्दशी

आज नरक चतुर्दशी का त्यौहार है, जिसे  नरक चौदस भी कहा जाता है। हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को, दीवाली से एक दिन पहले ये त्यौहार आता है और इसी कारण इसे छोटी दीवाली भी कहते हैं। इसके कई और नाम हैं - काली चौदस, रूप चौदस, नर्क निवारण चतुर्दशी, भूत चतुर्दशी, नर्का पूजा इत्यादि। कहते हैं कि इस दिन प्रातः काल तेल की मालिश कर के स्नान करने पर नर्क की यातनाओं से मुक्ति मिल जाती है। इसी दिन शाम को दीप दान किया जाता है जिससे यमराज प्रसन्न होते हैं। 

गुरुवार, अक्तूबर 24, 2019

श्रीकृष्ण के तीन सबसे घनिष्ठ मित्र

सुदामा:
जब भी मित्रता की बात होती है तो कृष्ण-सुदामा का नाम अवश्य आता है। सुदामा श्रीकृष्ण के बाल सखा और अनन्य भक्त थे। कंस के वध के बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने गए तो वहाँ उनकी भेंट सुदामा से हुई। सुदामा एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण कुमार थे जो पहले से ही सांदीपनि मुनि के यहाँ शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उनका एक स्वाभाव था कि वो किसी से कुछ मांगते नहीं थे। एक बार वर्षाकाल में कृष्ण और सुदामा जंगल में अलग-अलग वृक्षों पर फस गए। उनकी गुरुमाता ने उन्हें कुछ चावल दिए थे जो सुदामा के पास थे। भूख लगने पर सुदामा ने वो सारे चावल खा लिए। जब श्रीकृष्ण को ये पता चला तो उन्होंने हँसते हुए कहा कि अब उनपर श्रीकृष्ण का ऋण है।

मंगलवार, अक्तूबर 22, 2019

श्रीफल

नारियल हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र वस्तुओं में से एक माना जाता है। इसे श्रीफल भी कहते हैं, अर्थात समृद्धि देने वाला फल। इसीलिए इसे माता लक्ष्मी से भी जोड कर देखा जाता है। दुनिया में केवल नारियल ही एक ऐसा फल है जो पूर्ण रूप से शुद्ध है और जिसमें किसी भी प्रकार की मिलावट नहीं की जा सकती। यही नहीं, केवल नारियल ही एक ऐसा वृक्ष है जिससे जुडी हर चीज मनुष्य के काम आती है। इसीलिए भारत, विशेषकर दक्षिण भारत में इसे "कल्पवृक्ष" भी कहा जाता है।

शुक्रवार, अक्तूबर 18, 2019

अतिकाय

हम सबने रावण के ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद के विषय में जरूर पढ़ा होगा किन्तु रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में अधिक जानकारी नहीं दी गयी है। इस लेख में रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में बताया जाएगा। वो रावण के ७ पुत्रों में से एक था जो मंदोदरी से उत्पन्न हुआ था। हालाँकि कई ग्रंथों में रावण की दूसरी पत्नी धन्यमालिनी को अतिकाय की माता बताया जाता है। धन्यमालिनी मंदोदरी की छोटी बहन थी जो मय दानव और हेमा अप्सरा की पुत्री थी।

सोमवार, अक्तूबर 14, 2019

भूरिश्रवा

भूरिश्रवा महाभारत के सबसे प्रसिद्ध योद्धाओं में से एक थे। इन्होने महाभारत युद्ध में कौरवों के पक्ष से युद्ध किया था। कौरव सेना के प्रधान सेनापति भीष्म ने अपनी ११ अक्षौहिणी सेना के लिए जिन ११ सेनापतियों का चयन किया था, भूरिश्रवा उन सेनापतियों में से एक थे। भूरिश्रवा का वध युद्ध के १४वें दिन सात्यिकी ने किया था। वास्तव में भूरिश्रवा कुरुवंशी ही थे और महाभारत युद्ध में उनके साथ उनके पिता और दादा ने भी युद्ध किया था।

शनिवार, अक्तूबर 12, 2019

शरद पूर्णिमा

कल शरद पूर्णिमा का पर्व है। इस पर्व का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है। आश्विन महीने की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। शरद का एक अर्थ चन्द्रमा भी है और इस दिन चाँद की किरणों का अपना एक अलग ही महत्त्व होता है। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्र की किरणों में स्वयं अमृत समाहित होता है। यही कारण है कि आज के दिन गावों में लोग खुले आकाश एवं चांदनी के नीचे सोते हैं। कहते हैं कि शरद पूर्णिमा की रौशनी में रहने से कई प्रकार के रोग समाप्त हो जाते हैं। 

गुरुवार, अक्तूबर 10, 2019

जब रावण असुरराज शंभर से पराजित हुआ

ये रावण के मानमर्दन श्रृंखला का दूसरा लेख है। इससे पहले के लेख में हमने ये बताया था कि किस प्रकार रावण दैत्यराज बलि के हाथों परास्त होने के बाद अपमानित होता है। इस लेख में हम असुरराज शंभर के हाथों रावण के पराजय की कथा बताएंगे। शंभर वैजंतपुर के सम्राट थे। उनकी पत्नी माया मय दानव की पुत्री एवं रावण की पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन थी। इस प्रकार रावण शंभर का सम्बन्धी था।

रविवार, अक्तूबर 06, 2019

माद्री

आज पंजाब में जिस स्थान पर रावी और चिनाब नदियों का मिलन होता है उसे ही पहले मद्रदेश कहा जाता था। वहाँ के एक राजा थे भगवान, जिन्होंने लम्बे समय तक मद्र पर शासन किया। मद्रदेश उस समय आर्यावर्त के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राज्यों में से एक माना जाता था। उनकी दो संतानें थी, एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्र का नाम शल्य और पुत्री का नाम माद्री था।

शुक्रवार, अक्तूबर 04, 2019

माँ गौरी और उनके वाहन की कथा

माता सती की मृत्यु के उपरांत भगवान शिव बैरागी हो गए। तब सती ने पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। उस जन्म में भी उनका महादेव के प्रति अनुराग था और इसी कारण उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की और अंततः उन्हें पति के रूप में प्राप्त किया। दोनों का विवाह बड़ी धूम धाम से हुआ और फिर वे दोनों अपने निवास कैलाश पर लौट आये और कुछ काल उन्होंने बड़े सुख से बिताये।

बुधवार, अक्तूबर 02, 2019

माँ दुर्गा के १०८ नाम

माता पार्वती ही संसार की समस्त शक्तियों का स्रोत हैं। उन्ही का एक रूप माँ दुर्गा को भी माना जाता है। उनपर आधारित ग्रन्थ "दुर्गा सप्तसती" में माँ के १०८ नामों का उल्लेख है। प्रातःकाल इन नामों का स्मरण करने से मनुष्य के सभी दुःख दूर होते हैं। आइये उन नामों और उनके अर्थों को जानें:
  1. सती: भगवान शंकर की पहली पत्नी। अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाली इन देवी का माहात्म्य इतना है कि उसके बाद पति परायण सभी स्त्रियों को सती की ही उपमा दी जाने लगी।
  2. साध्वी: ऐसी स्त्री जो आशावादी हो।

शनिवार, सितंबर 28, 2019

महर्षि भृगु

पुराणों में महर्षि भृगु के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। ये भारतवर्ष के सर्वाधिक प्रभावशाली, सिद्ध और प्रसिद्ध ऋषियों में से एक है। ये परमपिता ब्रह्मा और महर्षि अंगिरा के छोटे भाई थे और वर्तमान के बलिया (उत्तरप्रदेश) में जन्मे थे। ये एक प्रजापति भी हैं और स्वयंभू मनु के बाद के मन्वन्तरों में कई जगह इनकी गणना सप्तर्षियों में भी की जाती है। इनके वंशज आगे चल कर भार्गव कहलाये और उनसे भी भृगुवंशियों का प्रादुर्भाव हुआ। नारायण के छठे अवतार श्री परशुराम भी इन्ही के वंश में जन्मे और भृगुवंशी कहलाये।

शुक्रवार, सितंबर 20, 2019

दस दिशाएं और दिग्पाल

दिशाओं के विषय में सबको पता है। हमें मुख्यतः ४ दिशाओं के बारे में पता होता है जो हैं पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण। वैज्ञानिक और वास्तु की दृष्टि से ४ और दिशाएं है जो इन चारों दिशाओं के मिलान बिंदु पर होती हैं। ये हैं - उत्तरपूर्व (ईशान), दक्षिणपूर्व (आग्नेय), उत्तरपश्चिम (वायव्य) एवं दक्षिणपश्चिम (नैऋत्य)। तो इस प्रकार ८ होती हैं जो सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त उर्ध्व (आकाश) एवं अधो (पाताल) को भी दो दिशाएं मानी जाती है। तो दिशाओं की संख्या १० हुए। अंततः जहाँ हमारी वर्तमान स्थिति होती है उसे मध्य दिशा कहते हैं। इस प्रकार दिशों की कुल संख्या ११ होती है। किन्तु ११ में से १०, उनमे से ८ एवं उनमे से भी ४ दिशाओं का विशेष महत्त्व है।

गुरुवार, सितंबर 12, 2019

कार्तवीर्य अर्जुन

कार्तवीर्य अर्जुन पौराणिक काल के एक महान चंद्रवंशी सम्राट थे जिनकी राजधानी महिष्मति नगरी थी। इनके वंश का आरम्भ ययाति के पुत्र यदु से हुआ। ये वास्तव में यदुवंशी ही थी किन्तु आगे चलकर यदुवंश से हैहय वंश अलग हो गया जिस कारण ये हैहैयवंशी कहलाये। यदुवंश और हैहयवंश का विस्तृत वर्णन पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ। हैहयवंश महाराज शतजित के पुत्र हैहय से प्रारम्भ हुआ। इन्ही के वंश में आगे जाकर महाराज कर्त्यवीर्य के पुत्र के रूप में अर्जुन का जन्म हुआ जो आगे चलकर अपने पिता के नाम से कर्त्यवीर्य अर्जुन और अपने १००० भुजाओं के कारण सहस्त्रार्जुन के नाम से प्रसिद्ध हुए।

रविवार, सितंबर 08, 2019

सोलह सिद्धियाँ

पुराणों में १६ मुख्य सिद्धियों का वर्णन किया गया है। किसी एक व्यक्ति में सभी १६ सिद्धियों का होना दुर्लभ है। केवल अवतारी पुरुष, जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादि अथवा बहुत सिद्ध ऋषियों जैसे सप्तर्षियों में ये सारी सिद्धियाँ हो सकती है। इसे १६ कलाओं से भी जोड़ कर देखा जाता है। आइये इन सिद्धियों के विषय में कुछ जानते हैं:

शनिवार, अगस्त 31, 2019

ब्राह्मणों के प्रकार

वैसे तो ये सम्पूर्ण सृष्टि ही परमपिता ब्रह्मा से उत्पन्न हुई है किन्तु उनमे से भी ब्राह्मणों को उनका ही दूसरा रूप माना गया है। "ब्राह्मण", ये शब्द भी स्वयं "ब्रह्मा" से उत्पन्न हुआ है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में कई स्थान पर ऋषि, मुनि इत्यादि का वर्णन है। आम तौर पर हम इसे एक ही समझ लेते हैं किन्तु इनमे भी भेद है। हमारे ग्रंथों में ब्राह्मणों के भी ८ प्रकार बताये गए हैं। तो आइए आज इस विषय में कुछ जानते हैं।

मंगलवार, अगस्त 27, 2019

शुक्रवार, अगस्त 23, 2019

उज्जैन से अन्य ज्योतिर्लिंगों की दूरी

द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रृंखला में हमने
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में एक लेख लिखा था। कहा गया है:

आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्।
भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते॥

अर्थात: आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।

गुरुवार, अगस्त 15, 2019

रक्षा बंधन

आप सभी को रक्षाबंधन एवं स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। रक्षाबंधन एक अति प्राचीन पर्व है जो हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व में बहनें अपने भाइयों के हाथ में रेशम के धागों का एक सूत्र बाँधती है और उसकी रक्षा की कामना करती है। बदले में भाई भी सदैव अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है। ये साधारण सा बंधन भाई एवं बहन की रक्षा की कड़ी है और इसी कारण इसे रक्षा बंधन के नाम से जाना जाता है। सांस्कृतिक रूप से तो इसका बहुत महत्त्व है पर आज हम इसके धार्मिक महत्त्व को जानेंगे।

मंगलवार, अगस्त 13, 2019

कुबेर की नौ निधियाँ

कुछ समय पहले हमने आपको पवनपुत्र हनुमान की नौ निधियों के बारे में बताया था। हनुमानजी को अष्ट सिद्धि और नौ निधि का दाता कहा जाता है। जिस प्रकार हनुमान के पास नौ निधियाँ हैं, ठीक उसी प्रकार देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के पास भी नौ निधियाँ हैं। अंतर केवल इतना है कि हनुमान अपनी नौ निधियों को किसी अन्य को प्रदान कर सकते हैं जबकि कुबेर ऐसा नहीं कर सकते।

शुक्रवार, अगस्त 09, 2019

तिरुपति बालाजी

कदाचित ही कोई ऐसा हो जिसने तिरुपति बालाजी का नाम ना सुना हो। इसे दक्षिण भारत के सब बड़े और प्रसिद्ध मंदिर के रूप में मान्यता प्राप्त है। दक्षिण भारत के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी इस मंदिर की बहुत मान्यता है। यह एक ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान विष्णु मनुष्य रूप में विद्यमान हैं जिन्हे "वेंकटेश" कहा जाता है। इसी कारण इसे "वेंकटेश्वर बालाजी" भी कहते हैं। ये मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है जहाँ की अनुमानित धनराशि ५०००० करोड़ से भी अधिक है। इसके पीछे का कारण बड़ा विचित्र है।

सोमवार, अगस्त 05, 2019

क्यों महाभारत के युद्ध को रोकना असंभव था?

कौरवों ने छल से द्युत जीतकर पांडवों को १२ वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास पर भेज दिया। पांडवों ने अपना वनवास और अज्ञातवास नियमपूर्वक पूर्ण किया। विराट के युद्ध के पश्चात स्वयं पितामह भीष्म ने कहा कि पांडवों ने सफलतापूर्वक अपना अज्ञातवास पूर्ण कर लिया था किन्तु दुर्योधन अपने हठ पर अड़ा रहा। पांडवों ने धृतराष्ट्र से विनम्रतापूर्वक अपने हिस्से का राज्य माँगा पर पुत्रमोह में पड़ कर धृतराष्ट्र अच्छे-बुरे का विवेक खो बैठे। जब हस्तिनपुर दूत बनकर गए श्रीकृष्ण स्वयं संधि करवाने में असफल रहे तब अंततः महाभारत का युद्ध निश्चित हो गया। 

शुक्रवार, जुलाई 26, 2019

क्या श्रीकृष्ण माँ काली के अवतार हैं?

अगर आपसे कोई पूछे कि श्रीकृष्ण किसके अवतार थे तो १००० में से ९९९ लोग बिना संकोच के कहेंगे कि श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार थे। हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी इस बात की स्पष्ट व्याख्या है कि भगवान श्रीकृष्ण के रूप में श्रीहरि ने अपना ९वां अवतार लिया। ध्यान रहे कि अधिकतर ग्रंथों में गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार नहीं माना जाता। कदाचित बहुत बाद में उन्हें दशावतार में स्थान देने के लिए प्रचारित किया गया था। इसके विषय में विस्तार से यहाँ पढ़ें।

शनिवार, जुलाई 20, 2019

राघवयादवीयम् - विश्व की सबसे अद्भुत रचना

क्या आप किसी ऐसे ग्रन्थ के विषय में सोच सकते हैं जिसे आप सीधे पढ़े तो कुछ और अर्थ निकले और अगर उल्टा पढ़ें तो कोई और अर्थ? ग्रन्थ को तो छोड़िये, ऐसा केवल एक श्लोक भी बनाना अत्यंत कठिन है। लेकिन क्या आपको पता है कि एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें एक नहीं बल्कि ३० श्लोक इस प्रकार लिखे गए हैं जिसे अगर आप सीधा पढ़ें तो रामकथा बनती है और उसी को अगर आप उल्टा पढ़ें तो कृष्णकथा। जी हाँ, ऐसा अद्भुत ग्रन्थ हमारे भारत में ही है। उस ग्रन्थ का नाम है राघवयादवीयम्, जो स्वयं राघव (श्रीराम) और यादव (श्रीकृष्ण) के योग से बना है। इसे "अनुलोम-विलोम काव्य" भी कहा जाता है।

मंगलवार, जुलाई 16, 2019

महावीर हनुमान की दस गौण सिद्धियां

पिछले लेखों में आपने महाबली हनुमान की अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों के विषय में पढ़ा। इसके अतिरिक्त पवनपुत्र के पास १० गौण सिद्धियों के होने का भी वर्णन है। ये गोपनीय और रहस्य्मयी १० गौण सिद्धियां जिस किसी के पास भी होती हैं वो अजेय हो जाता है। भागवत पुराण में श्रीकृष्ण ने भी इन १० गौण सिद्धियों के महत्त्व का वर्णन किया है। ये सिद्धियां चमत्कारी हैं और देवों तथा दानवों के लिए भी दुर्लभ हैं। आइये इन १० गौण सिद्धियों के बारे में कुछ जानते हैं: 

रविवार, जुलाई 14, 2019

महर्षि भृगु द्वारा त्रिदेवों की परीक्षा

बहुत काल के पहले महान ऋषियों द्वारा पृथ्वी पर एक महान यज्ञ किया गया। तब उस समय प्रश्न उठा कि इसका पुण्यफल त्रिदेवों में सर्वप्रथम किसे प्रदान किया जाये। तब महर्षि अंगिरा ने सुझाव दिया कि इन तीनों में जो कोई भी "त्रिगुणातीत", अर्थात सत, राज और तम गुणों के अधीन ना हो उसे ही सर्वश्रेष्ठ मान कर यज्ञ का पुण्य सबसे पहले प्रदान किया जाये। किन्तु अब त्रिदेवों की परीक्षा कौन ले? वे तो त्रिकालदर्शी हैं और जो कोई भी उनकी परीक्षा लेने का प्रयास करेगा उसे उनके कोप का भाजन बनना पड़ेगा। तब सप्तर्षियों ने महर्षि भृगु का नाम सुझाया और उनके अनुमोदन पर भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने को तैयार हो गए।

शुक्रवार, जुलाई 12, 2019

बालखिल्य

हमारे सप्तर्षि श्रृंखला में आपने महर्षि क्रतु के विषय में पढ़ा। बालखिल्य इन्ही महर्षि क्रतु के पुत्र हैं। प्रजापति दक्ष की पुत्री सन्नति से महर्षि क्रतु ने विवाह किया जिससे इन्हे ६०००० तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुए। इन बाल ऋषियों का आकर केवल अंगूठे जितना था। ये सारे ६०००० पुत्र ही सामूहिक रूप से बालखिल्य कहलाते हैं। महर्षि क्रतु के ये तेजस्वी पुत्र गुण और तेज में अपने पिता के समान ही माने जाते हैं। बालखिल्यों और पक्षीराज गरुड़ का सम्बन्ध बहुत पुराना है।

बुधवार, जुलाई 10, 2019

महावीर हनुमान की नौ निधियाँ

पवनपुत्र हनुमान को अष्ट सिद्धि और नौ निधियों का स्वामी कहा गया है। पिछले लेख में आपने बजरंगबली की आठ सिद्धियों के बारे में पढ़ा था। इस लेख में हम आपको उनकी नौ निधियों के बारे में बताएँगे। निधि का अर्थ धन अथवा ऐश्वर्य होता है। ऐसी वस्तुएं जो अत्यंत दुर्लभ होती हैं, बहुत ही कम लोगों के पास रहती हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए घोर तप करना होता हो, उन्हें ही निधि कहा जाता है। वैसे तो ब्रह्माण्ड पुराण एवं वायु पुराण में कई निधियों का उल्लेख किया गया है किन्तु उनमे से नौ निधियाँ मुख्य होती हैं। कहा जाता है कि हनुमानजी को ये नौ निधियाँ माता सीता ने वरदान स्वरुप दी थी।

शनिवार, जुलाई 06, 2019

क्यों श्रीकृष्ण ने अपने ही पुत्र को श्राप दिया?

महाभारत काल के दौरान सत्राजित की समयान्तक मणि ढूंढने के दौरान श्रीकृष्ण एक गुफा में पहुँचे जहाँ उन्होंने ऋक्षराज जांबवंत को देखा। जांबवंत के पास श्रीकृष्ण की समयान्तक मणि थी और जब उन्होंने उसे श्रीकृष्ण को वापस देने से मना किया तब दोनों के बीच भयानक युद्ध आरम्भ हुआ। ये युद्ध २८ दिनों तक चलता रहा किन्तु दोनों के बीच हार-जीत का निर्णय नहीं हो सका। तब जांबवंत ने अपने आराध्य श्रीराम का स्मरण किया तो उन्हें श्रीकृष्ण में ही अपने प्रभु श्रीराम दिखाई दिए। इससे जांबवंत को समझ आ गया कि श्रीकृष्ण ही श्रीराम के दूसरे रूप हैं। उन्होंने मणि श्रीकृष्ण को दे दी और अपनी पुत्री जांबवंती का विवाह भी श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

शुक्रवार, जून 28, 2019

विकर्ण

विकर्ण कुरु सम्राट धृतराष्ट्र एवं गांधारी का १९वां पुत्र था (१०० कौरवों का नाम जानने के लिए यहाँ जाएँ)। महाभारत में दुर्योधन और दुःशासन के अतिरिक्त केवल विकर्ण ही है जिसकी प्रसिद्धि अधिक है। अन्य कौरवों के बारे में लोग अधिक नहीं जानते हैं। वैसे तो युयत्सु भी धृतराष्ट्र का एक प्रसिद्ध पुत्र है किन्तु दासी पुत्र होने के कारण उसे वो सम्मान नहीं मिला जिसका वो अधिकारी था। हालाँकि कौरवों में केवल युयुत्सु ही ऐसा था जो महाभारत के युद्ध के बाद जीवित बच गया था। कौरवों में विकर्ण ही ऐसा था जो अपने सच्चरित्र के कारण प्रसिद्ध हुआ।

बुधवार, जून 26, 2019

महावीर हनुमान की अष्ट सिद्धियाँ

आप सभी ने हनुमान चालीसा में एक चौपाई अवश्य पढ़ी होगी - "अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता"। इसका अर्थ ये है कि महावीर हनुमान आठ प्रकार की सिद्धि और नौ प्रकार की निधियों को प्रदान करने वाले हैं। इस लेख में हम महाबली हनुमान की आठ सिद्धियों के बारे में बात करेंगे। सिद्धि ऐसी आलौकिक शक्तियों को कहा जाता है जो घोर साधना अथवा तपस्या से प्राप्त होती है। हिन्दू धर्म में अनेक प्रकार की सिद्धियों का वर्णन है किन्तु उसमे से ८ सिद्धियाँ सर्वाधिक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण मानी जाती है। जिनके पास ये सभी सिद्धियाँ होती हैं वो अजेय हो जाता है। इन सिद्धियों को एक श्लोक से दर्शाया गया है:

शनिवार, जून 22, 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र (अर्थ सहित)

पिछले लेख
में आपने मृतसञ्जीवनी मन्त्र के विषय में पढ़ा। इस भाग में हम "मृतसंजीवनी स्त्रोत्र" के विषय में आपको बताएँगे। ऐसा माना जाता है कि इस महान स्त्रोत्र को परमपिता ब्रह्मा के पुत्र महर्षि वशिष्ठ ने लिखा था। ३० श्लोकों का ये स्त्रोत्र भगवान शिव को समर्पित है और उनके कई अनजाने पहलुओं पर प्रकाश डालता है। जो कोई भी इस स्त्रोत्र का पूर्ण चित्त से पाठ करता है, उसे जीवन में किसी भी कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता। इस लेख में हम आपको पूर्ण मृतसञ्जीवनी मन्त्र से अर्थ सहित परिचित करवाएंगे।

मंगलवार, जून 18, 2019

मृतसंजीवनी मंत्र

हिन्दू धर्म में अनेकानेक मन्त्रों का वर्णन है किन्तु जो दो मन्त्र सबसे प्रमुख हैं वो है भगवान शिव का "महामृत्युञ्जय मन्त्र" और वेदमाता गायत्री का "श्री गायत्री मन्त्र"। इन दोनों के सामान शक्तिशाली और कोई मन्त्र नहीं है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद गीता में कहा है कि "मन्त्रों में मैं गायत्री हूँ"। ऐसा माना जाता है कि दोनों मन्त्रों में किसी का १२५०००० बार जाप करके बड़ी से बड़ी इच्छा को फलीभूत किया जा सकता है।

शुक्रवार, जून 14, 2019

शिवलिंग पर चढाने योग्य वस्तुएं

वैसे तो शिवलिंग पर कई चीजें चढ़ाई जाती है जिनमे से प्रमुख है दुग्ध, घृत, शहद, दही इत्यादि किन्तु आम तौर पर दो चीजों का महत्त्व बहुत अधिक है। वो हैं बिल्वपत्र (बेलपत्र) और गंगाजल। किन्तु इनके अतिरिक्त कई अन्य चीजों को शिवलिंग को अर्पण करने का विधान पुराणों में बताया गया है। इसका पता हमें शिवपुराण के एक श्लोक से चलता है:

बुधवार, जून 12, 2019

अप्सराएँ

हिन्दू धर्म में अप्सराएँ सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है और बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अप्सराओं से अधिक सुन्दर रचना और किसी की भी नहीं मानी जाती। पृथ्वी पर जो कोई भी स्त्री अत्यंत सुन्दर होती है उसे भी अप्सरा कह कर उनके सौंदर्य को सम्मान दिया जाता है। कहा जाता है कि देवराज इंद्र ने अप्सराओं का निर्माण किया था। कई अप्सराओं की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा ने भी की थी जिनमे से तिलोत्तमा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त कई अप्सराएं महान ऋषिओं की पुत्रियां भी थी। भागवत पुराण के अनुसार अप्सराओं का जन्म महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री मुनि से हुआ था। कामदेव और रति से भी कई अप्सराओं की उत्पत्ति बताई जाती है।

मंगलवार, जून 04, 2019

जब श्रीराम कल्पवृक्ष को पृथ्वी पर ले आये

महर्षि दुर्वासा के विषय में हम सभी जानते हैं। वे महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र थे जो भगवान शिव के अंश से जन्मे थे। इनकी गणना सर्वाधिक क्रोधी ऋषि के रूप में की जाती है। श्राप तो जैसे इनकी जिह्वा की नोक पर रखा रहता था। इन्ही महर्षि दुर्वासा ने एक बार श्रीराम की परीक्षा लेने की ठानी। उन्हें पता था कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं किन्तु फिर भी सामान्य जन को उनका महत्त्व और महानता दिखाने के लिए वे श्रीराम की परीक्षा लेने अयोध्या पहुँचे। उस समय तक लंका युद्ध समाप्त हो गया था और श्रीराम सुखपूर्वक अयोध्या पर राज्य कर रहे थे।