सोमवार, अप्रैल 13, 2020

मंदोदरी - १: पूर्वजन्म

मंदोदरी मय दानव और हेमा नामक अप्सरा की पुत्री और रावण की पट्टमहिषी थी। इन्हे पञ्चसतियों में से एक माना जाता है। कई ग्रंथों का कहना है कि मय दानव केवल इनके दत्तक पिता थे और मय और हेमा ने केवल मंदोदरी का पालन पोषण किया। इस विषय में भी विद्वानों में मतभेद है। इस कथा के पीछे मंदोदरी के पूर्वजन्म की एक बड़ी अनोखी कथा है।

एक कथा के अनुसार मधुरा नामक के अप्सरा थी जो एक भार भगवान शंकर के दर्शनों के लिए कैलाश पहुँची। भोलेनाथ उस समय समाधिरत थे। मधुरा उनका अलौकिक रूप देख कर मुग्ध हो गयी। माता पार्वती को आस पास ना देख कर मधुरा नृत्य-संगीत और आलिंगन द्वारा महादेव को रिझाने का प्रयास करने लगी। बहुत प्रयत्न करने के पश्चात भी वो महादेव का तप भंग ना कर पायी। उसी समय माता पार्वती वहाँ पहुंची और मधुरा के शरीर पर महादेव की भस्म लगी देख कर वे बड़ी क्रोधित हुई। उन्होंने मधुरा को मेढ़की बनने का श्राप दे दिया।

उसी समय भगवान शंकर जागे और उन्होंने माता से कहा कि ये कन्या भूलवश मुझपर आकर्षित हो गयी अतः इसकी गलती को एक बालिका की गलती समझ कर क्षमा कर दो। तब माता ने अपने श्राप को सीमित करते हुए कहा कि वो केवल १२ वर्षों तक मेढ़की के रूप में रहेगी और अगर इसने १२ वर्षों तक घोर तप किया तब उसे उस योनि से मुक्ति मिल जाएगी।

माता के श्राप के कारण मधुरा मेढ़की बन एक कुँए में गिर पड़ी। वहीँ उसने भगवान शंकर की १२ वर्षों तक घोर तपस्या की। उसने अपने मन ही मन में महादेव से ये कामना की कि उसका विवाह संसार के सबसे शक्तिशाली और विद्वान व्यक्ति से हो। १२ वर्षों की समाप्ति के बाद भगवान शंकर उसकी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे श्रेष्ठ पति को प्राप्त करने का वरदान दिया। साथ ही उन्होंने मधुरा को चिरकुमारी रहने का वरदान भी दिया जिसके कारण उसका यौवन कभी क्षीण नहीं होता था। 

महादेव से वरदान पाने के पश्चात उनकी कृपा से मधुरा पुनः अपने स्वरुप में आ गयी और स्वयं को उस कुँए से बाहर निकलने हेतु सहायता के लिए चिल्लाने लगी। उसी कुँए के पास मय दानव अपनी पत्नी हेमा के साथ विचरण कर रहा था। एक स्त्री की पुकार सुनकर दोनों वहाँ आये और मधुरा को कुँए से बाहर निकला। उसे देख कर दोनों के मन में स्वतः ही वात्सल्य जाग उठा और दोनों ने उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उसकी छरहरी काया के कारण उन्होंने उसका नाम मंदोदरी (कम उदर (पेट) वाली) रखा।

इस विषय में एक और कथा प्रचलित है कि माता के श्राप के कारण मधुरा मेढ़की में बदल कर इधर-उधर भटकने लगी। एक दिन वो भटकते हुए सप्तर्षियों के पास पहुँची जहाँ वे अपने भोजन के लिए खीर बना रहे थे। पात्र को चूल्हे पर रख कर वे आपस में वार्तालाप कर रहे थे कि अचानक उनकी खीर में एक विषधर सर्प गिर गया। ये सप्तर्षियों ने नहीं देखा किन्तु मेढ़की बनी मधुरा ने देख लिया। उसने सोचा कि अब तो इस भोजन को खाकर ये सभी मर जाएंगे इसलिए वो उनके पास जाकर कूदने लगी। किन्तु एक मेढ़की पर भला कौन ध्यान देता, वे सभी ऋषि अपने वार्तालाप में व्यस्त रहे। 

कुछ समय के पश्चात वे भोजन करने पहुँचे। मधुरा ने जब देखा कि अब वे वो विषैला भोजन करने ही वाले हैं तो उसने और कोई चारा ना देख कर उसी गर्म खीर में छलांग लगा दी और मृत्यु को प्राप्त हुई। जब सप्तर्षियों ने देखा कि खीर में मेढ़की गिर गयी है तो उन्होंने उस खीर को फेंक दिया। तब उस खीर से उस मेढ़की के साथ मरा हुआ विषधर भी निकला। ये देख कर सप्तर्षि बहुत द्रवित हुए कि वो तो अमर हैं किन्तु उनके कारण उस मेढ़की ने नाहक ही अपने प्राण गवा दिए। किन्तु उस मेढ़की का बलिदान देखकर उन्होंने उसे एक कन्या बालिका के रूप में पुनर्जीवित कर दिया। 

कुछ समय वो उन सप्तर्षियों के साथ ही रही किन्तु वे उसे कब तक अपने साथ रखते? उसी समय मयासुर अपनी पत्नी हेमा के साथ उनके पास आया और उनसे संतान की कामना की। तब सप्तर्षियों ने उस कन्या को मयासुर के हाथों सौंप दिया जिसका पालन-पोषण मय और हेमा ने किया। वही कन्या बड़ी होकर मंदोदरी के नाम से प्रसिद्ध हुई। बाद में उसने श्री बिल्वेश्वर नाथ मंदिर में भगवान शिव की आराधना की जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने उसे अद्भुत सौंदर्य प्रदान किया और चिरकुमारी रहने का वरदान दिया। तब मंदोदरी ने एक ऐसी पति की कामना की जो संसार में सबसे अधिक शक्तिशाली और विद्वान हो। महादेव ने उसे ये वरदान भी दिया। वो बिल्वेश्वर नाथ का मंदिर आज के मेरठ शहर में स्थित है।

मंदोदरी के युवा होने पर मय दानव पूरे विश्व में उसके लिए योग्य वर ढूंढता रहा किन्तु कोई भी योग्य वर उसे मंदोदरी के लिए नहीं दिखा। तभी धरा पर रावण का उदय हुआ जिसने अपने प्रचंड पराक्रम से मनुष्यों, नाग, गन्धर्व, यक्ष, दैत्य, दानव और देवताओं तक पर अपना अधिपत्य जमा लिया। वो ब्रह्मा का प्रपौत्र, महर्षि पुलत्स्य का पौत्र और विश्रवा मुनि का पुत्र था। उसे चारो वेद कंठस्थ थे और उस युग में उससे विद्वान कोई और नहीं था। रावण के गुण महादेव के दोनों वरदानों को संतुष्ट करते थे। और तो और वो स्वयं महादेव का भी कृपा पात्र था। मय दानव को मंदोदरी के लिए रावण से अधिक योग्य वर दिखाई नहीं दिया और उसने उसके विवाह का प्रस्ताव रावण के समक्ष रखा। पूरे विश्व में मंदोदरी के समान सुन्दर स्त्री और कोई नहीं थी इसीलिए रावण ने उस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार किया।

2 टिप्‍पणियां:

  1. रानी मंदोदरी के बारे में इतनी सुंदर कथाओं का वर्णन करने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार।
    हिंदू धर्म और सत्य सनातन धर्म के बारे में आपका शोध स्तुत्य, प्रणम्य है ।आप ऐसे ही धर्म संसार के द्वारा इसका प्रचार-प्रसार करते रहे तथा हम लोगों को ऐसे ही सुंदर-सुंदर कथाओं के बारे में परिचित कराते रहें, यही कामना करती हूं।
    एक बार पुनः शुभकामनाएं

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