शनिवार, अक्तूबर 24, 2009

कृष्ण शंकर युद्ध

दानवीर दैत्यराज बलि के सौ प्रतापी पुत्र थे, उनमें सबसे बड़ा बाणासुर था। बाणासुर ने भगवान शंकर की बड़ी कठिन तपस्या की। शंकर जी ने उसके तप से प्रसन्न होकर उसे सहस्त्र बाहु तथा अपार बल दे दिया। उसके सहस्त्र बाहु और अपार बल के भय से कोई भी उससे युद्ध नहीं करता था। इसी कारण से बाणासुर अति अहंकारी हो गया। बहुत काल व्यतीत हो जाने के पश्चात् भी जब उससे किसी ने युद्ध नहीं किया तो वह एक दिन शंकर भगवान के पास आकर बोला, "हे चराचर जगत के ईश्वर! मुझे युद्ध करने की प्रबल इच्छा हो रही है किन्तु कोई भी मुझसे युद्ध नहीं करता। अतः कृपा करके आप ही मुझसे युद्ध करिये।"

मंगलवार, अक्तूबर 20, 2009

पांडवों का दिग्विजय

युधिष्ठिर का राजसू यज्ञ प्रारंभ होने वाला था। राजसू यज्ञ करने से पहले यह जरुरी था कि सारे राजा युधिष्ठिर का आधिपत्य स्वीकार कर ले। जरासंध पहले हीं भीम के हांथों मारा जा चुका था। दिग्विजय के लिए सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम चारो दिशाओं में निकले।

१०० कौरवों के नाम

हम सब जानते हैं की धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे।  कुछ लोग ये जानते होंगे की इनके अलावा उनका एक पुत्र और भी था जो वैश्य कन्या से उत्पन्न हुआ था जिसका नाम युयुत्सु था। इसके अतितिक्त इनकी एक कन्या भी थी जिसका नाम दुशाला था जो कौरवों एवं पांडवों की एकलौती बहन थी और उसका विवाह जयद्रथ के साथ हुआ था।

पुरु वंश का वर्णन

जैसा की हम जानते हैं कि सारी सृष्टी परमपिता ब्रम्हा से उत्पन्न हुई है इसलिए उनके बाद से पुरुवंश की पचास पीढ़ियों का वर्णन इस प्रकार है। आप दिए गए क्रम से उनकी पीढ़ी का पता लगा सकते है। 
१. परमपिता ब्रम्हा से प्रजापति दक्ष हुए। 
२. दक्ष से अदिति हुए। 
३. अदिति से विवस्वान हुए। 
४. बिस्ववान से मनु हुए जिनके नाम से हम लोग मानव कहलाते हैं। 
५. मनु से इला हुए। 
६. इला से पुरुरवा हुए जिन्होंने उर्वशी से विवाह किया। 
७. पुरुरवा से आयु हुए। 
८. आयु से नहुष हुए  जो इन्द्र के पद पर भी आसीन हुए परन्तु सप्तर्षियों के श्राप के कारण पदच्युत हुए।