शनिवार, मई 23, 2020

आदि शंकराचार्य - १: वास्तविक शंकराचार्य कौन हैं?

हिन्दू धर्म के महान प्रवर्तक जगतगुरु आदि शंकराचार्य को कौन नहीं जनता? किन्तु अगर मैं कहूँ कि हममें से अधिकतर लोग उनके विषय में सत्य नहीं जानते तो आपको आश्चर्य होगा। किन्तु सत्य यही है कि आदि शंकराचार्य के विषय में जो मिथ्या और भ्रामक जानकारी उपलब्ध है उसे ही अधिकतर हिन्दू जानते और मानते हैं। सबसे अधिक मिथक तो इनके जन्म का समय है जो इन्हे ८वीं सदी का विद्वान बताता है किन्तु सत्य ये नहीं है। तो आइये आदि शंकराचार्य के विषय में कुछ जानने से पहले अपने मन पर जमी अज्ञानता की धूल हम हटा लें।

रविवार, मई 17, 2020

पौराणिक द्वीप - ४: शाल्मल द्वीप

पिछले लेख में आपने प्लक्ष द्वीप के विषय में पढ़ा। अब हम शाल्मल द्वीप के विषय में कुछ जानते हैं।
  • शाल्मल द्वीप विस्तार में प्लक्ष द्वीप से दुगना है।
  • इस द्वीप के स्वामी पवुष्मान हैं जिनके सात पुत्र इस द्वीप के सातों वर्षों पर राज्य करते हैं। 

सोमवार, मई 11, 2020

पौराणिक द्वीप - ३: प्लक्ष द्वीप

पिछले लेख में आपने जम्बू द्वीप के बारे में विस्तार से पढ़ा। इस लेख में हम प्लक्ष द्वीप के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। आइये प्लक्ष द्वीप के बारे में कुछ अद्भुत तथ्य जानते हैं: 
  • प्लक्ष द्वीप का विस्तार जम्बू द्वीप से दूना है जो जम्बू द्वीप को चारो ओर से घेरे है और स्वयं चारो ओर से इक्षुरस (गन्ने के रस) सागर से घिरा हुआ है। 
  • विष्णु पुराण के अनुसार प्लक्ष द्वीप का विस्तार २००००० (दो लाख) योजन है। 

मंगलवार, मई 05, 2020

महर्षि व्यास के अनुसार पृथ्वी की संरचना

अगर हम पृथ्वी की संरचना और नक़्शे की बात करें तो अलग-अलग देशों में अपने-अपने मत हैं। रोम के वासियों का मानना था कि पृथ्वी का पहला नक्शा उन्होंने ही बनाया था। ऐसा ही कुछ प्राचीन ग्रीक और इजिप्ट के निवासी कहा करते थे। फ्रेंच और पुर्तगाली वासी आधुनिक विश्व के नक़्शे को अपना बताने का कोई मौका नहीं चूकते। पर क्या आपको ज्ञात है कि जिस विश्व की परिकल्पना हमने कुछ सौ वर्षों पहले की है उसके बारे में हमारे धर्मग्रंथों में पहले से ही बता दिया गया था।

शुक्रवार, मई 01, 2020

सीता लेखनी

हम सबने ब्राह्मी एवं देवनागरी लिपि के बारे में बहुत पढ़ा है किन्तु क्या आपने कभी "शंख लिपि" के विषय में सुना है? ऐसी मान्यता है कि शंख लिपि देवनागरी से भी प्राचीन लिपि थी जिसका ज्ञान दुर्भाग्य से आगे आने वाली पीढ़ियों को नहीं मिल पाया और इसी कारण ये लिपि पूर्णतः लुप्त हो गयी। इस लिपि का काल त्रेतायुग के अंत समय का बताया जाता है। वैसे तो ब्राह्मी लिपि को शंख लिपि से भी प्राचीन माना जाता है किन्तु सौभाग्य से ब्राह्मी लिपि का देवनागरी लिपि में अनुवाद कर लिया गया है। तो ब्राह्मी दुर्लभ तो है किन्तु लुप्त नहीं। पर कदाचित शंख लिपि उतनी भाग्यशाली नहीं रह पायी।

रविवार, अप्रैल 26, 2020

पौराणिक द्वीप - २: जम्बू द्वीप

पिछले लेख में आपने पौराणिक पृथ्वी की संरचना और ७ द्वीपों के विषय में पढ़ा था। इनमे से श्रेष्ठ है जम्बू द्वीप जिसके बारे में पुराणों में बहुत लिखा गया है। ब्रह्मपुराण में अध्याय १८ के श्लोक २१, २२ और २३ में जम्बुद्वीप की महत्ता का वर्णन है।

तपस्तप्यन्ति यताये जुह्वते चात्र याज्विन।
दानाभि चात्र दीयन्ते परलोकार्थ मादरात्।। (२१)

मंगलवार, अप्रैल 21, 2020

पौराणिक द्वीप - १: परिचय

आज आधुनिक विज्ञान ने बहुत उन्नति कर ली है और पृथ्वी के बारे में विस्तृत जानकारी हमारे पास है। हम सभी को पता है कि आज के युग में पृथ्वी को ७ महाद्वीपों में बंटा गया है। लेकिन क्या आपको पता है कि उसका आधार कैसे पड़ा? क्यों हम पृथ्वी को केवल ७ महाद्वीपों में ही बांटते हैं? उसका कारण ये है कि सप्तद्वीपों की विचारधारा आधुनिक नहीं है बल्कि हमारे हिन्दू धर्म में इसकी अवधारणा प्राचीन काल से चली आ रही है। आपको कदाचित ये पता नहीं होगा कि जो विश्व का नक्शा आज हमारे पास है वो भी महर्षि वेदव्यास की ही देन है। खैर उसके बारे में कभी और चर्चा करेंगे।

शुक्रवार, अप्रैल 17, 2020

मंदोदरी - २: सतीत्व

पिछले लेख में आपने मंदोदरी के पिछले जन्म की कथा पढ़ी और किस प्रकार उसका विवाह रावण के साथ हुआ। रावण से विवाह के बाद मंदोदरी लंका की महारानी बनी जो रावण ने अपने सौतेले भाई कुबेर से युद्ध में छीना था। मंदोदरी स्वयं विदुषी थी और कहा जाता है कि वो प्रायः राज-काज चलाने में रावण की सहायता करती थी। रावण को मंदोदरी से मेघनाद, प्रहस्त और अक्षयकुमार नामक तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुए।

सोमवार, अप्रैल 13, 2020

मंदोदरी - १: पूर्वजन्म

मंदोदरी मय दानव और हेमा नामक अप्सरा की पुत्री और रावण की पट्टमहिषी थी। इन्हे पञ्चसतियों में से एक माना जाता है। कई ग्रंथों का कहना है कि मय दानव केवल इनके दत्तक पिता थे और मय और हेमा ने केवल मंदोदरी का पालन पोषण किया। इस विषय में भी विद्वानों में मतभेद है। इस कथा के पीछे मंदोदरी के पूर्वजन्म की एक बड़ी अनोखी कथा है।

गुरुवार, अप्रैल 09, 2020

रावण का मानमर्दन - ४: वानरराज बाली

रावण के मानमर्दन श्रृंखला की ये चौथी कथा है। इसे पहले आप दैत्यराज बलि, असुरराज शंभर और कर्त्यवीर्य अर्जुन (सहस्त्रार्जुन) के हाथों रावण की पराजय का लेख पढ़ चुके हैं। इस लेख में हम उस चौथे योद्धा का वर्णन करेंगे जिसके हाथों रावण को अपमानजनक पराजय का स्वाद चखना पड़ा था। वो योद्धा था इंद्रपुत्र और किष्किंधा का राजा वानरराज बाली। कथा तब की है जब बाली के बल और शौर्य का डंका पूरे विश्व में बज रहा था। उस पर बाली ने उस दुदुम्भी, जिससे लड़ने को स्वयं समुद्र और हिमवान ने भी मना कर दिया था, केवल एक प्रहार में ही वध कर दिया था और उसके विशाल शव को अपने हाथों में उठा कर १ योजन दूर फेक दिया था। यही कारण था कि विश्व का कोई भी योद्धा उससे लड़ने का साहस नहीं जुटा पाता था।

शनिवार, अप्रैल 04, 2020

ययाति पुत्री माधवी - ३: शोषण

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार गरुड़ और ऋषि गालव श्यामकर्ण अश्व को ढूंढते हुए एक योगिनी शाण्डिली के पास पहुँचे। शाण्डिली ने उनकी सहायता की और उन्हें चक्रवर्ती सम्राट ययाति के पास जाने का सुझाव दिया। दोनों ययाति के पास पहुँचे और उनसे सहायता की मांग की। तब ययाति ने अपनी अद्वितीय सुंदरी कन्या माधवी उन दोनों को प्रदान की ताकि वे उसका विवाह करवा कर श्यामकर्ण अश्व प्राप्त कर सकें। 

माधवी को लेकर गालव और गरुड़ सर्वप्रथम अयोध्या के राजा हर्यश्व के पास पहुँचे। उन्होंने उनसे कहा कि "हे राजन! किसी कार्यवश हमें ८०० श्यामकर्ण अश्व की आवश्यकता है। इसके बदले महाराज ययाति की ये सुन्दर कन्या आपका वरण करेगी। आज संसार में इससे सुन्दर और शीलवती कन्या नहीं है। अतः आप इस श्रेष्ठ कन्या को पत्नी के रूप में वरण करें और हमें ८०० श्यामकर्ण अश्व प्रदान करें।"

मंगलवार, मार्च 31, 2020

ययाति पुत्री माधवी - २: ययाति का दान और शर्त

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि महर्षि विश्वामित्र के शिष्य गालव उन्हें गुरु दक्षिणा देने की जिद की जिससे तंग आकर विश्वामित्र ने उनसे ८०० श्यामकर्ण अश्व मांग लिए। गालव बहुत काल तक ऐसे अश्व ढूंढते रहे किन्तु ना मिलने पर उन्होंने भगवान विष्णु की तपस्या की। अंततः तंग आकर वे आत्महत्या करना ही चाहते थे कि नारायण की प्रेरणा पर गरुड़, जो कि गालव के मित्र थे, उनके पास पहुँचे। अपने मित्र गरुड़ को अपने समक्ष पाकर गालव को बड़ा संतोष हुआ। गरुड़ ने उनसे कहा कि वो अकेले इतने श्यामकर्ण अश्व नहीं खोज सकते। उनकी गति अत्यंत तीव्र है और वे उन अश्वों को खोजने में उनकी सहायता करेंगे। तब गरुड़ गालव को अपनी पीठ पर बिठाकर पूर्व दिशा की ओर बढे। उड़ते-उड़ते वे दोनों ऋषभ पर्वत पहुँचे जहाँ उनकी भेंट शाण्डिली नामक योगिनी से हुई। वहीं पर दोनों को शाण्डिली ने भोजन करवाया और तत्पश्चात दोनों गहरी नींद में सो गए।

गुरुवार, मार्च 26, 2020

ययाति पुत्री माधवी - १: ऋषि गालव का हठ

हमारे धर्मग्रंथों में ऐसी कई स्त्रियाँ हैं जिन्हे अपने जीवन में बड़े कष्ट झेलने पड़े किन्तु कुछ स्त्रियाँ ऐसी हैं जिन्हे इतना कुछ झेलना पड़ा जिसे सुनकर हम विश्वास भी नहीं कर सकते कि ऐसा कुछ हो सकता है। ऐसी ही एक कथा चक्रवर्ती सम्राट ययाति की पुत्री माधवी की है। कई जगह उसका नाम वृषदवती बताया गया है। उसके साथ जो हुआ वो कदाचित हम सोच भी नहीं सकते किन्तु अपने पिता के मान के लिए उसने सब सहा।

शुक्रवार, मार्च 20, 2020

कुब्जा

गोकुल वृंदावन में जब श्रीकृष्ण १६ वर्ष के हुए, कंस के निमंत्रण पर अक्रूर उन्हें और बलराम को लेकर मथुरा आ गए। कंस से मिलने से पहले उन्हें कुछ दिन अतिथिशाला में ठहराया गया जहाँ उन्होंने नगर भ्रमण का सोचा। वे दोनों भाई मथुरा की गलियों में भ्रमण करने लगे। वे जिधर भी निकल जाते, लोग उन्हें देखते ही रह जाते। नगर में पहले ही समाचार फ़ैल चुका था कि ये दोनों भाई ही उन्हें कंस के अत्याचारों से मुक्त करवाएंगे।

उसी नगर में एक त्रिवक्रा (कुबड़ी) रहा करती थी। वैसे तो उसका नाम सैरंध्री था किन्तु कुबड़ी होने के कारण उसका "कुब्जा" नाम ही प्रसिद्ध हो गया था। वो देखने में अति सुन्दर थी किन्तु उनकी शारीरिक विकलांगता के कारण सब उसे चिढ़ाते थे। इसी कारण उसने श्रृंगार करना बिलकुल ही छोड़ दिया जिससे उसकी वेश-भूषा अत्यन विकृत हो गयी थी। कुब्जा कंस की दासी थी जो प्रतिदिन उसके लिए पुष्प और चन्दन का उबटन लेकर राजमहल जाया करती थी। कंस को भी उसका सुगन्धित उबटन बहुत प्रिय था और इसीलिए वो भी उसका मान करता था।

सोमवार, मार्च 16, 2020

रावण की ७ अपूर्ण इच्छाएं

हमारे कई पौराणिक ग्रंथों में ऐसा वर्णन है कि रावण की कई ऐसी इच्छाएं थी जो वो पूरा नहीं कर पाया। उसकी अपूर्ण इच्छाएं तो बहुत थी किन्तु उनमे से ७ सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। रावण सप्तद्वीपाधिपति था, नवग्रह उसके अधीन रहते थे और स्वयं भगवान रूद्र की उसपर कृपा थी। किन्तु उसके बाद भी, अपने हर प्रयासों के बाद भी उसकी ये ७ इच्छाएं पूरी नहीं हो सकी। आइये इनके बारे में कुछ जानते हैं। 
  1. स्वर्ग तक सोपान का निर्माण: लंका का अधिपति बनने के बाद रावण ने स्वर्ग पर आक्रमण करने की ठानी। अपने पुत्र मेघनाद और राक्षस सेना के साथ इंद्र पर आक्रमण किया जहाँ मेघनाद ने इंद्र को परास्त कर इंद्रजीत की उपाधि प्राप्त की। देवताओं को पराभूत कर और नवग्रह को अपने अधीन कर रावण वापस लंका लौट आया। इसके बाद उसके मन में एक इच्छा जागी कि वो पृथ्वी से स्वर्ग तक सीढ़ी का निर्माण करेगा ताकि वो जब चाहे स्वर्ग जा सके। वो ऐसा कर ईश्वर की सत्ता को चुनौती देना चाहता था ताकि लोग ईश्वर को छोड़ को उसकी पूजा करना आरम्भ कर दें। किन्तु वो कभी भी स्वर्ग तक सीढियाँ बनाने में सफल ना हो सका।

शुक्रवार, मार्च 13, 2020

भगवान शिव को क्यों नहीं चढ़ाया जाता केतकी का फूल?

पिछले लेखों में आपने पढ़ा कि ऐसी कौन कौन सी वस्तुएं हैं जो भगवान शिव को चढ़ाना वर्जित है। इन वस्तुओं में से एक है केतकी का पुष्प। केतकी का पुष्प सफ़ेद रंग का होता है और देखने में बहुत सुन्दर होता है किन्तु फिर भी इसे महादेव को अर्पित नहीं किया जाता क्यूंकि स्वयं भगवान शंकर ने इसे वर्जित किया है। इसके पीछे जो कथा है वो सृष्टि के आरम्भ से पहले की है।

सोमवार, मार्च 09, 2020

भगवान शिव को क्यों नहीं चढ़ाई जाती कुमकुम?

इस श्रृंखला के पिछले लेखों में आपने उन वस्तुओं के विषय में पढ़ा जो भगवान शिव को वर्जित है। इनमें से शंख, तुलसी, लौह पात्र, केतकी और कुमकुम के पीछे विशेष कथा है। शंख, तुलसी एवं लौह पात्र की कथा हम पहले ही धर्मसंसार पर प्रकाशित कर चुके हैं। इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर क्या कारण है कि भगवान शिव को कुमकुम नहीं चढ़ाई जाती।

गुरुवार, मार्च 05, 2020

वर्तमान शहरों के प्राचीन नाम

निर्विवाद रूप से भारत वर्ष विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। ये देव नगरी है। यहाँ के कई नगर अत्यंत प्राचीन हैं। वैसे तो भारत के सहस्त्रों नगरों का प्राचीन नाम अवश्य होगा किन्तु इस लेख में हम केवल कुछ प्रमुख नगरों को ही समाहित कर पाए हैं। अगर आपके पास किसी अन्य नगर के प्राचीन नाम की जानकारी हो तो हमें अवश्य बताएं।

रविवार, मार्च 01, 2020

वैद्यराज चरक - २: चरक संहिता

पिछले लेख में आपने वैद्यराज चरक का जीवन परिचय पढ़ा। कुछ विद्वान संसार को कुछ ऐसा दे कर जाते हैं जिससे वे सदा के लिए इतिहास में अमर हो जाते हैं। जैसे महर्षि वाल्मीकि रामायण, वेदव्यास महाभारत और तुलसीदास रामचरितमानस के लिए जाने जाते हैं। उसी प्रकार वैद्यराज चरक ने एक ऐसे महान ग्रन्थ की रचना की जिससे वे इतिहास में अमर हो गए। वो ग्रन्थ है "चरक संहिता"

सोमवार, फ़रवरी 24, 2020

वैद्यराज चरक - १: परिचय

चरक एक महान वैद्य थे जिन्हे विश्व का सबसे पहला वैद्य माना जाता है। यही नहीं, इन्हे आयुर्वेद का जनक भी माना जाता है। इनके जन्म को लेकर कुछ मतभेद है। कुछ लोग इनका जन्म ईसा से ३०० वर्ष पहले का मानते हैं जबकि अधिकतर लोग इनका जन्म महात्मा बुद्ध से भी पहले का मानते हैं। इसमें से दूसरा मत ही ज्यादा तर्कसंगत लगता है। कुछ लोग चरक और कनिष्क को एक मानते हैं किन्तु ऐसा नहीं है। कनिष्क बौद्ध थे किन्तु चरक साहित्य में बौद्ध मतों का कठोरता से खंडन किया गया है।

सोमवार, फ़रवरी 17, 2020

वस्तुएं जो भगवान शिव को वर्जित है - २

पिछले लेख में आपने उन चौदह वस्तुओं के बारे में पढ़ा जो भगवान शिव को अर्पित नहीं की जाती। जैसे कि पहले बताया गया है कि इस लेख को हम दो भागों में विभक्त करेंगे। इस भाग में हम उन वस्तुओं को समाहित करेंगे जिसे शिवलिंग पर चढाने को शास्त्रों में मना किया गया है। इसके अगले लेखों में हम उन मुख्य वस्तुओं के बारे में अलग से बताएंगे जिसे महादेव पर ना चढाने के पीछे कोई कथा है। तो आइये पहले सामान्य चीजों के बारे में जानते हैं। इस लेख में तीन ऐसी चीजें है जिसके पीछे कथा तो है किन्तु वो पहले ही धर्मसंसार पर प्रकाशित की जा चुकी है। उसके वर्णन के साथ उसका लिंक भी दिया गया है जिसे आप पढ़ सकते हैं।

बुधवार, फ़रवरी 12, 2020

वस्तुएं जो भगवान शिव को वर्जित है - १

भगवान शंकर को भोलेनाथ कहते हैं क्यूंकि वे सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। महादेव ही ऐसे हैं जो केवल मन के भाव से ही प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी पूजा के लिए किसी विशेष वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु कुछ ऐसी वस्तुएं हैं जो महादेव को नहीं चढ़ाई जाती। वे जितनी जल्दी प्रसन्न होते हैं उतनी ही जल्दी अप्रसन्न भी हो जाते हैं। अतः उनकी पूजा करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि ये वस्तुएं उन्हें अर्पित ना की जाये। इस लेख को हम कई भागों में विभाजित करेंगे। सबसे पहले इस लेख में हम केवल उन वस्तुओं को समाहित करेंगे जो उन्हें चढ़ाना वर्जित है। इसके आगे के लेखों में हम इस बात का विस्तार से वर्णन करेंगे कि आखिर इन वस्तुओं को महादेव पर चढ़ाना क्यों मना है। तो चलिए उन वस्तुओं के विषय में जानते हैं।

शनिवार, फ़रवरी 08, 2020

रावण के अनुसार स्त्रियों के ८ अवगुण

रामचरितमानस में एक प्रसंग आता है जब रावण द्वारा सीता हरण करने के पश्चात रावण की पटरानी मंदोदरी उसे बार बार देवी सीता को श्रीराम को लौटाने का अनुरोध करती है। पहले तो रावण उसके इस हठ को हंसी में टाल देता था किन्तु मंदोदरी के बार-बार टोकने के कारण रावण क्रोधित हो जाता है और वो बताता है कि स्त्रियों के ८ दुर्गुणों के कारण ही पुरुषों का विनाश होता है।

मंगलवार, फ़रवरी 04, 2020

वर्तमान देशों के पौराणिक नाम

पौराणिक ग्रंथों में हमें कई देशों के वैदिक नाम मिलते हैं। भारत का नाम आर्यावर्त था ये तो विश्व प्रसिद्ध है किन्तु कुछ और भी देश हैं जिनका वर्णन हमारे धार्मिक ग्रंथों में आता है। कुछ ऐसे ही प्रमुख देशों का विवरण इस लेख में दिया जा रहा है। अगर आपको किसी अन्य देश का पौराणिक नाम पता हो तो हमें बताएं।

गुरुवार, जनवरी 30, 2020

जब देवताओं ने देवी सरस्वती को गिरवी रखा

आप सभी को वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें। वैसे तो वसंत पंचमी पर हमने पहले ही लेख डाल रखा है और माता सरस्वती, लक्ष्मी एवं गंगा विवाद पर भी एक लेख पहले ही प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इस लेख में हम आपको एक ऐसी कथा के बारे में बताने वाले हैं जिसके बारे में बहुत कम लोगों को मालूम है। एक ऐसी घटना जब देवताओं ने माता सरस्वती का विनिमय किया।

रविवार, जनवरी 26, 2020

परीक्षित - ४: तक्षक का दंश और मृत्यु

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कलियुग के प्रभाव के कारण महाराज परीक्षित से महर्षि शमीक का अपमान हो जाता है। इससे क्रोधित होकर उनके पुत्र श्रृंगी परीक्षित को श्राप देते हैं कि ठीक सातवें दिन तक्षक के दंश से परीक्षित की मृत्यु हो जाएगी। जब शमीक ऋषि को इसका पता चलता है तो वे बड़े दुखी होते हैं और परीक्षित को सन्देश भिजवाते हैं कि केवल ७ दिनों के लिए अपनी सुरक्षा का प्रबंध कर लें। 

जब परीक्षित को ये समाचार मिला तो उन्होंने अपने पुत्र जन्मेजय को राजा बना दिया और अपनी रक्षा के लिए ७ मंजिला एक ऐसा लौह भवन बनवाया जिसमे वायु को छोड़ कर कुछ और प्रवेश ही नहीं कर सकता था। राजा की रक्षा के लिए प्रत्येक मंजिल पर चारो ओर सर्पमँत्र के ज्ञाताओं को रक्षा के लिए बिठा दिया। उस भवन के सबसे ऊपरी ७वीं मंजिल पर स्वयं महाराज परीक्षित बैठे। 

गुरुवार, जनवरी 23, 2020

परीक्षित -३: कलियुग का प्रभाव और श्राप

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महाराज परीक्षित कलियुग को धर्म रूपी बैल पर अत्याचार करते देखा। कलियुग के समझाए जाने पर कि अब उसका युग आने वाला है, महाराज परीक्षित ने कलियुग को रहने के लिए पाँच स्थान निश्चित कर दिए। वे थे - जुआ, हिंसा, मदिरा, स्त्री एवं स्वर्ण। परीक्षित ने कलियुग को रहने का स्थान तो दे दिया किन्तु वे खुद नहीं जानते थे कि उसका प्रभाव सबसे पहले उनपर ही पड़ने वाला है।

रविवार, जनवरी 19, 2020

परीक्षित - २: कलियुग से सात्क्षात्कार

पिछले लेख में आपने परीक्षित के जन्म के विषय में पढ़ा। आपने ये भी जाना कि महाभारत के ३६ वर्षों के बाद जब श्रीकृष्ण ने निर्वाण लिया, तब युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का राज्य परीक्षित को सौंपा और अपने भाइयों और पत्नी के साथ शरीर का त्याग कर दिया। तब परीक्षित ने युधिष्ठिर के उत्तराधिकार को कुशलतापूर्वक संभाला और हस्तिनापुर का राज्य उचित ढंग से चलाने लगे। अब आगे...

गुरुवार, जनवरी 16, 2020

परीक्षित - १: जन्म

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और दुर्योधन की मृत्यु हो चुकी थी। कौरव सेना में केवल तीन योद्धा - अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा बचे थे। मरने से पूर्व दुर्योधन ने अश्वथामा को अपनी सेना का अंतिम प्रधान सेनापति नियुक्त किया और उससे पांडवों का वध करने को कहा। अश्वथामा ने भूलवश पांडवों के पांचों पुत्रों - प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन का वध कर दिया। जब पांडवों को ये पता चला तो वो अश्वथामा को ढूंढते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम पर पहुंचे।

शनिवार, जनवरी 11, 2020

रावण का मानमर्दन ३: कर्त्यवीर्य अर्जुन - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि रावण अपने दिग्विजय की यात्रा में कर्त्यवीर्य अर्जुन की माहिष्मति नगरी पहुँचता है। वहाँ रावण नर्मदा के तट पर शिवलिंग बना कर पूजा करने लगा। उसी समय सहस्त्रार्जुन ने अपने १००० हाथों से नर्मदा का प्रवाह रोक लिया जिससे रावण का बनाया शिवलिंग खंडित हो गया। इससे क्रुद्ध होकर रावण ने सहस्त्रार्जुन को युद्ध की चुनौती दी। तब उसने रावण को अपने नगर आने का आमंत्रण दिया।

बुधवार, जनवरी 08, 2020

रावण का मानमर्दन ३: कर्त्यवीर्य अर्जुन - १

पिछले लेखों में आपने इस श्रृंखला में दैत्यराज बलि और असुरराज शंभर के हाथों रावण की पराजय के विषय में पढ़ा है। कर्त्यवीर्य अर्जुन के विषय में भी आपने पिछले लेख में पढ़ा। इस लेख में रावण और हैहयवंशी महान राजा कर्त्यवीर्य अर्जुन के बीच की प्रतिद्वंदिता के बारे में आप जानेंगे। कर्त्यवीर्य जिसे सहस्तार्जुन के नाम से भी जाना जाता है, के बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं।

रविवार, जनवरी 05, 2020

पुत्रदा एकादशी

हिन्दू धर्म में एकादशी का बड़ा महत्त्व है। प्रत्येक मास दो बार एकादशी होती है और इस प्रकार वर्ष में कुल २४ एकादशी होती है। मलमास अथवा अधिकमास की अवस्था में दो एकादशी और बढ़ जाती है और कुल २६ एकादशी होती है। पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं और इसका सभी एकादशियों में विशेष स्थान है। इस वर्ष ६ जनवरी को पुत्रदा एकादशी पड़ रही है जिसका मुहूर्त प्रातः ३:०७ से लेकर अगले दिन ७ जनवरी प्रातः ४:०२ तक है।

शुक्रवार, जनवरी 03, 2020

जैन धर्म के अनुसार श्री ऋषभनाथ का बल

सामान्यतः तो हम धर्मसंसार में हिन्दू धर्म से सम्बंधित जानकारियाँ ही प्रकाशित करते हैं किन्तु ऐसे कई धर्म हैं जो हिन्दू धर्म से बड़ी निकटता के साथ जुड़े हुए हैं। उनमें से तीन धर्म प्रमुख हैं - जैन, बौद्ध और सिख। वैसे तो विश्व के लगभग सारे धर्म सनातन हिन्दू धर्म से ही निकले हैं या उससे प्रभावित माने जाते हैं किन्तु भारत में इन तीन धर्मों की हिन्दू धर्म के साथ बड़ी महत्ता है। इनमे से भी जैन धर्म भी अत्यंत प्राचीन माना जाता है। कदाचित हिन्दू धर्म के बाद दूसरा सबसे प्राचीन धर्म जिसके प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभनाथ थे।

कुछ समय पहले हमने धर्म संसार में योद्धाओं की श्रेणियों के बारे में एक लेख प्रकाशित किया था जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इसमें आपने अर्धरथी, रथी, अतिरथी, महारथी, अतिमहारथी एवं महामहारथी, इन ६ श्रेणियों के योद्धाओं और उनके बल के बारे में पढ़ा था। ठीक इसी प्रकार जैन धर्म में भी श्री ऋषभदेव के बल के बारे में बताया गया है।

बुधवार, जनवरी 01, 2020

नील

पिछले लेख में आपने वानर वीर नल के विषय में पढ़ा। नील नल के घनिष्ठ मित्र थे और नल के सामान उन्हें भी ये श्राप मिला था कि वो जिस वस्तु को हाथ लगाएंगे वो जल में डूबेगी नहीं। दोनों की घनिष्ठता ऐसी थी कि आज भी लोग इन दो वानरों को भाई मानते हैं, हालाँकि ऐसा नहीं था। नल विश्वकर्मा के अवतार थे और रामसेतु का निर्माण उन्होंने ही किया था। दूसरी ओर नील अग्निदेव के अंश थे और सम्पूर्ण वानर सेना के प्रधान सेनापति थे।