"ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी" - तुलसीदास जी के इस दोहे का वास्तविक अर्थ

"ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी" - तुलसीदास जी के इस दोहे का वास्तविक अर्थ
ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।

गोस्वामी तुलसीदास रचित महान ग्रन्थ श्रीरामचरितमानस में वर्णित इस एक दोहे को लेकर बहुत प्रश्न उठाये जाते है। विशेषकर "शूद्र" एवं "नारी" शब्द को लेकर वामपंथियों और छद्म नारीवादियों ने इसे तुलसीदास और मानस के विरुद्ध एक शस्त्र बना रखा है। प्रश्न ये है कि क्या वास्तव में गोस्वामी तुलसीदास जैसा श्रेष्ठ व्यक्ति शूद्रों एवं नारियों के विषय में ऐसा लिख सकता है? आइये इसे समझते हैं।

क्यों दिया माता सीता ने गौ माता को श्राप?

क्यों दिया माता सीता ने गौ माता को श्राप?
मूल वाल्मीकि रामायण की कथाओं के अतिरिक्त भी कई ऐसी कथाएं हैं जो जनमानस में लोक कथाओं के रूप में प्रसिद्ध हैं। ऐसी ही एक कथा में ऐसा वर्णन है जब माता सीता ने गौ माता, फल्गू नदी एवं
केतकी के पुष्प को श्राप दिया था। देश के कई राज्य, विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश में ये कथा बहुत प्रसिद्ध है।

सबसे शक्तिशाली अस्त्र

सबसे शक्तिशाली अस्त्र
पिछले लेख
  में आपने प्रमुख दिव्यास्त्रों के विषय में पढ़ा था। इस लेख में हम उन कुछ विशेष दिव्यास्त्रों के विषय में बात करेंगे जो त्रिदेवों से सम्बंधित हैं और सबसे अधिक शक्तिशाली माने जाते हैं, जिन्हे हम महास्त्र कहते हैं। आम तौर पर हम त्रिदेवों के दिव्यास्त्रों में ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र एवं पाशुपतास्त्र के बारे में जानते हैं किन्तु वास्तव में त्रिदेवों के महान अस्त्र भी तीन स्तरों/श्रेणियों में बंटे हैं और इनसे भी शक्तिशाली हैं। आइये त्रिदेवों के उन महान अस्त्रों के विषय में जानते हैं।

दिव्यास्त्र

दिव्यास्त्र
हमारे पिछले लेख में आपने साधारण अस्त्र-शस्त्रों के विषय में पढ़ा था। इस लेख में हम प्रमुख दिव्यास्त्रों के विषय में चर्चा करेंगे। दिव्यास्त्र अर्थात दिव्य अस्त्र। ऐसे अस्त्र जो देवताओं द्वारा उपयोग में लाये जाते हों एवं उनसे ही प्राप्त किये जाते हों।

प्रसिद्ध अस्त्र एवं शस्त्र

प्रसिद्ध अस्त्र एवं शस्त्र

पिछले लेख
में आपने अस्त्र एवं शस्त्र के बीच के मूल अंतर के  बारे में पढ़ा। इस लेख में हम साधारण अस्त्रों एवं शस्त्रों के विषय में पढ़ेंगे। इस लेख में हम किसी दिव्यास्त्र को सम्मलित नहीं करेंगे। हालाँकि हमारे पौराणिक ग्रंथों में अधिकतर अस्त्रों का वर्णन किसी दिव्यास्त्र के सन्दर्भ में ही आता है इसीलिए इस सूची में अधिक अस्त्रों का समावेश नहीं किया गया है और मूलतः शस्त्रों के विषय में ही जानकारी दी गयी है।

अस्त्र एवं शस्त्र में अंतर

अस्त्र एवं शस्त्र में अंतर
आज से हम अस्त्र-शस्त्रों पर एक श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। आम तौर पर हम अस्त्र एवं शस्त्र का उपयोग एक ही पर्यायवाची के रूप में करते हैं जैसा कि हमने पहले वाक्य में किया, किन्तु वास्तव में इन दोनों में अंतर होता है। दोनों ही आयुध हैं और दोनों का ही प्रयोग शत्रु को हताहत करने के लिए किया जाता है, किन्तु इनके उपयोग की विधि अलग-अलग है। इससे पहले कि हम विभिन्न प्रकार के अस्त्र एवं शस्त्रों के विषय में जानें, हमें ये ज्ञान होना आवश्यक है कि वास्तव में ये दोनों होते क्या हैं। इस लेख में हम इन दोनों के बीच का मूल अंतर समझेंगे।

नवगुंजर अवतार

नवगुंजर अवतार
वैसे तो भगवान विष्णु के मुख्य १० (दशावतार) एवं कुल २४ अवतार माने गए हैं किन्तु उनका एक ऐसा अवतार भी है जिसके विषय में बहुत ही कम लोगों को जानकारी है और वो है नवगुंजर अवतार। ऐसा इसलिए है क्यूंकि इस अवतार के विषय में महाभारत या किसी भी पुराण में कोई वर्णन नहीं है। केवल उड़ीसा के लोक कथाओं में श्रीहरि के इस विचित्र अवतार का वर्णन मिलता है। वहाँ नवगुंजर को श्रीकृष्ण का अवतार भी माना जाता है। आइये इस विशिष्ट अवतार के विषय में कुछ जानते हैं।

धनतेरस क्यों मनाया जाता है? कौन हैं देव धन्वन्तरि?

आप सबको धनतेरस की हार्दिक शुभकामनायें। आज का दिन देवताओं के वैद्य माने जाने वाले श्री धन्वन्तरि को समर्पित है। इसी दिन ये समुद्र मंथन से अपने हाथोँ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। कलश के साथ प्रकट होने के कारण ही आज के दिन धातु (सोना, चाँदी) एवं बर्तनों को खरीदने की परंपरा आरम्भ हुई। देव धन्वन्तरि को भगवान विष्णु के २४ अवतारों में से एक माना जाता है।

भगवान विष्णु के सभी अवतार भारत में ही क्यों होते हैं?

हम सभी भगवान विष्णु के दशावतार के विषय में जानते हैं। उस विषय में एक प्रश्न हमेशा आता है कि ऐसा क्या कारण है कि भगवान विष्णु के सभी अवतार भारत में ही क्यों होते हैं? श्रीहरि तो समस्त विश्व के स्वामी हैं फिर किसी अन्य भूभाग में वे वतरित क्यों नहीं होते? इस प्रश्न का उत्तर श्री विष्णु पुराण में दिया गया है। किन्तु इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे के वंश वर्णन को देखना होगा। आइये इसे समझते हैं।

नवदुर्गा

आप सभी को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें। वैसे तो धर्म संसार पर माता दुर्गा, अष्टमातृका एवं दश महाविद्या पर लेख पहले से लिखा जा चुका है किन्तु इस नवरात्रि सोचा कि एक लेख माता के उन ९ रूपों पर भी लिखा जाये जिस कारण नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस लेख में सभी ९ देवियों का संक्षिप्त विवरण विवरण दिया जायेगा। उन सभी पर विस्तृत लेख बाद में प्रकाशित किया जाएगा।

भक्तराज ध्रुव

भक्तराज ध्रुव
इस संसार में भगवान श्रीहरि के जितने अनन्य भक्त हुए हैं, ध्रुव उनमें से अग्रगणी हैं। विष्णु पुराण एवं भागवत पुराण में इनके विषय में विस्तार से लिखा गया है। ब्रह्मा के पुत्र स्वयंभू मनु हुए जिन्होंने माता शतरूपा से विवाह किया। दोनों की ५ संतानें हुई। २ पुत्र - प्रियव्रत एवं उत्तानपाद और तीन पुत्रियां - आकूति, देवहुति एवं प्रसूति। महाराज मनु ने अपना राज्य अपने दोनों पुत्रों में बाँट दिया। उत्तानपाद ने दो कन्याओं से विवाह किया - सुनीति एवं सुरुचि। बड़ी रानी सुनीति के गर्भ से ही ध्रुव का जन्म हुआ। छोटी रानी सुरुचि को उत्तम नामक एक पुत्र प्राप्त हुआ।

भगवान विष्णु की १६ कलाएं

भगवान विष्णु की १६ कलाएं
आप सब ने प्रायः भगवान विष्णु की १६ कलाओं के विषय में सुना होगा। रामायण और महाभारत में ये वर्णित है कि भगवान श्रीराम भगवान विष्णु की १२ कलाओं के साथ जन्में थे और श्रीकृष्ण १६ कलाओं के साथ। वैसे तो श्रीहरि अनंत हैं किन्तु मनुष्य रूप में उनकी कुल १६ कलाएं मानी गयी हैं।

वैदिक घडी

वैदिक घडी
कुछ दिनों पहले मुझे इस प्राचीन घडी का चित्र प्राप्त हुआ जिसमें १ से १२ अंकों के स्थान पर विभिन्न देवताओं के नाम लिखे थे। वो एक अबूझ पहेली की भांति थी किन्तु अचानक गौर करने पर मुझे इसका रहस्य समझ में आ गया। मैं इसपर पहले ही एक लेख लिखना चाहता था किन्तु उससे पहले इसी प्रश्न को मैंने अपने फेसबुक पेज पर भी लोगों से पूछा और हमारे एक पाठक श्री तरुण विश्वकर्मा ने इसका सही उत्तर भी बताया। तो अपने इस लेख में मैं तरुण जी का भी योगदान मानते हुए इसका शुभारम्भ करते हैं।

क्या उत्तर कांड एवं शम्बूक वध सत्य है?

क्या उत्तर कांड एवं शम्बूक वध सत्य है?
बहुत समय से सोच रहा था कि जनमानस में शम्बूक, सीता त्याग इत्यादि को लेकर जो असत्य फैला है उसके विषय में कुछ लिखूं। १-२ शताब्दी पूर्व से सुनियोजित रूप से श्रीराम के चरित्रहनन का जो प्रयास हुआ है वो वास्तव में दुखद है। वैसे तो ऐसी कई मिथ्या चीजें जनमानस में फैलाई गयी है जिससे श्रीराम के उज्जवल चरित्र पर कलंक लगाया जा सके किन्तु उनमें भी जो सबसे बड़े पात्र के रूप में उभरता है वो है शम्बूक। पहले मैंने केवल शम्बूक के विषय में लिखने का निश्चय किया था किन्तु फिर सोचा कि इसी बहाने रामायण के उत्तर कांड के सत्य से भी सबको अवगत कराया जाये। तो आइये इस विषय में विस्तार से जानते हैं। 

क्या गौतम बुद्ध विष्णु अवतार हैं?

क्या गौतम बुद्ध विष्णु अवतार हैं?
अगर हम भगवान विष्णु के दशावतार की बात करें तो संभव है कि १०० में से ९९ लोग गौतम बुद्ध को श्रीहरि का अवतार बताएँगे। बहुत काल से इसपर विवाद चला आ रहा है कि क्या वास्तव में गौतम बुद्ध भगवान विष्णु के अवतार हैं? हिन्दू धर्म में गौतम बुद्ध को विष्णु अवतार नहीं माना जाता किन्तु बौद्ध धर्म में उन्हें विष्णु के ९वें अवतार के रूप में प्रचारित किया जाता है। सर्वप्रथम तो मैं ये स्पष्ट कर दूँ कि गौतम बुद्ध श्रीहरि विष्णु के अवतार नही हैं। आइये इसका कारण जानते हैं।

श्रीकृष्ण की १६१०८ रानियों का पूर्वजन्म

श्रीकृष्ण की १६१०८ रानियों का पूर्वजन्म
हम सभी ने श्रीकृष्ण की १६१०८ रानियों के विषय में पढ़ा है। वास्तव में श्रीकृष्ण की १६१०८ पत्नियों की भूमिका त्रेता युग में रामावतार के समय ही बन गयी थी। त्रेतायुग में श्रीराम ने एक पत्नीव्रती होने का निश्चय कर लिया था किन्तु उस समय अनेकानेक युवतियां श्रीराम को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थी। इसी कारण उन्होंने उन युवतियों को द्वापरयुग में पत्नीरूप में स्वीकार करने का वचन दिया था। द्वापरयुग में वही युवतियां श्रीकृष्ण की भार्यायें हुईं। आइये देखते हैं कौन किसका अवतार थीं।

रामेश्वरम के काले श्रीराम

रामेश्वरम
सितम्बर २०१९ की बात है, मैंने अपने परिवार के साथ रामेश्वरम जाने की योजना बनाई। उस समय मैं बैंगलोर में नौकरी कर रहा था और रामेश्वरम जाने के लिए पहले मदुरै जाना पड़ता था। ये मेरे लिए और भी सुखद था क्यूंकि मैं माता मीनाक्षी के भी दर्शन करना चाहता था। तो पहले हम मदुरै पहुंचे और उसी शाम हमारी रामेश्वरम के लिए ट्रेन थी। तो सुबह करीब ५ बजे हम मीनाक्षी मंदिर पहुंचे। ऐसा भव्य मंदिर मैंने आज तक नहीं देखा था। काफी देर तक हम वहाँ रहे और फिर शाम को रामेश्वरम के लिए निकल पड़े।

मोक्ष पट्टम

मोक्ष पट्टम
आप सभी ने सांप सीढ़ी का खेल अवश्य खेला होगा। लेकिन क्या आपको पता है कि इसके पीछे का इतिहास क्या है? क्या आपको ये ज्ञात है कि इस खेल का सम्बन्ध हमारे पौराणिक ज्ञान से भी है। आज हम आपको इस खेल के उद्भव के विषय में बताएँगे और हम ये भी देखेंगे कि ये खेल किस प्रकार हमारे पौराणिक ज्ञान से सम्बंधित है।

गोमती चक्र

गोमती चक्र
हिन्दू धर्म में गोमती नदी का बड़ा महत्त्व है। हमारी पांच सबसे पवित्र नदियों में से एक गोमती भी है। मान्यता है कि गोमती महर्षि वशिष्ठ की पुत्री थी जो बाद में नदी के रूप में परिणत हो गयी। इसी पवित्र नदी के अंदर एक विशेष पत्थर पाया जाता है जिसे हम गोमती चक्र के नाम से जानते हैं। ये पत्थर उतना कीमती तो नहीं होता किन्तु बहुत दुर्लभ होता है। ये कैल्शियम का पत्थर होता है जिसमे चक्र का निशान होता है जो इसके नाम का मुख्य कारण है। हिन्दू धर्म में गोमती चक्र का बड़ा महत्त्व है। विशेष रूप से ज्योतिष शास्त्र में इसे बहुत पवित्र माना जाता है। मुख्य रूप से गोमती चक्र श्रीहरि और श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ है।

महर्षि जमदग्नि

महर्षि जमदग्नि
ब्रह्मा
जी के श्रेष्ठ पुत्रों में एक थे महर्षि भृगु जिन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा ली थी। इनकी कई पत्नियां थी जिनमे से एक थी दानवराज पौलोम की पुत्री "पौलोमी"। इन दोनों के एक परम तेजस्वी पुत्र हुए महर्षि च्यवन। च्यवन ने आरुषि नामक कन्या से विवाह किया जिनसे उन्हें और्व नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। और्व के एक पुत्र हुए ऋचीक, जो परम तपस्वी थे। इनका विवाह महाराज गाधि की पुत्री और विश्वामित्र की बहन सत्यवती से हुआ। सत्यवती को प्राप्त करने के लिए ऋचीक ने १००० श्यामकर्ण अश्व महाराज गाधि को भेंट किये थे। कालांतर में इन्ही श्यामकर्ण अश्व को प्राप्त करने के लिए ऋषि गालव ने ययाति कन्या माधवी का विनिमय किया था।

कुश का वंश

कुश का वंश
श्रीराम के वंश
का विस्तृत वर्णन धर्मसंसार पर पहले ही प्रकाशित हो चुका है। श्रीराम के दो पुत्र हुए - लव और कुश। निर्वाण लेते समय श्रीराम ने अपने साम्राज्य को स्वयं और अपने अनुज पुत्रों में समान रूप से बाँट दिया। लव को जो राज्य मिला उसका नाम उन्होंने लव नगर रखा। आज पाकिस्तान का लाहौर ही वो नगर था।

यदुवंश

यदुवंश
इस वेबसाइट का पहला लेख मैंने कुरुवंश (पुरुवंश) से किया था। श्रीकृष्ण का लेख लिखने में बहुत देर हो गयी। श्रीकृष्ण के वंश की शाखा भी उन्ही चक्रवर्ती सम्राट ययाति से चली जिनसे पुरु का वंश चला। पुरु ययाति के सबसे छोटे पुत्र थे और यदु सबसे बड़े। हालाँकि ययाति के श्राप के कारण सबसे प्रसिद्ध राजवंश पुरु का ही रहा जिसमें दुष्यंत, भरत, कुरु, हस्ती, शांतनु और युधिष्ठिर जैसे महान सम्राट हुए। ययाति के अन्य पुत्रों का वंश भी चला किन्तु चक्रवर्ती सम्राट केवल पुरु के वंश में ही हुए।

रुद्राक्ष

रुद्राक्ष
रुद्राक्ष हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र वस्तुओं में से एक माना गया है। कहते हैं कि भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने हेतु रुद्राक्ष सबसे सरल माध्यम है क्यूंकि ये स्वयं रूद्र से ही जन्मा है। शिव पुराण और पद्म पुराण में कहा गया है कि रुद्राक्ष धारण करने से अधम से अधम व्यक्ति भी स्वर्ग को प्राप्त होता है। रुद्राक्ष वास्तव में एक वृक्ष का फल होता है। ऐसे वृक्ष हिमालय में सबसे अधिक पाए जाते हैं। उसकेअतिरिक्त नेपाल और इंडोनेशिया में भी रुद्राक्ष के वृक्ष मिलते हैं। भारत में भी रुद्राक्ष के वृक्ष होते हैं किन्तु इनकी लकड़ियों को अंधाधुंध काटने के कारण भारत में ये दुर्लभ वृक्ष विलुप्त होने की कगार पर है।

आदि शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य
हिन्दू धर्म के महान प्रवर्तक जगतगुरु आदि शंकराचार्य को कौन नहीं जनता? किन्तु अगर मैं कहूँ कि हममें से अधिकतर लोग उनके विषय में सत्य नहीं जानते तो आपको आश्चर्य होगा। किन्तु सत्य यही है कि आदि शंकराचार्य के विषय में जो मिथ्या और भ्रामक जानकारी उपलब्ध है उसे ही अधिकतर हिन्दू जानते और मानते हैं। सबसे अधिक मिथक तो इनके जन्म का समय है जो इन्हे ८वीं सदी का विद्वान बताता है किन्तु सत्य ये नहीं है। तो आइये आदि शंकराचार्य के विषय में कुछ जानने से पहले अपने मन पर जमी अज्ञानता की धूल हम हटा लें।

महर्षि वेदव्यास द्वारा बनाया गया पृथ्वी का नक्शा

अगर हम पृथ्वी की संरचना और नक़्शे की बात करें तो अलग-अलग देशों में अपने-अपने मत हैं। रोम के वासियों का मानना था कि पृथ्वी का पहला नक्शा उन्होंने ही बनाया था। ऐसा ही कुछ प्राचीन ग्रीक और इजिप्ट के निवासी कहा करते थे। फ्रेंच और पुर्तगाली वासी आधुनिक विश्व के नक़्शे को अपना बताने का कोई मौका नहीं चूकते। पर क्या आपको ज्ञात है कि जिस विश्व की परिकल्पना हमने कुछ सौ वर्षों पहले की है उसके बारे में हमारे धर्मग्रंथों में पहले से ही बता दिया गया था।

सीता लेखनी

सीता लेखनी
हम सबने ब्राह्मी एवं देवनागरी लिपि के बारे में बहुत पढ़ा है किन्तु क्या आपने कभी "शंख लिपि" के विषय में सुना है? ऐसी मान्यता है कि शंख लिपि देवनागरी से भी प्राचीन लिपि थी जिसका ज्ञान दुर्भाग्य से आगे आने वाली पीढ़ियों को नहीं मिल पाया और इसी कारण ये लिपि पूर्णतः लुप्त हो गयी। इस लिपि का काल त्रेतायुग के अंत समय का बताया जाता है। वैसे तो ब्राह्मी लिपि को शंख लिपि से भी प्राचीन माना जाता है किन्तु सौभाग्य से ब्राह्मी लिपि का देवनागरी लिपि में अनुवाद कर लिया गया है। तो ब्राह्मी दुर्लभ तो है किन्तु लुप्त नहीं। पर कदाचित शंख लिपि उतनी भाग्यशाली नहीं रह पायी।

पुष्कर द्वीप

पुष्कर द्वीप
पिछले लेख में हमने शाक द्वीप के विषय में पढ़ा। इस लेख में हम सप्तद्वीपों में से अंतिम पुष्कर द्वीप के विषय में जानेंगे।
  • पुष्कर द्वीप का आकर शाक द्वीप से दुगुना है। 
  • इस द्वीप का नाम यहाँ स्थिति अतिविशाल न्यग्रोध (वट) के वृक्ष के कारण पड़ा है। ये इतना विशाल है कि उसका शिखर दिखाई नहीं देता। कहते हैं इस विशाल वृक्ष में पातमपिता ब्रह्मा का स्थान है।

शाक द्वीप

शाक द्वीप
पिछले लेख में हमने क्रौंच द्वीप के विषय में पढ़ा। इस लेख में हम छठे महान शाक द्वीप के विषय में जानेंगे। 
  • इस द्वीप के मध्य में एक अतिविशाल शाक का वृक्ष है और उसी वृक्ष के कारण इस द्वीप का नाम शाक द्वीप पड़ा है। 

क्रौंच द्वीप

क्रौंच द्वीप
पिछले लेख में हमने कुश द्वीप के विषय में पढ़ा था। इस लेख में हम क्रौंच द्वीप के विषय में विस्तार पूर्वक जानेंगे जिसका स्थान सप्तद्वीपों में पाँचवा है। 
  • इस द्वीप का नाम यहाँ स्थित क्रौंच नामक महान पर्वत के कारण पड़ा है। 
  • यहाँ के निवासी वरुण देव की पूजा करते हैं। 

कुश द्वीप

कुश द्वीप
पिछले लेख में हमने शाल्मल द्वीप के विषय में पढ़ा था। इस लेख में हम कुश द्वीप के विषय में विस्तार से जानेंगे। कुश द्वीप उन सात पौराणिक द्वीपों में से एक है जिसका वर्णन हमारे पुराणों में किया गया है। विष्णु पुराण के अनुसार -

कुश: क्रौंचस्तथा शाक: पुष्करश्चैव सप्तम:।

शाल्मल द्वीप

शाल्मल द्वीप
पिछले लेख में आपने प्लक्ष द्वीप के विषय में पढ़ा। अब हम शाल्मल द्वीप के विषय में कुछ जानते हैं।
  • शाल्मल द्वीप विस्तार में प्लक्ष द्वीप से दुगना है।
  • इस द्वीप के स्वामी पवुष्मान हैं जिनके सात पुत्र इस द्वीप के सातों वर्षों पर राज्य करते हैं। 

प्लक्ष द्वीप

प्लक्ष द्वीप
पिछले लेख में आपने जम्बू द्वीप के बारे में विस्तार से पढ़ा। इस लेख में हम प्लक्ष द्वीप के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। आइये प्लक्ष द्वीप के बारे में कुछ अद्भुत तथ्य जानते हैं: 
  • प्लक्ष द्वीप का विस्तार जम्बू द्वीप से दूना है जो जम्बू द्वीप को चारो ओर से घेरे है और स्वयं चारो ओर से इक्षुरस (गन्ने के रस) सागर से घिरा हुआ है।

जम्बू द्वीप

जम्बू द्वीप
पिछले लेख
में आपने पौराणिक पृथ्वी की संरचना और ७ द्वीपों के विषय में पढ़ा था। इनमे से श्रेष्ठ है जम्बू द्वीप जिसके बारे में पुराणों में बहुत लिखा गया है। ब्रह्मपुराण में अध्याय १८ के श्लोक २१, २२ और २३ में जम्बुद्वीप की महत्ता का वर्णन है।

तपस्तप्यन्ति यताये जुह्वते चात्र याज्विन।
दानाभि चात्र दीयन्ते परलोकार्थ मादरात्।। (२१)

पुराणों में वर्णित सात पौराणिक द्वीप

आज आधुनिक विज्ञान ने बहुत उन्नति कर ली है और पृथ्वी के बारे में विस्तृत जानकारी हमारे पास है। हम सभी को पता है कि आज के युग में पृथ्वी को ७ महाद्वीपों में बंटा गया है। लेकिन क्या आपको पता है कि उसका आधार कैसे पड़ा? क्यों हम पृथ्वी को केवल ७ महाद्वीपों में ही बांटते हैं? उसका कारण ये है कि सप्तद्वीपों की विचारधारा आधुनिक नहीं है बल्कि हमारे हिन्दू धर्म में इसकी अवधारणा प्राचीन काल से चली आ रही है। आपको कदाचित ये पता नहीं होगा कि जो विश्व का नक्शा आज हमारे पास है वो भी महर्षि वेदव्यास की ही देन है। इसके बारे में आप यहाँ जान सकते हैं। 

जब वानरराज बाली ने रावण को परास्त किया

जब वानरराज बाली ने रावण को परास्त किया
इस लेख में हम उस चौथे योद्धा का वर्णन करेंगे जिसके हाथों रावण को अपमानजनक पराजय का स्वाद चखना पड़ा था। वो योद्धा था इंद्रपुत्र और किष्किंधा का राजा वानरराज बाली। कथा तब की है जब बाली के बल और शौर्य का डंका पूरे विश्व में बज रहा था। उस पर बाली ने उस दुदुम्भी, जिससे लड़ने को स्वयं समुद्र और हिमवान ने भी मना कर दिया था, केवल एक प्रहार में ही वध कर दिया था और उसके विशाल शव को अपने हाथों में उठा कर १ योजन दूर फेक दिया था। यही कारण था कि विश्व का कोई भी योद्धा उससे लड़ने का साहस नहीं जुटा पाता था।

माधवी - ययाति की पुत्री की दारुण कथा

माधवी - ययाति की पुत्री की दारुण कथा
हमारे ग्रंथों में ऐसी कई स्त्रियाँ हैं जिन्हे अपने जीवन में बड़े कष्ट झेलने पड़े किन्तु कुछ स्त्रियाँ ऐसी हैं जिन्हे इतना कुछ झेलना पड़ा जिसे सुनकर हम विश्वास भी नहीं कर सकते कि ऐसा कुछ हो सकता है। ऐसी ही एक कथा चक्रवर्ती सम्राट ययाति की पुत्री माधवी की है। कई जगह उसका नाम वृषदवती बताया गया है। उसके साथ जो हुआ वो कदाचित हम सोच भी नहीं सकते किन्तु अपने पिता के मान के लिए उसने सब सहा। 

कुब्जा

कुब्जा
गोकुल वृंदावन में जब श्रीकृष्ण १६ वर्ष के हुए, कंस के निमंत्रण पर अक्रूर उन्हें और बलराम को लेकर मथुरा आ गए। कंस से मिलने से पहले उन्हें कुछ दिन अतिथिशाला में ठहराया गया जहाँ उन्होंने नगर भ्रमण का सोचा। वे दोनों भाई मथुरा की गलियों में भ्रमण करने लगे। वे जिधर भी निकल जाते, लोग उन्हें देखते ही रह जाते। नगर में पहले ही समाचार फ़ैल चुका था कि ये दोनों भाई ही उन्हें कंस के अत्याचारों से मुक्त करवाएंगे।

रावण की ७ अपूर्ण इच्छाएं

रावण की ७ अपूर्ण इच्छाएं
हमारे कई पौराणिक ग्रंथों में ऐसा वर्णन है कि रावण की कई ऐसी इच्छाएं थी जो वो पूरा नहीं कर पाया। उसकी अपूर्ण इच्छाएं तो बहुत थी किन्तु उनमे से ७ सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। रावण सप्तद्वीपाधिपति था, नवग्रह उसके अधीन रहते थे और स्वयं भगवान रूद्र की उसपर कृपा थी। किन्तु उसके बाद भी, अपने हर प्रयासों के बाद भी उसकी ये ७ इच्छाएं पूरी नहीं हो सकी। आइये इनके बारे में कुछ जानते हैं।

भगवान शिव को क्यों नहीं चढ़ाया जाता केतकी का फूल?

भगवान शिव को क्यों नहीं चढ़ाया जाता केतकी का फूल?
भगवान शिव को ना चढ़ाई जाने वाली वस्तुओं
के विषय में आपने पढ़ा जिसमें से केतकी का फूल भी एक है। केतकी का पुष्प सफ़ेद रंग का होता है और देखने में बहुत सुन्दर होता है किन्तु फिर भी इसे महादेव को अर्पित नहीं किया जाता क्यूंकि स्वयं भगवान शंकर ने इसे वर्जित किया है। इसके पीछे जो कथा है वो सृष्टि के आरम्भ से पहले की है।

भगवान शिव को क्यों नहीं चढ़ाई जाती कुमकुम?

भगवान शिव को क्यों नहीं चढ़ाई जाती कुमकुम?
धर्म संसार पर एक लेख पहले ही प्रकाशित हो चुका है जिसमें बताया गया है कि महादेव को कौन-कौन सी वस्तुएं अर्पित नहीं की जाती। इसके बारे आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। कुमकुम भी उन्ही वस्तुओं में से एक है जो भगवान शिव पर नहीं चढ़ाई जाती। इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर क्या कारण है कि भगवान शिव को कुमकुम नहीं चढ़ाई जाती।

वैद्यराज चरक

वैद्यराज चरक
चरक एक महान वैद्य थे जिन्हे विश्व का सबसे पहला वैद्य माना जाता है। यही नहीं, इन्हे आयुर्वेद का जनक भी माना जाता है। इनके जन्म को लेकर कुछ मतभेद है। कुछ लोग इनका जन्म ईसा से ३०० वर्ष पहले का मानते हैं जबकि अधिकतर लोग इनका जन्म महात्मा बुद्ध से भी पहले का मानते हैं। इसमें से दूसरा मत ही ज्यादा तर्कसंगत लगता है। कुछ लोग चरक और कनिष्क को एक मानते हैं किन्तु ऐसा नहीं है। कनिष्क बौद्ध थे किन्तु चरक साहित्य में बौद्ध मतों का कठोरता से खंडन किया गया है।

शिवलिंग पर क्या नहीं चढ़ाना चाहिए

शिवलिंग पर क्या नहीं चढ़ाना चाहिए
शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए
ये तो बहुत लोग जानते हैं किन्तु कुछ ऐसी वस्तुएं भी हैं जिसे भगवान शिव को अर्पण करने को शास्त्रों में मना किया गया है। आइये ऐसी ही कुछ वस्तुओं के विषय में जानते हैं। 
  1. हल्दी: भगवान शिव को हल्दी नहीं चढ़ती है क्यूंकि इसका सम्बन्ध भगवान विष्णु से है। विष्णु-लक्ष्मी को हल्दी चढाने का विधान है क्यूंकि नारायण को हल्दी या पीली वस्तुएं बड़ी पसंद हैं। यही कारण है कि उन्हें पीतांबर कहा गया है। इसके अतिरिक्त चूँकि हल्दी का सम्बन्ध रसोईघर से है इसीलिए भी ये महादेव को नहीं चढ़ाई जाती।

रावण के अनुसार स्त्रियों के ८ अवगुण

रावण के अनुसार स्त्रियों के ८ अवगुण
रामचरितमानस में एक प्रसंग आता है जब रावण द्वारा सीता हरण करने के पश्चात रावण की पटरानी मंदोदरी उसे बार बार देवी सीता को श्रीराम को लौटाने का अनुरोध करती है। पहले तो रावण उसके इस हठ को हंसी में टाल देता था किन्तु मंदोदरी के बार-बार टोकने के कारण रावण क्रोधित हो जाता है और वो बताता है कि स्त्रियों के ८ दुर्गुणों के कारण ही पुरुषों का विनाश होता है।

वर्तमान स्थानों के प्राचीन नाम

वर्तमान स्थानों के प्राचीन नाम
पौराणिक ग्रंथों में हमें कई देशों के वैदिक नाम मिलते हैं। भारत का नाम आर्यावर्त था ये तो विश्व प्रसिद्ध है किन्तु कुछ और भी देश हैं जिनका वर्णन हमारे धार्मिक ग्रंथों में आता है। कुछ ऐसे ही प्रमुख देशों का विवरण इस लेख में दिया जा रहा है। पहले विदेशों के प्राचीन नाम देखते हैं।
  • अखंड भारत: आर्यवर्त
    • भारत: शंकुन्तला पुत्र महाराज भरत के नाम पर

जब देवताओं ने देवी सरस्वती का विनिमय किया

जब देवताओं ने देवी सरस्वती का विनिमय किया
आप सभी को वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें। वैसे तो वसंत पंचमी पर हमने पहले ही लेख डाल रखा है किन्तु इस लेख में हम आपको एक ऐसी कथा के बारे में बताने वाले हैं जिसके बारे में बहुत कम लोगों को मालूम है। एक ऐसी घटना जब देवताओं ने माता सरस्वती का विनिमय किया। ये कथा आरम्भ होती है सोमरस की खोज से।

परीक्षित

परीक्षित
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और दुर्योधन की मृत्यु हो चुकी थी। कौरव सेना में केवल तीन योद्धा - अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा बचे थे। मरने से पूर्व दुर्योधन ने अश्वथामा को अपनी सेना का अंतिम प्रधान सेनापति नियुक्त किया और उससे पांडवों का वध करने को कहा। अश्वथामा ने भूलवश पांडवों के पांचों पुत्रों, जिन्हे उप-पांडव कहा जाता था, उनका वध कर दिया। जब पांडवों को ये पता चला तो वो अश्वथामा को ढूंढते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम पर पहुंचे।

जब रावण सहस्त्रार्जुन से परास्त हुआ

जब रावण सहस्त्रार्जुन से परास्त हुआ
इस लेख में रावण और कार्त्यवीर्य अर्जुन के बीच की प्रतिद्वंदिता के बारे में आप जानेंगे। अपने दिग्विजय के समय रावण सभी देशों और प्रदेशों को जीतता हुआ नर्मदा तट पर स्थित महिष्मति नगर पहुँचा। वहाँ उस समय हैहयवंशी राजा कार्त्यवीर्य अर्जुन का राज था जिसे अपने १००० भुजाओं के कारण सहस्त्रार्जुन भी कहा जाता था। उसने अपनी शक्ति से अपना साम्राज्य हिमालय तक फैला रखा था और संसार में कोई भी ऐसा नहीं था जो उससे युद्ध करने का साहस करता हो।

पुत्रदा एकादशी

पुत्रदा एकादशी
हिन्दू धर्म में एकादशी का बड़ा महत्त्व है। प्रत्येक मास दो बार एकादशी होती है और इस प्रकार वर्ष में कुल २४ एकादशी होती है। मलमास अथवा अधिकमास की अवस्था में दो एकादशी और बढ़ जाती है और कुल २६ एकादशी होती है। पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं और इसका सभी एकादशियों में विशेष स्थान है। इस वर्ष ६ जनवरी को पुत्रदा एकादशी पड़ रही है जिसका मुहूर्त प्रातः ३:०७ से लेकर अगले दिन ७ जनवरी प्रातः ४:०२ तक है।

जैन धर्म के अनुसार श्री ऋषभनाथ का बल

जैन धर्म के अनुसार श्री ऋषभनाथ का बल
सामान्यतः तो हम धर्मसंसार में हिन्दू धर्म से सम्बंधित जानकारियाँ ही प्रकाशित करते हैं किन्तु ऐसे कई धर्म हैं जो हिन्दू धर्म से बड़ी निकटता के साथ जुड़े हुए हैं। उनमें से तीन धर्म प्रमुख हैं - जैन, बौद्ध और सिख। वैसे तो विश्व के लगभग सारे धर्म सनातन हिन्दू धर्म से ही निकले हैं या उससे प्रभावित माने जाते हैं किन्तु भारत में इन तीन धर्मों की हिन्दू धर्म के साथ बड़ी महत्ता है। इनमे से भी जैन धर्म भी अत्यंत प्राचीन माना जाता है। कदाचित हिन्दू धर्म के बाद दूसरा सबसे प्राचीन धर्म जिसके प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभनाथ थे।

नील

नील
नील नल के घनिष्ठ मित्र थे और नल के सामान उन्हें भी ये श्राप मिला था कि वो जिस वस्तु को हाथ लगाएंगे वो जल में डूबेगी नहीं। दोनों की घनिष्ठता ऐसी थी कि आज भी लोग इन दो वानरों को भाई मानते हैं, हालाँकि ऐसा नहीं था। नल विश्वकर्मा के अवतार थे और रामसेतु का निर्माण उन्होंने ही किया था। दूसरी ओर नील अग्निदेव के अंश थे। कई लोगों को लगता है कि श्रीराम की सेना के सेनापति महावीर हनुमान थे किन्तु ऐसा नहीं है। हनुमान सुग्रीव के मंत्री थे जो उनके साथ ऋष्यमूक पर्वत पर भी रहते थे जब बालि ने सुग्रीव को किष्किंधा से निष्काषित कर दिया था। ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान के साथ जो कुछ चुनिंदा वानर सुग्रीव के साथ रहते थे उनमे से एक नील भी थे और वही उनकी सेना के अधिपति भी थे।