गुरुवार, नवंबर 26, 2020

अस्त्र एवं शस्त्र में अंतर


आज से हम अस्त्र-शस्त्रों पर एक श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। आम तौर पर हम अस्त्र एवं शस्त्र का उपयोग एक ही पर्यायवाची के रूप में करते हैं जैसा कि हमने पहले वाक्य में किया, किन्तु वास्तव में इन दोनों में अंतर होता है। दोनों ही आयुध हैं और दोनों का ही प्रयोग शत्रु को हताहत करने के लिए किया जाता है, किन्तु इनके उपयोग की विधि अलग-अलग है। इससे पहले कि हम विभिन्न प्रकार के अस्त्र एवं शस्त्रों के विषय में जानें, हमें ये ज्ञान होना आवश्यक है कि वास्तव में ये दोनों होते क्या हैं। इस लेख में हम इन दोनों के बीच का मूल अंतर समझेंगे।

अगर अस्त्र एवं शस्त्र के बीच के अंतर को एक वाक्य में बताया जाये तो वो ये है कि "अस्त्र ऐसे आयुध होते थे जो दूर से छोड़े जा सकते थे और शस्त्र ऐसे आयुध होते थे जिसे हाथ में लेकर ही प्रहार किया जा सकता था और उससे बहुत दूर तक नहीं छोड़ा जा सकता था।" अस्त्रों में बाण, चक्र इत्यादि का वर्णन आता है वहीँ शस्त्रों में अधिक आयुध आते हैं जैसे तलवार, खड्ग, गदा, भाला इत्यादि। शस्त्र सभी योद्धा के पास हुआ करते थे किन्तु ये आवश्यक नहीं था कि अस्त्र सभी योद्धा के पास हों। यही कारण है कि आम भाषा में हम योद्धा को "शस्त्रधारी" कहते हैं, "अस्त्रधारी" नहीं।

कुछ अस्त्र ऐसे होते थे जो बहुत शक्तिशाली होते थे और देवताओं से प्राप्त किये जाते थे। उसे दिव्यास्त्र कहते थे और उसे मन्त्रों द्वारा सिद्ध और प्रक्षेपित किया जा सकता था। दिव्यास्त्र की सहायता से कोई भी योद्धा बड़ी मात्रा में शत्रुओं की प्राणहानि कर सकता था। दिव्यास्त्र कई हैं जैसे आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, पर्जन्यास्त्र, पर्वतास्त्र इत्यादि। शस्त्रों में स्वयं के कौशल और बाहुबल का परिचय देना होता था। तो हम ये कह सकते हैं शस्त्र के सञ्चालन में शक्ति और युक्ति दोनों लगते थे। आम तौर पर दिव्य या मन्त्रसिद्ध शस्त्रों का बहुत वर्णन नहीं आता है किन्तु कुछ शस्त्र ऐसे हैं जो दिव्य थे और मन्त्रों से सिद्ध किये जा सकते थे। जैसे भगवान विष्णु की कौमोदीकी गदा, नन्दक तलवार, भगवान शंकर का त्रिशूल और इंद्र का वज्र इत्यादि।

अस्त्र और शस्त्रों को मुख्यतः ४ भागों में बांटा गया है:

  1. अमुक्ता: ऐसे आयुध जिन्हे फेंका नहीं जाता था। जैसे गदा, खड्ग, परशु, तलवार इत्यादि। इस श्रेणी में मुख्यतः शस्त्र ही आते हैं। 
  2. मुक्ता: ऐसे आयुध जिन्हे फेंका जा सकता था। उसमें अस्त्र एवं शस्त्र दोनों आते हैं किन्तु अधिकतर अस्त्र ही होते हैं। इसके भी दो प्रकार माने गए हैं:
    1. पाणिमुक्ता: ऐसे आयुध जिसे हाथ से छोड़ा जा सके। जैसे भाला, त्रिशूल इत्यादि। इसके अतिरिक्त कई ऐसे दिव्यास्त्र होते थे जिसे मंत्रसिद्ध कर हाथ से छोड़ा जा सकता था। 
    2. यंत्रमुक्ता: ऐसे आयुध जिसे छोड़ने हेतु किसी यंत्र की आवश्यकता होती हो। जैसे बाण को छोड़ने के लिए धनुष की आवश्यकता होती है। 
  3. मुक्तामुक्त: ऐसे आयुध जो पकड़कर या फेंककर दोनों तरीके से उपयोग में लाये जा सकते हों। जैसे त्रिशूल एवं भाला। 
  4. मुक्तसंनिवृति: ऐसे आयुध जिसे छोड़ कर पुनः लौटाया जा सकता हो। इसमें मुख्यतः दिव्यास्त्र ही होते थे। जैसे भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र।
देवताओं के अस्त्रों के दिव्यास्त्र कहा जाता था जिसे मंत्रसिद्ध कर उपयोग में लाया जाता था। दिव्यास्त्र कई थे और प्रत्येक देवता का अपना दिव्यास्त्र होता था। किसी मनुष्य को दिव्यास्त्र प्राप्त करने हेतु देवताओं को प्रसन्न करना होता था। जैसे महाभारत में भीष्म, द्रोण, कर्ण और अर्जुन के पास अनेकानेक दिव्यास्त्र थे। अधिकतर दिव्यास्त्र मंत्रसिद्ध होते थे इसी कारण उसका ज्ञान दूसरे लोगों को दिया जा सकता था किन्तु कुछ दिव्यास्त्रों को हस्तानांतरित नहीं किया जा सकता था और उस व्यक्ति की मृत्यु के बाद वो पुनः अपने देवता के पास लौट जाता था। कर्ण का शक्ति अस्त्र ऐसा ही दिव्यास्त्र थे जो घटोत्कच का वध कर पुनः इंद्र के पास लौट गया। 

दिव्यास्त्रों से भी अधिक शक्तिशाली त्रिदेवों का व्यक्तिगत अस्त्र होता था जिसे "महास्त्र" कहते थे। महास्त्रों में तीन महान दिव्यास्त्र आते थे - परमपिता ब्रह्मा का ब्रह्मास्त्र, भगवान विष्णु का नारायणास्त्र एवं भगवान शंकर का पाशुपतास्त्र। बहुत कम ही योद्धा ऐसे होते थे जिनके पास महास्त्र होता था। महाभारत में भीष्म, द्रोण, कर्ण, अर्जुन एवं अश्वत्थामा के पास ब्रह्मास्त्र था। नारायणास्त्र केवल श्रीकृष्ण एवं अश्वत्थामा के पास था और पाशुपतास्त्र केवल अर्जुन के पास।

कुछ विशेष अस्त्र ऐसे होते थे जो महास्त्रों से भी अधिक शक्तिशाली और घातक होते थे। ऐसे अस्त्रों पर त्रिदेवों का ही एकाधिकार होता था और इसे किसी मानव को नहीं दिया जा सकता था। ऐसे अस्त्रों में ब्रह्मदेव का ब्रह्मशिरा और ब्रह्माण्ड अस्त्र, भगवान विष्णु का विष्णुज्वर एवं भगवान शंकर का माहेश्वरज्वर नामक सर्वशक्तिशाली आयुध का वर्णन आता है। आने वाले लेखों में हम सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के बारे में विस्तृत लेख प्रकाशित करेंगे। आशा है आपको ये जानकारी पसंद आएगी।

2 टिप्‍पणियां:

कृपया टिपण्णी में कोई स्पैम लिंक ना डालें एवं भाषा की मर्यादा बनाये रखें।