कुरुवंश

ये धर्म संसार का प्रथम लेख है।
जैसा कि हम जानते हैं कि सारी सृष्टि परमपिता ब्रह्मा से उत्पन्न हुई है। देव, दैत्य, मानव, नाग, असुर, गन्धर्व, राक्षस सभी का आरम्भ उन्ही से हुआ। आर्यावर्त में जितने भी राजवंश हुए वो ययाति की ही संतान थे। उनमे भी कुरुवंश सबसे आदरणीय था जिसमें शांतनु, भीष्म, कौरवों और पांडवों ने जन्म लिया। आइये कुरु के वंश को जानते हैं:
  1. परमपिता ब्रह्मा से पूरी सृष्टि उत्पन्न हुई।
  2. ब्रह्मा से महर्षि अत्रि ने जन्म लिया जो सप्तर्षियों में से एक थे।
  3. अत्रि ने अनुसूया से विवाह किया जिनसे उन्हें तीन पुत्र हुए - चंद्र, दत्तात्रेय और दुर्वासा
  4. चंद्र बृहस्पति की पत्नी तारा पर आसक्त हुए जिनसे उन्हें एक पुत्र हुआ बुध
  5. बुध ने मनुपुत्री ईला से विवाह किया जिनसे पुरुरवा नामक पुत्र जन्मा।
  6. पुरुरवा ने उर्वशी से विवाह किया जिससे उन्हें छः पुत्र प्राप्त हुए - आयु, अमावसु, विश्वायु, श्रुतायु, शतायु एवं दृढ़ायु
  7. आयु ने स्वर्भानु (बाद में यही राहु केतु कहलाये) की पुत्री प्रभा से विवाह किया जिनसे उन्हें नहुष नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। नहुष ने इंद्र पद भी प्राप्त किया और वे ३६९८२५६वें इंद्र बने।
  8. नहुष ने महादेव की पुत्री अशोकसुन्दरी से विवाह किया जिनसे उन्हें यति एवं ययाति दो पुत्रों और १०० पुत्रियों को प्राप्त किया। यति संन्यासी बन गए जिससे राज्य ययाति को मिला।
  9. ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से विवाह किया। देवयानी से उन्हें यदु और तर्वसु ये दो पुत्र एवं माधवी नामक एक कन्या हुई। शर्मिष्ठा से उन्हें अनु, द्रुहु एवं पुरु नामक पुत्रों की प्राप्ति हुई। यदु से यादवों का यदुकुल चला जिसमे आगे चलकर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। तर्वासु से मलेछ, दृहू से भोज तथा पुरु से सबसे प्रतापी पुरुवंश चला। अनु का वंश ज्यादा नहीं चला।
  10. पुरु के कौशल्या से जन्मेजय हुए।
  11. जन्मेजय के अनंता से प्रचिंवान हुए।
  12. प्रचिंवान के अश्म्की से संयाति हुए।
  13. संयाति के वारंगी से अहंयाति हुए।
  14. अहंयाति के भानुमती से सार्वभौम हुए।
  15. सार्वभौम के सुनंदा से जयत्सेन हुए।
  16. जयत्सेन के सुश्रवा से अवाचीन हुए।
  17. अवाचीन के मर्यादा से अरिह हुए।
  18. अरिह के खल्वंगी से महाभौम हुए।
  19. महाभौम के शुयशा से अनुतनायी हुए।
  20. अनुतनायी के कामा से अक्रोधन हुए।
  21. अक्रोधन के कराम्भा से देवातिथि हुए।
  22. देवातिथि के मर्यादा से अरिह हुए।
  23. अरिह के सुदेवा से ऋक्ष हुए।
  24. ऋक्ष के ज्वाला से मतिनार हुए।
  25. मतिनार के सरस्वती से तंसु हुए।
  26. तंसु के कालिंदी से इलिन हुए।
  27. इलिन के राथान्तरी से दुष्यंत हुए जो बहुत प्रतापी राजा हुए।
  28. दुष्यंत ने विश्वामित्र की कन्या शकुंतला से विवाह किया जिससे चक्रवर्ती सम्राट भरत हुए। इन्ही के नाम पर हमारा देश भारतवर्ष कहलाता है।
  29. भरत के सुनंदा से भमन्यु हुए।
  30. भमन्यु के विजय से सुहोत्र हुए।
  31. सुहोत्र के सुवर्णा से हस्ती हुए और इन्ही के नाम पर इनके साम्राज्य का नाम हस्तिनापुर पड़ा।
  32. हस्ती के यशोधरा से विकुंठन हुए।
  33. विकुंठन के सुदेवा से अजमीढ़ हुए।
  34. अजमीढ़ ने सुयति से विवाह किया जिनसे संवरण हुए।
  35. संवरण के तपती से कुरु हुए जिनके नाम से ये वंश कुरुवंश कहलाया।
  36. कुरु के शुभांगी से विदुरथ हुए।
  37. विदुरथ के संप्रिया से अनाश्वा हुए।
  38. अनाश्वा के अमृता से परीक्षित हुए।
  39. परीक्षित के सुयशा से भीमसेन हुए।
  40. भीमसेन के कुमारी से प्रतिश्रावा हुए।
  41. प्रतिश्रावा ने सुकुमारी से विवाह किया जिनसे प्रतीप हुए। गंगा पहले इन्ही के पास विवाह के लिए आयी थी और इनकी दाहिने और बैठ गयी। तब प्रतीप ने कहा कि दाहिना भाग पुत्री का होता है इसीलिए मैं तुम्हे अपनी पुत्रवधु के रूप में स्वीकार करता हूँ।
  42. प्रतीप के सुनंदा से तीन पुत्र हुए - देवापि, बाह्लीक एवं शांतनु। देवापि किशोरावस्था में ही सन्यासी हो गए एवं बाह्लीक युवावस्था में अपने राज्य की सीमाओं को बढ़ने में लग गए इसलिए सबसे छोटे पुत्र शांतनु को राज्य मिला।
  43. शांतनु ने प्रथम गंगा से विवाह किया जिनसे देवव्रत हुए जो आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए। भीष्म का वंश आगे नहीं बढा क्योंकि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा कर ली। शांतनु की दूसरी पत्नी सत्यवती से चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए। 
  44. चित्रांगद की मृत्यु युवावस्था में ही हो गयी। विचित्रवीर्य की दो रानियाँ थी - अम्बिका और अम्बालिका। विचिचित्रवीर्य भी संतान प्राप्ति के पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। तब सत्यवती के पुत्र महर्षि व्यास कि कृपा से अम्बिका से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पाण्डु हुए। अम्बिका की दासी परिश्रवि से विदुर का जन्म हुआ इसीलिए वे राजकुमार नहीं माने गए।
  45. धृतराष्ट्र ने गांधारी से विवाह किया जिनसे उन्हें १०० पुत्र प्राप्त हुए जिनमे दुर्योधन ज्येष्ठ था। उनकी दुःशला नामक एक पुत्री भी हुई। इसके अतिरिक्त धृतराष्ट्र के एक वैश्य कन्या सुगंधा, जो गांधारी की दासी थी, उससे युयुत्सु नामक पुत्र भी हुआ। किन्दम ऋषि के श्राप के कारण पाण्डु संतानोत्पत्ति में असमर्थ थे इसी कारण उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को दुर्वासा ऋषि के मंत्र से संतान उत्पत्ति की आज्ञा दी। कुंती ने धर्मराज से युधिष्ठिर, पवनदेव से भीम और इन्द्रदेव से अर्जुन तथा माद्री के अश्वनीकुमारों से नकुल और सहदेव को प्राप्त किया। इनसे पहले कुंती ने विवाह पूर्व उसी मन्त्र की शक्ति से सूर्यदेव से कर्ण को प्राप्त किया था किन्तु लोक-लाज के भय से उन्होंने कर्ण का त्याग कर दिया। उसकी मृत्यु के पश्चात पांडवों को पता चला कि कर्ण उनके ज्येष्ठ भ्राता थे। 
  46. युधिष्ठिर के द्रौपदी से प्रतिविन्ध्य एवं देविका से यौधेय हुए। भीम के द्रौपदी से सुतसोम, जलन्धरा से सवर्ग तथा हिडिम्बा से घटोत्कच हुए। नकुल के द्रौपदी से शतानीक एवं करेनुमती से निरमित्र हुए। सह्देव के द्रौपदी से श्रुतकर्मा तथा विजया से सुहोत्र हुए। अर्जुन के द्रौपदी से श्रुतसेन, सुभद्रा से अभिमन्यु, उलूपी से इरावान तथा चित्रांगदा से बभ्रुवाहन हुए। पांडवों के सभी पुत्र महाभारत युद्ध में मारे गए और केवल अभिमन्यु का वंश चला। पांडवों के पुत्रों के विषय में विस्तार से यहाँ पढ़ें। 
  47. अभिमन्यु के उत्तरा से परीक्षित हुए। इन्हें ऋषि के श्रापवश तक्षक ने काटा और ये मृत्यु को प्राप्त हुए। घटोत्कच के मौर्वी से बर्बरीक और अंजनपर्व नामक पुत्र हुए पर इन्हे कुरुवंशी नहीं माना गया।
  48. परीक्षित से जन्मेजय हुए। इन्होने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए प्रसिद्ध सर्पयज्ञ करवाया जिसमे सर्पों के कई जातियां समाप्त हो गयी किन्तु देवराज इंद्र की कृपा से तक्षक जीवित बच गया।
ये संक्षेप में कुरुवंश का वर्णन है। इसके बाद युधिष्ठिर से आगे की पीढ़ी के राजाओं का वर्णन भी उपलब्ध है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं।

19 टिप्‍पणियां:

  1. ..

    मित्र नीलाभ,
    रुचिकर जानकारियाँ संजोई हुई हैं आपने. पसंद आयीं.
    कुछ प्रश्न :
    — क्या कोई शिक्षित पिता या माता अपनी समस्त संतानों का नामकरण बुरे अर्थ देने वाले संज्ञा सूचक शब्दों में करना चाहेगा? यदि नहीं तो अच्छे अर्थ वाले धृतराष्ट्र ने अपनी संतानों का नाम दुर या दुह से क्यों प्रारंभ किया. यह उपसर्ग तो अच्छे-भले शब्दों को बुरा अर्थ दे देता है. युयुत्सु नाम शब्द का अर्थ भी कोई अधिक सुन्दर नहीं है 'लड़ने की इच्छा रखने वाला युयुत्सु कहलाता है'
    — क्या समकालीन लेखक इतिहासकार का उनके प्रति दुराग्रह था?
    फिलहाल इतना ही. आपके द्वारा संग्रहित समस्त आंकड़े कई प्रश्नों को मन में जन्म लेने की तैयारी करवाते हैं.

    ........... आपकी ऐतिहासिक रुचि को नमन करता हूँ.

    ..

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    1. प्रिय प्रतुल जी,

      बहुत कम लोगों को ये मालुम है कि ध्रितराष्ट्र के सरे पुत्रों के नाम "सु" से थे. दुर्वोधन का नाम वास्तव में सुयोधन था और दुह्शाशन का सुशाशन. इनके बिगड़े हुए नाम इनके घृणित कार्यों कि वजह से है. ये एक तरह से इनकी उपाधि है. कुछ पुत्रों कि गलतियों कि सजा उनके बांकी पुत्रों को भी मिली जो सदाचारी थे. युयुत्सु और विकर्ण इनके उदाहरण हैं.

      सधन्यवाद

      नीलाभ

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  2. ..

    सत्य अन्वेषक नीलाभ जी,

    मेरे आवासीय क्षेत्र के पास ही एक 'विनोद नगर' है, एक जोशी कोलोनी है, एक चन्द्र विहार है,
    अब विनोद नगर में सबसे पहले आकर बसने वाले कोई विनोद पांडे जी थे, जोशी कोलोनी में कोई 'जोशी बन्धु आकर रहे, वे अन्यों की बनस्पत काफी प्रभावशाली थे. और चन्द्र विहार किसी चंदर गूजर के खेत में बसा हुआ है. उनके नामकरण का आधार तो समझ में आ सकता है.
    अब अपने देश 'भारत' देश की बात करते हैं. यह आर्यावर्त से कब भारत बन गया और कब हिन्दुस्तान कहा जाने लगा. इसी तरह इंडिया के पीछे सत्य खोजा जा सकता है.
    — कुछ कहते हैं कि भारत नाम राम के भाई 'भरत' के नाम पर पड़ा.
    — कुछ कहते हैं कि भारत नाम शकुन्तला पुत्र सर्वदमन 'भरत' के नाम पर पड़ा.
    — कुछ विद्वान् ...... भा (ज्ञान या प्रकाश) + रत (निमग्न या डूबा हुआ) अर्थात ज्ञान-गुरु या प्रकाश-पुंज .... अर्थ करते हैं.
    — दिल्ली जैसे महानगर में एकाधिक इंदिरा के नाम पर 'प्रियदर्शनी विहार, इंदिरा विहार, इंदिरा कोलोनी, इंदिरा बस्ती, इंदिरा मोहल्ला, इंदिरा नगर, इंदिरा पार्क ....... मतलब हर तरह की छोटी-बड़ी पैमाइश का नामकरण हो चुका है, इसी तरह राजीव, सोनिया और राहुल के नाम के साथ रिआया मानसिकता ने नामकरण किये हुए हैं.
    अब आप बताइये हम किसी गाँव या प्रदेश का नामकरण कर देते हैं तो क्या केवल किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम ही कारण रहा होगा. कोई अन्य नहीं हो सकता.
    — यदि दुष्यंत पुत्र 'भरत' के नाम पर ही 'भारत' नाम पड़ा तो बाद में 'अशोक' के नाम पर वह बदल जाना चाहिए था. उसने भी तो अपना साम्राज्य लगभग पूरे प्रायद्वीप में फैला लिया था. कलिंग-विजय को उसने स्वेच्छा से नहीं स्वीकारा यह उसकी हार नहीं कही जा सकती.
    — मुझे लगता है कि आर्यावर्त का नाम 'भारत' ज्ञान-गुरु' की विशेषता के कारण पड़ा. और बाद में भी मुगलों द्वारा पददलित होकर आर्य लोग 'हिन्दू' नाम से पहचाने जाने लगे. उनके घर का नाम स्वभावतः काफिर प्रदेश मतलब 'हिन्दुस्तान' हो गया. यह नाम हमें मजबूरी में स्वीकार करना पड़ा. उसी तरह इंडिया नाम भी कोई ऐतिहासिक गौरव की प्रतीति नहीं कराता. उसे भी हमने 'इंडी'+या मतलब नील की खेती क्षेत्र — बड़े सम्मान से ग्रहण कर लिया है. हमारी घ्राण शक्ति इतनी दुर्बल हो गई है कि हमें उसमें गुलामी की गंध तक नहीं आती.
    — मुझे लगता है कि 'हस्तिनापुर' हो या 'भारतवर्ष' नाम .... व्यक्ति के नाम पर कतई नहीं रखे गये. ये संज्ञा नाम गुणवाची हैं. ये नाम विशेषता को दर्शाते हैं.
    हमारी बाद में सोच हुई है व्यक्ति को प्रधानता देने की. यदि हम व्यक्ति को ही प्रधानता देते होते तो हमारे देश का नाम युगों पहले ही 'राम' के नाम पर रूप ले चुका होता. यह देश प्रारम्भ से गुणों को ही प्राथमिकता देता आया था व्यक्ति की छुद्र महत्वाकांक्षा ने मन में बाद में जगह बनाई.

    ..

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    1. ऐतिहासिक तथ्य है की भरत नामक कबीले के नाम पर उत्तर पश्चिमी क्षेत्र का नाम भारत पड़ा। भरत कबीले का उल्लेख ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में है। इस कबीले की त्रित्सु शाखा के राजा सुदास ने अपने कौशल से अपने कबीले का क्षेत्र सिंधु नदी से पार झेलम की ओर विस्तृत कर लिया था और समस्त आर्य जाति में प्रसिद्ध हो गया था।
      सिंधु नदी को पार कर व्यास तक बढ़ आने वाले सिंकन्दर के यूनानी लेखकों ने सिंधु को अपनी भाषा में इंडस नाम दिया और यह देश उनके लिए होगया इंडिया। (प्लुटार्क, एरियन, स्ट्रेबों, जस्टिन आदि)

      जब बाद में फारस, तुर्की से लोग आए तो फारसी में "स" के स्थान पर हो जाता है "ह" तो बना सिंधु से हिन्दू, यह प्रदेश तब तक सप्त सैन्धव (सात सिंधु नदियों वाला प्रदेश)के नाम से प्रसिद्ध हो चुका था। अतः सैन्धव हो गया हैंदव और यहाँ के निवासी हिन्दू और हिंदुओं का देश हिंदुस्तान।

      नामकरण में समान्यतः नदियों, पर्वतों या अन्य भौगोलिक पहचान को प्राथमिकता दी जाती थी। बाद में किसी व्यक्ति द्वारा बसाये जाने पर उसी के नाम पर नामकरण कर दिया जाता। जैसे सिकंदरिया नाम के अनेक शहर (alexendriya) सिकंदर ने बसाये।

      इंडिया का नील से कोई लेना देना नहीं है। बल्कि बात उल्टी है। जो रंग इंडिया में पैदा होता था उसे दरअसल इंडिगो नाम दिया गया। हमारे देश का सबसे पुराना नाम भारतवर्ष ही है। उसके बाद बाहरी लोगों ने हमें इंडिया और हिंदुस्तान दिया।

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    2. अनुपम जी,

      इस अनुपम जानकारी के लिए धन्यवाद।

      नीलाभ

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    3. प्रिय प्रतुल जी,

      भारतीय धर्म और इसके धर्म ग्रन्थ एक सागर के सामान विशाल है. इनकी विशालता कि वजह से आप देखेंगे कि धर्म ग्रन्थ कई जगह परस्पर एक दुसरे का ही विरोध करते हैं. जहाँ तक नामांकरण कि बात है, पहले के युग में नाम पिपासा कुछ ज्यादा ही थी. अगर आप भारत का इतिहास देखें तो आप पाएंगे कि पुराने ज़माने में राजा महाराजा अपने नाम के सिक्के वैगेरह बनवाते थे. मैं समझता हूँ कि अति प्राचीन काल भी इससे अछूता नहीं था. आप ये भी कह सकते हैं कि ये परंपरा पुराने ज़माने से आ रही है. जहाँ तक अशोक और भारत या दुशंत कि बात है इनमे कोई तुलना नहीं है क्योंकि इनके युगों का अंतराल बहुत ज्यादा था. आप आस पास के राजा महाराजों कि तुलना महाभारत या रामायण काल के राजाओं से नहीं कर सकते. अंत में मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि धर्म या भगवन जिनकी कथा हम धर्म ग्रंथों में पढ़ते हैं हमारे और आपके विश्वास पर टिकी है क्योंकि उनका कोई प्रमाणिक विवरण नहीं है. अगर आपको विश्वास है तो राम थे और नहीं है तो नहीं थे.

      आपका संस्कृत ब्लॉग देखा.. बेहतरीन है.. लिखते रहिये.

      सधन्यवाद

      नीलाभ

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  3. आज मैंने भी पढ़ ली है, बेहद अकाम की जानकारी है

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  4. संदीप जी,
    गलतियाँ सुधरने और उसे अच्छा करने की कला आप भली भांति जानते हैं. आपका ब्लॉग देखा. यात्रा वृतांत बेहतरीन है. मेरे अन्य वेबसाइट पर भी अपनी राय दें. धन्यवाद.
    नीलाभ
    www.itsmycountdown.com | www.nilabh.in

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  5. नीलेश जी एक पोस्ट को पेस्ट कर रहा हूं कृपया मंथन करके इनकी जानकारी दीजिये कि हैहैयवंशिय कौन है कहां से उत्पत्ति हुई। क्या ठठेरा इन्हीं के वंशज हैं?

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    1. हैहयवंशी महाराज सहस्त्रबाहु के वंशज हैं। इसपर एक लेख प्रकाशित हो चुका है:

      https://www.dharmsansar.com/2019/09/kartavirya-arjuna.html

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  6. अत्यंत हर्ष हुआ कि हम अपने प्रचीन इतिहास से आप जैसे विद्वानों के कारण अवगत हो पा रहे है । परंतु इसके प्रचार प्रसार अत्यंत आवश्यक है क्योंकि हम अपनी इस विरासत को इतिहास को मिथ कहने लगे है।

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  7. I am very glad and salute you sir for your deep knowledge in kuru vansh.we all being a proud Hindu ought to have such knowledge about our existence.i want your permission for that can i use this blog in my YouTube channel i will definitely give you credit and give link in my description.please guide

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