रविवार, जनवरी 19, 2020

परीक्षित - २: कलियुग से सात्क्षात्कार

पिछले लेख में आपने परीक्षित के जन्म के विषय में पढ़ा। आपने ये भी जाना कि महाभारत के ३६ वर्षों के बाद जब श्रीकृष्ण ने निर्वाण लिया, तब युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का राज्य परीक्षित को सौंपा और अपने भाइयों और पत्नी के साथ शरीर का त्याग कर दिया। तब परीक्षित ने युधिष्ठिर के उत्तराधिकार को कुशलतापूर्वक संभाला और हस्तिनापुर का राज्य उचित ढंग से चलाने लगे। अब आगे...

गुरुवार, जनवरी 16, 2020

परीक्षित - १: जन्म

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और दुर्योधन की मृत्यु हो चुकी थी। कौरव सेना में केवल तीन योद्धा - अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा बचे थे। मरने से पूर्व दुर्योधन ने अश्वथामा को अपनी सेना का अंतिम प्रधान सेनापति नियुक्त किया और उससे पांडवों का वध करने को कहा। अश्वथामा ने भूलवश पांडवों के पांचों पुत्रों - प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन का वध कर दिया। जब पांडवों को ये पता चला तो वो अश्वथामा को ढूंढते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम पर पहुंचे। 

उन्हें वहाँ आया देख कर अश्वथामा ने प्रतिशोध की भावना से उनपर ब्रह्मास्त्र के प्रहार कर दिया। उससे बचने के लिए अर्जुन को भी ब्रह्मास्त्र चलाना पड़ा। दोनों ब्रह्मास्त्रों के टकराने से जो विनाश होता उससे बचने के लिए वेदव्यास और देवर्षि ने बीच-बचाव किया जिससे अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया किन्तु अश्वथामा को ब्रम्हास्त्र को लौटना आता ही नहीं था। तब महर्षि वेदव्यास ने उसे ब्रह्मास्त्र की दिशा बदलने को कहा जिसके बाद अश्वथामा ने अपने ब्रह्मास्त्र को अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर छोड़ दिया। इसके बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ।

शनिवार, जनवरी 11, 2020

रावण का मानमर्दन ३: कर्त्यवीर्य अर्जुन - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि रावण अपने दिग्विजय की यात्रा में कर्त्यवीर्य अर्जुन की माहिष्मति नगरी पहुँचता है। वहाँ रावण नर्मदा के तट पर शिवलिंग बना कर पूजा करने लगा। उसी समय सहस्त्रार्जुन ने अपने १००० हाथों से नर्मदा का प्रवाह रोक लिया जिससे रावण का बनाया शिवलिंग खंडित हो गया। इससे क्रुद्ध होकर रावण ने सहस्त्रार्जुन को युद्ध की चुनौती दी। तब उसने रावण को अपने नगर आने का आमंत्रण दिया।

बुधवार, जनवरी 08, 2020

रावण का मानमर्दन ३: कर्त्यवीर्य अर्जुन - १

पिछले लेखों में आपने इस श्रृंखला में दैत्यराज बलि और असुरराज शंभर के हाथों रावण की पराजय के विषय में पढ़ा है। कर्त्यवीर्य अर्जुन के विषय में भी आपने पिछले लेख में पढ़ा। इस लेख में रावण और हैहयवंशी महान राजा कर्त्यवीर्य अर्जुन के बीच की प्रतिद्वंदिता के बारे में आप जानेंगे। कर्त्यवीर्य जिसे सहस्तार्जुन के नाम से भी जाना जाता है, के बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं।

रविवार, जनवरी 05, 2020

पुत्रदा एकादशी

हिन्दू धर्म में एकादशी का बड़ा महत्त्व है। प्रत्येक मास दो बार एकादशी होती है और इस प्रकार वर्ष में कुल २४ एकादशी होती है। मलमास अथवा अधिकमास की अवस्था में दो एकादशी और बढ़ जाती है और कुल २६ एकादशी होती है। पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं और इसका सभी एकादशियों में विशेष स्थान है। इस वर्ष ६ जनवरी को पुत्रदा एकादशी पड़ रही है जिसका मुहूर्त प्रातः ३:०७ से लेकर अगले दिन ७ जनवरी प्रातः ४:०२ तक है।

शुक्रवार, जनवरी 03, 2020

जैन धर्म के अनुसार श्री ऋषभनाथ का बल

सामान्यतः तो हम धर्मसंसार में हिन्दू धर्म से सम्बंधित जानकारियाँ ही प्रकाशित करते हैं किन्तु ऐसे कई धर्म हैं जो हिन्दू धर्म से बड़ी निकटता के साथ जुड़े हुए हैं। उनमें से तीन धर्म प्रमुख हैं - जैन, बौद्ध और सिख। वैसे तो विश्व के लगभग सारे धर्म सनातन हिन्दू धर्म से ही निकले हैं या उससे प्रभावित माने जाते हैं किन्तु भारत में इन तीन धर्मों की हिन्दू धर्म के साथ बड़ी महत्ता है। इनमे से भी जैन धर्म भी अत्यंत प्राचीन माना जाता है। कदाचित हिन्दू धर्म के बाद दूसरा सबसे प्राचीन धर्म जिसके प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभनाथ थे।

कुछ समय पहले हमने धर्म संसार में योद्धाओं की श्रेणियों के बारे में एक लेख प्रकाशित किया था जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इसमें आपने अर्धरथी, रथी, अतिरथी, महारथी, अतिमहारथी एवं महामहारथी, इन ६ श्रेणियों के योद्धाओं और उनके बल के बारे में पढ़ा था। ठीक इसी प्रकार जैन धर्म में भी श्री ऋषभदेव के बल के बारे में बताया गया है।

बुधवार, जनवरी 01, 2020

नील

पिछले लेख में आपने वानर वीर नल के विषय में पढ़ा। नील नल के घनिष्ठ मित्र थे और नल के सामान उन्हें भी ये श्राप मिला था कि वो जिस वस्तु को हाथ लगाएंगे वो जल में डूबेगी नहीं। दोनों की घनिष्ठता ऐसी थी कि आज भी लोग इन दो वानरों को भाई मानते हैं, हालाँकि ऐसा नहीं था। नल विश्वकर्मा के अवतार थे और रामसेतु का निर्माण उन्होंने ही किया था। दूसरी ओर नील अग्निदेव के अंश थे और सम्पूर्ण वानर सेना के प्रधान सेनापति थे।