गुरुवार, जनवरी 23, 2020

परीक्षित -३: कलियुग का प्रभाव और श्राप

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महाराज परीक्षित कलियुग को धर्म रूपी बैल पर अत्याचार करते देखा। कलियुग के समझाए जाने पर कि अब उसका युग आने वाला है, महाराज परीक्षित ने कलियुग को रहने के लिए पाँच स्थान निश्चित कर दिए। वे थे - जुआ, हिंसा, मदिरा, स्त्री एवं स्वर्ण। परीक्षित ने कलियुग को रहने का स्थान तो दे दिया किन्तु वे खुद नहीं जानते थे कि उसका प्रभाव सबसे पहले उनपर ही पड़ने वाला है।

परीक्षित से अनुमति प्राप्त करने के पश्चात कलियुग ने सोचा कि प्रजा पर प्रभाव डालने से उसका लाभ नहीं मिलेगा किन्तु अगर स्वयं राजा पर प्रभाव डाला जाये तो उससे पूरी प्रजा प्रभावित होगी। यही सोच कर कलियुग सदैव इसी ताक में रहने लगा कि कब वो महाराज परीक्षित पर अपना प्रभाव डाल सके। कलियुग को इस अवसर शीघ्र ही मिल गया। 

एक बार परीक्षित आखेट करते हुए बड़ी दूर निकल गए। कलियुग आरम्भ से ही उनके पीछे लगा था। परीक्षित ने अपना स्वर्ण निर्मित राजमुकुट पहन रखा था। स्वयं उन्होंने ही कलियुग के रहने के लिए स्वर्ण को भी निश्चित किया था। कलियुग ने इस बात का लाभ उठाया और उनके स्वर्ण मुकुट पर जा बैठा। ऐसा करने से कलियुग का प्रभाव परीक्षित पर पड़ा और उनकी बुद्धि भ्रमित हो गयी। 

दिन भर आखेट का पीछा करते हुए थक कर राजा परीक्षित जल की खोज में भटकने लगे। वहीँ उन्हें एक आश्रम दिखा और वे जल की आस में उस आश्रम में चले गए। वो आश्रम महर्षि शमीक का था जिन्होंने उस समय मौन व्रत धारण किया हुआ था और घोर समाधि में लीन थे। परीक्षित ने उनसे पीने को जल माँगा किन्तु समाधि में होने के कारण शमीक ऋषि ने उसका उत्तर नहीं दिया। 

ऋषिओं का इस प्रकार समाधि में रहना एक बड़ी सामान्य बात थी किन्तु उस समय परीक्षित पर पूर्ण रूप से कलियुग का प्रभाव था और उसी कारण उन्होंने समझा कि ऋषि जान-बूझ कर मेरा अपमान करने हेतु मुझे उत्तर नहीं दे रहे। इससे उन्हें अकारण ही क्रोध आ गया। उन्होंने सबसे पहले वहाँ रखे जल से अपनी प्यास बुझाई और फिर प्रतिशोध की भावना से वहीँ पर पड़े एक मृत सर्प को उठा कर शमीक ऋषि के गले में डाल दिया और वापस अपने भवन को लौट गए।

शमीक ऋषि के एक पुत्र थे श्रृंगी। वे भी महान तपस्वी थे किन्तु स्वाभाव से बड़े क्रोधी थे। जिस समय परीक्षित उनके आश्रम में आये थे उस समय श्रृंगी किसी कार्यवश बाहर गए थे। जब वे लौटे तो उन्होंने देखा कि उनके पिता के गले में एक मृत सर्प लटका पड़ा है। उन्होंने तत्काल उस सर्प को अपने पिता के गले से निकला और अपने तपोबल पर जान लिया कि ये धृष्टता परीक्षित ने की है। मारे क्रोध के उन्होंने तत्काल परीक्षित को श्राप दिया - "हे अहंकारी राजा। जिस प्रकार तुमने एक सर्प के द्वारा मेरे निरपराध पिता का अपमान किया, उसी प्रकार नागराज तक्षक के दंश से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।"

उसी समय शमीक ऋषि समाधि से जागे। देश के चक्रवर्ती राजा को ऐसा श्राप मिलने पर वे बड़े दुखी हुए। उन्होंने अपने पुत्र से कहा - "वत्स! राजा तो स्वाभाव से ही क्रोधी होता है किन्तु तुम तो तपस्वी हो। फिर किस प्रकार तुमने अपने ही राजा को ऐसा घोर श्राप दे दिया? महाराज परीक्षित तो बड़े न्यायी और धर्मात्मा हैं किन्तु उस समय उनपर कलियुग का प्रभाव था जिस कारण उन्होंने ऐसा कर्म किया किन्तु तुमने बिना सत्य को जाने ही उन्हें श्राप दे दिया।"

अपने पिता की बात सुनकर श्रृंगी ऋषि को बड़ा पछतावा हुआ। उन्होंने कहा - "हे पिताश्री! मुझे क्षमा करें। निश्चय ही मुझसे बड़ी भूल हो गयी। मैं अपने श्राप को वापस तो नहीं ले सकता किन्तु उसे सीमित कर सकता हूँ। अगर महाराज परीक्षित आज से ७ दिनों तक अपनी रक्षा कर सके तो फिर उन्हें तक्षक से कोई भय नहीं होगा।" इसके बाद शमीक ऋषि ने अपने एक शिष्य को महाराज परीक्षित के पास भेजा ताकि वे उन्हें सचेत कर सके और राजा ७ दिनों तक अपनी सुरक्षा का प्रबंध कर सकें।"

उधर राजा परीक्षित ने अपने भवन में पहुंच कर जैसे ही अपना स्वर्ण मुकुट उतारा, कलियुग का प्रभाव समाप्त हो गया। अब परीक्षित को अपने द्वारा किये गए कृत्य पर घोर पश्चाताप हुआ। उन्होंने तत्काल ऋषि के पास जाकर क्षमा-याचना करने का निर्णय लिया। अभी वे भवन से बाहर ही निकले थे कि शमीक ऋषि के शिष्य वहाँ पहुँचे और उन्हें श्रृंगी ऋषि के श्राप से अवगत करवाया। उन्होंने राजा को परामर्श दिया कि केवल ७ दिनों तक वे अपनी सुरक्षा का ऐसा प्रबंध कर लें कि तक्षक उनतक ना पहुँच सके।

...शेष

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