गुरुवार, जनवरी 16, 2020

परीक्षित - १: जन्म

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और दुर्योधन की मृत्यु हो चुकी थी। कौरव सेना में केवल तीन योद्धा - अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा बचे थे। मरने से पूर्व दुर्योधन ने अश्वथामा को अपनी सेना का अंतिम प्रधान सेनापति नियुक्त किया और उससे पांडवों का वध करने को कहा। अश्वथामा ने भूलवश पांडवों के पांचों पुत्रों - प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन का वध कर दिया। जब पांडवों को ये पता चला तो वो अश्वथामा को ढूंढते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम पर पहुंचे।

उन्हें वहाँ आया देख कर अश्वथामा ने प्रतिशोध की भावना से उनपर ब्रह्मास्त्र के प्रहार कर दिया। उससे बचने के लिए अर्जुन को भी ब्रह्मास्त्र चलाना पड़ा। दोनों ब्रह्मास्त्रों के टकराने से जो विनाश होता उससे बचने के लिए वेदव्यास और देवर्षि ने बीच-बचाव किया जिससे अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया किन्तु अश्वथामा को ब्रम्हास्त्र को लौटना आता ही नहीं था। तब महर्षि वेदव्यास ने उसे ब्रह्मास्त्र की दिशा बदलने को कहा जिसके बाद अश्वथामा ने अपने ब्रह्मास्त्र को अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर छोड़ दिया। इसके बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ।

उस प्रहार से उत्तरा के गर्भ से एक मृत पुत्र का जन्म हुआ। अब समस्या बड़ी विकट थी क्यूंकि इससे पांडवों के वंश का समूल नाश हो गया। पांडव बड़े निराश हुए क्यूंकि जिस राज्य के लिए उन्होंने इतना भीषण युद्ध लड़ा अब उस राज्य के लिए कोई व्यक्ति ही पुरुवंश में जीवित नहीं रहा। तब अंततः सभी ने श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। युधिष्ठिर ने कहा - "हे मधुसूदन! आप ही हमारा आधार हैं। हमारे वंश का तो समूल नाश हो गया। अब इस महान राज्य को सँभालने वाला भी कोई नहीं बचा। अब आप ही हमारी सहायता करें।"

उस समय उत्तरा के शोक की कोई सीमा ना थी। उसे स्वयं का कोई सुध ना था। तब अभिमन्यु की माता सुभद्रा ने उत्तरा से कहा - "पुत्री! अब शोक ना करो और स्वयं को सम्भालो। देखो तुम्हारे स्वसुर तुम्हारे समक्ष खड़े हैं और उनके सामने इस प्रकार प्रलाप करना तुम्हे शोभा नहीं देता। मेरे भाई तो स्वयं ईश्वर के अवतार हैं, वे अवश्य ही तुम्हारे दुखों का निवारण करेंगे।" ये कहकर सभी आशापूर्वक श्रीकृष्ण की ओर देखने लगे। 

तब श्रीकृष्ण ने उत्तरा से कहा - "पुत्री! शोक ना करो। मेरे लिए कुछ भी असंभव नहीं है। ये बालक जो यहाँ मृत पड़ा है उसपर ही समस्त कुरुवंश का भविष्य निर्भर है। मैंने आजतक कभी असत्य नहीं बोला और तुमसे भी कहता हूँ कि ये बालक अवश्य जीवित होगा। मैंने इस जन्म में और पूर्वजन्म में अपने कर्मों से जो कोई भी पुण्य अर्जित किया है वो सब मैं इस बालक को देता हूँ और उसी के प्रभाव से इस बालक को पुनर्जीवित करता हूँ।"

श्रीकृष्ण के ऐसा कहते ही उस मृत बालक के शरीर में स्पंदन हुआ और वो क्रंदन करने लगा। पांडवों को अपने सभी परिजनों को खोने के बाद भी अपार हर्ष हुआ और वे बारम्बार श्रीकृष्ण को साधुवाद देने लगे। तब श्रीकृष्ण ने कहा - "ये बालक अद्भुत है। आने वाले समय में ये अवश्य ही एक महान सम्राट बनेगा। मनुष्य अपने जन्म के पश्चात ही जीवन में कई परीक्षाएं देता है किन्तु इस बालक ने अपने जन्म से पहले ही कठोर परीक्षा दे दी है। अतः इस बालक का नाम "परीक्षित" होगा।"

ऐसी भी मान्यता है कि उत्तरा का पुत्र ब्रह्मास्त्र के प्रहार से उसके गर्भ में ही मर गया था। उसे जीवनदान देने के लिए श्रीकृष्ण स्वयं सूक्ष्म रूप में उत्तरा के गर्भ में उतरे। उस समय उनका आकार पाँव के अंगूठे के बराबर था। वहाँ गर्भ में उन्होंने उत्तरा के मृत बालक को देखा और अपने पुण्य प्रभाव से उन्होंने उस मृत बालक को जीवनदान दिया। यही कारण है कि परीक्षित भी असाधारण गुणों के साथ जन्मा।

परीक्षित का लालन पालन बड़े यत्न से किया गया। कुरुओं के कुलगुरु कृपाचार्य ने उसे सभी प्रकार के शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा दी। पांडवों ने उसे युद्धकुशल बनाया और अपने पिता अभिमन्यु की भांति ही वो एक महान योद्धा बना। समय आने पर पांडवों ने उसका विवाह "मद्रावती" नामक क्षत्रिय राजकुमारी से करवाया। कई जगह उनकी पत्नी का नाम "इरावती" भी बताया जाता है। अपने पितामह सम्राट युधिष्ठिर से परीक्षित ने राजधर्म की शिक्षा ली और राज-काज में भी उनका हाथ बटाने लगा।

युधिष्ठिर राजा तो बन गए किन्तु उनका मन विरक्त हो चुका था। उधर युद्ध के ३६ वर्ष बाद श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के कारण प्रभास तीर्थ पर यादवों का भयानक युद्ध हुआ जिसमे सभी यादवों का नाश हो गया। तब उससे खिन्न होकर बलराम और श्रीकृष्ण ने भी निर्वाण ले लिया। इसके बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ। जब युधिष्ठिर को श्रीकृष्ण की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होंने भी निर्वाण लेने की ठानी। तब उन्होंने परीक्षित को हस्तिनापुर का और श्रीकृष्ण के पौत्र वज्र को इंद्रप्रस्थ का राजा बनाया और अपने जीवन का अंत कर लिया। 

श्रीकृष्ण और पांडवों के अंत को ही द्वापरयुग का अंत माना जाता है। यहाँ ये एक और युग का आरम्भ हुआ और एक विचित्र कथा भी आरम्भ होती है। क्यूंकि कलियुग अपने प्रवेश करने के लिए मार्ग में था।

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