शुक्रवार, मई 01, 2020

सीता लेखनी

हम सबने ब्राह्मी एवं देवनागरी लिपि के बारे में बहुत पढ़ा है किन्तु क्या आपने कभी "शंख लिपि" के विषय में सुना है? ऐसी मान्यता है कि शंख लिपि देवनागरी से भी प्राचीन लिपि थी जिसका ज्ञान दुर्भाग्य से आगे आने वाली पीढ़ियों को नहीं मिल पाया और इसी कारण ये लिपि पूर्णतः लुप्त हो गयी। इस लिपि का काल त्रेतायुग के अंत समय का बताया जाता है। वैसे तो ब्राह्मी लिपि को शंख लिपि से भी प्राचीन माना जाता है किन्तु सौभाग्य से ब्राह्मी लिपि का देवनागरी लिपि में अनुवाद कर लिया गया है। तो ब्राह्मी दुर्लभ तो है किन्तु लुप्त नहीं। पर कदाचित शंख लिपि उतनी भाग्यशाली नहीं रह पायी।

छत्तीसगढ़ (पहले मध्यप्रदेश) सदैव से स्वयं को रामायण का साक्षी बताता रहा है और उसे सिद्ध करने के लिए वहाँ कई प्रमाण भी उपलब्ध हैं। उनमे से भी श्रेष्ठ है "सीता लेखनी" नामक पहाड़ी। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से करीब ७५ किलोमीटर और ओड़गी तहसील से करीब ३२ किलोमीटर दूर महुली गाँव में एक प्राचीन पहाड़ी है जिसके पत्थरों पर अतिप्राचीन शिलालेख उकेरे हुए दिखते हैं। इन पत्थरों पर कई गोल-गोल सी आकृतियां भी उकेरी गयी हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि ये लेखनी स्वयं माता सीता ने ही लिखा था इसीलिए इसका नाम सीता लेखनी  पड़ गया। 

उसी पहाड़ी में एक पत्थर पर एक बड़े से हाथ की छाप भी देखने को मिलती है जिसे लोग "लक्ष्मण पंजा" के नाम से जानते हैं। उनका विश्वास है कि ये हाथ का निशान लक्ष्मण जी का है। वहाँ के पत्थर सिंदूरी रंग के हैं और आज भी स्थानीय महिलाएं अपने लम्बे सुहाग की कामना के लिए उन पत्थरों को घिस कर प्राप्त किया गया सिंदूर ही उपयोग में लाती हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से उन्हें स्वयं माता सीता द्वारा सुहागन होने का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है। 

उन पत्थरों पर जो कुछ भी उकेरा गया है उसका अर्थ आज तक किसी को समझ नहीं आया है इसीलिए राजकीय पुरातत्व विभाग ने अपने अनुसन्धान के बाद ये अंदेशा लगाया है कि ये शायद प्राचीन लुप्त शंख लिपि हो सकती है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा उन चीजों को समझने के लिए सरकारी दल अभी भी कार्य कर रहा है। उसी जगह पर सरकार द्वारा श्रीराम, सीता और लक्ष्मण द्वारा वन गमन के मार्ग का नक्शा भी लगा दिया गया है जो स्थानीय लोगों और बाहर ये आये पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। 

जिला पुरातत्व विभाग के अनुसार इस पहाड़ी पर १०० से भी अधिक काले रंग के पत्थर हैं जिनपर शिवलिंग की आकृतियां उकेरी गयी है। इसी के पास महादेव के गण की मूर्ति है जिसके ऊपर उकेरे गए दो हाथों में सूर्य और चन्द्रमा की आकृतियां बनी हुई हैं। इसी कारण स्थानीय लोग ये दावा करते हैं कि इस पहाड़ी पर श्रीराम, देवी सीता और वीरवर लक्ष्मण १०८ दिनों तक रहे थे और हर दिन एक शिवलिंग की स्थापना कर वे महादेव की पूजा किया करते थे। हालाँकि पुरातत्व विभाग का ये मानना है कि ये प्रतिमाएं आधुनिक काल की हैं और इसे ९वीं सदी के आस पास निर्मित किया गया होगा। 

इस पहाड़ी को लेकर एक लोक कथा प्रचलित है कि श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ कई दिनों तक उस स्थान पर रहे थे। वहाँ की स्थानीय महिलाएं माता सीता का बड़ा सम्मान करती थी। एक दिन जब सीता उनसे मिलने गयी तो उन्होंने देखा कि वे महिलाएं एक पत्थर से दूसरे पत्थर पर कुछ लिख रही थी। जब उन्होंने उनसे पूछा कि वे क्या कर रही हैं तब उन महिलाओं ने उन्हें बताया कि वे अक्षरों को लिख रही हैं। सीताजी लिखना नहीं जानती थी इसीलिए उन्हें बुरा लगा और वे वापस लौट गयी। वापस लौट कर उन्होंने लक्ष्मण से आग्रह किया कि वे उन्हें लिखना सिखाएं। तब इसी पहाड़ी पर लक्ष्मण ने माता सीता को लिखना सिखाया था जिसके अवशेष इस पहाड़ी के चारो ओर हैं। इसी कारण इस पहाड़ी का नाम सीता लेखनी पड़ा।

हालाँकि ये लोक कथा है किन्तु कई विद्वान इसे सच नहीं मानते। उनका कहना है कि रामायण काल में ताड़पत्रों पर लिखने की कला विकसित हो चुकी थी फिर इस प्रकार पत्थरों पर लिखने का क्या कारण था? इसके उत्तर में हम ये कह सकते हैं कि स्वयं महावीर हनुमान ने सम्पूर्ण रामायण अपने नाखूनों से पाषाण पर ही लिखी थी जिसे हम "हनुमद रामायण" के नाम से जानते हैं। बाद में उन्होंने उस पाषाण को महर्षि वाल्मीकि के संतोष के लिए समुद्र में डुबो दिया था। दूसरा कारण ये भी है कि वाल्मीकि रामायण में सीता को विदुषी बताया गया है फिर ये मानना थोड़ा कठिन है कि उन्हें लिखना पढ़ना नहीं आता था।

पुरातत्व विभाग के लिए ये प्राचीन धरोहर कितनी महत्वपूर्ण है ये सबको पता है किन्तु दुःख इस बात का है कि इसकी सुरक्षा को लेकर सरकार द्वारा समुचित प्रबंध नहीं किये गए हैं। यहाँ के स्थानीय लोग कई बार इन पत्थरों को तोड़ देते हैं या उठा कर अपने साथ ले जाते हैं। इस पहाड़ी पर माँ दुर्गा की एक अष्टभुजा प्रतिमा है जिसकी बहुत मान्यता है। लोग इसे "गढ़वतिया माई" के नाम से जानते हैं। इसके अतिरिक्त इस पहाड़ पर भगवान शिव, गणेश, हनुमान और देवी की प्रतिमाएं भी हैं किन्तु बिना किसी सुरक्षा और संरक्षण के उनकी स्थिति उतनी अच्छी नहीं है। राज्य और केंद्र सरकार को इस अमूल्य धरोहर पर ध्यान देना चाहिए।

अंत में यही कहना चाहूंगा कि ये कथा कदाचित आपको किसी प्रसिद्ध धर्मग्रन्थ में लिखित रूप से ना मिले किन्तु स्थानीय लोगों का अपार विश्वास इस पवित्र स्थान के प्रति है वो सराहनीय है। और वैसे भी ये केवल हमारा विश्वास ही तो है कि हम पाषाण में भी ईश्वर को देख लेते हैं। फिर क्या अंतर पड़ता है कि ये केवल एक लोक कथा है अथवा लिखित इतिहास। जय सियाराम। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत सुंदर कथा।
    पर सीता जी के अनपढ़ होने पर प्रश्न चिन्ह है।
    आपका शोध सराहनीय है

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