शनिवार, मई 30, 2020

आदि शंकराचार्य - २: जीवन

पिछले लेख में आपने वास्तविक शंकराचार्य के विषय में पढ़ा जिनका जन्म २६३१ युधिष्ठिर सम्वत (लगभग ५०८ ईस्वी पूर्व) हुआ था। कहा जाता है कि ये स्वयं भगवान शंकर (शिव नहीं) के अवतार थे। पुराणों में कई ऐसे श्लोक हैं जो इन्हे भगवान शंकर का अवतार सिद्ध करते हैं। आइये उनमें से कुछ पर दृष्टि डालते हैं -

सर्गे प्राथमिके प्रयाति विरतिं मार्गे स्थिते दौगर्तेस्वर्गे दुर्गमतामुपेयूषि भृशं दुर्गेSपवर्गे सति। 
वर्गे देहभृतां निसर्ग मलिने जातोपसर्गेSखिलेसर्गे विश्वसृजस्तदीयवपुषा भर्गोSवतीर्नो भुवि।।

अर्थात: सनातन संस्कृति के पुरोधा सनकादिक महर्षियों का प्राथमिक सर्ग जब उपरति को प्राप्त हो गया, अभ्युदय तथा निःश्रेयसप्रद वैदिक सन्मार्ग की दुर्गति होने लगी जिसके फलस्वरूप स्वर्ग दुर्गम होने लगा तथा अपवर्ग अगम हो गया तब इस भूतल पर भगवान  भर्ग (शंकर) अवतीर्ण हुए।

भविष्योत्तर पुराण के ३६वें श्लोक में लिखा है -

कल्यब्दे दविसहस्त्रान्ते लोकानुग्रहकाम्यया। 
चतुर्भिः सह शिष्यैस्तु शंकरोSअवतरिष्यति।।

अर्थात: कलि के दो सहस्त्र वर्ष बीतने के पश्चात लोक अनुग्रह की कामना से श्री सर्वेश्वर शंकर अपने चार शिष्यों सहित अवतार धारण कर अवतरित होते हैं। 

लिंगपुराण के ४०.२०-२१.१/२ में लिखा है - 

निन्दन्ति वेदविद्यांच द्विजाः कर्माणि वै कलौ। कलौ देवो महादेवः शंकरो नीललोहितः।।
प्रकाशते प्रतिष्ठार्थ धर्मस्य विकृताकृति:। ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनापि शकरं।।
कलिदोषान्विनिर्जित्य प्रयान्ति परमं पदम्।।

अर्थात: कलि में ब्राह्मण वेदविद्या और वैदिक कर्मों की जब निंदा करने लगते हैं, रूद्र संज्ञक विकटरूप नीललोहित महादेव धर्म की प्रतिष्ठा के लिए अवतीर्ण होते हैं। जो ब्राह्मणादि किसी उपाय से उनका आस्था सहित अनुसरण और सेवन करते हैं वो परमपद को प्राप्त होते हैं। 

कूर्मपुराण के १.२८.३२-३४ में लिखा है -

कलौ रुद्रो महादेवो लोकनामीश्वर: परः। न देवता भवेन्नृणां देवतानांचं दैवतं।।
करिष्यत्यवताराणि शंकरो नीललोहितः। श्रौतस्मार्तप्रतिष्ठार्थ भक्तानां हितकाम्यया।।
उपदेक्ष्यति तज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मासंज्ञितम। सर्ववेदांतसार हि धर्मान वेदनदिर्शितं।।
ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केणोपाचरतः। विजित्य कलिजान दोषान यन्ति ते परम पदम्।।

अर्थात: कलि में देवों के देव महादेव लोकों के परमेश्वर रूद्र शिव मनुष्यों के उद्धार के लिए उन भक्तों की हित की कामना से श्रौत-स्मार्त प्रतिपादित धर्म की प्रतिष्ठा के लिए विविध अवतारों को ग्रहण करेंगे। वे शिष्यों को वेदप्रतिपादित सर्ववेदांतसार ब्रह्मज्ञानरूप मोक्ष धर्मों का उपदेश देंगे। जो ब्राह्मण जिस किसी भी प्रकार उनका सेवन करते हैं वे कलिप्रभाव दोषों को जीत कर परमपद को प्राप्त करते हैं।

शिवपुराण के रुद्रखण्ड ७.१ में लिखा है -

व्याकुरवन व्याससुत्रार्थ श्रुतेर्राथं यथोचीवान। 
श्रुतेन्यायः स एवार्थः शंकरः सविताननः।।

अर्थात: सूर्यसदृश प्रतापी श्री शिव अवतार आचार्य शंकर श्री बादरायण वेदव्यास रचित ब्रह्मसूत्रों पर श्रुतिसम्मत युक्तियुक्त भाष्य संरचना करते हैं। 

इनका जन्मस्थान वर्तमान के केरल के मालाबार क्षेत्र में स्थित कालड़ी नामक स्थान है। इनके पिता एक नम्बूद्री ब्राह्मण थे जिनका नाम शिवगुरु था और इनकी माता का नाम अर्याम्बा था। इनके जन्म की एक कथा है कि इनके माता पिता ने पुत्र प्राप्ति हेतु भगवान रूद्र की घोर तपस्या की। तब एक दिन उन्होंने इन्हे स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि वे कैसा पुत्र चाहते हैं? दीर्घायु गुणहीन पुत्र अथवा अल्पायु असाधारण गुणी पुत्र? तब इनके माता पिता ने आयु की जगह गुणों को प्राथमिकता दी और अल्पायु, किन्तु गुणी पुत्र माँगा। तब भगवान शंकर की कृपा से इनके यहाँ एक बालक का जन्म हुआ। भगवान शंकर की आराधना करने के पश्चात उन्होंने इन्हे पुत्र के रूप में पाया था इसीलिए इनका नाम शंकर रखा गया। तीन वर्ष की अल्पायु में इनके पिता का देहांत हो गया किन्तु माता ने इनका पालन पोषण किया। 

इनकी मेधा इतनी असाधारण थी कि केवल छः वर्ष की अवस्था में इन्होने सभी वेदों, पुराणों और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। जब वे सात वर्ष के थे तब भिक्षा मांगने एक दरिद्र वृद्धा की कुटिया में जा पहुँचे। उस वृद्धा के पास अन्न का एक दाना ना था। तब उन्होंने एक आंवला शंकर की हाथों में रख दिया और रोते हुए बोली कि उसके पास देने को यही है। उनकी ये दशा देख कर उस बालक का ह्रदय द्रवित हो गया और उसी समय उन्होंने श्री लक्ष्मी स्त्रोत्र की रचना की और माता लक्ष्मी से प्रार्थना की कि उनकी दरिद्रता समाप्त कर दे। माता ने उनका अनुरोध माना और उस वृद्धा के घर पर स्वर्ण आंवलों की वर्षा कर दी। 

आठ वर्ष की आयु में इन्होने संन्यास लेने का निश्चय किया किन्तु संन्यास ग्रहण करने के बीच में इनकी माता थी। वे कभी नहीं चाहती थी कि जिस पुत्र को उन्होंने इतनी प्रार्थना के बाद प्राप्त किया है और जिसे उनके पिता के निधन के बाद उन्होंने इतने जतन से पाला है, वो संन्यासी हो जाये। इससे शंकर धर्मसंकट में पड़ गए क्यूंकि वे माता की अवज्ञा भी नहीं करना चाहते थे और सांसारिक बंधनों में बंध कर भी नहीं रहना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने एक लीला रची। एक दिन स्नान के समय इनका पैर एक मगर ने पकड़ लिया। तब इन्होने चिल्ला कर अपनी माता से कहा कि "हे माता! जल्दी से मुझे संन्यास ग्रहण करने की आज्ञा दो अन्यथा ये मगर मुझे खा जाएगा।"

उस संकट को देखकर अर्याम्बा ने उन्हें संन्यास लेने की आज्ञा दे दी। आश्चर्य कि जैसे ही उन्हें माता की आज्ञा मिली, उस मगर ने उनका पैर छोड़ दिया। अपनी माता से बिछड़ने से पूर्व उन्होंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा - "माता! तुम दुखी ना हो। तुम्हारी कृपा छाया तो मेरे ऊपर सदैव बनी रहेगी। मैं वचन देता हूँ कि तुम्हारे निर्वाण से पूर्व मैं तुम्हारे पास लौटूँगा और अपने पुत्र धर्म के सभी दायित्वों का निर्वहन करूँगा।" तत्पश्चात उन्होंने आचार्य गोविंदनाथ से संन्यास की दीक्षा ली और शंकराचार्य कहलाये। 

संन्यासी होते हुए भी आदि शंकराचार्य ने अपना ये वचन निभाया और अपनी माता की मृत्यु के समय वे उनके पास वापस लौटे और एक पुत्र होने के सभी दायित्व निभाए। ऐसा कहा गया है कि अपनी माता की मृत्यु के बाद भावुक हो शंकराचार्य उन्हें अग्नि देने आगे बढे किन्तु उनके शिष्य और अन्य विद्वानों ने संन्यास के परंपरागत नियम की दुहाई देकर उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। तब उन्होंने कहा कि "अपनी माता को मुखाग्नि देना धर्म के विपरीत नहीं है किन्तु आप सभी की इच्छा है इसी कारण आपकी सम्मति मिलने तक मैं अपनी माता को मुखाग्नि नहीं दूंगा।"

इससे वहाँ उपस्थित ब्राह्मण समाज और उनके शिष्यों के मन में शंका उत्पन्न हो गयी। उनसे पूछा - "हे आचार्य!जब आपने पुनः माता के पास लौट कर एक बार संन्यास का नियम भंग कर ही दिया है तो फिर उन्हें मुखाग्नि देने के लिए समाज की सम्मति क्यों आवश्यक है?" तब शंकराचार्य ने कहा - "हे सज्जनों! अभी मैं संन्यास के नियमों से बंधा हुआ हूँ इसीलिए अपनी माता को मुखाग्नि नहीं दे पाया किन्तु जब मैंने अपनी माता को वचन दिया था, उस समय मैं संन्यासी नहीं था और इसीलिए अपने वचन के पालन हेतु मैं अपनी माता के पास लौटा।" उनका ये उत्तर सुनकर सभी धन्य-धन्य कहने लगे और उन्हें अपनी माता को मुखाग्नि देने को कहा। तब उन्होंने अपने घर के बाहर ही अपनी माता को मुखाग्नि दी। आज भी दक्षिण भारत में घर के बाहर ही अंतिम करने की प्रथा आपको दिख जाएगी।

एक बार काशी में वे अपने शिष्यों सहित जा रहे थे कि मार्ग में उन्हें एक चाण्डाल लेटा हुआ मिला। उनके शिष्यों ने उसे हटने को कहा पर उस चाण्डाल ने कोई उत्तर नहीं दिया। तब आदि शंकराचार्य स्वयं आगे आये और उसे मार्ग से हटने को कहा। तब चाण्डाल ने कहा - "किसे हटाऊँ? शरीर को या आत्मा को? आकर को या निराकार को? सीम को अथवा असीम को?" ये सुनकर शंकराचार्य आश्चर्य में पड़ गए। उनकी विद्वता को देख कर उन्होंने उस चाण्डाल को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। ब्राह्मण होकर चाण्डाल की गुरुता स्वीकार करना उनकी आतंरिक शुद्धि को दर्शाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि चाण्डाल का रूप धर कर स्वयं भगवान शंकर उन्हें ज्ञान देने आये थे। 

वैसे तो शंकराचार्य की उपलब्धि असीम है किन्तु जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य उन्होंने किया वो था भारत की चार दिशाओं में चार महान मठों की स्थापना करना। ये मठ आज भी अस्तित्व में हैं और पूरे विश्व का संत समाज इन्ही चारों मठों के अंतर्गत आता है। अगले लेख में हम इन चारो मठों के बारे में विस्तार से जानेंगे।

आभार - डॉ विदुषी शर्मा का इन पौराणिक श्लोकों का सन्दर्भ उपलब्ध करवाने हेतु।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सादर अभिवादन ।
    आपका कार्य, आपकी भावनाएं, आपकी निष्ठा अभिप्रेरक है, स्तुत्य है, प्रणम्य है।

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    1. आपके लगातार सहयोग के लिए बहुत धन्यवाद। अगर आप लॉगिन कर के टिपण्णी करेंगे तो हमें भी आपका परिचय प्राप्त हो पायेगा।

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