गुरुवार, सितंबर 17, 2020

क्या गौतम बुद्ध विष्णु अवतार हैं?


अगर हम भगवान विष्णु के दशावतार की बात करें तो संभव है कि १०० में से ९९ लोग गौतम बुद्ध को श्रीहरि का अवतार बताएँगे। बहुत काल से इसपर विवाद चला आ रहा है कि क्या वास्तव में गौतम बुद्ध भगवान विष्णु के अवतार हैं? हिन्दू धर्म में गौतम बुद्ध को विष्णु अवतार नहीं माना जाता किन्तु बौद्ध धर्म में उन्हें विष्णु के ९वें अवतार के रूप में प्रचारित किया जाता है। सर्वप्रथम तो मैं ये स्पष्ट कर दूँ कि गौतम बुद्ध श्रीहरि विष्णु के अवतार नही हैं। आइये इसका कारण जानते हैं।

हिन्दू धर्म में वेदों, पुराणों, उपनिषदों एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में दशावतार का विस्तृत वर्णन किया गया है। विशेषकर पुराणों से हमें दशावतार के विषय मे सटीक जानकारी मिलती है। हमारे किसी भी मूल धार्मिक ग्रन्थ में गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार नही बताया गया है। इसके अतिरिक्त भी इसके कई अन्य ठोस कारण हैं। आइये इसे समझते हैं।

वेद तो फिर भी अति प्राचीन हैं, किन्तु अगर पुराणों की बात करें जिनकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की है, जो स्वयं श्रीहरि के २४ अवतारों में से एक हैं, तो वे भी अत्यंत प्राचीन कृतियाँ हैं। ऐसी मान्यता है कि अधिकतर पुराणों की रचना वेदव्यास ने महाभारत से भी पहले की थी। किन्तु अगर उसका कालखंड महाभारत के समकक्ष भी माना जाये तो भी पुराणों की रचना आधुनिक गणना (पौराणिक नही) के हिसाब से कम से कम ७००० वर्ष पहले की गई होगी। अर्थात ७००० वर्ष पूर्व ही महर्षि व्यास ने ये उल्लेख कर दिया था कि कल्कि अवतार कलियुग में होना शेष है।

गौतम बुद्ध लगभग २५०० वर्ष वर्ष पहले, ४८० ईस्वी पूर्व कलियुग में जन्में, लेकिन उनका कोई भी विवरण विष्णु अवतार के रूप में हमारे मूल पुराणों में, विशेषकर विष्णु पुराण में नहीं मिलता है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में गौतम बुद्ध को नहीं अपितु बलराम को श्रीहरि का ८वां अवतार माना गया है। जब महर्षि वेदव्यास द्वापर युग में ही भविष्य के कल्कि अवतार के रूप में लिख सकते हैं तो फिर गौतम बुद्ध का वर्णन उन्होंने अपने कृतियों में क्यों नही किया है? विशेषकर अगर गौतम बुद्ध वास्तव में विष्णु अवतार होते तो वेदव्यास द्वारा अन्य विष्णु अवतारों के समान उनका वर्णन अवश्य किया जाता।

इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु के दशावतार के पीछे एक अद्भुत विज्ञान छिपा हुआ है। हमने धर्मसंसार पर एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें बताया था कि किस प्रकार डार्विन के विकास क्रम का सिद्धांत दशावतार से ही लिया गया है। अर्थात डार्विन के सिद्धांत से सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही भगवान विष्णु के १० अवतारों द्वारा प्राणियों के विकास क्रम के विषय में जानकारी दे दी गयी थी। इसके विषय में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। हालाँकि इस विषय पर हम दशावतार के एक और अद्भुत रहस्य के विषय में बात करेंगे।

अगर आप हिन्दू धर्म में वर्णित युगों का वर्णन समझेंगे तो आपको समझ में आएगा कि चतुर्युग में कुल जितने चरण हैं ठीक उतने ही श्रीहरि के मुख्य अवतार होते हैं। यही नहीं, श्रीहरि के दशावतार इस प्रकार अवतरित हुए हैं कि एक चरण में उनका केवल एक ही अवतार होता है। केवल द्वापर में बलराम और श्रीकृष्ण के अवतार इसका अपवाद हैं क्यूंकि दोनों द्वापर के अंतिम चरण में हुए थे। 

वेदों और पुराणों के अनुसार चार युग हैं - सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं कलियुग। इन चारों के सम्मलित रूप को महायुग अथवा चतुर्युग कहा जाता है। भगवान विष्णु के दशावतार इन्ही चतुर्युग में होते हैं। युगों की गणना दिव्य वर्षों के रूप में की जाती है। इस गणना के अनुसार १ दिव्य वर्ष = ३६० मानव वर्ष एवं १२०० दिव्य वर्ष = १ चरण। उसी अनुसार चारो युगों का अपना कालखंड होता है।
  • सतयुग = ४८०० दिव्य वर्ष = ४ चरण
    • सतयुग के ४ चरण होने के कारण इसी अनुपात में भगवान विष्णु के इस युग में ४ अवतार होते हैं - प्रथम चरण में मत्स्य, द्वितीय चरण में कूर्म, तृतीय चरण में वाराह एवं अंतिम चतुर्थ चरण में नृसिंह
  • त्रेतायुग = ३६०० दिव्य वर्ष = ३ चरण
    • त्रेतायुग में ३ चरण होने के कारण इस युग में श्रीहरि के ३ अवतार होते हैं - प्रथम चरण में वामन, द्वितीय चरण में परशुराम एवं अंतिम तृतीय चरण में श्रीराम
  • द्वापरयुग = २४०० दिव्य वर्ष = २ चरण
    • इस युग में २ चरण होने के कारण इसमें श्रीहरि के २ अवतार हुए - बलराम और श्रीकृष्ण। द्वापर के पहले चरण में श्रीहरि का कोई अवतार नहीं हुआ, दोनों अवतार द्वापर के अंतिम चरण में हुए।
  • कलियुग = १२०० दिव्य वर्ष = १ चरण
    • कलियुग में केवल १ चरण होता है इसी लिए ये पूर्वविदित है कि कलियुग के अंत में श्रीहरि अपने ४ चार कलाओं सहित कल्कि रूप में अवतार लेंगे।
अब अगर आपको युगों का मापन और अवतारों का विज्ञान समझ आ गया हो तो बताएं कि गौतम बुद्ध अवतार रूप में इसमें कहाँ आते हैं? उनका जन्म ४८० ईसा पूर्व हुआ था, अर्थात कलियुग में। चूंकि कलियुग में केवल एक ही अवतार हो सकता है जो निर्विवाद रूप से भगवान कल्कि ही होंगे, इसीलिए गौतम बुद्ध का श्रीहरि का अवतार होना संभव ही नही है। इसके अतिरिक्त यदि गौतम बुद्ध श्रीहरि के अवतार होते तो वो हिन्दू धर्म छोड़ कर अपना स्वयं का धर्म कभी प्रारम्भ नही करते। क्योंकि नारायण के सभी अवतार केवल हिन्दू धर्म मे ही होना निश्चित है।

तो अब प्रश्न ये उठता है कि गौतम बुद्ध को श्रीहरि का अवतार बताने का मिथ्या प्रचार कब और कैसे हुआ? क्या गौतम बुद्ध ने स्वयं ऐसा कहा? नही, गौतम बुद्ध ने स्वयं को कभी भी श्रीहरि का अवतार नही कहा है। जन्म से तो वे स्वयं हिन्दू थे और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उनका जन्म श्रीराम की पीढ़ी में ही उनके पुत्र कुश के वंश में हुआ। कुश के वंश के विषय में विस्तार से यहाँ पढ़ें। उनके अपने वंशजों ने आगे चल कर बौद्ध धर्म को छोड़ कर पुनः हिन्दू धर्म अपनाया। और तो और स्वयं बौद्ध धर्म के लोग भी उन्हें विष्णु अवतार नही मानते हैं, ये विश्वास स्वयं हिन्दू धर्म मे ही अधिक है।

वास्तव में उन्हें भगवान विष्णु का अवतार बताने का प्रयास बहुत बाद में आरम्भ हुआ। उनकी मृत्यु के लगभग ६००-७०० वर्ष बाद, जब ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ रहा था। हिन्दू धर्म से अलग होने पर बौद्ध धर्म मे सनातन धर्म के प्रति मतभेद पैदा हो गए और वे परमात्मा, ब्रह्म, वेद इत्यादि का विरोध करने लगे। कदाचित इसी स्पर्धा में बने रहने के कारण उस समय के बौद्ध अनुयायियों ने गौतम बुद्ध को नारायण के अवतार के रूप में प्रचारित करना आरंभ कर दिया।

जब ये गलत प्रचार हो रहा था तो उसी समय नवीन शंकराचार्य (आदि शंकराचार्य नही, वे गौतम बुद्ध से बहुत पहले जन्मे थे) का प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने इसका बहुत भीषण विरोध किया। अगर आप नवीन शंकराचार्य का जीवन देखेंगे तो पाएंगे कि ना केवल उनके श्रृंगेरी मठ ने, बल्कि अंत तीन प्रमुख मठों ने भी बौद्ध धर्म की इस अवधारणा का बड़ी कड़ाई से खंडन किया। आज भी हिन्दू धर्म के ये चारों प्रमुख मठ गौतम बुद्ध को नारायण का अवतार नही मानते हैं। किंतु ये दुर्भाग्य है कि आज भी ९९% लोग अज्ञानता में गौतम बुद्ध को ही नारायण का अवतार मानते हैं।

हमारे धार्मिक ग्रंथों में कुछ स्थान पर "बुद्ध" का वर्णन है। कुछ लोग जो गौतम बुद्ध को दशावतार में स्थान नहीं देते वे उन्हें श्रीहरि विष्णु के २४ अवतारों में स्थान देने का प्रयास करते हैं किन्तु ये भी सत्य नहीं है। ऐसी मान्यता है कि कुछ पुराणों, विशेषकर भागवत पुराण में जिन बुद्ध का वर्णन है वो महात्मा बुद्ध से बहुत पहले (कलियुग में ही) जन्मे थे। इसमें इसके पिता का नाम "अजन" और जन्मस्थान प्राचीन "कीकट" को बताया गया है। भागवत पुराण में इस विषय में एक श्लोक भी है:

तत: कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्।
बुद्धो नाम्नाञ्जनसुत: कीकटेषु भविष्यति॥

इस श्लोक में इनके पिता का नाम अजन और जन्मस्थान कीकट बताया गया है जबकि गौतम बुद्ध के पिता का नाम निर्विवाद रूप से शुद्धोधन और जन्म स्थान लुम्बिनी (नेपाल) बताया गया है। आपको ये जानकर महान आश्चर्य होगा कि तथागत गौतम बुद्ध को भविष्य पुराण में "राक्षस" भी कहा गया है किन्तु यहाँ राक्षस का तात्पर्य अपभ्रंश रूप में उनकी जाति से है ना कि उनके आचरण से, इसी कारण इसे सही रूप में समझना अत्यंत आवश्यक है।

आशा है आपको इसका वास्तविक संदर्भ समझ आ गया होगा। अगर ऐसा है तो कृपया उन लोगों को वास्तविक जानकारी देने का प्रयास करें जो गौतम बुद्ध को नारायण का अवतार मानते हैं। जय श्रीहरि। 

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