गुरुवार, फ़रवरी 02, 2023

जब श्रीराम को हनुमान के साथ छल करना पड़ा

जब श्रीराम को हनुमान के साथ छल करना पड़ा
ये तो हम सभी जानते हैं कि रावण की मृत्यु के पश्चात श्रीराम ने ११००० वर्षों तक अयोध्या पर राज्य किया। उसके पश्चात उन्होंने निर्वाण लिया और अपनी लीला समाप्त की। लेकिन रामायण के कुछ संस्करणों में हमें एक और बड़ी ही रोचक कथा जानने को मिलती है।

कथा के अनुसार श्रीराम को राज्य करते हुए ११००० वर्ष बीत गए थे। उनकी कृपा से महाबली हनुमान भी चिरंजीवी बन चुके थे और कल्प के अंत तक जीवित रहने वाले थे। वही श्रीराम के मुख्य द्वार के रक्षक भी थे। श्रीराम द्वारा त्यागे जाने के बाद उन चारो भाइयों में सबसे पहले लक्ष्मण ने अपने शरीर का त्याग किया। लक्ष्मण और देवी सीता के ना रहने के कारण श्रीराम का मन भी संसार से उचट गया।

इसी कारण उन्होंने अपनी लीला समाप्त करने का निर्णय लिया। मनुष्य रूप में थे तो मृत्यु को अंगीकार करना उनकी लीला का अंतिम चरण था। यही सोच कर उन्होंने यमराज को आमंत्रित किया। यमराज आये तो सही किन्तु जब उन्होंने द्वार पर पवनपुत्र को देखा तो सोच में पड़ गए कि अब श्रीराम तक कैसे पहुंचा जाये। हनुमान किसी भी स्थिति में मृत्यु को अपने प्रभु तक पहुँचने नहीं दे सकते थे। और उनसे युद्ध कर अंदर जाना किसी के वश की बात नहीं थी। ये बात यमराज ने श्रीराम को बताई।

जब श्रीराम ने ये सुना तो उन्होंने हनुमान जी को बुला कर बहुत समझाया कि जिसने भी जन्म लिया है उसकी मृत्यु आवश्यक है। अतः अब वे हठ छोड़ें और उन्हें इस संसार का त्याग करने दें। किन्तु बजरंगबली ने जब ये सुना कि उनके प्रभु अब इस मृत्यु लोक का त्याग करने वाले हैं, वे अत्यंत व्याकुल हो उठे। अब तक उन्हें पता चल ही चुका था कि यमराज द्वार से प्रवेश करना चाहते हैं इसीलिए वे और तत्परता से पहरा देने लगे। इससे श्रीराम के निर्वाण में विलम्ब होने लगा।

श्रीराम ये जानते थे कि जब तक हनुमान द्वार पर हैं, उनका निर्वाण लेना असंभव है। इसी कारण उन्होंने हनुमान को छल से अपनी माया से अवगत कराने का निश्चय किया। एक दिन जब हनुमान श्रीराम के समक्ष थे, श्रीराम ने जान-बूझ कर अपनी अंगूठी भूमि के एक छिद्र में गिरा दिया। फिर उन्होंने हनुमान से कहा कि "पवनपुत्र! ये अंगूठी मुझे सीता ने दी थी इसीलिए मुझे अत्यंत प्रिय है। अतः आप यथाशीघ्र उसे ढूंढ कर ले आएं।"

अपने प्रभु की आज्ञा पर हनुमान सूक्ष्म रूप धर कर उस छिद्र में घुस गए और अंगूठी खोजते हुए पाताल में नागलोक तक पहुँच गए। वहाँ जब जब नागों ने उन्हें कुछ खोजते हुए देखा तो वे उन्हें नागराज वासुकि के पास ले गए। हनुमान ने वासुकि को प्रणाम किया और वहां आने का अपना प्रयोजन बताया। उनकी बात सुन कर वासुकि हंसने लगे और कहा - "तो इस कल्प में श्रीराम का अवतरण समाप्त हो ही गया।"

हनुमान को कुछ समझ में नहीं आया। तब वासुकि उन्हें लेकर पाताल के गर्भ में ले कर चले गए जहाँ एक जैसी अंगूठियों का ढेर लगा हुआ था। उन्होंने हनुमान से कहा कि श्रीराम की अंगूठी ढूंढ लें। हनुमान बड़े परेशान हुए कि अंगूठियों के इस ढेर में वे असली अंगूठी कैसे ढूंढे? फिर उन्होंने पहली अंगूठी उठाई तो उसमें उन्हें श्रीराम का चित्र दिखा। वे प्रसन्न हो गए और वापस जाने को मुड़े ही थे कि उनका ध्यान वहां पड़ी अन्य अंगूठियों पर पड़ा। वे ये देख कर आश्चर्यचकित रह गए कि सभी अंगूठियां एक सी ही थी और सब में श्रीराम का चित्र अंकित था। उन्होंने नागराज वासुकि से इसका रहस्य पूछा।

तब उन्होंने कहा कि "क्या आपको लगता है कि आज तक केवल एक ही श्रीराम अवतरित हुए हैं? आज पहले असंख्य श्रीराम अवतरित हो चुके हैं और आज के बाद भी असंख्य श्रीराम अवतरित होते रहेंगे। यही परमपिता ब्रह्मा द्वारा रचित सृष्टि का विधान है। इसी को सृजन और विनाश का चक्र कहते हैं। ब्रह्मा जी के आधे दिन को एक कल्प कहा जाता है जिसमें १००० चतुर्युग होते हैं। प्रत्येक कल्प में उन्ही सहस्त्र चतुर्युग के किसी त्रेता में श्रीराम अवतरित होते हैं। यही नहीं, स्वयं आप भी हर कल्प में जन्म लेते हैं और इस अंगूठी को ढूंढते हुए यहाँ आते हैं। तब आपकी अनुपस्थिति में श्रीराम अपनी लीला समाप्त कर यमराज के साथ अपने लोक वापस चले जाते हैं। इसी प्रकार इन अंगूठियों का ढेर बढ़ता रहता है। भविष्य के श्रीराम की अंगूठियों के लिए अभी भी यहाँ बहुत स्थान है।" 

(कल्प और हिन्दू काल चक्र के बारे में विस्तार से जाने के लिए यहाँ जाएँ।)

तब हनुमान श्रीराम की लीला को समझ गए। उन्हें ये भी समझ आ गया कि भले ही वे नारायण का अवतार हो, यदि वे पृथ्वी पर अवतरित होते हैं तो उस रूप में उनकी मृत्यु होना भी अवश्यम्भावी है। यदि ईश्वर स्वयं अपने बनाये विधान का उलंघन करेंगे तो सृष्टि में अराजकता व्याप्त हो जाएगी। हनुमान के मन की व्यथा समाप्त हो गयी और वे पुनः वापस धरती लोक पर आ गए।

वहां आकर उन्हें पता चला कि श्रीराम अपने दोनों भाइयों के साथ निर्वाण ले चुके हैं। साथ ही साथ जिन देवताओं के अंशों ने पृथ्वी पर अवतार लिया था वे भी पुनः अपने लोक लौट चुके थे। श्रीराम के बिना हनुमान को वो पृथ्वी अच्छी नहीं लग रही थी किन्तु उन्हें ये समझ आ गया कि कदाचित इसी कारण श्रीराम ने उन्हें कल्प के अंत तक जीवित रहने का वरदान दिया था ताकि वे उनकी कथाओं का प्रचार-प्रसार करते रहें। चिरंजीवी हनुमान आज भी इस लोक में उपस्थित हैं और सृष्टि के अंत तक राम कथा भी उनके साथ उपस्थित रहेगी।

जय श्रीराम। जय हनुमान।

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