गुरुवार, मई 26, 2022

ऋषियों के कितने समुदाय हैं?

ऋषियों के कितने समुदाय हैं?
कुछ समय पहले हमने ऋषि, मुनि, साधु, संन्यासी के अंतर पर एक लेख प्रकाशित किया था। आज हम पुराणों में वर्णित ऋषि-मुनियों के विभिन्न समुदायों के विषय में बात करेंगे। इनमें से कई समुदाय आपको आज भी अपने आस पास मिल जायेंगे। वैसे तो पुराणों में अनेकों समुदायों का वर्णन है किन्तु इस लेख में हम मुख्य समुदायों के विषय में चर्चा करेंगे।

इनका सबसे विस्तृत वर्णन हमें वाल्मीकि रामायण में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब श्रीराम को वनवास हुआ तो वे अपने वनवास के दौरान २१ प्रकार के ऋषियों के समूह से मिले जिन्होंने उनसे राक्षसों का वध करने का अनुरोध किया। आइये इनके विषय में संक्षेप में जानते हैं।
  1. वैखानस: ऐसी मान्यता है कि ऋषियों का यह समूह ब्रह्मा जी के नख से उत्पन्न हुआ था। इसके अनुयायी मुख्यतः भगवान विष्णु के भक्त (वैष्णव) होते हैं। ऐसा माना जाता है कि इसका आरम्भ "विखनस" नामक मुनि से हुआ था। आधुनिक युग में स्वामी रामानुजाचार्य ने इस समुदाय के उत्थान में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इस मत की मुख्यतः चार शाखाएं होती हैं जो चार महान ऋषियों के नाम पर आधारित है - आत्रेय, काश्यपीय, मारीच एवं भार्गव
  2. वालखिल्य: ऋषियों का यह समूह ब्रह्मा जी के रोम से प्रकट हुआ था। इनका मूल ६०००० बालखिल्य हैं जो महर्षि क्रतु और दक्षपुत्री सन्नति से उत्पन्न हुए। इनके ही आशीर्वाद से महर्षि कश्यप और विनता को महापराक्रमी गरुड़ पुत्र रूप में प्राप्त हुए। ये सभी ६०००० बालखिल्य सूर्य के सामने चलते रहते हैं जिनसे सूर्यदेव को शक्ति प्राप्त होती है। वालखिल्य समुदाय स्वयं को इन्ही का वंशज मानते हैं और वे स्वाभाव से सात्विक प्रवित्ति के होते हैं। बालखिल्य पर एक विस्तृत लेख पहले ही प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। 
  3. संप्रक्षाल: ऋषियों का यह समूह भोजन के बाद बर्तन धो-पोछकर रख देते है, दूसरे समय के लिए कुछ नहीं बचाते हैं। ये प्रजापति के चरणोदक से उत्पन्न बताये गए हैं। इस समुदाय के ऋषि एक विशेष विधि से स्नान करते हैं। संप्रक्षाल का अर्थ भी विधि पूर्वक स्नान करने वाला ही है। इसका एक अर्थ ये भी है कि जिनका दिन प्रक्षालन अर्थात स्नान से आरम्भ होता हो।
  4. मरीचिप: इन्हे भी बालखिल्यों से ही जोड़ा गया है। कई लोग इन्हे भी उन्ही का वंशज मानते हैं तो वही कुछ लोग इन्हे ब्रह्मपुत्र महर्षि मरीचि से जोड़ कर देखते हैं। मरीचिप का अर्थ होता है वो ऋषि जो सूर्य और चन्द्र की किरणों का पान करके रहते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ भगवान सूर्यनारायण से शक्ति ग्रहण करना है, अर्थात इस समुदाय के ऋषि अपनी शक्तियां सूर्यदेव से प्राप्त करते हैं। इसी कारण इस समुदाय में सूर्य पूजा का विशेष महत्त्व है। 
  5. अश्मकूट: ये ऋषियों का एक दुर्लभ समुदाय है। ये सदैव झुण्ड में ही रहते हैं और एकाकी कही आने जाने से बचते हैं। इसलिए इन्हे बहुसंख्यक समुदाय भी कहा जता है। इनकी विशेष बात ये है कि इनका भोजन करने का तरीका अत्यंत दुर्लभ होता है। ये कच्चे अन्न को पत्थर से कूटकर खाते हैं और इसी कारण इनका ये नाम पड़ा है।
  6. पत्राहार: जैसा कि नाम से पता चलता है, इस समुदाय के ऋषि केवल पत्तों को आहार के रूप में ग्रहण करते हैं। इनका जीवन पूर्ण रूप से वनस्पतियों पर निर्भर होता है किन्तु फिर भी वे किसी भी फल को ग्रहण नहीं करते हैं, अपितु वृक्ष के पत्ते ही इनका भोजन होते हैं। उन पत्तों से अपनी क्षुधा मिटा कर ये सदैव तप और पूजा पाठ में रत रहते हैं।
  7. दंतोलूखली: ये समुदाय दो शब्दों से बना है - दन्त एवं ऊखल। दन्त का अर्थ होता है दांत और ऊखल वो पात्र होता है जिसमें धान इत्यादि अनाज पीसे जाते हैं। अर्थात ऋषियों का ये समुदाय अपने दांतों से ही ऊखल का काम करते हैं। अर्थात ये भोजन, फल, सब्जियों को काटने के लिए अपने दातों का ही उपयोग करते हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार ये हर समय कुछ ना कुछ चबाते रहते हैं।
  8. उन्मज्ज्क: इनका सीधा सम्बन्ध जल से है। कई ग्रंथों के अनुसार इनकी उत्पत्ति भी जल से ही मानी गयी है। ये ऋषियों का ऐसा समुदाय है जो कंठ तक पानी में डूब कर तपस्या करते हैं। उन्मज्ज्क का एक अर्थ शुद्ध भी होता है, अर्थात जल से स्नान कर शुद्ध हो बाहर निकलने वाला। जो जल में डूबता नहीं अपितु जल से उदित होता है उसे ही उन्मज्ज्क कहते हैं।
  9. गात्रशय्य: गात्र अर्थात शरीर और शय्य का अर्थ है शैया। मतलब ऐसे ऋषि जो शरीर से से ही शय्या का काम लेते हैं उन्हें ही गात्रशय्य कहा जाता है। ये आसन अथवा बिछौने का प्रयोग नहीं करते बल्कि स्वयं की भुजाओं पर सिर रख कर सोते हैं। इन्हे विश्राम करने के लिए कोई विशेष स्थान नहीं चाहिए होता है बल्कि ये कहीं भी स्वयं के शरीर को शैय्या बना कर सो जाते हैं।
  10. अश्य्य: अश्य्य का अर्थ होता है ना सोने वाले। ये अल्प शैय्या, अर्थात ना सोने या अत्यंत कम सोने वाले होते हैं। गात्रशय्य समुदाय की भांति ये भी स्वयं को साधनों से रहित रखते हैं और सोने के लिए नीचे कुछ भी नहीं बिछाते हैं और भूमि पर ही विश्राम करते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये अपने सोने के समय का उपयोग भगवद्भजन में करते हैं।
  11. अनवकाशिक: वे जो निरंतर सत्कर्म में लगे रहते हैं और कभी भी अवकाश नहीं लेते हैं। इनका लक्ष्य सामाजिक परिवर्तन और विकास होता है। अनवकाशिक का अर्थ होता है जिन्हे अपने काम से फुर्सत नहीं होती है। इनके जीवन में छुट्टी जैसी कोई चीज नहीं होती है।
  12. सलिलाहार: सलिल का अर्थ है जल या धारा और आहार का अर्थ है भोजन। अर्थात इस समुदाय के ऋषियों के लिए जल ही भोजन होता है और ये जल पीकर ही जीवित रहते हैं। दूसरे शब्दों में ये सदैव जलाहार करते हैं। इनकी इस जीवन पद्धति के कारण इनका जीवन अत्यंत कठिन होता है।
  13. वायुभक्ष: वायु का अर्थ है हवा और भक्ष का अर्थ है भक्षण करना अर्थात खाना। ये ऐसा समुदाय होता है जो केवल वायु का पान कर जीवित रहता है। जैसे सलिलाहार के लिए जल ही भोजन होता है वैसे ही वायुभक्ष समुदाय के लिए हवा ही भोजन होती है। हमारे पुराणों में ऐसी कई तपस्या का वर्णन है जहाँ साधक ने भोजन का त्याग कर केवल वायु का सेवन कर अपनी तपस्या पूर्ण की। हिरण्यकशिपु और रावण भी अपनी तपस्या के अंतिम चरण में वायुभक्ष बन गए थे।
  14. आकाश निलय: गगन ही जिसका घर हो उसे ही आकाश निलय कहते हैं। इसका एक अर्थ घर या कुटिया से रहित भी होता है। इस समुदाय के ऋषि खुले मैदान में आकाश के नीचे रहते हैं। कड़ी धूप एवं वर्षा में भी ये कभी भवन के अंदर नहीं जाते। अधिक धूप या बारिश होने पर ये वृक्ष के नीचे शरण लेते हैं। हालाँकि कुछ लोग ये मानते हैं कि ये किसी भी स्थिति में छाया रहित स्थानों पर ही रहते हैं।
  15. स्थनिडन्लाशाय: स्थनिडन्लाशाय का अर्थ होता है गाय के गोबर से लीपी हुई पवित्र भूमि पर सोने वाले। ऐसे ऋषि पवित्र भूमि या वेदी (यञवेदी) पर ही सोने वाले होते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि समय बचाने के लिए इस समुदाय के लोग यज्ञ के बाद उसी पवित्र भूमि पर विश्राम करते हैं।
  16. उर्ध्व्वासी: अर्थात ऊँचे स्थान पर रहने वाले। इस समुदाय के ऋषि पर्वत, शिखर या ऊंचे स्थानों पर रहने वाले होते हैं। इसका एक अर्थ भूमि से ऊपर स्थापित की गयी कुटिया में रहने वाले लोग भी होता है। हिमालय और अन्य पर्वतों पर तपस्या करने वाले ऋषियों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। भगवान परशुराम को भी सदैव महेंद्र पर्वत पर रहने के कारण उर्ध्व्वासी कहा जाता है।
  17. दांत: दांत का अर्थ होता है संयमी या दमन करने वाला। इस समुदाय के ऋषि मन और इन्द्रियों को अपने वश में रखने वाले होते हैं। जिस प्रकार मनुष्य अपने दातों से भोजन को पकड़ कर रखता है ताकि वो इधर उधर नहीं गिरे, उसी प्रकार इस समुदाय के ऋषि कठिन संयम से अपनी इन्द्रियों को जकड कर रखते हैं ताकि वे अनियंत्रित ना हों।
  18. आद्रपटवासा: आद्र का अर्थ होता है गीला या भींगा हुआ और पटवास का अर्थ होता है वस्त्र। अर्थात ऋषियों का ये समूह सदैव भीगे या गीले वस्त्र पहनता है। जल को शुद्धि का प्रतीक माना गया है और इस समुदाय के लोगों का मानना है कि सदैव गीले वस्त्र पहनने के कारण ये सदैव शुद्ध रहते है।
  19. सजप: सजप का अर्थ होता है सदैव जप करने वाला। ऋषियों का ये समूह हमेशा और निरंतर जप करते रहते हैं। आपको आज भी ऐसे कई समूह मिल जायेंगे जो हमेशा जप करने में तत्पर रहते हैं। जप किसी भी चीज का हो सकता है। ये भगवान के नाम का स्मरण भी हो सकता है या फिर कोई मन्त्र भी।
  20. तपोनिष्ठ: तपोनिष्ठ का अर्थ होता है वो जो तपस्या में निष्ठा रखे। ऋषियों का ये समूह सदैव तपस्या अथवा ईश्वर के विचारों में स्थित रहने वाला होता है। आधुनिक युग में यज्ञ और कर्मकांड करने वाले ऋषि मूलतः इसी समुदाय के होते हैं।
  21. पंचाग्नि सेवी: ऋषियों का ये अंतिम समुदाय पंचाग्नि का सेवन करने वाले होते हैं। ऐसे ऋषि चारों ओर से जलती हुई पाँचों प्रकार की अग्नियों के बीच बैठकर और ऊपर से सूर्य का तप सहते हुए ग्रीष्म ऋतु में किये जाने वाले एक विशेष प्रकार के तप में सिद्ध होते हैं। पंचाग्नि कई प्रकार की मानी गयी है। हमारे शास्त्रों में दो मार्ग बताये गए हैं - उत्तरायण एवं दक्षिणायन। पंचाग्नि दक्षिणायन से सम्बंधित है। शास्त्रों में अन्वाहार्यपचन, गार्हपत्य, आहवनीय, सभ्य और आवसथ्य नामक अग्नि प्रकार की अग्नि के बारे में बताया गया है। छान्दोग्य उपनिषद में सूर्य, पर्जन्य, पृथ्वी, पुरुष और योषित् (स्त्री) को पांच प्रकार की अग्नि माना गया है। आयुर्वेद में चीता, चिचिड़ी, भिलावाँ, गंधक और मदार को पंचाग्नि कहा गया है। 

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