30 सितंबर 2019

महर्षि भृगु - २

पिछले लेख में आपने महर्षि भृगु के जन्म, वंश, पत्नियों और पुत्रों के विषय में पढ़ा। अब आगे... शिव पुराण एवं वायु पुराण में ऐसा वर्णन है कि जब दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव के अपमान हेतु महायज्ञ का आयोजन किया तो महर्षि भृगु उस यज्ञ में उपस्थित थे। जब सबने देखा कि दक्ष ने महादेव को आमंत्रित नहीं किया है तो महर्षि कश्यप के साथ भृगु ने भी दक्ष को चेतावनी दी कि महादेव के बिना ये यज्ञ सफल नहीं हो सकता। किन्तु अभिमान वश दक्ष ने उनकी बात अनसुनी कर दी। इसका परिणाम ये हुआ कि अपने पति का अपमान देख कर सती ने उसी यञकुंड में आत्मदाह कर लिया।

28 सितंबर 2019

महर्षि भृगु - १

पुराणों में महर्षि भृगु के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। ये भारतवर्ष के सर्वाधिक प्रभावशाली, सिद्ध और प्रसिद्ध ऋषियों में से एक है। ये परमपिता ब्रह्मा और महर्षि अंगिरा के छोटे भाई थे और वर्तमान के बलिया (उत्तरप्रदेश) में जन्मे थे। ये एक प्रजापति भी हैं और स्वयंभू मनु के बाद के मन्वन्तरों में कई जगह इनकी गणना सप्तर्षियों में भी की जाती है। इनके वंशज आगे चल कर भार्गव कहलाये और उनसे भी भृगुवंशियों का प्रादुर्भाव हुआ। नारायण के छठे अवतार श्री परशुराम भी इन्ही के वंश में जन्मे और भृगुवंशी कहलाये।

26 सितंबर 2019

दस दिशाएं - २

पिछले लेख में आपने उर्ध्व, दक्षिण, पूर्व, ईशान एवं आग्नेय दिशाओं के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम अन्य ५ दिशाओं के बारे में जानेंगे।

६. नैऋत्य: दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य कहा गया है। यह दिशा सूर्यदेव के आधिपत्य में है और इस दिशा के स्वामी राहु हैं। शिवानी देवी इस दिशा की अधिष्ठात्री हैं। इस दिशा में पृथ्वी तत्व प्रमुख रूप से विद्यमान रहता है इसी कारण घर की भारी वस्तुएं इस दिशा में रखनी जाहिए। इस दिशा में जल तत्व को रखने की मनाही है। अर्थात इस दिशा में कुआँ, बोरिंग, गड्ढे इत्यादि नहीं होना चाहिए। सूर्यदेव के संरक्षण में होने के कारण इस दिशा को वास्तु के अनुसार सही रखने पर जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

24 सितंबर 2019

दस दिशाएं - १

पिछले लेख में आपने १० दिशों के दिक्पालों के बारे में विस्तार से पढ़ा। आज हम उन १० दिशाओं के महत्त्व के बारे में जानेंगे। 
  1. उर्ध्व: इस दिशा के देवता स्वयं परमपिता ब्रह्मा हैं। उर्ध्व का अर्थ आकाश है और जो कोई भी उर्ध्व की ओर मुख कर सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करता है, उसे उसका फल अवश्य प्राप्त होता है। वेदों में ऐसा लिखा है कि अगर कभी भी कुछ मांगना हो तो ब्रह्म और ब्रह्माण्ड से ही मांगना चाहिए। उनसे की हुई हर प्रार्थना स्वीकार होती है। हमारे घर की छत, छज्जे, रोशनदान एवं खिड़कियां इस दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। कहा जाता है कि कभी भी आकाश की ओर देख कर अपशब्द नहीं बोलना चाहिए, आकाश की ओर कुछ फेंकना, थूकना, चिल्लाना इत्यादि वर्जित है। जिस प्रकार आकाश की ओर फेंकी हुई कोई भी चीज वापस आपके पास ही आती है उसी प्रकार आकाश की ओर देखकर की गयी प्रार्थना आप पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और आपका जीवन खुशहाल हो जाता है। दूसरी ओर अगर आप आकाश की ओर देख कर अपशब्द कहते हैं अथवा बद्दुआ देते हैं तो वो वापस आपके ही जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालती है और उसे दुखों से भर देती है।

22 सितंबर 2019

दिक्पाल - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार ब्रह्मदेव के कर्णों से १० दिशाओं की उत्पत्ति होती है और फिर उनके अनुरोध पर ब्रह्मदेव उनके पतियों के रूप में ८ देवताओं की रचना करते हैं और उन्हें ८ दिशाओं के अधिपति बना कर दिक्पालों का पद प्रदान करते हैं। यहाँ पर एक बात ध्यान देने वाली है कि अधिकतर ग्रंथों में ईशान दिशा के स्वामी भगवान शिव और अधो दिशा के स्वामी भगवान विष्णु माने जाते है। इस लेख में हम १० दिशाओं के देवताओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।

20 सितंबर 2019

दिक्पाल - १

दिशाओं के विषय में सबको पता है। हमें मुख्यतः ४ दिशाओं के बारे में पता होता है जो हैं पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण। वैज्ञानिक और वास्तु की दृष्टि से ४ और दिशाएं है जो इन चारों दिशाओं के मिलान बिंदु पर होती हैं। ये हैं - उत्तरपूर्व (ईशान), दक्षिणपूर्व (आग्नेय), उत्तरपश्चिम (वायव्य) एवं दक्षिणपश्चिम (नैऋत्य)। तो इस प्रकार ८ होती हैं जो सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।

18 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - ४: सहस्तार्जुन के बाद का वंश

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार अर्जुन को अपने पिता कार्तवीर्य के बाद राजगद्दी मिलती है और वो महर्षि जमदग्नि के आश्रम से उनकी प्रिय गाय कामधेनु को बलात अपने साथ ले जाता है। जब परशुराम को इस बात की जानकारी मिलती है हो तो वे सहस्त्रार्जुन को युद्ध के लिए ललकारते हैं और दोनों में भीषण युद्ध होता है। उस युद्ध में अंततः सहस्त्रार्जुन की मृत्यु हो जाती है। अब आगे...

16 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - ३: परशुराम के साथ युद्ध और मृत्यु

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि अपने पिता कार्तवीर्य की मृत्यु के बाद उनके पुत्र कार्तीवीर्य अर्जुन को सिंहासन प्राप्त हुआ। और अधिक शक्ति प्राप्त करने के लिए अर्जुन ने श्री दत्तात्रेय की घोर आराधना कर उनसे १००० भुजाओं का वरदान प्राप्त किया। उन १००० भुजाओं के कारण ही उनका एक नाम सहस्तार्जुन भी हुआ। अपनी इस शक्ति के बल पर उसने सातों द्वीपों पर अपना अधिकार जमा लिया और सप्तद्वीपाधिपति कहलाया। यहाँ तक कि लंकापति रावण को भी उसने युद्ध में परास्त किया। अब आगे...

14 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - २: अर्जुन से सहस्त्रार्जुन की यात्रा

पिछले लेख में आपने परमपिता ब्रह्मा से लेकर कार्तवीर्य अर्जुन तक के वंश का वर्णन पढ़ा। कार्तवीर्य अर्जुन चंद्रवंशी राजाओं में सबसे प्रतापी थे। उनके पिता महाराज कार्तवीर्य ने अपने राज्य को बहुत बढ़ाया। फिर अपने मंत्रियों की सलाह पर उन्होंने भृगुवंशी ब्राह्मणों को अपने पुरोहितों के रूप में नियुक्त किया। उस समय भृगुवंशी ब्राह्मणों का नेतृत्व परशुराम के पिता जमदग्नि कर रहे थे। महर्षि जमदग्नि के साथ कार्तवीर्य के बहुत मधुर सम्बन्ध थे। कार्तवीर्य जमदग्नि का बड़ा आदर करते थे और राजकाज में उनका परामर्श लेते थे।

12 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - १: वंश वर्णन

कार्तवीर्य अर्जुन पौराणिक काल के एक महान चंद्रवंशी सम्राट थे जिनकी राजधानी महिष्मति नगरी थी। परमपिता ब्रह्मा के पुत्र अत्रि ऋषि हुए। अत्रि से चंद्र और चंद्र से बुध हुए। बुध और उनकी पत्नी इला के पुत्र महान पुरुरवा हुए जिन्होंने उर्वशी से विवाह किया। दोनों के पुत्र आयु हुए और आयु के पुत्र नहुष हुए। नहुष के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट ययाति हुए जिनके ज्येष्ठ पुत्र यदु हुए। इन्ही से यदुकुल चला जिसमे आगे चलकर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। यदु के पुत्र सहस्त्रजीत हुए और उनके पुत्र शतजीत हुए। इन्ही शतजीत के पुत्र हैहय हुए जिनसे हैहयवंश चला। इसी वंश में कार्तवीर्य अर्जुन ने जन्म लिया। महाराज हैहय ने प्रतिष्ठानपुर को अपनी राजधानी बनाया।

10 सितंबर 2019

सोलह सिद्धियाँ - २

पिछले लेख में आपने इन १६ सिद्धियों में से पहली आठ सिद्धियों के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम अगली ८ सिद्धियों के विषय में जानेंगे।

९. देवक्रियानुदर्शन: इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक विभिन्न देवताओं का सानिध्य प्राप्त कर सकता है। यही नहीं वो देवताओं को अपने अनुकूल बना कर उनसे उचित सहयोग ले सकता है। हमारे पुराणों में कई महान ऋषि हुए हैं जो अपनी इच्छा अनुसार देवताओं से मिल सकते हैं। दुर्वासा, भृगु, वशिष्ठ इत्यादि ऐसे कई ऋषि इसके उदाहरण हैं।

8 सितंबर 2019

सोलह सिद्धियाँ - १

आप सब ने महावीर हनुमान की अष्ट सिद्धियों के बारे में पढ़ा। इसके अतिरिक्त हमारे पुराणों में १६ मुख्य सिद्धियों का वर्णन किया गया है। किसी एक व्यक्ति में सभी १६ सिद्धियों का होना दुर्लभ है। केवल अवतारी पुरुष, जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादि में ही ये सारी सिद्धियाँ हो सकती है। साथ ही बहुत सिद्ध ऋषियों जैसे सप्तर्षियों में ये साडी सिद्धियाँ हो सकती है। आइये इन सिद्धियों के विषय में कुछ जानते हैं:

4 सितंबर 2019

गणेश चतुर्थी - २

पिछले लेख में आपने श्रीगणेश के जन्म की कथा पढ़ी। आपने ये भी जाना कि साल के हर महीने में श्रीगणेश की पूजा होती है जिसे हम "विनायक चतुर्थी" कहते हैं पर उनमे से भाद्रपद की चतुर्थी तिथि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है जिसे हम "गणेश चतुर्थी" कहते हैं। ये तो सभी जानते हैं कि गणेश चतुर्थी का त्यौहार १० दिनों तक रहता है और उसके बाद उनकी प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस परंपरा के पीछे भी एक कथा है। 

बात तब की है जब ब्रह्मदेव की प्रेरणा से महर्षि व्यास ने महाभारत की कथा को लिखने का निर्णय लिया। उन्होंने ये निश्चय किया कि वे केवल श्लोकों की रचना करेंगे। किन्तु फिर उस महान कथा को लिपिबद्ध कौन करे? तब उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वे उस कथा को लिखने की कृपा करें। उनका अनुरोध सुनकर श्रीगणेश उस कथा को लिखने के लिए तैयार तो हो गए पर उन्होंने एक शर्त रख दी कि एक बार लिखना शुरू होने के बाद उनकी लेखनी कभी रुकनी नहीं चाहिए। अगर व्यास ने कथा सुनाना बंद किया और उनकी लेखनी रुकी तो वे आगे उस कथा को नहीं लिखेंगे।

2 सितंबर 2019

गणेश चतुर्थी - १

आप सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें। गणेश चतुर्थी श्रीगणेश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रसिद्द पर्व है जिसे पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। विशेषकर महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में इस पर्व की बहुत अधिक मान्यता है और वहाँ इस उत्सव को भव्य रूप से १० दिनों तक मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी को महाचतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन श्रीगणेश का जन्म हुआ था और दुर्भाग्य से इसी दिन उनकी मृत्यु भी हो गयी थी। बाद में भगवान शंकर की कृपा से इसी दिन उन्हें जीवनदान भी प्राप्त हुआ। यही कारण है कि इस पर्व का इतना अधिक महत्त्व है।