शुक्रवार, नवंबर 30, 2018

धर्मः मम

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः !
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय !! - श्रीमद्भगवद्गीता !! १ !! १ !!

हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ! 
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धुव्रा नीतिर्मतिर्मम !! - श्रीमद्भगवद्गीता !! १८ !! ७८ !! 

(सञ्जय उवाच) जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं (और) जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति (और) अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है। 

विस्तार: धर्म की गति सूक्ष्म होती है (सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य), यह सम्पूर्ण लोकों का कल्याण करता है और इसमें अत्यन्त गूढता समाहित होती है। यथा - भक्त प्रह्लाद का नारायण की शरणागति होना, बलि का उपेन्द्र को सर्वस्व अर्पण करना, विभिषण का ब्रह्म राम की शरण ग्रहण करना और महात्मा अर्जुन का ब्रह्माण्डनायक प्रभु श्रीकृष्ण की शरण में जा शिष्यत्व ग्रहण करना एवं कहना - "मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए (शिष्यस्ते$हं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्)। श्रीकृष्ण सब लोकों के एकमात्र अधिपति हैं। ऋग्वेद में कहा गया है कि वह सब लोकों का एकमात्र स्वामी है (एको विश्वस्य भुवनस्य राजा)! इन्हीं सबके नाथ श्रीकृष्ण से प्रार्थना की जाती है - हे प्रभो! हम लोगों में सुख और कल्याणमय उत्तम संड्कल्प, ज्ञान और कर्म को धारण कराओ (भद्रं भद्रं क्रतुमस्मासु धेहि)। आरती में कहा जाता है - तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति। 

गीताशास्त्र का प्रारम्भ ही "धर्म" शब्द से होता है और समापन "मम" कहकर। धर्ममम (मेरा धर्म) और इसके बीच में ही इसका सारतत्व है। श्रीकृष्णवाणी गीता को वेदव्यास जी ने सात सौ श्लोकों में रच महाभारत की शोभा बढा दी। इस ज्ञान के अथाह सागर को प्राणी-मात्र के लिए सर्वसुलभ कर दिया। गीता जी के प्रथम श्लोक का प्रथम शब्द आदि है और अंतिम श्लोक का अंतिम शब्द अंत है जो प्रस्तावना से उपसंहार तक की धर्मयात्रा पूर्ण करता है और 'धर्ममम' विश्वकल्याण की सुदृढ नींव बनता है। श्रीमद्भगवद्गीता का जितनी बार अध्ययन-मनन किया जाए उतनी ही बार नित नये अर्थ निकलकर सामने प्रस्तुत होंगे। यह मानव-मात्र के लिए अमृत है, देवगण और सिद्ध पुरूष भी इस अमृतपान के लिए लालायित रहते हैं। इसके माध्यम से श्रीकृष्ण जगत-कल्याण के लिए ॐ तत्सत् का उपदेश देते हैं। वराहपुराण में प्रभु स्वयं कहते हैं -

गीताश्रयेSहं तिष्ठामि गीता मे चोत्तमं गृहम् !
गीताज्ञानमुपाश्रित्य त्रींल्लोकान् पालयाम्यगम् !!

अर्थात, मैं गीता के आश्रय में रहता हूँ, गीता मेरा श्रेष्ठ घर है। गीता के ज्ञान का सहारा लेकर ही मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ। 

धर्म आचरण से प्रकट होता है (आचार प्रभवो धर्मः)। सामान्यजनों के लिए शिष्टाचार ही धर्म होता है। धर्ममम का पालन करके ही निज का, समाज का और राष्ट्र का उत्थान किया जा सकता है। महाराज मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं -

धृतिः क्षमा दमो$स्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः !
धीर्विद्या सत्यमक्रोधः दशकं धर्मलक्षणम् !!

अर्थात, धैर्य, क्षमा, मन का संयम, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रियों का संयम, शुद्ध बुद्धि, उत्तम विद्या, सत्य और अक्रोध। जिस पुरुष में ये लक्षण होते हैं, जो पुरुष इसका पालन करता है, वही धर्म पर चलने वाला होता है। महाभारत में महाराज युधिष्ठिर कहते हैं कि -

तर्कोSप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नाः
नैको ऋषिर्यस्य वचः प्रमाणम् !
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां
महाजनो येन गतः स पन्था !!

अर्थात, तर्क धर्म को समझने और समझाने में असमर्थ है। किसी एक भी ऋषि का वाक्य प्रमाण अथवा अंतिम निर्णय नहीं है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि मानो धर्म का तत्व गुफा में छिपा हुआ है। अतएव महापुरुष जिस मार्ग पर चलें, उसे हम प्रशस्त पथरूप में स्वीकार कर सकते हैं। 

इसीलिए धर्म को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने के लिए श्रीहरि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और योगेश्वर श्रीकृष्ण रूप में एवं अन्य अवतारों के माध्यम से अपने जीवन-चरित्र और दिव्य वचनों को समस्त प्रजा के आगे रखते हैं जिससे जनसमुदाय शिक्षा ले धर्म के सही स्वरूप को समझे और वैसा ही आचरण करे। अर्जुन से भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - "श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है। क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बडी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।"

वैदिक शिक्षा में कहा जाता है - धर्म का पालन करो (धर्मं चर)। महाभारत वनपर्व में उल्लेख है -

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः !
तस्माद्धर्मं न त्यजामि मा न धर्मो हतोSवधीत !

अर्थात, धर्म ही आहत (परित्यक्त) होने पर मनुष्य को मारता है और वही रक्षित (पालित) होने पर रक्षा करता है। अतः मैं धर्म का त्याग नहीं करता, इस भय से कि कहीं मारा (त्याग किया) हुआ धर्म हमारा ही वध न कर डाले। 

धर्मेणैवर्षयस्तीर्णा धर्मे लोकाः प्रतिष्ठिता !
धर्मेण देवता वतृधुर्धुर्मे चार्थः समाहितः !!

अर्थात, धर्म के द्वारा ही ऋषिगण इस भवसागर से पार हो गये। सम्पूर्ण लोक धर्म के आधार पर ही टिके हुए हैं। धर्म से ही देवता बढे हैं और धन भी धर्म के ही आश्रित है। 

कूर्मपुराण में देवी भगवती हिमवान् को कहती हैं - "गिरिश्रेष्ठ! श्रुति तथा स्मृतिशास्त्रों में जो सम्यक् वर्णाश्रमकर्म (धर्म) बतलाया गया है, मुक्ति प्राप्ति के लिए अध्यात्मज्ञानयुक्त उस कर्म का निरन्तर आचरण करो। धर्म से भक्ति उत्पन्न होती है और भक्ति से परम (तत्त्व) प्राप्त होता है। श्रुति एवं स्मृति द्वारा प्रतिपादित यज्ञादि कर्म को धर्म कहा गया है। वेद के अर्थ को जानने वाले श्रेष्ठ विद्वानों के द्वारा जिस कर्म को वेदसम्मत कहा गया है वह कर्म करणीय है और जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक उस कर्म को करते हैं, वे मुझे प्रिय हैं।"

धर्म के महत्व को बताते हुए महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं - "पुराण तथा धर्मशास्त्र वेदों के विस्तार हैं। एक से ब्रह्म का विशेष ज्ञान होता है और दूसरे से धर्म का ज्ञान होता है। धर्म की जिज्ञासा करने वालो के लिए धर्मशास्त्र श्रेष्ठ प्रमाण कहा गया है और ब्रह्मज्ञान के लिए पुराण उत्कृष्ट प्रमाण है। वेद से अतिरिक्त अन्य किसी से धर्म का तथा वैदिक धर्मविद्या का ज्ञान नहीं होता इसलिए द्विजातियों को धर्मशास्त्र तथा पुराण पर श्रद्धा रखनी चाहिए।"

धर्म को चतुष्पाद कहा जाता है और इसे वृषभ की संज्ञा दी जाती है (वृषो ही भगवान् धर्मः), अतः इसके चार पाद (चरण) होते हैं। भविष्यपुराण के अनुसार - "धर्म के चार चरण हैं ज्ञान, ध्यान, शम और दम। आत्मज्ञान ज्ञान कहलाता है, अध्यात्मचिन्तन ध्यान कहलाता है, मन की स्थिरता शम है और इन्द्रियों का निग्रह दम है। चार लाख बत्तीस हजार वर्ष धर्म का एक पाद कहा जाता है। जब धर्म की वृद्धि होती है तब आयु की भी वृद्धि हो जाती है। जैसे-जैसे कलियुग की आयु में बढोतरी होगी, अधर्म पालन से आयु कम होती रहेगी। तब अधर्म ही लोगों का भाई-बन्धु होगा एवं अपने कार्यो की सिद्धि होने तक ही बन्धुता रहेगी, सौहार्द बना रहेगा। 

अधर्म मार्ग को पकडकर वैसा ही मनमाना आचरण कर दुर्योधन पक्ष अपनी आयु पूर्ण कर चुका था केवल देहों का त्यागना रह गया था क्योंकि पांडवों पर समय-समय पर अत्याचार करते हुए दुर्योधन ने सभी सीमाओं को, सभी मर्यादाओं को पार कर लिया था। जब पांडवों की सहनशीलता जवाब दे गयी तब वे युद्ध के लिए प्रस्तुत हुए और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा - "क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढकर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्त्तव्य नहीं है। हे पार्थ! अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं। ये सब शूरवीर पहले से ही मेरे द्वारा मारे हुए हैं, भय मत कर। निःसंदेह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा इसलिए युद्ध कर।"

प्रत्येक मानव अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है, प्रकृति अनुसार ही कर्त्तव्य का निर्धारण होता है। पाँचों पाण्डव महान पुरुषार्थी थे। अर्जुन की प्रकृति महान क्षत्रिय की थी और एक महायोद्धा के लिए न्यायोचित युद्ध में हिंसक होना पुण्यों में वृद्धि करता है। इससे प्रजा का कल्याण होता है, प्रकृति अपने शान्त स्वभाव में सुरक्षित रहती है, यही स्वधर्म पालन है, ममधर्म पालन है क्योंकि जिस कार्य की जिम्मेदारी जिस पर होती है, उस कार्य में यदि किंचित् दोष भी हो तो भी कल्याणकारक है, सुख-शान्ति को स्थापित करने में सहायक है। सिंह और गरूड को अहिंसा शोभा नहीं देती और गाय की आँखों में ही करूणा व्याप्त रहती है। स्वधर्म पालन में यदि मृत्यु भी वरण कर ले वह श्रेयस्कर है। इससे कीर्ति बढती है और मृत्यु पश्चात् भी सदा के लिए नाम अमर हो जाता है। समाज में और राष्ट्र में सुख-शान्ति, समृद्धि और सुरक्षा के व्यापक हित में आसुरी शक्तियों पर, तामसिक शक्तियों पर और निन्दनीय शक्तियों पर नियन्त्रण करना अति आवश्यक होता है। विदुर जी के मतानुसार शासक को दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना चाहिए और सज्जनों के साथ दयालुता का।

कुरुक्षेत्र को धर्मभूमि कहा गया है जहाँ ब्रह्मा जी और देवगणों ने तप किया था। चन्द्रवंशी राजा कुरु ने तपस्या की थी और इन्हीं के नाम पर इस क्षेत्र का नाम कुरुक्षेत्र पडा। यह भूमि पुण्यों में वृद्धि करती है, यह परम पवित्र तीर्थस्थल रहा है, यहाँ युद्धस्थल में वीरगति प्राप्त होने वाले वीरों को स्वर्ग की प्राप्ति हो इसी हेतु इस क्षेत्र को युद्ध के लिए चुना गया। चौरासी लाख योनियों में एकमात्र मानवयोनि ही कर्मयोनि और भोगयोनि दोनों हैं। यह शरीर कुरुक्षेत्र है, कुरु अर्थात् कर्म करने का पावन संदेश। इस कर्मरूपी क्षेत्र में जैसा बीज बोया जाता है वैसी ही फसल कटती है।

पूर्वजन्म के महाराज भरत, ब्राह्मण जडभरत जी सौवीरनरेश को कहते हैं - "कहीं भी आने-जाने का कर्म कर्मफल के उपभोग के लिए ही हुआ करता है। धर्माधर्मजनित सुख-दुःखों का उपभोग करने के लिए ही जीव देह आदि धारण करता है। भूपाल! सब जीवों की सम्पूर्ण अवस्थाओं के कारण केवल उनके धर्म और अधर्म ही हैं।" अपने मित्र एवं शत्रु हम स्वयं ही हैं और यह शरीर हमें भोगों की अति से दूर रह उत्तम कर्मो के लिए मिला है जिससे मृत्यु पश्चात् भी कीर्ति की सुगन्ध चहुँ ओर बिखरती रहे और अमरता प्राप्त हो। 

पुत्र मोह के कारण वृद्ध धृतराष्ट्र संजय से अपने अधर्मी पुत्रों को 'मेरे' कह और अपने भाई की संतानों युधिष्ठिर आदिक भाईयों को 'पाण्डु के पुत्र' कहकर सम्बोधित करते हैं। इससे धृतराष्ट्र की दुर्भावना स्पष्ट होती है जो अपने आतताई और अधर्म पर चलने वाले पुत्रों की विजय चाहते हैं। महाभारत युद्ध के पश्चात् भी वे इस भावना से, पक्षपात से ऊबर नहीं पाते। अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाते और भीमसेन को अपनी भुजाओं में दबाकर मार डालना चाहते हैं। महाराज युधिष्ठिर धर्मावतार हैं, साक्षात धर्मराज ही युधिष्ठिर के रूप में धरा-धाम पर अवतरित होते हैं। इन धर्मरूपी वृषभ के चारों पाद उनके भाई हैं और जगद्गुरु श्रीकृष्ण द्वारा नियन्त्रित हैं, उनकी कृपा के पात्र हैं, उनके परम भक्त है, उनकी शरण में हैं। पाँचों पाण्डव निज हेतु नहीं बल्कि न्याय के लिए युद्ध करते हैं। अधर्म को समाप्त करने के लिए युद्ध करते हैं और दुष्टों के दमन के लिए कालस्वरूप हो जाते हैं। 

महाराज धृतराष्ट्र मन ही मन भयभीत हैं क्योंकि वे यह भलीभाँति जानते हैं कि सत्य की ही जीत होती है ( सत्यमेव जयते)। महात्मा विदुर जी के समझाने पर भी धृतराष्ट्र उनसे कहते हैं - "सौम्य! तुम मुझसे जो कुछ कहते हो, वैसे ही मैं भी विचार रखता हूँ यद्यपि दुर्योधन से मिलने पर मेरी बुद्धि पलट जाती है। 

न दिष्टमश्यतिक्रान्तुं शक्यं भूतेन केनचित् !
दिष्टमेव ध्रुवं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् !!

अर्थात, प्रारब्ध का उल्लड्घन करने की शक्ति किसी भी प्राणी में नहीं है। मैं तो प्रारब्ध को ही अचल मानता हूँ, उसके सामने पुरुषार्थ तो व्यर्थ है।"

महाराज धृतराष्ट्र को धर्मात्मन् विदुर जी के कहे वचन स्मरण हो उठते हैं। राजा धृतराष्ट्र युद्ध के परिणाम को लेकर विचलित थे। उन्होंने विदुर जी को परामर्श देने को कहा। धर्मात्मा पुरुष और सत्यपथ के अनुगामी विदुर जी अपने दुष्कर्मो के कारण अधर्मरूपी दुर्योधन के पक्ष का विनाश सुनिश्चित समझ इसे टालने के लिए एवं पाण्डवों को न्याय दिलवाने हेतु महाराज धृतराष्ट्र को समझाते हैं - "आप दुर्योधन, शकुनि, कर्ण तथा दुःशासन जैसे अयोग्य व्यक्तियों पर राज्य का भार रखकर कैसे ऐश्वर्य-वृद्धि चाहते हैं? 'अब तो राज्य प्राप्त हो ही गया' - ऐसा समझकर अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिए। उद्दण्डता सम्पत्ति को उसी प्रकार नष्ट कर देती है जैसे सुन्दर रूप को बुढापा।" भरत श्रेष्ठ! आपके पुत्रों की वह (मलिन) बुद्धि पाण्डवों के प्रति विरोध से व्याप्त हो गयी है, आप इन्हें पहचान नहीं रहे हैं। आपका आज्ञाकारी युधिष्ठिर ही इस पृथ्वी का शासक होने योग्य है। धर्मधारियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर दया, सौम्यभाव तथा आपके प्रति गौरव बुद्धि के कारण बहुत कष्ट सह रहा है। मैंने आपसे कहा था कि आप द्युतक्रीडा में आसक्त दुर्योधन को रोकें किन्तु आपने मेरा कहना नहीं माना। समस्त पाण्डव सत्य पर डटे हुए हैं।

हे राजन! जो मनुष्य अपने साथ जैसा बर्ताव करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए यही नीति धर्म है। कपट का आचरण करने वाले के साथ कपटपूर्ण बर्ताव करे और अच्छा बर्ताव करने वाले के साथ साधुभाव से ही बर्ताव करना चाहिए। आप सिंहों (पाण्डवों) को छोडकर सियारों (दुष्ट पुत्रों) की रक्षा कर रहे हैं। समय आने पर आपको इसके लिए पश्चाताप् करना पडेगा। अतः आप पाण्डवों से संधि कर लें। अपने पुत्रों सहित आप लता के समान हैं और पाण्डव महान शालवृक्ष के सदृश हैं। महान वृक्ष का आश्रय लिए बिना लता कभी बढ नहीं सकती। शुभ चाहने वालों को अपने जाति-भाईयों के साथ मिलकर सुख का उपभोग करना चाहिए। राजन्! लकडी डालकर आग को जीतने की आशा न रखें। जिनके पास हजार (रुपये) हैं वे भी जीवित हैं तथा जिनके पास सौ (रुपये) हैं वे भी जीवित हैं। अतः महाराज धृतराष्ट्र! आप अधिक का लोभ छोड दीजिए, इससे भी किसी तरह जीवन रहेगा ही। अतः आप युधिष्ठिर को पुनः राजधर्म में नियुक्त कीजिए। हे राजन्! मैं फिर कहता हूँ यदि आपका अपने पुत्रों और पाण्डवों में समान भाव है तो उन सभी पुत्रों के साथ एक-सा बर्ताव कीजिए।"

असंगति का प्रभाव, कुसंस्कारों का प्रभाव व्यापक होता है। यह अपनी पकड में शीघ्र ले लेता है किन्तु परिणाम में विष होता है, पतन को प्राप्त होता है। इसके उलट संगति का प्रभाव सुसंस्कारों का प्रभाव धीरे-धीरे जड जमाता है और परिणाम में अमृत समान हो यश दिलाता है। दुर्योधन पक्ष पर कुसंस्कार व कुसंगति हावी हो चुकी थी, कुटिलता में ही उन्हें लाभ दिखता था और सह्रदयता से वे कोसों दूर हो चुके थे। रामचरितमानस उत्तरकाण्ड में श्रीरामचन्द्र जी कहते हैं - "सरल स्वभाव न मन कुटिलाई, यथा लाभ सन्तोष सदाई।" धृतराष्ट्र भीष्म, द्रौणाचार्य, कर्ण आदिक वीरों के बाहुबल पर अपने पुत्रों की विजय की कामना ह्रदय में रखते थे। संजय उन्हें स्पष्ट कर देता है कि जहाँ अर्जुन (नर) और श्रीकृष्ण (नारायण) नहीं हैं, वहाँ पराजय निश्चित है क्योंकि ये दोनों ही श्रीहरि के स्वरूप हैं। श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं - पाण्डवानां धनञ्जयः अर्थात् पाण्डवों में मैं अर्जुन हूँ। 

पितामह भीष्म भलीभाँति जानते हैं कि श्रीकृष्ण सर्वाधार हैं, परमपिता परमेश्वर हैं, ये अर्जुन को कहते हैं - "यतः कृष्णस्ततो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः" अर्थात् जहाँ कृष्ण हैं वहाँ धर्म है, जहाँ धर्म है वहाँ जय है।" यही बात धृतराष्ट्र से महात्मा संजय कहते हैं - जहाँ श्रीकृष्ण (नारायण) और अर्जुन (नरश्रेष्ठ), हैं वहीं शोभा, यश, जय, सफलता, समृद्धि, ऐश्वर्य, न्याय और धर्म है एवं यह सर्वविदित है कि सत्य की ही जीत होती है। भगवान श्रीकृष्ण जिनमें श्री, विजय, विभूति और अचल नीति समाहित है, वे असंख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति क्षणभर में समस्त जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार कर सकते हैं। वे श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध में पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर के सहायक हैं। पवित्रात्मा, धर्मनीति का पालन करने वाले और सत्यवादी युधिष्धिर की विजय सुनिश्चित थी। पाण्डवों ने अपने आपको भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित कर दिया था, उन्हीं की शरण ग्रहण कर ली थी क्योंकि वे भलीभाँति जानते थे कि श्रीकृष्ण सृष्टि के संचालक है, हमारे नियन्ता हैं। नरश्रेष्ठ महात्मा अर्जुन सदैव श्रीकृष्ण का स्मरण करते थे और सोते समय भी इनकी देह से श्रीकृष्ण नाम की ध्वनि निकला करती थी जो वातावरण को परम-पवित्र बना देती थी। इसी शरणागति और विश्वास को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कवितावली में रामस्वरूप को आराध्य मान अभिव्यक्त किया है -

कानन भूधर वारि बयारि महाविष व्याधि दवा अरि घेरे !
संकट कोटि जहाँ तुलसी सूत मात पिता हितु बंधु न नेरे !!
राखिहै राम कृपालु तहाँ हनुमान से सेवक हैं जेहि केरे !
नाक रसातल भूतल में रघुनायक एक सहायक मेरे !!

अर्थात् वन, पर्वत, जल, आँधी, महाविष, रोग, अग्नि, शत्रु से घिरने पर तथा जहाँ कोटि संकट हों और पुत्र, माता-पिता, हितैषी, बंधु भी निकट न हों, वहाँ कृपालु राम रक्षा करेंगे जिनके हनुमान् जैसे समर्थ सेवक हैं। स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी पर श्रीराम मेरे एक सहायक हैं।

दिव्यवंशी पाण्डवों में स्वविवेक है, विचारशीलता है, सत्य विद्यमान है और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम है। स्वविवेक से ही धर्ममम का विस्तार होता है, इसकी गूढता सरलता में परिवर्तित होती है, इसके मर्म का ज्ञान होता है। बृहस्पति स्मृति में कहा गया है -

केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः !
युक्तिहीनविचारे तु धर्महानिः प्रजायते !!

अर्थात् "केवल शास्त्र का आश्रय लेकर कर्तव्य-निर्णय नहीं करना चाहिए क्योंकि युक्तिहीन विचार करने पर धर्म की हानि हो जाती है।"

जिसके पास नेत्र ही न हों वह दर्पण से क्या लाभ ले पायेगा? जिसके पास ज्ञानचक्षु ही न हों वह स्वविवेक का और दूरदर्शिता का क्या विचार कर पायेगा? दुर्योधन और अर्जुन दोनों ने प्रभु श्रीकृष्ण को महाभारत युद्ध का निमन्त्रण देने के लिए द्वारिका प्रस्थान किया। इन दोनों का आना जान श्रीहरि ने युक्ति से काम लिया और निद्रा में लीन हो गये। राजा दुर्योधन द्वारिका पहुँचे और भगवान श्रीकृष्ण को सोते देख अभिमानवश उनके सिरहाने बैठ गये। उसी समय पहुँचे अर्जुन प्रभु के चरणकमलों की ओर खडे हो उन्हीं का स्मरण करने लगे। भगवान मधुसूदन ने जगकर सर्वप्रथम अर्जुन को देखा और उन दोनों का अभिवादन स्वीकार कर स्वागत किया। दोनों के द्वारा युद्ध का निमन्त्रण दिये जाने पर उन दोनों को कहा - मेरी सहायता दो प्रकार से प्राप्त होगी। एक ओर मैं युद्ध नहीं करूँगा, शस्त्र का प्रयोग नहीं करूँगा और दूसरी ओर मेरी अत्यन्त बलशालिनी नारायणी सेना रहेगी। अर्जुन! सर्वप्रथम मैंने तुम्हे देखा है, इसलिए धर्मानुसार पहले तुम माँग लो। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को माँग लिया अर्थात् सर्वस्व ले लिया और दुर्योधन ने नारायणी सेना माँगी एवं प्रसन्नचित्त होता हुआ, मन ही मन अपनी बुद्धि की प्रशंसा करता हुआ हस्तिनापुर लौट गया। 

दुर्योधन ने अपने सर पर काल को तभी सवार कर लिया, अपनी हार तभी निश्चित कर ली, अपनी मृत्यु का वरण तभी कर लिया जब भगवान श्रीकृष्ण युद्ध के मुहाने पर दूत बन संधि का प्रस्ताव लेकर कौरव पक्ष के पास गये और सुलह की बात करते हुए केवल पाँच गांवों की माँग की और दुर्योधन ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। श्रीकृष्ण के समझाने पर भी दुष्ट बुद्धि वाला दुर्योधन न माना और स्पष्ट कहा - "मेरे जीते जी पाण्डव राज्य नहीं पा सकते, यहाँ तक कि सुईं की नोक भर भी जमीन मैं पाण्डु पुत्रों को नहीं दूँगा।"इसके पश्चात् धर्मयुद्ध करना पाण्डवों के लिए अनिवार्य बन गया। 

ब्रह्माजी के पुत्र श्रीसनक जी नारद जी को कहते हैं - "हे देवर्षि नारद! शरीर को क्षेत्र कहते हैं जो क्षेत्र में स्थित आत्मा है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। परमात्मा अव्यक्त, शुद्ध एवं सर्वत्र परिपूर्ण कहा गया है। परमात्मा सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म और महान् से भी अत्यन्त महान है। वह सनातन परमेश्वर समस्त विश्व का कारण है। योगी लोग अपने ह्रदय में जिस अजन्मा, शुद्ध, विकार रहित, सनातन परमात्मा का दर्शन करते हैं, उन्हीं का नाम परब्रह्म है। मैं सत्य कहता हूँ, हित की बात कहता हूँ और बार-बार सम्पूर्ण शास्त्रों का सार बताता हूँ - इस असार संसार में श्रीहरि की आराधना ही सत्य है। अतः देवर्षे! तुम सदैव श्रीहरि का भजन करो। बचपन और बुढापे में भगवान की आराधना नहीं हो सकती अतः अहंकार छोडकर युवावस्था में ही धर्मो का अनुष्ठान करना चाहिए। सदा भगवान विष्णु का भजन करो, क्योंकि मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। 

अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् !
नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् !!

अर्थात, अच्युत, अनन्त और गोविन्द - इन नामों के उच्चारण रूप औषध से सब रोग नष्ट हो जाते हैं। यह मैं सत्य कहता हूँ, सत्य कहता हूँ। भगवान गोविन्द का आश्रय लो, इस कार्य में विलम्ब न करो, क्योंकि यमराज का नगर निकट ही है। जो मनुष्य दिन-रात विष्णु के नाम का कीर्तन अथवा उसकी पूजा करते हैं उन्हें कलियुग बाधा नहीं देता है। जो शिवशंकर! रुद्र! नीलकण्ठ! त्रिलोचन! इत्यादि महादेव जी के नामों का उच्चारण करते हैं, उन्हें भी कलियुग बाधा नहीं देता। अतः मैं सम्पूर्ण लोकों के हित की बात कहता हूँ कि भगवन्नामपरायण मनुष्यों को कलियुग कभी बाधा नहीं दे सकता। 

हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम् !
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा !!

अर्थात, भगवान विष्णु का नाम ही मेरा जीवन है। कलियुग में दूसरी कोई गति नहीं है... नहीं है... नहीं है..."

श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि - "मनुष्य जन्म का यही इतना ही लाभ है चाहे जैसे हो ज्ञान से, भक्ति से अथवा अपने धर्म की निष्ठा से जीवन को ऐसा बना लिया जाए कि जिससे मृत्यु के समय भगवान की स्मृति अवश्य ही बनी रहे। और धर्मनिष्ठ पाण्डवों ने इसी राह पर चल, सत्यपथ को पकड, भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित हो, इन्हीं का आश्रय ले, दुःख-सुख को समान समझ इहलोक को भोग, अपना परलोक संवार अपने को श्रीकृष्ण कृपा द्वारा भवसागर से पार कर लिया। भगवान श्रीकृष्ण चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति करते हैं, चारों आश्रमों को स्थापित करते हैं और ये ही इन सबमें प्रविष्ट होकर अपनी जीवनचर्या से जन-जन को शिक्षा देते हैं। आदि शंकराचार्य के स्वरूप में शिव ही अनेक समुदायों को क्षत्रियों में परिवर्तित कर देते हैं। श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण उद्धव जी को कहते हैं -

तेजः श्रीः कीर्तिरैश्वर्यं ह्रीस्त्यागः सौभगं भगः !
वीर्यं तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र स मेंSशकः !!

अर्थात, हे उद्धव! ऐसा समझो कि जिसमें भी तेज, श्री, कीर्ति, ऐश्वर्य, लज्जा, त्याग, सौन्दर्य, सौभाग्य, पराक्रम, तितिक्षा और विज्ञान आदि श्रेष्ठ गुण हों, वह मेरा ही अँश है। 

ये महर्षि नर (अर्जुन) और महर्षि नारायण (श्रीहरि) स्वरूपों में बदरिकाश्रम में तपस्या करते हुए परमश्रेष्ठ संन्यासियों को अपने आचरण से शिक्षित करते हैं। कपिल स्वरूप में सांख्ययोग की शिक्षा देते हैं, और परशुराम - राम, कृष्ण स्वरूपों में अवतरित हो साधु-संतो की रक्षा का भार उठाते हैं। रामानंद जी के रूप मे भक्तिमार्ग की शिक्षा देते हैं एवं समर्थ गुरू रामदास जी के स्वरूप में शिवाजी को छत्रपति बनाते हैं। 

राजा परीक्षित को शुकदेव जी प्रभु श्रीकृष्ण के विषय में बताते हैं - "प्रातःकाल भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्ममुहूर्त में उठते थे, आत्मध्यान करते थे, अपने ही सच्चिदानन्दमय स्वरूप के ध्यान में मग्न हो जाते थे। शुद्ध जल में स्नान कर विधिपूर्वक सन्ध्योपासनादि नित्यक्रिया और अग्नि में हवन कर मौन होकर गायत्री-मंत्र का जाप करते थे। इसके बाद कुल के बडे-बूढो और ब्राह्मणों की विधिपूर्वक पूजा करते थे। तदन्तर परम मनस्वी भगवान श्रीकृष्ण दुधारू एवं बछडों वाली हजारों गौओं का दान करते थे। इसके पश्चात् अन्यान्य प्रजा की कामनापूर्ति करके उन्हें संतुष्ट करते थे और इस प्रकार सबको प्रसन्न देखकर स्वयं भी आनन्दित होते थे।" प्रभु श्रीकृष्ण की शरणागति से व्यक्ति सम्पूर्ण विघ्नों से पार पा लेता है, श्रीकृष्णकृपा सभी साधनों का सार है। ईश्वर की शरणागति शीघ्र ही धर्मात्मा एवं उनके युगल चरणों का अनुगामी बना देती है और शान्ति प्राप्त होती है। अतएव श्रेष्ठ पाण्डवों की तरह भगवान का आश्रय लेकर ही कर्म करने चाहिए। प्रत्येक स्थिति में धैर्य धारण करें, धर्मशास्त्रों में निष्ठा रखें और आदर्श मानें, ईश्वर द्वारा बताये गये उपदेशों को ग्रहण करें। श्रीकृष्ण ही धर्म हैं, श्रीकृष्ण ही धर्म के मूल हैं, श्रीकृष्ण ही धर्म के रक्षक हैं और श्रीकृष्ण ही धर्माचरण करने वाले हैं। परमादर्श परमपिता परमेश्वर श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में उद्घोष करते हैं -

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु !
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोSसि मे !!

जय श्रीकृष्ण!
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ये लेख हमें श्री प्रदीप अरोरा जी से प्राप्त हुआ है जो हकीकत नगर, सरहनपुर, उत्तरप्रदेश के निवासी हैं। इन्होने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय (वाराणसी) से साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त इन्हे अंकज्योतिष का भी अच्छा ज्ञान है। इनके लेख कई पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। सराहनपुर से प्रकाशित "महाविद्या पञ्चाङ्ग" में नियमित इनके धार्मिक लेख प्रकाशित होते रहते हैं। हकीकत नगर में ही इनकी अपनी इलेक्ट्रिकल उपकरणों की दुकान है। धर्मसंसार में सहयोग देने के लिए हम इनके अत्यंत आभारी हैं।

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