कैसी थी द्वारिका नगरी और क्यों डूब गयी समुद्र में? - द्वारिका नगरी का पूरा इतिहास

चार धाम और सप्त पुरियों में से एक द्वारिका। जिस प्रकार अयोध्या को श्रीराम ने अपने चरणों से पावन किया ठीक उसी प्रकार द्वारिका श्रीकृष्ण की नगरी होने के कारण धन्य हुई। हालाँकि अयोध्या से उलट द्वारिका नगरी बहुत ही रहस्य्मयी मानी जाती है। कहा जाता है कि हर कल्प में जब भी कृष्णावतार होता है, समुद्र द्वारिका नगरी की भूमि प्रदान करने के लिए पीछे हटता है और उनके निर्वाण के साथ ही समुद्र वो भूमि वापस ले लेता है। यही कारण है कि आज भी द्वारिका जलमग्न है। आज इस लेख में हम श्रीकृष्ण की नगरी द्वारिका के विषय में जानेंगे।

ये तो हम सभी जानते ही है कि द्वारिका नगरी का निर्माण करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। संक्षेप में जरासंध ने अपने जमाता कंस के वध का प्रतिशोध लेने के लिए मथुरा पर १७ बार आक्रमण किया और पराजित हुआ। फिर अंत में उसने अपनी सेना एकत्र कर १८वीं बार आक्रमण किया और ठीक उसी समय कालयवन भी अपनी विशाल सेना लेकर मथुरा पर चढ़ आया। इस दोतरफे आक्रमण से अपनी प्रजा को बचाने के लिए ही श्रीकृष्ण ने सब ओर से सुरक्षित द्वारिका पुरी बसाने और मथुरा छोड़ने का निश्चय किया।

द्वारिका नगरी का बहुत अधिक वर्णन महाभारत में नहीं मिलता। महाभारत में कई स्थानों पर द्वारिका का वर्णन आता है और मौसल पर्व में उसके समुद्र में डूब जाने के विषय में भी उसमें लिखा गया है किन्तु वो वर्णन बहुत सतही है और द्वारिका के विषय में महाभारत में विस्तार से कुछ नहीं लिखा गया है। कारण ये भी है कि महाभारत में महर्षि वेदव्यास ने श्रीकृष्ण लीलाओं का बहुत अधिक वर्णन नहीं किया है।

श्रीकृष्ण लीला का विस्तृत वर्णन हमें श्रीमद्भागवत पुराण में मिलता है, हालाँकि वहां पर भी द्वारिका नगरी की स्थापना के विषय में बहुत अधिक जानकारी नहीं दी गयी है। जितना वर्णन द्वारिका का भागवत पुराण में है लगभग उतना ही थोड़ा सा वर्णन विष्णु पुराण में दिया गया है। द्वारिका नगरी का मुख्य वर्णन हमें महाभारत के खिलभाग श्री हरिवंश उपपुराण में मिलता है।

हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ५८वें अध्याय में द्वारिका नगरी की स्थापना के विषय में बताया गया है। इसमें श्रीकृष्ण सभी यादवों की एक सभा बुलाते हैं और उनसे कहते हैं कि उन्होंने देवसदन के समान इस भूमि को प्राप्त किया है। उन्होंने इसका नाम "द्वारवती" रखा। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं इसे इस प्रकार बनवाऊंगा जैसे देवराज इंद्र की अमरावती है। जैसे चिन्ह, मंदिर, चौराहे, सड़कें और उत्तम अंतःपुर अमरावती में है, ठीक उसी प्रकार की नगरी बनाने की बात श्रीकृष्ण कहते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं - "जैसे देवता अमरावती में आनंद भोगते हैं, उसी प्रकार उग्रसेन आदि आप लोग भी निश्चिंत हो अपने शत्रुओं को पीड़ा देते हुए इस पुरी में आनंद पूर्वक निवास करें। घरों के शिलान्यास की सामग्रियां लायी जाये, चौराहों की कल्पना की जाये, सड़कों के लिए और राजमहल की ओर जाने का जो मार्ग है, उसके लिए भूमि का नाप लिया जाये। गृहनिर्माण में जो भी श्रेष्ठ शिल्पी हो उन्हें मजदूरों के साथ काम करने के लिए लगा दिया जाये।"

श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार सभी यादव पुरी निमार्ण के लिए आवश्यक सामग्री का संग्रह करने में लग गए। फिर उन्होंने एक पवित्र दिन सूत्र (धागे) से भूमि को नापना आरम्भ किया। फिर वास्तुपूजा के बाद श्रीकृष्ण ने वहां उपस्थित शिल्पियों से कहा कि "शिल्पियों, तुम लोग हम यादवों के लिए एक सुन्दर मंदिर का निर्माण करो जिसमें इष्टदेवता की उत्तम विधि से स्थापना की जाये। यहाँ का मार्ग और चौराहा पृथक रहना चाहिए।"

श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार दुर्ग निर्माण, नींव खोदना, भूमि शोधन, और काँटों को साफ करके उचित रीति से विभिन्न दुर्गों और मंदिरों का निर्माण किया और उसमें भगवान ब्रह्मा और अन्य देवताओं के लिए स्थान बनाया। उन्होंने इस मंदिर में चार द्वार बनाये जो वरुण, अग्नि, इंद्र एवं सिल-ओखली, इन चार देवताओं को समर्पित थे। उन्होंने मंदिर में शुद्धाक्ष, ऐन्द्र, भल्लाट एवं पुष्पदंत की भी मूर्तियां बनाई।

जब उन सभी कारीगरों के साथ यादव उस पुरी के निर्माण में लगे थे तो श्रीकृष्ण ने विलम्ब होता देख कर सोचा कि किस प्रकार इस कार्य को शीघ्रता से पूर्ण किया जाये। तब उनके मन में विचार आया कि प्रजापति पुत्र विश्वकर्मा इस कार्य को शीघ्रता से पूर्ण कर सकते हैं। ये सोच उन्होंने विश्वकर्मा का आह्वान किया और विश्वकर्मा उनके समक्ष प्रकट हुए।

विश्वकर्मा ने श्रीकृष्ण से कहा - "हे श्रीकृष्ण! मुझे इंद्रदेव ने आपके पास भेजा है। जिस प्रकार देवाधिदेव ब्रह्मा और अविनाशी शंकर मेरे लिए सम्माननीय हैं वैसे ही आप भी हैं। मेरे विचार में आप तीनों में कोई अंतर नहीं है। आप तीनों लोकों को आज्ञा देने में समर्थ हैं इसीलिए मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं आपका क्या प्रिय करूँ?"

तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा - "हे सुरश्रेष्ठ! आप मेरे लिए एक सुन्दर सदन का निर्माण कीजिये। आपको मेरे लिए इस नगरी को बसाना है ताकि यह पुरी सभी ओर से मेरे प्रभाव के अनुरूप गृहों द्वारा सुशोभित हो। जैसे स्वर्ग में अमरावती और मेरा वैकुण्ठ लोक है ये नगरी भी उसी प्रकार शोभित हो।"

तब विश्वकर्मा ने कहा कि "प्रभु! आपने जो कुछ भी कहा है वो मैं करूँगा किन्तु इतनी भूमि इतने विशाल जनसमुदाय के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि समुद्र कुछ भूमि छोड़ सके तो ये नगरी सभी प्रकार से ऐश्वर्यशाली बनेगी। साथ ही इसकी सुरक्षा के लिए समुद्र देव भी इसके चारो ओर विचरण करेंगे।"

विश्वकर्मा की बात सुनकर श्रीकृष्ण ने समुद्र से प्रार्थना की - "हे जलपति! यदि मेरे प्रति आपके मन में आदर का भाव है तो १२ योजन तक अपने जल को समेट लीजिये। आपके द्वारा प्रदान की गयी भूमि पर इस पुरी का पर्याप्त विस्तार हो जाएगा।" उनकी प्रार्थना सुन कर समुद्र ने अपने बीचों बीच १२ योजन तक अपने जल को समेट लिया जिससे एक विशाल भूमि उजागर हो गयी।

तब उस विशाल भूमि को देख कर विश्वकर्मा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने श्रीकृष्ण के लिए एक विशाल अंतःपुर का निर्माण किया जिसमें अलग-अलग घर बने हुए थे। उन्होंने महान द्वारिकापुरी का निर्माण किया। इस पुरी के श्रेष्ठ परकोटे थे, उसके चारो ओर सुरक्षा के लिए खाई खोदी गयी और खाई के उस पर स्वयं समुद्र उस पुरी की रक्षा करते थे। उचित स्थान पर अट्टालिकाएं, चारदीवारी और तोरण बने हुए थे। उस नगर में सुन्दर स्त्रियां और तेजस्वी पुरुष थे, व्यापारी वर्ग उसकी शोभा बढ़ाते थे और बाजार अनेकानेक सामानों से भरा पड़ा था।

उस पुरी के तालाब और बावड़ियां जल से भरे पड़े थे, अनगिनत सुन्दर उद्यान थे, उसके चौराहे बहुत चौड़े और भवन आकाश को छू रहे थे। उस पुरी में सहस्त्रों गलियां थी। ऐसा लगता था कि आकाश में विचरने वाली नगरी पृथ्व पर उतर आयी हो। सम्पूर्ण रत्नों से भरी हुई वो नगरी पृथ्वी पर एक ही थी। यहाँ तक कि देवता भी उस नगरी को देख कर ईर्ष्या करने लगे। ऐसी अद्वितीय नगरी में श्रीकृष्ण यादवों सहित निवास करने लगे।

श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा का बड़ा सम्मान किया और फिर वे वापस आने लोक चले गए। फिर श्रीकृष्ण ने सोचा कि यदि यहाँ प्रचुर मात्रा में धन हो तो बड़ा अच्छा हो। ये सोचकर उन्होंने कुबेर से संरक्षित निधियों में श्रेष्ठ शंख का आह्वान किया। तब शंख स्वयं द्वारिका में आये और श्रीकृष्ण से पूछा कि उन्होंने क्यों उसका स्मरण किया। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि इस नगरी के हर व्यक्ति को धन से परिपूर्ण कर दो। मैं इस नगर में एक भी निर्धन व्यक्ति नहीं देखना चाहता। उनकी आज्ञा सुनकर शंख ने सभी निधियों को द्वारिका में धन की वर्षा करने को कहा। सभी निधियों ने द्वारिका में इतनी धनवर्षा कि कोई निर्धन ना रहा।

इसके बाद श्रीकृष्ण ने वायुदेव का आह्वान किया और उनके प्रकट होने पर उनसे कहा कि वे स्वर्ग जाकर देवराज इंद्र की आज्ञा से उनकी सुधर्मा नामक सभा को यहाँ ले आओ। मैं चाहता हूँ कि वही हमारी राजसभा हो और सहस्त्रों वीर यादव उसी सभा में बैठें। उनकी इच्छा जान कर वायुदेव स्वर्गलोक गए और देवराज इंद्र की आज्ञा से सुधर्मा सभा को लाकर द्वारिका के मध्य में स्थित कर दिया।

इस प्रकार अपनी नगरी को एक स्त्री की भांति समस्त रत्नों से सुसज्जित कर श्रीकृष्ण ने सभी नागरिकों के लिए मर्यादाएं बांध दी। महाराज उग्रसेन को द्वारिका का राजा बनाया गया। काशी के विद्वान सांदीपनि मुनि को पुरोहित के पद पर आसीन किया गया। अतिरथी अनाधृष्टि को प्रधान सेनापति बनाया गया और बुद्धिमान विक्रदु को प्रधानमंत्री बनाया गया। 

फिर श्रीकृष्ण ने यादव वंश के १० वृद्धों (श्रेष्ठ व्यक्तियों) को उस साम्राज्य का सलाहकार बनाया। ये दस वृद्ध थे - उद्धव, वसुदेव, कङ्क, विपृथु, श्वफल्क़, चित्रक, गद, सत्यक, बलभद्र एवं पृथु। दारुक श्रीकृष्ण के सारथि बने तथा सात्यकि सभी योद्धाओं के प्रधान बनाये गए। इस प्रकार श्रीकृष्ण सम्पूर्ण राज्य की स्थापना कर उस अद्भुत द्वारिका में समस्त यादवों सहित रहने लगे।

विष्णु पुराण के २३वें अध्याय में भी पराशर जी द्वारा केवल इतना बताया गया है कि कालयवन और जरासंध के दोहरे आक्रमण से बचने के लिए श्रीकृष्ण ने एक ऐसी नगरी का निर्माण करने का निश्चय किया जो चारो ओर से सुरक्षित हो और वहां यादवों को परास्त नहीं किया जा सके। इसके लिए उन्होंने समुद्र से १२ योजन भूमि मांगी और उसपर द्वारिका नगरी का निर्माण किया। विष्णु पुराण में द्वारिका नगरी के निर्माण के लिए विश्वकर्मा जी का कोई वर्णन नहीं है।

भागवत पुराण के १०वें स्कन्द में भी द्वारिका नगरी का थोड़ा वर्णन है। भागवत के अनुसार भी कालयवन और जरासंध के आक्रमण से बचने के लिए श्रीकृष्ण ने समुद्र के बीच में एक दुर्गम दुर्ग बनवाया जिसकी लम्बाई और चौड़ाई ४८-४८ कोस की थी। उसका निर्माण विश्वकर्मा ने किया था। बड़ी सड़के और चौराहे थे, सुन्दर उद्यान और उपवन थे, आकाश को छूते सोने के भवन थे और स्फटिकमणि से जड़े दरवाजे थे। अन्न के भण्डारण के लिए चांदी और पीतल के बड़े बड़े कोठरे बने हुए थे। उस नगरी में चारो वर्णों के लोग रहते थे और मध्य में महाराज उग्रसेन, वसुदेव, बलराम और श्रीकृष्ण के विशाल भवन थे।

उस नगर के लिए देवराज इंद्र ने पारिजात वृक्ष और सुधर्मा सभा को भेज दिया। सुधर्मा सभा ऐसी थी जिसके अंदर भूख प्यास और मृत्यु का प्रवेश नहीं हो सकता था। वरुणदेव ने अनेकों श्यामकर्ण अश्व भेजे जिनकी गति मन के समान थी। धनपति कुबेर ने अपनी आठों निधियां भेज दी और अन्य लोकपालों ने भी अपनी-अपनी विभूतियाँ द्वारिका भेजी। फिर श्रीकृष्ण की आज्ञा से योगमाया ने सभी यादवों को मथुरा से द्वारिका भेज दिया।

जैन ग्रन्थ अंतकृत दशांग में भी द्वारिका नगरी का वर्णन आता है। इस ग्रन्थ में इस नगरी का विस्तार १२ योजन लम्बा और नौ योजन चौड़ा बताया गया है। इस ग्रन्थ के अनुसार इसका निर्माण कुबेर ने किया था। ये पुरी स्वर्ण के कोट से घिरी तथा इंद्र, नील, वैदूर्य, पद्मराग आदि मणियों से जड़ित थी। उसकी दीवार स्फटिक से जड़ी थी जिसपर राजहंस, चक्रवाक, सारस, हाथी, घोड़े, मयूर, मृग, मगर अदि पशु-पक्षियों के चित्र उकेरे गए थे।

अंतकृत दशांग के अनुसार द्वारिका नगरी के ईशान कोण में रैवैतक नामक एक पर्वत था। उस पर्वत पर नंदनवन नामक एक उद्यान था और उस उद्यान में सुरप्रिय नाम का एक यक्षायतन था। उस उद्यान के चारो और वन था जहाँ अशोक नाम का एक श्रेष्ठ वृक्ष था। उस द्वारिका नगरी में दस पूज्य पुरुष (वृद्ध पुरुष) निवास करते थे। श्रीकृष्ण और बलदेव के अतिरिक्त पांच प्रमुख महावीर, प्रद्युम्न के अंतर्गत साढ़े तीन करोड़ कुमार, साम्ब के अंतर्गत ६०००० दुर्दांत वीर, महासेन के अंतर्गत ५६००० बलशाली सैनिक, वीरसेन के अंतर्गत २१००० वीर योद्धा, उग्रसेन के अंतर्गत १६००० प्रमुख राजा और रुक्मिणी के अंतर्गत १६००० रानियां निवास करती थी।

दुर्भाग्य से ऐसी महान ऐश्वर्यशाली द्वारिका और समस्त यदुकुल का अंत बहुत ही दुखद और दारुण था। यदुकुल के विनाश के पीछे दो श्राप थे। गांधारी का श्रीकृष्ण को दिया श्राप और महर्षि दुर्वासा का साम्ब को दिया श्राप। इस विषय में एक विस्तृत वीडियो पहले ही प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं।

यदुकुल और द्वारिका के नाश का वर्णन हमें महाभारत के मौसल पर्व में मिलता है। इसके अनुसार जब श्राप से ग्रसित सारे यादव आपस में लग कर मर गए और बांकियों का वध श्रीकृष्ण और बलराम ने कर दिया, तब श्रीकृष्ण ने अपने सारथि दारुक से कहा कि वो अविलम्ब हस्तिनापुर चला जाये और अर्जुन को यहाँ लेकर आये ताकि वो सभी स्त्रियों और बचे हुए वृद्धों को सुरक्षित ले कर जा सके।

दारुक के चले जाने के बाद उन्होंने बभ्रु से कहा कि वे द्वारिका चले जाएँ और स्त्रियों की रक्षा करें। जैसे ही बभ्रु द्वारिका की ओर बढे श्राप के प्रभाव से एक विशाल मूसल उनके ऊपर गिरा और उनकी मृत्यु हो गयी। तब श्रीकृष्ण ने बलराम से कहा - "भैया! आप यहीं मेरी प्रतीक्षा कीजिये तबतक मैं स्त्रियों को कुटुम्बियों के संरक्षण में छोड़ आता हूँ।"

ये कह कर वे स्वयं द्वारिका पहुंचे और अपने पिता वसुदेव से कहा कि "आप लोग सभी स्त्रियों की रक्षा कीजिये। थोड़े ही समय में अर्जुन यहाँ आ जाएंगे और सभी को सुरक्षित स्थान पर ले जाएंगे। मुझे भैया बलराम के पास जाना है क्यूंकि हम दोनों के प्राण त्यागने का अवसर आ गया है।" इस प्रकार अपनी रोती हुई पत्नियों को छोड़ कर श्रीकृष्ण बलराम जी के पास पहुँचे जो ध्यान में थे।

श्रीकृष्ण के पहुँचते ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए और उनके मुख से श्वेत वर्ण का सहस्त्र फनों वाला एक नाग निकलकर समुद्र में समा गया। बलराम जी की मृत्यु से दुखी श्रीकृष्ण उसी जगह लेट गए जहाँ उनके चरण को मृग की कस्तूरी समझ कर जरा नामक एक शिकारी ने बाण चला दिया। उसी को निमित्त मन कर श्रीकृष्ण ने भी अपने प्राण त्याग दिए।

उधर जब अर्जुन को दारुक का सन्देश मिला तो वे तत्काल उसके साथ द्वारिका पहुंचे। श्रीकृष्ण की मृत्यु का समाचार सुनकर उन्हें अथाह दुःख हुआ और वे मूर्छित हो गए। तब रुक्मिणी और सत्यभामा ने उन्हें संभाला और फिर अर्जुन ने सभी स्त्रियों को सांत्वना दी। फिर अर्जुन और यादवों ने सभी मृतकों का अंतिम संस्कार किया। श्रीकृष्ण और बलराम के शरीर को ढूंढ कर उनका भी अंतिम संस्कार किया गया।

इसके बाद उन्होंने सभी यादवों से वहां से इंद्रप्रस्थ चलने को कहा। श्रीकृष्ण के एक मन्त्र जीवित पौत्र वज्र को उन्होंने इंद्रप्रस्थ का सम्राट बनाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि आज से सातवें दिन हम यहाँ से प्रस्थान करेंगे। ये सुनकर सभी यादव और स्त्रियां चलने की तयारी करने लगे। 

सातवें दिन वृद्धों और स्त्रियों का विशाल समुदाय इंद्रप्रस्थ को निकला और अर्जुन उनके पीछे रक्षा करते हुए चले। चूँकि श्रीकृष्ण अब अपने लोक चले गए और उनका कोई सम्बन्धी वहां नहीं रहा, समुद्र ने अपनी भूमि वापस लेना आरम्भ किया। जैसे जैसे अर्जुन द्वारिका की भूमि को छोड़ते, समुद्र उसे अपने गर्त में ले लेता। इस प्रकार अर्जुन और उस जनसमुदाय के द्वारिका से निकलते ही द्वारिका पूरी तरह समुद्र में समा गयी। केवल वो भूमि जहाँ श्रीकृष्ण ने पहले मंदिर का निर्माण करवाया था वही शेष रही। वर्तमान में वही श्री द्वारिकाधीश मंदिर है।

चलते चलते उन्होंने पंचनद नगर में डेरा डाला। वहां अभीर डाकुओं के समुदाय ने जान इतनी सारी स्त्रियों और धन को देखा तो उन्होंने उसे लूटने की योजना बनाई। उन्होंने चारो और से उस जनसमुदाय पर आक्रमण कर दिया और बचे हुए यादवों को मारने और सुन्दर स्त्रियों का हरण करने लगे। प्रभु की लीला से विवश महारथी अर्जुन उनकी रक्षा के लिए गांडीव पर प्रत्यंचा भी ना चढ़ा सके। उनकी आँखों के सामने ही अभीर अधिकतर स्त्रियों का हरण कर ले गए। बांकी स्त्रियां उनके अत्याचर और स्पर्श से बचने के लिए स्वयं उनके साथ चल दी। गांडीवधारी अर्जुन कुछ ना कर सके।

जैसे तैसे बची हुई स्त्रियों और वृद्धों को अर्जुन मार्ग में बसाते हुए वापस इंद्रप्रस्थ पहुंचे। वहां उन्होंने अंत में बची स्त्रियों को इंद्रप्रस्थ में बसाया और फिर युधिष्ठिर ने वज्र को इंद्रप्रस्थ का राजा बना दिया। महर्षि वेदव्यास ने अर्जुन को बताया कि उनका बल श्रीकृष्ण के कारण ही था। अब वे नहीं हैं इसीलिए उनसे गांडीव भी ना उठ सका।

ये सुनकर युधिष्ठिर समझ गए कि उनके जाने का समय भी आ गया है और फिर उन्होंने अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ महाप्रस्थानिक यात्रा की। मार्ग में द्रौपदी और अन्य पांडवों ने भी प्राण त्याग दिए और युधिष्ठिर अकेले एक कुत्ते के साथ स्वर्ग तक पहुंचे। 

शुभम।

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