10 जुलाई 2018

रहस्यलोक सा भागलपुर का खिरनी घाट - भाग १

इस बार की भागलपुर यात्रा में ये आखिरी मंदिर है। खिरनी घाट भागलपुर के सबसे महत्वपूर्ण घाटों में से एक है जो बड़ी खंजरपुर के पास स्थित है। बचपन में मैं पता नहीं कितनी बार वहाँ गया हूँ। हालाँकि उस समय शाम के वक्त वहाँ जाने में डर भी लगता था क्यूंकि वो इलाका बीच शहर में होते हुए भी थोड़ा अगल-थलग है और वहाँ का माहौल भी थोड़ा अजीब है। बचपन में गंगा कई बार सीढ़ियों को पर कर मंदिर परिसर में चली आती थी किन्तु अब भागलपुर के अन्य घाटों की तरह यहाँ भी गंगा सूख गयी है। हालाँकि माहौल आज भी यहाँ का वैसा ही शांत है। पहले मैंने सोचा कि इसके बारे में सभी जानकारी एक ही लेख में दूंगा किन्तु फिर लगा कि लेख कुछ लम्बा हो जाएगा तो मैंने इस लेख को दो भागों में बाँटने का निर्णय किया। एक लेख जिसमे वहाँ के मुख्य शिव मंदिर के बारे में जानकारी दी जाएगी और एक ये लेख जिसमे वहाँ उपस्थित एक विशाल पेड़ और एक रहस्य्मय नाग की कहानी है। शिव मंदिर के बारे में मैं बाद में एक और लेख लिखूंगा आज उस नाग की कहानी ही जानते हैं। आज जब ये लेख लिख रहा हूँ तो अचानक याद आता है कि आज से करीब १४-१५ साल पहले में मैं एक बार इस मंदिर में गया था तो अचानक एक बड़ा साँप देख कर उलटे पाँव लौट आया था। उसके बाद कई सालों तक मैंने उस मंदिर की ओर रुख नहीं किया। अब जिस नाग के बारे में मुझे अब पता चला जिसके लिए मैं ये लेख लिख रहा हूँ वो वही साँप था या कोई दूसरा मैं कह नहीं सकता। वैसे भी उस इलाके में साँपों का मिलना आम बात है।

इस बार जब वहाँ पहुंचा तो एक बड़े देवी मंदिर के दर्शन हुए। पता चला कि इसकी स्थापना हाल ही में हुई और और नवरात्र में वहाँ अब भारी भीड़ आने लगी है। कुछ देर तो मैंने अपनी कुछ पुरानी यादें ताजा की फिर सोचा वहाँ उपस्थित ब्राह्मणों से इस मंदिर के बारे में कुछ बात की जाये। जब अंदर पहुँचा तो वहाँ तीन पुजारी और दो विद्यार्थी बैठे थे। मैंने उनसे बात करने की कोशिश की पर वो कुछ मन्त्र बुदबुदा रहे थे इसीलिए उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं वही बैठ गया और उनके जाप के ख़त्म होने का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझसे बात शुरू की। मैंने उन्हें बतया कि मैं यही का हूँ और इस मंदिर के बारे में कुछ जानना चाहता हूँ। संयोगवश वहाँ के प्रधान पंडित मेरे परिचित के भाई निकल गए इसीलिए उन्होंने काफी खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि ये घाट तो बहुत पुराना है पर यहाँ पर मंदिर का काम लगभग ४० साल पहले चलना शुरू हुआ। इसी बीच बात-बात में उस नाग की चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि वैसे तो आज भी इस इलाके में साँपों की संख्या अधिक है पर पुराने ज़माने में तो यहाँ बड़ी मात्रा में सर्प पाए जाते थे। उन दिनों सापों को आस पास खुले में घूमते देखना आम था। इसी कारण लोग इधर ज्यादा आने से कतराते ही थे और बहुत कम ही थे जो इस घाट पर गंगा में डुबकी लगाने का साहस रखते थे। मैं भी बचपन में कई बार इस घाट पर आया हूँ लेकिन कभी भी मेरा पानी में उतरने का साहस नहीं हुआ। वहाँ के प्रधान पंडित के अनुसार आज से लगभग २२ वर्ष पूर्व सन १९९६-९७ में नाग पंचमी के दिन एक गेहुअन (कोबरा) नाग इस मंदिर में आ गया और वहाँ पर प्रतिष्ठित शिलिंग से आकर लिपट गया। उस समय लोगों ने इसे चमत्कार माना और उस नाग को वहाँ से भगाया नहीं। उसके बाद उस उस नाग का नित्य का यही कर्म बन गया। कहते हैं कि उसने आज तक वहाँ आने वाले किसी भी श्रद्धालु को नहीं काटा और बच्चे तो उसे अपने हाथों में भी उठाने लगे। नागपंचमी और शिवरात्रि के दिन उस नाग को देखने के लिए वहाँ बहुत भीड़ इकट्ठी होने लगी। उस नाग का इस मंदिर परिसर में होना बहुत आम बात बन गयी और अब वहाँ आने जाने वाले लोगों को इससे अधिक भय नहीं रहा। फिर एक दिन सन २००४ में महाशिवरात्रि के दिन किसी ने उस नाग को मार दिया। किसने ये किसी को नहीं पता। एक और जानकर व्यक्ति के अनुसार वहाँ के बच्चों में उसे पहले उठाने को लेकर कुछ विवाद हो गया और इसी क्रम में किसी के हाथों भूल से उसे पत्थर लग गया। हालाँकि ये घटना मंदिर परिसर के बाहर ही हुई पर उस नाग ने अपना दम उसी शिवलिंग के पास आकर तोडा। उनके अनुसार ये जानकर कि वो नाग अब नहीं रहा, वहाँ के स्थानीय श्रद्धालु रोने लगे और उस वर्ष और अगले कुछ वर्षों तक शिवरात्रि और नागपंचमी उस उत्साह से नहीं मनाई गयी। उसी मंदिर में शिवमंदिर के पीछे उस नाग की समाधि बनाई गयी और उसपर एक छोटे शिवलिंग की स्थापना की गयी जो आज तक है। 

कहानी बहुत रोचक थी पर इस कहानी के अतिरिक्त अगर कुछ और आपका ध्यान खींचता है तो वो है वहाँ उपस्थित एक विशाल वटवृक्ष। वैसे तो वो एक आम वटवृक्ष ही है लेकिन उसकी संरचना थोड़ी अलग है। उसके बारे में भी मैंने पंडितजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये वृक्ष वहाँ बहुत समय से है। वो वृक्ष अंदर से कुछ खोखला है और आज भी उसके अंदर कई सर्प रहते हैं। उनके अनुसार उस वृक्ष पर श्रीगणेश की आकृति उकेरी गयी से लगती है। उस वृक्ष से एक मोटा तना कुछ अलग ही तरह से निकला हुआ है जो उसे विशिष्ट अकार देता है। ऐसा लगता है जिसे वो किसी हाँथी का पैर है। गणेश जी की आकृति के बारे में सुनने पर मैंने उसे निकट से जाकर देखा। वहाँ ऐसी कोई आकृति उकेरी नहीं गयी है लेकिन उस पेड़ की एक शाखा इस प्रकार है कि उसे एक विशेष कोण से देखने पर वो गणेश जी की तरह दिखाई पड़ता है। इस मामले में मैं किसी भी प्रकार के अन्धविश्वास को बढ़ावा नहीं दे सकता। अगर आपको इस बारे में कोई जानकारी ना हो तो शायद आपको ये आकृति दिखाई भी ना दे। वैसे भी इस देश में पत्थर में भी भगवान दिख जाते हैं फिर गणेशजी की आकृति देख कर लोग उसे पूजने लगें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। तो इस लेख में बस इतना ही। अब उस नाग की कहानी और और इस पेड़ के बारे में जानकारी कितनी सत्य है मैं कह नहीं सकता। इन दोनों के बारे में जो कुछ भी मैं यहाँ लिख रहा हूँ वो वहाँ के पंडित द्वारा प्रदान की गयी जानकारी के आधार पर लिखा रहा हूँ। असल में वास्तविकता यही है या कुछ और इसकी प्रमाणिकता मैं नहीं बता सकता। अगले लेख में मैं वहाँ के शिव मंदिर के बारे में कुछ जानकारी दूँगा। अगर आपमें से कोई इसके विषय में कुछ और जानता हो तो अवश्य साझा करें।