18 जून 2018

कृष्ण का वो पुत्र जिसके कारण सम्पूर्ण यदुवंश का नाश हो गया

साम्ब कृष्ण और उनकी दूसरी पत्नी जांबवंती के ज्येष्ठ पुत्र थे जिसका विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से हुआ था। जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तो गांधारी ने कृष्ण को इसका दोषी मानते हुए यदुकुल के नाश का श्राप दे दिया जिसे कृष्ण ने सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने ये भी कहा कि समय आने पर वे और बलराम स्वयं यदुकुल का नाश कर देंगे। हालाँकि किसी ने उस समय ये नहीं सोचा था कि कृष्ण के कुल का नाश उनके अपने पुत्र साम्ब के कारण होगा। महाभारत को समाप्त हुए ३६ वर्ष बीत चुके थे। एक बार महर्षि दुर्वासा एवं अन्य ऋषि द्वारका पधारे। ऋषियों का इतना बड़ा झुण्ड देख कर साम्ब और उनके मित्रों ने उनसे ठिठोली करने की सोची। उन्होंने साम्ब को एक स्त्री के रूप में सजाया और उसका मुख ढँक कर महर्षि दुर्वासा के पास ले गए। उन्होंने महर्षि को प्रणाम कर उनसे कहा - "हे महर्षि! हमारी ये सखि गर्भवती है। आपलोग तो सर्वज्ञानी हैं अतः भविष्यवाणी कर के ये बताइये कि इसे प्रसव में पुत्र होगा अथवा पुत्री।" इस प्रकार के परिहास से सभी ऋषि बड़े दुखी हुए किन्तु इसे बालकों का बचपना समझ कर उन्होंने कुछ नहीं कहा। किन्तु महर्षि दुर्वासा अपने क्रोध पर नियंत्रण ना रख पाए। श्राप तो वैसे भी उनकी जिह्वा के नोक पर रखा रहता था। उन्होंने क्रोधित होते हुए कहा कि "रे मुर्ख! तू हमसे ठिठोली करता है? जा तेरी इस सखि के गर्भ से एक मूसल का प्रसव होगा और उसी मूसल से समस्त यदुकुल का नाश हो जाएगा।" महर्षि दुर्वासा का ये श्राप सुनकर सभी लोग भय के मारे वहाँ से भाग निकले। अभी वे थोड़ी ही दूर गए थे कि साम्ब को प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी और उसने वही मार्ग में एक विशाल मूसल को उत्पन्न किया। सभी अत्यंत भयभीत हो उस मूसल को लेकर श्रीकृष्ण के पास पहुँचे और उन्हें सारी घटनाएँ सच-सच बता दी। 

14 जून 2018

उडुपी के राजा - महाभारत की एक ऐसी अनोखी कहानी जो आप शायद ही जानते हों

महाभारत एक सागर के समान है और इसके अंदर कथा रुपी कितने मोती छिपे हैं ये शायद कोई नहीं जनता। आज मैं आपको जो कथा सुनाने जा रहा हूँ वो कदाचित आपने कभी सुनी नहीं होगी पर ये कथा दक्षिण, विशेषकर तमिलनाडु में बड़ी प्रचलित है। महाभारत को हम सही मायने में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध कह सकते हैं क्यूंकि शायद ही कोई ऐसा राज्य था जिसने इस युद्ध में भाग नहीं लिया। आर्यावर्त के समस्त राजा या तो कौरव अथवा पांडव के पक्ष में खड़े दिख रहे थे। बलराम और रुक्मी ये दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग नहीं लिया। कम से कम हम सभी तो यही जानते हैं। किन्तु एक और राज्य ऐसा था जो युद्ध क्षेत्र में होते हुए भी युद्ध से विरत था। वो था दक्षिण के "उडुपी" का राज्य। 

12 जून 2018

कालिया नाग मर्दन

श्रीकृष्ण अभी बालक ही थे किन्तु उनपर कंस के राक्षसों द्वारा कई आक्रमण हो चुके थे। अब तक तो पूरा ब्रज भी जान चुका था कि कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं हैं। प्रतिदिन कृष्ण अपने मित्रों और बलराम के साथ गौ चराने जाते थे। जब तक गौएँ चरती थीं, बालक भिन्न-भिन्न प्रकार के खेल खेलते थे। अधिकतर उनका जमावड़ा यमुना नदी के तट पर ही होता था। एक बार खेलते-खेलते कृष्ण को बड़ी प्यास लगी। जैसे ही वो यमुना नदी का पानी पीने को बढे, उनके मित्रों ने उन्हें रोक दिया और बताया कि यमुना में कालिया नामक अतिविषधर नाग का निवास है जिसके कारण पुरे यमुना का पानी विषाक्त हो चुका था। यही कारण था कि यमुना के इतने पास होने पर भी ब्रजवासियों को बड़ी दूर से पानी लाना पड़ता था। इस संकट को जान कर श्रीकृष्ण ने मन ही मन इससे मुक्ति दिलाने की ठान ली। खेल-खेल में ही उन्होंने अपनी गेंद यमुना में फेंक दी और सब के लाख समझने के बाद भी वो उसे लाने के बहाने यमुना में कूद पड़े। जब सबने ऐसा देखा तो दौड़ कर नन्द और यशोदा को इसकी खबर की। बलराम तो सब जानते ही थे, इसी कारण वे वही निश्चिंत खड़े रहे। कृष्ण के यमुना में कूदने की बात सुनकर सभी दौड़े-दौड़े यमुना तट पर पहुँचे। वहाँ नदी में कोई हलचल ना देख कर सबने कृष्ण की आशा ही छोड़ दी। यशोदा तो दुःख से अपनी चेतना ही खो बैठी। ये सत्य था कि कृष्ण और बलराम ने अब तक कई राक्षसों का वध किया था किन्तु इस प्रकार के महाविषधर से उनका सामना कभी नहीं हुआ था। और वैसे भी कृष्ण अभी एक बालक ही तो था। 

10 जून 2018

जब महाबली हनुमान ने पूरे पर्वत शिखर को उखाड़ दिया

लंका का युद्ध चल रहा था। लंकापति रावण के अधिकांश महारथी मारे जा चुके थे। अब लंका केवल रावण और उसके पुत्र मेघनाद के भरोसे थी। मेघनाद एक बार श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश से बाँध चुका था किन्तु गरुड़ ने दोनों को नागपाश से मुक्त कर दिया। जब रावण को ये सूचना मिली तो उसने एक बार फिर मेघनाद को युद्ध के लिए भेजा। मेघनाद ने घोर युद्ध किया। श्रीराम की ओर से लक्ष्मण उसका प्रतिकार करने आये। तो महारथियों का युद्ध देखने के लिए अन्य योद्धाओं ने अपने हाथ रोक लिए। दोनों के बीच बहुत देर तक युद्ध चलता रहा किन्तु कोई फैसला नहीं हो पाया। संध्या वेला भी आने को थी। उसी समय मेघनाद की दृष्टि विभीषण पर पड़ी। वो क्रोध में भर उठा क्यूंकि विभीषण के कारण ही राम की सेना लंका तक पहुँच पायी थी। यही नहीं विभीषण ने ही श्रीराम को उन सभी रहस्यों से अवगत करवाया था जिस कारण रावण की सेना पराजय के निकट पहुँच गयी थी। मेघनाद ने सोचा कि अगर इस कुलकलंक विभीषण का अंत हो जाये तो राम कभी भी लंका पर विजय नहीं पा सकते। ये सोच कर उसने इंद्र से प्राप्त एक अमोघ शक्ति मन्त्रपूत कर विभीषण की ओर फेंकी। जब लक्ष्मण ने ये देखा तो किसी भी प्रकार विभीषण को बचाने की ठानी। श्रीराम ने उन्हें लंका का राजा घोषित किया था और अगर उनका वध हो जाता तो श्रीराम का वचन मिथ्या हो जाता। इतना समय नहीं था कि लक्ष्मण मंत्रसिद्ध बाण चलाकर उसका प्रतिकार करते। अतः विभीषण के प्राण बचाने के लिए वो शक्ति अपने पर ले ली। शक्ति लगते ही वे अपनी चेतना खोकर वही गिर गए। जब मेघनाद ने ये देखा तो वो तुरंत अपने रथ से उतरकर लक्ष्मण को उठाने की कोशिश करने लगा वो किन्तु शेषावतार को उठा ना सका। तभी हनुमान वहाँ आये और लक्ष्मण को उठा कर सुरक्षित अपने शिविर ले आये। लक्ष्मण को मरा जान कर मेघनाद विजयनाद करता हुआ वापस लंका लौट गया। 

7 जून 2018

जब कृष्ण ने पांडवों को बताया कलियुग की गति के बारे में

पांडवों को जुए में छल से हराया जा चुका था और शर्त के अनुसार उन्हें वन में जाना था। जाने से पहले श्रीकृष्ण उनसे मिलने आये। तब सहदेव ने उनसे पूछा - "हे कृष्ण! हमने तो आज तक कोई पाप नहीं किया फिर हमें ये कष्ट क्यों उठाने पड़ रहे हैं?" तब कृष्ण ने कहा - "प्रिय सहदेव! द्वापरयुग अपने अंतिम चरण पर है। ये सब जो हो रहा है वो आने वाले कलियुग का प्रभाव है।" इसपर युधिष्ठिर ने आश्चर्य से पूछा - "वासुदेव! कलियुग तो अभी आया भी नहीं है और उसका इतना भयंकर परिणाम? जब कलियुग प्रारम्भ हो जाएगा तो क्या होगा? कृपया हमें कलियुग में काल की गति कैसी रहेगी ये बताने की कृपा करें।" इसपर कृष्ण ने कहा "आप सभी भाई वन में जाइये और जो कुछ भी दिखे आकर मुझे बताइये। उसी आधार पर मैं आपको कलियुग की गति बता पाउँगा।" कृष्ण के ऐसा कहने पर पाँचों भाई वन में अलग-अलग दिशा में चल दिए। कुछ समय बाद जब सभी लौटे तो आश्चर्य से भरे हुए थे। कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा "अब आपलोग एक-एक करके बैठाइये कि आपने क्या-क्या देखा।" तब सभी भाइयों ने अपने आश्चर्यजनक अनुभव बताये:

4 जून 2018

जब महादेव ने हनुमान का घमंड तोडा - हनुमदीश्वर शिवलिंग की कथा

रामायण और महाभारत में ऐसी कई कहानियाँ हैं जिसमे महाबली हनुमान ने दूसरों का घमंड थोड़ा। विशेषकर महाभारत में श्रीकृष्ण ने हनुमान जी के द्वारा ही अर्जुन, बलराम, भीम, सुदर्शन चक्र, गरुड़ एवं सत्यभामा का घमंड थोड़ा था। इसमें कोई शंका नहीं कि महाबली हनुमान में अपर बल था। रामायण के बाद उनके बल का वर्णन करते हुए श्रीराम कहते हैं कि "यद्यपि रावण की सेना में स्वयं रावण, कुम्भकर्ण एवं मेघनाद जैसे अविजित वीर थे और हमारी सेना में भी स्वयं मैं, लक्ष्मण, जामवंत, सुग्रीव, विभीषण एवं अंगद जैसे योद्धा थे किन्तु इन सब में से कोई भी हनुमान के बल की समता नहीं कर सकता। इस पूरे विश्व में परमपिता ब्रह्मा, नारायण एवं भगवान रूद्र के अतिरिक्त कदाचित ही कोई और हनुमान को परास्त करने की शक्ति रखता है।" इतने बलवान होने के बाद भी हनुमान अत्यंत विनम्र और मृदुभाषी थे एवं अहंकार तो उन्हें छू भी नहीं गया था। इसपर भी रामायण में एक-आध ऐसी कथा आती है जब हनुमान को क्षणिक घमंड हो गया था। किन्तु जिनके स्वामी स्वयं श्रीराम हों उन्हें उबरने में समय नहीं लगता।

29 मई 2018

क्या आपको देवी सीता के भाई के बारे में पता है?

आज मंगलवार है और इस लेख को लिखने के लिए ये दिन सर्वथा उचित है। आज मैं आपको रामायण के उस प्रसंग के बारे में बताऊंगा जिसके बारे में अधिकतर लोग नहीं जानते। हममे से किसी ने देवी सीता के भाई के बारे में नहीं सुना है। उनके किसी भाई का उल्लेख रामायण में कहीं आता भी नहीं है। किन्तु रामायण में एक ऐसा भी प्रसंग है जहाँ किसी ने कुछ समय के लिए माता सीता के भाई की भूमिका निभाई थी।

27 मई 2018

जलांधर और वृंदा की कथा

बहुत काल पहले एक बार भगवान शिव की देवी पार्वती के साथ रमण करने की इच्छा हुई। उस समय माता पार्वती अनुष्ठान पर बैठी थी इस कारण उन्होंने महादेव से क्षमा मांगते हुए अपनी असमर्थता जाहिर की। महादेव ने उनका मान रखा और अपने तेज को समुद्र में फेंक दिया। महादेव के तेज को समुद्र संभाल नहीं पाया और तब उससे परम तेजस्वी दैत्य जालंधर की उत्पत्ति हुई। दैत्यों की दशा उस समय बड़ी दयनीय थी। देवों के भय से दैत्य पातळ में जा छुपे थे। इस महान दैत्य को जन्मा देख कर दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने ये निश्चय किया कि ये शिव का अंश ही दैत्यों का उद्धार करेगा। उन्होंने उसे समस्त विद्या का दान दिया और समय आने पर दैत्यों का सम्राट बना दिया। उसने कठिन तपस्या कर ब्रह्मदेव को प्रसन्न किया और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि जब तक उसकी पत्नी का सतीत्व अक्षय रहेगा तब तक उसे कोई और नहीं मार सकेगा। इसके पश्चात अपने गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से उसने कालनेमि की कन्या वृंदा से विवाह किया जिसके रूप और गुण की चर्चा पूरे विश्व में थी। वृंदा महान सती और नारायण की परम भक्त थी। इससे उदण्ड होकर जालंधर ने पूरी पृथ्वी और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। फिर बैकुंठ पर विजय प्राप्त करने पहुँचा। वहाँ उसने देवी लक्ष्मी को देखा और उनके रूप पर मोहित हो गया। जब देवी लक्ष्मी को ये पता चला तो उन्होंने जालंधर से कहा "हे वीर! मेरे लिए तुम्हारे मन में जो भाव आये हैं वो सर्वथा अनुचित हैं। तुम्हारी ही तरह मैं भी समुद्र से उत्त्पन हुई हूँ इसी कारण मैं तुम्हारी बड़ी बहन के समान हूँ। अतः अपने कलुषित विचार को अपने मन से निकल दो।" ये सुनकर जालन्धर को बड़ा क्षोभ हुआ। उसने देवी लक्ष्मी को अपनी बहन स्वीकार किया और उनका आशीर्वाद लेकर वहाँ से चला गया।