13 नवंबर 2018

छठ महापर्व

आप सबों को छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ। पूर्वी भारत, विशेषकर बिहार, झारखण्ड एवं उत्तर प्रदेश में तो इस पर्व का महत्त्व सर्वाधिक है ही, अब भारत के हर क्षेत्र में इस पर्व को मनाया जाता है। भारत के बाहर, विशेषकर नेपाल, इंडोनेशिया, मॉरीशस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिनाद, अमेरिका, इंग्लैण्ड, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, नूज़ीलैण्ड, मलेशिया एवं जापान में भी इसे  वृहद् रूप से मनाया जाता है। ये पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है इसी कारण इसे "छठ" के नाम से जाना जाता है। ये त्यौहार भगवान सूर्यनारायण एवं उनकी पत्नी उषा को समर्पित है। ये व्रत बड़ा कठिन है और सबके लिए उसे रखना संभव नहीं है क्यूंकि इस व्रत में व्रती को ३६ घंटों का निर्जल व्रत रखना पड़ता है। इस बीच वो पानी भी नहीं पी सकता और इसके नियम भी बहुत ही कठिन होते हैं। हिन्दू धर्म के अन्य व्रतों के इतर इस व्रत को स्त्री के साथ पुरुष भी समान रूप से रखते हैं। इस पर्व में व्रती बिना सिले हुए कपडे धारण करते हैं और इस दौरान व्रती सुस्वादु भोजन के साथ-साथ शैय्या का भी त्याग करते हैं और भूमि पर सोते हैं। इस व्रत को बहुत ही संवेदनशील पर्व माना जाता है क्यूंकि ऐसी मान्यता है कि जो भी इस व्रत का आरम्भ करता है तो उसे तब तक हर वर्ष इस व्रत को करना पड़ता है जबतक अगली पीढ़ी की कोई विवाहिता महिला इस व्रत को करने के लिए तैयार ना हो जाये। इस पर्व को  कुल चार दिनों में समपन्न किया जाता है।

11 नवंबर 2018

चामुंडेश्वरी मंदिर - मैसूर

जब आप कर्नाटक के राजसी नगर मैसूर पहुँचते हैं तो मैसूर पैलेस के साथ-साथ जो स्थान आपको सबसे अधिक आकर्षित करता है वो है १००० मीटर ऊपर चामुंडा पहाड़ी पर स्थित माँ चामुंडेश्वरी का मंदिर। मैसूर शहर से १३ किलोमीटर दूर ये मंदिर समुद्र तल से करीब १०६५ मीटर की उचाई पर है और इतनी उचाई पर मंदिर का निर्माण कर देना ही अपने आप में एक आश्चर्य है। ये मंदिर वास्तुकला का एक अद्वितीय उदाहरण तो है ही, साथ ही साथ इसका पौराणिक महत्त्व भी बहुत अधिक है। मूल रूप से ये मंदिर माँ दुर्गा के एक रूप माँ चामुंडा को समर्पित है और उन्ही पर इसका नामकरण भी है। इसके अतिरिक्त ये ५१ शक्तिपीठों और १८ महाशक्तिपीठों में से भी एक है। यहाँ माँ सती के केश गिरे थे और अन्य शक्तिपीठों की तरह भैरव इसकी सदैव रक्षा करते हैं। आज का वर्तमान मंदिर के मूल भाग का निर्माण १२वीं सदी में होयसल राजवंश के शासकों (कदाचित महाराज विष्णुवर्धन) के द्वारा करवाया गया था। वर्तमान मंदिर का निर्माण १६वीं शताब्दी में विजयनगर शासकों द्वारा करवाया गया और १९वीं सदी में मैसूर के राजा द्वारा इसकी मरम्मत कराई गयी। ७ मंजिले इस मंदिर की कुल उचाई करीब ४० मीटर है जो द्रविड़ वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। 

9 नवंबर 2018

क्यों कायस्थ २४ घंटे के लिए नही करते कलम का उपयोग

आप सभी को चित्रगुप्त पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं। चित्रगुप्त जयन्ती कायस्थ समाज के लिए तो सर्वश्रेष्ठ त्यौहार है ही लेकिन इसके अतिरिक्त अन्य समुदाय के लोग इस बड़ी श्रद्धा से मनाते है। बचपन में हमारे लिए इस दिन का सबसे बड़ा आकर्षण ये होता था कि इस दिन हमें पढाई-लिखाई से छुट्टी मिल जाती थी। ऐसी मान्यता है कि कोई भी कायस्थ चित्रगुप्त पूजा के दिन २४ घंटों के लिए कलम-दवात को हाथ नहीं लगा सकता। उस काल को "परेवा काल" कहते हैं। पूरी दुनिया में कायस्थ दीवाली की पूजा के बाद कलम रख देते हैं और फिर यमद्वितीया के बाद कलम-दवात की पूजा के बाद ही उसे उठाते हैं। इसके विषय में एक बहुत ही रोचक पौराणिक कथा है जो रामायण से जुडी है। मान्यता है कि श्रीराम की एक भूल के कारण ही चित्रगुप्तजी ने अपनी कलम रख दी थी।

7 नवंबर 2018

कैसे करें दीपावली पूजन

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ। दीपावली पर श्री गणेश एवं माता लक्ष्मी की पूजा करने से मनुष्य को समस्त मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाती है। पूरे वर्ष घर में लक्ष्मी का वास रहता है और घर मे लक्ष्मी आने से समस्त समस्याओं का निवारण भी हो जाता है। दीपावली की रात्रि में भगवती लक्ष्मी का स्मरण करते हुए अपने गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र का निरंतर जप करने से वह मंत्र सिद्ध हो जाता है। जो दीपावली की रात्रि में जागरण करते हुए लक्ष्मी जी का ध्यान करते हुए जाग कर रात्रि व्यतीत करता है उसके घर में पूरे वर्ष लक्ष्मी का वास रहता है। विशेष रुप से घर की स्त्रियों का सम्मान करने वाले व्यक्ति के घर से लक्ष्मी कभी रुठ कर नहीं जाती इसलिए गृहलक्ष्मी का सम्मान भी अवश्य करना चाहिए। दीपावली की रात्रि में मांस मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।

5 नवंबर 2018

धनतेरस

आप सबको धनतेरस की हार्दिक शुभकामनायें। आज का दिन देवताओं के वैद्य माने जाने वाले श्री धन्वन्तरि को समर्पित है। इसी दिन ये समुद्र मंथन से अपने हाथोँ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। कलश के साथ प्रकट होने के कारण ही आज के दिन धातु (सोना, चाँदी) एवं बर्तनों को खरीदने की परंपरा आरम्भ हुई। देव धन्वन्तरि को भगवान विष्णु का अवतार भी माना जाता है जो उनके समुद्र मंथन में कच्छप रूप में मंदार पर्वत को अपने ऊपर सँभालने के श्रम के कारण हुआ था। नारायण की भांति ही धन्वन्तरि भी चतुर्भुज हैं और ऊपर के दो हाथों में श्रीहरि की भांति ही शंख और चक्र धारण करते हैं। अन्य दो हाथों में औषधि और अमृत कलश होता है। ऐसी मान्यता है कि आज के दिन जो कुछ भी हम खरीदते हैं वो १३ गुणा बढ़ जाता है। इसी कारण आज के दिन देश भर में लोग कुछ न कुछ खरीदते हैं। २०१६ में भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मानाने का निर्णय लिया। इसके विषय में कई कथा प्रचलित है:
  • समुद्र मंथन के दौरान शरद पूर्णिमा को चन्द्रमा, द्वादशी को कामधेनु, त्रयोदशी को धन्वन्तरि, चतुर्दशी को माँ काली एवं अमावस्या को देवी लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ। इसी कारण दीपावली के दो दिन पहले धन्वन्तरि जयंती या धनतेरस मनाई जाती है।
  • आज के दिन ही भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर दैत्यराज बलि के यज्ञ में पहुँचे और देवताओं के कार्य में विघ्न डालने वाले दैत्यगुरु शुक्राचार्य की आँख बलि के हाथों फोड़ दी। उसके बाद उन्होंने तीन पग में तीनों लोक नाप कर बलि को पाताललोक जाने को विवश कर दिया। 

4 नवंबर 2018

अशोक सुंदरी

भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्रों श्री कार्तिकेय एवं श्रीगणेश के विषय में तो हम सभी जानते हैं किन्तु उनकी कन्या "अशोकसुन्दरी" के विषय में सबको अधिक जानकारी नहीं है। हालांकि महादेव की और भी पुत्रियां मानी गयी हैं, विशेषकर जिन्हें नागकन्या माना गया - जया, विषहरी, शामिलबारी, देव और दोतलि। किन्तु अशोक सुंदरी को ही महादेव की की पुत्री बताया गया है इसीलिए वही गणेशजी एवं कार्तिकेय की बहन मानी जाती है। कई जगह पर इन्हे गणेश की छोटी बहन भी बताया गया है लेकिन अधिकतर स्थानों पर ये मान्यता है कि ये गणेश की बड़ी बहन थी। पद्मपुराण अनुसार अशोक सुंदरी देवकन्या हैं। 

2 नवंबर 2018

जब लक्ष्मण की रक्षा हेतु सीता ने उन्हें निगल लिया

रामायण समुद्र की तरह अथाह है। रामायण और रामचरितमानस के अतिरिक्त भी रामायण के कई क्षेत्रीय प्रारूप हैं जो जनमानस में बहुत प्रसिद्ध हैं। आज जो कथा हम आपको बताने जा रहे हैं वो भी कुछ ऐसी ही है। इसका विवरण हमें रामायण अथवा रामचरितमानस में तो नहीं मिलता किन्तु ये कुछ भारतीय लोककथाओं में चाव से सुनी और सुनाई जाती है। कथा लंका युद्ध के बाद की है। रावण का वध हो चुका था और श्रीराम माता सीता और वीरवर लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस आ चुके थे। उनके आने की ख़ुशी में दीपावली का पर्व मनाया जा रहा था। सारा नगर प्रसन्न था। उसी रात्रि देवी सीता को ये याद आया कि जब वे लंका में थी तो उन्होंने ये मनौती माँगी थी कि अगर वे सकुशल अयोध्या पहुँच जाएंगी तब सरयू नदी के तट पर विधिवत पूजा अर्चना करेंगी। ये याद आते ही सीताजी लक्ष्मण के साथ सरयू नदी के तट पर पहुँच गयी। उसी समय महाबली हनुमान ने उन्हें रात्रि में सरोवर की ओर जाते देखा तो सुरक्षा के लिए वे भी बिना बताये उनके पीछे हो लिए। 

31 अक्तूबर 2018

अहोई अष्टमी

आप सभी को अहोई अष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं। ये भारत का एक प्रमुख त्यौहार है जिसे विशेषकर उत्तर भारत में मनाया जाता है। इस व्रत को पुत्रवती महिलायें अपने पुत्रों की लम्बी आयु के लिए रखती है। वे दिन भर निर्जल उपवास रखती हैं और शाम को तारे के दर्शन के बाद पूजा के साथ अपना उपवास तोड़ती है। होई एक चित्र होता है जिसे दीवार पर बनाया जाता है अथवा किसी कपडे पर काढ़ कर दीवार पर टाँग दिया जाता है। इसमें आठ खानों की एक पुतली बनाई जाती है जिसके इर्द-गिर्द साही और उसके सात बच्चों की आकृति होती है। इस व्रत को करवाचौथ के चार दिन बाद कार्तिक की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और इसी कारण इसे अहोई अष्टमी कहते हैं। अहोई माता की पूजा स्त्रियाँ अपने-अपने सामर्थ्य से करती है। कई संपन्न घरों में अहोई का चित्र चाँदी से भी बनाया जाता है। इस दिन माताएं प्रातः उठ कर अहोई माता के व्रत का संकल्प लेती है और स्नानादि के पश्चात भूमि को गाय के गोबर से लीप कर उसमे कलश की स्थापना की जाती है जिसके चारो ओर बैठ कर सभी स्त्रियाँ इस व्रत की कथा सुनती हैं। प्रसाद के रूप में १४ पूरी और ८ पुओं का भोग अहोई माता को लगाया जाता है। इस पूजा के लिए जल जिस करवे (एक प्रकार का मिटटी का बर्तन) में रखा जाता है वो करवाचौथ में इस्तेमाल किया गया करवा ही होता है। पूजा के बाद इस जल को संभाल कर रखा जाता है और दीवाली के दिन इस करवे के जल का पूरे घर में छिड़काव किया जाता है। इस दिन अहोई माता की व्रत कथा सुनने पर निःसंतान स्त्रिओं को संतान की प्राप्ति होती है और पुत्र/पुत्री प्राप्त महिलाओं की संतानों को दीर्घ आयु प्राप्त होती है।

30 अक्तूबर 2018

वाल्मीकि रामायण - एक दृष्टिकोण

तुलसी रामायण की जगह वाल्मिकी रामायण क्यों? वाल्मिकी रामायण में राम पर तंज हैं, प्रश्न है। सीता का वनगमन है। लव-कुश के तीखे प्रश्न बाण हैं। तुलसी रामायण जहां उत्तरकांड पर खत्म हो जाती है, वाल्मिकी रामायण में रावण और हनुमान की जन्म कथा, राजा नृग, राजा निमि, राजा ययाति और रामराज्य में कुत्ते के न्याय की उपकथाएं, सीतावनगमन, लवकुश जन्म, अश्वमेघ यज्ञ, लव-कुश का रामायण गान, सीता का भूमि प्रवेश, लक्ष्मण का परित्याग सबकुछ समाहित है। यदि राम को जानना है तो तुलसी बाबा नहीं महाकवि वाल्मिकी को समझना होगा। महाकवि वाल्मिकी ने मर्यादापुरुषोत्तम राम की व्याख्या की है तो सीता के चरित्र के साथ भी पूरा न्याय किया है। लव-कुश के जरिए सीता पर लांछन लगाने वालों का प्रतिकार किया है। वाल्मिकी रामायण पूर्ण है, संपूर्ण है। यह युगपुरुष कृष्ण से पहले का चरित्र है। राम मर्यादा पुरुष थे, कृष्ण युगपुरुष। इसलिए तुलसी बाबा से रामायण को पढ़ना शुरू करें लेकिन समझने के लिए महाकवि वाल्मिकी को अवश्य पढ़े। रामायण से मिली सीख:

28 अक्तूबर 2018

श्रीकृष्ण का पूर्वजन्म

जब कंस ने ये सुना कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान ही उसका वध करेगी तब उसने उसे मारने का निश्चय किया। बाद में इस शर्त पर कि देवकी और वसुदेव अपनी सभी संतानों को जन्म लेते ही उसके हवाले कर देगी, उसने दोनों के प्राण नहीं लिए किन्तु दोनों को कारागार में डाल दिया। एक-एक कर कंस ने दोनों के सात संतानों का वध कर दिया। अब आठवीं संतान के रूप में श्रीहरि विष्णु देवकी के गर्भ से जन्म लेने वाले थे। अपने अन्य पुत्रों के वध से दुखी देवकी और वसुदेव अत्यंत दीन अवस्था में भगवान विष्णु के तप में बैठे। उनके मन में केवल यही प्रश्न था कि आखिर किस पाप का दण्ड उन्हें मिल रहा है? साथ ही ये भी कि क्या उनका आठवाँ पुत्र भी उस दुष्ट कंस के हाथों मारा जाएगा? इस प्रकार भगवान विष्णु के तप में बैठे-बैठे उन्हें कई मास बीत गए और देवकी के प्रसव का समय आ गया। जिस रात परमावतार श्रीकृष्ण का जन्म होने वाला था, उनकी पीड़ा और तप देख कर स्वयं भगवान नारायण उनके समक्ष प्रकट हुए। त्रिलोकीनाथ को अपने समक्ष देख दोनों उनके चरणों में गिर पड़े। दोनों के अश्रुओं से भगवान के चरण भींगने लगे। देवकी ने उनके चरणों पर सर रखते हुए कहा - "हे नाथ! आप तो सर्वज्ञ हैं। इस कंस के अत्याचार से संसार को मुक्त क्यों नहीं करवाते? उस पापी को मारने के लिए तो आपकी इच्छा मात्र ही पर्याप्त है। फिर किस कारण आप अपने भक्तों की इतनी कठिन परीक्षा ले रहे हैं? ऐसा कौन सा अपराध हमसे हुआ है जिस कारण हमें आप इतना कठिन दण्ड दे रहे हैं?"