रविवार, 9 अक्तूबर 2016

सप्तर्षियों की पृथ्वी से दूरी

पुराणों में सात महान ऋषियों के बारे में वर्णित है जिन्हें सप्तर्षि कहा जाता है। ध्यान देने वाली बात है कि हर मनवन्तर में सप्तर्षि अलग अलग होते हैं। अभी सातवां मनवन्तर चल रहा है जिसमे वैवस्वत मनु का शासन है। किन्तु पहले मनवन्तर जिसके शासक स्वयंभू मनु हैं, के सप्तर्षियों का महत्त्व सबसे अधिक है। कहा जाता है कि सातों ऋषि अपने अपने ग्रह पर निवास करते हैं जो पृथ्वी से बहुत दूर हैं। आज हम आपको बताएँगे कि सप्तर्षियों में कौन से ऋषि पृथ्वी से कितनी दूरी पर निवास करते हैं। आशा है आपको ये जानकारी पसंद आएगी। 

  • महर्षि अत्रि: ५४८०००००००००००० (548 x 10^12) किलोमीटर या ५७.९ (57.9) प्रकाशवर्ष दूर
  • महर्षि वशिष्ठ: ७३७०००००००००००० (737 x 10^12) किलोमीटर या ७७.९ (77.9) प्रकाशवर्ष दूर 
  • महर्षि पुलह: ७४७०००००००००००० (747 x 10^12) किलोमीटर या ७९ (79) प्रकाशवर्ष दूर 
  • महर्षि अंगिरस: ७६६०००००००००००० (766 x 10^12) किलोमीटर या ८१ (81) प्रकाशवर्ष दूर
  • महर्षि पुलत्स्य: ७९४०००००००००००० (794 x 10^12) किलोमीटर या ८३.९ (83.9) प्रकाशवर्ष दूर 
  • महर्षि मारीचि: ९५५०००००००००००० (955 x 10^12) किलोमीटर या १००.९ (100.9) प्रकाशवर्ष दूर 
  • महर्षि क्रतु: ११७००००००००००००० (1170 x 10^12) किलोमीटर या १२३.७ (123.7) प्रकाशवर्ष दूर
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गुरुवार, 17 सितंबर 2015

५६ (छप्पन) भोग का रहस्य

भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है. इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है. यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है. अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं. 

ऐसा कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी. अर्थात् बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे. जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया. आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र की वर्षा बंद हो गई है तो उन्होंने सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा. तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ. भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने सात दिन और अष्ट पहर के हिसाब से ७ x ८=५६ व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया.

श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों. श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी. व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया.

ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं. उस कमल की तीन परतें होती हैं. प्रथम परत में "आठ", दूसरी में "सोलह" और तीसरी में "बत्तीस पंखुड़िया" होती हैं. प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में भगवान विराजते हैं. इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है. 

छप्पन भोग इस प्रकार है:
  1. भक्त (भात)
  2. सूप (दाल)
  3. प्रलेह (चटनी)
  4. सदिका (कढ़ी)
  5. दधिशाकजा (दही शाक की कढ़ी)
  6. सिखरिणी (सिखरन)
  7. अवलेह (शरबत)
  8. बालका (बाटी)
  9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा)
  10. त्रिकोण (शर्करा युक्त)
  11. बटक (बड़ा)
  12. मधु शीर्षक (मठरी)
  13. फेणिका (फेनी)
  14. परिष्टïश्च (पूरी)
  15. शतपत्र (खजला)
  16. सधिद्रक (घेवर)
  17. चक्राम (मालपुआ)
  18. चिल्डिका (चोला)
  19. सुधाकुंडलिका (जलेबी)
  20. धृतपूर (मेसू)
  21. वायुपूर (रसगुल्ला)
  22. चन्द्रकला (पगी हुई)
  23. दधि (महारायता)
  24. स्थूली (थूली)
  25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी)
  26. खंड मंडल (खुरमा)
  27. गोधूम (दलिया)
  28. परिखा
  29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त)
  30. दधिरूप (बिलसारू)
  31. मोदक (लड्डू)
  32. शाक (साग)
  33. सौधान (अधानौ अचार)
  34. मंडका (मोठ)
  35. पायस (खीर)
  36. दधि (दही)
  37. गोघृत
  38. हैयंगपीनम (मक्खन)
  39. मंडूरी (मलाई)
  40. कूपिका (रबड़ी)
  41. पर्पट (पापड़)
  42. शक्तिका (सीरा)
  43. लसिका (लस्सी)
  44. सुवत
  45. संघाय (मोहन)
  46. सुफला (सुपारी)
  47. सिता (इलायची)
  48. फल
  49. तांबूल
  50. मोहन भोग
  51. लवण
  52. कषाय
  53. मधुर
  54. तिक्त
  55. कटु
  56. अम्ल
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सोमवार, 18 मई 2015

श्री मद भगवद गीता के बारे में कुछ तत्थ्य

  • किसने किसको सुनाई: श्रीकृष्ण ने अर्जुन को
  • कब सुनाई: आज से लगभग ७००० साल पहले
  • किस दिन सुनाई: रविवार के दिन
  • कौन सी तिथि को: एकादशी 
  • कहाँ सुनाई: कुरुक्षेत्र की रणभूमि में
  • कितनी देर में सुनाई: लगभग ४५ मिनट
  • क्यों सुनाई: कर्त्तव्य से भटके अर्जुन को कर्त्तव्य पथ पर लेन के लिए एवं आने वाली पीढ़ी को धर्म ज्ञान सिखाने के लिए
  • अर्जुन को गीता पर पूर्ण विश्वास कब आया: श्रीकृष्ण के विराट स्वरुप के दर्शन के बाद
  • अर्जुन के आलावा और किसने श्रीकृष्ण के विराट रूप के दर्शन किये: संजय ने
  • अर्जुन के आलावा इसे और किसने सुना: ध्रितराष्ट्र एवं संजय ने
  • अर्जुन से पहले इसका ज्ञान किसे मिला था: सूर्यदेव को
  • गीता की गिनती किन धर्मग्रंथों में की जाती है: उपनिषदों में
  • गीता किस महाग्रंथ का भाग है: महाभारत के शांति पर्व का
  • गीता का दूसरा नाम: गीतोपनिषद
  • गीता का सार क्या है: परमात्मा की शरण लेना
  • कुल कितने श्लोक हैं: ७००
  • कुल कितने अध्याय है: १८
    1. विषाद योग: ४६ श्लोक
    2. सांख्य योग: ७२ श्लोक
    3. कर्म योग: ४३ श्लोक
    4. ज्ञान कर्म संन्यास योग: ४२ श्लोक 
    5. कर्म संन्यास योग: २९ श्लोक 
    6. ध्यान योग अथवा आत्मसंयम योग: ४७ श्लोक
    7. ज्ञान विज्ञान योग: ३० श्लोक
    8. अक्षर ब्रम्ह योग: २८ श्लोक
    9. राजविद्या राजगुह्य योग: ३४ श्लोक
    10. विभूति विस्तार योग: ४२ श्लोक
    11. विश्वरूप दर्शन योग: ५५ श्लोक
    12. भक्ति योग: २० श्लोक
    13. क्षेत्र क्षेत्रजन विभाग योग: ३५ श्लोक
    14. गुणत्रय विभाग योग: २७ श्लोक
    15. पुरुषोत्तम योग: २० श्लोक
    16. दैवासुर सम्पद विभाग योग: २४ श्लोक
    17. श्रध्दात्रय विभाग योग: २८ श्लोक
    18. मोक्ष संन्यास योग: ७८ श्लोक 
  • गीता में किसने कितने श्लोक कहे हैं:
    • श्रीकृष्ण ने: ५७४
    • अर्जुन ने: ८५
    • ध्रितराष्ट्र ने:
    • संजय ने: ४०
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रविवार, 12 अप्रैल 2015

३३ कोटि देवताओं का रहस्य

हिन्दू धर्म सागर की तरह विशाल है. इसकी विशालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हिन्दू धर्म में कुल देवी देवताओं की संख्या ३३ करोड़ बताई जाती है. सुनने में कुछ अजीब नहीं लगता? क्या ये संभव है कि किसी धर्म में कुल देवी देवताओं की संख्या ३३ करोड़ हो सकती है? किसी को भी आश्चर्य हो सकता है. कहते हैं कि अधूरा ज्ञान हानिकारक हो सकता है. तो आईये हम इस बारे में कुछ आश्चर्यजनक तत्थ्य जानें.

सबसे पहले ये बात कि हिन्दू धर्म में कुल ३३ करोड़ देवी देवतायें हैं ये सत्य नहीं है. मैंने कई धर्म गुरुओं को पुरे विश्वास के साथ ये कहते सुना है कि ये संख्या सटीक रूप से ३३ करोड़ ही हैं किन्तु जब उनसे ये पूछा जाए कि केवल ३३ देवी देवताओं के नाम बताएं, निश्चित रूप से उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ेगी.

सबसे पहली बात, वेद, पुराण, गीता, रामायण, महाभारत या किसी अन्य धार्मिक ग्रन्थ में ये नहीं लिखा कि हिन्दू धर्म में ३३ करोड़ देवी देवताओं हैं और यही नहीं देवियों को कहीं भी इस गिनती में शामिल नहीं किया है. इतनी विशाल संख्या देखते हुआ शायद उन्हें बाद में इस सूची में शामिल कर लिया गया होगा. हमारे धर्म ग्रंथों में ३३ करोड़ नहीं बल्कि "३३ कोटि" देवताओं (ध्यान दें, देवता न कि भगवान) का जिक्र है. ध्यान दें कि यहाँ "कोटि" शब्द का प्रयोग किया गया है, करोड़ का नहीं. आज हम जिसे करोड़ कहते हैं, पुराने समय में उसे कोटि कहा जाता है. युधिष्ठिर ने ध्यूत सभा में अपने धन का वर्णन करते समय कोटि शब्द का प्रयोग किया है. आधुनिक काल के विद्वानों ने कोटि का अर्थ सीधा सीधा अनुवाद कर करोड़ कर दिया.

दरअसल यहाँ कोटि का प्रयोग ३३ करोड़ नहीं बल्कि ३३ (त्रिदशा) "प्रकार" के देवताओं के लिए किया गया है. कोटि का एक अर्थ "प्रकार" (तरह) भी होता है. उस समय जब देवताओं का वर्गीकरण किया गया तो उसे ३३ प्रकार में विभाजित किया गया जो समय के साथ अपभ्रंश होकर कब "करोड़" के रूप में प्रचलित हो गया पता ही नहीं चला. दुःख कि बात ये है कि आज भी हम हिन्दू रटे रटाये तौर पर बड़े गर्व से कहते हैं कि हमारे देवी देवताओं की संख्या इतनी अधिक है. इन ३३ कोटि (करोड़ नहीं) देवताओं को वर्णन आपको किसी भी धर्म ग्रन्थ खासकर पुराणों में मिल जाएगा.

१२ आदित्य, ८ वसु, ११ रूद्र एवं दो अश्विनी कुमार मिलकर ३३ (१३+८+११+२ = ३३) देवताओं की श्रेणी बनाते हैं. इनका वर्णन नीचे दिया गया है:

१२ आदित्य (सभी देवताओं में मूल देवता)

  1. धाता
  2. मित
  3. आर्यमा 
  4. शक्रा
  5. वरुण
  6. अंश
  7. भाग
  8. विवास्वान
  9. पूष
  10. सविता
  11. त्वास्था
  12. विष्णु
८ वसु (इंद्र और विष्णु के सहायक)
  1. धर (पृथ्वी)
  2. ध्रुव (नक्षत्र)
  3. सोम (चन्द्र)
  4. अह (अंतरिक्ष)
  5. अनिल (वायु)
  6. अनल (अग्नि)
  7. प्रत्युष (सूर्य)
  8. प्रभास (ध्यौ: यही आठवें वसु थे जिनका जन्म भीष्म के रूप में गंगा की आठवी संतान के रूप में हुआ)
११ रूद्र (भगवान शंकर के प्रमुख अनुयायी. इन्हें उनका (भगवान रूद्र) का हीं रूप माना जाता है) 
  1. हर 
  2. बहुरूप
  3. त्रयम्बक
  4. अपराजिता
  5. वृषाकपि
  6. शम्भू
  7. कपार्दी
  8. रेवात
  9. मृगव्याध
  10. शर्वा
  11. कपाली
२ अश्विनी कुमार (इनकी गिनती जुड़वाँ भाइयों के रूप में एक साथ ही होती है जो देवताओं के राजवैध भी हैं)
  1.  नसात्या
  2. दसरा
कुल ३३ कोटि (प्रकार) देवता
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रविवार, 4 जनवरी 2015

कर्त्यवीर्य अर्जुन द्धारा रावण को बंदी बनाना

रावण का दिग्विजय अभियान चल रहा था। कई राज्यों को जीतते हुए रावण महिष्मति पहुंचा। उस समय वहाँ हैहय वंश के राजा कर्त्यवीर्य अर्जुन शासन कर रहा था तथा नित्य की भांति अपनी रानियों के साथ जलविहार को गया हुआ था। घूमता घूमता रावण अपनी सेना सहित उसी सरोवर के किनारे पहुंच गया और अपने आराध्य भगवान शंकर की आराधना हेतु उसने शिवलिंग की स्थापना की। उधर अर्जुन की रानियों ने कौतुक के लिए उससे कुछ असाधारण करने का अनुरोध किया। कर्त्यवीर्य अर्जुन को वरदान स्वरुप हजार भुजाएं प्राप्त हुई थी इसी कारण वो सहस्त्रबाहु के नाम से भी विख्यात था तथा अजेय था। अपने पत्नियों के इस प्रकार अनुरोध करने पर उसने अपनी हजार भुजाओं से नदी का प्रवाह पूरी तरह रोक दिया। 

अचानक धारा रुक जाने से नदी का जलस्तर बढ़ गया और उसमे तट पर बनाया गया रावण का शिवलिंग बह गया। इससे अतिक्रोध में आकर रावण ने अपनी सेना की एक टुकड़ी को इसका कारण पता करने और अपराधी को बंदी बना कर लाने का आदेश दिया। जब उसकी सेना ने देखा कि अर्जुन ने अपने हजार हाथों से जल का प्रवाह रोक दिया है तो उन्होंने उसे बंदी बनाने के लिए उसपर आक्रमण कर दिया किन्तु अर्जुन के पराक्रम के आगे किसी की ना चली। उससे पराजित हो वे वापस रावण के पास लौटे और उससे सारी घटना कही। अपने विजय के मद में चूर रावण ये सुनकर नदी के तट पर पहुंचा और अर्जुन को युद्ध की चुनौती दे डाली। पहले अर्जुन ने कहा की रावण उसका अतिथि है इसलिए उसका उससे युद्ध करना उचित नहीं है किन्तु रावण के रणमत्त हठ के आगे उसकी एक न चली।  अंततः दोनों वीर युद्ध के लिए सज्जित हुए।  

दोनों महायोद्धा और अजेय थे। उनका युद्ध कई दिनों तक चलता रहा और ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उनमे से कोई भी पराजित नहीं हो सकता। अंत में अर्जुन ने क्रोध में आकर रावण को अपने हजार हाथों से जकड लिया। रावण अपनी पूरी शक्ति के बाद भी उससे निकल नहीं पाया और अर्जुन ने उसे बंदी बना लिया। बाद में जब रावण के दादा महर्षि पुलत्स्य को इसका पता चला तो उन्होंने बीच बचाव कर रावण को मुक्त करवाया और फिर रावण अर्जुन से मित्रता कर वापस लंका को लौट गया। 
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शनिवार, 28 जून 2014

जब महादेव ने श्रीराम की परीक्षा ली

श्रीराम का वनवास ख़त्म हो चुका था. एक बार श्रीराम ब्राम्हणों को भोजन करा रहे थे तभी भगवान शिव ब्राम्हण वेश में वहाँ आये. श्रीराम ने लक्ष्मण और हनुमान सहित उनका स्वागत किया और उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया. भगवान शिव भोजन करने बैठे किन्तु उनकी क्षुधा को कौन बुझा सकता था? बात हीं बात में श्रीराम का सारा भण्डार खाली हो गया. लक्ष्मण और हनुमान ये देख कर चिंतित हो गए और आश्चर्य से भर गए. एक ब्राम्हण उनके द्वार से भूखे पेट लौट जाये ये तो बड़े अपमान की बात थी. उन्होंने श्रीराम से और भोजन बनवाने की आज्ञा मांगी. श्रीराम तो सब कुछ जानते हीं थे, उन्होंने मुस्कुराते हुए लक्ष्मण से देवी सीता को बुला लाने के लिए कहा.

सीता जी वहाँ आयी और ब्राम्हण वेश में बैठे भगवान शिव का अभिवादन किया. श्रीराम ने मुस्कुराते हुए सीता जी को सारी बातें बताई और उन्हें इस परिस्थिति का समाधान करने को कहा. सीता जी अब स्वयं महादेव को भोजन कराने को उद्धत हुई. उनके हाथ का पहला ग्रास खाते हीं भगवान शिव संतुष्ट हो गए. 

भोजन के उपरान्त भगवान शिव ने श्रीराम से कहा कि आकण्ठ भोजन करने के कारण वे स्वयं उठने में असमर्थ हैं इसी कारण कोई उन्हें उठा कर शैय्या पर सुला दे. श्रीराम की आज्ञा से हनुमान महादेव को उठाने लगे मगर आश्चर्य, एक विशाल पर्वत को बात हीं बात में उखाड़ देने वाले हनुमान, जिनके बल का कोई पार हीं नहीं था, महादेव को हिला तक नहीं सके. भला रुद्रावतार रूद्र की शक्ति से कैसे पार पा सकते थे? हनुमान लज्जित हो पीछे हट गए. फिर श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण ये कार्य करने को आये. अब तक वो ये समझ चुके थे कि ये कोई साधारण ब्राम्हण नहीं हैं. अनंत की शक्ति भी अनंत हीं थी. परमपिता ब्रम्हा, नारायण और महादेव का स्मरण करते हुए लक्ष्मण ने उन्हें उठा कर शैय्या पर लिटा दिया.

लेटने के बाद भगवान शिव ने श्रीराम से सेवा करने को कहा. स्वयं श्रीराम लक्ष्मण और हनुमान के साथ भगवान शिव की पाद सेवा करने लगे. देवी सीता ने महादेव को पीने के लिए जल दिया. महादेव ने आधा जल पिया और बांकी जल का कुल्ला देवी सीता पर कर दिया. देवी सीता ने हाथ जोड़ कर कहा कि हे ब्राम्हणदेव, आपने अपने जूठन से मुझे पवित्र कर दिया. ऐसा सौभाग्य तो बिरलों को प्राप्त होता है. ये कहते हुए देवी सीता उनके चरण स्पर्श करने बढ़ी, तभी महादेव उपने असली स्वरुप में आ गए. महाकाल के दर्शन होते हीं सभी ने करबद्ध हो उन्हें नमन किया.

भगवान शिव ने श्रीराम को अपने ह्रदय से लगते हुए कहा कि आप सभी मेरी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए. ऐसे कई अवसर थे जब किसी भी मनुष्य को क्रोध आ सकता था किन्तु आपने अपना संयम नहीं खोया. इसी कारण संसार आपको मर्यादा पुरुषोत्तम कहता है. उन्होंने श्रीराम को वरदान मांगने को कहा किन्तु श्रीराम ने हाथ जोड़ कर कहा कि आपके आशीर्वाद से मेरे पास सब कुछ है. अगर आप कुछ देना हीं चाहते हैं तो अपने चरणों में सदा की भक्ति का आशीर्वाद दीजिये. महादेव ने मुस्कुराते हुए कहा कि आप और मैं कोई अलग नहीं हैं किन्तु फिर भी देवी सीता ने मुझे भोजन करवाया है इसीलिए उन्हें कोई वरदान तो माँगना हीं होगा. देवी सीता ने कहा कि हे भगवान, अगर आप हमसे प्रसन्न हैं तो कुछ काल तक आप हमारे राजसभा में कथावाचक बनकर रहें. उसके बाद कुछ काल तक भगवान शिव श्रीराम की सभा में कथा सुना कर सबको कृतार्थ करते रहे.
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शनिवार, 22 मार्च 2014

घटोत्कच

घटोत्कच भीम और राक्षस कन्या हिडिम्बा का पुत्र था. पांडवों के वंश का वो सबसे बड़ा पुत्र था और महाभारत के युध्द में उसने अहम भूमिका निभाई. हालाँकि कभी भी उसकी गिनती चंद्रवंशियों में नहीं की गयी (इसका कारण हिडिम्बा का राक्षसी कुल था) लेकिन उसे कभी भी अन्य पुत्रों से कम महत्वपूर्ण नहीं समझा गया. महाभारत के युद्ध में कर्ण से अर्जुन के प्राणों की रक्षा करने हेतु घटोत्कच ने अपने प्राणों की बलि दे दी.

लाक्षाग्रह की घटना के बाद पांडव वनों में भटक रहे थे. चलते चलते कुंती का धैर्य जाता रहा और सब ने विश्राम की इच्छा जाहिर की. कुंती सहित सभी भाई गहरी नींद सो गए और भीम वहां पहरे पर बैठ गए. वहीँ पास में हिडिम्ब नमक राक्षस अपनी बहन हिडिम्बा के साथ रहता था. जब पांडव वहां विश्राम कर रहे थे तो हिडिम्ब को मानवों की गंध मिल गयी और उसने हिडिम्बा को इसका पता लगाने भेजा. हिडिम्बा हालाँकि राक्षसी थी लेकिन अहिंसा प्रिय थी. केवल अपने भाई के भय से वो उसका साथ देती थी. जब हिडिम्बा मनुष्यों को खोजती वहां तक पहुंची तो वहां पर भीम के रूप और बलिष्ठ शरीर को देख कर वो उसपर आसक्त हो गयी. वो एक सुन्दर स्त्री का रूप धर कर भीम के पास गयी और उसे कहा कि वो जल्द से जल्द अपने परिवार के साथ वहां से चला जाए नहीं तो वे सभी उसके भाई के ग्रास बन जाएँगे. भीम कहा कि उसका परिवार दिन भर की थकान के बाद विश्राम कर रहा है इसीलिए वो उन्हें उठा नहीं सकते. भीम ने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि उसे किसी से भी घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है.

उधर जब हिडिम्बा वापस लौट कर नहीं आयी तो हिडिम्ब स्वयं उसे ढूंढ़ता हुआ वहां पर पहुच गया. क्रोध में वो पहले हिडिम्बा को हीं मारना चाहता था पर भीम ने उसे ऐसा करने नहीं दिया. कोलाहल से उनका परिवार उठ ना जाए इसीलिए भीम उसे घसीटता हुआ वहां से दूर ले गया पर उन दोनो में ऐसा भयानक युध्द होने लगा कि आसपास के वृक्ष टूट कर गिर पड़े और सभी लोग जाग गए. पहले तो उन्हें कुछ समझ में हीं नहीं आया लेकिन हिडिम्बा ने उन्हें सारी बातें बता दी. भीम को लेकर सभी निश्चिन्त थे क्योंकि विश्व की कोई भी शक्ति उसे परास्त नहीं कर सकती थी. ऐसा हीं हुआ और भीम ने जल्द ही हिडिम्ब का अंत कर दिया.

उसकी मृत्यु के बाद हिडिम्बा ने कुंती से कहा कि उसकी भाई की मृत्यु के बाद वो बिलकुल असहाय हो गयी है. भीम के प्रति अपनी आसक्ति के बारे में भी उसने सब को बताया और उससे विवाह करने की अपनी इच्छा व्यक्त की. अब एक अजीब स्थिति पैदा हो गयी. पहली ये कि विपत्ति के इस समय में पांडवों का बल भीम हीं था और दूसरी ये कि अपने बड़े भाई युधिष्ठिर के अविवाहित रहते भीम विवाह नहीं कर सकता था. कुंती ने ये समस्या युधिष्ठिर को बताई तो उसने कहा कि ये तो सत्य है कि उनके अविवाहित रहते भीम रीतिगत तरीके से विवाह नहीं कर सकता किन्तु किसी की रक्षा हेतु धर्म उसे गन्धर्व विवाह करने की छूट देता है. उन्होंने दो शर्तों पर भीम का विवाह हिडिम्बा से करना स्वीकार किया कि एक तो हिडिम्बा प्रत्येक रात्रि उसे उसके परिवार के पास वापस छोड़ आएगी और दूसरे भीम उसके पास केवल एक संतान की उत्पत्ति तक हीं रहेगा. इन शर्तों को हिडिम्बा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

कुछ समय के बाद हिडिम्बा ने घटोत्कच को जन्म दिया जो पैदा होते हीं वयस्क हो गया. उसके सर पर एक भी बाल नहीं था इसीलिए भीम ने उसका नाम घटोत्कच रखा जिसका अर्थ होता है घड़े के सामान चिकने सर वाला. शर्त के अनुसार भीम अपने परिवार के पास वापस चला गया. जब घटोत्कच को पांडवों के साथ हुए अन्याय का पता चला तो वो अत्यंत क्रोधित हो उठा. वह उसी समय कौरवों पर आक्रमण करना चाहता था किन्तु युधिष्ठिर ने उसे समझा बुझा कर शांत किया. घटोत्कच ने पांडवों को वचन दिया कि जब भी संकट के समय वे उसे याद करेंगे, वो उपस्थित हो जाएगा.

महाभारत के युध्द में घटोत्कच ने कौरव सेना का बड़ा विनाश किया. कौरव की तरफ से अलम्बुष राक्षस ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की परन्तु अंत में वो घटोत्कच के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुआ. भीष्म के सेनापति रहते तो भीष्म ने घटोत्कच को जैसे तैसे रोके रखा किन्तु भीष्म के धराशायी होने के बाद तो उसने कौरव सेना की बड़ी बुरी गत की. महाभारत में कहा गया है कि भीष्म के पतन के बाद घटोत्कच ने कौरवों की सेना में ऐसा उत्पात मचाया कि दुर्योधन ने बांकी सभी को छोड़ कर केवल उसे मारने का आदेश दिया. घटोत्कच ने ऐसा हाहाकार मचाया कि अंत में दुर्योधन ने कर्ण से उसे मारने का अनुरोध किया. कर्ण ने दुर्योधन को वचन दिया कि वो आज घटोत्कच को अवश्य मार गिरायेगा लेकिन कर्ण को ये जल्द हीं पता चल गया कि घटोत्कच को मारना उसके लिए भी सहज नहीं है. कर्ण ने साधारण बाणों से घटोत्कच को मारने का बड़ा प्रयास किया पर सफल नहीं हो पाया. अंत में दुर्योधन के बार बार उपालंभ देने पर और पाने वचन की रक्षा के लिए उसने घटोत्कच पर इन्द्र के द्वारा दी गयी अमोघ शक्ति का प्रयोग किया जिससे आखिरकार घटोत्कच की मृत्यु हो गयी.

ऐसा कहा जाता है कि अर्जुन के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को कौरव सेना में हाहाकार मचाने के लिए उत्साहित किया. उन्हें पता था कि जबतक कर्ण के पास इंद्र की दी गयी शक्ति थी, अर्जुन उसे कभी परास्त नहीं कर सकता था और कर्ण अर्जुन के प्राण कभी भी ले सकता था. जब कर्ण ने घटोत्कच का वध किया तो कौरव सेना में सभी हर्षित थे केवल कर्ण को छोड़ कर क्योंकि उसे पता था कि अब अर्जुन की निश्चित मृत्यु उसके हाथ से निकल चुकी है, वहीँ पांडव सेना में सभी दुखी थे केवल श्रीकृष्ण को छोड़ कर क्योंकि उन्हें पता था कि घटोत्कच ने अर्जुन को निश्चित मृत्यु से बचा लिया है.
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शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

सोमवार, 12 अगस्त 2013

दक्ष प्रजापति की पुत्रियों और उनके पतियों के नाम

Daksha's Daughters
पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति परमपिता ब्रम्हा के पुत्र थे जो उनके दाहिने पैर के अंगूठे से उत्पन्न हुए थे. प्रजापति दक्ष की दो पत्नियाँ थी - प्रसूति और वीरणी. प्रसूति से दक्ष की चौबीस कन्याएँ थीं और वीरणी से साठ कन्याएँ. उन सभी का वर्णन नीचे दिया है और साथ हीं साथ उनके पतियों का नाम भी दिया गया है:

प्रसूति से दक्ष की चौबीस पुत्रियाँ और उनके पति
  1. श्रद्धा (धर्म)
  2. लक्ष्मी (धर्म)
  3. धृति (धर्म)  
  4. तुष्टि (धर्म)  
  5. पुष्टि (धर्म)  
  6. मेधा (धर्म)
  7. क्रिया (धर्म)  
  8. बुद्धि (धर्म)  
  9. लज्जा (धर्म)  
  10. वपु (धर्म)  
  11. शांति (धर्म)  
  12. सिद्धि (धर्म)  
  13. कीर्ति (धर्म)
  14. ख्याति (महर्षि भृगु)
  15. सती (रूद्र)
  16. सम्भूति (महर्षि मरीचि)
  17. स्मृति (महर्षि अंगीरस)
  18. प्रीति (महर्षि पुलत्स्य)
  19. क्षमा (महर्षि पुलह)
  20. सन्नति (कृतु)
  21. अनुसूया (महर्षि अत्रि)
  22. उर्जा (महर्षि वशिष्ठ)
  23. स्वाहा (अग्नि)
  24. स्वधा (पितृस)
वीरणी से दक्ष की साठ पुत्रियाँ और उनके पति 
  1. मरुवती (धर्म)
  2. वसु (धर्म)
  3. जामी (धर्म)  
  4. लंबा (धर्म)
  5. भानु (धर्म)
  6. अरुंधती (धर्म)
  7. संकल्प (धर्म)
  8. महूर्त (धर्म)
  9. संध्या (धर्म)
  10. विश्वा (धर्म)
  11. अदिति (महर्षि कश्यप)
  12. दिति (महर्षि कश्यप)
  13. दनु (महर्षि कश्यप)
  14. काष्ठा (महर्षि कश्यप)
  15. अरिष्टा (महर्षि कश्यप)
  16. सुरसा (महर्षि कश्यप)
  17. इला (महर्षि कश्यप)
  18. मुनि (महर्षि कश्यप)
  19. क्रोधवषा (महर्षि कश्यप)
  20. तामरा (महर्षि कश्यप)
  21. सुरभि (महर्षि कश्यप)
  22. सरमा (महर्षि कश्यप)
  23. तिमि (महर्षि कश्यप)
  24. कृतिका (चंद्रमा)
  25. रोहिणी (चंद्रमा)
  26. मृगशिरा (चंद्रमा)
  27. आद्रा (चंद्रमा)
  28. पुनर्वसु (चंद्रमा)
  29. सुन्रिता (चंद्रमा)
  30. पुष्य (चंद्रमा)
  31. अश्लेषा (चंद्रमा)
  32. मेघा (चंद्रमा)
  33. स्वाति (चंद्रमा)
  34. चित्रा (चंद्रमा)
  35. फाल्गुनी (चंद्रमा)
  36. हस्ता (चंद्रमा)  
  37. राधा (चंद्रमा)
  38. विशाखा (चंद्रमा)
  39. अनुराधा (चंद्रमा)
  40. ज्येष्ठा (चंद्रमा)
  41. मुला (चंद्रमा)
  42. अषाढ़ (चंद्रमा)
  43. अभिजीत (चंद्रमा)
  44. श्रावण (चंद्रमा)
  45. सर्विष्ठ (चंद्रमा)
  46. सताभिषक (चंद्रमा)
  47. प्रोष्ठपदस (चंद्रमा)
  48. रेवती (चंद्रमा)
  49. अश्वयुज (चंद्रमा)
  50. भरणी (चंद्रमा)
  51. रति (कामदेव) 
  52. स्वरूपा (भूत)
  53. भूता (भूत)
  54. स्वधा (अंगिरा प्रजापति)
  55. अर्चि (कृशाश्वा)
  56. दिशाना (कृशाश्वा)
  57. विनीता (तार्क्ष्य कश्यप)
  58. कद्रू (तार्क्ष्य कश्यप)
  59. पतंगी (तार्क्ष्य कश्यप)
  60. यामिनी (तार्क्ष्य कश्यप)
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शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

पंच सती

हिन्दू धर्म में पंच सतियों का बड़ा महत्त्व है। ये पांचो सम्पूर्ण नारी जाति के सम्मान की साक्षी मानी जाती हैं। विशेष बात ये है कि इन पांचो स्त्रियों को अपने जीवन में अत्यंत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और साथ ही साथ समाज ने इनके पतिव्रत धर्म पर सवाल भी उठाए लेकिन इन सभी के पश्चात् भी वे हमेशा पवित्र और पतिव्रत धर्म की प्रतीक मानी गई। कहा जाता है कि नित्य सुबह इनके बारे में चिंतन करने से सारे पाप धुल जाते हैं। आइये इनके बारे में कुछ जानें।
  • अहल्या: ये महर्षि गौतम की पत्नी थी। देवराज इन्द्र इनकी सुन्दरता पर रीझ गए और उन्होंने अहल्या को प्राप्त करने की जिद ठान ली पर मन ही मन वे अहल्या के पतिव्रत से डरते भी थे। एक बार रात्रि में हीं उन्होंने गौतम ऋषि के आश्रम पर मुर्गे के स्वर में बांग देना शुरू कर दिया। गौतम ऋषि ने समझा कि सवेरा हो गया है और इसी भ्रम में वे स्नान करने निकल पड़े। अहल्या को अकेला पाकर इन्द्र ने गौतम ऋषि के रूप में आकर अहल्या से प्रणय याचना की और उनका शील भंग किया। गौतम ऋषि जब वापस आये तो अहल्या का मुख देख कर वे सब समझ गए। उन्होंने इन्द्र को नपुंसक होने का और अहल्या को शिला में परिणत होने का श्राप दे दिया। युगों बाद श्रीराम ने अपने चरणों के स्पर्श से अहल्या को श्राप मुक्त किया।
  • मन्दोदरी: मंदोदरी मय दानव और हेमा अप्सरा की पुत्री, राक्षसराज रावण की पत्नी और इन्द्रजीत मेघनाद की माता थी। पुराणों के अनुसार रावण के विश्व विजय के अभियान के समय मय दानव ने रावण को अपनी पुत्री दे दी थी। जब रावण ने सीता का हरण कर लिया तो मंदोदरी ने बार बार रावण को समझाया कि वो सीता को सम्मान सहित लौटा दें। रावण की मृत्यु के पश्चात् मंदोदरी के करुण रुदन का जिक्र आता है। श्रीराम के सलाह पर रावण के छोटे भाई विभीषण ने मंदोदरी से विवाह कर लिया था।
  • तारा: तारा समुद्र मंथन के समय निकली अप्सराओं में से एक थी। ये वानरराज बालि की पत्नी और अंगद की माता  थी। रामायण में हालाँकि इनका जिक्र बहुत कम आया है लेकिन ये अपनी बुधिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थीं। पहली बार बालि से हारने के बाद जब सुग्रीव दुबारा लड़ने के लिए आया तो इन्होने बालि से कहा कि अवश्य हीं इसमें कोई भेद है लेकिन क्रोध में बालि ने इनकी बात नहीं सुनी और मारे गए। बालि के मृत्यु के पश्चात् इनके करुण रुदन का वर्णन है। श्रीराम की सलाह से बालि के छोटे भाई सुग्रीव से इनका विवाह होता है। जब लक्षमण क्रोध पूर्वक सुग्रीव का वध करने कृष्किन्धा आये तो तारा ने हीं अपनी चतुराई और मधुर व्यहवार से उनका क्रोध शांत किया।
  • कुन्ती: ये श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन थी। इनका असली नाम पृथा था लेकिन महाराज कुन्तिभोज ने इन्हें गोद लिया था जिसके कारण इनका नाम कुंती पड़ा। इनका विवाह भीष्म के भतीजे और ध्रितराष्ट्र के छोटे भाई पांडू से हुआ। विवाह से पूर्व भूलवश इन्होने महर्षि दुर्वासा के वरदान का प्रयोग सूर्यदेव पर कर दिया जिनसे कर्ण का जन्म हुआ लेकिन लोकलाज के डर से इन्होने कर्ण को नदी में बहा दिया। पांडू के संतानोत्पत्ति में असमर्थ होने पर उन्होंने उसी मंत्र का प्रयोग कर धर्मराज से युधिष्ठिर, वायुदेव से भीम और इन्द्र से अर्जुन को जन्म दिया। इन्होने पांडू की दूसरी पत्नी माद्री को भी इस मंत्र की दीक्षा दी जिससे उन्होंने अश्वनीकुमारों से नकुल और सहदेव को जन्म दिया।
  • द्रौपदी: ये पांचाल के राजा महाराज द्रुपद की पुत्री, धृष्टधुम्न की बहन और पांचो पांडवो की पत्नी थी। श्रीकृष्ण ने इन्हें अपनी मुहबोली बहन माना। ये पांडवों के दुःख और संघर्ष में बराबर की हिस्सेदार थी। पांच व्यक्तियों की पत्नी होकर भी इन्होने पतिव्रत धर्म का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। कौरवों ने इनका चीरहरण करने का प्रयास किया और ये इनके पतिव्रत धर्म का हीं प्रभाव था कि स्वयं श्रीकृष्ण को इनकी रक्षा के लिए आना पड़ा। श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को इन्होने हीं पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी। यही नहीं, जब पांडवों ने अपने शरीर को त्यागने का निर्णय लिया तो उनकी अंतिम यात्रा में ये भी उनके साथ थीं। 
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