15 अक्तूबर 2018

नवरात्रि पूजा विधि

पूरे वर्ष में चार बार नवरात्रि का आगमन होता है। बुधवार से आरंभ होने वाले नवरात्र को शारदीय नवरात्र के नाम से जाना जाता है । "नवरात्र" जगदंबा की नवरात्रि ९ रात्रियों से संबंधित है। ९ दिन तक माँ भगवती की के अलग रूप की पूजा होती है। ९ दिनों में भगवती के नौ रूपों की पूजा कर भक्त अपने जीवन में सुख शांति एवं आनंद की प्राप्ति करते हैं भगवती के नाम एवं रूप अलग अलग हैं लेकिन इनका संबंध वास्तव में भगवती माता पार्वती से है। माता पार्वती ही अलग अलग समय में अपने भक्तों के कल्याण के लिए अलग-अलग रूप धारण कर संसार में प्रकट होकर लीला करती है श्री गणेश जी की माता पार्वती की पूजा करने से मनुष्य को समस्त मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाती है किसी भी प्रकार की समस्या हो इन नवरात्रों में मां जगदंबा की आराधना करने से समस्त समस्याओं का निवारण हो जाता है। भगवती के नौ रूप इस प्रकार हैं:

12 अक्तूबर 2018

यमराज

महर्षि कश्यप एवं अदिति पुत्र सूर्यनारायण का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ। उनसे उन्हें वैवस्वत मनु, यम, अश्वनीकुमार, रेवंत नमक पुत्र एवं  यमी (यमुना) नामक पुत्री की प्राप्ति हुई। यमुना ने ही सर्वप्रथम यम को धागा बांध कर रक्षाबंधन का आरम्भ किया था। सूर्यदेव के तेज से भयभीत हो संज्ञा ने अपनी एक प्रतिलिपि छाया के रूप में वहाँ छोड़ अपने पिता विश्वकर्मा के पास आ गयी। छाया से भी सूर्यदेव को सावर्णि मनु एवं शनि नामक पुत्र एवं भद्रा (विष्टि) और ताप्ती नामक पुत्री की प्राप्ति हुई। जब सूर्यदेव को संज्ञा के छल के बारे में पता चला तो उन्होंने उसे श्राप दिया कि उसका पुत्र मृत्यु के सामान भयंकर होगा। यमराज दस दिक्पालों में से एक माने जाते हैं जो दक्षिण दिशा के स्वामी हैं। भगवान ब्रह्मा ने उन्हें यमलोक का अधिपति एवं मृत्यु का देवता बनाया। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के पश्चात यमदूत व्यक्ति की आत्मा को यमराज के समक्ष लाते हैं और उनके मंत्री श्री चित्रगुप्त उस मनुष्य के पाप और पुण्य का लेखा-जोखा देख कर उसे स्वर्ग अथवा नर्क में भेजते हैं। इसी कारण यमराज को धर्मराज भी कहते हैं क्यूंकि वे धर्मपूर्वक प्राणियों के साथ न्याय करते हैं। ऋग्वेद में लिखा है कि यमराज यमलोक में उसी प्रकार स्थित होते हैं जिस प्रकार नारायण वैकुण्ठ में। जो भी जीवात्मा यमलोक के दक्षिण द्वार तक महाभयंकर वैतरणी नदी को पार कर के पहुँचती है, उसे शंख, चक्र, पद्म एवं गदाधारी यमदेव के दर्शन होते हैं। 

10 अक्तूबर 2018

नवरात्रि

आज से भारत में नवरात्रि का आरम्भ हो गया है जो आने वाले दस दिनों तक चलेगा और विजयादशमी (दहशरा) पर समाप्त होगा। ये भारत के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है और इसमें देवी पार्वती (दुर्गा) के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इन सभी का पूजन बारी-बारी से किया जाता है और सभी का वाहन सिंह कहा जाता है। नवरात्रि के पहले तीन दिन माँ दुर्गा की पूजा के रूप में मनाया जाता है जहाँ उनके विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। पहले दिन बालिकाओं की, दूसरे दिन युवतियों की और तीसरे दिन परिपक्व महिलाओँ की पूजा करने का विधान है। पर्व के चौथे दिन देवी लक्ष्मी, पाँचवे दिन माँ सरस्वती और छठे दिन शांति देवी की पूजा की जाती है। सातवें दिन पुनः देवी सरस्वती की पूजा होती है और आठवें दिन माँ दुर्गा को बलिदान स्वरुप एक यज्ञ किया जाता है। नौवां दिन अंतिम पूजा का दिन होता है जिसे महानवमी भी कहते हैं। इस दिन नौ देवियों के प्रतीक स्वरुप नौ किशोरी कन्याओं की पूजा की जाती है। उनके चरण धोने के बाद उन्हें मिष्ठान एवं वस्त्र उपहार स्वरुप दिए जाते हैं। ये नौ देवियां हैं:

7 अक्तूबर 2018

जब हनुमान कुम्भकर्ण से शर्त हार गए

लंका में युद्ध अपनी चरम सीमा पर था। श्रीराम की सेना आगे बढ़ती ही जा रही थी और रावण के अनेकानेक महारथी रण में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। अब तक रावण भी समझ गया था कि श्रीराम की सेना से जीतना उतना सरल कार्य नहीं है जितना वो समझ रहा था। तब उसने अपने छोटे भाई कुम्भकर्ण को जगाने का निर्णय लिया जो ब्रह्मदेव के वरदान के कारण ६ महीने तक सोता रहता था। जब कुम्भकर्ण नींद से जागा तो रावण ने उसे स्थिति से अवगत कराया। इसपर कुम्भकर्ण ने रावण को उसके कार्य के लिए खरी-खोटी तो अवश्य सुनाई किन्तु अपने भाई की सहायता से पीछे नहीं हटा। जब वो रणभूमि में पहुँचा तो उसकी काया देख कर वानर सेना में खलबली मच गयी और राक्षस सेना निश्चिंत हो गयी। कुम्भकर्ण इस युद्ध को अधिक खींचना नहीं चाहता था इसी कारण उसने सीधे श्रीराम से युद्ध करने की ठानी किन्तु वानर वीरों के होते हुए वो श्रीराम तक कैसे पहुँचता। लगभग पूरी वानर सेना उसके भय से भाग खड़ी हुई किन्तु वानरों में जो महारथी थे उन्होंने कुम्भकर्ण को रोकने का प्रयास किया। सबसे पहले नल, फिर नील, द्विविन्द आदि वीरों ने कुम्भकर्ण को रोकने का प्रयास किया किन्तु उसके बल से पार ना पा सके। फिर वानरराज सुग्रीव एवं अंगद ने सम्मलित रूप से कुम्भकर्ण को रोकने का प्रयास किया जिससे कुम्भकर्ण थोड़ा विचलित हुआ किन्तु शीघ्र ही वो अपनी गति से आगे बढ़ता ही रहा। तब ऋक्षराज जामवंत ने एक भीषण मुष्टि प्रहार कुम्भकर्ण पर किया जिससे वो थोड़ी देर रुका और उसने जामवंत के बल की प्रशंसा की किन्तु वानर सेना का संहार जारी रखा। 

4 अक्तूबर 2018

नंदी

प्राचीन काल में एक ऋषि थे "शिलाद"। उन्होंने ये निश्चय किया कि वे ब्रह्मचारी ही रहेंगे। जब उनके पित्तरों को ये पता कि शिलाद ने ब्रह्मचारी रहने का निश्चय किया है तो वे दुखी हो गए क्यूँकि जबतक शिलाद को पुत्र प्राप्ति ना हो, उनकी मुक्ति नहीं हो सकती थी। उन्होंने शिलाद मुनि के स्वप्न में ये बात उन्हें बताई। शिलाद विवाह करना नहीं चाहते थे किन्तु अपने पित्तरों के उद्धार के लिए पुत्र प्राप्ति की कामना से उन्होंने देवराज इंद्र की तपस्या की। इंद्र ने उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर कहा कि "हे ऋषि! मैं आपकी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ किन्तु आपके मन में जो इच्छा है उसे मैं पूरा नहीं कर सकता। इसी कारण आप महादेव को प्रसन्न करें।" इंद्र के सुझाव अनुसार शिलाद मुनि ने फिर भगवान शिव की कई वर्षों तक घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से महादेव प्रसन्न हुए और उन्हें अपने सामान ही एक पुत्र की प्राप्ति का वरदान दिया। उसके कुछ समय शिलाद ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ किया और भूमि को जोतते समय उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसे देख कर उन्हें अत्यंत आनद हुआ और इसी कारण उन्होंने उसका नाम नंदी रखा। नंदी का अर्थ भी प्रसन्नता या आनंद है। वैसे तो शिलाद ने नंदी को अपने पित्तरों के उद्धार के लिए प्राप्त किया था किन्तु उसके जन्म के बाद वे पुत्र मोह में पड़ गए और अपने पुत्र से अत्यंत प्रेम करने लगे। एक दिन "मित्र" एवं "वरुण" नामक दो ऋषि शिलाद मुनि के आश्रम में आये। वहाँ पर शिलाद और नंदी ने उनकी खूब सेवा की जिससे प्रसन्न होकर दोनों ने शिलाद को तो दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया किन्तु नंदी को बिना आशीर्वाद दिए वे जाने लगे। तब शिलाद मुनि ने दोनों से पुछा कि उन्होंने उनके पुत्र को आशीर्वाद क्यों नहीं दिया। इसपर दोनों ने बताया कि नंदी अल्पायु है और १६ वर्ष पूर्ण करते ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। ये सुनकर शिलाद विलाप करने लगे किन्तु नंदी ने हँसते हुए कहा - "हे पिताश्री! आप व्यर्थ ही दुखी हो रहे हैं। मेरा जन्म महादेव के आशीर्वाद से हुआ है और अब वही मुझे मृत्यु से भी बचाएंगे।" ऐसा कहकर नंदी महादेव की तपस्या के लिए वन में चले गए।

1 अक्तूबर 2018

श्रीकृष्ण के अन्य सात भाइयों के नाम

श्रीकृष्ण के जन्म की कहानी हम सभी जानते हैं। जब कंस को ये पता चला कि उसकी चचेरी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र उसका वध करेगा तो उसने देवकी को मारने का निश्चय किया। वसुदेव के आग्रह पर वो उन दोनों के प्राण इस शर्त पर छोड़ने को तैयार हुआ कि वे दोनों अपने नवजात शिशु को पैदा होते ही उसके सुपुर्द कर देंगे। दोनों ने उनकी ये शर्त ये सोच कर मान ली कि जब कंस उनके नजात शिशु का मुख देखेगा तो प्रेम के कारण उन्हें मार नहीं पाएगा। किन्तु कंस के ह्रदय में ममता थी ही नहीं। उसने एक-एक कर कंस ने देवकी की छः संतानों को जन्मते ही मृत्यु के घाट उतार दिया। सातवीं संतान को योगमाया ने देवकी की गर्भ से वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया इसी लिए वे संकर्षण कहलाये और बलराम के नाम से विश्व-विख्यात हुए। उनकी आठवीं संतान के रूप में स्वयं श्रीहरि विष्णु ने अवतार लिया। किन्तु क्या आपको कृष्ण एवं बलराम के अतिरिक्त उनके ६ अन्य पुत्रों के नाम ज्ञात हैं? अगर नहीं तो हम आपको देवकी के आठों संतानों के नाम बताते हैं। 
  1. कीर्तिमान् 
  2. सुषेण 
  3. भद्रसेन 
  4. ऋृजु 
  5. सम्मर्दन 
  6. भद्र 
  7. संकर्षण (बलराम)
  8. श्रीकृष्ण 

29 सितंबर 2018

लक्ष्मी एवं अलक्ष्मी (दरिद्रा) का विवाद

दीपावली के दिन देवी लक्ष्मी एवं श्रीगणेश के साथ कुबेर जी की भी पूजा की जाती है। उनकी उत्पत्ति समुद्र मंथन से बताई जाती है जिन्होंने समुद्र से निकलने के पश्चात नारायण को अपना वर चुना। प्राचीन ग्रंथों में लक्ष्मी जी के साथ अलक्ष्मी (दरिद्रा) जी का भी उल्लेख मिलता है। अलक्ष्मी जी को नृति एवं दरिद्रा नाम से भी जाना जाता है। लक्ष्मी जी के प्रभाव का मार्ग धन-संपत्ति, प्रगति का होता है वही अलक्ष्मी जी दरिद्रता, पतन,अंधकार का प्रतीक होती है। एक बार लक्ष्मी और अलक्ष्मी में संवाद हुआ जिसमे दोनों एक दूसरे का विरोध करते हुए स्वयं को श्रेष्ठ बताने लगी।

27 सितंबर 2018

श्रीगणेश के १०८ नाम

  1. बालगणपति
  2. भालचन्द्र
  3. बुद्धिनाथ
  4. धूम्रवर्ण
  5. एकाक्षर
  6. एकदंत
  7. गजकर्ण
  8. गजानन
  9. गजनान
  10. गजवक्र
  11. गजवक्त्र
  12. गणाध्यक्ष
  13. गणपति
  14. गौरीसुत
  15. लंबकर्ण
  16. लंबोदर
  17. महाबल
  18. महागणपति
  19. महेश्वर
  20. मंगलमूर्ति
  21. मूषकवाहन
  22. निदीश्वरम
  23. प्रथमेश्वर
  24. शूपकर्ण
  25. शुभम
  26. सिद्धिदाता
  27. सिद्धिविनायक
  28. सुरेश्वरम
  29. वक्रतुंड

25 सितंबर 2018

सती देवस्मिता

एक वैश्य जिसका नाम धर्मगुप्त था देवनगरी में रहता था। उसकी कन्या का नाम देवस्मिता था जो बहुत ही सुशील, सच्चरित्र कन्या थी। साथ ही साथ वो भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी। समय के साथ देवस्मिता के रूप और गुण की चर्चा दूर-दूर तक फ़ैल गयी और फिर धर्मगुप्त ने सही समय आने पर उसका विवाह पास ही ताम्रलिपि नगर के एक धार्मिक युवक मणिभद्र से कर दिया। देवस्मिता पतिव्रता थी। घर का सारा काम -काज संभालने के साथ ही वह पति और सास- ससुर की खूब सेवा करती थी तथा अतिथियों का स्वागत सत्कार पूरी निष्ठा से करती थी जिससे सब लोग उससे प्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उसके ससुर का देहांत हो गया जिससे सारी गृहस्थी का बोझ मणिभद्र पर आ गया और उसे देवस्मिता को छोड़ व्यापार के लिए विदेश जाना पड़ा। वह कटाह नामक नगर में जाकर रहने लगा। दुर्भाग्यवश वहाँ कुछ ऐसे दुराचारी थे जो शराब पी कर नशे में स्त्रियों की निन्दा करते थे।मणिभद्र को यह बात नही रुची और उसने उन्हें समझाने का प्रयत्न किया। तब उनमे से एक शराबी ने कहा - "बालक! तुम्हे दुनियादारी का क्या ज्ञान। तुम भी तो अपनी स्त्री को छोड़ कर यहाँ पड़े हुए हो। क्या पता तुम्हारे पीठ पीछे वो क्या-क्या करती हो।" अपनी पत्नी के विषय में ऐसी बातें सुनकर मणिभद्र उनपर बहुत बिगड़ा और कहा - "जैसे कीचड में लिपटे हुए शूकर को गंदगी ही प्रिय होती है उसी तरह मदिरा के मद में धुत्त तुम पापियों को सभी स्त्रियां चरित्रहीन ही दिखती है। किन्तु मैं अपनी पत्नी को भली-भांति जनता हूँ। वो तो देवी है और ऐसी सती स्त्री के बारे में बुरी बात करना भी पाप है।"