16 जुलाई 2018

जब दत्तात्रेय ने राजा को सत्य से अवगत कराया

प्राचीन काल में एक बड़े सदाचारी राजा थे जीमकेतु। उनके राज्य में सभी बिना किसी चिंता के निवास करते थे। पूरी प्रजा सुखी एवं समपन्न थी। जीमकेतु ने अपने सामर्थ्य से अतुल धन संचित किया। उसकी वीरता और सम्पन्नता के कारण आस-पास के राज्य में उसका कोई शत्रु ना रहा। समस्त जगत में उसकी प्रशंसा होने लगी। इतना प्रचुर धन और सम्मान देखकर दुर्भाग्यवश उसके मन में अपनी अथाह संपत्ति का अहंकार पैदा हो गया। राज-काज तो वो पहले जैसा करता था लेकिन धन के अहंकार के कारण उसके स्वाभाव में परिवर्तन आ गया। जिस राजसभा में कभी योग्य व्यक्ति हुआ करते थे वो अब चाटुकारों से भर गयी। जीमकेतु महर्षि दत्तात्रेय के महान भक्त थे और वर्षों से उनके दर्शनों के लिए नित्य सुबह उनकी पूजा और ध्यान किया करते थे। इतने बड़े भक्त होने के बाद भी इतने वर्षों में दत्तात्रेय ने कभी उन्हें अपने दर्शन नहीं दिए किन्तु जब उन्होंने देखा कि उनका ये भक्त अब अहंकार के वश में आ गया है तो उन्हें जीमकेतु पर दया आयी और उन्होंने उसे सत्य का मार्ग दिखने का निर्णय किया। 

13 जुलाई 2018

भागलपुर के खिरनी घाट का श्री त्रिलोकीनाथ शिव मंदिर - भाग २

पिछले लेख में मैंने आपको खिरनी घाट के विशाल वटवृक्ष और एक नाग के बारे में बताया था। आज वहाँ के बारे में अन्य जानकारी दूंगा। वैसे तो खिरनी घाट में कई छोटे-बड़े मंदिर है और सबसे बड़ा मंदिर तो वहाँ देवी माँ का है लेकिन वहाँ का सबसे प्रसिद्ध मंदिर वही भगवान शिव का मंदिर है जहाँ पर वहाँ के पंडितों के अनुसार वो नाग रहा करता था। जब मैं ये सब जानकारी ले रहा था और उस मंदिर के बारे में मैंने उन पंडितजी से पूछा तो उन्होंने कहा कि उस मंदिर के पास एक अन्य पंडित दी मिलेंगे वो इसके बारे में और अधिक विस्तार से बता सकते हैं। मैं जब वहाँ पहुंचा तो देखा एक बुजुर्ग पर मजबूत व्यक्ति रुद्राक्ष की माला पहने बालू और सीमेंट के बीच एक छोटा स्थान बनाने में व्यस्त है। मैंने उससे पूछा कि ये जगह क्यों बना रहे हैं तो उसने कहा कि यहाँ पर नंदी की प्रतिमा की स्थापना की जाएगी। फिर मैंने उससे शिव मंदिर के बारे में जानना चाहा तो उसने काफी अच्छी प्रतिक्रिया दी। मैंने उससे पूछा कि आप पंडित होते हुए ये सब काम भी कर लेते हैं? तब उसने हँसते हुए कहा कि वो ब्राह्मण नहीं है। एक तरह से उसी ने इस मंदिर की स्थापना की है और इसके रख-रखाव का काम भी करता है इसी कारण लोगो उसे भी भी पंडितजी ही बुलाते हैं। 

11 जुलाई 2018

रघुपति राघव राजा राम - वास्तविक भजन

महात्मा गांधी गीता का एक श्लोक हमेशा कहा करते थे: अहिंसा परमो धर्मः, जबकि पूर्ण श्लोक इस प्रकार है:

अहिंसा परमो धर्मः। 
धर्म हिंसा तदैव च ।।

अर्थात अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है, किन्तु धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उससे भी श्रेष्ठ है। वे श्रीराम का एक प्रसिद्ध भजन भी गाते थे:

रघुपति राघव राजाराम 
पतित पावन सीताराम 
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम 
सब को सन्मति दे भगवान 

आपको जानकर हैरानी होगी कि इसमें "अल्लाह" शब्द गांधीजी ने अपनी ओर से जोड़ा। इस भजन के असली जनक थे "पंडित लक्ष्मणाचार्य"। मूल भजन "श्री नमः रामनायनम" नामक हिन्दू ग्रंथ से लिया गया है जो इस प्रकार है:

रघुपति राघव राजाराम 
पतित पावन सीताराम 
सुंदर विग्रह मेघाश्याम 
गंगा तुलसी शालीग्राम 
भद्रगिरीश्वर सीताराम 
भगत-जनप्रिय सीताराम 
जानकीरमणा सीताराम 
जयजय राघव सीताराम

दुख की बात ये है कि बड़े-बड़े पंडित तथा वक्ता भी इस भजन को गलत गाते हैं, यहां तक कि मंदिरो में भी। हालांकि ये लेख किसी भी रूप में महात्मा गांधी के प्रति असम्मान प्रकट करने के लिए नही है पर किसी भी हिन्दू धर्मग्रंथ से इस प्रकार की छेड़छाड़ भी उचित नही है और हम सबको इसके प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है।

10 जुलाई 2018

रहस्यलोक सा भागलपुर का खिरनी घाट - भाग १

इस बार की भागलपुर यात्रा में ये आखिरी मंदिर है। खिरनी घाट भागलपुर के सबसे महत्वपूर्ण घाटों में से एक है जो बड़ी खंजरपुर के पास स्थित है। बचपन में मैं पता नहीं कितनी बार वहाँ गया हूँ। हालाँकि उस समय शाम के वक्त वहाँ जाने में डर भी लगता था क्यूंकि वो इलाका बीच शहर में होते हुए भी थोड़ा अगल-थलग है और वहाँ का माहौल भी थोड़ा अजीब है। बचपन में गंगा कई बार सीढ़ियों को पर कर मंदिर परिसर में चली आती थी किन्तु अब भागलपुर के अन्य घाटों की तरह यहाँ भी गंगा सूख गयी है। हालाँकि माहौल आज भी यहाँ का वैसा ही शांत है। पहले मैंने सोचा कि इसके बारे में सभी जानकारी एक ही लेख में दूंगा किन्तु फिर लगा कि लेख कुछ लम्बा हो जाएगा तो मैंने इस लेख को दो भागों में बाँटने का निर्णय किया। एक लेख जिसमे वहाँ के मुख्य शिव मंदिर के बारे में जानकारी दी जाएगी और एक ये लेख जिसमे वहाँ उपस्थित एक विशाल पेड़ और एक रहस्य्मय नाग की कहानी है। शिव मंदिर के बारे में मैं बाद में एक और लेख लिखूंगा आज उस नाग की कहानी ही जानते हैं। आज जब ये लेख लिख रहा हूँ तो अचानक याद आता है कि आज से करीब १४-१५ साल पहले में मैं एक बार इस मंदिर में गया था तो अचानक एक बड़ा साँप देख कर उलटे पाँव लौट आया था। उसके बाद कई सालों तक मैंने उस मंदिर की ओर रुख नहीं किया। अब जिस नाग के बारे में मुझे अब पता चला जिसके लिए मैं ये लेख लिख रहा हूँ वो वही साँप था या कोई दूसरा मैं कह नहीं सकता। वैसे भी उस इलाके में साँपों का मिलना आम बात है।

6 जुलाई 2018

समदर्शी मनुष्य का महत्त्व

महर्षि पतंजलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों का सर्वथा रुक जाना ही योग है। यही वो स्थिति है जब व्यक्ति द्रष्टा भाव से जगत को निहारता भर है किन्तु उसमे लिप्त नहीं होता। वो सब कुछ देखता हुआ भी यही समझता है कि सब इन्द्रियां अपने-अपने कर्म को कर रही है और वह स्वयं कुछ नहीं कर रहा। अतः उसे किसी चीज  का क्षोभ अथवा प्रसन्नता नहीं होती। वो ना दुखी होता है और ना ही आनंदित, ना चीजों में आसक्त होता है और ना ही विरक्त। वह तो आत्मविभोर हो कर स्वयं में आनंदित रहता है। फिर चाहे वन हो या नगर, महल हो या श्मशान, उसके लिए सब सामान है। वह सर्वत्र सुखी और निर्भय रहता है। इस प्रकार निरंतर आत्मभाव, ब्रह्मभाव से परमानन्द में मग्न व्यक्ति कही सम्मानित तो कही अपमानित होकर भी समदर्शी बने रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए आचार्य शंकर ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ "विवेक चूड़ामणि" में कहा है -

अपि कुर्वन्नकुर्वाणश्चभोक्ता फलभोग्यापि।
शरीरयाप्यशरीरयेष परिछिन्नोपि सवर्गः।।
अशरीरं सदा संतमिमं ब्रह्मविन्दं क्वचित। 
प्रियप्रिये न स्पृशतत्सथैव च शुभाशुभे।।
क्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेतकेवलात्मना।। 
शिव एवं स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः।।

अर्थात सदा ब्रह्मभाव, साक्षीभाव में स्थित महात्मा सब कुछ करता हुआ भी अकर्ता है, नाना प्रकार के फल भोगता हुआ भी अभोक्ता है, शरीरधारी होने पर भी अशरीरी है एवं परिच्छिन्न होने पर भी सर्वव्यापी है। सदा अशीर भाव में स्थित रहने से इस ब्रह्मवेत्ता को प्रिय अथवा अप्रिय, शुभ अथवा अशुभ कभी छू नहीं सकते। जो लक्ष्य और अलक्ष्य दोनों दृष्टियों को त्याग कर केवल एक आत्मरूप में ही स्थित रहता है, वो ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महापुरुष साक्षात् शिव ही है।

4 जुलाई 2018

२१० साल से अधिक पुराना भागलपुर का दुग्धेश्वरनाथ महादेव

आप भागलपुर के किसी भी व्यक्ति से अगर ये पूछे कि इस शहर का सबसे व्यस्त और भीड़-भाड़ वाला इलाका कौन सा है तो वो वेराइटी चौक का नाम लेगा। भागलपुर का मुख्य बाजार खुद ही बेहद भीड़ वाला इलाका है और इस बाजार के बीचोंबीच स्थित इस चौक पर तो पैदल चलना भी मुश्किल है। इसी चौंक पर एक शिव मंदिर है जिसपर शायद ही वहाँ से गुजरने वाला कोई व्यक्ति सर ना झुकाता हो। वैसे तो यहाँ हर दिन भीड़ रहती है लेकिन सोमवार के दिन तो इसके आस-पास से निकलना मुश्किल हो जाता है। ये शिव मंदिर भागलपुर के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है लेकिन कितना पुराना, ये जानने के लिए मैं वहाँ गया। मेरा जन्म भागलपुर में ही हुआ है और इतने सालों में मैं एक बार भी उस मंदिर के अंदर नहीं गया था। तो इस कारण मैं पहली बार उस मंदिर के अंदर जाने वाला था। सौभाग्य से जब मैं वहाँ पहुँचा तो मंदिर बंद होने वाला था और अधिक भीड़ नहीं थी। अच्छी बात ये थी कि वहाँ के पुजारी भी वहाँ मौजूद थे जिनसे बात की जा सकती थी। वो एक युवा पुजारी था जो अपने फेसबुक पर व्यस्त था। मैंने उससे बात करना शुरू किया और बताया कि मेरे धार्मिक वेबसाइट के लिए मैं कुछ जानकारी जुटा रहा हूँ। उसने बहुत अच्छी प्रतिक्रिया दी और फिर हम बात करने लगे। 

29 जून 2018

वेदों में प्रतिदिन पृथ्वी से क्षमा माँगने को क्यों कहा गया है?

बहुत काल पहले विद्वानों की एक सभा में शास्त्रार्थ चल रहा था। उसी समय एक प्रश्न उठा कि सृष्टि में वो कौन है जिसकी सहनशीलता अपार है? तब कई विद्वानों ने अलग-अलग तर्क रखे। एक ने कहा कि जल सबसे सहनशील है क्यूंकि उसपर चाहे कितने प्रहार करो वो अंततः शांत हो जाता है। तब दूसरे ने वायु को सहनशील बताया जो जीव मात्र को जीने की शक्ति प्रदान करता है। तीसरे की दृष्टि में अग्नि सर्वाधिक सहनशील थी क्यूंकि वो संसार की समस्त अशुद्धिओं को नष्ट कर देती है। किसी ने आकाश को सहनशील बताया कि कितने आपदाओं से वो हमारी रक्षा करती है और जीवन के लिए जल भी प्रदान करती है। तब अंततः ऋषि होत्र ने कहा - "हे महानुभावों! आपने जिन तत्वों के बारे में कहा है वो निश्चय ही सहनशील है किन्तु मेरे विचार से पृथ्वी इन सब से अधिक सहनशील है।" सभी के पूछने पर उन्होंने इस प्रकार इसकी व्याख्या की:

27 जून 2018

भागलपुर का ५१ साल पुराना "जय हनुमान मंदिर"

जब आप भागलपुर (बिहार) के खंजरपुर नामक स्थान पहुँचते हैं तो आपको एस.बी.आई. क्षेत्रीय कार्यालय के बाद और एस.एम. कॉलेज से पहले, बिलकुल चौराहे पर एक त्रिकोणीय भूमि पर स्थित एक छोटा किन्तु पुराना और महत्वपूर्ण हनुमान मंदिर दिखता है। इस मंदिर का नाम ही "जय हनुमान मंदिर" है। इस मंदिर की स्थापना आज से ५१ वर्ष पूर्व १९६७ में की गयी थी। इससे पहले उस खाली स्थान पर शहर के रिक्शेवालों का जमावड़ा रहता था जो मंदिर बनने के बाद उसी जगह थोड़ा बाईं ओर चला गया है। पहले वहाँ केवल हनुमानजी की मूर्ति स्थापित की गयी लेकिन बाद में वाहनों की अधिक आवाजाही को देखते हुए एक छोटा सा मंदिर बना दिया गया। ये मंदिर स्वायत्त है और इसके अपने पुजारी हैं जिनपर इस मंदिर की जिम्मेदारी है। पहले ये मंदिर २४ घंटे खुला रहता था किन्तु अब रात्रि के समय इसे बंद कर दिया जाता है। हालाँकि उसके बाद भी आप बाहर से मूर्ति के दर्शन कर सकते हैं। ये मंदिर सुबह ५ बजे से रात्रि ९ बजे तक सबके लिए खुला रहता है और इस मंदिर में किसी भी जाति अथवा धर्म के लोग बेखटक प्रवेश कर सकते हैं। यहाँ दिन में दो बार सुबह और शाम नियमित आरती  होती है। महिला कॉलेज के निकट होने के कारण यहाँ दिन भर भीड़ लगी रहती है।

25 जून 2018

कालनेमि - एक ऐसा दैत्य जिसने कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा

सतयुग में दो महाशक्तिशाली दैत्य हुए - हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष। ये इतने शक्तिशाली थे कि इनका वध करने को स्वयं भगवान विष्णु को अवतार लेना पड़ा। हिरण्याक्ष ने अपनी शक्ति से पृथ्वी को सागर में डुबो दिया। तब नारायण ने वाराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध किया। उसके दो पुत्र थे - अंधक एवं कालनेमि जो उसके ही समान शक्तिशली थे। जब तक उनके चाचा हिरण्यकशिपु जीवित रहे, उन्होंने उनके संरक्षण में जीवन बिताया किन्तु जब नारायण ने हिरण्यकशिपु को नृसिंह अवतार लेकर मारा तब दोनों भाई ने प्रतिशोध लेने की ठानी। अंधक अपनी महान शक्ति के मद में आकर देवी पार्वती से धृष्टता कर बैठा और महारुद्र के हाथों मारा गया। तब कालनेमि ने महादेव से प्रतिशोध लेने हेतु अपनी पुत्री वृंदा, जिसे ये अवतार प्राप्त था कि उसके होते उसके पति की मृत्यु नहीं हो सकती, उसका विवाह जालंधर नमक दैत्य से कर दिया जो महादेव का घोर शत्रु था। हालाँकि वृंदा का सतीत्व भी जालंधर को बचा नहीं सका और वो नारायण के छल के कारण भगवान शिव के हाथों मारा गया। इसके बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। जब कालनेमि को विष्णु के छल और अपनी पुत्री और जमता के मृत्यु का समाचार मिला तो उसने नारायण से प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा की।