संदेश

पौराणिक काल में धन/संख्या की मापन विधि

चित्र
महाभारत में एक प्रसंग आता है जब जुए में युधिष्ठिर हार रहे होते हैं तब दुर्योधन उनसे व्यंग करते हुए पूछता है कि क्या अब आपके पास धन ख़त्म हो गया? तब युधिष्ठिर क्रोधित होते हुए अपने पास संचित धन की व्याख्या करते हैं। जहाँ दुर्योधन ने अपने पास संचित धन की संख्या "पद्म" बताई, वहीं युधिष्ठिर कहते हैं कि उनके पास "परार्ध" से भी अधिक धन है। आज के युग में हम धन को मिलियन, बिलियन, ट्रिलियन आदि में मापते हैं किन्तु प्राचीन काल में धन के मापन की विधि अलग थी। इनमे से कुछ जैसे इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि तो हमने अपने विद्यालय के दिनों में पढ़ा है किन्तु अन्य कई परिमाण है जिसके बारे में हम नहीं जानते। तो आइये, इस लेख में हम उन परिमाणों के बारे में जानते हैं।
इकाई            १ दहाई             १० (१०^१)सैकड़ा            १०० (१०^२) सहस्त्र            १००० (१०^३)दस सहस्त्र         १०००० (१०^४)लक्ष              १००००० (१०^५)दस लक्ष           १०००००० (१०^६)करोड़             १००००००० (१०^७)दस करोड़          १०००००००० (१०^८)अरब              १००००००००० (१०^९)दस अरब           १०००००००००० (१०^१०)खर्…

मकर संक्रांति की कथा एवं उसका महत्त्व

चित्र
सर्व-प्रथम आप सभी लोगों को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें। आज पूरा देश और कई अन्य जगह विदेशों में भी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा है। तो आइये आज हम मकर संक्रांति का महत्व जानते हैं और समझते हैं कि ये क्यों मनाया जाता है। मकर संक्रांति से जुडी कुछ पौराणिक कथाएं भी हैं और कई ऐसे पौराणिक प्रसंग हैं जो आज के ही दिन घटित हुए थे। मकर संक्रांति के दिन ही भगवान सूर्य नारायण धनु राशि को छोड़ कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। ऐसी मान्यता है कि आज के ही दिन सूर्यदेव अपनी नाराजगी त्याग कर अपने पुत्र शनिदेव से मिलने जाते हैं जो कि मकर राशि के स्वामी हैं। धनु और मकर राशि के इसी संयोग को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।

जब दुर्वासा ऋषि के श्राप से तीनों लोक श्रीहीन हो गए

चित्र
महर्षि दुर्वासा महामुनि अत्रि एवं सती अनुसूया के कनिष्ठ पुत्र थे जो भगवान रूद्र के अंश से जन्मे थे। वे चन्द्र एवं दत्तात्रेय के भाई थे और पूरे विश्व में अपने क्रोध के कारण प्रसिद्ध थे। श्राप तो जैसे इनके जिह्वा के नोक पर रखा रहता था। पृथ्वी पर ना जाने कितने मनुष्य उनके क्रोध और श्राप का भाजन बनें किन्तु इन्होने स्वयं देवराज इंद्र को भी नहीं छोड़ा।

एक बार ऋषि दुर्वासा वन में भ्रमण करने को निकले। अचानक उन्हें एक बहुत तेज व अनोखी सुगंध का अनुभव हुआ। वो सुगंध इतनी अच्छी थी कि दुर्वासा स्वयं को रोक नहीं पाए एवं सुगंध की दिशा में बढ़ने लगे। थोड़ी दूर चलने के पश्चात उन्होंने देखा कि एक बहुत रूपवती नारी वहीं सरोवर के तट पर बैठी हुई है। उसके गले में एक अद्भभुत पुष्प हार था जो प्रकाश की भांति जगमगा रहा था और ये मनभावन सुगंध उसी हार से निकल रही थी। एक अकेली नारी को इस प्रकार वन में बैठा देख उन्हें विस्मय हुआ और वे उसके पास पहुँचे। एक जटाजूट योगी को इस प्रकार अपने पास आते देख उस कन्या ने तत्काल उठ कर उन्हें प्रणाम किया।

पौराणिक काल के योद्धाओं का स्तर

चित्र
हम लोगों ने कई बार रामायण, महाभारत एवं अन्य पौराणिक कहानियों में योद्धाओं के ओहदे के बारे में पढ़ा है। सबसे आम शब्द जो इन पुस्तकों में आता है वह है "महारथी" और ये शब्द इतना आम बना  दिया गया है कि किसी भी योध्या के लिए हम महारथी शब्द का प्रयोग कर लेते है जबकि यह एक बहुत बड़ी पदवी होती थी और कुछ चुनिंदा योद्धा हीं महारथी के स्तर तक पहुच पाते थे। क्या आपको पता है कि इन ओहदों को पाने के लिए भी कुछ योग्यता जरुरी होती थी? अगर नहीं तो आज हम पौराणिक काल के योद्धाओं के स्तर के बारे में जानेंगे। 
यहाँ मैं विशेष रूप से अनुरोध करना चाहूंगा कि कृपया रामायण और महाभारत के योद्धाओं की आपस में तुलना न करें। उनका बल उनके काल में उनके समकक्ष योद्धाओं के लिहाज से देखें। अन्यथा रामायण काल के सामान्य योद्धा भी महाभारत काल के महारथी से अधिक शक्तिशाली थे। उसी प्रकार किसी देवता की तुलना साधारण मनुष्य से ना करें। उनका बल भी उनके समक्ष देवताओं अथवा दानवों के सन्दर्भ में है। ये भी ध्यान रखें कि किसी भी योद्धा को केवल उसके शारीरिक बल से नहीं अपितु उसके द्वारा प्राप्त दिव्यास्त्रों के आधार पर भी प्रमाणित …

इरावान

चित्र
इरावान महाभारत का बहुचर्चित तो नहीं किन्तु एक मुख्य पात्र है। इरावान महारथी अर्जुन का पुत्र था जो एक नाग कन्या से उत्पन्न हुआ था। द्रौपदी से विवाह के पूर्व देवर्षि नारद के सलाह के अनुसार पाँचों भाइयों ने अनुबंध किया कि द्रौपदी एक वर्ष तक किसी एक भाई की पत्नी बन कर रहेगी। उस एक वर्ष में अगर कोई भी अन्य भाई भूल कर भी बिना आज्ञा द्रौपदी के कक्ष में प्रवेश करेगा तो उसे १२ वर्ष का वनवास भोगना पड़ेगा। देवर्षि ने ये अनुबंध इस लिए करवाया था ताकि दौपदी को लेकर भाइयों के मध्य किसी प्रकार का मतभेद ना हो।

भगवान चित्रगुप्त एवं कायस्थ वंश

चित्र
कायस्थों का स्त्रोत श्री चित्रगुप्तजी महाराज को माना जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्माजी ने चार वर्णो को बनाया (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) तब यम जी ने उनसे मानवों का विवरण रखने में सहायता मांगी। फिर ब्रह्माजी ११००० वर्षों के लिये ध्यानसाधना मे लीन हो गये और जब उन्होने आँखे खोली तो देखा कि "आजानुभुज करवाल पुस्तक कर कलम मसिभाजनम" अर्थात एक पुरुष को अपने सामने कलम, दवात, पुस्तक तथा कमर मे तलवार बाँधे पाया। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि "हे पुरुष तुम कौन हो, तब वह पुरुष बोला मैं आपके चित्त में गुप्त रूप से निवास कर रहा था, अब आप मेरा नामकरण करें और मेरे लिए जो भी दायित्व हो मुझे सौपें। तब ब्रह्माजी बोले जैसा कि तुम मेरे चित्र (शरीर) मे गुप्त (विलीन) थे इसलिये तुम्हे चित्रगुप्त के नाम से जाना जाएगा। और तुम्हारा कार्य होगा प्रेत्यक प्राणी की काया में गुप्तरूप से निवास करते हुए उनके द्वारा किये गए सत्कर्म और अपकर्म का लेखा रखना और तदानुसार सही न्याय कर उपहार और दंड की व्यवस्था करना। चूंकि तुम प्रत्येक प्राणी की काया में गुप्तरूप से निवास करोगे इसलिये तुम्हे और तुम्हारी संता…

सप्तर्षियों की पृथ्वी से दूरी

चित्र
पुराणों में सात महान ऋषियों के बारे में वर्णित है जिन्हें सप्तर्षि कहा जाता है। ध्यान देने वाली बात है कि हर मनवन्तर में सप्तर्षि अलग अलग होते हैं। अभी सातवां मनवन्तर चल रहा है जिसमे वैवस्वत मनु का शासन है। किन्तु पहले मनवन्तर जिसके शासक स्वयंभू मनु हैं, के सप्तर्षियों का महत्त्व सबसे अधिक है। कहा जाता है कि सातों ऋषि अपने अपने ग्रह पर निवास करते हैं जो पृथ्वी से बहुत दूर हैं। आज हम आपको बताएँगे कि सप्तर्षियों में कौन से ऋषि पृथ्वी से कितनी दूरी पर निवास करते हैं। आशा है आपको ये जानकारी पसंद आएगी।