22 नवंबर 2019

प्रतिशोध गाथा - ४: देवराज की कृपा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि यवक्रीत परावसु की पत्नी से काम याचना करता है जिससे क्रोधित होकर रैभ्य ऋषि कृत्य का आह्वान करते हैं। यवक्रीत सोचता है कि वो कृत्य को परास्त कर देगा किन्तु ऐसा नहीं हो पता है और अंततः कृत्य के हाथों उसकी मृत्यु हो जाती है। जब भारद्वाज ऋषि को इस बात का पता चलता है तो वो क्रोधित होकर रैभ्य को श्राप दे देते हैं। अब आगे... 

20 नवंबर 2019

प्रतिशोध गाथा - ३: कृत्य का आह्वान

कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के कारण पिछले कुछ दिनों से कोई लेख नहीं प्रकाशित पाया, इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार यवक्रीत ने अपने हठ से, जो उसके योग्य ना था, उस ज्ञान को देवराज इंद्र से प्राप्त कर लिया। देवराज ने हालाँकि उसके हठ के कारण उसे वरदान अवश्य दिया किन्तु वे जानते थे कि इस प्रकार प्राप्त वरदान से किसी का कल्याण नहीं होता और यवक्रीत को भी इसका मूल्य चुकाना पड़ेगा।

जब यवक्रीत लौट कर आया तब तक सभी जगह ये प्रसिद्ध हो चुका था कि उसने इंद्र को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त किया है। अब विद्वानों की सभाओं में उसकी भी पूछ होने लगी। जब कोई व्यक्ति लगन और कड़े परिश्रम से स्वयं को प्रशंसा के योग्य बनाता है तो उसे ये ज्ञात रहता है कि उसे कोई सम्मान क्यों दे रहा है। यही कारण है कि उनके व्यहवार में स्थिरता होती है। किन्तु यवक्रीत के साथ ऐसा नहीं था। उसे वरदान उसके हठ के कारण प्राप्त हुआ था। यही कारण था कि शीघ्र ही यवक्रीत के मन में घमंड ने अपना घर कर लिया। अब वो अपने समक्ष किसी को कुछ ना समझने लगा।

13 नवंबर 2019

प्रतिशोध गाथा - २: यवक्रीत का हठ

पिछले लेख में आपने रैभ्य और भारद्वाज ऋषि के बीच की मित्रता के बारे में पढ़ा। जहाँ रैभ्य के पुत्र परावसु एवं अर्वावसु विद्वान थे वहीँ भारद्वाज का पुत्र यवक्रीत को शिक्षा प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं थी। परावसु को वहाँ के राजा ७ वर्षो के यज्ञ को करवाने हेतु अपने साथ ले गए। उधर दूसरों द्वारा सम्मान ना प्राप्त होने के कारण यवक्रीत भी तपस्या करने वन को चले गए।

11 नवंबर 2019

प्रतिशोध गाथा - १: दो ऋषियों की मित्रता

कथा महाभारत के वन पर्व की है। युधिष्ठिर अपना सारा राज पाठ द्युत में हार कर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ १२ वर्षों के लिए वन चले गए। वहाँ सभी भाई, विशेषकर युधिष्ठिर ऋषियों-महर्षियों के सानिध्य में अपना दिन काट रहे थे। उनसे मिली शिक्षा उनके मनोबल को और दृढ करती थी। उसी समय लोमश ऋषि घुमते हुए उनके आश्रम में आये। सभी भाइयों ने उनकी बड़ी सेवा की। लोमश ऋषि ने उनसे उनका हाल समाचार पूछा।

9 नवंबर 2019

भृंगी - २: जिसके कारण विश्व को अर्धनारीश्वर के दर्शन हुए

पिछले लेख में आपने भगवान शिव के गण भृंगी के विषय में पढ़ा। आपने ये भी जाना कि किस प्रकार भृंगी की भक्ति केवल और केवल महादेव के प्रति थी और उनके अतिरिक्त उसे कुछ और दिखाई नहीं देता था। महादेव के प्रति उसकी भक्ति इतनी अधिक थी कि वो स्वयं माता पार्वती की भी आराधना नहीं करते थे। वे माता को भगवान शिव से अलग मानते थे और उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं था कि दोनों वास्तव में एक ही हैं।

7 नवंबर 2019

भृंगी - १: तीन पैरों वाला महादेव का महान भक्त

जब भी भगवान शिव के गणों की बात होती है तो उनमें नंदी, भृंगी, श्रृंगी इत्यादि का वर्णन आता ही है। हिन्दू धर्म में नंदी एक बहुत ही प्रसिद्ध शिवगण हैं जिनके बारे में हमारे ग्रंथों में बहुत कुछ लिखा गया है। नंदी की भांति ही भृंगी भी शिव के महान गण और तपस्वी हैं किन्तु दुर्भाग्यवश उनके बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं मिलती है। भृंगी को तीन पैरों वाला गण कहा गया है। कवि तुलसीदास जी ने भगवान शिव का वर्णन करते हुए भृंगी के बारे में लिखा है -

"बिनुपद होए कोई। बहुपद बाहु।।" 

अर्थात: शिवगणों में कोई बिना पैरों के तो कोई कई पैरों वाले थे। यहाँ कई पैरों वाले से तुलसीदास जी का अर्थ भृंगी से ही है।

5 नवंबर 2019

सोमरस

आपने कई जगह सोमरस के विषय में पढ़ा या सुना होगा। अधिकतर लोग ये समझते हैं कि सोमरस का अर्थ मदिरा या शराब होता है जो कि बिलकुल गलत है। कई लोगों का ये भी मानना है कि अमृत का ही दूसरा नाम सोमरस है। ऐसा लोग इस लिए भी सोचते हैं क्यूंकि हमारे विभिन्न ग्रंथों में कई जगह देवताओं को सोमरस का पान करते हुए दर्शाया गया है। आम तौर पर देवता अमृत पान करते हैं और इसी कारण लोग सोमरस को अमृत समझ लेते हैं जो कि गलत है।

अब प्रश्न ये है कि सोमरस आखिरकार है क्या? सोमरस के विषय में ऋग्वेद में विस्तार से लिखा गया है। ऋग्वेद में वर्णित है कि "ये निचोड़ा हुआ दुग्ध मिश्रित सोमरस देवराज इंद्र को प्राप्त हो।" एक अन्य ऋचा में कहा गया है - "हे पवनदेव! ये सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिलकर तैयार किया गया है।" इस प्रकार हम यहाँ देख सकते हैं कि सोमरस के निर्माण में दुग्ध का उपयोग हुआ है इसी कारण ये मदिरा नहीं हो सकता क्यूंकि उसके निर्माण में दुग्ध का उपयोग नहीं होता। 

3 नवंबर 2019

पुरुष द्वारा की गयी सर्वप्रथम छठ पूजा

आप सभी को छठ के संध्या एवं प्रातः अर्ध्य की शुभकामनायें। पिछले लेख में आपने माता अदिति द्वारा किये जाने वाले सर्वप्रथम छठ पूजा के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम आपको बताएँगे कि वो कौन सा पहला पुरुष था जिसके द्वारा सर्वप्रथम छठ पूजा की गयी थी। ये तो हम सभी को पता है कि छठ पूजा कोई लिंग विशेष पूजा नहीं है और इसे स्त्री या पुरुष दोनों कर सकते हैं। पुराणों में भी देवी अदिति और प्रियव्रत द्वारा सर्वप्रथम इस पूजा को करने का प्रसंग आया है।

परमपिता ब्रह्मा के पुत्र हुए मनु, जिन्हे हम स्वम्भू मनु के नाम से भी जानते हैं। ब्रह्मदेव के ही वाम अंग से जन्मी शतरूपा के साथ मनु ने विवाह किया जिससे समस्त मानवों का जन्म हुआ। मनु के नाम से ही हम मानव कहलाते हैं। दोनों के दो पुत्र हुए - प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद के पुत्र ही महान भक्त ध्रुव हुए जिन्होंने भगवान विष्णु की कृपा से अनंत लोक को प्राप्त किया।

1 नवंबर 2019

स्त्री द्वारा की गयी सर्वप्रथम छठ पूजा

आप सभी को खरना की शुभकामनायें। कल से छठ महापर्व का शुभारम्भ हो चुका है। नहाय खाय (कद्दू भात) से आरम्भ होने वाला ये महापर्व खरना, संध्या अर्ग एवं प्रातः अर्ग पर समाप्त होता है। छठ माई की कोई तस्वीर आपको नहीं मिलेगी क्यूंकि ये स्वयं सृष्टि देवी का अवतार मानी जाती है। साथ ही ये पर्व किसी लिंग विशेष के लिए नहीं है अपितु स्त्री और पुरुष दोनों इस व्रत को रख सकते हैं।

जब बात छठ पूजा के आरम्भ की आती है तो इस बारे में अलग अलग मत हैं। सबसे पहले छठ पूजा करने का वर्णन दो कथाओं में मिलता है। एक तो ब्रह्मपुत्र मनु के पुत्र प्रियव्रत द्वारा जिसके बारे में एक अलग लेख बाद में प्रकाशित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त छठ पूजा के व्रत को रखने का जो सबसे प्राचीन इतिहास मिलता है वो है दक्षपुत्री एवं देवमाता अदिति के द्वारा। इन दोनों को सबसे प्राचीन छठ व्रत के रूप में मान्यता प्राप्त है।

30 अक्तूबर 2019

यम द्वितीया

कल आप सबने यम द्वितीया का पर्व मनाया। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को पड़ने के कारण ही इस पर्व का नाम यम द्वितीया पड़ा है। इस नाम का एक कारण ये भी है कि ये पर्व दीपावली के दो दिनों के बाद आता है। इसी को भाई दूज के नाम से भी जाना जाता है। भाई दूज का महत्त्व रक्षा बंधन के समान ही है जिसमे बहनें अपने भाइयों को रक्षा सूत्र बांधती हैं और उनके वज्र के समान शक्तिशाली होने की कामना करती हैं। बदले में भाई भी अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है।

इसके पीछे की कथा कुछ इस प्रकार है। भगवान सूर्यनारायण के उनकी पत्नी संध्या से दो संतानें थी - पुत्र यम एवं पुत्री यमुना। ब्रह्मदेव ने प्राणियों के जीवन मरण का भार यमराज को सौंपा। अब जन्म और मृत्यु तो सदा चलने वाली प्रक्रिया है अतः यमराज सदैव उसी में व्यस्त रहते थे। उनकी बहन यमुना प्रायः उनसे मिलने यमलोक जाया करती थी। वापस लौटते हुए वो सदैव अपने भाई से अपने यहाँ आने का अनुरोध करती रहती थी किन्तु यमराज अपनी व्यस्तताओं के कारण कभी यमुना का घर नहीं जा पाते थे।