22 मई 2018

अपरा (अचला) एकादशी

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा या अचला एकादशी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। अपरा एकादशी को जलक्रीड़ा एकादशी, भद्रकाली तथा अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु और उनके पाँचवें अवतार भगवान वामन की पूजा की जाती है। अपरा/अचला एकादशी की प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा। एक दिन अचानक धौम्य नामक ऋषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा। ऋषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया। दयालु ऋषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया। 

अपरा एकादशी की कथा पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। अपरा एकादशी व्रत से मनुष्य को अपार खुशियों की प्राप्ति होती है तथा समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। महाभारत में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि जो व्यक्ति शुद्ध मन से इस व्रत को पूरा करता है उसे निश्चय ही वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। औरों की तो बात ही क्या, इस व्रत से ब्रह्मा हत्या से दबा हुआ, गोत्र की हत्या करने वाला, गर्भस्थ शिशु को मारने वाला, परनिंदक तथा परस्त्रीगामी भी पापमुक्त होकर विष्णु लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है। कहते हैं कि मकर संक्रांति में प्रयाग में स्नान, शिवरात्रि में काशी में रहकर व्रत, गया में पिंडदान, वृष राशि में गोदावरी में स्नान, बद्रिकाश्रम में भगवान केदार के दर्शन या सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान और सहस्त्र गोदान के के बराबर जो फल मिलता है, वह अपरा एकादशी के मात्र एक व्रत से मिल जाता है। अपरा एकादशी को उपवास करके भगवान वामन की पूजा से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

19 मई 2018

दान के नियम

हिन्दू धर्म में दान की बड़ी महत्ता बताई गयी है। शास्त्रों में दान को मोक्ष की प्राप्ति का एक साधन भी कहा गया है। ये भी कहा गया है कि दान गृहस्थ आश्रम का आधार है। जिस घर में प्रतिदिन सुपात्र को दान दिया जाता है वही सफल गृहस्थ माना जाता है। आजकल केवल किसी को कुछ दे देना ही दान कहलाता है किन्तु प्राचीन समय में इसके कुछ विशेष नियम थे इनमे से १० महत्वपूर्ण कहे गए हैं। आइये इन महत्वपूर्ण नियम के बारे में कुछ जानते हैं:

17 मई 2018

पांडवों की पत्नी और पुत्रों के नाम

सभी जानते हैं कि द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी थी किन्तु उसके अतिरिक्त भी सभी पांडवों ने अन्य विवाह भी किये। हालाँकि द्रौपदी को पांडवों की पटरानी या ज्येष्ठ रानी कहा जाता है किन्तु वो कुरुकुल की पहली पुत्रवधु नहीं थी। पांडवों में सबसे पहले भीम का विवाह हिडिम्बा नमक राक्षसी से हुआ किन्तु राक्षसी होने तथा कुंती को दिए वचन के कारण भीम ने कभी उसे अपने साथ नहीं रखा और ना ही उसकी गणना कभी कुरुकुल की कुलवधू में हुई। इसी कारण द्रौपदी को पटरानी का स्थान मिला। उसने पाँचों पांडवों से विवाह किया और वो बारी-बारी एक वर्ष के लिए एक पांडव की पत्नी बनकर रहती थी। उसे महर्षि व्यास द्वारा अक्षतयोनि रहने का वरदान प्राप्त था इसी कारण एक वर्ष के पश्चात वो पुनः कौमार्य धारण कर लेती थी। द्रौपदी ने पाँचो पांडवों से एक-एक पुत्र प्राप्त किये जिन्हे उप-पांडव कहा जाता था। पाँचों पांडवों के जन्म में एक-एक वर्ष का अंतराल था (हालाँकि कई जगह नकुल और सहदेव को जुड़वाँ बताया जाता है) और उसी तरह पांडवों के पाँचों पुत्रों की आयु मे भी एक-एक वर्ष का अंतर था और वय के अनुसार उनका भी वही क्रम था जो उनके पिता का था। दुर्भाग्य से सभी की हत्या महाभारत युद्ध में अश्वथामा के हाथों हुई।

15 मई 2018

वट सावित्री

आप सबों को वट सावित्री की हार्दिक शुभकामनाएँ। आज का दिन विवाहिता स्त्री के लिए बड़े महत्त्व का दिन होता है। वट सावित्री का व्रत भारत के प्रमुख व्रतों में से एक है और ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को रखने पर ईश्वर स्त्रिओं के सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद देते हैं और उनके पति और पुत्र पर किसी प्रकार की आपदा नहीं आती। ये व्रत पौराणिक काल की सतिओं में श्रेष्ठ "सावित्री" से जुड़ा है जिसने अपने पति सत्यवान को स्वयं मृत्यु के मुख से बचा लिया था। देवी सावित्री के अतिरिक्त उस व्रत में वटवृक्ष (बरगद का पेड़) का भी अत्यंत महत्त्व है। महर्षि पराशर ने कहा है कि "वट मूल तपोवासा।" अर्थात वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनो देवों का वास होता है। वटवृक्ष अपनी विशालता के कारण हिन्दू धर्म के विशाल स्वरुप का भी प्रतिनिधित्व करता है। आज के दिन सुहागिनें वटवृक्ष की ३ अथवा ५ परिक्रमा कर उसपर सुहाग की निशानियां भेंट करती हैं। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से उनके पतियों की आयु लम्बी और निरोगी होती है। इससे जुडी एक पौराणिक कथा भी है।

12 मई 2018

कृष्ण और कर्ण के बीच हुआ अति सुन्दर संवाद

ये कथा तब की है जब कृष्ण शांतिदूत बन कर हस्तिनापुर गए थे। जब उनका प्रयास असफल हो गया तो युद्ध भी अवश्यम्भावी हो गया। उस स्थिति में ये आवश्यक था कि वे पाण्डवों की शक्ति जितनी बढ़ा सकते थे उतनी बढ़ाएं। इसी कारण उन्होंने वापस लौटते समय कर्ण से मिलने का निश्चय किया। जब कर्ण ने देखा कि श्रीकृष्ण स्वयं उनके घर आये हैं तो उन्होंने उनका स्वागत सत्कार किया। फिर कृष्ण ने कर्ण को अपने रथ पर बिठाया और उन्हें गंगा तट पर ले गए। सात्यिकी को रथ पर ही छोड़ दोनों एकांत में वार्तालाप हेतु चले गए। कर्ण अनिश्चित था कि कृष्ण उससे क्या बात करना चाहते हैं। कुछ औपचारिक बातों के बाद कृष्ण ने कर्ण से कहा कि "हे राधेय! आज इस युद्ध को रोकने का मेरा अंतिम प्रयास भी असफल हो गया। अब तो युद्ध निश्चित है। किन्तु ये तो तुम भी जानते हो कि धर्म पाण्डवों के पक्ष में है अतः तुम जैसे महावीर के लिए यही उचित है कि तुम कौरवों का पक्ष छोड़ कर पांडवों के पक्ष से युद्ध करो। हे कर्ण! वास्तव में तुम भी पाण्डव ही हो क्यूंकि तुम्हारी वास्तविक माता कुंती हैंअतः ये तुम्हारा धर्म है कि तुम अपने पुत्र धर्म का पालन करो।" कृष्ण के ऐसा कहने पर उनके बीच एक अत्यंत सुन्दर संवाद हुआ।

9 मई 2018

अष्टांग योग

पौराणिक काल में महर्षि पतंजलि ने योग को चित्तवृत्तिनिरोधः के रूप में परिभाषित किया है तथा उन्होंने "योगसूत्र" नाम से योगसूत्रों का एक संकलन किया है, जिसमें उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आठ अंगों वाले योग का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग योग का अर्थ है आठ अंगों वाला योग जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पाँच अंग - यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार को "बहिरंग" और शेष तीन अंग - धारणा, ध्यान, समाधि को "अंतरंग" कहते हैं। अंतरंग साधना को आरम्भ करने से पहले व्यक्ति को पहले बहिरंग साधना को पूर्ण करना पड़ता है।

8 मई 2018

हिन्दू धर्म का सार अति-संक्षेप में

आज हम सभी लोग धर्म, उपनिषद, वेद, न्याय और अन्य भी कई विषयों पर बातें करते रहते हैं। परंतु हिंदू धर्म और सनातन धर्म कहां से आरंभ होता है और कहां तक जाता है इसके बारे में संपूर्ण जानकारी इस लेख में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है। हर चीज के बारे में गहनता से बताया गया है ताकि कोई भी पहलू अछूता न रहे। लेकिन आपको यह जानकारी होना चाहिए कि पुराण, रामायण और महाभारत हिन्दुओं के धर्मग्रंथ नहीं है, धर्मग्रंथ तो वेद ही है। 
  • श्रुति-स्मृति: शास्त्रों को दो भागों में बांटा गया है: श्रुति और स्मृति। श्रुति के अंतर्गत धर्मग्रंथ वेद आते हैं और स्मृति के अंतर्गत इतिहास और वेदों की व्याख्‍या की पुस्तकें पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियां आदि आते हैं। हिन्दुओं के धर्मग्रंथ तो वेद ही है। वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का सार गीता है।
  • वेदों में क्या है: वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, संस्कार, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है। वेद चार है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।
    • ऋग्वेद: ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है।

2 मई 2018

ब्रह्मा

ब्रह्मा हिन्दू धर्म के त्रिदेवों में से एक हैं। ये सृष्टिकर्ता हैं जो पालनहार नारायण एवं संहारक शिव के साथ त्रिमूर्ति को पूर्ण करते हैं। इन्हे हिरण्यगर्भ कहा जाता है क्यूँकि इनकी उत्पत्ति ब्रम्ह-अण्ड (ब्रम्हांड) से मानी जाती है। समस्त सृष्टि का सृजन करने के लिए इन्हे परमपिता भी कहा जाता है। हालाँकि ये त्रिदेवों में एक हैं लेकिन आधुनिक युग में इन्हे अन्य दो देवों विष्णु एवं शिव के जितना महत्त्व और सम्मान नहीं दिया जाता जो कि बिलकुल भी सही नहीं है। रही सही कसर आज कल के फालतू धार्मिक टीवी शोज ने पूरी कर दी है। वास्तविकता ये है कि वेदों एवं पुराणों में ब्रम्हा का महत्त्व विष्णु एवं शिव से किसी भी मामले में कम नहीं है और इन तीनों को एक दुसरे का पूरक और समकक्ष माना जाता है। हालाँकि इनकी उत्पत्ति निर्विवाद रूप से शिव और विष्णु के बाद मानी गयी है लेकिन कहीं कहीं सदाशिव के साकार रूप रूद्र को ब्रम्हा से उत्पन्न माना गया है। ऐसी मान्यता है कि सदाशिव (परब्रम्ह या शिव का निराकार रूप) ने विष्णु और ब्रम्हा की उत्पत्ति के बाद स्वयं त्रिदेवों को पूर्ण करने के लिए एवं संहार का उत्तरदायित्व सँभालने के लिए रूद्र के रूप में उत्पन्न हुए।

30 अप्रैल 2018

बुद्ध पूर्णिमा

आप सभी को बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ। आज सारा विश्व भगवान गौतम बुद्ध का २५८० वाँ जन्मदिवस मना रहा है। आज के ही दिन पूर्णिमा को ५६३ ईस्वी पूर्व लुम्बिनी (आज का नेपाल) में ये महाराजा शुद्धोधन की पत्नी महामाया के गर्भ से जन्में। आगे चल कर उन्होंने स्वयं का धर्म चलाया किन्तु हिन्दू धर्म में जन्मे बुद्ध को भगवान विष्णु का नवां अवतार भी माना जाता है। हालाँकि इसपर मतभेद है। कई लोग श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम को विष्णु का आठवाँ एवं कृष्ण को विष्णु का नवां अवतार भी बताते हैं। वैसे इससे बुद्ध के महत्त्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और कई समुदायों द्वारा वे विष्णु-अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। दशावतार के विषय में आप यहाँ विस्तार से पढ़ सकते हैं। दुर्भाग्य से उनकी माता का निधन उनके जन्म से सातवें दिन ही हो गया।  माता की मृत्यु के पश्चात शुद्धोधन की दूसरी पत्नी और महामाया की छोटी बहन ने प्रजावती, जिनका एक नाम गौतमी भी था, ने उनका पालन-पोषण किया। उनके पुत्र होने के कारण और गौतम गोत्र में जन्म लेने के कारण वे गौतम भी कहलाये। उन्होंने उनका नाम सिद्धार्थ रखा। कहा जाता है कि बचपन में अपने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा एक पक्षी को बाण मारे जाने पर उनके ह्रदय में प्राणिमात्र के लिए करुणा का भाव उत्पन्न हुआ। ऐसा विवरण है कि उन्होंने अपनी शिक्षा स्वयं विश्वामित्र से ली, हालाँकि अधिकतर विद्वान उन्हें महर्षि विश्वामित्र नहीं मानते बल्कि उनके काल में विश्वामित्र को एक गुरुपद माना जाता था, ऐसी मान्यता है। १६ वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह कोली की राजकुमारी यशोधरा से हुआ और अगले वर्ष उन्हें राहुल नामक एक पुत्र की प्राप्ति हुई। सिद्धार्थ का मन कभी भी गृहस्थ जीवन में नहीं लगा और वे स्वयं को जकड़ा हुआ महसूस करते थे। एक बार भ्रमण करते समय उन्होंने एक व्यक्ति को अपने आँखों के सामने मरते हुए देखा जिससे उन्हें संसार से विरक्ति हो गयी और उसी छोटी उम्र में उन्होंने अपनी पत्नी और नवजात शिशु को छोड़ कर संन्यास ग्रहण कर लिया।