13 अगस्त 2018

द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रंखला ५: श्री केदारनाथ

कहा जाता है कि ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ वैसे ही सुशोभित होते हैं जैसे ग्रहों के बीच में सूर्यनारायण। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में हिमालय के "केदार" नामक चोटी पर बसे ये स्थान इतना मनोरम है कि यही बस जाने को जी चाहता है। किन्तु ये स्थान मनोरम होने के साथ-साथ दुर्गम भी है। इस ज्योतिर्लिंग का महत्त्व इसी लिए भी अधिक है क्यूंकि ये ज्योतिर्लिंग होने के साथ-साथ चार धामों में से भी एक है। साथ ही साथ ये पञ्च-केदार में से भी एक है। बद्रीनाथ धाम के निकट इस धाम पर आपको हरि (बद्री) और हर (केदार) का अनोखा सानिध्य देखने को मिलता है। कहा गया है:

अकृत्वा दर्शनं वैश्वय केदारस्याघनाशिन:।
यो गच्छेद् बदरीं तस्य यात्रा निष्फलतां व्रजेत्।।

अर्थात जो भी व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन के बिना बदीनाथ के दर्शन को आता है उसे उस दर्शन का फल प्राप्त नहीं होता, अर्थात उसकी बद्रीनाथ यात्रा व्यर्थ हो जाती है। 

ये मंदिर समुद्र तल से करीब ११७५० फ़ीट ऊपर स्थित है। ये मंदिर वास्तव में कितना पुराना है इसका कोई आधिकारिक प्रमाण तो नहीं है किन्तु भारत की प्रसिद्ध केदारनाथ यात्रा पिछले १००० से भी अधिक वर्षों से निरंतर चल रही है। २०१३ में उत्तराखंड में आये विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन से केदारनाथ मंदिर सबसे अधिक प्रभावित हुआ जिसमे इसके मुख्य द्वार को बड़ी क्षति पहुँची किन्तु मूल शिवलिंग को कोई नुकसान नहीं हुआ। केदारनाथ के मूल मंदिर का निर्माण अर्जुन के पड़पोते, अभिमन्यु के पौत्र एवं परीक्षित और माद्रवती के पुत्र जन्मेजय ने करवाया था। उसके बाद इसका जीर्णोद्धार आठवीं शताब्दी में आदि-शंकराचार्य द्वारा करवाया गया। ग्वालियर के भोज राजा के स्तुति पत्र से ये पता चलता है कि आधुनिक मंदिर उनके द्वारा १०८० से १०९० ईस्वी के बीच बनवाया गया था। इस मंदिर के मुख्य द्वार पर नंदी की एक विशाल प्रतिमा है। इस मंदिर के पुजारी केवल मैसूर के जँगम ब्राह्मण ही होते हैं। प्राकृतिक प्रतिकूलताओं के कारण इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन अप्रैल से नवम्बर के बीच होते हैं। मंदिर प्रतिदिन प्रातः ०६:०० बजे खुलता है। दोपहर तीन बजे इसमें एक विशेष पूजा होती है जिसके बाद इसे विश्राम के लिए बंद कर दिया जाता है। शाम के ०५:०० बजे इसे फिर से खोला जाता है और ०७:३० बजे पञ्चमुख शिव की आरती के बाद ०८:३० बजे इसे बंद कर दिया जाता है। 

10 अगस्त 2018

द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रंखला ४: श्री ॐकारेश्वर

मध्यप्रदेश के खण्डवा जिले में परम पावन नर्मदा नदी के बीच स्थित शिवपुरी द्वीप पर भगवान महादेव का चौथा ज्योतिर्लिगं श्री ॐकारेश्वर स्थित है। शिवद्वीप, जिसे मान्धाता द्वीप भी कहते हैं, उसकी आकृति भी आश्चर्यजनक रूप से ॐ के समान है। इस ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ नर्मदा नदी का भी बड़ा महत्त्व है। शास्त्र कहते हैं कि जो फल यमुना में १५ स्नान और गंगा में ७ स्नान करने पर मिलता है वो ॐकारेश्वर महादेव की कृपा से नर्मदा के दर्शन मात्र से मिल जाता है। इस ज्योतिर्लिंग की महत्ता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि ये मान्यता है कि भले ही आप चारो धाम की यात्रा कर लें और चाहे कितने ही तीर्थ कर लें, जब तक आप ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग पर जल नहीं चढ़ाते, तब तक आपको अधूरा पुण्य ही प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव प्रतिदिन सभी लोकों की परिक्रमा कर यही आकर विश्राम करते हैं। इसी कारण इस मंदिर में प्रत्येक दिन महादेव की विश्राम आरती की जाती है और प्रतिदिन यहाँ तीन बार पूजा की जाती है। स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में ॐकारेश्वर की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। ओम्कारेश्वर में ६८ तीर्थ, ३३ करोड़ देवता, १०८ प्रभावशाली शिवलिंग तथा ८४ योजन का विस्तार करने वाली माँ नर्मदा का विराट स्वरुप विद्यमान है जिसके के दर्शन मात्र से समस्त पाप भस्म हो जाते है। अहिल्याबाई होकर ने यहाँ पर १८००० शिवलिंगों का विसर्जन किया था। आज भी यहाँ उतने ही शिवलिंगों के विसर्जन की प्रथा है। यहाँ के गर्भ गृह को बंद ही रखा जाता है और यहाँ के राजपरिवार के द्वारा इसे खोलने की मनाही है। ऐसा माना जाता है कि गर्भगृह में एक विशाल खजाना रखा है।

8 अगस्त 2018

द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रंखला ३: श्री महाकालेश्वर

आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् ।
भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते ॥

अर्थात आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।

इस एक ही श्लोक से महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा पता चलती है। मध्यप्रदेश के प्राचीन शहर उज्जैन दो चीजों के लिए प्रसिद्ध है। एक महाकुम्भ एवं दूसरे श्री महाकालेश्वर महादेव। कहते हैं कि ये शिवलिंग स्वयंभू है जिसके ऊपर बाद में मंदिर बना दिया गया। सोमनाथ की भांति ये मंदिर भी ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ शक्तिपीठ भी माना जाता है जो यहाँ उनकी पत्नी महाकाली कहलाती है। सोमनाथ की ही भांति मुस्लिम शासकों ने महाकेश्वर मंदिर को भी नष्ट करने का पूरा प्रयास किया। सन १२३४ में मुग़ल शासक इल्तुतमिश ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया किन्तु हमेशा की तरह शिवलिंग को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। उसके बाद सभी राजाओं ने इस मंदिर की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा। कहा जाता है कि भगवान महाकाल के कारण ही महाराज विक्रमादित्य इतने महान सम्राट बने और उन्ही के कारण किसी और राज्य का उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं होता था। महाकवि कालिदास एवं विद्वान बाणभट्ट का कर्मक्षेत्र भी उज्जैन ही रहा और उनके काव्यों में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का प्रभाव साफ़ झलकता है। यही नहीं स्वयं श्रीकृष्ण ने अपनी शिक्षा-दीक्षा के लिए महाकाल की नगरी उज्जैन को ही चुना और महादेव के सानिध्य में केवल ६४ दिनों में ही ६४ कलाओं में वे पारंगत हो गए। कुम्भ मेले के समय तो उज्जैन और महाकालेश्वर की छटा देखते ही बनती है। महादेव को भस्म क्यों प्रिय है इसके बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। भगवान महाकाल की ये भस्मारती पूरे विश्व में प्रसिद्द है जिसे देखने के लिए विदेशों से भी लोग आते हैं और ये कई कारणों से विशिष्ट है: 

6 अगस्त 2018

द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रंखला २: श्री मल्लिकार्जुन

हैदराबाद से करीब २०० किलोमीटर दूर आंध्र के कुर्नूल जिले के श्रीशैलम पहाड़ियों की प्राकृतिक सौंदर्य के बीच महादेव का द्वितीय ज्योतिर्लिंग श्रीमल्लिकार्जुन स्थित है। वैसे तो भगवान शिव के सभी ज्योतिर्लिंगों का अत्यधिक महत्त्व है पर उसपर भी ये ज्योतिर्लिंग अद्वितीय एवं विशेष है। इसका कारण ये है कि यहाँ महादेव के साथ-साथ माता पार्वती भी विराजती है तथा मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ शक्तिपीठों में से भी एक है। मल्लिकार्जुन दो शब्दों से मिलकर बना है - मल्लिका एवं अर्जुन। यहाँ मल्लिका का अर्थ देवी पार्वती एवं अर्जुन का अर्थ भगवान शंकर है। शक्तिपीठ के विषय में एक कथा है कि जब देवी सती ने आत्मदाह किया तब महादेव उनके मृत शरीर को लेकर शोक में इधर-उधर घूमने लगे। उनके इस प्रकार वैराग्य धारण करने पर सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया। तब ब्रह्मदेव की प्रेरणा से भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के ५१ भाग कर दिए। पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ देवी सती के ये भाग गिरे वो शक्तिपीठ कहलाया। मल्लिकार्जुन में देवी सती के होंठ गिरे थे जिससे ये महाशक्तिपीठों में से एक बना। यहाँ पर भ्रामरी देवी का एक मंदिर भी है जहाँ पर देवी पार्वती ने भ्रमर के रूप में भगवान शिव की पूजा की थी।  

4 अगस्त 2018

द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रंखला १: श्री सोमनाथ

गुजरात के सौराष्ट्र में प्रभास तीर्थ पर बना सोमनाथ का मंदिर अपनी अदभुत कलाकृति के साथ-साथ भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग होने के कारण भी प्रसिद्ध है। ये शिवलिंग अत्यंत प्राचीन है क्यूंकि इसकी स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। इसके बारे में एक कथा है कि ब्रह्मपुत्र प्रजापति दक्ष ने चंद्र को अपनी २७ कन्याओं का दान किया। आरम्भ में सभी उनके साथ सुख पूर्वक रह रही थी किन्तु चंद्रदेव का अपनी पत्नी रोहिणी पर अधिक प्रेम था। वो उससे इतना प्रेम करते थे कि उनका ध्यान अन्य पत्निओं की तरफ नहीं जाता था। अपने पति की ऐसी अनदेखी देख कर उनकी अन्य पत्निओं ने अपने पिता प्रजापति दक्ष से इसकी शिकायत की। दक्ष ने चंद्र को समझाया की उनकी अन्य भार्याओं के प्रति भी उनका कुछ कर्तव्य है। उस दिन तो चंद्र ने दक्ष की बात मान ली किन्तु जल्द ही पुनः वे रोहिणी के आकर्षण में खो गए। जब दक्ष को ये पता चला कि उनके समझाने का चंद्र पर कोई असर नहीं हुआ तो उन्होंने चंद्र को श्राप दिया कि उनका शरीर क्षय हो जाये। इस श्राप के मिलते ही चंद्रदेव को क्षयरोग ने अपने चंगुल में ले लिया और उनकी सारी कांति और सौंदर्य जाता रहा। जब उनकी अन्य पत्नियों ने अपनी पति की ये दशा देखी तो उन्होंने अपने पिता से प्रार्थना की कि वे अपना श्राप वापस ले लें किन्तु दक्ष ने अपना श्राप वापस लेने में अपनी असमर्थता दिखाई। 

2 अगस्त 2018

द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रृंखला

कई वर्षों से सोच रहा था कि द्वादश ज्योतिर्लिंगों पर एक लेख लिखूं। इस बार श्रावण के इस पवित्र अवसर पर हरेक ज्योतिर्लिंग पर एक लेख प्रकाशित करूँगा। सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग का वर्णन तब आता है जब सृष्टि के आरम्भ में भगवान विष्णु एवं परमपिता ब्रह्मा के बीच अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाता है। तब उनके बीच अग्नि प्रज्वलित एक ज्योतिर्लिंग उपस्थित होता है। ना ब्रह्मा और ना ही विष्णु उस महान आदि ज्योतिर्लिंग का आदि या अंत पता कर पाते हैं। अंततः उसका छोर ढूंढने के लिए ब्रह्मा हंस के रूप में ऊपर और विष्णु वाराह के रूप में नीचे जाते हैं किन्तु १००० वर्षों तक निरंतर चलने के बाद भी वे दोनों उस ज्योतिर्लिंग का कोई ओर छोर नहीं ढूंढ पाते। वापस आकर ब्रह्मा असत्य कह देते हैं कि उन्होंने छोर ढूंढ लिया है जिसके बाद सदाशिव उन्हें दर्शन देकर ब्रह्माजी को उनके असत्य के लिए धिक्कारते हैं और विष्णु को उनसे श्रेष्ठ घोषित करते हैं। पुराणों में कदाचित ये सबसे पहला प्रकरण है जहाँ ज्योतिर्लिंग या शिवलिंग का वर्णन आता है। पुराणों के अनुसार ही पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ भगवान शिव प्रकट हुए वो स्थान ज्योतिर्लिंग कहलाया। ये मुख्य रूप से १२ हैं। पहले सोचा था कि बैद्यनाथ पर पहला लेख लिखूंगा किन्तु अब सोचता हूँ कि ज्योतिर्लिंगों के क्रम से ही लेख प्रकाशित किया जाये। तो परसों सोमनाथ पर पहला लेख लिखूँगा। ॐ नमः शिवाय।।
  1. सोमनाथ - सौराष्ट्र (गुजरात)
  2. मल्लिकार्जुन - श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश)
  3. महाकालेश्वर - उज्जैन (मध्य प्रदेश)
  4. ॐकारेश्वर - खण्डवा (मध्य प्रदेश)
  5. केदारनाथ - रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड)
  6. भीमाशंकर - रायचूर (महाराष्ट्र)
  7. काशी विश्वनाथ - वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
  8. त्रयंबकेश्वर - नासिक (महाराष्ट्र)
  9. नागेश्वर - जामनगर (गुजरात)
  10. बैद्यनाथ - देवघर (झारखण्ड)
  11. रामेश्वर - रामेश्वरम (तमिलनाडु)
  12. घृष्णेश्वर - औरंगाबाद (महाराष्ट्र)

31 जुलाई 2018

भगवान शिव के १०८ नाम और उनके मन्त्र

कल से सावन का आरम्भ हुआ तो मैंने सोचा महादेव के १०८ पवित्र नामों से इसकी शुरुआत की जाये। भगवान शिव के इन नामों के विषय में एक कथा है कि जब नारायण क्षीरसागर में निद्रामग्न थे तो उनकी नाभि से एक कमलपुष्प पर परमपिता ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। परमपिता सहस्त्र वर्षों तक भगवान विष्णु की चेतना में आने की प्रतीक्षा करते रहे। एक दिन उनके समक्ष सदाशिव एक अग्निमयी ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए किन्तु परमपिता ब्रह्मा ने उन्हें नमस्कार नहीं किया। तब नारायण अपनी निद्रा से जागे और उन्होंने उस ज्योतिर्लिंग को शाष्टांग प्रणाम किया और फिर ब्रह्मदेव को भगवान शिव के प्रताप से अवगत कराया। तब ब्रह्मदेव को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस ज्योतिर्लिंग को प्रणाम किया। तब ज्योतिरूपी सदाशिव ने भगवान ब्रह्मा को सृष्टि की रचना एवं नारायण को उसका पालन करने की प्रेरणा दी। इसपर नारायण ने कहा कि सृष्टि का नाश भी आवश्यक है। तब सदाशिव ने कहा कि समय आने पर मैं भी सृष्टि के विनाश का भार सँभालने के लिए अवतरित हूँगा। तब ब्रह्मदेव ने कहा कि सृष्टि के आरम्भ के पूर्व वे उन्ही से उत्पन्न होने की कृपा करें। भगवान सदाशिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

29 जुलाई 2018

स्वर्भानु (राहु एवं केतु)

स्वर्भानु का नाम शायद आपने पहली बार सुना हो किन्तु मुझे विश्वास है कि उसका दूसरा नाम आप सभी जानते होंगे। कल ही ही इस सदी का सबसे लम्बा चंद्रग्रहण समाप्त हुआ और स्वर्भानु भी उससे सम्बंधित है। इस नाम को शायद आप ना जानते हों किन्तु उसका दूसरा नाम हिन्दू धर्म के सबसे प्रसिद्द पात्रों में से एक है और हम सभी उससे परिचित हैं। हम उसे राहु एवं केतु के नाम से जानते हैं। अधिकतर धर्मग्रंथों में केवल राहु का विवरण ही मिलता है जिससे बाद में केतु अलग होता है किन्तु उसका वास्तविक नाम स्वर्भानु था। स्वर्भानु दैत्यराज बलि का एक महत्वपूर्ण सेनानायक था। समुद्र मंथन के समय जब अंत में अमृत की उत्पत्ति हुई तो देवों और दैत्यों में उसे पाने के लिए प्रतिस्पर्धा आरम्भ हो गयी। अमृत दैत्यों के हाथों में ना चला जाये इस कारण भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धरा जिसे देखकर सभी मंत्रमुग्ध हो गए और सम्मोहित हो मोहिनी रुपी भगवान विष्णु का अनुसरण करने लगे। मोहिनी ने कहा कि देव और दैत्य दोनों अपनी-अपनी पंक्तियों में बैठ जाएँ ताकि वो सभी को अमृत-पान करा सके। बलि के नेतृत्व में दैत्य और इंद्र के नेतृत्व में देवता अपनी-अपनी पंक्तियों में बैठ गए और मोहिनी उन्हें अमृत पिलाने को आयी। मोहिनी दैत्यों को केवल अमृत पिलाने का अभिनय करती किन्तु देवों को वास्तव में अमृतपान करवाती। ऐसा करते-करते सभी देव अमर हो गए किन्तु किसी भी दैत्य को अमृत की एक बूँद भी नहीं मिली। 

27 जुलाई 2018

महादेव को क्यों प्रिय है चिता की भस्म?

हम सभी ने देखा है कि भोलेनाथ को वैसी चीजें ही पसंद हैं जो अन्य किसी देवता को पसंद नहीं। ये भी कह सकते हैं कि जो समस्त विश्व के द्वारा त्याज्य हो उसे महादेव अपने पास शरण देते हैं। चाहे वो चंद्र हो, वासुकि, हलाहल, भूत-प्रेत, राक्षस, दैत्य, दानव, पिशाच, श्मशान अथवा भस्म। देवों में देव महादेव ही ऐसे हैं जो देव-दानव सभी के द्वारा पूज्य हैं। सभी जानते हैं कि भगवान शिव को चिता की भस्म अत्यंत प्रिय है। उनका श्रृंगार भी भस्म से किया जाता है। शैव पंथ के साधक श्मशान और चिता की राख का प्रयोग अपनी साधना के लिए करते हैं। तो ये जानने की इच्छा होती है कि आखिर महादेव को वो चिता की रख क्यों प्रिय है जिसे कोई अन्य देवता देखना नहीं चाहता? इसे जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। 

25 जुलाई 2018

परिक्रमा का महत्त्व एवं नियम

परिक्रमा हिन्दू धर्म की एक महत्वपूर्ण क्रिया है। नवग्रह सूर्य की और सूर्य भी महासूर्य की परिक्रमा करते हैं। जब कार्तिकेय और गणेश में प्रतिस्पर्धा हुई थी तो कार्तिकेय ने पृथ्वी की और गणेश ने शिव-पार्वती की सात-सात परिक्रमाएँ की थी। कदाचित परिक्रमाओं का चलन उसी समय से प्रारम्भ हुआ। ऋग्वेद के अनुसार प्रदक्षिणा शब्द को दो भागों (प्रा + दक्षिणा) में विभाजित किया गया है। इस शब्द में मौजूद प्रा से तात्पर्य है आगे बढ़ना और दक्षिणा मतलब चार दिशाओं में से एक दक्षिण की दिशा। यानी कि ऋग्वेद के अनुसार परिक्रमा का अर्थ है दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए देवी-देवता की उपासना करना। सरल शब्दों में कहा जाये तो घडी की सुइयों की दिशा में आगे बढ़ना।