18 अप्रैल 2018

अक्षय तृतीया

सर्वप्रथम आप सभी को अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएँ। अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है जिस कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान अदि कर भगवान नारायण की पूजा, विशेषकर श्वेत पुष्प से करने का विधान है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा दान का कभी भी क्षय नहीं होता। इस व्रत की एक विशेष कथा प्रचलित है जो धर्मदास नामक वैश्य की है जो अक्षय तृतीया के व्रत के कारण बहुत धनी बना और ऐसा माना जाता है कि आगे चलकर वही सम्राट चन्द्रगुप्त के रूप में जन्मा। भारत में इस दिन से ही विवाह मुहूर्त आरम्भ हो जाता है और लग्न का मांगलिक कार्य किया जाता है। विशेषकर बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया आज से पूर्णिमा तक बडी धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें कुँवारी कन्याएँ अपने भाई, पिता तथा गाँव-घर और कुटुंब के लोगों को शगुन बाँटती हैं और गीत गाती हैं। आज का दिन सभी दृष्टि से शुभ माना जाता है और कोई भी शुभ कार्य आज शुरू किया जा सकता है। इससे जुडी कई धार्मिक मान्यताएं भी हैं:

16 अप्रैल 2018

वो छः श्राप जो रावण के विनाश का कारण बने

रावण के बारे में कौन नहीं जनता। उसकी वीरता सर्व-विख्यात थी। उसे सप्तसिंघुपति कहा जाता था क्यूंकि उसने सातों महाद्वीपों पर विजय पायी यही। उसे परमपिता ब्रम्हा का वरदान प्राप्त था और उसपर महारुद्र की विशेष कृपा थी। यही कारण था कि उससे युद्ध करने का कोई साहस नहीं करता था। यही नहीं, उसने समस्त देवताओं पर विजय पायी थी और नवग्रह उसके वश में थे। सभी गृह उसकी इच्छा से चलते थे इसीलिए वो अपनी मृत्यु का योग बदल सकता था। शनि को उसने अपने दरबार में अपने पैरों के नीचे रखता था। इतने प्रतापी और वीर असुर की मृत्यु अवश्य ही अत्यंत कठिन थी इसी कारण प्रकृति ने उसके लिए कोई और उपाय सोचा। रावण को अपने जीवन में कई ऐसे श्राप मिले जो आगे चलकर उसकी मृत्यु का कारण बनें, किन्तु ६ श्रापों का विशेष रूप से जिक्र है:

14 अप्रैल 2018

गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती

तुलसी की हिन्दू धर्म में कितनी महत्ता है इसके बारे में बताने की आवश्यकता नहीं है। पीपल, बेलपत्र और तुलसी को हिन्दू धर्म में सबसे पवित्र माना जाता है। प्रत्येक देवता की पूजा में तुलसी को समर्पित करने की प्रथा है विशेषकर भगवान विष्णु को तुलसी समर्पित करने का विशेष पुण्य मिलता है। किन्तु श्री गणेश को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। 

12 अप्रैल 2018

स्तंभेश्वर महादेव - जहाँ समुद्र स्वयं महादेव का अभिषेक करता है।

गुजरात में वड़ोदरा के पास, भरुच जिले में अरब सागर के पास स्थित स्तंभेश्वर महादेव का मंदिर अपने आप में एक आश्चर्य है जहाँ वह दिन में एक बार दर्शन देकर समुद्र में गायब हो जाता है। इसमें ४ फुट ऊँचा शिवलिंग स्थित है जिसका जलाभिषेक खुद समुद्र करता है। यह मंदिर समुद्र की तेज लहरों में अपने आप गायब हो जाता है और कुछ देर बार खुद बाहर आ जाता है। इस मंदिर की खोज करीब २०० वर्ष पहले हुई थी। इस मंदिर में शिवलिंग के दर्शन दिन में केवल एक बार ही होते हैं और बाँकी समय यह मंदिर समुद्र में डूबा रहता है। समुद्र तट पर दिन में दो बार ज्वार भाटा आता है, ज्वार भाटे के कारण पानी मंदिर के अंदर पहुंच जाता है। ऐसा हर रोज सुबह और शाम होता है। ज्वार के वक्त शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है। उस समय वहां किसी को भी जाने की अनुमित नहीं होती है। ऐसा क्यों होता है ये किसी को ज्ञात नहीं। 

10 अप्रैल 2018

शुकदेव

शुकदेव ऋषि का वर्णन महाभारत में आता है। वो महर्षि व्यास के अनियोजित पुत्र एवं उनके पहले शिष्य थे। उन्होंने महर्षि व्यास से महाभारत की पूरी कथा सुनकर कंठस्थ कर लिया था और आगे उस कथा का विस्तार किया। जब परीक्षित को उस श्राप का पता चला कि आज से सातवें दिन तक्षक के दंश से उनकी मृत्यु हो जाएगी तो उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में महाभारत और गीता कथा सुनने की इच्छा जाहिर की। तब शुकदेव जी ने ही उन्हें और उनके साथ महर्षि व्यास समेत कई अन्य ऋषियों को महाभारत एवं गीता की कथा सुनाई थी। वे बड़ी कम आयु में ही विरक्ति भाव से मृत्यु को प्राप्त हुए। वे एक ऐसे ऋषि के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने ब्रम्हचर्य के बाद सीधे सन्यास आश्रम में प्रवेश किया। इनके जन्म के सम्बन्ध में एक कथा मिलती है जो भगवान शिव और माता पार्वती से जुडी है। 

9 अप्रैल 2018

एक ऐसा रुद्रावतार जिस पर स्वयं विष्णु भी अंकुश ना रख सके - वीरभद्र

शिव और सती के विषय में सब जानते ही हैं। अपने पिता ब्रम्हापुत्र प्रजापति दक्ष के विरूद्ध जाकर सती ने शिव से विवाह किया। दक्ष घोर शिव विरोधी थे क्यूंकि उन्होंने उनके पिता ब्रम्हा का पाँचवा मस्तक काटा था। सती ने विवाह तो कर लिया किन्तु दक्ष उसे कभी स्वीकार नहीं कर सके और शिव और सती का त्याग कर दिया। कई वर्षों के पश्चात दक्ष ने कनखल (आज के हरिद्वार में स्थित) में एक महान वैष्णव यज्ञ का अनुष्ठान किया। भगवान विष्णु उस यज्ञ के अग्रदेवता बने और स्वयं ब्रम्हा ने पुरोहित का स्थान सँभाला। उस यज्ञ में इंद्र सहित समस्त देवता, यक्ष, गन्धर्व एवं महान ऋषिओं को आमंत्रित किया गया किन्तु शिव के साथ बैर के कारण दक्ष ने उन्हें आमंत्रित नहीं किया। जब ब्रम्हा ने देखा कि महादेव को आमंत्रित नहीं किया गया है तो उन्होंने दक्ष से कहा कि अविलम्ब शिव से क्षमा माँग कर उन्हें आमंत्रित कर लें क्योंकि उनके बिना यज्ञ पूरा नहीं हो सकता किन्तु दक्ष नहीं माने। भगवान विष्णु और ब्रम्हा अग्रदेव और पुरोहित का पद सँभाल चुके थे इसीलिए यज्ञ को बीच में छोड़ना उन्हें उचित नहीं लगा। यज्ञ आरम्भ तो हो गया किन्तु महर्षि भृगु एवं कश्यप ने यज्ञ के  अनिष्ट की भविष्यवाणी कर दी। इसपर ब्रम्हदेव और नारायण ने एक बार और दक्ष को समझाया किन्तु उनके ना मानने पर उन्होंने विनाशकाल को समझ कर यज्ञ के आरम्भ की आज्ञा दे दी। 

6 अप्रैल 2018

जनेऊ का महत्त्व

जनेऊ को लेकर लोगों में कई भ्रांतियां मौजूद है। लोग जनेऊ को धर्म से जोड़ते हैं जबकि सच तो कुछ और ही है। तो आइए इस बारे में कुछ और जानते हैं। 
  • जनेऊ पहनने से आदमी को लकवे से सुरक्षा मिल जाती है: कहा गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दाँत पर दाँत बैठा कर रहना चाहिए अन्यथा अधर्म होता है। दरअसल इसके पीछे विज्ञान का गहरा रह्स्य छिपा है क्योंकि दाँत पर दाँत बैठा कर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता। 
  • आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है: एक पुरुष को बताता है कि उसे दो लोगों का भार या ज़िम्मेदारी वहन करना है - एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का। अब एक एक जनेऊ में ९ धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पति पक्ष के ९ ग्रहों का भार है। अब इन ९-९ धांगों के अंदर से १-१ धागे निकालकर देंखें तो इसमें २७-२७ धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के २७-२७ नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो २९ + ९ = ३६ होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर ३६ = ३ + ६ = ९ आता है, जो एक पूर्ण अंक है। अब अगर इस ९ में दो जनेऊ की संख्या अर्थात २ और जोड़ दें तो ९ + २ = ११ होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (१ और १) के मिलने से बना है। १ + १ = २ होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है और चंद्रमा हमें शीतलता प्रदान करता है। जब हम अपने दोनो पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें असीम शांति की प्राप्ति हो जाती है। 

4 अप्रैल 2018

कावेरी

कावेरी भारत में बहने वाली प्रमुख नदियों में से एक है। कावेरी परमपिता ब्रम्हा की पुत्री है और इसे देवी गंगा की तरह ही पूजनीय माना गया है। पुराणों के अनुसार जब महर्षि अगस्त्य उत्तर भारत से दक्षिण की ओर आ गए तो उन्हें वहाँ पड़ने वाले सूखे ने चिंतित कर दिया। इसी के निराकरण के लिए वे ब्रम्हलोक पहुँचे और परमपिता ब्रम्हा को नमन करते हुए कहा "हे ब्रम्हदेव! आप तो जानते ही हैं कि भगवान शिव की आज्ञा अनुसार अब मैं दक्षिण में निवास करता हूँ। महादेव ने मुझसे कहा था कि दक्षिण हर प्रकार से उत्तर के प्रदेश से पिछड़ा हुआ है और उन्होंने मुझे आज्ञा दी कि मैं अपने ज्ञान से दक्षिण को समृद्ध बनाऊँ। उनके आज्ञा अनुसार मैंने अपने ज्ञान का वहाँ प्रसार किया किन्तु भौगोलिक दृष्टि से भी दक्षिण में जीवन बहुत कठिन है। पूरे प्रदेश में सूखा पड़ा है और जल का कोई साधन नहीं है। इसीलिए हे परमपिता कृपा कर दक्षिण को अपने वरदान से परिपूर्ण करें।"