19 दिसंबर 2018

काकभुशुण्डि

काकभुशुण्डि का वर्णन वाल्मीकि रामायण एवं तुलसीदास के रामचरितमानस में आता है। सबसे पहला वर्णन इनका तब आता है जब देवी पार्वती ने महादेव से श्रीराम की कथा सुनाने का अनुरोध किया था। माता के अनुरोध पर भगवान शिव उन्हें एकांत में ले गए और रामकथा विस्तार से सुनाने लगे। दैववश देवताओं के लिए भी दुर्लभ उस कथा को वहाँ बैठे एक कौवे ने सुन लिया। भगवान शिव द्वारा कथा सुनाये जाने पर उसे श्रीराम के सभी रहस्यों सहित पूर्ण कथा का ज्ञान हो गया। वही कौवा आगे चल कर काकभुशुण्डि के रूप में जन्मा। काकभुशुण्डि राम भक्त थे और श्रीराम की भक्ति के अतिरिक्त उनका कोई अन्य कार्य ना था। वे नित्य वृक्ष के नीचे रामकथा का वाचन करते थे जिसे सुनने के लिए ऋषि-मुनि दूर-दूर से आते थे। उनकी कथा में वो आकर्षण था कि एक बार स्वयं महादेव काकभुशुण्डि के मुख से रामकथा सुनने के लिए हंस के रूप में उस वृक्ष के निकट रुक गए। श्री काकभुशुण्डि के मुख से राम कथा सुनकर महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया ताकि वे युगों-युगों तक उसी प्रकार रामकथा का वाचन करते रहें। कुछ दिनों तक उनसे वो रामकथा जो उन्होंने स्वयं देवी पार्वती को सुनाया था, सुनकर वे तृप्त मन से वापस कैलाश को लौट गए। जो महान कथा स्वयं महादेव के मुख से निकली हो, उसे स्वयं महादेव को सुनाने का सौभाग्य केवल काकभुशुण्डि को प्राप्त है। 

इनके जन्म के विषय में एक कथा है कि श्रीराम के जन्म से एक कल्प पहले इनका जन्म अयोध्या में ही एक शूद्र जाति में हुआ। ये महादेव के अनन्य भक्त थे और उसी भक्ति के अभिमान में वे अन्य देवताओं की निंदा करते थे। एक बार ये उज्जैन गए और एक ब्राह्मण की सेवा कर अपना जीवन बिताने लगे। वो ब्राह्मण भी महादेव के अनन्य भक्त थे किन्तु भूलकर भी वे नारायण की निंदा नहीं करते थे। उन्हें के समक्ष एक बार काकभुशुण्डि ने भगवान शिव की तुलना नारायण से करते हुए भगवान विष्णु की निंदा की। श्रीहरि की निंदा सुनकर महारुद्र अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने आकाशवाणी द्वारा काकभुशुण्डि को धिक्कारते हुए कहा - "रे अधम! तू स्वयं को मेरा भक्त कहता है पर तुझे ये भी ज्ञात नहीं कि हरि और हर में कोई भेद नहीं। तूने नारायण की निंदा कर मेरी भक्ति को कलंकित किया है इसीलिए जा तू १००० अधम योनिओं में जन्म लेकर भटकता रह।" महादेव का रौद्र रूप देख कर काकभुशुण्डि कांपते हुए उनसे दया की याचना करने लगे। तब ब्राह्मण ने भी द्रवित होकर महादेव से उसे क्षमा करने की प्रार्थना की। इसपर महादेव ने कहा कि "मेरा श्राप तो निष्फल नहीं हो सकता। इस निश्चय ही १००० लेने पड़ेंगे लेकिन मैं इसे आशीर्वाद देता हूँ कि मृत्यु का जो कष्ट होता है वह इसे नहीं होगा। साथ ही इसे अपने प्रत्येक जन्म का स्मरण रहेगा और इसका ज्ञान कभी क्षीण नहीं होगा। अपने अंतिम जन्म में इसे श्रीराम की अनन्य भक्ति प्राप्त होगी।"

महादेव के वचन अनुसार काकभुशुण्डि का सबसे पहला जन्म सर्पयोनि में हुआ। उसके बाद वे जिस भी योनि में जन्मते उन्हें बिना कष्ट मुक्ति मिल जाती थी। साथ ही महादेव के आशीर्वाद के कारण उन्हें अपने पिछले सभी जन्मों का पूरा स्मरण रहता था। इसी प्रकार वो एक के बाद एक जन्म लेते रहे और १००० वें जन्म में एक ब्राह्मण के रूप में जन्मे। उस जन्म में वो आत्मज्ञान लेने महर्षि लोमश के पास पहुंचे। जब लोमश ऋषि उन्हें ज्ञान की बात बताने लगे तो वे बात-बात पर उन्हें टोकने लगे। इससे रुष्ट होकर लोमश ऋषि ने कहा - "रे मुर्ख! तू क्या कौवे की भांति बात-बात पर काँव-काँव करता है? तू तो मनुष्य होने के योग्य ही नहीं है इसीलिए जा तू कौवे का ही जीवन व्यतीत कर।" उनके इस श्राप से काकभुशुण्डि तत्काल कौआ बन गए। ऐसा देख कर अपने क्रोध पर पश्चाताप करते हुए लोमश ऋषि अत्यंत दुखी हो गए। तब काग रूपी काकभुशुण्डि ने कहा - "हे मुनिवर! आप कृपया दुखी ना हों। आप जैसे महात्मा का श्राप भी मेरे लिए वरदान है। मुझे विश्वास है कि इस कागरूप में भी मेरा भला ही होगा।" ये कहकर काकभुशुण्डि ने लोमश ऋषि को रामकथा सुनाई। उनका ये संयम देख और श्रेठ रामकथा सुनकर लोमश ऋषि बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान दिया और साथ ही उन्हें राममंत्र भी दिया। राममंत्र मिलने से उन्हें अपने कागरूप से प्रेम हो गया और वो उसी रूप में नित्य रामकथा का वाचन करने लगे। उनके द्वारा कहे रामायण को "काकभुशुण्डि रामायण" के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने ही श्रीराम के प्रति गरुड़ के अज्ञान को दूर किया था। इस विषय में विस्तृत जानकारी दुसरे लेख में दी जाएगी।