जब श्रीराम और लक्ष्मण जान बूझ कर अचेत हो गए
रामायण में एक जगह ऐसा प्रसंग मिलता है जब मेघनाद ने श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश से बांध दिया था। कुछ लोग को ऐसा लगता है कि मेघनाद ने अपने पराक्रम से उन दोनों को अचेत कर दिया था लेकिन रामायण में ही हमें एक ऐसी कथा मिलती है जब श्रीराम और लक्ष्मण केवल वानर सेना की रक्षा के लिए जान बूझ कर अचेत हो गए थे।
भगवान जगन्नाथ और जगन्नाथ पुरी मंदिर
द्वापर अपने अंतिम चरण में था। कलियुग आने वाला था। उसी वेला में भगवान श्रीकृष्ण ने निर्वाण ले लिया। उनकी मृत्यु के बाद द्वारिका भी समुद्र में डूब गयी। उनके परिवारजनों ने उनका अंतिम संस्कार किया। श्रीकृष्ण का शरीर तो पंचतत्व में विलीन हो गया किन्तु उनका ह्रदय वैसे ही धड़कता रहा। उसे भस्मीभूत करने का बहुत प्रयास किया गया किन्तु वो वैसे का वैसा ही रहा। जब अर्जुन द्वारिका पहुंचे तो उन्होंने उनके ह्रदय हो उनका जीवित स्वरुप मानकर उसे समुद्र में विसर्जित कर दिया।
वाल्मीकि रामायण अरण्य कांड (सम्पूर्ण) - मूल श्लोक और हिंदी अर्थ सहित
प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान्।
रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम्॥१॥
दण्डकारण्य नामक महान् वन में प्रवेश करके मन को वश में रखने वाले दुर्जय वीर श्रीराम ने तपस्वी मुनियों के बहुत-से आश्रम देखे॥१॥
धार के भोजशाला का पूरा इतिहास
आप सभी ने मध्यप्रदेश के धार में स्थित भोजशाला विवाद के बारे में सुना होगा। आज इस लेख में हम इसके पूरे इतिहास के विषय में जानेंगे। इस भोजशाला का सीधा सम्बन्ध भारत के सबसे महान राजाओं में से एक राजा भोज से है जो आज से लगभग १००० वर्ष पूर्व मालवा साम्राज्य के राजा बने थे और धार ही उनके राज्य की राजधानी थी। उन्होंने अपने शासनकाल में धार में एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय की स्थापना की और वही बाद में उनके नाम पर 'भोजशाला' के नाम से जाना जाने लगा।
क्या द्रौपदी ने कभी दुर्योधन का अपमान किया था?
महाभारत के सन्दर्भ में एक जो बहुत बड़ी भ्रान्ति द्रौपदी और दुर्योधन के बारे में है वो ये है कि इंद्रप्रस्थ में द्रौपदी ने दुर्योधन का अपमान किया था। लगभग सभी लोगों का ऐसा मानना है कि इंद्रप्रस्थ के मयाभावन में जब दुर्योधन मायानिर्मित सरोवर में गिर पड़ा, तब द्रौपदी ने हँसते हुए उसे "अंधे का पुत्र अँधा" कहकर अपमानित किया। हालाँकि द्रौपदी ने ऐसा परिहास में कहा लेकिन दुर्योधन उस बात को कभी भूला नहीं।
द्रौपदी स्वयंवर में किन किन लोगों ने धनुष को उठा लिया था?
द्रौपदी स्वयंवर के विषय में तो हम सभी जानते ही हैं। एक आम अवधारणा है कि अर्जुन को अपने जमाता के रूप में प्राप्त करने के लिए पंचालराज द्रुपद ने धनुष को इतना कठोर और भारी बनवाया था कि कोई भी उस धनुष को हिला भी नहीं पाया। लेकिन ये बात बिल्कुल गलत है। महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत स्वयंवर पर्व में द्रौपदी स्वयंवर के प्रकरण में हमें इसके बारे में पता चलता है।
क्या मेघनाद वास्तव में अपराजेय था?
रावण का पुत्र मेघनाद हिन्दू धर्म के सबसे दुर्धुष एवं प्रसिद्ध योद्धाओं में से एक है। इतिहास में कदाचित वही एक योद्धा है जिसे अतिमहारथी होने का गौरव प्राप्त है। आम तौर पर लोगों को ऐसा लगता है कि मेघनाद ही एकमात्र ऐसा योद्धा है जो कभी पराजित नहीं हुआ। हालाँकि ये बात सच है कि मेघनाद निःसंदेह एक अभूतपूर्व योद्धा था किन्तु फिर भी वो अपराजेय नहीं था।
कौन हैं वास्तु पुरुष?
बरसों से जब भी हम अपने घर का निर्माण करना चाहते हैं तो जो सबसे पहले जो एक चीज हमारे ध्यान में रहती है वो है वास्तु। वास्तु शास्त्र को कई लोग आधुनिक विज्ञान मानते हैं किन्तु इसका इतिहास बहुत पुराना है। वास्तु जो शब्द है वो हिन्दू धर्म के एक देवता "वास्तु देव" के ऊपर पड़ा है। वास्तु शास्त्र का पूरा विज्ञान वास्तु देव की स्थिति को ध्यान में रख कर ही गढ़ा गया है। किन्तु आखिर ये वास्तु देव हैं कौन हैं?
वनवास के समय द्रौपदी के पुत्र कहाँ थे?
महाभारत में द्युत के खेल के पश्चात पांडवों को १२वर्ष का वनवास और १ वर्ष का अज्ञातवास मिला। वनवास के लिए पांचों पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ निकले। उन्होंने अपनी वृद्ध माता को वन ले जाना उचित नहीं समझा इसीलिए कुंती हस्तिनापुर में ही रुकी। इसके अतिरिक्त पांडवों के पुत्र भी छोटी अवस्था में होने के कारण वन को नहीं गए।
क्या कभी माता सीता का स्वयंवर हुआ था?
भगवान श्रीराम और माता सीता का स्वयंवर हिन्दू धर्म के सबसे प्रसिद्ध स्वयंवरों में से एक है। श्री रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने सीता स्वयंवर का बहुत विस्तृत और सुन्दर वर्णन किया है। मानस के अनुसार संक्षेप में कथा ये है कि महर्षि विश्वामित्र के साथ श्रीराम और लक्ष्मण जनकपुरी में आते हैं। पुष्प वाटिका में श्रीराम और सीताजी एक दूसरे का दर्शन करते हैं। फिर माता सीता के स्वयंवर का आयोजन होता है।
क्या शकुनि ने जुए में छल किया था?
द्यूत क्रीड़ा महाभारत के सबसे दारुण घटनाओं में से एक है। इसी सभा में द्रौपदी का अपमान किया गया था और यही वो घटना थी जिसने महाभारत के युद्ध को निश्चित कर दिया था। जब भी द्यूत क्रीड़ा की बात होती है तो शकुनि का नाम सबसे पहले आता है। ये बात जनमानस में प्रसिद्ध है कि उस खेल को जीतने के लिए शकुनि ने छल किया था। किन्तु क्या ये बात सही है? आइये जानते हैं।
महर्षि अंगिरा का वंश
महर्षि अंगिरा (अंगिरस) परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं प्रथम स्वयंभू मन्वन्तर में सप्तर्षियों में से एक हैं। इन्ही के पुत्र देवगुरु बृहस्पति हुए। हालाँकि इनके वंश का बहुत विस्तार से वर्णन हमें महाभारत के वनपर्व में मिलता है जब महर्षि मार्कण्डेय युधिष्ठिर को महर्षि अंगिरा और उनके वंश के विषय में बताते हैं। ये वंश मुख्यतः महर्षि अंगिरा और अग्नि से सम्बंधित है।
वाल्मीकि रामायण की पूरी संरचना (सम्पूर्ण कांड, सर्ग और श्लोक)
- कुल कांड: ७
- कुल मूल सर्ग: ६४२
- कुल प्रक्षिप्त सर्ग: ३
- कुल सर्ग: ६४५
- कुल मूल श्लोक: २३६४४
क्या द्रौपदी ने स्वयंवर में कर्ण का अपमान किया था?
आज की पीढ़ी और शायद पुरानी पीढ़ी भी, जिन्होंने महाभारत को केवल टीवी सीरियलों में देखा है, उनमें से ९९% लोगों की ऐसी मान्यता है कि चूँकि महारथी कर्ण एक सूतपुत्र थे, इसी कारण द्रोपदी ने उनसे विवाह करने से मना कर दिया। लोग ऐसा मानते हैं कि जब महारथी कर्ण ने स्वयंवर में धनुष उठा कर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा ली, तब जैसे ही वो मछली को भेदने के लिए आगे बढे, द्रौपदी ने भरी सभा में ये घोषणा कर दी कि मैं एक सूतपुत्र के साथ विवाह नहीं करुँगी। इससे सबके सामने कर्ण का बड़ा अपमान हुआ।
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
महर्षि विश्वामित्र हिन्दू धर्म के सर्वाधिक प्रसिद्ध, प्रभावशाली और शक्तिशाली ऋषियों में से एक हैं। वो हमारे धर्म के उन गिने चुने ऋषियों में से एक हैं जिन्होंने ऋषियों के सर्वोच्च पद, अर्थात ब्रह्मर्षि के पद को प्राप्त किया था। सबसे कमाल की बात ये है कि ब्रह्मर्षि के पद को प्राप्त करने वाले विश्वामित्र वास्तव में ब्राह्मण वर्ण के थे ही नहीं। वे जन्म से एक क्षत्रिय थे और उन्होंने अपने तप के बल पर ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया। वे इस बात के ज्वलंत उदाहरण हैं कि हमारा धर्म जन्म नहीं बल्कि कर्म प्रधान है।
वाल्मीकि रामायण अयोध्या कांड (सम्पूर्ण) - मूल श्लोक और हिंदी अर्थ सहित
गच्छता मातुलकुलं भरतेन तदानघः।
शत्रुघ्नो नित्यशत्रुघ्नो नीतः प्रीतिपुरस्कृतः॥१॥
(पहले यह बताया जा चुका है कि) भरत अपने मामा के यहाँ जाते समय काम आदि शत्रुओं को सदा के लिये नष्ट कर देने वाले निष्पाप शत्रुघ्न को भी प्रेमवश अपने साथ लेते गये थे॥१॥
नरसिंह मंदिर (बीदर) - रहस्यलोक सा मंदिर
कुछ समय पहले मुझे अपने परिवार के साथ कर्णाटक में बीदर नामक स्थान पर जाने का अवसर मिला। ये स्थान एक गुरूद्वारे के कारण प्रसिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि जब गुरु नानक अपनी यात्रा पर निकले थे तो वे यहाँ पर भी रुके थे। मैं उसी गुरूद्वारे में रुका और मुझे पता चला कि लगभग १५ किलोमीटर दूर भगवान नृसिंह का एक प्रसिद्ध मंदिर है। हमने वहां जाने का निश्चय किया।
वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड (सम्पूर्ण) - मूल श्लोक और हिंदी अर्थ सहित
ॐ तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम्॥१॥
तपस्वी वाल्मीकिजी ने तपस्या और स्वाध्याय में लगे हुए विद्वानों में श्रेष्ठ मुनिवर नारदजी से पूछा-
क्या अंगद ने रावण को अपना पैर उखाड़ने की चुनौती दी थी?
रामायण में अंगद द्वारा रावण को अपना पैर हिलाने की चुनौती देने वाला प्रसंग रामायण के सबसे रोचक प्रसंगों में से एक है। संक्षेप में कथा ये है कि जब श्रीराम की सेना ने समुद्र में पुल बना कर लंका में प्रवेश किया तब उस युद्ध को रोकने के अंतिम प्रयास के रूप में श्रीराम ने रावण के पास संधि प्रस्ताव भेजने का विचार किया। हालाँकि सुग्रीव उनकी इस बात से सहमत नहीं थे, फिर भी श्रीराम की आज्ञा मान कर उन्होंने अंगद को अपना दूत बना कर रावण के पास भेजा।
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