बुधवार, दिसंबर 20, 2017

पौराणिक काल के योद्धाओं का स्तर

हम सभी ने कई बार रामायण, महाभारत एवं अन्य पौराणिक कहानियों में योद्धाओं की पदवी के विषय में पढ़ा है। सबसे आम शब्द जो इन पुस्तकों में आता है वह है "महारथी" और ये शब्द इतना आम बना  दिया गया है कि किसी भी प्रसिद्ध योद्धा के लिए हम महारथी शब्द का प्रयोग कर लेते है जबकि सत्य ये है कि महारथी एक बहुत बड़ी श्रेणी होती थी और कुछ चुनिंदा योद्धा हीं महारथी के स्तर तक पहुच पाते थे। क्या आपको पता है कि इन श्रेणिओं को पाने के लिए भी कुछ योग्यता जरुरी होती थी? आज हम पौराणिक काल के योद्धाओं के स्तर के बारे में जानेंगे। यहाँ हम किसी साधारण सैनिक नहीं बल्कि उच्च कोटि के योद्धाओं की बात करेंगे।

यहाँ मैं विशेष रूप से अनुरोध करना चाहूंगा कि इसे बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ें। अर्थात केवल इसी कारण कि हमें कोई योद्धा सर्वाधिक पसंद है, हम उसे ऊपर की श्रेणी में नहीं डाल सकते। ये भी ध्यान रखें कि किसी भी योद्धा को केवल उसके शारीरिक बल से नहीं अपितु उसके द्वारा प्राप्त दिव्यास्त्रों के आधार पर भी प्रमाणित किया जाता था। उदाहरण के लिए अर्जुन शारीरिक बल में भीम से कहीं पीछे थे किन्तु दिव्यास्त्रों के आधार पर उनसे कहीं आगे।

इसके अतिरिक्त कृपया रामायण और महाभारत के योद्धाओं की आपस में तुलना न करें। उनका बल उनके काल में उनके समकक्ष योद्धाओं के लिहाज से देखें। अन्यथा रामायण काल के सामान्य योद्धा भी महाभारत काल के महारथी से अधिक शक्तिशाली थे। उसी प्रकार किसी देवता की तुलना साधारण मनुष्य से ना करें। उनका बल भी उनके समक्ष देवताओं अथवा दानवों के सन्दर्भ में है। 


प्राचीन काल के प्रमुख योद्धाओं को मुख्यतः  श्रेणियों में बांटा गया है:
  1. अर्धरथी: अर्धरथी एक प्रशिक्षित योद्धा होता था जो अस्त्र-शस्त्रों के सञ्चालन में निपुण होता था। एक अर्धरथी अकेले २५०० सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता था। रामायण और महाभारत की बात करें तो इन युद्धों में असंख्य अर्धरथियों ने हिस्सा लिया था। उल्लेखनीय है कि महाभारत युद्ध में योद्धओं के बल का वर्णण करते हुए पितामह भीष्म ने कर्ण की गिनती एक अर्धरथी के रूप में कर दी थी। कई लोग मानते हैं कि इसी कारण कर्ण ने भीष्म के रहते युद्ध में भाग नहीं लिया था। 
  2. रथी: एक ऐसा योद्धा जो सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र के सञ्चालन में निपुण हो तथा २ अर्धरथियों, अर्थात ५००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सके।
    1. रामायण: रामायण में कई रथियों ने हिस्सा लिया जिनका बहुत विस्तृत वर्णण नहीं मिलता है। राक्षसों में खर, दूषण, तड़का, मारीच, सुबाहु, वातापि आदि रथी थे। वानरों में गंधमादन, मैन्द एवं द्विविन्द, हनुमान के पुत्र मकरध्वज, शरभ एवं सुषेण को रथी माना जाता था।
    2. महाभारत: सभी कौरव, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, शकुनि, उसका पुत्र उलूक, उपपांडव (प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक एवं श्रुतसेन), विराट, उत्तर, शिशुपाल पुत्र धृष्टकेतु, जयद्रथ, शिखंडी, सुदक्षिण, शंख, श्वेत, इरावान, कर्ण के सभी पुत्र, सुशर्मा, उत्तमौजा, युधामन्यु, जरासंध पुत्र सहदेव, बाह्लीक पुत्र सोमदत्त, कंस, अलम्बुष, अलायुध, बृहदबल आदि की गिनती रथी के रूप में होती थी। दुर्योधन को ८ रथियों के बराबर माना गया है। 
  3. अतिरथी: एक ऐसा योद्धा जो सामान्य अस्त्रों के साथ अनेक दिव्यास्त्रों का भी ज्ञाता हो तथा युद्ध में १२ रथियों, अर्थात ६०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सकता हो। 
    1. रामायण: लव, कुश, अकम्पन्न, विभीषण, देवान्तक, नरान्तक, महिरावण, पुष्कल, काल में अंगद, नल, नील, प्रहस्त, अकम्पन, भरत पुत्र पुष्कल, विभीषण, त्रिशिरा, अक्षयकुमार, हनुमान के पिता केसरी अदि अतिरथी थे।
    2. महाभारत: भीम, जरासंध, धृष्टधुम्न, कृतवर्मा, शल्य, भूरिश्रवा, द्रुपद, घटोत्कच, सात्यिकी, कीचक, बाह्लीक, साम्ब, प्रद्युम्न, कृपाचार्य, शिशुपाल, रुक्मी, सात्यिकी, बाह्लीक, नरकासुर, प्रद्युम्न, कीचक आदि अतिरथी थे।
  4. महारथी: ये संभवतः सबसे प्रसिद्ध पदवी थी और जो भी योद्धा इस पदवी को प्राप्त करते थे वे पुरे विश्व में सम्मानित और प्रसिद्ध होते थे। महारथी एक ऐसा योद्धा होता था जो सभी ज्ञात अस्त्र शस्त्रों और कई दिव्यास्त्रों को चलने में समर्थ होता था। युद्ध में महारथी १२ अतिरथियों अथवा ७२०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता था। इसके अतिरिक्त जिस भी योद्धा के पास ब्रह्मास्त्र का ज्ञान होता था (जो गिने चुने ही थे) वो सीधे महारथी की श्रेणी में आ जाते थे। 
    1. रामायण: भरत, शत्रुघ्न, अंगद, सुग्रीव, अतिकाय, कुम्भकर्ण, प्रहस्त, जामवंत आदि महारथी की श्रेणी में आते हैं। रावण, बाली एवं कर्त्यवीर्य अर्जुन को एक से अधिक महारथियों के बराबर माना गया है।
    2. महाभारत: अभिमन्यु, बभ्रुवाहन, अश्वत्थामा, भगदत्त, बर्बरीक आदि महारथी थे। भीष्म, द्रोण, कर्ण, अर्जुन एवं बलराम को एक से अधिक महारथियों के बराबर माना गया है। कहीं-कहीं अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के कारण अतिमहारथी भी कहा जाता है किन्तु उसका कोई लिखित सन्दर्भ नहीं है।
  5. अतिमहारथी: इस श्रेणी के योद्धा दुर्लभ होते थे। अतिमहारथी उसे कहा जाता था जो १२ महारथी श्रेणी के योद्धाओं अर्थात ८६४०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना अकेले कर सकता हो साथ ही सभी प्रकार के दैवीय शक्तियों का ज्ञाता हो। 
    1. महाभारत: महाभारत काल में केवल भगवान श्रीकृष्ण को अतिमहारथी माना जाता है। 
    2. रामायण: रामायण में भगवान श्रीराम अतिमहारथी थे। उनके अतिरिक्त मेघनाद को अतिमहारथी माना जाता है क्यूंकि केवल वही था जिसके पास तीनों महास्त्र - ब्रम्हास्त्र, नारायणास्त्र एवं पाशुपतास्त्र थे। पाशुपतास्त्र को छोड़ कर लक्ष्मण को भी समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान था अतः कुछ जगह उन्हें भी इस श्रेणी में रखा जाता है। इसके अतिरिक्त भगवान परशुराम और महावीर हनुमान का भी वर्णन कई स्थान पर अतिमहारथी के रूप में किया गया है।
    3. अन्य: भगवान विष्णु के अवतार विशेष कर वाराह एवं नृसिंह को भी अतिमहारथी की श्रेणी में रखा जाता है। कुछ देवताओं जैसे कार्तिकेय, गणेश तथा वैदिक युग के ग्रंथों में इंद्र, सूर्य एवं वरुण को भी अतिमहारथी माना जाता है। आदिशक्ति की दस महाविद्याओं, नवदुर्गा एवं रुद्रावतार, विशेषकर वीरभद्र और भैरव को भी अतिमहारथी माना जाता है।
  6. महामहारथी: ये किसी भी प्रकार के योद्धा का उच्चतम स्तर माना जाता है। महामहारथी उसे कहा जाता है जो २४ अतिमहारथियों अर्थात २०७३६०००० सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता हो। इसके साथ ही समस्त प्रकार की दैवीय एवं महाशक्तियाँ उसके अधीन हो। इन्हे परास्त नहीं किया जा सकता। आज तक पृथ्वी पर कोई भी योद्धा अथवा अवतार इस स्तर पर नहीं पहुँचा है। इसका एक कारण ये भी है कि अभी तक २४ अतिमहारथी एक काल में तो क्या पूरे कल्प में भी नहीं हुए हैं। केवल त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र) एवं आदिशक्ति को ही इतना शक्तिशाली माना जाता है।

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