सोमवार, अप्रैल 30, 2018

नृसिंह अवतार

आप सभी को नृसिँह जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं। भगवान नृसिंह का स्थान दशावतार में चौथा माना जाता है। आज के दिन ही अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा और हिरण्यकशिपु के संहार के लिए भगवान विष्णु ने सतयुग में आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में अवतार लिया था। महर्षि कश्यप और दक्ष की ज्येष्ठ पुत्री दिति के पुत्र के रूप में हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष नामक दो अत्यंत शक्तिशाली दैत्यों का जन्म हुआ। यहीं से दैत्यकुल का आरम्भ हुआ। हिरण्यकशिपु दैत्यों का सम्राट हुआ एवं उसके अनुज हिरण्याक्ष ने अपने बल से उसकी राज्य की सीमा अनंत तक फैला दी। उससे भी उसकी महत्वाकांक्षा नहीं मिटी तो उसने धरती को समुद्र के गर्भ में धकेल दिया। सारी सृष्टि में हाहाकार मच गया जिस कारण नारायण ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध कर दिया।

अपने भाई के वध से हिरण्यकशिपु के मन में मृत्यु का भय बैठ गया। इसके निदान के लिए उसने परमपिता ब्रह्मा की घोर तपस्या की और उनके प्रसन्न होने पर उनसे अमरता का वरदान माँगा किन्तु ब्रह्मदेव ने ये कहते हुए मना कर दिया कि मृत्यु सृष्टि का नियम है। इसपर हिरण्यकशिपु ने चतुरता दिखते हुए उनसे वरदान माँगा कि "हे पितामह! अगर आप मुझे अमरता का वरदान नहीं दे सकते तो ठीक है पर मुझे ये वरदान दीजिये कि देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, असुर, मानव, नाग, सर्प, पशु या कोई अन्य मेरा वध ना कर सके। मुझे ना दिन में मारा जा सके न रात में। ना अस्त्र से, ना शस्त्र से। ना भूमि पर, ना जल में और ना ही आकाश ही में मेरा वध किया जा सके। मुझे ना भवन के अंदर मारा जा सके और ना ही बाहर।"ब्रह्मदेव ने कुछ सोचा और फिर तथास्तु कह दिया। हिरण्यकशिपु अत्यंत प्रसन्न हुआ और निश्चिंत भी कि अब तो मेरा वध असंभव है। उसने समस्त देवों, विशेषकर भगवान विष्णु की आराधना बंद करवा दी और स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया। जिस किसी ने भी उसका आदेश नहीं माना उसे मृत्यु के घाट उतार दिया गया। पृथ्वी एक बार फिर से पाप के बोझ तले दब गयी। जगत एक बार फिर हाहाकार कर उठा। 

जिस प्रकार कीचड में कमल खिलता है उसी प्रकार उस अधर्मी के प्रह्लाद नामक एक पुत्र हुआ। हिरण्यकश्यप की पत्नी और प्रह्लाद की माता कयाधु महान विष्णु भक्तिनी थी और यही संस्कार गर्भ समय से ही प्रह्लाद में आ गए। कई वर्षों तक तो हिरण्यकश्यप को कुछ पता नहीं चला किन्तु धीरे-धीरे प्रह्लाद की विष्णु भक्ति पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गयी। जब उसे ये पता चला कि उसी का पुत्र उसके शत्रु नारायण का परम भक्त है तो उसके क्रोध की सीमा नहीं रही। वो प्रह्लाद से अत्यंत प्रेम करता था किन्तु अपनी सत्ता कायम रखने के लिए उसने उसकी हत्या करने का निश्चय किया। लेकिन जिसके रक्षक स्वयं नारायण हो उसका कोई क्या बिगाड़ सकता है? उसने हर प्रयत्न कर लिया किन्तु प्रह्लाद का कुछ नहीं बिगड़ा। यहाँ तक कि इस प्रयास में उसकी बहन होलिका को भी अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

अंत में कोई और उपाय देख कर उसने स्वयं प्रह्लाद के वध का निश्चय किया। उसे मारने से पहले उसने प्रह्लाद से पूछा कि "रे मुर्ख! तू क्यों व्यर्थ विष्णु की भक्ति के कारण अपने प्राणों से हाथ धोना चाहता है। मैं तुझसे अत्यंत स्नेह करता हूँ। अभी भी समय है अगर तू मुझे ईश्वर मान ले तो तेरे प्राण बच सकते हैं।" इसपर प्रह्लाद ने कहा "हे पिताश्री! पुत्र होने के नाते तो मैं आपकी पूजा एक ईश्वर की भांति ही करता हूँ किन्तु जब इस जगत के ईश्वर की बात आती है तो वो केवल नारायण ही हैं। वो तो इस सृष्टि के कण-कण में समाये हैं।" प्रह्लाद की ऐसी बातें सुनकर हिरण्यकशिपु ने एक विकट गदा उठाई और कहा "नराधम! तेरी मृत्यु मेरे हाथों ही लिखी है लेकिन मैं तुझे रक्षा का एक मौका अवश्य दूंगा। तूने कहा कि विष्णु हर जगह है, क्या वो इस स्तम्भ में भी है?" प्रह्लाद के हामी भरने पर उसने एक भीषण प्रहार उस स्तम्भ पर किया जिससे उस स्तम्भ के टुकड़े-टुकड़े हो गए।

अचानक उसी स्तम्भ से तड़ित की गर्जना सी हुई और एक अर्ध सिंह एवं अर्ध नर के रूप में भगवान नृसिंह घोर गर्जना करते हुए प्रकट हुए। उनका सर सिंह का और शेष शरीर मनुष्य का था। ऑंखें रक्तिम और जिह्वा अग्नि के सामान थी। उनके तीक्ष्ण नख स्वयं वज्र के भांति चमक रहे थे। उनका तेज स्वयं सूर्य के सामान था और देखने में वो साक्षात् मृत्यु की भांति प्रतीत हो रहे थे। उनका रूप इतना भयानक था कि हिरण्यकशिपु के अंगरक्षक तो उन्हें देखते ही अचेत हो गए। औरों की क्या कहें, उनका ये रूप देख कर विष्णुभक्त प्रह्लाद भी भय से कांपने लगा। ऐसा रूप और बल को देख कर हिरण्यकशिपु के भी प्राण सूख गए। उसने उसी गदा से भगवान नृसिंह पर प्रहार किया किन्तु उन्होंने बात ही बात में उस गदा को अपने मुष्टि के प्रहार से चूर्ण कर दिया। उसके बाद हिरण्यकशिपु ने एक के बाद एक अस्त्रों की झड़ी लगा दी किन्तु कोई भी भगवान नृसिंह के शरीर को छू भी ना पाया।

तब भगवान विष्णु के उस महान अवतार ने हिरण्यकशिपु को अपनी भुजाओं में इस प्रकार उठा लिया जैसे कोई महावीर किसी बालक को उठा लेता है। उन्होंने उसे अपनी जंघा पर रखा और उसके वक्ष पर अपने नख टिका दिए। उसी समय आकाशवाणी हुई - "हे हिरण्यकशिपु! देख जो तेरा वध कर रहा है वो ना मनुष्य है और न ही पशु, ना देव, ना दैत्य, ना राक्षस, ना यक्ष और ना ही गन्धर्व ही है। ये परमपिता ब्रम्हा द्वारा सृजित सभी चराचरों से भिन्न हैं। अभी ना दिन है, ना ही रात्रि। ये गोधुलिबेला का काल है। तू ना पृथ्वी पर है, ना जल में और ना ही आकाश में। तेरा वध ना अस्त्र से हो रहा है ना ही शस्त्र से। अपने आप को अमर मान कर जो भी पाप तूने किये हैं उसके अंत का समय अब आ गया है। आज पृथ्वी तुझ जैसे अत्याचारी के भार से मुक्त होने वाली है।" ऐसी आकाशवाणी होते ही भगवान नृसिंह ने अपने वज्र सामान नखों से उस महापापी दैत्य का ह्रदय चीर कर उसके प्राणों का अंत कर डाला।

उसका अंत होते ही देवताओं ने स्वर्ग से पुष्प-वर्षा की। प्रह्लाद हो इस प्रकार भयभीत देख कर भगवान नृसिंह ने उसे अपने ह्रदय से लगाया और सांत्वना दी और उसे दैत्यकुल का नया सम्राट नियुक्त कर दिया। एक कथा के अनुसार जब हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद भी भगवान नृसिंह का क्रोध शांत ना हुआ तो उन्हें वश में करने हेतु भगवान शंकर ने शरभ अवतार लिया। 

एक और कथा के अनुसार भगवान नारायण के पार्षद जय-विजय ही सनत्कुमारों के श्राप के कारण हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्में। मान्यता है कि वर्तमान में आंध्रप्रदेश के विशाखापट्नम में स्थित सिंहाचल पर्वत पर ही भगवान नृसिंह का वास है। स्थल पुराण के अनुसार ऐसा माना जाता है कि ये मंदिर स्वयं प्रह्लाद ने बनवाया था जो गर्त में चला गया किन्तु कालांतर में लुनार वंश के पुरुरवा ने इसकी खोज की और पुनर्निर्माण करवाया। इस प्रतिमा को साल भर चन्दन के लेप से ढँक कर रखा जाता है और आज ही के दिन केवल एक दिन के लिए लेप हटाया जाता है ताकि भक्तगण इसके दर्शन कर सकें। इसके अतिरिक्त बिहार के पूर्णिया जिले के धरहरा गाँव में स्थित सिकुलीगढ़ को भी नृसिंहदेव का जन्म स्थल माना जाता है। यहाँ एक अतिप्राचीन खंडित स्तम्भ है और ऐसी मान्यता है कि इसी स्तम्भ में से भगवान नृसिंह प्रकट हुए थे (इसका चित्र आप ऊपर देख सकते हैं)। आज के दिन उपवास रखा जाता है और नृसिंह मन्त्र से भगवान की स्तुति की जाती है। ये मन्त्र है: 

नृसिंह देवदेवेश तव जन्मदिने शुभे।
उपवासं करिष्यामि सर्वभोगविवर्जितः॥

आज के दिन मन में संकल्प रख नृसिंह भगवान का व्रत करने पर मनुष्य की हर मनोकामना पूर्ण होती है और शत्रु उसकी ओर मुख भी नहीं कर सकते। आज के दिन मनुष्य के समस्त विघ्न केवल नृसिंह मन्त्र के जपते ही समाप्त हो जाते हैं। जय भगवान नृसिंह।

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