महाजनपद

हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में १६ मुख्य साम्राज्यों का वर्णन मिलता है जिन्हे महाजनपद के नाम से जाना जाता था। इससे मिलते जुलते विवरण बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी मिलते हैं। महाजनपद वास्तव में कई साम्राज्यों का समूह होता था जिसके अंतर्गत राज्यों के राजा महाजनपद के प्रमुख राजा के अधीन रहते थे। इनका राजनितिक महत्त्व बहुत अधिक था। आइये इसके बारे में कुछ जानते हैं:

अक्षौहिणी सेना

अक्षौहिणी प्राचीन भारत में सेना का माप हुआ करता था जिसका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है। किसी भी अक्षौहिणी सेना के चार विभाग होते थे:
  1. गज (हाँथी सवार)
  2. रथ (रथी)
  3. घोड़े (घुड़सवार)
  4. सैनिक (पैदल सिपाही)

एकश्लोकी रामायण

एकश्लोकी रामायण
।। आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनं
वैदेही हरणं, जटायु मरणं, सुग्रीव संभाषणं
बालि निर्दलं, समुन्द्र तरणं, लंकापुरी दाहनं
पश्चाद्रावण-कुम्भकरण हननं, एतद्धि रामायणं ।।

दशावतार

हिन्दू धर्म में अवतारों की बड़ी महत्ता है। वैसे तो कई देवताओं ने अवतार लिए किन्तु भगवान विष्णु के १० अवतारों का महत्त्व सबसे अधिक माना जाता है। भगवान शिव के भी कई अवतार हैं किन्तु उनके लिए ज्योतिर्लिंगों का ही उल्लेख होता है। प्रत्येक युग में जितने चरण होते हैं, श्रीहरि के उतने ही अवतार होते हैं। युगों का विस्तृत वर्णन आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

हिन्दू धर्म में सप्त संख्या का महत्त्व

हिन्दू धर्म में सप्त संख्याओं का बड़ा महत्त्व है। ऐसी कई चीजें हैं जिससे सप्त संख्या सीधे तौर पर जुडी हुई है। आइए इसे देखते हैं:

श्रीराम का वंश

भगवान श्रीराम श्रीहरि के ७वें अवतार हैं। श्रीराम के विषय में तो जितना कहा जाये उतना कम है और अगर हम इनके वंश के विषय में जानें तो देखते हैं कि श्रीराम जिस इक्षवाकु कुल में जन्मे उस कुल में एक से एक प्रतापी सम्राट हुए। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे। गौतम बुद्ध का जन्म भी बहुत बाद में श्रीराम के पुत्र कुश के वंश में ही हुआ। इक्ष्वाकु कुल का वर्णन रामायण में महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया था जब महाराज दशरथ और महाराज जनक के बीच श्रीराम और देवी सीता के विवाह का वार्तालाप चल रहा था। आइये इस महान वंश के विषय में जानते हैं: