हिन्दू धर्म में अवतारों की बड़ी महत्ता है। वैसे तो कई देवताओं ने अवतार लिए किन्तु भगवान विष्णु के १० अवतारों का महत्त्व सबसे अधिक माना जाता है। भगवान शिव के भी कई अवतार हैं किन्तु उनके लिए ज्योतिर्लिंगों का ही उल्लेख होता है। प्रत्येक युग में जितने चरण होते हैं, श्रीहरि के उतने ही अवतार होते हैं। युगों का विस्तृत वर्णन आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
हिन्दू धर्म में सप्त संख्या का महत्त्व
हिन्दू धर्म में सप्त संख्याओं का बड़ा महत्त्व है। ऐसी कई चीजें हैं जिससे सप्त संख्या सीधे तौर पर जुडी हुई है। आइए इसे देखते हैं:
- सप्तद्वीप: जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप एवं पुष्करद्वीप
- सप्त पुरियां: अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन एवं द्वारका
श्रीराम का वंश
भगवान श्रीराम श्रीहरि के ७वें अवतार हैं। श्रीराम के विषय में तो जितना कहा जाये उतना कम है और अगर हम इनके वंश के विषय में जानें तो देखते हैं कि श्रीराम जिस इक्षवाकु कुल में जन्मे उस कुल में एक से एक प्रतापी सम्राट हुए। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे। गौतम बुद्ध का जन्म भी बहुत बाद में श्रीराम के पुत्र कुश के वंश में ही हुआ। इक्ष्वाकु कुल का वर्णन रामायण में महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया था जब महाराज दशरथ और महाराज जनक के बीच श्रीराम और देवी सीता के विवाह का वार्तालाप चल रहा था। आइये इस महान वंश के विषय में जानते हैं:
श्रीराम और भगवान शिव का युद्ध
बात उन दिनों कि है जब श्रीराम का अश्वमेघ यज्ञ चल रहा था। श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न के नेतृत्व में असंख्य वीरों की सेना उन सारे प्रदेशों को विजित करती जा रही थी जहाँ भी यज्ञ का अश्व जा रहा था। इस क्रम में कई राजाओं के द्वारा यज्ञ का घोड़ा पकड़ा गया लेकिन अयोध्या की सेना के आगे उन्हें झुकना पड़ा। शत्रुघ्न के आलावा सेना में हनुमान, सुग्रीव और भारत पुत्र पुष्कल सहित कई महारथी उपस्थित थे जिन्हें जीतना देवताओं के लिए भी संभव नहीं था। उसपर श्रीराम का प्रताप ऐसा था कि कोई भी राजा उनके ध्वज तले राज्य करना अपना सौभाग्य मानता था। इसी कारण उस सेना को अधिक प्रयास भी नहीं करना पड़ रहा था।
श्रीकृष्ण और भगवान शिव का युद्ध
दानवीर दैत्यराज बलि के सौ प्रतापी पुत्र थे, उनमें सबसे बड़ा बाणासुर था। बाणासुर ने भगवान शंकर की बड़ी कठिन तपस्या की। शंकर जी ने उसके तप से प्रसन्न होकर उसे सहस्त्र भुजाएं तथा अपार बल दे दिया। उसके सहस्त्र बाहु और अपार बल के भय से कोई भी उससे युद्ध नहीं करता था। इसी कारण से बाणासुर अति अहंकारी हो गया। बहुत काल व्यतीत हो जाने के पश्चात् भी जब उससे किसी ने युद्ध नहीं किया।
पांडवों का दिग्विजय
महाराज युधिष्ठिर का राजसू यज्ञ प्रारंभ होने वाला था। राजसू यज्ञ करने से पहले यह जरुरी था कि सारे राजा युधिष्ठिर का आधिपत्य स्वीकार कर ले। जरासंध पहले हीं भीम के हांथों मारा जा चुका था। राजसू यज्ञ के मार्ग में केवल वही एक बाधा था। इसके बाद चारों दिशाओं के राजाओं को जीतने के लिए युधिष्ठिर के चारो भाई चार दिशाओं में दिग्विजय के लिए निकले। उन चारों ने अपने-अपने दिग्विजय में कई राजाओं से युद्ध किया। आइये उस विषय में कुछ जानते हैं।
१०० कौरवों के नाम
हम सब जानते हैं की धृतराष्ट्र ने गांधारी से विवाह किया जिससे उन्हें १०० पुत्रों और एक पुत्री दुःशला की प्राप्ति हुई। इसके अतिरिक्त गांधारी की दासी सुगंधा से उन्हें एक पुत्र और प्राप्त हुआ - युयुत्सु पर चूँकि वो दासी पुत्र था इसी कारण उसे कौरवों में नहीं गिना गया। हालाँकि महाभारत के युद्ध के बाद केवल वही था जो जीवित बचा। आइये धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों के नाम जानते हैं।
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