२१ जुलाई २०१२, ठीक अपने जन्मदिन के दिन मैं अपने एक मित्र प्रशांत साहू के साथ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में भ्रमण के लिए गया था। वहाँ विज्ञान भवन में एक पूरा हिस्सा महाभारत को समर्पित था। वही मैंने महाभारत में प्रयोग किये गए इन व्यूहों का चित्र देखा। वैसे तो इसका चित्र लेना प्रतिबंधित था किन्तु फिर मैंने जब सुरक्षा अधिकारीयों को धर्मसंसार के बारे में बताया तब उन्होंने इन चित्रों को लेने की अनुमति दे दी।
अति प्राचीन विश्व के नक्शों पर भारत
२१ जुलाई २०१२, ठीक अपने जन्मदिन के दिन मैं अपने एक मित्र प्रशांत साहू के साथ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में भ्रमण के लिए गया था। वहाँ विज्ञान भवन में एक पूरा हिस्सा महाभारत को समर्पित था। वही मैंने इन दुर्लभ नक्शों को देखा। वैसे तो इसका चित्र लेना प्रतिबंधित था किन्तु फिर मैंने जब सुरक्षा अधिकारीयों को धर्मसंसार के बारे में बताया तब उन्होंने इन चित्रों को लेने की अनुमति दे दी।
जब दो ब्रह्मास्त्रों का सामना हुआ - अर्जुन और अश्वत्थामा का युद्ध
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरवों की ओर से केवल तीन महारथी हीं जीवित बचे थे - अश्वत्थमा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। दुर्योधन की मृत्यु से दुखी अश्वत्थामा ने पांडवों को छल से मारने की प्रतिज्ञा की। उसने दुर्योधन को मरते हुए वचन दिया था कि जैसे भी हो वो पांचों पांडवों को अवश्य मार डालेगा। कृपाचार्य ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की पर अंततः उन्होंने भी उसका साथ देने की स्वीकृति भर दी।
जब भगवान शिव ने माता सती का त्याग किया
सभी लोग जानते हैं कि सती ने अपने पिता द्वारा शिव को यज्ञ में आमंत्रित न करने और उनका अपमान करने पर उसी यज्ञशाला में आत्मदाह कर लिया था लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि इसकी भूमिका बहुत पहले हीं लिखी जा चुकी थी। ये कथा रामचरितमानस के बालकाण्ड में दी गयी है।
महर्षि कश्यप का वंश
महर्षि कश्यप परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र थे, इस प्रकार वे ब्रह्मा के पोते हुए। महर्षि कश्यप ने ब्रह्मापुत्र प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया। संसार की सारी जातियां महर्षि कश्यप की इन्ही १७ पत्नियों की संतानें मानी जाति हैं। इसी कारण महर्षि कश्यप की पत्नियों को लोकमाता भी कहा जाता है। प्रजापति दक्ष की सभी पुत्रियों और उनके पति के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ जाएँ। उनकी पत्नियों और उनसे उत्पन्न संतानों का वर्णन नीचे है:
महाभारत में १८ संख्या का महत्त्व
महाभारत कथा में १८ (अठारह) संख्या का बड़ा महत्त्व है। महाभारत की कई घटनाएँ १८ संख्या से सम्बंधित है। कुछ उदाहरण देखें:
- महाभारत का युद्ध कुल १८ दिनों तक हुआ था।
- कौरवों (११ अक्षौहिणी) और पांडवों (७ अक्षौहिणी) की सेना भी कुल १८ अक्षौहिणी थी।
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