महर्षि रुरु और प्रमद्वरा की कथा

महर्षि रुरु और प्रमद्वरा की कथा
आज वट सावित्री का पर्व है। सावित्री के पात्रिव्रत के विषय में हमने एक लेख पहले ही प्रकाशित किया है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। सावित्री और उन जैसे अनेकों पतिव्रताओं की कथा से हमारे ग्रन्थ भरे पड़े हैं पर आज हम आपको एक ऐसे पुरुष की कथा सुनाते हैं जिन्होंने अपने मृत पत्नी के प्राण यमराज की कृपा से वापस प्राप्त किये।

इस कथा का वर्णन हमें व्यास महाभारत के आदि पर्व के अध्याय ८ से १२ तक में मिलता है। इस कथा के अनुसार महर्षि भृगु एवं पौलोमा के पुत्र महर्षि च्यवन और उनकी पत्नी सुकन्या के एक पुत्र थे प्रमति। वे बड़े तेजस्वी थे। उनका अनुराग घृताची नामक अप्सरा पर हुआ और उन दोनों के एक पुत्र हुए रुरु।

उसी कल में गन्धर्व विश्वावसु और अप्सराओं में श्रेष्ठ मेनका के संसर्ग से एक कन्या का जन्म हुआ। उस कन्या को मेनका ने एक आश्रम के निकट नदी तट पर छोड़ दिया और वापस स्वर्ग लोक चली गयी। वो आश्रम महर्षि स्थूलकेश का था। जब महर्षि स्थूलकेश ने एक कन्या को अपने आश्रम के पास देखा तो उन्होंने दयावश उसे अपनी दत्तक पुत्री के रूप में अपना लिया। वो कन्या संसार की समस्त प्रमदाओं, अर्थात सुंदर स्त्रियों से श्रेष्ठ दिखती थी इसीलिए महर्षि ने उसका नाम प्रमद्वरा रखा।

समय बीता और प्रमद्वरा युवा हो गयी। उसका सौंदर्य अप्सराओं को भी लज्जित कर देने वाला था। एक बार ऋषि प्रमति अपने पुत्र रुरु के साथ महर्षि स्थूलकेश के आश्रम में उनसे मिलने पहुंचे। वहां रुरु ने प्रमद्वरा को देखा और उसके प्रति आकृष्ट हो गए। तब उन्होंने परोक्ष रूप से अपने पिता को अपनी इच्छा बताई। अपने पुत्र की इच्छा पर महर्षि प्रमति ने महर्षि स्थूलकेश से प्रमद्वरा को अपनी पुत्रवधु के रूप में मांग लिया।

इससे महर्षि स्थूलकेश बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी कन्या का वाग्दान कर दिया और आने वाले उत्तरफाल्गुनी नक्षत्र में उन्होंने प्रमद्वरा और रुरु का विवाह निश्चित कर दिया। समय बीता और विवाह का मुहूर्त निकट आ गया। एक दिन प्रमद्वरा अपनी सखियों के साथ वन विहार को गयी। मार्ग में एक विषधर सर्प सो रहा था। प्रमद्वरा ने उसने नहीं देखा और उस पर पैर रखकर बढ़ गयी।

इस पर उस सर्प ने उसे डस लिया और प्राणशून्य हो पृथ्वी पर गिर पड़ी। तब उसकी सखियों ने तत्काल महर्षि स्थूलकेश को वहां बुलाया। प्रमद्वरा की खबर सुन कर प्रमति, रुरु, स्वास्त्यत्रेय, महाजानु, कुशिक, शांकमेखल, उद्दालक, कठ, श्वेत, भारद्वाज, कौणकुत्स्य, आर्ष्टिषेण, गौतम आदि महर्षि वहाँ आ गए। सभी प्रमद्वरा की ये दशा देख कर बड़े दुखी हुए और कई तो क्रंदन करने लगे।

रुरु अपनी होने वाली पत्नी की ये दशा देख नहीं सके और वहां से दूर गहन वन में चले गए और जोर जोर से रुदन करने लगे। उन्होंने अत्यंत आर्त स्वर में विधाता से कहा - "यदि मैंने दान दिया हो, तपस्या की हो और गुरुजनों को भली भांति सेवा की हो तो उसके पुण्य से मेरी प्रिया जीवित हो जाए।"

"यदि मैंने जन्म से लेकर अब तक मन और इन्द्रियों पर संयम रखा हो और ब्रह्मचर्य आदि व्रतों का दृढ़तापूर्वक पालन क्या हो तो मेरी प्रमद्वरा अभी जीवित हो जाये। यदि असुरों का नाश करने वाले जगदीश्वर श्रीहरि (श्रीकृष्ण) में मेरी अविचल भक्ति हो तो यह कल्याणी प्रमद्वरा जी उठे।"

उनकी ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर एक देवदूत उनके पास आये और उन्होंने रुरु से कहा - "धर्मात्मा रुरु! तुम व्यर्थ ही दुखी हो रहे हो क्यूंकि जिसकी आयु पूरी हो चुकी हो वो उसे पुनः नहीं मिल सकती। प्रमद्वरा की आयु समाप्त हो चुकी है इसी कारण तुम अपने मन को शोक में मत डालो।"

तब रुरु ने उनसे प्रार्थना की कि किसी भी प्रकार प्रमद्वरा को प्राण दान मिले। तब उन देवदूत ने कहा कि यदि तुम अपनी पत्नी को अपनी आधी आयु दे दो तो वो जीवित हो सकती है।" तब रुरु ने तत्काल प्रमद्वरा को अपनी आधी आयु देने का संकल्प लिया। ये देख कर वो देवदूत प्रमद्वरा के पिता विश्वावसु को साथ लेकर धर्मराज के पास गए और उनसे रुरु को कामना पूर्ण करने की प्रार्थना की। तब यमराज ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उनकी कृपा से प्रमद्वरा जी उठी।

महर्षि स्थूलकेश रुरु का ऐसा प्रभाव और अपनी पुत्री के प्रति ऐसा प्रेम देख कर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने तय महूर्त में दोनों का विवाह करवा दिया। विवाह तो हो गया किन्तु रुरु का सर्पों के प्रति क्रोध नहीं गया। वे जहाँ भी सर्प को देखते थे उसे दंड से मार डालते थे। एक बार एक वन में उन्हें डुण्डुभ जाति का एक वृद्ध सर्प सोता हुआ मिला। इस जाति के सभी सर्प विषहीन और सात्विक होते थे।

पर रुरु ने अपने स्वाभाव स्वरुप उसे मार डालने के लिए अपना दंड उठाया। ये देख कर उस सर्प ने कहा कि "हे तपोधन! मैंने तो आपका कोई अहित नहीं किया। फिर आप मुझे क्यों मार रहे हैं?" इस पर रुरु ने कहा - "मेरी प्राणों से भी अधिक प्यारी पत्नी को एक सर्प ने डस लिया था। तभी से मैंने प्रतिज्ञा कर ली कि जिस सर्प को देखूंगा उसे मार डालूंगा।"

तब डुण्डुभ ने कहा - "ब्राह्मण! वे दूसरे सर्प होते हैं जो मनुष्यों को डसते हैं। हमारी केवल आकृति उन सर्पों के समान है इसिलए तुम्हे हमें नहीं मरना चाहिए।" ये सुनकर रुरु ने उसका वध नहीं किया पर उनके विषय में जानने की जिज्ञासा प्रकट की। तब डुण्डुभ ने रुरु को अपनी कथा बताई।

उन्होंने कहा कि "मैं पूर्वजन्म में सहस्रपाद नाम का ऋषि था, किन्तु एक ब्राह्मण के श्राप से मुझे सर्प योनि में जन्म लेना पड़ा। पूर्वजन्म में खगम नाम का ब्राह्मण मेरा मित्र था। उसने बहुत तपोबल अर्जित किया किन्तु फिर भी क्रोधी था। एक बार वो अग्निहोत्र कर रहा था तभी मैंने परिहास में एक तिनके का सर्प बना कर उसे डरा दिया जिससे वो मूर्छित हो गया। चेत होने पर उसने क्रोध में मुझे सर्प योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया।"

तब मैंने उससे क्षमा याचना की जिससे द्रवित होकर उसने कहा कि भविष्य में प्रमति पुत्र रुरु से तुम्हारा साक्षात्कार होगा जिसके बाद तुम्हे इस योनि से मुक्ति मिल जाएगी। तब रुरु ने उन्हें अपना परिचय दिया और फिर डुण्डुभ अपने पूर्व स्वरुप में आ गए। उन्होंने रुरु को आस्तीक मुनि की बात बताई और सर्पों की हिंसा बंद करने के लिए कहा।

बाद में रुरु ने अपने पिता प्रमति से जन्मेजय के सर्प यज्ञ और आस्तीक मुनि द्वारा नागों की रक्षा की कथा सुनी। उसके बाद रुरु ने सर्प हत्या बंद कर दी और प्रायश्चित किया। रुरु और प्रमद्वरा के एक पुत्र हुए शुनक। इन्ही शुनक ऋषि के पुत्र महातपस्वी शौनक ऋषि हुए जो महर्षि व्यास के प्रिय शिष्य और सूत जी के घनिष्ठ मित्र थे।

1 टिप्पणी:

  1. ज्ञानवर्धक कथा प्रकाशित करके आप हमारे ज्ञान का संवर्धन करते है हमे आपकी ऐसी ही कथा का इंतजार रहेगा

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