भगवान जगन्नाथ और जगन्नाथ पुरी मंदिर

द्वापर अपने अंतिम चरण में था। कलियुग आने वाला था। उसी वेला में भगवान श्रीकृष्ण ने निर्वाण ले लिया। उनकी मृत्यु के बाद द्वारिका भी समुद्र में डूब गयी। उनके परिवारजनों ने उनका अंतिम संस्कार किया। श्रीकृष्ण का शरीर तो पंचतत्व में विलीन हो गया किन्तु उनका ह्रदय वैसे ही धड़कता रहा। उसे भस्मीभूत करने का बहुत प्रयास किया गया किन्तु वो वैसे का वैसा ही रहा। जब अर्जुन द्वारिका पहुंचे तो उन्होंने उनके ह्रदय हो उनका जीवित स्वरुप मानकर उसे समुद्र में विसर्जित कर दिया।

समय बीता, कलियुग ने पदार्पण किया। उस समय अवन्ति में एक बड़े राजा हुए इन्द्रद्युम्न। वे भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे। एक दिन उनके स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण ने आकर कहा कि नीलगिरि में मैं नीलमाधव के रूप में विद्यमान हूँ और मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए एक मंदिर का निर्माण करो। जब राजा उठे तो वे दिन रात भगवान नीलमाधव के बारे में ही सोचने लगे।

तब उन्होंने अपने भाई विद्यापति से कहा कि वे नीलगिरि जाएँ और कैसे भी कर के वहां से भगवान नीलमाधव की प्रतिमा को यहाँ ले आएं। कुछ स्थानों पर विद्यापति को उनका मंत्री और पुरोहित भी कहा गया है। विद्यापति राजा की आज्ञा अनुसार नीलगिरि पहुंचे और नीलमाधव के बारे में पता किया। उन्हें पता चला कि वो प्रतिमा कहाँ पर है ये केवल उस प्रान्त के सरदार विश्वावसु को ही पता है।

विद्यापति विश्वावसु के पास पहुंचे। विश्वावसु ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया। कुछ दिन वहां रहने के बाद विद्यापति को पता चला कि विश्वावसु हर शाम कहीं जाते हैं और फिर अगले दिन सवेरे ही वापस लौटते हैं। उन्हें लगा कि हो ना हो वो नीलमाधव की पूजा करने ही जाते होंगे। समस्या ये थी कि विश्वावसु हर दिन केवल अकेले ही जाते थे और उनके साथ कोई और नहीं होता था। विद्यापति ने एक-आध बार साथ चलने का अनुरोध भी किया किन्तु विश्वावसु ने मना कर दिया।

तब विद्यापति ने एक और तरीका सोचा। विश्वावसु की एक कन्या थी ललिता। विद्यापति ने उससे साहचर्य बढ़ाया और दोनों में प्रेम हो गया। जब विश्वावसु को ये पता चला तो उन्होंने दोनों का विवाह करवा दिया। विवाह के बाद विद्यापति के पूछने पर ललिता ने उन्हें बता दिया कि उनके पिता हर शाम भगवान नीलमाधव की पूजा करने जाते हैं लेकिन वो स्थान इतना गुप्त है कि वे अपने साथ किसी और को नहीं ले जाते। तब विद्यापति ने ललिता से उस प्रतिमा के दर्शन की इच्छा बताई।

इस पर ललिता ने अपने पिता से उन्हें उस प्रतिमा के दर्शन करवाने का अनुरोध किया। चूँकि अब विद्यापति विश्वावसु के दामाद थे इसीलिए वे इस बार उनके अनुरोध को टाल नहीं सके। किन्तु उन्होंने एक शर्त रख दी कि वे उनके आँखों में पट्टी बाँध कर ले चलेंगे ताकि वो स्थान गुप्त ही रहे। विद्यापति ने हां कर दी। उस शाम जब विश्वावसु विद्यापति की आँखों पर पट्टी बांध कर उसे ले चले तो विद्यापति ने चालाकी से अपनी जेब में सरसों के दाने भर लिए और उसे रस्ते भर गिराते चले।

जब विद्यापति के आँखों की पट्टी खोली गयी तो उन्होंने अपने आप को एक गुफा में देखा और अपने सामने प्रभु नीलमाधव की मूर्ति देखी। उसे देख के वे भाव-विभोर हो गए और रोने लगे। कुछ दिनों के बाद विद्यापति विश्वावसु की आज्ञा से ललिता को लेकर वापस लौट गए। लौटकर उन्होंने महाराज इन्द्रद्युम्न से सारी बातें बताई। इन्द्रद्युम्न तत्काल विद्यापति को लेकर नीलगिरि पहुंचे।

तब तक वो सरसों के दानें छोटे-छोटे पेड़ बन चुके थे जिसका पीछा करते हुए दोनों उस गुफा तक पहुंचे। किन्तु वहां पहुँच कर उन्होंने देखा कि भगवान नीलमाधव की प्रतिमा वहां है ही नहीं। इन्द्रद्युम्न इससे इतने निराश हुए कि उन्होंने अपने प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया। वे तीन दिनों तक अन्न-जल त्याग कर वहीँ उस गुफा में पड़े रहे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने आकाशवाणी के माध्यम से उन्हें आत्महत्या करने से रोका और कहा कि वे शीघ्र ही एक नए रूप में अवतरित होंगे। तब तक वे उनके लिए समुद्र तट पर एक मंदिर का निर्माण करवाएं।

इन्द्रद्युम्न वापस लौट गए। उन्होंने एक भव्य मंदिर की स्थापना की और इसके बाद वे भगवान के मिलने की प्रतीक्षा करने लगे। उधर समुद्र में विर्सर्जित भगवान श्रीकृष्ण का ह्रदय उन्ही की इच्छा से एक लकड़ी के लट्ठे में स्थापित हो गया। वो लठ्ठा बहता हुआ समुद्र में उसी स्थान पर पहुंचा जहाँ इन्द्रद्युम्न ने मंदिर की स्थापना की थी। राजा उस लकड़ी को देखते ही समझ गए कि इसी में भगवान का विग्रह है। उन्होंने तत्काल उस लकड़ी को मंदिर में रखवाया और उससे भगवान की प्रतिमा बनाने की योजना बनाई।

लकड़ी से भगवान की प्रतिमा गढ़ने के लिए अनेकों कारीगर वहां आये लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी कोई भी उसी मूर्ति गढ़ने में सफल नहीं हो पाया। तब एक दिन एक वृद्ध कारीगर राजा के पास आया। उसने बताया कि कोई भी मूर्ति इसीलिए नहीं बना पा रहा क्यूंकि आप केवल भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति बनाना चाहते हैं। किन्तु भगवान तो सदैव अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ ही रहते हैं इसीलिए इन दोनों के बिना उनकी मूर्ति बनाना संभव नहीं है।

उसने कहा कि वो उस लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ सकता है लेकिन उसकी एक शर्त है। इस मूर्ति को बनाने में २१ दिन लगेंगे और वो उसे एक बंद और अँधेरे कमरे में गढ़ेगा। लेकिन उन २१ दिनों के लिए कोई भी किसी भी स्थिति में उस कमरे के अंदर ना आये। यदि ऐसा हुआ तो वो कार्य बीच में ही छोड़ कर चला जाएगा। राजा इन्द्रद्युम्न ने उसकी बाद मान ली। एक बड़े अंधरे बंद कमरे में उसने अपना कार्य शुरू किया। उसके छैनी हथौड़े की आवाज से बाहर सभी लोगों को पता चलता रहा कि अंदर मूर्ति का काम चल रहा है।

पंद्रह दिनों तक लगातार उस कारीगर के छैनी हथौड़े की आवाज अंदर से आती रही लेकिन फिर कमरे में शांति छा गयी। ये देख कर महाराज इन्द्रद्युम्न की पत्नी रानी गुंडिचा ने राजा से कहा कि वो वृद्ध व्यक्ति बिना कुछ खाये पिए लगातार १५ दिन से मूर्ति बना रहा है। भूख प्यास के मारे कहीं वो मर ना गया हो। अतः हमें द्वार खोल कर देखना चाहिए। ये सुनकर इन्द्रद्युम्न ने थोड़ी प्रतीक्षा करने को कहा। किन्तु जब अगले दिन भी कोई आवाज नहीं आयी तो रानी ने सत्रहवें दिन उस द्वार को खोल दिया। जैसे ही वो द्वार खुला, वो वृद्ध व्यक्ति वहां से अंतर्धान हो गया।

सब लोग अंदर गए तो देखा कि भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा की अद्भुत प्रतिमा बनी हुई है। लेकिन समय से पहले द्वार खोलने के कारण वे प्रतिमाएं अधूरी रह गयी। उनका शरीर तो बन गया था किन्तु उनके हाथ और पैर अभी तक पूरी तरह से बने नहीं थे। जब राजा इन्द्रद्युम्न ने ये देखा तो सन्न रह गए। उन्हें बड़ी ग्लानि हुई कि उनकी वजह से भगवान का विग्रह आधा ही बन पाया।

तब देवर्षि नारद उनके पास ऋषि के वेश में आये और उन्हें सांत्वना दी। उन्होंने उन्हें बताया कि कलियुग में भगवान का यही स्वरूप होना था। उन्होंने ये भी बताया कि वो कारीगर कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान विश्वकर्मा थे। ये सुनकर राजा को शांति मिली और उन्होंने उन तीनों की उन्ही प्रतिमाओं को मंदिर में स्थापित करवाया और वहां भगवान 'जगन्नाथ', अर्थात जगत के स्वामी के नाम से विख्यात हुए। कहा जाता है कि उस मंदिर में राजा इन्द्रद्युम्न ने १००० यज्ञ किये।

भगवान के इस रूप के विषय में एक और लोककथा भी हमें मिलती है जो महाभारत से सम्बंधित है। इस कथा के अनुसार एक बाद माता यशोदा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका आयी। उस समय माता देवकी, रोहिणी, सुभद्रा और अन्य स्त्रियों ने उनसे श्रीकृष्ण के बचपन की कथा सुनाने का अनुरोध किया। तब माता यशोदा ने सुभद्रा से कहा कि वो द्वार पर ही खड़ी रहे ताकि यदि कृष्ण और बलराम आएं तो वो उन्हें बता सकें ताकि वे कथा रोक दें। उनकी आज्ञा से सुभद्रा द्वार पर खड़ी हो गयी।

अब माता यशोदा ने जब श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन आरम्भ किया तो उसे सुन कर सभी स्त्रियां, विशेष कर सुभद्रा भाव-विभोर हो गयी। उसी समय बलराम और श्रीकृष्ण वहां आये किन्तु सुभद्रा तो ऐसी खोई हुई थी कि उन्हें उन दोनों के आने का पता ही नहीं चला। इसके कारण सुभद्रा के साथ साथ कृष्ण-बलराम ने भी वो कथा सुनी। उसे सुनकर वे इतने प्रसन्न हुए कि उन तीनों की ऑंखें बड़ी हो गयी और होठों पर हंसी छा गयी। उनका वो रूप इतना अद्भुत था कि स्वयं देवर्षि नारद ने वहां आकर उनसे उसी रूप में पुनः अवतरित होने की प्रार्थना की। उन्ही की प्रार्थना पर तीनों ने कलियुग में जगन्नाथ पुरी में विग्रह रूप में अवतार लिया।

हालाँकि सभी इन्हे 'जगन्नाथ' के नाम से ही जानते हैं किन्तु बहुत कम लोगों को ये पता है कि हर महीने इनका एक अलग नाम होता है।
  1. माघ (जनवरी): पद्मनाभ
  2. फाल्गुन (फ़रवरी): पुरुषोत्तम
  3. चैत्र (मार्च): सत्यनारायण
  4. बैसाख (अप्रैल): माधव
  5. ज्येष्ठ (मई): श्रीहरि
  6. आषाढ़ (जून): जगन्नाथ
  7. श्रावण (जुलाई): वामन
  8. भाद्रपद (अगस्त): श्रीधर
  9. आश्विन (सितम्बर): रधुनाथ
  10. कार्तिक (अक्टूबर): दमोदर
  11. अग्रहायण (नवम्बर): वासुदेव
  12. पौष (दिसम्बर): अनंतनारायण
चूँकि आषाढ़ मास में इनका नाम जगन्नाथ होता है और इसी मास इनका अवतरण हुआ था, इसीलिए इसका बड़ा महत्त्व है और विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा भी इसी मास निकाली जाती है। ये एक ऐसा समारोह है जिसमें साल में एक बार भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा अपनी प्रजा से मिलने बाहर निकलते हैं। रथयात्रा में ये तीनों अपने-अपने रथ पर सवार होते हैं। सबसे आगे भगवान भलभद्र चलते हैं, उनके पीछे माता सुभद्रा का रथ होता है और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ अपने रथ पर सवार होते हैं। इन तीनों रथों की अलग अलग विशेषताएं होती हैं:

भगवान जगन्नाथ का रथ:
  • नाम: नंदिघोष
  • अन्य नाम: गरुड़ध्वज, कपिध्वज
  • पहिये: १६
  • लकड़ियों की संख्या: ८३२
  • ऊंचाई: ४४ फ़ीट २ इंच
  • लम्बाई: ३४ फ़ीट ६ इंच
  • चौड़ाई: ३४ फ़ीट ४ इंच
  • रंग: लाल और पीला
  • रक्षक: गरुड़
  • सारथि: दारुक
  • ध्वज: त्रैलोक्यमोहिणी
  • ध्वजा चिह्न: तालवृक्ष
  • ४ अश्व: शंख, बहालक, श्वेत और हरिदश्व
  • अश्वों का रंग: श्वेत
  • रथ की रस्सी: शंखचूड़ नागिन
  • सह-देवता: मदनमोहन
  • द्वारपाल: जय और विजय
  • ९ पार्श्वदेवता: पंचमुखी हनुमान, हरिहर, मधुसूदन, गिरधारी, पाण्डु नरसिंह, चिंतामणि कृष्ण, नारायण, छत्र-भंग रावण, श्रीराम (हनुमान पर विराजित)
भगवान बलराम का रथ:
  • नाम: तालध्वज
  • अन्य नाम: लांगलध्वज
  • पहिये: १४
  • लकड़ियों की संख्या: ७६३
  • ऊंचाई: ४३ फ़ीट ३ इंच
  • लम्बाई: ३३ फ़ीट
  • चौड़ाई: ३३ फ़ीट
  • रंग: लाल और हरा
  • रक्षक: वसुदेव
  • सारथि: मातलि
  • ध्वज: उन्नानि
  • ध्वजा चिह्न: तालवृक्ष
  • ४ अश्व: तीव्र, घोर, दीर्घशर्मा और स्वर्णनवा
  • अश्वों का रंग: काला
  • रथ की रस्सी: वासुकि नाग
  • सह-देवता: रामकृष्ण
  • द्वारपाल: नन्द और सुनन्द
  • ९ पार्श्वदेवता: नट गणपति, कार्तिकेय, हस्तिन बलराम, लक्ष्मण और हनुमान, प्रलंबरी, हलधर, द्वाविंशभुज नरसिंह, नटांवर और अनंतनाग
माता सुभद्रा का रथ:
  • नाम: दर्पदलन
  • अन्य नाम: पद्मध्वज, देवदलन
  • पहिये: १२
  • लकड़ियों की संख्या: ५९३
  • ऊंचाई: ४२ फ़ीट ३ इंच
  • लम्बाई: ३१ फ़ीट ६ इंच
  • चौड़ाई: ३१ फ़ीट ६ इंच
  • रंग: लाल और काला
  • रक्षक: जयदुर्गा
  • सारथि: अर्जुन
  • ध्वज: नंदाम्बिका
  • ध्वजा चिह्न: तालवृक्ष
  • ४ अश्व: रोचिका, मोचिका, जिता और अपराजिता
  • अश्वों का रंग: लाल
  • रथ की रस्सी: स्वर्णचूड नागिन
  • सह-देवता: सुदर्शन
  • द्वारपाल: गंगा और यमुना
  • ९ पार्श्वदेवियां: वनदुर्गा, चामुंडा, भद्रकाली, हरचंडी, रणचंडी, वाराही, कात्यायिनी, मंगला और विमला
इन तीनों रथों की रस्सियों को भक्त खींचते हैं। कहा जाता है कि इन रथों की रस्सियों के स्पर्शमात्र से लोगों को वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होती है। इस समय गजपति राजा, जो कलिंग देश के राजा माने जाते हैं, एक साधारण कर्मचारी के वेश में रथ के आगे सोने के झाड़ू से मार्ग को बुहारते हैं। ये इस बात का प्रतीक होता है कि ईश्वर की नजर में राजा और रंक सब एक ही होते हैं। इस यात्रा में तीनों पहले जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर पहुँचते हैं जहाँ वे ७ दिनों तक विश्राम करते हैं। फिर वापसी में ये मौसी के मंदिर में रुकते हुए वापस अपने मूल स्थान पर आ जाते हैं।

जगन्नाथ पुरी मंदिर की महत्ता आप इस बात से समझ सकते हैं कि ना केवल ये ७ पुरियों में से एक है बल्कि ४ धामों में से भी एक माना जाता है। वर्तमान मंदिर का कार्य तत्कालीन कलिंग के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने सन १०७८ में शुरू किया था। बाद में सन ११९७ में तत्कालीन कलिंग सम्राट अनंत भीम देव ने इसे पूरा किया। वर्तमान का मंदिर करीब ४००००० वर्ग फ़ीट में फैला हुआ है।

सन १५५८ में एक मुस्लिम आक्रांता काला पहाड़ ने इस मंदिर पर आक्रमण किया जिस कारण पहली बार इस मंदिर में पूजा कार्य को बंद किया गया। भगवान के विग्रह हो कोई नुकसान ना हो इसीलिए तीनों प्रतिमाओं को गुप्त स्थान पर छिपा दिया गया। फिर मुग़ल काल में हमेशा ही कोई ना कोई इस मंदिर को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करता ही रहा। सबसे बड़ा हमला औरंगजेब ने १७वीं शताब्दी में किया। इस मंदिर पर १८ बार बड़े हमले किये गए और इस बार बार लूटा गया।

सन १८०३ में अंग्रेजों ने इस मंदिर की व्यवस्था अपने हाथ में ले ली। उस समय भी इस मंदिर से लगभग १ लाख रूपये सालाना टैक्स के रूप में वसूला जाता था। बाद में जनता के विरोध के कारण सन १८०६ में इसकी व्यवस्था तत्कालीन राजा मुकुंददेव और उनके परिवार को सौंप दी गयी। सन १९३६ में बिहार से अलग होकर उड़ीसा बना और स्वतंत्रता मिलने के बाद इस मंदिर को राज्य सरकार के अंतर्गत सौंप दिया गया। तब से उड़ीसा राज्य सरकार ही इस मंदिर की देख रेख और व्यवस्था देखती है।

इस मंदिर से जुड़े ऐसे कई रहस्य हैं जिसे आज तक कोई नहीं जान पाया है।
  • मूर्ति के अंदर भगवान श्रीकृष्ण का जो ह्रदय है, जिसे ब्रह्मपदार्थ कहा जाता है, उसे हर १२ साल बाद नई लकड़ी की प्रतिमा में स्थापित किया जाता है। इस प्रक्रिया को देखना सख्त मना है इसीलिए इसे रात्रि में किया जाता है। जब प्रतिमा बदलनी होती है तो पूरे शहर की बिजली काट दी जाती है और मंदिर के चारो ओर सख्त पहरा लगा दिया जाता है। फिर इस मंदिर के सबसे वयोवृद्ध पुजारी अपनी आँखों पर पट्टी बांध कर और हाथों को कपडे से ढँक कर पुराणी मूर्ति से ब्रह्मपदार्थ निकालते हैं और उसे नई मूर्ति में डाल देते हैं। जिसने भी आजतक ये किया है वो बताता है कि वो पदार्थ ठीक उसी प्रकार धड़कता है जैसे कोई दिल धड़कता है। भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के बाद बलराम और सुभद्रा की प्रतिमा भी बदल जी जाती है।
  • जब तक हम मंदिर से बाहर होते हैं तब तक हमें तेज और स्पष्ट समुद्र की आवाज सुनाई देती है लेकिन जैसे ही हम मंदिर के अंदर जाते हैं ये आवाज बंद हो जाती है। आज तक कोई नहीं जान पाया कि ऐसा क्यों होता है।
  • मंदिरों के ऊपर से पक्षियों का उड़ना आम बात है लेकिन जगन्नाथ पुरी मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं उड़ता। ये क्यों होता है आज तक कोई नहीं जान पाया।
  • इस मंदिर का जो झंडा है वो हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है जो एक अद्भुत बात है। इस झंडे को, जो मंदिर के शिखर पर लगा होता है, जिसकी ऊंचाई २१४ फ़ीट है, को हर रोज शाम को बदला जाता है। ऐसी मान्यता है कि यदि एक दिन भी झंडे को ना बदला गया तो मंदिर १८ वर्षों के लिए बंद हो जाएगा। ये प्रथा पिछले ८०० वर्षों से चल रही है। इतने ऊपर जाने के लिए भी एक व्यक्ति बिना किसी रस्सी या सुरक्षा के ही भारी झंडे को लेकर चढ़ता है।
  • ये मंदिर इतना विशाल है कि इसके नीचे खड़े होकर आप इसके शीर्ष को नहीं देख सकते। इतना विशाल शीर्ष होने के बाद भी दिन के किसी भी समय इसकी कोई छाया धरती पर नहीं बनती।
  • मंदिर के शीर्ष पर अष्टधातु से बना एक सुदर्शन चक्र है जिसे आप पुरी के किसी भी स्थान से देख सकते हैं। इसकी बनावट इतनी अद्भुत है कि आप इसे चाहे किसी भी ओर से देखें, इसका मुख आपकी ओर ही दिखेगा।
  • इस मंदिर की रसोई में प्रसाद का निर्माण होता ही रहता है। चाहे पुरी में कितने भी लोग आ जाएँ, प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता। मंदिर के बंद होने तक आश्चर्यजनक रूप से प्रसाद समाप्त हो जाता है। मतलब यहाँ कभी भी प्रसाद की बर्बादी नहीं होती।
  • यहाँ प्राचीन तरीके से प्रसाद का निर्माण किया जाता है। ७ मिटटी के बर्तन को एक के ऊपर एक रख कर प्रसाद तैयार किया जाता है लेकिन आश्चर्यजनक रूप से सबसे ऊपर के बर्तन का प्रसाद सबसे पहले तैयार होता है और सबसे नीचे आग पर रखे बर्तन का प्रसाद सबसे अंत में तैयार होता है।

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