कौन हैं वास्तु देवता?

वास्तु देवता
बरसों से जब भी हम अपने घर का निर्माण करना चाहते हैं तो जो सबसे पहले जो एक चीज हमारे ध्यान में रहती है वो है वास्तु। वास्तु शास्त्र को कई लोग आधुनिक विज्ञान मानते हैं किन्तु इसका इतिहास बहुत पुराना है। वास्तु जो शब्द है वो हिन्दू धर्म के एक देवता "वास्तु देव" के ऊपर पड़ा है। वास्तु शास्त्र का पूरा विज्ञान वास्तु देव की स्थिति को ध्यान में रख कर ही गढ़ा गया है। किन्तु आखिर ये वास्तु देव हैं कौन हैं?

वास्तु देव के विषय में हमें पुराणों में कई कथाएं मिलती है। एक कथा के अनुसार परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक थे धर्म जिनका विवाह वस्तु नामक कन्या से हुआ। इन दोनों के ७ पुत्र हुए और सबसे छोटे थे वास्तु। इन्होने ही वास्तुशास्त्र की रचना की और आगे चल कर वास्तु देवता के रूप में पूजित हुए। वास्तु का विवाह अंगिरसी नामक कन्या से हुआ। इन्ही दोने के ज्येष्ठ पुत्र हुए विश्वकर्मा जो वास्तुशास्त्र के अद्वितीय विद्वान थे। हालाँकि प्रचलित मान्यताओं के अनुसार विश्वकर्मा को ब्रह्मा का पुत्र माना जाता है।

वास्तु देव की उत्पत्ति के विषय में एक कथा हमें मत्स्यपुराण के अध्याय २५२ में भी मिलती है। इसमें सूत जी और ऋषियों का वार्तालाप है जहाँ पर सभी ऋषि सूत जी से वास्तु शास्त्र के बारे में पूछते हैं। तब सूत जी उन्हें बताते हैं कि भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित, भगवान शंकर, इंद्र, ब्रह्मा, कुमार, नंदीश्वर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति - ये १८ महापुरुष वास्तुशास्त्र के उपदेष्टा माने गए हैं।

आगे ऋषियों के पूछने पर वास्तु देव की उत्पत्ति की कथा सुनाते हैं। प्राचीन काल में भगवान शंकर के अश्रुओं से अंधक नाम का एक महाभयंकर असुर उत्पन्न हुआ। हालाँकि था तो वो महादेव का पुत्र ही किन्तु अज्ञानता में आकर उसने माता पार्वती पर कुदृष्टि डाली और उससे क्रुद्ध होकर महादेव ने उसका वध कर दिया। किन्तु महादेव के ही वरदान अनुसार अंधकासुर के रक्त की बूंदें जहाँ गिरती थी वहाँ से कई और अंधक उत्पन्न हो जाते थे।

उसी युद्ध में महादेव के मस्तक से पसीने की एक बूँद धरती पर गिरी और उसी से एक भयानक मुख वाला प्राणी जन्मा। उसका आकार ऐसा था जैसे लगता था वो समूची पृथ्वी को निगल जाएगा। महादेव की प्रेरणा से उसने पृथ्वी पर गिरे अंधकासुर के सभी रक्त बूंदों को पी गया जिससे अंधकासुर का पूर्ण रूप से नाश हुआ। किन्तु उतना रक्तपान करने के बाद भी उसकी भूख समाप्त नहीं हुई। तब उसने क्रोध में आकर पूरे त्रिलोक को निगलना किन्तु महादेव ने उसे ऐसा करने से रोक दिया और उसे भूमि पर पटक दिया।

वो प्राणी वापस से उठ कर त्रिलोकी का नाश ना करे इसके लिए भगवान शिव की आज्ञा से उसके शरीर के ४५ अंगों पर ४५ देवता विराजमान हो गए। उस समय उस पुरुष का मुख ईशान कोण में, बांया हाथ वायव्य कोण में, दांया हाथ आग्नेय कोण में और पैर नैऋत्य कोण में था। उस पुरुष ने उठने का बहुत प्रयास किया किन्तु देवताओं के भार के कारण वो उठ नहीं पाया। तब उसने सभी देवताओं से कहा कि आप सब ने मुझे इस प्रकार दबा रखा है, मैं ऐसे किस प्रकार रह पाउँगा?

इस पर उसकी विनम्रता से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे वरदान दिया कि उसे उनका ही मानस पुत्र माना जाएगा। ब्रह्माजी ने ही उसे "वास्तु" नाम दिया और कहा कि वैश्वदेव के अंत में जो बलि दी जाएगी वही तुम्हारा आहार होगी। वास्तु शांति के लिए जो सामग्री यज्ञ में डाली जाएगी वो भी तुम्हे आहार के रूप में प्राप्त होगी। जो कोई भी वास्तु पूजा नहीं करेगा, वो भी तुम्हारा ही आहार बनेगा। अज्ञानता से किया गया यज्ञ भी तुम्ही को प्राप्त होगा। इस प्रकार ब्रह्माजी से वरदान पाकर वास्तु वहीँ उसी प्रकार सदा के लिए भूमि पर स्थिति हो गया।

जो ४५ देवता/देवी वास्तु के ऊपर अपना भार लेकर बैठे हैं उनमें से ३२ वास्तु के बाहर और १३ अंदर स्थित हैं। वे हैं:

  • बाहरी देवता: शिखी, पर्जन्य, जयंत, इंद्र, सूर्य, सत्य, भृश, अंतरिक्ष, वायु, पूषा, वितथ, वृहत्क्षत, यम, गन्धर्व, भृंगराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदंत, जलाधिप, असुर, शोष, पाप, रोग, अहि, मुख्य, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति एवं दिति।
  • भीतरी देवता: आप, सावित्र, जय, रूद्र, ब्रह्मा, अयर्मा, सविता, विवस्वान, विवुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पृथ्वीधर एवं आपवत्स।

मत्स्य पुराण में वास्तु देवता, वास्तु शास्त्र एवं भगवान की प्रतिमा के गुण लक्षणों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। मत्स्य पुराण के अध्याय २५२ से लेकर अध्याय २७० तक आपको वास्तु विज्ञान की वृहद् जानकारी मिलती है।

तो तभी से किसी भी भवन निमार्ण से पहले वास्तु देवता की पूजा करने की प्रथा आरम्भ हुई। चूँकि वास्तुदेव के शरीर पर ४५ देवताओं का भी निवास है, इसी कारण उनकी पूजा करने से उन सभी देवताओं की पूजा स्वतः ही हो जाती है। अर्थात वास्तुपूजा से वास्तु देवता के अतिरिक्त इन ४५ देवताओं का आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होता है। अतः जब भी किसी भवन के निर्माण का कार्य प्रारम्भ होता है, वास्तु पूजा अवश्य की जाती है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें