३३ करोड़ देवताओं का रहस्य

हिन्दू धर्म सागर की तरह विशाल है। इसकी विशालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हिन्दू धर्म में कुल देवी देवताओं की संख्या ३३ करोड़ बताई जाती है। सुनने में कुछ अजीब नहीं लगता? क्या ये संभव है कि किसी धर्म में कुल देवी देवताओं की संख्या ३३ करोड़ हो सकती है? किसी को भी आश्चर्य हो सकता है। लेकिन कहते हैं ना कि अधूरा ज्ञान हानिकारक हो सकता है। तो आईये हम इस बात का वास्तविक तथ्य जानते हैं।

जब महादेव ने श्रीराम की परीक्षा ली

श्रीराम का वनवास ख़त्म हो चुका था। एक बार श्रीराम ब्राम्हणों को भोजन करा रहे थे तभी भगवान शिव ब्राम्हण वेश में वहाँ आये। श्रीराम ने लक्ष्मण और हनुमान सहित उनका स्वागत किया और उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। भगवान शिव भोजन करने बैठे किन्तु उनकी क्षुधा को कौन बुझा सकता था? बात हीं बात में श्रीराम का सारा भण्डार खाली हो गया। लक्ष्मण और हनुमान ये देख कर चिंतित हो गए और आश्चर्य से भर गए। एक ब्राम्हण उनके द्वार से भूखे पेट लौट जाये ये तो बड़े अपमान की बात थी। उन्होंने श्रीराम से और भोजन बनवाने की आज्ञा मांगी।

घटोत्कच

घटोत्कच भीम और राक्षस कन्या हिडिम्बा का पुत्र था। पांडवों के वंश का वो सबसे बड़ा पुत्र था और महाभारत के युध्द में उसने अहम भूमिका निभाई। हालाँकि कभी भी उसकी गिनती चंद्रवंशियों में नहीं की गयी (इसका कारण हिडिम्बा का राक्षसी कुल था) लेकिन उसे कभी भी अन्य पुत्रों से कम महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। महाभारत के युद्ध में कर्ण से अर्जुन के प्राणों की रक्षा करने हेतु घटोत्कच ने अपने प्राणों की बलि दे दी।

प्रजापति दक्ष की सभी पुत्रियाँ और उनके पति

पुराणों के अनुसार दक्ष परमपिता ब्रह्मा के पुत्र थे जो उनके दाहिने पैर के अंगूठे से उत्पन्न हुए थे। ये ब्रह्मा के उन प्रथम १६ पुत्रों में थे जो "प्रजापति" कहलाते थे। प्रजापति दक्ष की दो पत्नियाँ थी - स्वयंभू मनु की कन्या प्रसूति और वीरणी (पंचजनी)। प्रसूति से दक्ष की चौबीस कन्याएँ थीं और वीरणी से साठ कन्याएँ। उन सभी के लिए दक्ष प्रजापति ने श्रेष्ठ वर खोजे। आइये उनकी पुत्रियों और उनके पतियों के विषय में जानते हैं।

पंचकन्या (पंचसती)

हिन्दू धर्म में पंचकन्याओं का बड़ा महत्त्व है जिन्हे पंचसती भी कहा जाता है। ये पांचो सम्पूर्ण नारी जाति के सम्मान की साक्षी मानी जाती हैं। विशेष बात ये है कि इन पांचो स्त्रियों को अपने जीवन में अत्यंत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इन सभी स्त्रियों के सम्बन्ध एक से अधिक पुरुषों से रहा जिस कारण पतिव्रत धर्म पर प्रश्न भी उठाए गए। किन्तु इन सब के पश्चात् भी वे हमेशा पवित्र और पतिव्रत धर्म की प्रतीक मानी गई। विभिन्न वरदानों के कारण इन पाँचों का कौमार्य कभी भंग नहीं होता था, अर्थात ये पाँचों सदैव कुँवारी ही रहती थी। यही कारण है कि इन्हे पंचकन्या कहा जाता है। इनके बारे में कहा गया है -

श्री कृष्ण की सभी पत्नी और पुत्र

श्रीकृष्ण के जीवन में स्त्रियों का बड़ा महत्त्व रहा है, चाहे वो राधा और अथवा रुक्मिणी। श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम विदर्भ देश की कन्या रुक्मिणी से विवाह किया जो उनकी पटरानी बनी। इसके अतिरिक्त उनकी दो और प्रमुख पत्नियाँ थी - जांबवंती एवं सत्यभामा। श्रीकृष्ण की मुख्य रानियों की संख्या ८ बताई गयी है। जब उन्होंने नरकासुर का वध किया तो उसके कैद में १६१०० स्त्रियाँ थी। उन अपहृत स्त्रियों का ना कोई परिवार था और ना ही कोई ठिकाना। तब उनके उद्धार के लिए उन्होंने उन सभी १६१०० स्त्रियों को भी अपनी पत्नियों का पद प्रदान किया।

शरभ अवतार

भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष के वध के पश्चात ब्रह्मा से वरदान पा उसके बड़े भाई हिरण्यकशिपु के अत्याचार हद से अधिक बढ़ गए। सारी सृष्टि त्राहि-त्राहि करने लगी। जहाँ एक ओर हिरण्यकशिपु संसार से धर्म का नाश करने पर तुला हुआ था, वही उसका अपना पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु की भक्ति में लीन था।