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घटोत्कच

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घटोत्कच भीम और राक्षस कन्या हिडिम्बा का पुत्र था। पांडवों के वंश का वो सबसे बड़ा पुत्र था और महाभारत के युध्द में उसने अहम भूमिका निभाई। हालाँकि कभी भी उसकी गिनती चंद्रवंशियों में नहीं की गयी (इसका कारण हिडिम्बा का राक्षसी कुल था) लेकिन उसे कभी भी अन्य पुत्रों से कम महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। महाभारत के युद्ध में कर्ण से अर्जुन के प्राणों की रक्षा करने हेतु घटोत्कच ने अपने प्राणों की बलि दे दी।

प्रजापति दक्ष की सभी पुत्रियाँ और उनके पति

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पुराणों के अनुसार दक्ष परमपिता ब्रह्मा के पुत्र थे जो उनके दाहिने पैर के अंगूठे से उत्पन्न हुए थे। ये ब्रह्मा के उन प्रथम १६ पुत्रों में थे जो "प्रजापति"  कहलाते थे। प्रजापति दक्ष की दो पत्नियाँ थी - स्वयंभू मनु की कन्या  प्रसूति और वीरणी (पंचजनी)। प्रसूति से दक्ष की चौबीस कन्याएँ थीं और वीरणी से साठ कन्याएँ। उन सभी के लिए दक्ष प्रजापति ने श्रेष्ठ वर खोजे। आइये उनकी पुत्रियों और उनके पतियों के विषय में जानते हैं।

पंचकन्या (पंचसती)

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हिन्दू धर्म में पंचकन्याओं  का बड़ा महत्त्व है जिन्हे पंचसती भी कहा जाता है। ये पांचो सम्पूर्ण नारी जाति के सम्मान की साक्षी मानी जाती हैं। विशेष बात ये है कि इन पांचो स्त्रियों को अपने जीवन में अत्यंत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इन सभी स्त्रियों के सम्बन्ध एक से अधिक पुरुषों से रहा जिस कारण पतिव्रत धर्म पर प्रश्न भी उठाए गए। किन्तु इन सब के पश्चात् भी वे हमेशा पवित्र और पतिव्रत धर्म की प्रतीक मानी गई। विभिन्न वरदानों के कारण इन पाँचों का कौमार्य कभी भंग नहीं होता था, अर्थात ये पाँचों सदैव कुँवारी ही रहती थी। यही कारण है कि इन्हे पंचकन्या कहा जाता है। इनके बारे में कहा गया है -

श्री कृष्ण की सभी पत्नी और पुत्र

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श्रीकृष्ण के जीवन में स्त्रियों का बड़ा महत्त्व रहा है, चाहे वो राधा और अथवा रुक्मिणी। श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम विदर्भ देश की कन्या रुक्मिणी से विवाह किया जो उनकी पटरानी बनी। इसके अतिरिक्त उनकी दो और प्रमुख पत्नियाँ थी - जांबवंती एवं सत्यभामा। श्रीकृष्ण की मुख्य रानियों की संख्या ८ बताई गयी है। जब उन्होंने नरकासुर का वध किया तो उसके कैद में १६१०० स्त्रियाँ थी। उन अपहृत स्त्रियों का ना कोई परिवार था और ना ही कोई ठिकाना। तब उनके उद्धार के लिए उन्होंने उन सभी १६१०० स्त्रियों को भी अपनी पत्नियों का पद प्रदान किया।

शरभ अवतार

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भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष के वध के पश्चात ब्रह्मा से वरदान पा उसके बड़े भाई हिरण्यकशिपु के अत्याचार हद से अधिक बढ़ गए। सारी सृष्टि त्राहि-त्राहि करने लगी। जहाँ एक ओर हिरण्यकशिपु संसार से धर्म का नाश करने पर तुला हुआ था, वही उसका अपना पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु की भक्ति में लीन था।

प्रमुख नाग कुल

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पुराणों के अनुसार महर्षि कश्यप ने प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया और उनसे ही सभी जातियों की उत्पत्ति हुई। इसके बारे में विस्तार से यहाँ देखें। कश्यप एवं उनकी की पत्नी क्रुदु से नाग जाति (नाग और सर्प जाति अलग-अलग है) की उत्पत्ति हुई जिसमे नागों के आठ प्रमुख कुल चले। इनका वर्णन नीचे दिया गया है:

महाभारत में वर्णित विभिन्न व्यूह

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२१ जुलाई २०१२ , ठीक अपने जन्मदिन के दिन मैं अपने एक मित्र प्रशांत साहू के साथ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में भ्रमण के लिए गया था। वहाँ विज्ञान भवन में एक पूरा हिस्सा महाभारत को समर्पित था। वही मैंने महाभारत में प्रयोग किये गए इन व्यूहों का चित्र देखा। वैसे तो इसका चित्र लेना प्रतिबंधित था किन्तु फिर मैंने जब सुरक्षा अधिकारीयों को धर्मसंसार के बारे में बताया तब उन्होंने इन चित्रों को लेने की अनुमति दे दी।

अति प्राचीन विश्व के नक्शों पर भारत

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२१ जुलाई २०१२ , ठीक अपने जन्मदिन के दिन मैं अपने एक मित्र प्रशांत साहू के साथ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में भ्रमण के लिए गया था। वहाँ विज्ञान भवन में एक पूरा हिस्सा महाभारत को समर्पित था। वही मैंने इन दुर्लभ नक्शों को देखा। वैसे तो इसका चित्र लेना प्रतिबंधित था किन्तु फिर मैंने जब सुरक्षा अधिकारीयों को धर्मसंसार के बारे में बताया तब उन्होंने इन चित्रों को लेने की अनुमति दे दी।

युधिष्ठिर के बाद के राजाओं की सूची

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महाभारत युद्ध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर की ३० पीढ़ियों ने १७७० वर्ष ११ माह १० दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है। परमपिता ब्रह्मा से युधिष्ठिर तक का वंश वर्णन पहले ही धर्मसंसार पर प्रकाशित किया जा चुका है। इसके बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ।  युधिष्ठिर: ३६ वर्ष परीक्षित: ६० वर्ष

जब दो ब्रह्मास्त्रों का सामना हुआ - अर्जुन और अश्वत्थामा का युद्ध

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महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरवों की ओर से केवल तीन महारथी हीं जीवित बचे थे - अश्वत्थमा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। दुर्योधन की मृत्यु से दुखी अश्वत्थामा ने पांडवों को छल से मारने की प्रतिज्ञा की। उसने दुर्योधन को मरते हुए वचन दिया था कि जैसे भी हो वो पांचों पांडवों को अवश्य मार डालेगा। कृपाचार्य ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की पर अंततः उन्होंने भी उसका साथ देने की स्वीकृति भर दी।