महाभारत में देवर्षि नारद और युधिष्ठिर का एक संवाद है जहाँ देवर्षि नारद उन्हें भक्तराज प्रह्लाद के विषय में एक अनोखी बात बताते हैं। बात तब की है जब हिरण्यकशिपु तपस्या करने वन में चला गया। उसकी पत्नी कयाधु उस समय गर्भवती थी। हिरण्यकशिपु के जाने के बाद उस अवसर का लाभ उठा कर देवों ने दैत्यों पर आक्रमण कर दिया।
जब भीम ने युधिष्ठिर को धर्म ज्ञान दिया
महाभारत में भीम को मुख्यतः बल का प्रतीक माना जाता है। उनकी बुद्धि के विषय में ज्यादा चर्चा नहीं की जाती। जबकि सत्य ये है कि वो जितने बलशाली थे उतने ही बुद्धिमान भी थे। उससे भी अधिक कहा जाये तो वे अत्यंत स्पष्टवादी थे। कदाचित ही महाभारत में कोई ऐसा पात्र है जो उतना स्पष्टवादी हो। वैसे तो उनकी स्पष्टवादिता के कई उदाहरण है लेकिन एक कथा ऐसी भी है जिसके द्वारा उन्होंने युधिष्ठिर को उनके कर्तव्य की याद दिलाई। इससे ये भी सिद्ध होता है कि वे सही चीज के लिए अपने भाइयों को भी नहीं छोड़ते थे।
नागा साधु
महाकुंभ, अर्धकुंभ या फिर सिंहस्थ कुंभ में आपने नागा साधुओं को जरूर देखा होगा। इनको देखकर आप सभी के मन में अक्सर यह सवाल उठते होंगे कि आखिर कौन हैं ये नागा साधु? कहाँ से आते हैं? और कुंभ खत्म होते ही कहां चले जाते हैं? आइए आज हम लोग चर्चा करते है हिंदू धर्म के इन सबसे रहस्यमयी लोगों के बारे में।
माता अनुसूया
परमपिता ब्रह्मा के दाहिने भाग से स्वयंभू मनु उत्पन्न हुए जिनका विवाह ब्रह्मा के वाम अंग से उत्पन्न होने वाली शतरूपा से हुआ। इन दोनो की पाँच संताने थी। दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद और तीन पुत्रियाँ - आकूति, देवहूति एवं प्रसूति। आकूति का विवाह रूचि प्रजापति एवं प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहुति का विवाह कर्दम ऋषि से हुआ जिनसे उन्हें एक पुत्र - कपिल मुनि और नौ कन्याएं प्राप्त हुई - कला, अनुसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधती एवं शांति।
हनुमान की पत्नी - सती सुवर्चला
जब आप हैदराबाद से करीब २२५ किलोमीटर दूर आँध्रप्रदेश के खम्मम जिले में पहुँचते है तो एक ऐसा मंदिर मिलता है जो आपको हैरान कर सकता है। क्यूँकि ये विश्व का एकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ पवनपुत्र हनुमान अपनी पत्नी सुवर्चला के साथ विराजमान हैं। अब आप ये प्रश्न कर सकते हैं कि हनुमान तो बाल ब्रह्मचारी हैं। फिर उनकी पत्नी कैसे हो सकती है।
चौरासी लाख योनियों का रहस्य
हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है? ये देख कर और भी दुःख होता है कि आज की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी इस बात पर व्यंग करती और हँसती है कि इतनी सारी योनियाँ कैसे हो सकती है। कदाचित अपने सीमित ज्ञान के कारण वे इसे ठीक से समझ नहीं पाते। गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं।
शाकम्भरी जयंती
दुर्गम नाम का एक दैत्य था। हिरण्याक्ष के वंश में वह पैदा हुआ था और उसके पिता का नाम रुरु था। वो देवताओं से शत्रुता रखता था और देवताओं को कष्ट देने के लिए उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप आरम्भ कर दिया। तपस्या का फल देने आए ब्रह्मा जी ने उसे वरदान मांगने के लिए कहा। तब उस दैत्य ने ब्रह्मा जी से कहा सारे वेद मंत्र मेरे आधीन हो जाए। ब्रह्मा जी उसे तपस्या का वरदान देते हुए अंतर्ध्यान हो गए।
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