जनमानस में एक बड़ी विचित्र सी धारणा है कि जब दुर्योधन ने जन्म लिया था तो उसके जन्म के समय के अपशकुनों को देखते हुए धर्मराज विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र से उसे मार देने को कहा था, ताकि कुरुकुल सुरक्षित रह सके। हम सब ने फिल्मों और टीवी सीरियलों में आज तक यही सब देखा है। लेकिन या ये बात वास्तव में सच है?
जिन्होंने भी विदुर जी के व्यक्तित्व के बारे में पढ़ा है वो ये जानते हैं कि उन जैसा धर्मज्ञ और प्रकांड पंडित किसी को भी मारने के लिए नहीं कह सकता, विशेषकर एक नवजात बालक को तो बिलकुल नहीं। यदि आप ऐसा सोचते हैं तो ये बिलकुल सही है और यदि आप मूल व्यास महाभारत पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि वास्तव में विदुरजी ने ऐसा कभी नहीं कहा था।
महाभारत के अनुसार विदुरजी ने धृतराष्ट्र से दुर्योधन को त्याग देने कहा था, मार देने को नहीं। वो ऐसा कभी कह ही नहीं सकते थे। महाभारत के आदिपर्व के संभव उपपर्व में इस बात का वर्णन है कि जब दुर्योधन का जन्म हुआ तो गीदड़ और सियार रोने लगे, बिजली कड़कने लगी और चील कौवे मंडराने लगे। इन अपशकुनों को देख कर विदुरजी ने धृतराष्ट्र से उसे त्याग देने को कहा था ताकि कुल सुरक्षित रह सके। इस पर्व के अध्याय ११४ के श्लोक ३४ से ४० में हमें इसके बारे में पता चलता है।
आदिपर्व, संभव उपपर्व, गांधारीपुत्रोत्पत्ति विषयक उपपर्व, अध्याय ११४, श्लोक ३४ से ४०
लक्षयित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वशः।
तेऽब्रुवन्ब्राह्मणा राजन्विदुरश्च महामतिः॥३४॥
यथेमानि निमित्तानि घोराणि मनुजाधिप।
उत्थितानि सुते जाते ज्येष्ठे ते पुरुषर्षभ॥३५॥
व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितैष सुतस्तव।
तस्य शान्तिः परित्यागे गुप्तावपनयो महान्॥३६॥
अर्थात: राजन! सब ओर होने वाले उन भयानक अपशकुनों को लक्ष्य करके ब्राह्मण लोग तथा परम बुद्धिमान विदुरजी इस प्रकार बोले - नरश्रेष्ठ नरेश्वर! आपके ज्येष्ठ पुत्र के जन्म लेने पर जिस प्रकार ये भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उनसे स्पष्ट जान पड़ता है कि आपका यह पुत्र समूचे कुल का संहार करने वाला होगा। यदि इसका त्याग कर दिया जाये तो सब विघ्नों की शांति हो जाएगी और यदि इसकी रक्षा की गयी तो आगे चलकर बड़ा भारी उपद्रव खड़ा होगा।
शतमेकोनमप्यस्तु पुत्राणां ते महीपते।
त्यजैनमेकं शान्तिं चेत्कुलस्येच्छसि भारत॥३७॥
अर्थात: महीपते! आपके निन्यानबे पुत्र ही रहें, भारत! यदि आप अपने कुल की शांति चाहते हैं तो इस एक पुत्र को त्याग दें।
एकेन कुरु वै क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्॥३८॥
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।
स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः॥३९॥
न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वितः।
ततः पुत्रशतं पूर्ण धृतराष्ट्रस्य पार्थिव॥४०॥
अर्थात: केवल एक पुत्र के त्याग द्वारा इस सम्पूर्ण कुल का तथा समस्त जगत का कल्याण कीजिये। नीति कहती है कि समूचे कुल के हित के लिए एक व्यक्ति को त्याग दें, गांव के हित के लिए एक कुल को छोड़ दें, देश के हित के लिए एक गांव का परित्याग कर दें और आत्मा के कल्याण के लिए सारे भूमण्डल को त्याग दें। विदुर तथा उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों के यों कहने पर भी पुत्रस्नेह के बंधन में बंधे हुए राजा धृतराष्ट्र ने वैसा नहीं किया। जन्मेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र के पूरे सौ पुत्र हुए।
यही बात गांधारी ने धृतराष्ट्र से कही थी जब दुर्योधन ने द्रौपदी के चीरहरण का प्रयास किया था। महाभारत के सभा पर्व के अनुद्यूत उपपर्व में इस बात का उल्लेख मिलता है जब गांधारी चीरहरण के पश्चात धृतराष्ट्र को याद दिलाती है कि दुर्योधन के जन्म के समय ही विदुरजी ने इसे त्याग देने को कहा था।
सभा पर्व, अनुद्यूत उपपर्व, युधिष्ठिरप्रत्यानयनविषयक उपपर्व, अध्याय ७५, श्लोक २
जाते दुर्योधन क्षत्ता महामतिरभाषत।
नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसनः॥२॥
अर्थात: आर्यपुत्र! दुर्योधन के जन्म लेने पर परम बुद्धिमान विदुरजी ने कहा था - यह बालक अपने कुल का नाश करने वाला होगा, अतः इसे त्याग देना चाहिए।
इसके बाद महाभारत के अरण्यपर्व में भी जब पांडव वनवास को चले गए तो उस समय भी विदुरजी ने धृतराष्ट्र से कहा कि मैंने आपको पहले ही कहा था इस बालक को त्याग देना चाहिए लेकिन आपने मेरी बात नहीं मानी। उस समय विदुरजी धृतराष्ट्र को समझाते हैं कि आप दुर्योधन की हर बात ना माना कीजिये।
अरण्य पर्व, अध्याय ४, श्लोक ११ और १२
उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते; मया यत्ते हितमासीत्तदानीम्॥११ १/२॥
पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्ये; त्येतद्राजन्न च तत्त्वं चकर्थ।
इदानीं ते हितमुक्तं न चेत्त्वं; कर्तासि राजन्परितप्तासि पश्चात्॥१२॥
अर्थात: आपके पुत्र दुर्योधन के जन्म मुझे उस समय जो हित की बात जान पड़ी, वह मैंने पहले ही बता दी थी। मैंने साफ़ कह दिया था कि आपका यह पुत्र समस्त कुल का अहित करने वाला है, अतः इसको त्याग दीजिये, परन्तु आपने मेरी उत्तम कर सात्विक सलाह के अनुसार काम नहीं किया। राजन! इस समय भी मैंने जो यह आपके हित की बात बताई है यदि उसे आप नहीं करेंगे तो आपको बहुत पश्चाताप करना पड़ेगा।
तो यहाँ पर आप देख सकते हैं कि महाभारत में कहीं पर भी विदुरजी ने दुर्योधन को जन्म लेते ही मार देने को नहीं कहा बल्कि उसका परित्याग कर देने को कहा था। यदि धृतराष्ट्र दुर्योधन को जन्म लेते ही त्याग देते तो वो जीवित तो रहता लेकिन उसका कुरु राजवंश पर कोई अधिकार और प्रभाव नहीं रहता और कुरुवंश भावी विनाश से बच जाता। किन्तु धृतराष्ट्र अपने पुत्रमोह के कारण ऐसा नहीं कर सके।
अब बात आती है कि ये भ्रामक जानकारी कहाँ से आरम्भ हुई कि विदुर जी ने दुर्योधन को मार देने को कहा था। तो ये घटिया जानकारी भी आधुनिक टीवी सीरियलों और फिल्मों में ही दिखाई गयी है। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि आज कल के वाहियात धार्मिक सीरियलों से उचित दूर बना कर रखें।

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