जब श्रीराम और लक्ष्मण जान बूझ कर अचेत हो गए

जब श्रीराम और लक्ष्मण जान बूझ कर अचेत हो गए
रामायण में एक जगह ऐसा प्रसंग मिलता है जब मेघनाद ने श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश से बांध दिया था। कुछ लोग को ऐसा लगता है कि मेघनाद ने अपने पराक्रम से उन दोनों को अचेत कर दिया था लेकिन रामायण में ही हमें एक ऐसी कथा मिलती है जब श्रीराम और लक्ष्मण केवल वानर सेना की रक्षा के लिए जान बूझ कर अचेत हो गए थे।

ये वर्णन हमें वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के सर्ग ७३ के श्लोक ६७-७४ और युद्ध कांड के सर्ग ७४ के श्लोक १-४ में मिलता है। इस सर्ग में ऐसा वर्णित है कि जब श्रीराम के नेतृत्व में वानर सेना ने असुर सेना का भयानक संहार किया तो बचे खुचे राक्षसों ने रावण से जाकर युद्ध का हाल बताया। ये सुकर रावण की आज्ञा से मेघनाद पुनः युद्ध के लिए आया। वहां पहुंच कर उसने वानर सेना का घोर संहार करना आरम्भ कर दिया।

वानरों को क्षत-विक्षत करने के बाद मेघनाद ने श्रीराम और लक्ष्मण पर आक्रमण किया। साधारण बाणों से उन दोनों को परास्त नहीं किया जा सकता था इसीलिए मेघनाद ने महान ब्रह्मास्त्र का आह्वान किया। तब उसके बाणों की कोई परवाह ना कर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का सहारा लेकर सबको धराशायी कर दिया है और अब हम दोनों पर भी असंख्य बाणों से आक्रमण कर रहा है। इसने अपने शरीर को भी अदृश्य कर लिया है।

इसके बाद श्रीराम भगवान ब्रह्मा के प्रति सम्मान दिखाते हुए कहते हैं कि परमपिता ब्रह्मा की इस जगत के आदि कारण हैं। ये महान ब्रह्मास्त्र भी उन्ही का अस्त्र है। अतः हे लक्ष्मण! तुम मन में किसी भी प्रकार की घबराहट ना आने दो और मेरे साथ यहाँ चुपचाप खड़े होकर इसकी मार सहो। जब हम लोग युद्ध से विरत होकर अचेत होकर गिर जाएंगे, तब हमें उस अवस्था में देख कर ये राक्षस निश्चय ही लंका लौट जाएगा।

ये यहाँ पर लिखा गया है कि मेघनाद के बाणों से वानर सेना का और अहित ना हो इसीलिए श्रीराम और लक्ष्मण मेघनाद के प्रतिकार में समर्थ होने पर भी बिना शस्त्र उठाये उसी प्रकार ब्रह्मास्त्र से निकले बाणों का प्रहार झेलते रहे। उनकी ये योजना सफल हुई। जब मेघनाद ने दोनों भाइयों को घायल और अचेत हुआ देखा तो गर्व से विजयनाद करता हुआ वो वापस लंका को लौट गया।

युद्ध कांड के सर्ग ७३ में लिखा है -

स बाणवर्षैरभिवृष्यमाणो धारानिपातानिव तानचिन्त्य।
समीक्षमाणः परमाद्भुतश्री-रामस्तदा लक्ष्मणमित्युवाच॥६७॥

अर्थात: उस बाण वर्षा के लक्ष्य बने हुए परम अद्भुत शोभा से संपन्न श्रीराम पानी की धारा के समान गिरने वाले उन बाणों की कोई परवा ना करके लक्ष्मण की ओर देखते हुए बोले -

असौ पुनर्लक्ष्मण राक्षसेन्द्रो ब्रह्मास्त्रमाश्रित्य सुरेन्द्रशत्रुः।
निपातयित्वा हरिसैन्यमस्मान्-शितैः शरैरर्दयति प्रसक्तम्॥६८॥

अर्थात: लक्ष्मण! वह इंद्रद्रोही राक्षसराज इंद्रजीत प्राप्त हुए ब्रह्मास्त्र का सहारा लेकर वानर सेना को धराशायी करने के पश्चात अब तीखे बाणों द्वारा हम दोनों को भी पीड़ित कर रहा है।

स्वयंभुवा दत्तवरो महात्मा समाहितोऽन्तर्हितभीमकायः।
कथं नु शक्यो युधि नष्टदेहो निहन्तुमद्येन्द्रजिदुद्यतास्त्रः॥६९॥

अर्थात: ब्रह्माजी से वरदान पाकर सदा सावधान रहने वाले इस महामनस्वी वीर ने अपने भीषण शरीर को अदृश्य कर लिया है। युद्ध में इस इंद्रजीत का शरीर तो दिखाई ही नहीं देता, पर यह अस्त्रों का प्रयोग करता जा रहा है। ऐसी दशा में इसे हमलोग किस प्रकार मार सकते हैं?

मन्ये स्वयंभूर्भगवानचिन्त्य-स्तस्यैतदस्त्रं प्रभवश्च योऽस्य।
बाणावपातं त्वमिहाद्य धीमन् मया सहाव्यग्रमनाः सहस्व॥७०॥

अर्थात: स्वयंभू भगवान ब्रह्मा का स्वरुप अचिन्त्य है। वे ही इस जगत के आदि कारण हैं। मैं समझता हूँ, उन्ही का यह अस्त्र है, अतः बुद्धिमान सुमित्रकुमार! तुम मन में किसी प्रकार की घबराहट ना लाकर मेरे साथ यहाँ चुपचाप खड़े हो इन बाणों की मार सहो।

प्रच्छादयत्येष हि राक्षसेन्द्रः सर्वा दिशः सायकवृष्टिजालैः।
एतच्च सर्वं पतिताग्र्यशूरं न भ्राजते वानरराजसैन्यम्॥७१॥

अर्थात: यह राक्षसराज इंद्रजीत इस समय बाण समूहों की वर्षा करके सम्पूर्ण दिशाओं को आच्छादित किये देता है। वानरराज सुग्रीव की यह सारी सेना, जिसके प्रधान प्रधान शूरवीर धराशायी हो गए हैं, अब शोभा नहीं पा रही है।

आवां तु दृष्ट्वा पतितौ विसंज्ञौ निवृत्तयुद्धौ हतहर्षरोषौ।
ध्रुवं प्रवेक्ष्यत्यमरारिवास-मसौ समासाद्य रणाग्र्यलक्ष्मीम्॥७२॥

अर्थात: जब हम दोनों हर्ष एवं रोष से रहित तथा युद्ध से निवृत हो अचेत से होकर गिर जाएंगे, तब हमें उस अवस्था में देख कर युद्ध के मुहाने पर विजय लक्ष्मी को पाकर अवश्य ही यह राक्षसपुरी लंका में लौट जाएगा।

ततस्तु ताविन्द्रजितोऽस्त्रजालै-र्बभूवतुस्तत्र तदा विशस्तौ।
स चापि तौ तत्र विषादयित्वा ननाद हर्षाद् युधि राक्षसेन्द्रः॥७३॥

अर्थात: तदन्तर वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण वहां इंद्रजीत के बाण समूहों से बहुत घायल हो गए। उस समय उन दोनों को युद्ध में पीड़ित करके उस राक्षसराज ने बड़े हर्ष के साथ गर्जना की।

ततस्तदा वानरसैन्यमेवं रामं च संख्ये सह लक्ष्मणेन।
विषादयित्वा सहसा विवेश पुरीं दशग्रीवभुजाभिगुप्ताम्।
संस्तूयमानः स तु यातुधानैः पित्रे च सर्वं हृषितोऽभ्युवाच॥ ७४॥

अर्थात: इस प्रकार संग्राम में वानरों की सेना तथा लक्ष्मण सहित श्रीराम को मूर्छित करके इंद्रजीत सहसा देशमुख रावण की भुजाओं द्वारा पालित लंकापुरी में चला गया। उस समय समस्त निशाचर उसकी स्तुति कर रहे थे। वहां जाकर उसने पिता से प्रसन्नतापूर्वक अपनी विजय का सारा समाचार बताया।

इसके अगले सर्ग ७४ में मेघनाद के जाने के बाद सारी वानर सेना शिथिल सी पड़ गयी थी। तब विभीषण सभी वानरों को समझाते हुए बोले कि आप लोग इन दोनों को ऐसे देख कर चिंतित मत होइए क्यूंकि इनदोनो ने ब्रह्माजी का आदर करते हुए स्वयं अस्त्र नहीं उठाये थे। ये दोनों केवल मूर्छित हो गए हैं, इनके प्राणों पर कोई संकट नहीं आया है।

इसके आगे विभीषण बताते हैं कि परमपिता ब्रह्मा ने अपना महान अस्त्र ब्रह्मास्त्र इंद्रजीत को दिया था। इस अस्त्र का बल अमोघ है और इसीलिए रणभूमि में इसका आदर करते हुए दोनों भाई धराशायी हुए हैं, इस कारण इसमें खेद करने की कोई बात नहीं है।

युद्ध कांड के सर्ग ७४ में लिखा है -

तयोस्तदासादितयो रणाग्रे मुमोह सैन्यं हरियूथपानाम्।
सुग्रीवनीलाङ्गदजाम्बवन्तो न चापि किंचित् प्रतिपेदिरे ते॥१॥

अर्थात: युद्ध के मुहाने पर वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण निश्चेष्ट होकर पद गए, तब वानर सेनापतियों की वह सेना किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी। सुग्रीव, नील, अंगद और जांबवान को भी उस समय कुछ नहीं सूझता था।

ततो विषण्णं समवेक्ष्य सर्वं विभीषणो बुद्धिमतां वरिष्ठः।
उवाच शाखामृगराजवीरा-नाश्वासयन्नप्रतिमैर्वचोभिः॥२॥

अर्थात: उस समय सबको विषाद देख कर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण ने वानरराज के उन वीर सैनिकों को आश्वासन देते हुए अनुपम वाणी में कहा -

मा भैष्ट नास्त्यत्र विषादकालो यदार्यपुत्रौ ह्यवशौ विषण्णौ।
स्वयंभुवो वाक्यमथोद्वहन्तौ यत्सादिताविन्द्रजितास्त्रजालैः॥३॥

अर्थात: वानर वीरों! आपलोग भयभीत ना हूँ। यहाँ विषाद का अवसर नहीं है, क्यूंकि इन दोनों आर्यपुत्रों ने ब्रह्माजी के वचनों का आदर एवं पालन करते हुए स्वयं ही हथियार नहीं उठाये थे, इसीलिए इंद्रजीत ने इन दोनों को अपने अस्त्र समूहों से आच्छादित कर दिया था। अतएव ये दोनों भाई केवल विषादग्रस्त (मूर्छित) हो गए हैं ( इनके प्राणों पर कोई संकट नहीं आया है)।

तस्मै तु दत्तं परमास्त्रमेतत्स्व यंभुवा ब्राह्मममोघवीर्यम्।
तन्मानयन्तौ युधि राजपुत्रौ निपातितौ कोऽत्र विषादकालः॥४॥

अर्थात: स्वयंभू ब्रहाजी ने यह उत्तम अस्त्र इंद्रजीत को दिया था। ब्रह्मास्त्र नाम से इसकी प्रसिद्धि है और इसका बल अमोघ है। संग्राम में उसका समादर-उसकी मर्यादा की रक्षा करते हुए ही ये दोनों राजकुमार धराशायी हुए हैं, अतः इसमें खेद की कौन सी बात है?

तो यहाँ पर आप देख सकते हैं कि युद्ध भूमि में वानर सेना को और अधिक क्षति ना पहुंचे इसीलिए श्रीराम और लक्ष्मण स्वयं अपनी इच्छा से अचेत हो गए थे। इसके बाद जांबवंत के कहने पर हनुमान जी ने मृतसंजीवनी लाकर दोनों भाइयों के साथ साथ पूरी सेना की रक्षा की थी। जय श्रीराम।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें