गुरुवार, जनवरी 20, 2022

प्रमुख हिंदू धर्म ग्रंथों की सूची

कुछ समय पूर्व हमनें श्रुति एवं स्मृति के रूप में हमारे धार्मिक ग्रंथों के विभाजन के बारे में एक लेख लिखा था। आज हम उसे एक स्तर आगे ले जाने वाले हैं। सनातन हिंदू धर्म सृष्टि के आदि से प्रचलित भूमंडल में विख्यात धर्म है। इसके आधारभूत शास्त्रों को जानना आवश्यक है। इस लेख में संक्षेप मे इस पर कुछ निरूपण किया गया है।

हिन्दू धर्म के आधारग्रंथों को मुख्यतः ८ भागों में विभक्त किया गया है। आगम के अलावा अन्य सातों ग्रंथों को निगम कहा जाता है।
  1. वेद
  2. वेदांग
  3. उपवेद
  4. इतिहास और पुराण
  5. दर्शन
  6. स्मृति
  7. निबंध ग्रंथ
  8. आगम
वेद: हिंदू धर्म का मूल स्रोत वेद हैं, उसके बाद उपवेद, फिर वेद के अंग तथा उपांग हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं, मंत्र भागात्मक वेद के चार भेद हैं: 
  1. ऋक 
  2. यजुः 
  3. साम 
  4. अथर्व
वेद के छः भाग कहे गए हैं:
  1. मन्त्रसंहिता: इन चारों वेदों की ११३१ संहिताएँ थीं लेकिन आज सिर्फ १४ ही उपलब्ध हैं।
    • ऋग्वेद: इसकी २१ संहिताएँ होती हैं, जिनमें आजकल “बाष्कल” और “शाकल” ये दो संहिताएँ मिलती हैं। “बाष्कल” में अष्टक, आध्यायिक क्रम है और शाकल में मण्डल, अनुवाक आदि। शेष संहिताएँ लुप्त हैं।
    • यजुर्वेद: इसकी १०१ संहिताएँ हैं। यजुर्वेद के दो भेद माने जाते हैं:
      • शुक्ल: शुक्ल यजुर्वेद की १५ संहिताएँ हैं, उनमें केवल दो संहिताएँ मिलती हैं - वाजसनेयी या माध्यंदिनी और काव्य या कण्व, शेष लुप्त हैं।
      • कृष्ण: कृष्ण यजुर्वेद कि ८६ संहिताएँ होती हैं। इनमें से पाँच मिलती हैं - तैत्तिरीय संहिता, मैत्रायणी, कठ, कपिष्ठक और श्वेताश्वतर। शेष लुप्त हैं।
    • सामवेद: इसकी १००० संहिताए हैं, उनमें आजकल ३ मिलती हैं - कौथुमीया, जैमिनीया और राणायनीया संहिता का कुछ भाग मिलता है।
    • अथर्ववेद: इसकी ९ संहिताएँ हैं, इनमे आज दो मिलती हैं - शौनकीया और पैप्पलादी।
  2. ब्राह्मणग्रंथ: मंत्रभाग की जितनी संहिताएँ होती हैं, ब्राह्मण भाग भी उतना ही होता है, क्योंकि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध हुआ करता है। आरण्यक और उपनिषदें भी उतनी ही होती हैं। श्रौतसूत्र भी उतने ही तथा गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र, अनुक्रमणी और प्रातिशाख्य भी उतने ही होते हैं।
    • ऋग्वेद: इसके ऐतरेय और कौशीतकी (सांख्यायन) यह दो ब्राह्मणग्रंथ मिलते हैं।
    • यजुर्वेद:
      • कृष्ण यजुर्वेद: इसके तैत्तिरीय ब्राह्मण तथा तैत्तिरीय संहिता का मध्यवर्ती ब्राह्मण। 
      • शुक्ल यजुर्वेद: इसका शतपथ ब्राह्मण। यह भी दो प्रकार का है: 
        • काव्य शाखा वाला १७ काण्डों का है 
        • माध्यंदिनी शाखा का १४ काण्डों का है।
    • सामवेद: इसके ताण्ड ब्राह्मण, षडविंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण, आर्षेय ब्राह्मण, मंत्र ब्राह्मण, दैवताध्याय ब्राह्मण, वंश ब्राह्मण, संहितोपनिषद ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण और जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण आदि १० ब्राह्मण ग्रंथ हैं।
    • अथर्ववेद: इसका गोपथ ब्राह्मण।
  3. आरण्यक: ब्राह्मण ग्रंथों के जो भाग वन में पढ़ने योग्य हैं उन्हें आरण्यक या उपनिषद कहते हैं। इस समय प्राप्त उपनिषदों की कुल संख्या २७५ है किन्तु निम्नलिखित १३ ही प्रमुख हैं:
    1. ईश (ईश यजुर्वेद की मूल संहिता में ही है)
    2. केन
    3. कठ
    4. प्रश्न
    5. मुण्डक
    6. माण्डूक्य
    7. तैत्तिरीय
    8. ऐतरेय
    9. छांदोग्य
    10. वृहदारण्यक
    11. कौशीतकी
    12. मैत्रायणी
    13. श्वेताश्वतर
  4. सूत्रग्रंथ: ये तीन प्रकार के हैं: 
    1. श्रौतसूत्र: श्रौतसूत्रों में कल्प नामक वेदांग के कर्मकाण्ड सम्बंधी अध्याय को स्पष्ट किया गया है। इस समय निम्नलिखित श्रौतसूत्र उपलब्ध हैं:
      1. ऋग्वेद: इसके आश्वलायन और सांख्यायन श्रौतसूत्र।
      2. यजुर्वेद:
        1. कृष्ण यजुर्वेद: इसके आपस्तंब, हिरण्यकेशीय (सत्याषाढ़), बोधायन, भारद्वाज, वैखानस, बाधूल, मानव और वराह श्रौतसूत्र आदि कुल ८ हैं। 
        2. शुक्ल यजुर्वेद: इसका कात्यायन श्रौतसूत्र।
      3. सामवेद: इसके मशक, लाह्यायन, द्राह्यायण और खादिर श्रौतसूत्र हैं।
      4. अथर्ववेद: इसका वैतान श्रौतसूत्र।
    2. गृह्यसूत्र: वैदिक यज्ञादि तथा गृहस्थ कर्मों के विधान का वर्णन
    3. धर्मसूत्र: धर्माचार कर्मों के विधान का वर्णन। प्रमुख धर्मसूत्र हैं:
      1. गौतम
      2. वसिष्ठ
      3. आपस्तम्ब
      4. बोधायन
  5. प्रतिशाख्य: प्रतिशाख्य एक प्रकार के वैदिक व्याकरण हैं ये चारों ही वेदों के उपलब्ध हैं। इनके द्वारा भिन्न- भिन्न वेदों तथा एक ही वेद के अनेक तरह के स्वरों के उच्चारण, पदों के क्रम और विच्छेद आदि का निर्णय होता है।
  6. अनुक्रमणी: वेदों की रक्षा तथा वेदार्थ का विवेचन इन ग्रंथों का विषय है। विभिन्न वेदों की अनुक्रमणियाँ होती हैं जिनमें से ऋग्वेद की आर्षानुक्रमणी, छन्दोनुक्रमणी, देवतानुक्रमणी, अनुवाकानुक्रमणी, सर्वानुक्रमणी, बृहद्वैवत, ऋग्विज्ञान, शांख्यायन परिशिष्ट, आश्वलायन परिशिष्ट और ऋक्प्रतिशाख्य आदि कुल १० अनुक्रमणियाँ हैं। कृष्ण यजुर्वेद की आत्रेयानुक्रमणी, चारायणीयानुक्रमणी और तैत्तिरीय प्रातिशाख्य एवं शुक्ल यजुर्वेद की प्रातिशाख्य सूत्र और कात्यायनानुक्रमणी हैं। 
यज्ञों में कुल १६ ऋत्विक होते हैं जिनमें चार प्रमुख हैं, जो ये क्रम से चारों दिशाओं में बैठते हैं।
  1. ऋग्वेद के ऋत्विक को होता कहते हैं। 
  2. यजुर्वेद के ऋत्विक को अध्वर्यु कहते हैं। 
  3. सामवेद के ऋत्विक को उद्गाता कहते हैं। 
  4. अथर्ववेद के ऋत्विक को ब्रह्मा कहते हैं। 
उपवेद: जैसे वेद ४ प्रकार का होता है, वैसे ही सभी वेदों के उपवेद भी हैं:
  1. अथर्ववेद का आयुर्वेद जिसमें अश्विनी कुमार संहिता, ब्रह्म संहिता, मलसंहिता, धन्वंतरि सूत्र, सूपशास्त्र, जाबालिसूत्र, सुश्रुत संहिता, भेल संहिता, कश्यप संहिता, चरकसंहिता और अष्टांगहृदय आदि ग्रंथ उपलब्ध हैं।
  2. यजुर्वेद का धनुर्वेद जिसमें वैशम्पायनकृत नीतिप्रकाशिका, युक्ति कल्पतरु और समरांगण सूत्रधार आदि ग्रंथ उपलब्ध हैं।
  3. सामवेद का गान्धर्ववेद जिसमें भरत मुनि विरचित नाट्यशास्त्र, शारंगदेव का संगीत रत्नाकर और दामोदर कृत संगीत दर्पण आदि ग्रंथ उपलब्ध हैं।
  4. ऋग्वेद का अर्थवेद जिसमें कौटिल्य का अर्थशास्त्र, सोमदेवभट्ट का नीतिवाक्यामृत सूत्र, चाणक्य सूत्र, कामन्दक और शुकनीति आदि ग्रंथ उपलब्ध हैं।
वेदांग: वेद के अंग छः होते हैं जिन्हे वेदांग कहा जाता है: 
  1. शिक्षा:
    1. ऋग्वेद: पाणिनीय शिक्षा
    2. यजुर्वेद:
      1. कृष्ण यजुर्वेद: व्यास शिक्षा
      2. शुक्ल यजुर्वेद: याज्ञवल्क्य आदि २५ शिक्षा ग्रंथ हैं।
    3. सामवेद: गौतमी, लोमशी और नारदीय शिक्षायें हैं।
    4. अथर्ववेद: माण्डुकीय शिक्षा 
  2. कल्प: नक्षत्र कल्प, संहिता कल्प, आंगिरस कल्प, शान्ति कल्प, वैतान कल्प आदि ग्रंथ मिलते हैं। कल्प मे वेदमंत्रों का विनियोग मिलता है।
  3. व्याकरण: भिन्न- भिन्न वेदों के भिन्न भिन्न व्याकरण हुआ करते थे, पाणिनि का व्याकरण और शाकटायन व्याकरण के सूत्र यजुर्वेद से संबद्ध प्रतीत होते हैं। इस प्रकार शाकल्य आदि से भी बहुत से व्याकरण मिलते थे। इसी प्रकार पाणिनीय व्याकरण पर कात्यायन ऋषि का वार्तिक और महर्षि पतंजलि का महाभाष्य उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त सारस्वत, कामधेनु, हेमचन्द्र, प्राकृतिक प्रकाश, प्राकृत व्याकरण, कलाप व्याकरण और मुग्धबोध व्याकरण तथा इनके भाष्य मिलते हैं।
  4. निरुक्त: निरुक्त भी भिन्न भिन्न संहिताओं के भिन्न भिन्न थे। यास्काचार्य का निरुक्त ऋग्वेद की वर्तमान से प्रचलित शाकल संहिता का नहीं बल्कि अन्य संहिता का है, निरुक्त में व्याख्यात ऋकमंत्रों का वर्तमान ऋग्वेदसंहिता से पूरा मेल नहीं दिखता, कश्यप और शाकपूणी आदि के भी निरुक्त थे जिनका नाम इस निरुक्त में आता है। निरुक्त वेदों की व्याख्या पद्धति बतलाते हैं।
  5. छन्द: छंद शास्त्र भी भिन्न भिन्न मिलते हैं। पिंगलादि मुनि प्रणीत छंदोग्रंथ और गार्ग्यप्रोक्त उपनिदानसूत्र नामक सामवेद का छंदोग्रंथ उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त पिंगलनागप्रोक्त छन्दसूत्र (छन्दोविचिति), वेडूक माधवकृत छन्दानुक्रमणी और जयदेव का छन्दसूत्र उपलब्ध हैं। लौकिक छन्दों पर भी छन्दशास्त्र (हलायुधवृत्ति), छन्दोमंजरी, वृत्त रत्नाकर, श्रुतबोध और जानाश्रयी छन्दोविचिति आदि ग्रंथ उपलब्ध हैं।
  6. ज्योतिष: भृगुसंहिता, बृहत्संहिता, सूर्यसिद्धान्त, सिद्धान्तशिरोमणि आदि ग्रंथों के अलावा नारद, पाराशर, वशिष्ठ, वराहमिहिर, आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य के ज्योतिष ग्रंथ मिलते हैं, पर उनमें किसका किस वेदसंहिता से सम्बन्ध है ये पता नहीं लगता यह वेद के अंग हैं।
पुराण: पुराणों मे वेद के कठिन विषय - रामधिभाषा, परकीया व लौकिकी भाषा एवं गाथा आदि बहुत सरल कर दिए गए हैं। पुराण ज्ञान अनादि हैं, श्री वेदव्यास उनके संपादक एवं परिष्कारक हैं। रचना उनकी अपौरुषेय है। पुराणों मे वेद “गागर में सागर” की तरह समाये हुए हैं, उनमें वेद का सम्पूर्ण तत्व आ गया है। पुराण प्रधानता से लोकवृत्त का प्रतिपादन करते हैं, लोकव्यवहार की व्यवस्थापना उनका प्रधान विषय नहीं, लोकव्यवहार की व्यवस्थापना धर्मशास्त्र का मुख्य विषय है। पुराण चार प्रकार के होते हैं जिनमें सभी की संख्या १८-१८ है। 
  1. महापुराण
    1. ब्रह्म
    2. पद्म 
    3. विष्णु
    4. शिव
    5. लिंग 
    6. गरुड़ 
    7. नारद 
    8. भागवत 
    9. अग्नि 
    10. स्कन्द 
    11. भविष्य 
    12. ब्रह्मवैवर्त 
    13. मार्कण्डेय 
    14. वामन 
    15. वाराह
    16. मत्स्य 
    17. कूर्म 
    18. ब्रह्माण्ड
  2. लघु पुराण: इसे आम भाषा में पुराण कहते हैं।
    1. वृहद्विष्णु
    2. शिव उत्तरखण्ड
    3. लघु वृहन्नारदीय
    4. मारकण्डेय
    5. वह्नि
    6. भविष्योत्तर
    7. वराह
    8. स्कन्द
    9. वामन
    10. वृहद्वामन
    11. वृहन्मतस्य
    12. स्वल्पमतस्य
    13. लघुवैवर्त्य 
    14. अन्य ५ प्रकार के भविष्य पुराण
  3. अतिपुराण:
    1. सनत्कुमार
    2. बृहन्नारदीय
    3. आदित्य 
    4. मानव
    5. नन्दिकेश्वर
    6. कौर्म
    7. भागवत
    8. वसिष्ठ
    9. भार्गव 
    10. मुद्गल 
    11. कल्कि 
    12. देवी 
    13. महाभागवत 
    14. बृहद्धर्म 
    15. परानंद 
    16. पशुपति 
    17. वह्नि 
    18. हरिवंश
  4. उप पुराण:
    1. आदि
    2. नरसिंह 
    3. स्कन्द 
    4. शिवधर्म 
    5. दुर्वासा 
    6. नारदीय 
    7. कपिल 
    8. वामन
    9. महेश्वर 
    10. औशनस 
    11. ब्रह्माण्ड 
    12. वरुण 
    13. कालिका 
    14. साम्ब 
    15. सौरि 
    16. पाराशर
    17. मारीच 
    18. भास्कर
तंत्रशास्त्र: पुराणों मे तन्त्रग्रंथों का भी समावेश हो जाता है। तंत्रशास्त्र में भी वेदों के विषय विभिन्न अधिकारियों के लिए बतलाये गए हैं। इनमें आचार, उपासना, ज्ञान , मन्त्र, हठ, आदि योग, आयुर्वेद के वाजीकरण आदि के गुप्त योग, भूतविद्या, रसायन आदि सभी विद्यायें और ज्योतिष के रहस्य स्पष्ट किये गए हैं। तन्त्रों के परोक्षरूप से कहे गए कई तत्व अतिशयित गूढ़ हैं। परिभाषायें, मेरुमंत्र, महानिर्वाण तंत्र, आगमसार , हठयोग– प्रदीपिका आदि से जाने बिना वे अश्लील प्रतीत होते हैं। किन्तु उनकी परिभाषा जानने के बाद अत्यंत आनंद आता है। दत्तात्रेय, कुलार्णव, कालीतंत्र आदि बहुत से तन्त्रग्रंथ होते हैं।

इतिहास: इसमें मुख्यतः रामायण, महाभारत लिए जाते हैं। इनमें रामायण आदिकवि वाल्मीकि की आदिम मधुर रचना है। इसमें श्री राम अवतार का वर्णन है। इसकी पद्य संख्या २४ हज़ार है। दूसरा है महाभारत ये १ लाख पद्यों का है। इसमे १८ पर्व हैं। इसमे हिंदू धर्म के सभी विषय इतिहास द्वारा व्याख्यात कर दिए गए हैं।

शास्त्र: इसमें ६ दर्शन आते हैं: 
  1. सांख्य दर्शन: श्री कपिल मुनि से प्रणीत है। इसमे प्रकृति– पुरुष का वर्णन है।
  2. योग दर्शन: इसके कर्ता श्री पतंजलि मुनि हैं। इस पर व्यास का भाष्य है। इसमें योग की ग्रंथियाँ सुलझाई गई हैं।
  3. वैशेषिक दर्शन: इसके प्रणेता श्री कणाद मुनि हैं। इसका प्रशस्तपाद का भाष्य है। इसमें संसार को ६ भागों मे विभक्त करके उसका विवरण दिया गया है।
  4. न्याय दर्शन: इसमें १६ पदार्थों का तत्वज्ञान प्रतिपादित है। गौतम मुनि प्रणेता हैं। श्री वात्स्यायन मुनि का इस पर भाष्य है।
  5. मीमांसा दर्शन: इसके श्री जैमिनी जी कर्ता हैं। वैदिक कर्मकांड की मीमांसा इसका विषय है। इस पर श्री शंकराचार्य का भाष्य है।
  6. वेदांत दर्शन: इसके कर्ता श्री वेदव्यास हैं, इसमें जीव– ब्रह्म की अद्वैतता पर विचार किया गया है। इस पर श्री शंकराचार्य, स्वामी रामानुजाचार्य, श्री माध्वाचार्य, श्री वल्लभाचार्य आदि के भाष्य मिलते हैं।
स्मृतियाँ: स्मृतियाँ भी बहुत होती हैं, जितनी वेदसंहितायें हैं, उतने ही श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र तथा स्मृतियाँ होती हैं। धर्म के सूत्रों (संक्षेप) का नाम धर्मसूत्र है, वेदार्थ के स्मरण का नाम स्मृति होता है। स्मृतियों मे आचार, संस्कार , वर्णधर्म, वर्णसंकर धर्म , स्त्रीत्वधर्म, पुरुषधर्म, राजधर्म, प्रायश्चित्तादि बहुत विषय आये हैं। न्यायदर्शन के भाष्यकार श्री वात्स्यायन मुनि ने लिखा है कि "यदि धर्मशास्त्र न हो, तो लोकव्यवहार का उच्छेद हो जाय” यह ठीक ही है। विधिनिषेध सब स्मृतियों से ज्ञात होते हैं। वेद, स्मृति एवं पुराण के विरोध में वेद अधिक माननीय हैं। १०० से अधिक स्मृतियाँ उपलब्ध हैं। इनमे से मुख्य हैं:
  1. मनुस्मृति 
  2. वृद्धमनु 
  3. आंगिरस 
  4. अत्रि 
  5. आपस्तम्ब 
  6. औशनस 
  7. कात्यायन 
  8. गोभिल (प्रजापति) 
  9. यम 
  10. बृहद्धर्म 
  11. लघुविष्णु 
  12. वृहद्विष्णु 
  13. नारद
  14. शातातप 
  15. हारीत 
  16. वृद्धहारीत
  17. लघुआश्वलायन 
  18. शंख
  19. लिखित 
  20. शंख-लिखित
  21. याज्ञवल्क्य 
  22. व्यास
  23. संवर्त
  24. दक्ष
  25. देवल 
  26. बृहस्पति 
  27. पाराशर
  28. बृहत्पराशर
  29. कश्य
  30. गौतम
  31. वृद्धगौतम
  32. वसिष्ठ
  33. पुलत्स्य 
  34. योगीयाज्ञवल्क्य 
  35. व्याघ्रपाद 
  36. बोधायन
  37. कपिल 
  38. विश्वामित्र
  39. शाण्डिल्य 
  40. कण्व 
  41. दाभ्य 
  42. भारद्वाज
  43. मार्कण्डेय
  44. लौगाक्षी
निबंध: निबंध ग्रंथ स्मृतियों की भाँति ही प्रामाणिक हैं। वैदिक ग्रंथों से लेकर निबंध ग्रंथों तक सभी पर टीकायें भाष्य, कारिकाग्रंथ तथा संक्षिप्त सारसंग्रह है। इनकी भाष्य- टीकाओं के आधार पर शंकराचार्य का अद्वैतवाद, रामानुजाचार्य का विशिष्ट अद्वैतवाद, निम्बार्काचार्य का द्वैताद्वैतवाद, बल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतवाद, माधवाचार्य का द्वैतवाद और गौड़ीय सम्प्रदाय का अचिन्त्य भेदाभेदवाद आदि सम्प्रदाय चल निकले।

आगम ग्रंथ: आगम के दो भाग हैं:
  1. दक्षिणागम (समयमत): श्रुतियों में दक्षिणागम का मूल है तो पुराणों में उसका विस्तार हुआ है। ये तीन प्रकार के हैं:
    1. वैष्णवागम: इसमें पांचरात्र और वैखानस आगम दो प्रकार के ग्रंथ उपलब्ध हैं।
    2. शैवागम: भगवान शंकर के मुख से २८ प्रमुख और १८० उपतंत्र प्रकट हुए थे जिसमें ६४ मुख्य हैं। पाशुपत सूत्र, नरेश्वर परीक्षा, तत्वसंग्रह, भोगकारिका, मोक्षकारिका, परमोक्ष निराश कारिका, श्रुतिसूक्तिमाला, चतुर्वेद तात्पर्य संग्रह, तत्व प्रकाशिका, सूत्रसंहिता, नारदकारिका और रत्नत्रय आदि ग्रंथ उपलब्ध हैं।
    3. शाक्तागम: इसमें सात्विक ग्रंथों को तंन्त्र, राजसिक को यामल तथा तामसिक को डामर कहते हैं। असुरों की परम्परा का मुख्य शास्त्र वामागम है। इनमें ६४ ग्रंथ मुख्य हैं लेकिन सभी उपलब्ध नहीं हैं। शारदातिलक और मंत्र महार्णव उपलब्ध हैं। बाकी नेपाल के मंदिरों और अपने देश में रखे हुए हो सकते हैं। तमाम ग्रंथों की जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं है।
  2. वामागम (कौलमत)
हिन्दू धर्म बहुत विशाल है। सभी ग्रंथों को मिलाकर पूरा वैदिक ज्ञान संभव हो पाता है। इस प्रकार यह सारा साहित्य मिलकर हिंदू धर्म का आधार बनता है। हालाँकि ऊपर लिखे सभी ग्रन्थ भी सागर के समान विस्तृत हिन्दू धर्म में एक बून्द के समान ही हैं। 

ये लेख हमें श्री कामता प्रसाद मिश्र के द्वारा प्राप्त हुआ है जो मूल रूप से प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के निवासी हैं। इन्होने इलाहबाद विश्वविद्यालय से स्नातक किया है और वर्तमान में ये गुजरात के वापी नगर में निवास करते हैं। इनका अपना स्वरोजगार है और ये सतत धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और उसके ज्ञान को प्रसारित करते हैं। धर्मसंसार में उनके सहयोग के लिए हम उनके आभारी हैं।

6 टिप्‍पणियां:

  1. श्री नीलाभ जी!
    मेरे संकलन को आपने धर्मसंसार जैसे प्रतिष्ठित ब्लाॅग में शामिल करने योग्य समझा, इसके लिये हृदय से आभार।

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    उत्तर
    1. आपने इतनी अच्छी जानकारी साझा की सर, आपका आभार।

      हटाएं
  2. ज्ञान वर्धन हो, सनातन धर्म, चकाचौंध से भरी दुनिया आम जनमानस में विलुप्त न हो जाए, इस हेतु आपका धर्म संसार ज्ञान साझा कर रहा है, प्रयास सराहनीय है, आभार

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