गुरुवार, दिसंबर 02, 2021

विश्वामित्र और परशुराम में क्या सम्बन्ध था?

महर्षि विश्वामित्र और भगवान परशुराम के विषय में कौन नहीं जानता? किन्तु क्या आपको पता है कि ये दोनों आपस में सम्बन्धी भी थे? क्या आपको पता है कि इन दोनों में कौन बड़े थे? यदि आपने भगवान परशुराम पर लिखे गए हमारे लेख को पढ़ा होगा तो आपको पता होगा कि इन दोनों में क्या सम्बन्ध था। आइये इस विषय में कुछ जानते हैं।
  • परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक थे महर्षि भृगु
  • महर्षि भृगु का विवाह पौलोम दैत्य की पुत्री पौलोमी से हुआ। दोनों के एक पुत्र हुए जिनका नाम महर्षि च्यवन था।
  • महर्षि च्यवन ने आरुषि नामक कन्या से विवाह किया जिनसे इन्हे और्व नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।
  • और्व के महातपस्वी पुत्र हुए जिनका नाम था महर्षि ऋचीक
  • महर्षि ऋचीक का विवाह महाराज गाधि की पुत्री और राजर्षि विश्वामित्र की छोटी बहन सत्यवती से हुआ। सत्यवती और महर्षि ऋचीक के पुत्र हुए महर्षि जमदग्नि। इस प्रकार महर्षि विश्वामित्र महर्षि जमदग्नि के मामा लगे।
  • महर्षि जन्मदग्नि ने इक्ष्वाकु कुल के राजा महाराज प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। प्रसेनजित के ही कुल में आगे चल कर श्रीराम ने जन्म लिया। महर्षि जमदग्नि और रेणुका के कुल पाँच पुत्र हुए जिनमें से सबसे छोटे थे श्रीहरि के छठे अवतार राम। यही राम भगवान शंकर से विद्युतभि नामक परशु प्राप्त करने के बाद परशुराम नाम से जगतविख्यात हुए।
तो इस प्रकार भगवान परशुराम राजर्षि विश्वामित्र के नाती थे।

बाल्यकाल में जब भगवान परशुराम ने अपने पिता महर्षि जमदग्नि से शस्त्र विद्या प्राप्त करने की जिद की तब उन्होंने परशुराम को उनके नाना विश्वामित्र के पास ही भेजा। इस प्रकार महर्षि विश्वामित्र भगवान परशुराम के प्रथम गुरु भी बनें। उन्होंने परशुराम को सभी प्रकार के दिव्यास्त्र प्रदान किये। किन्तु परशुराम उससे भी संतुष्ट नहीं हुए। 

तब विश्वामित्र ने उन्हें भगवान शंकर की तपस्या करने को कहा। परशुराम जी ने ऐसा ही किया और तपस्या द्वारा भोलेनाथ को प्रसन्न कर उन्हें अपना गुरु बनाया। परशुराम ने त्रिदेवों को प्रसन्न करने उनसे अनेकानेक दिव्यास्त्र प्राप्त किये। उन अमोघ अस्त्रों के कारण ही वे संसार में अजेय बन गए।

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