गुरुवार, अक्तूबर 21, 2021

क्या वास्तव में हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में छिपाया था?

श्री विष्णु पुराण में वर्णित भगवान विष्णु के दशावतार में तीसरे हैं भगवान वाराह। इस अवतार में इन्होने हिरण्यकशिपु के छोटे भाई हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी का उद्धार किया था। इस अवतार में जो सबसे भ्रामक बात जन-मानस में फैली है वो ये है कि हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में छिपा दिया था। किन्तु ये कैसे संभव है? समुद्र तो पृथ्वी पर ही होता है, फिर पृथ्वी को समुद्र में छिपा देना कैसे संभव है? तो आइये इस घटना के पीछे छिपे सत्य को समझने का प्रयास करते हैं।

सबसे पहली बात ये है कि पृथ्वी को समुद्र में छिपा देने की बात मिथ्या है। किसी भी पुराण में ये नहीं लिखा है कि हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में छिपाया था। दशावतार की कथा हमें सबसे विस्तार में विष्णु पुराण में मिलती है। इसके अतिरिक्त २४००० श्लोकों वाले वाराह पुराण में भी इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। दोनों ग्रंथों में ये साफ-साफ लिखा है कि हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में नहीं बल्कि "रसातल" में छिपाया था।

पुराणों में १४ लोकों का वर्णन है जिनमें से ७ पृथ्वी से ऊपर और ७ पृथ्वी से नीचे की ओर बताये गए हैं। जो सात लोक पृथ्वी से ऊपर की ओर हैं वे हैं - भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और ब्रह्मलोक। उसी प्रकार पृथ्वी के नीचे जो सात लोक हैं वे हैं - अतल, वितल, सतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल। ध्यान कि ये १४ लोक पृथ्वी से अलग माने जाते हैं। इन्ही में से एक लोक रसातल में हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को छिपाया था।

कुछ स्थानों पर ऐसा भी वर्णन है कि हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को सातवें पाताल, जिसका नाम पाताल ही है वहाँ छिपा दिया था। किन्तु अधिकतर स्थानों पर रसातल का नाम ही वर्णित है। ऐसा माना जाता है कि रसातल में "पणि" नामक दैत्यों का वास है जिन्हे निवातकवच, कालिकेय एवं हिरण्यपुरवासी के नाम से भी जाना जाता है। ये सभी देवताओं के घोर शत्रु माने जाते हैं। हिरण्याक्ष ने इसी कारण पृथ्वी को रसातल में छिपाया था ताकि देवता यहाँ आकर उनकी रक्षा ना कर सकें।

अब प्रश्न ये आता है कि ये समुद्र वाली बात कहाँ से आयी? ये भी हमारी समझ का ही फेर है। कहा जाता है कि ये सभी १४ लोक शून्य तक फैले "खौगोलिक सागर" का भाग हैं। इस खौगोलिक सागर को ही कुछ विद्वान "भव सागर" भी कहते हैं। इसी कारण कुछ स्थानों पर ये लिख दिया गया कि हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को "खौगोलिक समुद्र" में छिपा दिया। ध्यान दें, खौगोलिक सागर, ना कि पानी वाला सागर। समय के साथ-साथ हमने गलती से इसे केवल "सागर" मान लिया और ये समस्या उत्पन्न हुई।

इसमें एक समस्या इस घटना के बाद घटी एक घटना के कारण भी हुई। ऐसा वर्णन है कि पृथ्वी को रसातल में छिपाने के बाद हिरण्याक्ष सागर में जाकर जल के देवता वरुण को युद्ध की चुनौती देता है। किन्तु वरुण देव उसकी इस चुनौती को हँस कर टाल देते हैं और उसे कहते हैं कि उसकी बल की समता करने वाले केवल नारायण ही हैं, अतः वो जाकर उन्हें ही युद्ध की चुनौती दे। 

तब हिरण्याक्ष नारायण से युद्ध करने चल देता है। बाद में उसे वरुण देव और देवर्षि नारद से पता चलता है कि भगवान विष्णु इस समय वाराह के रूप में पृथ्वी का उद्धार करने रसातल गए हैं। इस पर जब हिरण्याक्ष रसातल पहुँचता है तो वो देखता है कि अनन्त रूपी वाराह पृथ्वी को अपनी दाढ़ में उठा कर भवसागर अर्थात रसातल से निकाल कर उनके अपने स्थान पर ले जा रहे हैं। तब हिरण्याक्ष उन्हें कई अपशब्द बोलते हुए उन्हें युद्ध की चुनौती देता है और उनके द्वारा अवहेलना किये जाने पर उनपर आक्रमण कर देता है। पृथ्वी को अपने स्थान पर वापस स्थापित करने के बाद भगवान वाराह घोर युद्ध कर हिरण्याक्ष का वध कर देते हैं। 

जब भगवान वाराह पृथ्वी को उसके अपने स्थान पर ले जा रहे थे उस समय हिरण्याक्ष वरुण लोक में ही था। अब चूँकि वरुण जल के देवता हैं इसी कारण हो सकता है कुछ लोगों को ये लगा हो कि भगवान वाराह पृथ्वी को सागर से निकाल कर ला रहे हैं। यही से इस मिथक का आरम्भ हुआ होगा। तो ये सदैव ध्यान रखें कि हिरण्याक्ष द्वारा पृथ्वी को सागर में नहीं अपितु रसातल या खौगोलीय/भवसागर में रखा गया था। समय के साथ हमें ये भ्रम हो गया कि वो सागर था। 

जय वाराह देव।

3 टिप्‍पणियां:

  1. Prithvi ko agar varah Bhagwan ne apni seeng par rakh kar bahar nikala to kya us samay prithvi ka rotation band tha kya ,matlab vo surya ka chakkar nahi laga rahi thi aur ek second ke lie bhi agar prithvi ka rotation band ho jae to jeevan samapt ho jaega prithvi pe ,phir vapas jeevan kaise prarambh hua

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