गुरुवार, जून 24, 2021

क्या महर्षि वाल्मीकि शूद्र वर्ण से थे?

आज समाज जात-पात में बंटा हुआ है जिसमें कोई दो राय नहीं है। हालाँकि यदि हिन्दू धर्म को आधार माना जाये तो इसमें जाति नाम की कोई चीज ही नहीं होती थी। हिन्दू धर्म में सदैव वर्ण व्यवस्था का विधान है, जाति व्यवस्था का नहीं। समय के साथ-साथ ये वर्ण व्यवस्था कब जाति व्यवस्था में बदल गयी, किसी को पता नहीं। अन्यथा प्राचीन वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रों को समान अधिकार प्राप्त हैं। वर्ण और जाति के भेद को बताने के लिए हमने एक लेख पहले ही धर्म संसार पर प्रकाशित किया है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

जाति-पाती के इस भेद ने केवल हमें ही नहीं बांटा बल्कि हमारे पौराणिक चरित्रों को भी बांट दिया है। इनमें से जो अग्रगणी हैं वे हैं रामायण महाकाव्य के रचनाकार महर्षि वाल्मीकि। आज भी आपको लोग दलित समाज को "वाल्मीकि समाज" के नाम से उद्बोधित करते दिख जाएंगे। इसमें कुछ गलत नहीं है, किन्तु यदि हम अपने धार्मिक ग्रंथों की मानें तो महर्षि वाल्मीकि शूद्र नहीं अपितु ब्राह्मण वर्ण (ध्यान दें वर्ण, ना कि जाति) में जन्में थे और उनका गोत्र भृगु था।

परमपिता ब्रह्मा के प्रथम १६ मानस पुत्रों में एक थे महर्षि मरीचि। ये प्रजापति थे एवं सप्तर्षियों में से एक थे। मरीचि ने कर्दम ऋषि की पुत्री कला से विवाह किया जिनसे इन्हें महर्षि कश्यप पुत्र रूप में प्राप्त हुए। कश्यप ने प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया जिनसे समस्त जीवों की उत्पत्ति हुई। उनकी दूसरी पत्नी अदिति से १२ आदित्यों ने जन्म लिया। इन आदित्यों में एक थे वरुण। महर्षि वाल्मीकि को इन्ही वरुण का पुत्र बताया गया है।

वेदों में वरुण को प्रचेता भी कहा गया है और इसी कारण वाल्मीकि का एक नाम प्रचेतस भी प्रसिद्ध हुआ। इनकी माता का नाम चर्षणी था। इनका गोत्र महर्षि भृगु का बताया गया है, हालांकि कुछ जगह इन्हें भृगु का छोटा भाई भी बताया गया है। उत्तर रामायण में महर्षि वाल्मीकि अपना ठीक यही परिचय श्रीराम को देते हैं।

प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन।
(वाल्मीकिरामायण ७/९६/१८)

अगले श्लोक में वे महर्षि भृगु के कुल में जन्म लेने की पुष्टि करते हैं।

संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्र कम्।
उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना।।
(वाल्मीकि रामायण ७/९४/२५)

ब्रह्मवैवर्त पुराणमें कहा है -

कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टु: सृष्टिविधौ पुनः।
य: पुत्रश्चेतसो धातु: बभूव मुनिपुङ्गव:।।
तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामह:।।

अर्थात्: कल्पान्तरों के बीतने पर सृष्टा के नवीन सृष्टि विधान में ब्रह्मा के चेतस से जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसे ही ब्रह्मा के प्रकृष्ट चित्तसे आविर्भूत होनेके कारण प्रचेता कहा गया है।

मनुस्मृति में ब्रह्माजी द्वारा प्रचेता इत्यादि १० महर्षियों के जन्म के विषय में लिखा है।

अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।
पतीत् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश।।
(मनु०-१/३४-३५)

महाभारत में भी महर्षि वेदव्यास ने महर्षि वाल्मीकि के भार्गव कुल में उत्पत्ति के विषय में लिखा है -

श्लोकश्चापं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना।
आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत।।
(महाभारत १२/५७/४०)

विष्णु पुराण इनका एक नाम ऋक्ष भी आया है -

ऋक्षोऽभूद्भार्गववस्तस्माद्वाल्मीकिर्योऽभिधीयते।
(विष्णु०३/३/१८)

शिव पुराण में इन्हे ब्रह्मा से उत्पन्न बताया गया है।

पुरा स्वायम्भुवो ह्यासीत् प्राचेतस महाद्युतिः।
ब्रह्मात्मजस्तु ब्रह्मर्षि तेन रामायणं कृतम्।।

अब प्रश्न आता है कि यदि महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण वर्ण में जन्मे प्रचेता के पुत्र थे तो उनके शुद्र वर्ण में जन्म लेने की कथा का प्रसार कैसे हुआ? इसका उत्तर स्कन्द पुराण में है जहाँ रत्नाकर नामक एक डाकू का वर्णन है जो देवर्षि नारद की प्रेरणा से राम नाम लेकर महान तपस्वी बनता है और अपना नाम वाल्मीकि रख लेता है। ऐसी संभावना है कि उसने आदिकवि महर्षि वाल्मीकि से प्रेरित होकर अपना नाम उन्ही के नाम पर रख लिया हो। क्योंकि पुराणों का कालखंड रामायण से बहुत बाद का है, और रत्नाकर का वर्णन केवल स्कन्द पुराण में मिलता है, यही संभावना सबसे सटीक बैठती है।

अब समस्या ये है कि वास्तविक वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में लेश मात्र भी भेद नही है। लेकिन समय के साथ ये पवित्र वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में बदल गयी जहाँ ब्राह्मण को ऊँचा और शूद्र को नीचा बताया जाने लगा। बाद में जब स्वघोषित दलित विकास पथ पर आए तो उन्हें रत्नाकर डाकू से जोड़ दिया गया जो अपने कर्मो द्वारा ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है। हालांकि इसमें कुछ गलत नही है क्योंकि ये एक सांकेतिक संबंध है जो बहुत सकारात्मक है। अन्य वर्णों से ब्राह्मण बनने के भी कई उदाहरण हमारे पास हैं जिनमे से सर्वोत्तम महर्षि विश्वामित्र हैं जिन्होंने क्षत्रिय वर्ण त्याग कर ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया। ये स्वयं में एक प्रमाण है कि हिन्दू धर्म सदैव से कर्म प्रधान रहा है, जन्म प्रधान नही।

तो अंत मे यही कहना चाहूंगा कि सबसे पहले तो हमें वर्ण एवं जाति का अंतर ढंग से समझना चाहिए। तभी हम समझ पाएंगे कि रत्नाकर से वाल्मीकि बने व्यक्ति को यदि आज के शुद्र (जाति नही, वर्ण) से जोड़ें तो भी ये बहुत प्रेरणादायक है और किसी प्रकार की कोई हानि नही है। किंतु जहाँ तक रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का प्रश्न है तो वे ब्राह्मण वर्ण में जन्मे प्रचेता के पुत्र ही थे।

जय श्रीराम।

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