गुरुवार, अप्रैल 08, 2021

श्री कष्टभंजन हनुमान

गुजरात के बोटाद जिले में भावनगर के पास एक गाँव सारंगपुर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ पर स्थति श्री कष्टभंजन हनुमान का मंदिर है। इन्हे सारंगपुर का सम्राट माना जाता है और लोग इन्हे "बड़े हनुमानजी" एवं "महाराजाधिराज" के नाम से भी जानते हैं। इस सुन्दर मंदिर में हनुमान जी एक स्वर्ण सिंहासन पर विद्यमान रहते हैं। हालाँकि उनका ये रूप उनके आम साधारण रूप से थोड़ा अलग है। स्वर्ण मंदिर में, स्वर्ण गदा धारण किये हुए कष्टभंजन हनुमान प्रत्येक दिन श्रृंगार के बाद बहुत मनोहारी लगते हैं।

कहते हैं इस मंदिर में आने वाले प्रत्येक श्रद्धालुओं के कष्ट को महावीर हनुमान हर लेते हैं और इसी कारण इनका ये नाम पड़ा है। इस मंदिर में वे जिस सिंहासन पर विराजते हैं वो ४५ किलो स्वर्ण एवं ९५ किलो चाँदी से बनाया गया है। उनके शीश के मुकुट पर हीरे एवं अन्य माणिक्य जड़े हुए हैं एवं उनकी गदा भी ठोस स्वर्ण से निर्मित है। वे चहुँओर से अपनी वानर सेना से घिरे हैं एवं उन्होंने अपने पैरों के नीचे शनिदेव को दबा रखा है, किन्तु शनिदेव का रूप एक स्त्री का है। उनका ऐसा भव्य रूप और कहीं देखने को नहीं मिलता इसी लिए भक्त दूर-दूर से उनके दर्शनों को आते हैं।

वैसे तो प्रत्येक दिन दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है किन्तु विशेषकर मंगलवार और शनिवार को यहाँ की छटा देखने लायक होती है। इस मंदिर में हनुमानजी का प्रत्येक दिन श्रृंगार किया जाता है और प्रतिदिन सुबह और शाम दो बार आरती होती है। प्रातः आरती, जो लगभग ५:३० पर होती है, के पहले हनुमानजी के वस्त्र बदले जाते हैं और पुनः श्रंगार कर फिर वेदमंत्रों एवं हनुमान चालीसा के पाठ के साथ आरती की जाती है। इस आरती को देखने विशेष रूप से लोग यहाँ पहुँचते हैं।

ऐसी मान्यता है कि श्री कष्टभंजन हनुमान की इस मूर्ति में उनके साथ ३३ कोटि देवता भी विद्यमान रहते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ जो उनके दर्शन करने आता है उसे सूर्यपुत्र शनिदेव के दर्शन भी हो जाते हैं। यहाँ जो कोई भी नारियल चढ़ाता है उसे हनुमान जी के साथ-साथ शनिदेव का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। ये मंदिर भी लगभग २०० वर्ष पुराना है। ऐसी मान्यता है कि २०० वर्ष पूर्ण श्री स्वामी नारायण इस स्थान पर आये और उन्हें स्वप्न में महावीर हनुमान ने इस मंदिर की स्थापना करने को कहा। बाद में उनके शिष्य श्री गोपालदास स्वामी ने वर्तमान प्रतिमा की स्थापना की। ये संसार का एकमात्र ऐसा स्वामी नारायण मंदिर है जहाँ मुख्य प्रतिमा श्रीकृष्ण की नहीं अपितु किसी अन्य देवता की है। 

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार उस प्रदेश में शनिदेव की वक्र दृष्टि से अधिकांश लोग पीड़ित हो गए। तब सबने शनिदेव से ये प्रार्थना की कि वे अपनी कुदृष्टि उनपर ना डालें किन्तु शनिदेव ने अपनी वक्र दृष्टि नहीं हटाई। तब सब ने महाबली हनुमान से प्रार्थना की कि वे उन्हें शनिदेव की कुदृष्टि से मुक्ति दिलवाएं। उनकी प्रार्थना पर महावीर हनुमान ने शनिदेव से अपनी कुदृष्टि हटाने की प्रार्थना की किन्तु उनके ना मानने पर उन्होंने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा।

दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ जो बहुत दिनों तक चला किन्तु अंततः महावीर हनुमान ने शनिदेव को परास्त कर दिया। किन्तु उन्हें परास्त करने के बाद भी हनुमान जी का क्रोध कम नहीं हुआ। उनका वो रौद्र रूप देख कर शनिदेव वहाँ से पलायन कर गए किन्तु क्रोध में आकर हनुमान जी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। तब उनके क्रोध से बचने के लिए शनिदेव ने एक नारी का रूप धर लिया। उन्हें पता था कि हनुमान बाल ब्रह्मचारी हैं इसी कारण वे नारी पर प्रहार नहीं करेंगे। 

ठीक ऐसा ही हुआ, हनुमान ने नारी रूपी शनिदेव पर प्रहार नहीं किया। तब श्रीराम ने उन्हें मार्ग दिखाया और कहा कि वे केवल नारी रूप धरने के कारण अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटें। उनकी आज्ञा पर हनुमान जी ने नारी रुपी शनिदेव को अपने पैरों से दबा कर उनकी वक्र दृष्टि को संतुलित कर दिया। अपने भक्तों के लिए उनका ऐसा समर्पण देख कर शनिदेव भी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उनसे उसी प्रकार वही स्थित हो जाने की प्रार्थना की। साथ ही उन्होंने हनुमान जी को आशीर्वाद भी दिया कि जो कोई भी उनके इस रूप का दर्शन करेगा उन्हें उनकी वक्र दृष्टि का कभी कोई भय नहीं रहेगा, और साथ ही उन्हें हनुमान जी के साथ शनिदेव का आशीर्वाद भी प्राप्त हो जाएगा। तब से महावीर हनुमान शनिदेव के साथ उसी स्थान पर स्थिर हो गए। 

जय हनुमान। जय शनिदेव।

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